तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

Ignorance toward North East will cost high

महंगी पड़ेगी अनदेखी
पूर्वोत्तर
पंकज चतुव्रेदी

णिपुर में 54 दिन तक नाकाबंदी चली। नगा आंदोलनकारियों ने मणिपुर को बंधक बना रखा था। वहां गैस सिलेंडर दो हजार बिका, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में इसकी सुगबुगाहट नहीं हुई। अभी चार दिसम्बर को ही अरुणाचल प्रदेश के तिराप जिले के जिनु गांव के पास गश्त कर रहे असम राइफल्स के एक दल पर कुछ उग्रवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें एक जूनियर कमीशंड आफिसर सहित दो सैनिक शहीद हुए और आठ घायल हो गए। उससे कुछ दिन पहले ही 19 नवम्बर की सुबह तिनसुकिया जिले के डिग्बोई तहसील में पेनगरी संरक्षित वन के करीब सेना के दो ट्रक व एक जीप के काफिले को उग्रवादियों ने पहले विस्फोट कर रोका फिर उस क्लाश्नेव राइफल व आरपीजी यानी राकेट प्रोपेलेन्ड ग्रेनेड से हमला किया। इसमें तीन जवान शहीद हुए व चार बुरी तरह जख्मी। अरुणाचल वाले हमले का शक एनएससीएन-खपलांग व असम वाले संहार का आरोप उल्फा पर है। इसी साल चार जून को मणिपुर की राजधानी इंफाल से कोई 75 किलोमीटर दूर भारतीय सेना की डोगरा रेजीमेंट के चार पर उग्रवादियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं व 18 जवानों को मार डाला। इस हमले में 11 अन्य बेहद गंभीर घायल भी हुए है। इससे पहले दो अप्रैल और छह फरवरी को अरुणाचल में सेना पर हमले हो चुके हैं। इन हमलों का शक नगालैंड के पृथकतावादी संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड के खपलांग गुट पर है। मुल्क में जब कभी आतंकवाद से निबटने का मसला आता है तो क्या आम लोग और क्या नेता और अफसरान भी; कश्मीर पर आंसू बहाने लगते हैं पाकिस्तान को पटकने के नारे उछालने लगते हैं। लेकिन लंबे समय से यह बात बड़ी साफगोई से नजरअंदाज की जाती रही है कि हमारे ‘‘सेवन सिस्टर्स’ (हालांकि अब ये एट यानी आठ हो गई हैं) राज्यों में अलगाववाद, आतंक और देशद्रोही कश्मीर से कहीं ज्यादा है और उससे सटी सीमा के देशों-चीन, म्यांमार, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश ही नहीं; थाईलैंड, जापान तक इन संगठनों के आका बैठ कर अपनी समानांतर हुकुमत चला रहे हैं। अभी मणिपुर की सरकार म्यांमार से सहयोग मांग रही है। भूटान ने एक दशक पहले कड़ी नीति अपनाकर उल्फा के सभी अड्डे बंद कर दिए थे तब से नलबाड़ी इलाके में शांति है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में मणिपुर, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम में कोई पच्चीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। यहां बीते बारह सालों के दौरान कोई बीस हजार लोग मारे गए, जिनमें चालीस फीसद सुरक्षा बल वाले हैं। पूर्वोत्तर में उग्रवाद का प्रारंभ चीन, कम्युनिस्ट आंदोलन से कहा जाता है। लेकिन यह भी गौर करने वाली बात है कि पूरे इलाके में कभी र्चच या मिशनरी के किसी भी दल, संपत्ति या गतिविधि पर हमला नहीं हुआ। असम में उल्फा, एनडीबीएफ, केएलएनएलएफ और यूपीएसडी के लड़ाकों का बोलबाला है। अकेले उल्फा के पास अभी भी 1600 लड़ाके हैं, जिनके पास 200 एके राइफलें, 20आरपीजी और 400 दीगर किस्म के असलहा हैं। राजन दायमेरी के नेतृत्व वाले एनडीबीएफ के आतंकवादियों की संख्या 600 है जोकि 50 एके तथा 100 अन्य किस्म की राईफलों से लैसे हैं। बीते साल असमें देा बड़े नरसंहार करने वाले एनडीबीएफ के सांगबीजित गुट का मुखिया आईके संगबीजिहत म्यांमार में रह कर अपने व्यापा करता है। आश्र्चय यह जान कर होगा कि बोडो के नाम पर खून-खराबा करने वाला यह अपराधी खुद बोडो नहीं है। नगालैंड में पिछले एक दशक के दौरान अलग देश की मांग के नाम पर डेढ़ हजार लोग मारे जा चुके हैं। वहां एनएससीएन के दो घटक-आईएम और खपलांग बाकायदा सरकार के साथ युद्ध विराम की घोशणा कर जनता से चौथ वसूलते हैं। इनके आका विदेश में रहकर भारत सरकार के आला नेताओं से संपर्क में रहते हैं और इनके गुगरे को अत्याधुनिक प्रतिबंधित हथियार ले कर सरेआम घूमने की छूट होती है। यहां तक कि राज्य की सरकार का बनना और गिरना भी इन्हीं उग्रवादियों के हाथों में होता है। यह बात हाल ही में संपन्न विधान सभा चुनाव में सामने आ चुकी है। यह दुर्भाग्य है कि दिल्ली में बैठे लोग उत्तर-पूर्वी राज्यों को सतही दूरी ही नहीं, बल्कि दिलों से भी दूर मानते रहे हैं। हालात इस मुकाम पर पहुंच गए हैं कि अलगाववादी कदमों पर जल्द काबू नहीं किया गया तो पृथकतावादियों पर नियंतण्रकरना असंभव हो जाएगा।

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