तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

बुधवार, 30 अगस्त 2017

Elephant in villages or Villages in forest ?


गांवों में गजराज का आतंक

झारखंड के घाटशिला इलाके के आधा दर्जन गांव के लोग गत दो महीने से ना तो सो पा रहे हैं ना ही जंगल या खेत जा पा रहे हैं। गितिलडीह, चाडरी, मकरा, तालाडीह, भदुआ आदि गावों में कभी भी कोई बीस जंगली हाथियों का दल धमक जाता है, घर में रखा धन, महुआ आदि खाता है, झोपड़ियों तोड़ देता है। गांव वाले या तो भाग जाते है। या फिर मशाल जला कर उन्हें भगाने का प्रयास करते हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़, बलरामपुर, सरगुजा आदि जिलों के हालात इससे अलग नहीं हैं। यहां धरमजयगढ़ ब्लाक में हाथी पिछले सप्ताह ही एक व्यक्ति को पटक कर मार चुके हैं। तमिलनाडु के वेल्लोर जिला मुख्यालय के बाहरी इलाके में एक जंगली हाथी मुदुक्करई जंगल से घुस आया और चार लोगों को पटक कर मार दिया। पश्चिम बंगाल के नागरकाटा चायबागान इलाके के मेटली ब्लाक में चाल्सा गांव में हाथी कई लोगों को बस्ती उजाड़ चुके हैं। उधर, इन दिनों झारखंड-ओडिशा-छत्तीसगढ़ की सीमा के आसपास एक हाथी-समूह का आतंक है। जंगल महकमे के लोग उस झुंड को केवल अपने इलाके से भगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, जबकि ये गजराज-दल भाग कर दूसरे राज्य में उत्पात मचाते हैं। कहा जा रहा है कि हाथी बस्ती में आ गया है, लेकिन यदि तीस साल पहले के जमीन के रिकार्ड को उठा कर देखें तो साफ हो जाएगा कि इंसान ने हाथी के जंगल में घुसपैठ की है। दुनियाभर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत शामिल हो गया है। भारत में इसे ‘‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ घोषित किया गया है। इसके बावजूद भारत में बीते दो दशकों के दौरान हाथियों की संख्या स्थिर हो गई है। जिस देश में हाथी के सिर वाले गणोश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है, वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है। पिछले एक दशक के दौरान मध्य भारत में हाथी का प्राकृतिक पर्यावास कहलाने वाले झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा में हाथियों के बेकाबू झुंड के हाथों एक हजार से ज्यादा लाग मारे जा चुके हैं। धीरे-धीरे इंसान और हाथी के बीच के रण का दायरा विस्तार पाता जा रहा है। देश में हाथी के सुरक्षित कॉरिडोरों की संख्या 88 हैं, इसमें 22 पूर्वोत्तर राज्यों, 20 केंद्रीय भारत और 20 दक्षिणी भारत में हैं। कभी हाथियों का सुरक्षित क्षेत्र कहलाने वाले असम में पिछले सात सालों में हाथी व इंसान के टकराव में 467 लोग मारे जा चुके हैं। अकेले पिछले साल 43 लोगों की मौत हाथों के हाथों हुई। उससे पिछले साल 92 लोग मारे गए थे। झारखंड की ही तरह बंगाल व अन्य राज्यों में आए रोज हाथी को गुस्सा आ जाता है और वह खड़े खेत, घर, इंसान; जो भी रास्ते में आए कुचल कर रख देता है। देशभर से हाथियों के गुस्साने की खबरें आती ही रहती हैं। पिछले दिनों भुवनेश्वर में दो लोग हाथी के पैरों तले कुचल कर मारे गए। छत्तीसगढ़ में हाथी गांव में घुस कर खाने-पीने का सामान लूट रहे हैं। दक्षिणी राज्यों के जंगलों में गर्मी के मौसम में हर साल 20 से 30 हाथियों के निर्जीव शरीर संदिग्ध हालात में मिल रहे हैं। प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ को अपना हक समझने वाला इंसान हाथी के दर्द को समझ नहीं रहा है और धरती पर पाए जाने वाले सबसे भारी-भरकम प्राणी का अस्तित्व संकट में है। जानना जरूरी है कि हाथियों को 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटों तक भटकना पड़ता है। हाथी दिखने में भले ही भारी-भरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है। थोड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है। ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानी जंगल को जब नुकसान पहुंचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिडं़त होती है। बढ़ती आबादी के भोजन और आवास की कमी को पूरा करने के लिए जमकर जंगल काटे जा रहे हैं। उसे जब भूख लगती है और जंगल में कुछ मिलता नहीं या फिर जल-स्रेत सूखे मिलते हैं तो वे खेत या बस्ती की ओर आ जाते हैं। मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती दांतों का लालच; कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण हाथी को निर्ममता से मारा जा रहा है । यदि इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो जंगलों का सर्वोच्च गौरव कहलाने वाले गजराज को सर्कस, चिड़ियाघर या जुलूसों में भी देखना दुर्लभ हो जाए

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