तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

बुधवार, 1 जुलाई 2015

Flood : The men made disaster

आखिर क्यों उफन जाती हैं नदियां
 पंकज चतुर्वेदी
पंकज चतुर्वेदी
शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया...

अभी आषाढ़ शुरू ही हुआ था कि दो दिनों की बारिश ने उत्तरांचल व हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों पर कयामत ढहा दी, असम व पूर्वोत्तर राज्यों में हजारों लोग बाढ़ के कारण घर-बार छोड़ रहे हैं। बंगाल के कई जिलों में भी जल-विप्लव के यही हालात हैं। अभी तो बारिश के असली महीने सावन की शुरूआत हुई है और लगभग आधा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश का बड़ा हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पानी-पानी होने की संभावना से भयभीत है। मानसून की पहली फुहार में ही आधे गुजरात की हालत बाढ़ के कारण खराब हो गई है। बीते कई सालों से यह तो हर बार की त्रासदी है कि भले ही कागजों पर सूखा हो, लेकिन ज्यों-ज्यों मानसून अपना रंग दिखाता है, वैसे ही देश के बड़े भाग में नदियां उफन कर तबाही मचाने लगती हैं। हालांकि सरकारी महकमे बाढ़ से निबटने के नाम पर लाखों रूपए की खरीद-फरोख्त कर पानी के आतंक को रोकने के लिए कागजों की बाढ़ लगाते हैं, पर शायद उनका असली उद्देश्य बाढ़ से हुई तबाही के बाद पुनर्वास के नाम पर अधिक बजट प्राप्त करना मात्र होता है। पिछले कुछ सालों के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाकों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनाने लगी हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है।सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह बढ़ कर ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया। अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है। पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढहने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल बह जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं। यह जानकर आश्चर्य होगा कि सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं है। देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है। असम का जीवन कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं। हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते हैं। सरकार उनके प्रति सहानुभूति प्रकट कर उन्हें सहायता का ढोंग करती है, लेकिन वहां की बाढ़ प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित स्थान पर बसाहट के लिए कभी नहीं सोचा गया। बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है। यहां के पहाड़ों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ की बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है। सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की उपरी परत, गहराई तक छेदता है। यह मिट्टी बहकर नदी-नालों को उथला बना देती है और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं।देश के कुल बाढ़ प्रभवित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है। यहां कोशी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं। इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केंद्र सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा है। यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं। ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है। लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रुपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है। हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल नहीं रहे हैं। कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं। कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सील्ट यानी गाद के भराव से उंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती हैं। फरक्का बैराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मंुगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। विदित हो आजादी से पहले अंग्रेज सरकार द्वारा बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था। तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था। इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है। बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों का ताजातरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली छोटी नदी केन है। बुंदेलखंड सदैव से बाढ़ सुरक्षित माना जाता रहा है। गत डेढ़ दशक से केन अप्रत्याशित ढंग से उफन रही है और पन्ना, छतरपुर और बांदा जिले में जबरदस्त नुकसान कर रही है। केन के अचानक रौद्र हो जाने के कारणों को खोजा तो पता चला कि यह सब तो छोटे-बड़े बांधों की कारस्तानी है। सनद रहे केन नदी बांदा जिले में चिल्ला घाट के पास यमुना में मिलती है। जब अधिक बारिश होती है या किन्हीं कारणों से यमुना में जल आवक बढ़ती है, तब इसके बांधों के कारण इसका जल स्तर कुछ अधिक ही बढ़ जाता है। उधर केन और उसके सहायक नालों पर हर साल सैकड़ों स्टाप-डेम बनाए जा रहे हैं, जो इतने घटिया हैं कि थोड़ा ही जल संग्रहण होने पर टूट जाते हैं। केन में बारिश का पानी बढ़ता है, फिर स्टाप-डेमों का जल-दबाव बढ़ता है। साथ ही केन की राह पर स्थित पुराने ओवर-एज हो गए बांधों में भी टूट-फूट होती है। यानी केन क्षमता से अधिक पानी ले कर यमुना की और लपलपाती है। वहां का जल स्तर इतना उंचा होता है कि केन के प्राकृतिक मिलन स्थल का स्तर नीचे रह जाता है। रौद्र यमुना, केन की जलनिधि को पीछे ढकेलती है। इसी कशमकश में नदियों की सीमाएं बढ़ कर गांवों-सड़कों-खेतों तक पहुंच जाती हैं।वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है ।पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। सनद रहे हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है। इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे जीवित-पहाड़ भी कहा जाता है। इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर चट्टानें न हो कर, कोमल मिट्टी है। बारिश या बर्फ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है। पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं। लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेशकीमती मिट्टी अब बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है। साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता धीरे-धीरे है। पहली बारिश में ही आधे गुजरात के दरिया बन जाने का असली कारण वहां की छोटी नदियों का उथला होना ही है। मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंहतोड़ जवाब हो सकते हैं।
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