तालाब की बातें

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गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

Libya violence : threat to Africa

अशांत अफ्रीका कहीं उपजा न दे लीबिया में विद्रोह


ट्यूनीशिया, नाइजर, चाड और मिस्र से घिरा लीबिया अब दुनिया के लिए नए खतरे के रूप में ‘आजाद’ हो चुका है। इससे पहले इराक और अफगानिस्तान को भी आजाद किया गया, जो अब दुनियाभर में आतंक के कारक बन गए हैं। 41 साल तक लीबिया पर शासन करने वाला मुअम्मर गद्दाफी बीते दो दशकों से अमेरिका की आंख का कांटा बना हुआ था। इस मार्च में गद्दाफी सरकार के पतन के चार साल हो गए हैं और हकीकत यह है कि लीबिया यानी अरब-अफ्रीका के बीच का एक संपन्न देश अब लंबे समय तक के लिए अशांत और आतंकवादग्रस्त क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। वहां न तो सरकार है, न ही अर्थतंत्र, आईएस के आतंकवादियों व तस्करों के लिए यह मुफीद जगह बन गया है। संयुक्त राष्ट्र ने इस देश को हथियार खरीदने पर पाबंदी लगा रखी है, सो यहां चल रहा नशे के बदले हथियार का खेल पूरी दुनिया के लिए खतरा बन रहा है। विडंबना यह है कि कभी धर्मनिरपेक्ष, विशेष रूप से भारतीयों के लिए सुरक्षित जीवनयापन का स्थान लीबिया, अब रंगभेद व कट्टरपंथियों के हाथों में आ चुका है। मुल्क में जहां कभी भी काले लोग दिख रहे हैं, उन्हें विद्रोही सेना के लोग यह कहकर सरेआम मार रहे हैं कि ये गद्दाफी के भाड़े के सैनिक हैं। बेनगाजी सहित कई इलाकों के स्कूलों को गद्दाफी समर्थकों से पूछताछ का यातनागृह बना दिया गया है। वहां बीते चार सालों से पढ़ाई बंद है और सरकारी स्कूल पूछताछ के नाम पर हो रही अमानवीय हरकतों, लाशों और खून-मांस के लोथड़ों से पटे पड़े हैं। अंदाजा है कि विद्रोही सेना के हाथों मारे गए गद्दाफी समर्थकों की संख्या हजारों-हजार में है। असल में लीबिया टुकड़ों में बंटा हुआ जमीन का टुकड़ा मात्र है। वह फटे हुए चादर की तरह है, जहां शक्ति के लिए संघर्ष चल रहा है। जहां आम लीबियाई अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए क्षेत्रीय, राजनीतिक और कबीलाई मतभेदों के बीच जी रहा है। वहां दो अलग-अलग गुटों के संगठन हैं, जो एक-दूसरे के विरुद्ध हैं। हर एक के पास अपनी सेना, अपना प्रधानमंत्री और अपनी सरकार है और दोनों ही अपने वैधानिक होने का दावा करते हैं। यदि आप पूर्वी लीबिया के बएदा और टोब्रक में हैं, तो वहां अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसको जनरल खलीफा हफ्तार का समर्थन है और यदि आप पश्चिमी लीबिया के त्रिपोली में हैं, जहां तेल मंत्रालय है, नेशनल ऑयल कारपोरेशन है तो यहां मिलिशियाई गुटों द्वारा समर्थित स्वयंभू इस्लामी सरकार है, जिसके नीतिगत समझौते उन कट्टर इस्लामिक मिलिशियाई गुटों से भी हैं, जिन पर उसकी कोई पकड़ नहीं है। पूरे देश में दो किस्म की सरकारें हैं- त्रिपोली में उमर अल हसी का शासन है तो तोबरूक में अब्दुल्ला अल थानी का। वहां के तेल के कुओं से उत्पादन नहीं हो रहा है, क्योंकि उन पर कभी एक गुट तो कभी दूसरे गुट के हमले होते रहते हैं। तेल से होने वाली आय पच्चीस फीसदी भी नहीं बची है और देश के लगभग सभी बैंक दीवालिया घोषित हो चुके हैं। लोगों का पलायन जारी है और हर गांव-कस्बा युद्ध का मैदान बना हुआ है। इधर मिस्र भी दाएश (आईएस का संगठन) को मजा चखाने के लिए लीबिया पर हवाई हमले कर रहा है, जिसका खामियाजा भी स्थानीय जनता को ही भुगतना पड रहा है। यहां जानना जरूरी है कि अफ्रीका का साहेल क्षेत्र यानी सहारा रेगिस्तान से ले कर सूडान सवानास तक का इलाका, जिसमें चाड, नाइजर, नाइजीरिया, माली, इथोपिया जैसे कई देश आते हैं, इन दिनों नशे की तस्करी करने वालों का खुला मैदान बना हुआ है। सनद रहे कि गद्दाफी ने अपने देश की दक्षिणी सीमाओं पर इस तरह की अत्याधुनिक व संवेदनशील मशीनें लगवा रखीं थीं जोकि नशीली चीजों की छोटी मात्रा को भी तत्काल पकड़ लेती थीं। लगातार युद्ध के कारण लीबिया की सीमाओं पर लगे यंत्र काम नहीं कर रहे हैं। आईएस और एक्यूआईएम संगठन के लोगों की हशीश से भरी गाड़ियां नाइजर के रास्ते लीबिया के दक्षिणी इलाकों से घुसती हैं और वहां से अत्याधुनिक हथियार ले कर लौटती हैं। याद करें, लीबिया में जन-विद्रोह के शुरुआती दिनों में लोगों ने फौज के हथियार डिपो लूट लिए थे। बताया जा रहा है कि अब यही हथियार हशीश के बदले आईएस नेटवर्क तक पहुंच रहे हैं।तेल के भंडारों के कारण समृद्ध उत्तरी अफ्रीका के देश लीबिया में 42 साल तक शासक रहे कर्नल गद्दाफी ने अमेरिका के दबाव को कभी नहीं माना, शायद इसीलिए उन्हें सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका ने नाटो की अगुवाई में अपने सैन्य विमानों से पूरे मुल्क के चप्पे-चप्पे पर बमबारी करवा दी। इराक में अमेरिका ने अपनी सेना के बल पर सत्ता परिवर्तन करवाया, आज भी देश अंदरूनी असंतोष और आतंकवाद से जूझ रहा है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जब वहां बम धमाकों में निर्दोष लोग मारे न जाएं। अफगानिस्तान में अमेरिका के बल पर बनी सरकार की आज भी काबुल के बाहर नहीं चलती है। शेष मुल्क अभी भी विद्रोही तालिबान के इशारे पर नाच रहा है। एशिया के बाद अफ्रीका में इस तरह के असंतोष का उभरना आने वाली दुनिया की शांति, विकास और खुशहाली के लिए गंभीर खतरा है। अब ब्रिटेन की सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि लीबिया से हो रहा बड़ी संख्या में अवैध आव्रजन पूरे यूरोप के लिए खतरा बन रहा है। हालांकि ब्रितानी सरकार को यह भी स्वीकार करना था कि आतंकवादी आमतौर पर स्थानीय असंतोष, लचर आर्थिक व्यवस्था, लापरवाह सीमाई सतर्कता जैसे मुद्दों को आधार बना कर अपना विस्तार करते हैं और लीबिया का ताजातरीन तख्ता पलट ऐसे सभी हालातों को जन्म दे चुका है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह विचार करना होगा कि हथियारों के बल पर वैचारिक टकराव की नीति निर्दोष लोगों की जिंदगी पर खतरा ही होती है। किसी भी विद्रोह को समाप्त करने के लिए ताकत के बल पर दबाना और वैचारिक रूप से संतुष्ट करना, दोनों ही बराबर मात्रा में एकसाथ लागू करना जरूरी होता है।
= पंकज चतुर्वेदी

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