तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 9 मार्च 2017

Urbanization swallowing villages

गांवों को लीलते शहर


यदि इस सवाल का ईमानदारी से जवाब तलाशा जाए कि आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी किसे कहा जा सकता है, तो इसका जवाब होगा-करीब पचास करोड़ लोगों का अपने पुश्तैनी गांव-घर, रोजगार से पलायन। और आने वाले दिनों की सबसे भीषण त्रासदी क्या होगी? तो इसका जवाब होगा, ग्रामीण इलाकों से लोगों के पलायन के कारण शहरों का अर्बन स्लम में बदलना। देश की लगभग एक तिहाई आबादी (31.16 प्रतिशत) अब शहरों में रह रही है। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़कर शहर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब 37 करोड 70 लाख लोग शहरों के बाशिंदे हैं। वर्ष 2001 से 2011 के बीच शहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ, जबकि गांवों की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी।

देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहुंच गया है, जबकि खेती की भूमिका घटकर 15 प्रतिशत रह गई है। गांवों में निम्न जीवन-स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी है और लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर आ रहे हैं। अब उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें, तो वर्ष 2001 की जनगणना में प्रदेश की आबादी का 80 फीसदी हिस्सा गांवों में रहता था, जो 2011 में घटकर 77.7 फीसदी रह गया। पूरे देश में शहरों में रहने वाले कुल 7.89 करोड़ परिवारों में से 1.37 करोड़ झुग्गियों में रहते हैं। मेरठ की कुल आबादी का 40 फीसदी स्लम में रहता है, जबकि आगरा की 29.8 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जनसुविधाएं, सार्वजनिक परिवहन और सामाजिक ढांचा-सब कुछ बुरी तरह चरमरा गया है। इस महानगर की आबादी सवा करोड़ से अधिक हो चुकी है। हर रोज तकरीबन पांच हजार नए लोग यहां बसने आ रहे हैं। यही हाल देश के अन्य सात महानगरों, विभिन्न प्रदेश की राजधानियों और औद्योगिक बस्तियों का है। इसके विपरीत गांवों में ताले लगे घरों की संख्या में इजाफा हो रहा है। खेती और पशुपालन के व्यवसाय पर अब मशीनधारी बाहरी लोगों का कब्जा हो रहा है। गांवों के टूटने और शहरों के बिगड़ने से भारत के पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संस्कारों का चेहरा विद्रूप हो गया है। परिणामतः भ्रष्टाचार, अनाचार, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है।

शहर भी दिवास्वप्न से ज्यादा नहीं हैं, देश के दीगर 9,735 शहर भले ही आबादी से लबालब हों, लेकिन उनमें से मात्र 4,041 को ही सरकारी दस्तावेज में शहर की मान्यता मिली है। शेष 3,894 शहरों में नगर पालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़कर बेढ़ब मकान खड़े कर दिए गए हैं, जहां पानी, सड़क, बिजली आदि गांवों से भी बदतर है। शहर को बसाने के लिए आसपास के गांवों की बेशकीमती जमीन को होम किया जाता है। खेत उजड़ने पर किसान शहरों में मजदूरी करने के लिए विवश होता है।

गांवों में ही उच्च या तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज, खाद को प्रोत्साहित करना, ये कुछ ऐसे उपाय हैं, जिनसे ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोका जा सकता है। इसमें पंचायत समितियां अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को साझा तौर पर आज और अभी चेतना होगा। अन्यथा कुछ ही वर्षों में ये हालात देश की सबसे बड़ी समस्या का कारक बनेंगे-जब शहर बेगार, लाचार और कुंठित लोगों से भरे होंगे, और गांव मानव संसाधन विहीन हो जाएंगे।

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