तालाब की बातें

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बुधवार, 7 जून 2017

better to fall of Maharaja

ऐसे महाराज का तो पतन ही बेहतर

एयर इंडिया

                                                          पंकज चतुर्वेदी



 सरकार के वित्त मंत्री अरूण जेटली नीति आयोग के उस सुझाव से सहमत दिख रहे हैं जिसमें कहा गया है कि कर्ज में दबी एयर इंडिया का पूर्ण निजीकरण कर दिया जाना चाहिए। हालांकि नागर विमानन मंत्रालय, एयर इंडिया को आर्थिक द्रिष्टी से व्यावहारिक बनाने के लिए सभी संभावित विकल्पों पर विचार कर रहा है। सनद रहे कि जहां भारत में हवाई यात्रा का व्यवसाय सफलता के नए आयाम रच रहा है वहीं सरकारी कंपनी एयर इंडिया का कर्ज व घाटा दिन-दुगना रात चौगुना होता जा रहा है। यही नहीं सरकारी यात्राओं में एयर इंडिया की अनिवार्यता दूसरे महकमों के लिए भी घाटे का सौदा बनता जा रहा है। इस समय एया इंडिया का घाटा 52 हजार करोड़ को पार कर चुका है। सन 2012 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने एयर इंडिया के लिए 30,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी, जो कि दस साल के दौरान दिया जाएगा। इसी पैकेज के बूते एयर इंडिया परिचालन में बनी हुई है। जिसमें विमान खरीदने से संबंधित 21,000 करोड़ और एयर इंडिया को चलाने के लिए 8,000 करोड़ का कर्ज है। हालांकि एयर इंडिया के कर्मचारी और कई संगठन निजीकरण के विरोध में हैं। लेकिन जनता के कर के पैसे से चल रहे इस संस्थान के कर्मचारी हैं कि खुद के पैर पर खड़े होने को तैयार नहीं है। पिछले दिनों मुंबई से उड़ने वाली एक उड़ान इस लिए पांच घंटे लेट हो गई क्योंकि पायलट व स्टाफ एक साथी की जन्मदिन मना रहे थे। कभी क्रू मेंबर नहीं पहुंचे तो कभी जहाज ही हवाई अड्डे नहीं पहुंचा, कभी पायलेट की कमी हो गई ... भारत की सरकारी विमान कंपनी में यह आए रोज की बात है। बेचारे सरकारी कर्मचारियों पर पाबंदी है कि उन्हें अपने सरकारी दौरे इसी एयरलाइंस से करने हैं, सो जहाज में लोग दिखते भी हैं। बेहद जर्जर प्रबंधन, लागातर घाटे व आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में अक्षम रही एयर इंडिया को अब सरकारी इमदाद के बल पर जिंदा रखना हमारे संसाधनों का दुरूपयोग ही दिखता है। दुनिया की सबसे घटिया एयरलाइंस में तीसरे नंबर पर शुमार एयर इंडिया का घाटा खत्म करने के लिए सरकार पिछले नौ साल में तीस हजार करोड़ व्यय कर चुकी है। इस धन से कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक दो लेन के हाईवे बन सकते थे।सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया को आईआईएम अमदाबाद के प्रो. रवीन्द्र ढोलकिया के अगुवाई में बने विशेष दल ने कुछ साल पहले बचत बढ़ाने व खर्च घटाने के लिए निजी एयर लाईंस से सबक लेने की सलाह दी थी। फिर धर्माधिकारी समिति कर्मचारियों के वेतनमान व भत्तों की सिफारिश की। ढोलकिया कमेटी ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट में कुल 46 सिफारिशें थीं। इसमें कहा गया है कि प्रति दिन 14 करोड़ के परिचालन घाटे को कम करने के लिए एयर लाईस को कर्मचारियोें की संख्या और कम करनी होगी। सनद रहे कि जब इतने कर्मचरियों के होने पर भी मानवीय कमियों के कारण परिचालन व प्रबंधन में इतनी अव्यवस्थाएं हैं तो कर्मचारी कम होने पर इसका क्या हाल होगा। यह समिति एयर इंडिया के कर मुक्ति 10 हजार करोड़ के बांड जारी करने की बात भी कहती है - जरा सोचें कि इतने बड़े घाटे व कुव्यवस्था को झेल रही कंपनी के बांड कौन लेगा?ढोलकिया समिति का सुझाव है कि ट्रेवल एजेंट को दिया जाने वला एक प्रतिशत कमीशन बंद किया जाए, इसके ऐवज में एजेंट ग्राहक से सुविधा शुल्क ले लें। यह किसी से छिपा नहीं है कि निजी एयरलाइंस एजेंटों को ज्यादा मुनाफा देती है। ऐसे में उनका एक फीसद भी बंद हो जाने पर एयर इंडिया का टिकट कौन बेचना चाहेगा। यदि केवल सरकारी कर्मचारियों के बदौलत एयरलाइंस चलानी है तो सरकार के एक जेब से पैसा निकाल कर दूसरी जेब में देने की इस घाटे व घोटालों भरी प्रक्रिया पर विराम लग जाना ही बेहतर होगा। एयर इंडिया के अधिकांश उड़ानों के समय पर निजी एयरलाइंस पहले ही कब्जा किए हुए हैं, निजी कंपनियों का स्टाफ बेहद प्रोफेशनल तरीके से सवारियों से व्यवहार करता है उनके विमानों के देरी से उड़ने का प्रतिशत बहुत कम है- जाहिर है कि इनसे मुकाबला करना या पार पाना ‘‘महाराज’ के बस का नहीं है, क्योंकि राजा तो कभी कुछ गलत करता ही नहीं है, सो उसके सुधरने की कोई गुंजाईश नहीं है।

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