तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 26 जुलाई 2014

Iron medicne like iron piles

THE SEA EXPRESS AGRA 27-7-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=65728&boxid=30877844

लोहे के लिए लोहे के चने चबाते हैं मरीज
                          पंकज चतुर्वेदी


भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करता है । फलस्वरूप पौष्टिक आहार के अभाव में रक्त की कमी या एनीमिया एक आम रोग है । यह बड़े सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाता रहा है कि इस बीमारी का इलाज केवल लोह तत्वों का भक्षण है, और इसके लिए अंग्रेजी दवाएं एकमात्र जरिया हैं । लेकिन यह बात ना तो डाक्टर बताते हैं, और ना ही सरकारी एजेंसियां कि हमारी बाजार में उपलब्ध तथाकथित आयरन-दवाएं ना तो सही है और न कारगर । बीते एक सयाल में दिल्ली सहित देष के अलग अलग हिस्सों से यह खबरें लगातर आती रहीं कि सरकार द्वारा स्कूल में बांटी गई आयरन की गोलियां खा कर बच्चे बीमार हो गए। लोग दवाईयों की गुणवत्ता के छिद्रान्वेशण में तो तल्लीन रहे, लेकिन इस पर विमर्ष नहीं हुआ कि क्या लोहे के लिए अंग्रेजी दवाई की गोली ही एक मात्र विकल्प है ?
जनसंदेश टाईम्‍स, उ.प्र.http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/30-07-2014&spgmPic=9

लौह तत्व युक्त दवाएं तैयार करने का क्षेत्र उपभोक्ताओं के लिए खासा धंुधला है । कई ऐसी बाते हैं जिन्हें हम जानते नहीं हैं, जानते है तो सिर्फ वही जो लुभावने विज्ञापनों में दर्शाया जाता है । अधिकांश लोह-टानिक बहुत महंगे और अनियमित मात्रा वाले होते हैं । हाइमेटेनिक्स के नाम से प्रचलित लौह टानिक पांच विभिन्न रूपों में बिकते हैं - वे जिनमें केवल आयरन-फोलिक एसिड का मिश्रण होता है, वे जो स्पान्सूल के रूप में बेचे जाते है, कुछ में विटामिन्स और अन्य अयस्क भी होते है,सीरप की तरह बेचे जा रहे और जिनमें हीमोग्लोबिन होता है ।
भारत के बाजारों में ऐसे हाइमेटेनिक्स की बाढ़ सी है जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं, लेकिन उनका प्रचार-प्रसार बड़े ही लुभावने ढ़ंग से किया जाता है । यहां तक कि हीमोग्लोबिन वाले आयरन टानिकों पर पाकिस्तान सरीखे देश तक ने पाबंदी लगा रखी है । कुछ सालों पहले भारत में भी इस पर पाबंदी के लिए प्रकिया शुरू हुई थी, लेकिन दवा उत्पादकों की सशक्त लाबिंग के चलते यह खतरनाक टानिक दवा के रूप में अभी भी धड़ल्ले से बिक रहा है । विकसित देशों में हीमोग्लोबिन का इस्तेमाल कुत्तों के भोजन के रूप में किया जाता है, ना कि हाइमेटेनिक्स के रूप में । इसके बारे में एक और घिनौना तथ्य यह है कि कुछ हीमोग्लोबिन उत्पादों का निर्माण कसाई खानों से एकत्र किए गए खून से किया जाता है और ऐसी दवाईयां अधिक लाभकारी भी नहीं हैं । इसके विपरीत इनकी कीमत अंधाधंुध ऊंची होती हैं ।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हाइमेटेनिक्स के विभिन्न ब्रांडों की कीमतों में बेवजह खासा अंतर रखा जाता है । इनमें से कई आदमी की सेहत पर उलटा ही असर करते हैं । ‘मेक्राफोलीन-आयरन’ को हाइमेटेनिक्स में सबसे सस्ता ब्रांड है । मेक्राफोलीन की तुलना में अन्य दवाईयां 145 गुना तक महंगी हैं।‘फेरवीट’ नामक गोली की कीमत इससे 1.4 गुना अधिक है । बाजार में हाइमेटेनिक स्पान्सूल लगभग सात गुना अधिक कीमत पर बेचे जाते हैं और हाइमेटेनिक सीरप की कीमत दो से 145 गुना ऊंची है । जबकि हीमोग्लोबिन वाले हाइमेटेनिक्स की कीमतें मेक्राफोलीन-आयरन गोलियों की तुलना में 16 से 115 गुना अधिक होती हैं । खेदजनक बात तो यह है कि अधिकांश डाक्टर इस सवाल पर अनुत्तरित रहते हैं कि लौह-दवाओं की विभिन्न किस्मों की कीमतों में आखिर इतना फर्क क्यों हैं ?
हीमोग्लोबिन युक्त दवाएं बनाने वाली कंपनियां बड़े जोर-शोर से प्रचार करती है कि हाइमेटेनिक-आयरन की अवशोषण क्षमता काफी अधिक 30 प्रतिशत की दर तक होती है । लेकिन वे इस तथ्य को चालाकी से छुपाते है कि हीमोग्लोबिन के प्रत्येक ग्राम में मात्र 3.4 मिली ग्राम लोहे की मात्रा ही होती है । साथ ही साथ जानवर के खून से तैयार इस दवा के कारण एलर्जी होने की संभावना रहती है । हमारे देश की तेज गर्मी में ऐसी दवाओं में सड़न पैदा होने लगती है, जो ‘माईक्रोआरगन’ की पैदावार को बढ़ावा देता है । फलस्वरूप इसका सेवन करने वाले विभिन्न संक्रामक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं । मजेदार बात यह है कि कोई भी मेडिकल संस्था अधिकृत रूप से यह दावा नहीं करती है कि मानव शरीर में लौह-अयस्क की कमी पूरी करने के लिए हाइमेटेनिक दवाएं कारगर हैं । विकसित देशों में तो लौह-अस्यकों से परिपूर्ण इन छलावापूर्ण उत्पादों पर कई साल पहले से पूरी तरह पाबंदी है । जब कि भारत में ऐसी कई दवाएं सर्वाधिक बिकने वाले टानिकों में से हैं ।
यही नहीं ऐसे सीरप तैयार करने में प्रयुक्त जानवरों के लीवर के अर्क में बहुत सारे बेकार व अवांछित अंश भी होते हैं, जो लौह अयस्क के अवशोषण में बाधक हैं । एनिमिया यानि रक्त अल्पता के उचित इलाज हेतु रिपोर्ट में कहा गया है कि विशुð लौह कमी के लिए लौह-लवण देना और गर्भावस्था में फोलिक एसिड की अतिरिक्त खुराक देना पर्याप्त होता हैं । लौह अयस्कों को खाने के रूप में देना ही उचित है, क्योंकि इंजेक्शन के जरिए आयरन देना कष्टप्रद, असुविधाजनक और खतरनाक होने के साथ-साथ महंगा भी होता हैं । ऐसा तभी करना चाहिए जब रोगी को मूंह से दी गई आयरन-दवाएं पच नहीं रही हो, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है । बताया गया है कि मूंह से लिए गए प्रत्येक मिलिग्राम लौहे के लिए अन्य मंहगे उत्पादों के बनिस्पत फैरस सल्फेट सर्वाधिक प्रभावकारी और सुरक्षित होता है । 
आमतौर पर डाक्टर सामान्यतया आंखों की पुतलियां देखते हैं और मरीज को एनीमिया की शिकायत बता देते हैं । फिर शुरू हो जाता है आयरन युक्त दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल । जबकि एनीमिया की पुष्टि के लिए और कई परीक्षण किए जाने आवश्यक होते हैं । यह एक भयानक तथ्य है कि विभिन्न कंपनियों के  उत्पादों की पैकिंग पर दर्ज दवा की मात्रा भी आमतौर पर गलत ही होती है ।
फेरस सल्फेट इस बीमारी का बहुत ही सस्ता और कारगर उपाय है । इसके बावजूद दवाई कंपनियां फेरस सल्फेट की गोलियां बनाने में कतई रुचि नहीं दिखाती हैं, क्योंकि वे इससे अधिक मुनाफा नहीं काट सकेगें । विडंबना है कि हमारे देश में ऐसे कोई नियम कायदे नहीं हैं, जिसके तहत कंपनियों पर ऐसी सस्ती लौह-दवाओं के उत्पादन के लिए दबाव डाला जा सकें । अधिकांश लोगांे का यह भ्रम होता है कि महंगे हाइमेटेनिक्स अधिक कारगर व कम साईड इफेक्ट वाले होते हैं । जबकि इंग्लैंड की जानमानी कंपनी गुडमेन एंड गिलमेन का भी मानना है कि बाजार में उपलब्ध तथाकथित लौह दवाएं खून बढ़ाने में बहुत कम प्रभावी हैं । राम बाण के रूप में प्रचारित विटामिन बी कांपलेक्स के मिश्रण वाले हाईमेटेनिक फार्मूलों में तांबा, कोबाल्ट, लीवर के अर्क या जानवरों के हीमोग्लोबिन की अनियंत्रित मात्रा होती हैं । जो निश्चित ही बेहद नुकसान दायक हैं । ईमानदार चिकित्सा सिðांतों के तहत ऐसी दवाओं को औषधि के रूप में बेचना ही गैरकानूनी व अनैतिक है ।
वैसे आयरन की कमी को दूर करने के लिए आधारभूत दवा (फेरस सल्फेट) का उपयोग ही कारगर होता है। दवाई के क्षेत्र में कार्यरत् बहुराष्ट्ीय कंपनियां आंखों में धूल झोकते हुए आयरन के साथ कई ऐसे घटकों के मिश्रण का लुभावना फार्मूला पेश करती है, जो किसी भी चिकित्सा प्राधिकरण व्दारा मान्य ही नहीं होता हैं । ऐसी दवाओं को बेचने के लिए कंपनियां काकटेल पार्टी, भेंट आदि के जरिए कतिपय डाक्टरों को इस फरेब में शामिल करती हैं । लौह-तत्व की कमी पूरी करने के लिए दवाओं के बनिस्पत ऐसे फल-सब्जियों का सेवन करना चाहिए, जिन्हें काटने पर वे काले पड़ जाते हैं जैसे-बैंगन । दआज जरूरत इस बात की है कि सामान्य बीमारियों में की जा रही असामान्य दवाओं की आड़ में लोगों के साथ धोखा देने की बढ़ती प्रवर्ति के खिलाफ सशक्त उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हो । इस अभियान में निश्चित ही डाक्टरों की भूमिका तो अहम होगी ही ।
पंकज चतुर्वेदी                              
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