तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

बुधवार, 29 जनवरी 2014

गाँधी जी के शहादत दिवस पर विशेष , दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण , ३० जनवरी २०१४ http://epaper.jagran.com/epaper/30-jan-2014-262-edition-National-Page-1.html

गांधी की आत्मा को तो बख्शो
पंकज चतुर्वेदी
यह बात अलग-अलग मंचों पर-अवसरों पर, राजनेता व स्वयंसेवी लगातार रटते रहते हैं कि गांधी एक व्यक्ति या नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका या सिद्धांत है । फिर भी गांधीजी की एक भी समझाईश  पर क्रियान्वयन से परहेज किया जाता रहा है। यह बात भी अब खुल कर सामने आ गई है कि अपने आखिरी दिनों में गांधी खुद को उपेक्षित व विरक्त महसूस कर रहे थे। तन्हा गांधी की आत्मा अपने महाप्रयाण के समय तब के सत्ता-षिखरों से बेहद निराश  थी। उन्हें लग रहा था कि जिन मूल्यों के लिए वे संघर्श कर रहे थे वे असल में आम लोगों तक पहुंचे ही नहीं। जिस अहिंसा के नारे को उन्होंने आजादी का मूल मंत्र बनाया था , वह आजादी ही मिलते ही काफूर हो गया था- विभा जन की घोषणा  होते ही पूरे देष में हुआ कत्लेआम इसकी बानगी था। जाहिर है कि गांधीजी को उस समय समझ आ गया था कि उनके अहिंसा, व दीगर संदेश  नारे से ज्यादा नहीं हैं। तभी से एक हताश  गांधी को हर साल उनके शहीदी दिवस पर बार-बार शहीद किया जाता है।
‘‘ भारत को आजादी मिल गई, कांग्रेस का काम पूरा हो गया । अब इसकी जरूरत नहीं है , इसे समाप्त कर देना ही ठीक है । हमारी कांग्रेस सत्ता की भांति हथियारों के बल पर कायम नहीं रह सकेगी । कांगे्रस ने जनता का विष्वास अपने त्याग , और तप के आधार पर संपादित किया है । पर यदि कांगे्रस जनता की सेवक न बन कर उसकी अधीषशवर बने, अथवा मालिक का दर्जा अपना ले तो मैं अपने अनेक वर्षों  के अनुभव के आधार पर भविष्यवाणी कर सकता हूं कि चाहे मैं जीवित रहूं या न रहूं, एक क्रांति देश  में फैल जाएगी और लोग सफेद टोपी वालों का चुन-चुन कर सफाया कर देंगे । उसका फायदा एक तीसरी शक्ति उठाएगी । ’’ आजादी के कुछ दिन पहले ही 21 मई 1947 को महात्मा गांधी ने पटना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कोई छह दशक बाद के भारत के हालात का अंदाजा लगा लिया था । कांग्रेस, देश्  और जनता आज कुछ वैसे ही हालात से रूबरू हैं, जिसकी आशंका गांधी बाबा को थी । वैसे तो गांधी के शरीर को 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने एक ही बार मारा था, लेकिन उसके बाद तो उनकी आत्मा व विचारों की हत्या का दौर शु रू हो गया है । एक और जयंती है - दिल्ली में राजघाट, 30 जनवरी मार्ग स्थित स्मृति स्थल और देष में जहां कहीं भी गांधी की प्रतिमाएं हैं, उन पर हार-फूल चढ़ाने वालों का तांता  है । हर एक के भाशण में ‘‘साबरमती के संत’’ के सपनों का भारत साकार करने का संकल्प जोर मार रहा है । लेकिन क्या जरा गांधी और कांग्रेस के सच्चे हिमायती होने का दावा करने वाले कांग्रेसियों ने ऊपर उल्लेखित गांधी के उद्बोधन पर गौर किया है ?
दूरदशी गांधी ने कई दशक पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि आजाद हिंदुस्तान को धर्म और जाति के नाम पर विवाद झेलने पड़ेंगे । 11 मई 1935 के ‘‘हरिजन’’ के अंक में  उन्होंने धार्मिक संकीर्णता पर कुठाराघात करते हुए एक आलेख लिखा था -‘‘ यदि मेरे हाथ में सत्ता हेाती  और मैं कानून बना सकता तो मैं सब धर्म परिवर्तन पर रोक लगा देता ’’ ।  गांधी की विरासत के असली हकदार होने का दावा करने वालों के हाथों सत्ता व कानून की डोर लगभग 50 सालों से है । केंद्र में एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, िजसने राजघाट पर जा कर बापू के संकल्प नहीं दोहराए हों । परंतु पूरे देश्  में धर्म परिवर्तन धड़ल्ले से हो रहा है और इसके विषम  परिणाम जनजातिय इलाकों में सामने भी आ रहे हैं । राजनेता का धर्म जनसेवा होता है, जब वही धर्म परिवर्तन कर व्यवसाय करने को उतारू है तो उससे गांधी की आत्मा को सहेजने की क्या उम्मीद की जाए ।
गांधीजी को गिनी-चुनी चीजों से नफरत थी, उनमें सबसे ऊपर षराब का नाम था ।  ‘‘ यंग इंडिया’’  के 03 मार्च 1927 के अंक में उन्होंने एक लेख में उल्लेख किया था कि षराब और अन्य मादक द्रव्यों से होने वाली हानि कई अंषों में मलेरिया आदि बीमारियों सें होने वाली हानियों से असंख्य गुना ज्यादा है । कारण, बीमारियों से तो केवल षरीर को ही हानि पहंुचती है, जबकि षराब आदि से षरीर और आत्मा दोनों का ही नाष होता है ।  गांधी के आदर्शों  के प्रति कृतसंकल्पित होने का दावा करने वाली सरकारों के सर्वोच्च स्थान राश्ट्रपति भवन से ले कर हर छेाटे-बड़े नेता द्वारा शराब की खरीदी व उसका भोज-पार्टी में सार्वजनिक वितरण क्या गांधी की आत्मा को हर पल कचोटता नहीं होगा ?
‘‘यंग इंडिया’’ के ही 15 सितंबर 1927 अंक में गांधीजी ने  मदिरापान पर एक कड़ी टिप्पणी कर इस दिषा में अपनी मंशा  जताई थी- ‘‘ मैं भारत का गरीब होना पसंद करूंगा, लेकिन मैं यह नहीं बर्दाष्त करूंगा कि हजारों लेाग शराबी हों ।  अगर भारत में षराब पांबदी जारी रखने के लिए लेागों को षिक्षा देना बंद करना पड़े तो कोई परवाह नहीं । मैं यह कीमत चुका कर भी शराबखोरी बंद करूंगा । ’’ राजघाट पर फूल चढ़ाते समय हमारे ‘‘भारत भाग्य विधाता’’  क्या कभी  गांधी के इस संकल्प को याद करने का प्रयास करते हैं ? आज हर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए धन जुटाने में शराब से आ रहे राजस्व का बहुतायत है । पंजाब में अधिक शराब बेच कर किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने की घोशणाओं में किसी को षर्म नहीं आई । हरियाणा में षराबबंदी को समाप्त करना चुनावी मुद्दा बना थौ । दिल्ली में घर-घर तक षराब पहुंचाने की योजनाओं में सरकार यूरोप की नकल कर रही है । उत्तर प्रदेष और मध्यप्रदेष के कई कांग्रेसी षराब के ठेकों से परोक्ष-अपरोक्ष जुड़े हैं । यही नहीं भारत सरकार के विदेष महकमे बाकायदा सरकारी तौर पर षराब-पार्टी देते हैं

‘‘भारत छोड़ो आंदोलन’’ की 46वीं वर्शगांठ  पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संपन्न समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बड़े साफ मन से स्वीकार किया था कि गांधीजी के सिद्धांतों पर अमल न करके सरकार ने गलती की है । हम उस गलती को सुधारेंगे ।’’ लेकिन उसके बाद उनकी सरकार चली नहीं । काल के गाल में वह चमकता सूर्य अस्त हो गया । वैसे तो इस बात पर भी षक है कि उस समारोह के बाद वहां बैठे किसी नीति निर्धारकों को राजीवजी के ऐसे संकल्प की याद भी रही हो । हां, हर साल बदलती सरकारें गांधी के एक-एक सपने को चूर जरूर करती रहीं ।
खादी या कुटीर उद्योग की बात हो या षिक्षा या स्वाबलंबन की या फिर अनुसूचित जाति के लेागों के कल्याण या अल्पसंख्यकों को भयमुक्त माहौल देने की नीति, गांधी कहीं बिसूरता सा रहा । महात्मा गांधी ने भारतीय परिवेष में रोजगारोन्मुखी षिक्षा का खाका तैयार किया था, ताकि गांव का पढ़ा-लिखा तबका रोजगार के लिए षहर की ओर पलायन न करे । लेकिन आज की समूची षिक्षा प्रणाली षहरी तड़क-भड़क की ओर आकर्शित करती सी प्रतीत होती है । पठन-पाठन का मूल आधार होता है उसका भाशा माध्यम । गांधीजी हिंदी व अन्य भारतीय भाशाओं में षिक्षा व अन्य कामकाज के कट्टर समर्थक थे ।  देष की आजादी के बाद उन्होंने ‘‘हरिजन सेवक’’(21.09.1947)  में एक आलेख में इस विशय पर अपनी स्पशट टिप्पणी की थी -‘‘ मेरा मतलब यह है कि जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीनने वाले अंग्रेजों की सियासी हुकुमत को हमनें सफलतापूर्वक इस देष से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाशा को भी हमें यहां से निकाल देना चाहिए । ’’  कैसी विडंबना है कि गांधी के देष में अंग्रेजी ना केवल दिन दुगना-रात चैगुना प्रगति कर रही है, बल्कि संसद, सुप्रीम कोर्ट और सभी बड़े दफ्तरों में आधिकारिक भाशा अंग्रेजी ही है । यही नहीं अब तो हमारे देष में ऐसे बुद्धिजीवियों की जमात खड़ी हो रही है, जो कि अंग्रेजी को विदेषी भाशा ही नहीं मानते हैं ।  गांधी के सच्चे भक्तों की सरकारें  अब स्कूली स्तर पर सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेजी को अनिवार्य बना रही हैं ।
दिल्ली दुनिया के सबसे अधिक प्रदूशित नगरों में से है । यहां की सबसे बड़ी सड़क ‘रिंग रेाड’ कों महात्मा गांधी का नाम दिया गया है, यह जानते हुए भी कि यह सबसे दूशित इलाकों में से एक है । इतनी बड़ी सड़क को गांधी का नाम दे कर नेताओं ने सोचा कि वे गांधी को सम्मानित कर रहे हैं । ठीक उसी तरह गांधी के सिद्धांतों और मान्यताओं की समाधियों पर फूल चढ़ा कर उनकी आंख का पानी नहीं मर रहा है । न्यायमूर्ति कुदाल आयोग की रिपोर्ट में तो देष की गांधीवादी संस्थाओं को विभिन्न अनियमितताओं व कानून-विरेाधी कृत्यों का अड्डा बताया गया था । कागं्रेस के प्रति गांधी की भविश्यवाणी आज सत्य होती दिखती है । दूसरे मामलों में भी लेागों को अब संभल जाना चाहिए, वरना गांधी का नाम तो उनके महान कार्यों के कारण सदैव याद रख जाएगा, पर साथ में यह भी भुलाया नहीं जा सकेगा कि उस संत की षिक्षाओं को न मानने हमनें क्या खो दिया है ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
नई दिल्ली -110070

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