तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

Suicide, Army and politics

सुसाइड, सेना और सियासत

 
पूर्व सैनिक रामकिशन ने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है।
67 साल के रामकिशन सिंह ग्रेवाल ने कोई 28 साल फौज में नौकरी की। सन 2004 में जब वे सुबेदार के पद से रिटायर हो कर गांव पहुंचे तो उनका उत्साह व हिम्मत कम नहीं थी। वे हरियाणा में भिवानी जिले के अपने गांव बामना के सरपंच बने और स्वच्छता के लिए इतना काम किया कि सन 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों उन्हें ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ भी मिला। शहीद ग्रेवाल सरपंच के काम को दिल से करते थे और गांव की सफाई को पावनकाम समझते थे। जब एक रैंक -एक पेंशन का संघर्ष शुरू हुआ तो व उसमें भी आगे बढ़ कर लड़े। वे इस मसामले में सरकारों के वायदों और आदेशों से इतने व्यथित थे कि दीपावली के अगले दिन नहीं अपने कुछ साथियों के साथ धरना देने पहुंच गए। कहा जाता है कि उन्होंने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। अपनी अंतिम सांस तक अपने बेटे को फोन पर बात करते रहे। जब तक उनके साथ आए लोगों को सुबेदार ग्रेवाल के इस भावुक निर्णय की जानकारी मिली, देर हो चुकी थी, उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने सही ही कहा कि शहीद ग्रेवाल की मानसिक स्थिति की जांच होना चाहिए। सही है इस देश में किसान, जवान, बेरोजगार, आदिवासी या जो कोई भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाए, पागल ही होता है। शहीद ग्रेवाल का पागलपन ही था कि 28 साल सीमा पर तैनात रहने के बाद भी अपने गांव को संवारने में लग गए थे।
ओआरओपी पर पिछले दिनों राहुल गांधी ने एक पत्र प्रधानमंत्री को भी लिखा था, लेकिन श्री ग्रेवाल के दिवंगत होने के बाद दिल्ली की सड़कों पर जो तमाशे हुए, वे उनकी जायज मांगों के समर्थन में हो गए होते तो शायद आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। ओआरओपी की मांग कोई चार दशक की है। पेंशन में असमानता कम करने के लिए यूपीए के दोनों चरणों में पेंशन में बढोत्तरी भी की गई थी। यह भी सही है कि यूपीए ने अपने अंतिम बजट में पांच सौ करोड़ का प्रावधान ओआरओपी के लिए रखा था, हालांकि यह राशि मांग की तुलना में बहुत कम थी। फिर केंद्र की नई सरकार ने अपने प्रमुख चुनावी वायदे के मुताबिक ओआरओपी की घोषणा भी कर दी। विडंबना थी कि सैनिकों का बड़ा वर्ग चार बिंदुओं को ले कर घोषणा से नाखुश था। एक तो भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी कमेटी की सिफारिशों को ही लागू नहीं किया गया है। इनका मानना है सरकार जिस ओआरओपी की बात कर रही है वह अधूरी है, जिसे वे नहीं मानेंगे। उन्होंने सरकार को लगातार पत्र लिखे हैं, लेकिन अभी तक किसी का जवाब नहीं आया। इससे निराश होकर चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में याचिकाएं दायर कर दी गई हैं। हाल में विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने बताया था कि ओआरओपी का करीब 95 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। प्रश्न उठता है कि फिर कहां कमी रह गई है कि इन सैनिकों को आंदोलन जारी रखने और याचिकाएं दायर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दोनों पक्षों में समन्वय की कहां कमी रह गई है ?
यह मांग कुछ महीनों की नहीं, बल्कि चार दशकों से की जा रही है। पिछले साल मोदी सरकार ने इसे लागू करने के न्यायिक समिति गठित की थी। पटना हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस एल नरसिम्हा रेड्डी को इसका अध्यक्ष बनाया था।
गौर करना होगा कि यह व्यवस्था अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। पूर्व सैनिकों की पेंशन वेतन की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी। भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना। वर्ष 1957 के बाद से पूर्व सैनिकों की पेंशन कम कर दी गई और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ती रही। देखा जाए तो पूर्व सैनिकों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती। सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक वेतन लेने की सुविधा मिलती है, वहीं सैनिकों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है। उनकी सर्विस के हालात भी अधिक कठिन होते हैं। पूर्व सैनिक चाहते हैं कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की सिफरिशों के साथ लागू हो। यदि असली संतुलन लाना है तो उन्हें भी 60 साल की आयु में रिटायर किया जाए। वे 33 साल में ही रिटायर होने के बाद सारा जीवन केवल पेंशन से ही गुजारते हैं। ऐसे में उनकी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए।
इन सैनिकों की परेशानी यह है कि 1 जनवरी 1973 से पहले जवानों और जेसीओ को वेतन का 70 फीसदी पेंशन के रूप में मिलता था। उस समय सिविल अधिकारियों के वेतन की 30 फीसदी पेंशन मिलती थी। इसे बाद में 50 फीसदी कर दिया गया, जबकि फौज के जवानों की पेंशन वेतन के 70 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी कर दी गई। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उसने यह कदम क्यों उठाया? इन सैनिकों का कहना है कि 1973 के बाद सशस्त्र सेनाओं पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। सरकार को बताना चाहिए कि वह क्या कर रही है।
रक्षा मंत्रालय की वन रैंक वन पेंशन योजना को चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी गई है। एक ही दिन में ओआरओपी के खिलाफ कुल आठ याचिकाएं दायर हुईं। मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। केंद्र सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यह पहली बार हुआ है जब किसी ट्रिब्यूनल में वन रैंक वन पेंशन को चुनौती दी गई हो। इससे जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी छूट गई थी जिससे पूर्व सैनिक असंतुष्ट हैं। इनमें से कई पेंशनरों की उम्र करीब 80 से 90 की साल है। उम्र के इस पड़ाव में ये परेशानी के जिस दौर से गुजर रहे हैं उसे समझा जाना चाहिए।
ध्यान देना होगा कि यूपीए सरकार ने फरवरी 2014 में वन रैंक-वन पेंशन योजना की घोषणा की थी। अंतरिम बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गई। नरेंद्र मोदी ने भी सितंबर 2013 में अपनी एक रैली में वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो इस योजना पर तुरंत अमल होगा। एनडीए सरकार का जुलाई 2014 में पहला बजट आया। इसमें 1000 करोड़ रुपए इस योजना के लिए रखे गए।
उधर दिवंगत सुबेदार ग्रेवाल के मसले में यह भी बात सामने आ रही है कि उनका मामला बैंक द्वारा गलत गणना करने से कोई छह हजार रूपए कम पेंशन का था, लेकिन यह भी सच है कि उनका अंतिम संदेश उनकी अपनी पेंशन को ले कर नहीं, बल्कि पूरे सैनिक वर्ग के साथ हो रही असमानता को ले कर था।
आज जो भी राजनीतिक दल इस पर राजनीति कर रहे हैं उन्हें सोचना होगा कि क्या किसी की मौत के बाद ही चेतना क्या सही सियासत है ? काश ग्रेवाल के जिंदा रहते उनकी आवाज को व्यापक राजनीतिक समर्थन ही मिला होता तो एक जीवट वाला इंसान हताश हो कर ऐसा कदम नहीं उठाता । यह जान लें कि हमारी सेना को लगातार राजनीति में घसीटा जा रहा है और यह स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं।

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