तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 16 जून 2017

Neither follow rules nore feel public difficulties

न अदालत की परवाह न जनता की चिंता 

पंकज चतुर्वेदी

रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें, उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं... 


पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम दिलवाने के लिए आंदोलन हुआ। कई दिनों तक सड़कें बंद रहीं, रेल भी रोकी गईं। सैकड़ों सरकारी व निजी वाहन फूंक दिए गए। जनजीवन को ठप्प करने के इस कार्य को नाम दे दिया आंदोलन का। किसानों की मांगे जायज हैं, उन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए की गई हिंसा, तोड़फोड़ व व्यवधान को किसी भी स्तर पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। विडंबना यह है कि कुछ जन प्रतिनिधि लोगों को सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाते दिखे। रही-बची कसर राज्य सरकार ने पूरी कर दी, पुलिस की गोली से मारे गए लोगों के परिवारजनों को एक करोड़ का मुआवजा देने की घोषणा कर दी गई।

यह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के विपरीत भी है, जिसमें तोड़-फोड़ में लगे लोगों से उसका मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था।हमारा देश भी अजब-गजब है, कहीं विवाह समारोह के नाम पर सड़कें जाम हैं तो कोई धार्मिक या सियासती रैली-जलसे निकाल रहा है तो कोई नमाज-पूजा-आरती, तो कोई धरना-प्रदर्शन। सनद रहे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने केंद्र सरकार को तीन हफ्ते का समय देते हुए आए रोज रास्ते रोकने वालों के खिलाफ ठोस कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए कहा था। अदालत ने यह भी कहा था कि रेल-रास्ता रोकने की अपील करने वालों के खिलाफ अनिवार्य अभियोजन हो और तीन महीने के भीतर ऐसे प्रकरणों का निबटारा भी हो। किसी को अस्पताल पहुंचने की अनिवार्यता तो किसी की नौकरी का इंटरव्यू- इन सबसे लापरवाह न जाने कब-कौन-किन मांगों को लेकर सड़क घेर कर खड़ा हो। ऐसा नहीं कि अदालतों ने ऐसे बंद-प्रदर्शनों पर पहली बार नाखुशी जताई हो और सरकार ने उसको गंभीरता से नहीं लिया हो। विडंबना है कि ऐसे कृत्य करने वालों को न तो नैतिकता की चिंता है और न ही वैधानिकता की।

कथित आंदोलनकारियों को भड़का कर यह अनैतिक काम करने के लिए उकसाने वाले लोग विधानसभा व अन्य सदनों के सदस्य हैं और उन्हें मालूम है कि इस तरह से जनता को परेशान करने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। हो सकता है कि उनकी मांग जायज भी हों, लेकिन अपनी मांग के समर्थन में उठाए गए कदम न तो आम आदमी को जायज लग रहे हैं और न ही यह किसी देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए स्वस्थ परंपरा है। क्या जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले यह नहीं जानते हैं कि इस तरह का बंद न केवल गैरकानूनी है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम जनता के विरेाध में ही हैं। लोकतंत्र में निर्णय जनता के हाथों होता है, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि लोकतंत्र जनता के हाथों में खेलता है। चुनाव वह समय होता है, जब जनता अपनी अपेक्षाओं पर खरा न उतरने वालों को कुर्सी से नीचे उतार फेंकती है। लेकिन आज हालात तो अराजकता की ओर इशारा कर रहे हैं, अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए सड़क पर आ जाओ, जाम कर दो, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाओ, प्रशासन तंत्र को बंधक बनाओ।

लगभग अपहरणकर्ताओं की तर्ज पर अपनी मांगें मनवाने के लिए दूसरों की असुविधा, कानून की सीमा या फिर विधि की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया जाए। वे जन-प्रतिनिधि, जिन्हें जनता विभिन्न सदनों में इस उम्मीद से चुनकर भेजती है कि वे उनकी दिक्कतों को दूर करने के कानून बनाएंगे। सदन में तो वे चुप बैठे रहते हैं या जाते ही नहीं हैं और झूठी सहानुभूति दिखाने के लिए सड़कों पर उधम करते हैं। जबकि वे भी जानते हैं कि जिन नीतियों, कानूनों के कारण कीमतें बढ़ रही हैं, उन्हें सदन में पास करवाने में उनकी भी समान भागीदारी रही है। यही नहीं कई बार सत्ताधारी दल के लोग भी ऐसी हरकतों में शामिल होते हैं और ऐसे में पुलिस भी बच कर निकलती है। सन 1997 में ही केरल हाईकोर्ट एक मामले में आदेश दे चुकी थी कि इस तरह के बंद-हुड़दंग अवैध होते हैं। पिछले दिनों ही बंबई हाईकोर्ट सन् 2004 में भाजपा-शिवसेना द्वारा आयोजित बंद के मामले में सख्त आदेश दिए कि धरना-प्रदर्शन के दौरान यदि अधिकारी अदालत द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करवाने में असफल रहते हैं तो उन्हें भी अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति बिलाल नाजकी और वीके ताहिलरमानी की बेंच ने बंद-धरने के बारे में जारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया है कि किसी भी बंद का आह्वान करने पर उस नेता की पूरी जिम्मेदारी होगी। नेता को जनता के जीवन और संपत्ति की क्षति के लिए मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने सड़क पर आम लोगों की आवाजाही निरापद रखने के भी निर्देश दिए। इससे पहले कोलकता, मद्रास और दिल्ली की अदालतें भी समय-समय पर ऐसे आदेश देती रही है। लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं है। अधिकांश मामलों में पुलिस और प्रशासन भी हालात बिगड़ने का इंतजार करते रहते हैं।सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि हमारे देश में हर साल सड़कों पर हंगामे की 56 हजार छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं। इनकी चपेट में आ कर कोई पचास हजार वाहन बर्बाद हो जाते हैं, जिनमें 10 हजार बस या ट्रक होते हैं। अकेले दिल्ली में सालभर में 100 से अधिक तोड़फोड़, उधम की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। इस प्रकार के रोज-रोज के ंबंद, धरना-प्रदर्शन, जाम से आम आदमी आजिज आ चुका है। इन अराजकताओं के कारण समय पर इलाज न मिल पाने के कारण मौत होने, परीक्षा छूट जाने, नौकरी का इंटरव्यू न दे पाने जैसे किस्से अब आम हो चुके हैं और सरकार इतने गंभीर विषय पर संवेदनहीन बनी हुई है। सड़क रोकने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सार्वजनिक रूप से हंगामा करने को गैरकानूनी व अवैधानिक ठहराने वाली कई धाराएं व उन पर कड़ी सजा के प्रावधान हमारी दंड संहिता में हैं, लेकिन जब कानून बनाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि संसद व विधान सभाओं मे ही ऐसी सड़क-छाप हरकतें करते हैं तो सड़क वालों को यह करने से कौन रोकेगा?पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, पुलिस का काम सुचारू यातायात बनाए रखना है, इसके लिए वह वेतन लेती है, जनता की गाढ़ी कमाई से निकले करों से यह वेतन दिया जाता है।

लेकिन जब पच्चीस-पचास लोग नारे लगाते हुए चौराहों पर लेट जाते हैं तो पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है, इंतजार करती है, लंबे ट्राफिक जाम का या फिर स्थिति बिगड़ने का और उसके बाद अपनी चरम-कार्यवाही यानी बल प्रयोग पर उतारू हो जाती है। साफ दिखता है कि पुलिस का प्रशिक्षण ऐसे हालातों से निबटने के नाम पर शून्य हैै। भीड़ को जमा होने से रोकना, आम लोगों के जनजीवन को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों पर कड़ी कार्यवाही करना, गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर उपद्रवियों के इरादे भांपना और उसके अनुसार ‘प्रिवेंटिव’ कार्यवाही करना जैसे पुलिस भूल ही चुकी है। यह भी विंडबना है कि पचास से अधिक सशस्त्र पुलिस वालों की मौजूदगी में सौ लोगों की भीड़ सड़क पर कोहराम काटती है और इसकी जिम्मेदारी तय कर किसी भी पुलिस अफसर पर कार्यवाही करने का कोई रिकार्ड देशभर की पुलिस के पास नहीं है। अब समय आ गया है कि देश के विकास में व्यवधान बनी ऐसी हरकतों को सख्ती से रोका जाए। रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं। दिल्ली और प्रत्येक शहर में धरना-प्रदर्शन आदि के लिए आबादी से दूर कोई स्थान तय करने, उस स्थान पर लोगों की आवाज सुनने वाले सक्षम अफसरान की बहाली करना जैसे कदम भी आज समय की मांग हैं। यह तभी संभव है, जब राजनेताओं की प्रबल इच्छाशक्ति उनके छोटे-छोटे स्वाथोंर् पर भारी पड़े। पुलिस को उस मजबूरी से ऊपर उठना होगा कि भीड़ पर कोई कार्यवाही करना संभव नहीं होता है। आज बेहतरीन इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मौजूद हैं, जो हजारों की भीड़ में से उत्पातियों की पहचान कर सकती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सड़कों पर उधम, उत्पात, जाम, कोहराम देश की प्रगति के सबसे बड़े दुश्मन हैं और इनको समर्थन देने वाला देश के खिलाफ काम कर रहा है। और ऐसे लोगों को आंदोलनकारी या भीड़ का हिस्सा मान कर छोड़ देना अब नासूर बनता जा रहा है। बिजली, पानी या पुलिस या हर तरह की दिक्कत का हल सड़क रोककर तलाशने वालों को चुनाव लड़ने से रोकने जैसी पाबंदी लगाना समय की मांग है। ऐसे मामलों में वीडियो रिकार्डिंग को पर्याप्त सबूत मान कर मामले का संज्ञान लेना होगा।

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