तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

बुधवार, 13 जनवरी 2016

book fair is not a market. it is a festival of words and literature


मेला नहीं पुस्तकोत्सव है यह

                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी
घने कोहरे व कड़कउ़ाती ठंड बीच दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तकों की दुनिया सज गई है। प्रगति मैदा में बहुत से मेले लगते हैं, गाडि़यों का खाने-पीने का, प्लास्टिक व इंजीनियरिंग का.... और भी बहुत से लेकिन भले ही इसे नाम मेला का दिया गया हो, असल में यह पुस्तकों के साथ जीने, उसे महसूस करने का उत्सव है। जिसमें गीत-संगीत हैं, आलेाचना है, मनुहार है, मिलन है, असहमतियां हैं और सही मायने में देश की विविधतापूर्ण भाषायी एकता की प्रदर्शनी भी है। अक्सर लोग कहते मिलते हैं कि दुनियाभर के पुस्तक मेलों से तुलना करें तो अब वार्षिक बन गए विश्व पुस्तक मेले में वही प्रकाशक , विक्रेता अपनी दुकान लगा लेते हैं जो सालभर दरियागंज में होते हैं।
बीते दो दषकेां से, जबसे सूचना प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव हुआ है , मुद्रण तकनीक से से जुड़ी पूरी दुनिया एक ही भय में जीती रही है कि कहीं कंप्यूटर, टीवी सीडी की दुनिया छपे हुए काले अक्षरों को अपनी बहुरंगी चकाचैंध में उदरस्थ ना कर ले। जैसे-जैसे चिंताएं बढ़ीं,  पुस्तकों का बाजार भी बढ़ता गया। उसे बढ़ना ही था- आखिर साक्षरता दर बढ़ रही है, ज्ञान पर आधारित जीवकोपार्जन करने वालो की संख्या बढ़ रही है। जो प्रकाषक बदलते समय में पाठक के बदलते मूड को भांप गया , वह तो चल निकला, बांकी के पाठकों की घटती संख्या का स्यापा करते रहे।
बौद्धिक-विकास, ज्ञान- प्रस्फुटन और शिक्षा के प्रसार के इस युग में यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि देश की बात क्या करें ,दिल्ली में भी पुस्तकें सहजता से उपलब्ध नहीं हैं। गली-मुहल्लों में जो दुकाने हैं, वे पाठ्य पुस्तकों की आपूर्ति कर ही इतना कमा लेते हैं कि दीगर पुस्तकों के बारे में सोच नहीं पाते।  कुछ जगह ‘‘बुक स्टोर’’ हैं तो वे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग की जरूरतों को भले ही पूरी करते हों, लेकिन आम मध्यवर्गीय लोगों को वहां मनमाफिक पुस्तकें मिलती नहीं हैं  लेाग उदाहरण देते हें कि इरान जैसे देश में स्थाई तौर पर पुस्तकों का माॅल है, लेकिन भारत में सरकार इस पर सोच नहीं रही है। गौर तलब है कि भारत में पुस्तक व्यवसा की सालान प्रगति 20 फीसदी से ज्यादा है, वह भी तब जब कि कागज के कोटे, पुस्तकों को डाक से भेजने पर छूट ना मिलने, पुस्तकों के व्यवसाय में सरकारी सप्लाई की गिरोहबंदी से यह उद्योग  हर कदम पर लड़ता है। यह कहने वाले प्रकाशक  भी कम नहीं है जो इसे घाटे का सौदा कहते हैं, लेकिन जब प्रगति मैदान के पुस्तक मेला में छुट्टी के दिन किसी हाॅल में घुसो और वहां की गहमा-गहमी के बीच आधी बांह का स्वेटर भी उतार फैंकने की मन हो तो जाहिर हो जाता है कि लोग अभी भी पुस्तकों के पीछे दीवानगी रखते हैं। तो फिर इतना व्यय कर पुस्तक मेला का सालाना आयोजन क्यों? इसकी जगह गली-मुहल्लों में पुस्तकों की दुकाने क्यों नहीं, यह स्वाभविक सा सवाल सभी के मन में आता है।
असल में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला केवल किताब खरीदने-बेचने की जगह नहीं है, यह केवल पुस्तक प्रेमियों की जरूरत को एक स्थान पर पूरा करने का बाजार  भी नहीं है। केवल किताब खरीदने के लिए तो  दर्जनों वेबसाईट उपलब्ध हैं जिस पर घर बैठे आदेश दो और घर बैठे डिलेवरी लो। असल में पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है जिससे जब तक बात ना करो, रूबरू ना हो, हाथ से स्पर्ष ना करो, अपनत्व का अहसास देती नहीं हे। फिर तुलनातमकता के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इनते सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर विपणन विकल्प व मनोवृति भी है। फिर दिल्ली का पुस्तक मेला तो एक त्योहार है, पाठकों, लेखकों, व्यापारियों , बच्चों का।  हर दिन कई सौ पुस्तकों का लोकार्पण, कम से कम बीस गोष्ठी-विमर्श, दस-पंदह लेखकों से बातचीते के सत्र, बच्चों की गतिविधियां। खासतौर पर विशेष अतिथि देश चीन से आए 250 से ज्यादा लेखकों, चित्रकारों , प्रकाशकों से मिलने के कई फायदे हैं । उनके यहां के लेखन, पाठक, और व्यापार से काफी कुछ सीखने को मिल जाता हे।
नई दिल्ली विष्व पुस्तक मेला-2016 का थीम ’भारत की सांस्कृतिक धरोहर‘ है। इसमें दर्षन, ज्ञान-परंपराओं और बहुभाशी साहित्यिक प्रचलनों की खोज पर बल निहित है, जिसने न केवल भारत की संस्कृतियों और सभ्यताओं को उनका आकार दिया है बल्कि हजारों वर्शों तक देष की सीमा के परे की संस्कृतियों और सभ्यताओं को भी प्रभावित किया है।
’अनेकत्व‘ या विविधता को भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का सार मानते हुए, मेला युवाओं (15-25) और बच्चों और देष-विदेष से आए मेहमानों को भारतीय संस्कृति के उन पहलुओं से परिचित करा रहा है जो दैनिक जीवन में जाने-अनजाने हमें प्रभावित करते हैं। थीम के प्रतीक चिह्न में षब्द ’विविध‘ के अँग्रेजी अक्षर ’अ‘ की आकृति वस्तुतः हड़प्पा की लिपि है, जिसे सिंधु घाटी की सभ्यता की अमूल्य धरोहर माना जाता है।
प्रगति मैदान के हाॅल नं. 7 ई में थीम मंडप का निर्माण गोलाकार रूप में इस तरह किया गया है कि यह गोल संरचना संपूर्ण भारत की बहुविध और एकात्म सांस्कृतिक विविधता को उसके बहुवर्णी रूप में प्रकट करे। प्रेक्षक और आगंतुक इस गोल संरचना में ’लघु भारत‘ का दर्षन कर सकेंगे। दरअसल, इस संपूर्ण संरचना को पाँच भागों में बाँटा गया है जो भारत के पाँच क्षेत्रों को दरषाता है। ये हैं-उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पष्चिम और उत्तर -पूर्व। इस गोल संरचना के मध्य का गोल हिस्सा थीम मंडप में प्रतिदिन होने वाली विविध गतिविधियों का साक्षी होगा। यह आंतरिक गोल संरचना सात सदा प्रज्वलित रहने वाले विषेश रूप से निर्मित स्तंभों से बनी हुई है जो सूरज के सात रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके बीचोंबीच एक षुभ्र ष्वेत स्तंभ उन्मुक्त और षांत भाव से अवस्थित है जो हमारी वैष्विक षांतिपूर्ण नीति के प्रतीक स्वरूप है।
इस गोल संरचना का बाहरी हिस्सा देष की बहुविध सांस्कृतिक छटा बिखेरती ऐसी संरचना है जिसकी दीवार पर अनेकानेक छवियाँ चस्पाँ हैं। दीवार के ऊपरी हिस्से में 30 से अधिक ऐसी विषिश्टि छवियाँ हैं जो भारत के विविध भागों में अवस्थित और ’यूनेस्को‘ द्वारा संरक्षित हैं। इसके नीचे का पूरा क्षेत्र एक प्रकार से प्रदर्षनी क्षेत्र है जिसमें क्रमिक रूप से भारत के पाँचों वर्णित क्षेत्रों की सांस्कृतिक छवियाँ प्रदर्षित हैं। अनेक छवियाँ विषेश रूप से निर्मित पैनलों के माध्यम से प्रदर्षित हैं जो छवियों के विवरण से युक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो इस गोल संरचना में इतने चित्र और छवियाँ प्रदर्षित हैं जो सही मायने में ’विविध भारत‘ को रूपायित करती हैं और ’विविधता में एकात्मता‘ को प्रदर्षित करती हैं।
इस थीम मंडप में विभिन्न भारतीय भाशाओं में प्रकाषित, थीम विशयाधारित , लगभग 800 से अधिक पुस्तकों का प्रदर्षन एक अभिनव और महत्वपूर्ण उपक्रम है। ’भारत की सांस्कृतिक धरोहर‘ को प्रदर्षित करती पुस्तकों की यह विषाल प्रदर्षनी पुस्तकप्रेमियों के लिए जबरदस्त आकर्शण का केंद्र है। जाहिर है कि इस तरह का अनूटा आस्वाद किसी बाजार में तो मिलने से रहा  जो पुस्तकों की संस्कृति व संस्कृति की पुस्तकों को एक साथ प्रस्तुत करे।

तभी दिन चढ़ते ही प्रगति मैदान के लंबे-चैड़े लाॅन में लोगों के टिफिन खुल जाते हैं, खाने के स्टाॅल खचाखच भरे होते हैं, लेाग कंधे छीलती भीड़ में उचक-उचक कर लेखकों को  पहचानने-चीन्हने का प्रयास करते हैं। उसी के बीच कुछ मंत्री, कुछ वीआईपी, कुछ फिल्मी सितारे भी आ जाते हैं और भीड़ उनकी ओर निहारने लगती है। कहीं कविता पाठक चलता है तो कही व्यंग व कहानी पेश करने के आयोजन। अंधेरा होते ही लाल चैक पर  गीत-संगीत की महफिल सज जाती है। इस बार तो भारत की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाते देश के अलग-अलग हिस्सों के कई मशहूर कलाकार यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। दूर दराज से आए और नए लेखक अपनी पांडुलिपियां ले कर प्रकाशकों को तलाशते दिखते हैं तो कुछ एक अपनी पुस्तकों को मित्रों को बांट कर सुख पाते हैं। खेमेबाजी, वैचारिक मतभेद के बीच 35 से ज्यादा भाषाओं की पुस्तकें, हजारों लेखक व प्रकाशक लाखेंा पाठकों को नौ दिन बांधे रखते हैं।
इतना सबकुछ महज व्यावसायिक नहीं होता, इसमें दिल व दिमाग दोनों पुस्तक के साथ धड़कते-मचलते हैं तभी यह मेला नहीं है, आनंदोत्सव है पुस्तकों का श्शििरोत्स्तव।

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