तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

Farmers needs sure cost of agriculture products,

किसान बेहाल बिचोलिया मालामाल 
पंकज चतुर्वेदी


राज एक्सप्रेस भोपाल १६ जनवरी १५ http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx
हाल ही में दिल्ली-एनसीआर में जब सब्जी फल के दाम बेतहाशा  बढ़ने पर कुछ खबरिया चैनल ने रिपोर्ट कीं तो अखबारें में इश्तेहार छपे कि मंडी व मुहल्ले में फुटकर बेचने वालों के दामों में कितना ज्यादा अंतर है-कई जगह चालीस फीसदी तक। लेकिन कभी किसी ने यह नहीं बताया कि किसान को मिली कीमत व उपभोक्ता की खरीद में कितना फासला रहा है- शायद 70 टका तक। यह हर साल देश  के किसी ना किसी हिस्से में होता है कि जब किसान को मडी तक माल लाने का भाड़ाा निकालना भी मुश्किल होता है तो वह हताश  हो कर फसल इस मजूबरी में काट कर फैंक देता है कि उसे इसी जमीन पर अगली फसल भी उगानी है। यह देश भर की फल-सब्जी मंडियों का हाल है कि किसान अपनी खून-पसीने से कमाई-उगाई फसल ले कर पहुंचता है तो  उसके ढेर सारे सपने और उम्मीदें अचानक की ढह जाते हैं। कहां तो सपने देखे थे समृद्धि के , यहां तो खेत से मंडी तक की ढुलाई निकालना भी मुष्किल दिख रहा था। असल में यह किसान के शोषण , सरकारी कुप्रबंधन और दूरस्थ अंचलों में गोडाउन की सुविधा या सूचना ना होने की मिली-जुली साजिश  है, जिसे जानबूझ कर नजरअंदाज किया जाता है।
अब कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेष में आलू की इतनी अधिक पैदावार हो गई है कि बामुशकील  तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिल पा रहा है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भर गए हैं। जाहिर है कि आने वाले दिनों में आलू मिट्टी के मोल मिलेगा। कैसी विडंबना है कि जिस आलू, प्याज के लिए अभी एक महीने पहले तक मारा-मारी मची थी ,वह अब मारा-मारा घूम रहा है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसान की हताशा  आम आदमी पर भारी पड़ी है। पूरे देश की खेती-किसानी अनियोजित ,शोषण  की शिकार  व किसान विरोधी है। तभी हर साल देश  के कई हिस्सों में अफरात फसल को सड़क पर फैंकने और कुछ ही महीनों बाद उसी फसल की त्राहि-त्राहि होने की घटनाएं होती रहती हैं। किसान मेहनत कर सकता है, अच्छी फसल दे सकता है, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को भी उसके परिश्रम के माकूल दाम , अधिक माल के सुरक्षित भंडारण के बारे में सोचना चाहिए। शायद इस छोटी सी जरूरत को मुनाफाखोरों और बिचैलियों के हितों के लिए दरकिनार किया जाता है।
जब कभी कोई किसान हालात से हताश  हो कर खुदकुशी कर लेता है तो प्रशा सन का पहला बयान यही
होता है कि मृत मानसिक रूप से विक्षिप्त था। वैसे यह गलत भी नहीं है - अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देष का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान पागल ही तो है, जिसकी ना तो कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिष्ठा , तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता हे। जब कभी बेहतरीन मानसून और अच्छी बुवाई के कारण किसान बंपर फसल की उम्मीद में बहुत खुश  होता है । जब उसके श्रम से उपजे अनाज के दाने खेतों में सोने की तरह दमकते दिखते हैं और सपनों से लवरेज किसान जब माल लेकर मंडी पहुंचता तो उसके सपने छन्नकर बिखर जाते हैं और संकट मुंह बाए दिखने लगता है कि घर का खर्च, बैंक का कर्ज, अगली फसल की तैयारी.... कैसे कुछ होगा।
किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशी  उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा  बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञा होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
खेती एक चुनौती वाला कार्य है । कभी सूखा पड़ गया तो कभी इंद्र की कृपा जरूरत से ज्यादा हो गई । कहीं ओलों की मार तो कभी आंधी या चक्रवात । पलक झपकते ही महीनों की हाड़ तोड़ मेहनत व खाद-बीज पर हुआ खर्चा  मिट्टी होता दिखता है । भारतीय कृषि में बहुत विविधता है । एक तरफ पूरी तरह सिंचित खेती तो दूसरी ओर बारिश पर निर्भर किसान । तभी एक तरफ बढि़या फसल लहलहाती है तो दूसरी तरफ बाढ़ या सूखे से किसान रोता दिखता है । ऐसी स्थिति में बार-बार फसलों के विशेषकर बारानी, सूखा या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नष्ट होने से किसानों की उत्पादन के स्तर में अनिश्चितता तथा मूल्यों के उतार-चढ़ाव की स्थिति से निबटने की क्षमता बहुत कम हो गई है । इसके साथ ही कर्जे की वापिसी और वित्तीय संस्थाओं द्वारा कृषि में निवेश भी बहुत कम रहा है। इसी दर्द के चलते बीते कुछ सालों में हजारों किसानों की खुदकुशी करने की मार्मिक घटनाएं राजनेताओं की आपसी बहस का मुख्य मुद्दा रही हैं। इसके बावजूद खेती-किसानी के बीमा के मामले में सरकार का नजरिया सदैव लापरवाही वाला रहा है । भारत एक कृशि-प्रधान देष है । देष की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृशि है । आंकड़े भी यही कुछ कहते हैं। देष की 67 फीसदी आबादी और काम करने वालों का 55 प्रतिषत परोक्ष-अपरोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है। जनवरी-मार्च 2009  की अवधि में देष की विकास दर 5.8 प्रतिषत रही, जिसमें खेती की विकास दर 2.7 रही है।
1947 में डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रस्तुत किए गए केंद्रीय विधान में फसल बीमा पर राष्ट्र व्यापी बहस की जरूरत का उल्लेख किया गया था । इसके बाद समय-समय पर फसल बीमा के खूब लुभावने छलावे सामने आए, लेकिन किसी से भी किसान को उसकी मेहनत व लागत के सुनिष्चित लाभ का प्रतिफल नहीं मिला। ऐसी योजनाओं में आम किसान की भागीदारी, कर्ज लेते समय दस्तखत या अंगूठा लगाने के लिए एक फार्म की बढ़ौतरी से अधिक नहीं थी । हकीकत में किसान को मालूम ही नहीं चलता था कि उसकी फसल का बीमा हुआ है । हां, किसी प्राकृतिक विपदा के समय कर्जा माफ होने पर कुछ राहत जरूर महसूस होती थी ।
वैसे भी फसल बीमा किसानों के लिए अनिवार्य नहीं है । हमारे देश के किसानों में निरक्षरता का प्रतिशत बेहद अधिक है , गांवों तक संचार व सड़क का टोटा है ; यानी जागरूकता का अभाव है । ऐसे में दूरस्थ गांवों तक किसानों को इसका लाभ मिलना संदिग्ध ही रहा है । आज देश में कोई 25 लाख किसान ऐसे हैं जिनकी जोत का रकबा एक हेक्टर से कम है । ये लोग कुल संभावित उत्पादन के दो फीसदी के बराबर प्रीमियम भुगतान करने में असमर्थ हैं ।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो।  बोहनी के समय ही हर किसान के रकबे में बोई गई फसल, उससे संभावित फसल का आंकड़ा सरकार के पास हो तथा किसी दुखद परिस्थिति में किसान को मुआवजा उसी के अनुसार सीधे उसके बैंक खाते में जमा करने का नेटवर्क बनाया जाए। इसमें समय-सीमा भी कड़ाई से षामिल हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचैलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है।  एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देष के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण हो रहा है । किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेष पर प्रतिबंध -जैसे कदम देष का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिषत है ,जबकि भारत में यह गत 20 सालों से दो को पार नहीं कर पाई है। अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देष में हिंसक आंदोलन भी हो रहे हैं। विडंबना है कि हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति ना ही समाज और ना ही सियासती दल संवेदनषील दिख रहे हैं। काष कोई किसान को फसल की गारंटेड कीमत का आष्वासन दे पाता  तो किसी भी किसान कोे कभी जान ना देनी पड़ती।


पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
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