तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 9 जून 2017

How can agriculture become profit business

किसान को मेहनत का वाजिब दाम दो !


                                                                      पंकज चतुर्वेदी
बीते 15 दिनों से महाराष्ट्र  और मप्र में किसान आंदोलन मुखर होता जा रहा है। मंदसौर में छह लोगों के मारे जाने के अलावा दर्जनों स्थान पर आगजनी और लूट हुई। करोड़ों के कृषि  व दुग्ध उत्पाद सड़कों पर नष्ट  कर दिए गए।  कम आवक का असर बाजार पर भी दिखा। वहीं केंद्र सरकार के तीन साल के सरकारी प्रचार माध्यम जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं कि किसान के जीवन में अब खुशहाली आ गई है क्योंकि उसे फसल-बीमा का सहारा मिल गया है। किसान अब बहुत खुश है कि उसे आसान कर्ज व क्रेडिट कार्ड मिल गया है। हालांकि हकीकत तो उन किसानों से पूछो जो हर रोज पंजाब से लेकर विदर्भ तक कर्ज व खराब फसल के कारण मौत को गले लगा रहे है। किसान की समस्या अकेले मौसमी मार के चलते फसल बेकार होना नहीं है, हर साल हजारों किसान बंपर फसल के कारण हताश हो कर खुदकुशी करते हैं। ऐसे किसानों को ना तो बीमा का कवर है ना ही कर्ज का।

अभी सोशल मीडिया पर एक ऐसे किसान की कहानी चल रही है सिमें डेढ कुंटल प्याज बेचने के बाद किसान को एक रूपया बचने का गणित समझाया गया है। बीते तीन महीने के दौरान मध्यभारत के कई राज्यों में टमाटर व प्याज की फसल के गुड़-गोर होने के किस्से सुनाई देते रहे, लेकिन कोई भी सरकारी एजेंसी माल का सही दमा देने के लिए आगे नहीं आई। कहीं टमाटर मवेशी को खिला दिए गए तो कहीं प्याज सड़क पर फैंक दिया गया। जिन इलाकों में टमाटर और प्याज का यह हाल हुआ, वे भीशण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं । है भी तो टमाटर तो रखते नहीं और प्याज रखने के सौ नखरे। मप्र में राज्य सरकार ने प्याज खरीदी की घोशणा की तो मंडी में पहले दिन महज एक ट्राली प्याज ही बिका, क्योंकि खरीदी के मापदंड में अधिकांश प्याज आया ही नहीं। हताश किसान अपना प्याज वहीं मडी में पटक कर चले गए। यदि देश में इनके दाम बाजार में बढते हैंे तो सारा मीडिया व प्रशासन इस की चिंता करने लगता है , लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।

खेती को लाभ का कार्य बनाने के लिए सन 2007 में प्रख्यात कृशि वैज्ञानिक एम.एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें किसान को उसके उत्पपाद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पचास फीसदी अतिरिक्त भुगतान की बात कही गई थी। चाहे केंद्र सरकार का चुनाव हो या फिर मप्र का पिछला विधान सभा चुनाव, सभी के घोशणा पत्र में इस रिपोर्ट को लागू करने के वायदे किए गए थे।। हालांकि इसमें भी खेती की लागत में जमीन की कीमत को षामिल नहीं किया गया था। लेकिन दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।
अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिष्ठा , तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञ होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है। यदि प्रत्येक किसान की बुवाई का रिकार्ड सरकार के पास हो तो उसकी न्यूनतम आय की गणना की जा सकती है। फसल होने पर किसान स्वतंत्र है विपणन के लिए, लेकिन आपदा या अफरात फसल के हालात में उसे न्यूनतम दाम मिले व उसकी फसल पर सरकारी एजेंसी का कब्जा हो। इससे मुआवजा, गिरदावरी जैसी लंबी प्रकियाओ ंसे बचा जा सकता है। एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

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