तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 7 जनवरी 2017

Printed books never die

संदर्भ विश्व  पुस्तक मेला(7 से 15 जनवरी 2017, नई दिल्ली )

किताबें छपती भी हैं और बिकती भी
पंकज चतुर्वेदी
कुछ दिनों पहले एनडीटीवी पर रवीश  कुमार ने राष्ट्र वाद  पर अपना प्राईमटाईम किया। उनके विमर्ष में कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के आलेखों के संकलन की एक पुस्तक का उल्लेख हो गया। इस पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने सौमित्रमोहन द्वारा हिंदी में अनूदित कर छापा था। देखते ही देखते इस पुस्तक की सारी प्रतियां बिक गईं। आनलाईन भी और स्टोर से भी। यह बानगी हैं कि किस तरह आधुनिक संचार माध्यम मुद्रित ुपस्तकों के प्रचार-प्रसार में सकारातमक भूमिका निभाते हैं। इससे पहले प्रेमचंद के उपन्यास ‘‘निर्मला’’,  भीष्म  के तमस, देवकीनंदन खत्री की रचनाओं, आरके नारायण के मालगुढी डजे जैसे सीरियल टीवी पर आने के बाद उन पुस्तकों की बिक्री बेतहाशा बढ़ना ज्यादा पुरानी बात नहीं है। आज लोग फेेसबुक जैसे सोश ल मीडिया पर निषुल्क प्रचार कर कई सौ पुस्तकें आराम से पाठकों तक पहुंचा देते हैं।
‘‘ बाजार बढ़ रहा है, इस सड़क पर किताबों की एक दुकान खुली है और दवाओं की दो। ज्ञान और बीमारी का यही अनुपात है। ज्ञान की चाह जितनी बढ़ी है, उससे दुगनी दवा की चाह बढ़ी है। ज्ञान खुद एक बीमारी है।’’ हरषिंकर परसाई ने यह षब्द कोई तीन दषक पहले लिखे थे और आज भी ठीक उसी तरह प्रासंगिक हैं जितनी मुद्रित पुस्तकें। बीते एक दषक से बड़ा हल्ला हुआ, विमर्ष हुए, चिंतांए जताई गई कि टेलीविजन या इंटरनेट पुस्तकों को चाट जाएगा। लेकिन रामायण के दोहे ‘‘ जो -जो सुरसा रूप दिखावा, ता दो गुनी कवि बदन बढ़ावा’’ की तर्ज पर ज्ञान की मांग बढ़ती गई। सनद रहे कि कागज पर मुदिगत पुस्ताकें का आविश्कार कोई इतना प्राचीन भी नहीं है कि उसके अतीत-विलाप में पुस्तकों के नए स्वरूप- ई बुकस या आनलाईन रीडिंग को पठनीयता पर ही संकट मान लिया जाए। नए साल की षुरूआत में सात जनवरी को जब उम्मीद है कि घना कोहरा होगा, कड़कड़ती ठंड होगी, राजधानी को आने वाली ट्रेन, बसें और हवाई जहाज अपने- आने-जाने के समय की परवाह नहीं करते होंगे , ऐसे में देष की राजधानी के बीचों-बीच प्रगति मैदान में पुस्तकों का एक भरा-पूरा संसार जीवंत हो उठेगा। यहां आ कर महसूस किया जा सकेगा कि पुस्तकें निर्जीव कागज का पुलिंदा नहीं, बल्कि बातें करती जीवंत ऐसी संरचना हैं जो अतीत, वर्तमान और भविश्य तीनों को बांचती हैं।
यदि समाज की आर्थिक दषा सुधर रही है, उसकी खरीद क्षमता बढ़ रही है, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से औसत उम्र बढ़ रही है और भारतीय समाज षिक्षा के प्रति गंभीर हो रहा है तो इस विकासमान समाज पर आधुनिकता और हाई-टेक का गहरा असर है ।  बेहतर जीवन की चाह ने हमारे जीवन के मौलिक सौंदर्य को भी प्रभावित किया है। ऐसे में पुस्तकें आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में अदभुत और निर्णायक भूमिका निभाती है । सूचनाएं और संचार बदलते हुए विष्व के सर्वाधिक षक्तिषाली अस्त्र-षस्त्र बनते जा रहे हैं । पिछले दो दषकों में सूचना तंत्र अत्यधिक सषक्त हुआ है, उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं ।
लेकिन पुस्तक का महत्व और रोमांच इस विस्तार के बावजूद अक्षुण्ण है । यही नहीं कई स्थानों पर तो पुस्तक व्यवसाय में अत्यधिक प्रगति हुई है । यूरोप और अमेरिका में लेाग मानने लगे हैं कि पुस्तकें उनकी संस्कृति की पोशक हैं, तभी वहां लेखकों को बड़े-बड़े सम्मान दिए जा रहे हैं । अरब देषों में जहां अकूत दौलत है, अब वे खुद को एक पठनषील समाज सिद्ध करने मे ंलगे हैं। अबुधाबी व षारजहां के पुस्तक मेले दुनिया में मषहूर हो रहे हैं। षारजहा की सरकार लेखकों, अनुवादकों और बच्चों की पुस्तकों के चित्रकारों को दुनिया का सबसे ज्यादा कीमत वाला पुरस्कार दे रही है। वहां के पुस्तक मेलों में भले ही कुछ जगह मल्ीमीडिया या ई-बुक्स के स्टाल दिखें, लेकिन अभी भी पूर मेला मुदित पुस्तकों का ही होता है।
बीते 25 सालो ंके दौरान जबसे सूचना प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव हुआ है , मुद्रण तकनीक से से जुड़ी पूरी दुनिया एक ही भय में जीती रही है कि कहीं कंप्यूटर, टीवी सीडी की दुनिया छपे हुए काले अक्षरों को अपनी बहुरंगी चकाचैंध में उदरस्थ ना कर ले। जैसे-जैसे चिंताएं बढ़ीं,  पुस्तकों का बाजार भी बढ़ता गया। उसे बढ़ना ही था- आखिर साक्षरता दर बढ़ रही है, ज्ञान पर आधारित जीवकोपार्जन करने वालो की संख्या बढ़ रही है। जो प्रकाषक बदलते समय में पाठक के बदलते मूड को भांप गया , वह तो चल निकला, बांकी के पाठकों की घटती संख्या का स्यापा करते रहे।
संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के बाद अंग्रेजी पुस्तकों के प्रकाषन में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है। भारत दुनिया के सबसे विषाल पुस्तक बाजारों में से एक हैं और इसी कारण हाल के वर्शों में विष्व के कई बड़े प्रकाषकों ने भारत की ओर अपना रुख किया है । विष्व पुस्तक बाजार में भारत के विकासमान महत्व को रेखांकित करने के उदाहरणस्वरूप ये तथ्य विचारणीय हैं-फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला, 2006 में भारत को दूसरी बार अतिथि देष सम्मान, सन 2009 के लंदन पुस्तक मेला का ‘मार्केट फोकस’ भारत होना, मास्को अंतरराश्ट्रीय पुस्तक मेला 2009 में भारत को अतिथि देष का दर्जा आदि। भारत में भी महंगाई, अवमूल्यन और प्रतिकूल सांस्कृतिक, सामाजिक-बौद्धिक परिस्थितियों के बावजूद पुस्तक प्रकाषन एक क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है । छपाई की गुणवत्ता में परिवर्तन के साथ-साथ विशय विविधता यहां की विषेशता है । समसामयिक भारतीय प्रकाषन एक रोमांचक और भाशाई दृश्टि से विविधतापूर्ण कार्य है। विष्व में संभवतः भारत ही एक मात्र ऐसा देष हैं जहां 37 से अधिक भाशाओं में पुस्तकें प्रकाषित की जाती हैं। संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन के बाद अंग्रेजी पुस्तकों के प्रकाषन में भारत का तीसरा स्थान है । सन 2009 में नेषनल बुक ट्रस्ट ने देष के युवाओं के बीच पठनीयता को    ले कर एक सर्वे किया था। उस समय हमारे देष की युवा आबादी 45 करोड़ 90 लाख थी और उसमे ंसे 33 करोड़ 33 लाख साक्षर। इस सर्वे में पाया गया था कि महज 7.5 प्रतिषत युवा अपने खाली समय में पुस्तकें पढ़नो का षौक रखते हैं बाकी या तो टीवी या अन्य। हां, अखबार पढना पसंद करने वाले युवा जरूर 14.8 था। यह भी सही है कि अखबार जिस तरह कम कीमत में सर्वसुलभ हैं , पुस्तकों की उपलब्धता व कीमत उसका 10 फीसदी भी नहीं है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत में भशा-संस्कृति अदि को ले कर विधिता बेहद व्यापक है। हमारा देष दुनिया का संभवतया विरला देष होगा जिसमें इतनी भाशा-बोली में प्रकाषन होता है। यहां इस्तेमाल होने वाले फांट दुनिया में सबसे ज्यादा है। हमारा भाशायी प्रकाषन बहुत-कुछ असंगठित है। छोटे गांव-कस्बों में उत्साही लेखक अपने खर्च पर अपी कृतियां प्रकाषित कर लेते हैं और ये किसी भी आंकड़ों में दर्ज नहीं होतीं। यह जान लें कि भारत में पुस्तक वितरण बेहद कठिन कार्य है।  प्रत्येक पुस्तक एक स्वतंत्र ईकाई होती है, उसके विशय, उसके पाठक वर्ग, उसकी उपलब्धता व प्रस्तुति सबकुछ दूसरी पस्तक से भिन्न होती है।  स्पश्ट है कि इंटरनेट ने  पुस्तकों के प्रसार मे ंयह सहयोग तो किया ही है कि पुस्तक की जानकारी अब देष-दुनिया तक होने लगी हे। कई आॅनलाईन स्टोर, यहां तक कि पुस्तक मेले भी हैं जहां से पुसतकें बिक रही है। जरूरत इस बात की है कि भाशायी लेखक व प्रकाषक व्यक्तिगत बिक्री के लिए संचार के नए माध्यमों का इस्तेमाल करे। यह भी जरूरी है कि पाठक की पठन रूचि परिश्कृत करनेे के लिए लेखक बगैर किसी सरकारी आयोजन की अपेक्षा करे, पाइकों तक जाए। नए पाइक तैयार करे। आज बिडंबना है कि वह मजदूर या किसान जानता ही नहीं है कि केाई लेखक उसके हालात पर कागज काले कर रहा है। लेखक भी मान बैठा है कि पेट के लिए मषक्कत करने वाले के लिए किताबें कोई अनिवार्य  खुराक नहीं है। सो वह अपना पाठक कालेज स्तर के लेागेों या सरकारी सप्लाई में ही तलाषता है।
बौद्धिक-विकास, ज्ञान- प्रस्फुटन और शिक्षा के प्रसार के इस युग में यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि देश की बात क्या करें ,दिल्ली में भी पुस्तकें सहजता से उपलब्ध नहीं हैं। गली-मुहल्लों में जो दुकाने हैं, वे पाठ्य पुस्तकों की आपूर्ति कर ही इतना कमा लेते हैं कि दीगर पुस्तकों के बारे में सोच नहीं पाते।  कुछ जगह ‘‘बुक स्टोर’’ हैं तो वे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग की जरूरतों को भले ही पूरी करते हों, लेकिन आम मध्यवर्गीय लोगों को वहां मनमाफिक पुस्तकें मिलती नहीं हैं  लेाग उदाहरण देते हें कि इरान जैसे देश में स्थाई तौर पर पुस्तकों का माॅल है, लेकिन भारत में सरकार इस पर सोच नहीं रही है। गौरतलब है कि भारत में पुस्तक व्यवसाय की सालान प्रगति 20 फीसदी से ज्यादा है, वह भी तब जब कि कागज के कोटे, पुस्तकों को डाक से भेजने पर छूट ना मिलने, पुस्तकों के व्यवसाय में सरकारी सप्लाई की गिरोहबंदी से यह उद्योग  हर कदम पर लड़ता है। यह कहने वाले प्रकाशक  भी कम नहीं है जो इसे घाटे का सौदा कहते हैं, लेकिन जनवरी की ठंड में , प्रगति मैदान के पुस्तक मेला में छुट्टी के दिन किसी हाॅल में घुसो और वहां की गहमा-गहमी के बीच आधी बांह का स्वेटर भी उतार फैंकने की मन हो तो जाहिर हो जाता है कि लोग अभी भी पुस्तकों के पीछे दीवानगी रखते हैं। यह जान लें कि ना तो पुस्तकों पर कोई संकट है और ना ही लेखकों पर, हां बदलते समय के साथ लेखन बदलने का दवाब  जरूर है।

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