तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

Voice against Jam


जानलेवा बन रही है जाम की समस्या

                                                 पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Hindustan 27-10-15
यह एक गंभीर चेतावनी है कि आने वाले दशक में दुनिया में वायु प्रदूषण के शिकार सबसे ज्यादा लोग दिल्ली में होंगे। एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया, तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार बन असमय ही मौत के मुंह में चले जाएंगे।

प्रतिष्ठित नेचर  पत्रिका में प्रकाशित ताजा शोध के मुताबिक, दुनिया भर में 33 लाख लोग हर साल वायु प्रदूषण के शिकार बनते हैं। यही नहीं, सड़कों पर बेवजह घंटों जाम में फंसे लोग मानसिक रूप से भी बीमार होते जा रहे हैं।

हमारे यहां शहर के रास्ते हों या हाई-वे, बनते समय तो वे चौड़े दिखते हैं, पर दो-तीन वर्षों में ही संकरे दिखने लग जाते हैं। दरअसल, हमारे महानगरों से लेकर कस्बों तक और सुपर हाई-वे से लेकर गांव की पतली सड़क तक, लोग अपने वाहनों या जरूरी सामान को सड़क पर रखना अपना अधिकार समझते हैं। जाहिर है, जो सड़क वाहनों के चलने के लिए बनाई गई है, उसके बड़े हिस्से में बाधा होगी, तो यातायात प्रभावित होगा ही।

यातायात जाम का बड़ा कारण सड़कों का दोषपूर्ण डिजाइन भी है, जिसके चलते थोड़ी-सी बारिश में उन पर जल भराव या मोड़ पर अचानक यातायात के धीमा होने की समस्या पैदा हो जाती है या फिर गड्ढ़े बन जाते हैं। पूरे देश में सड़कों पर अवैध व ओवरलोड वाहनों पर तो जैसे अब कोई रोक ही नहीं है। इसके अलावा, मिलावटी ईंधन, घटिया ऑटो पार्ट्स भी वाहनों से निकलने वाले धुएं के जहर कई गुना कर देते हैं। वाहन सीएनजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा, तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा।

दूसरी तरफ, पूरे देश में स्कूलों और सरकारी कार्यालयों के खुलने व बंद होने के समय लगभग एक समान हैं। इसका परिणाम यह है कि हर छोटे-बड़े शहर में सुबह से सड़कों पर जाम दिखने लगता है। ठीक यही हाल दफ्तरों के वक्त में भी होता है।

नए मापदंड वाले वाहन यदि 40 या उससे अधिक की गति में चलें, तो उनसे बहुत कम प्रदूषण होता है। लेकिन यदि ये फर्स्ट गियर में ही रेंगते रहे, तो उनसे सॉलिड पार्टिकल, सल्फर डाई ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड बेहिसाब उत्सर्जित होती हैं। सवाल उठता है कि क्या स्कूलों के खुलने और बंद होने के समय में बदलाव करके इस जाम के तनाव से मुक्ति नहीं पाई जा सकती? इसी तरह, कुछ कार्यालयों की बंदी के दिन शनिवार-रविवार की जगह दूसरे दिवस में नहीं किए जा सकते?

शहरों की हवा को प्रदूषण मुक्त करने और जाम की समस्या को निपटाने के लिए जो कार्यालय जरूरी न हों, या राजधानियों में जिन दफ्तरों का मंत्रालयों से सीधा ताल्लुक न हो, उन्हें दूर के शहरों में भेजा सकता है। इससे नए शहरों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और लोगों का पलायन भी कम होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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