तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

Our wariors of 71 war will never come back

तो अब कभी भी लौटेंगे हमारे 1971 के जांबाज


                                                                                      पंकज चतुर्वेदी
एक सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जो जवाब दिया, उससे तो स्पष्ट हो गया है कि इंतजार, उम्मीदों के 44 साल बेकार गए और सन 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का इतिहास ही नहीं, विश्व का भूगोल बदलने वाले वे 54 रणबांकुरे कभी लौट कर घर नहीं आऐंगे, जो पाकिस्तानी जेलों में थे। भारत के कई प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान की जेलों में गए, संसद में कम से कम 24 बार सरकार कहती रही कि हमारे बहादुर जवानों के पाकिस्तान में होने की संभावना है। लेकिन अब सरकार ने भी कह दिया कि चूंकि पाकिस्तान अपनी जेलों में किसी भी युद्ध बंदी की मौजूदगी से इनकार करता है, सो उनमें से कोई जीवित नहीं है। जानकर आश्चर्य होगा कि उन 54 में से तीन का कोई सेवा रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं है, जाहिर है कि ऐसे में उनके परिवारों को पेंशन व अन्य सुविधाएं मिलना भी मुश्किल होगा। ऐसा नहीं है कि हमारे 54 रणबांकुरों के पाकिस्तानी जेलों में होने की बात महज संभावना के आधार पर उठाई जाती रही हो। उन जवानों के परिवारीजन अपने लोगों के जिंदा होने के सबूत भी देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है। इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी। लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं, जिन्हें न तो शहीद माना जा सकता है और न ही गुमशुदा।उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारीजन अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं। दिल मानता नहीं है कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं। 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं, उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं। इनमें 6 मेजर, 1 कमांडर, 2 फ्लाइंग आफिसर, 5 कैप्टन, 15 फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 1 सेकेंड फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 3 स्कावर्डन लीडर, 1 नेवी पालयट कमांडर, 3 लांसनायक, और 3 सिपाही हैं।एक लापता फौजी मेजर
MP jansandesh 12-9-15
अशोक कुमार सूरी के पिता डॉ. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं। डॉ. सूरी को 1974 व 1975 में उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी। 1979 में डॉ. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है। मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए। पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था। लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर ‘संडे पाकिस्तान आब्जर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी। वीर तंाबे का विवाह बैडमिंटन की राष्ट्रीय चैंपियन रहीं दमयंती से हुआ था। शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी। तब से 44 साल हो गए, दमयंती अपने पति की राह देख रही हैं। सेकेंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे। कैप्टर रवींद्र कौरा को अदम्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने वीर चक्र से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है।पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है। बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है। किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं। भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी हैं। जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक विक्षिप्त हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट में सरकार के सालिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं ले जाया जा सकता। यहां पता चलता है कि युद्ध के बाबत संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं। इनका क्रियान्वयन से कोई वास्ता नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेडक्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे। दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं। इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है। लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा। 1972 में अतंरराष्ट्रीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी। लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गईं।
प्रभात, मेरठ 13 सितंबर 15
एक गुमशुदा फ्लाइंग आफिसर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था। लेकिन वो सूची अचानक नदारद हो गई।भारत सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी मानते रहे हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं। उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं। करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। लापता फौजियों के परिवारीजनों का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में हैं। पर दावों पर राजनीति के दांवपंच हावी हैं।विएना समझौता के तहत सैनिकों के मारे जाने के बाबत जो प्रमाण होने चाहिए, पाकिस्तान सरकार उनमें से एक भी प्रमाण इन 54 जवानों के लिए दे नहीं पाई है। अलबत्ता पाकिस्तान सरकार ने लापता फौजियों को जेल में पहचानने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल को आने का न्यौता दिया था। पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जेल दिखाने के नाटक किए जाते रहे। लेकिन अपनी एक गलती छिपाने के लिए पकिस्तान सरकार ने भारतीय अभिभावकों के सामने 160 साधारण भारतीय बंदी शिनाख्त के लिए पेश किए। इनमें से एक भी फौजी नहीं था। जेल अधिकारियों ने ही दबी जुबान में कह दिया कि उन्हें गलत जगह भेजा गया है। भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारीजनों को अभी तक सिर्फ आस दे रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दायर जवाब के बाद वह उम्मीद भी टूट गई है। काश, 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापस लिया होता। पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें उन सैनिक परिवारों के आंसुओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ।44 साल के लंबे अंतराल में हमारा लंबा-चौड़ा प्रशासनिक व गुप्तचर तंत्र, उन वीरों की वापसी तो दूर की बात है, वो प्रमाण भी सरकारी तौर पर मुहैया नहीं करवा पाया है, जिसके बूते पर हमारे जवानों के सलामत पाकिस्तानी जेल में होने का दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता और अब सभी उम्मीदों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए।


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