तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 27 अक्तूबर 2017

awareness against firework/crackers requires 365 days

बीते कई सालों से यही हो रहा है - दिवाली के ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट आतिशबाजी को ले कर कुछ पाबंदी लगाती है , कथित हिंदूवादी इस पर आपत्ति करते हैं, कुछ लोग इसका पालन करते हैं . आंकड़ों की चीख होती है और फिर मसला अगली दिवाली तक तल जाता है, असल में हवा में बढ़ रहे जहर और उसमें आतिशबाजी की खलनायकी पर सारे साल विमर्श होना चाहिए, लोगों को पुरे साल इसकी विभीषिका के प्रति जागरूक करने और स्वत ही इसका परित्याग करने के लिए प्रेरित करने के पाध्यक्र्म, प्रशिक्षण, लेखन आदि होना चाहिए , वरना किसी दिन अदालती आदेश भी मखौल बन कर रह जायेंगे और इन्सान जहर भरी हवा में साँस ले कर मरने को विवश.
इस सप्ताह मेरे विमर्श का मसला यही है, इस आलेख को विस्तार से पढ़ें, विचार करने और क्रियान्वयन करें -
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इंतजार ना करें अगली दीवाली का


पंकज चतुर्वेदी


हालांकि बीते सालों की तुलना में इस बार दीपावली की रात कुछ कम जहरीली हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी समय, आवाज की कोई भी सीमा मानी नहीं गई। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के स्थानीय निकाय का कहना है कि केवल एक रात में पटाखों के कारण दो सौ टन अतिरिक्त कचरा निकला। बीते साले से कुछ कम तो हुआ, लेकिन इतना भी कम नहीं हुआ कि दीपावली के बाद दिल्ली और उसके आसपास 100 किलोमीटर में ‘स्मॉग’ का कहर ना होता। स्मॉग यानि फॉग यानि कोहरा और स्मोक यानि धुआं का मिश्रण। इसमें जहरीले कण षामिल होते हैं जो कि भारी होने के कारण उपर उठ नहीं पाते व इंसान की पहुंच वले वायुमंडल में ही रह जाते हैं। जब इंसान सांस लेता है तो ये फैंफड़े में पहुच जाते हैं। किस तरह दमे और सांस की बीमारी के मरीज बेहाल रहे, कई हजार लोग ब्लड प्रेशर व हार्ट अटैक की चपेट में आए- इसके किस्से हर कस्बे, षहर में हैं। लैसेट जर्नल की ताजा रिपोर्ट बता चुकी है कि भारत में हर साल प्रदूशण के चलते 25 लाख लेाग मारे जाते हैं। इसमें बड़ा हिस्सा हवा के जहर होने के कहर का हेाता है।

हालांकि सर्वाेच्च अदालत ने भी पर्व की जन भावनाओं का खयाल कर आतिशबजी पर पूर्ण पाबंदी से इंकार कर दिया, लेकिन बीती दीपावली की रात दिल्ली व देश में जो कुछ हुआ, उससे साफ है कि आम लोग कानून को तब तक नहीं मानते है,जब तक उसका कड़ाई से पालन ना करवाया जाए। पूरे देश में हवा इतनी जहर हो गई कि 68 करोड़ लेागों की जिंदगी तीन साल कम हो गई। अकेले दिल्ली में 300 से ज्यादा जगह आग लगी व पूरे देश में आतिशबाजी के कारण लगी आग की घटनाओं की संख्या हजारों में हैं। इसका आंकड़ा रखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि कितने लेाग आतिशबाजी के धुंए से हुई घुटन के कारण अस्पताल गए। दीपावली की रात प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी व देश के लिए अनिवार्य ‘‘स्वच्छता अभियान’’ की दुर्गति देशभर की सड़कों पर देखी गई। दीपावली की अतिशबाजी ने राजधानी दिल्ली की आवोहवा को इतना जहरीला कर दिया गया कि बाकायदा एक सरकारी सलाह जारी की गई थी कि यदि जरूरी ना हो तो घर से ना निकलें। फैंफडों को जहर से भर कर अस्थमा व कैंसर जैसी बीमारी देने वाले पीएम यानि पार्टिक्यूलर मैटर अर्थात हवा में मौजूद छोटे कणों की निर्धारित सीमा 60 से 100 माईक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली के बादयह सीमा कई जगह एक हजार के पार तक हो गई। ठीक यही हाल ना केवल देश के अन्य महानगरों के बल्कि प्रदेशेां की राजधानी व मंझोले षहरों के भी थे । सनद रहे कि पटाखें जलाने से निकले धुंए में सल्फर डाय आक्साईड, नाईट्रोजन डाय आक्साईड, कार्बन मोनो आक्साईड, षीशा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिये षरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव परिवेश में मैाजूद पशु-पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं इससे उपजा करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है। यदि इसे जलाया जाए तो भयानक वायु प्रदूशण होता है। यदि इसके कागज वाले हिस्से को रिसाईकल किया जाए तो भी जहर घर, प्रकृति में आता है। और यदि इसे डंपिंग में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए तो इसके विशैले कण जमीन में जज्ब हो कर भूजल व जमीन को स्थाई व लाईलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं। आतिशबाजी से उपजे षोर के घातक परिणाम तो हर साल बच्चे, बूढ़े व बीमार लोग भुगतते ही हैं। दिल्ली के दिलशाद गार्डन में मानसिक रोगों को बड़ा चिकित्सालय है। यहां अधिसूचित किया गया है कि दिन में 50 व रात में 40 डेसीबल से ज्यादा का षोर ना हो। लेकिन यह आंकड़ा सरकारी मॉनिटरिंग एजेंसी का है कि दीपावली के पहले से यहां षोर का स्तर 83 से 105 डेसीबल के बीच है। दिल्ली के अन्य इलाकों में यह 175 तक पार गया है।
हालांकि यह सरकार व समाज देानेां को भलीभांति जानकारी थी कि रात 10 बजे के बाद पटाखे चलाना अपराध है। कार्रवाई होने पर छह माह की सजा भी हो सकती है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 में दिया था जो अब अब कानून की शक्ल ले चुका है। 1998 में दायर की गई एक जनहित याचिका और 2005 में लगाई गई सिविल अपील का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे। 18 जुलाई 2005 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति आरसी लाहोटी और न्यायमूर्ति अशोक शर्मा ने बढ़ते शोर की रोकथाम के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों की आड़ में दूसरों को तकलीफ पहुंचाने, पर्यावरण को नुकसान करने की अनुमति नहीं देते हुए पुराने नियमों को और अधिक स्पष्ट किया, ताकि कानूनी कार्रवाई में कोई भ्रम न हो। अगर कोई ध्वनि प्रदूषण या सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्देशों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ भादंवि की धारा 268, 290, 291 के तहत कार्रवाई होगी। इसमें छह माह का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल से लेकर वरिष्ठतम अधिकारी को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई का अधिकार है। इसके साथ ही प्रशासन के मजिस्ट्रियल अधिकारी भी कार्रवाई कर सकते हैं। विडंबना है कि इस बार रात एक बजे तक जम कर पटाखें बजे, ध्वनि के डेसीमल को नापने की तो किसी को परवाह थी ही नहीं, इसकी भी चिंता नहीं थी कि ये धमाके व धुआं अस्पताल, रिहाईशी इलााकों या अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में बेरोकटोक किए जाते रहे । असल में आतिशबाजी को नियंत्रित करने की षुरूआत ही लापरवाही से है। विस्फोटक नियमावली 1983 और विस्फोटक अधिनियम के परिपालन में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि 145 डेसीबल से अधिक ध्वनि तीव्रता के पटाखों का निर्माण, उपयोग और विक्रय गैरकानूनी है। प्रत्येक पटाखे पर केमिकल एक्सपायरी और एमआरपी के साथ-साथ उसकी तीव्रता भी अंकित होना चाहिए, लेकिन बाजार में बिकने वाले एक भी पटाखे पर उसकी ध्वनि तीव्रता अंकित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक बाजार में 500 डेसीबल की तीव्रता के पटाखे भी उपलब्ध हैं। यही नहीं चीन से आए पटाखों में जहर की मात्रा असीम है व इस पर कहीं कोई रोक टोक नहीं है। कानून कहता है कि पटाखा छूटने के स्थल से चार मीटर के भीतर 145 डेसीबल से अधिक आवाज नहीं हो। शांति क्षेत्र जैसे अस्पताल, शैक्षणिक स्थल, न्यायालय परिसर व सक्षम अधिकारी द्वारा घोषित स्थल से 100 मीटर की परिधि में किसी भी तरह का शोर 24 घंटे में कभी नहीं किया जा सकता। लेकिन विडंबना है कि आतिशबाजी बेचने पर रोक लगाने के ओदश के कारण कुछ अराजक तत्वों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ही दिन दहाड़े पटाखे चलाए। पिछले साल अदालत ने तो सरकार को समझाईश दे दी थी कि केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारें पटाखों के दुष्प्रभावों के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में व्यापक प्रचार करें और जनता को इस बारे में सलाह दे। दुर्भाग्य है कि अब आम लोगों पर ऐसी अपीलों का असर होता नहीं है, क्योंकि उनके राजनेता खुद आतिशबाजी चलाते दिखते हैं। यह जान लें कि दीपावली पर परंपराओं के नाम पर कुछ घंटे जलाई गई बारूद कई-कई साल तक आपकी ही जेब में छेद करेगी, जिसमें दवाईयों व डाक्टर पर होने वाला व्यय प्रमुख है। हालांकि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि आतिशबाजी चलाना सनातन धर्म की किसी परंपरा का हिस्सा है, यह तो कुछ दशक पहले विस्तारित हुई सामाजिक त्रासदी है। आतिशबाजी पर नियंत्रित करने के लिए अगले साल दीपावली का इंतजार करने से बेहतर होगा कि अभी से ही आतिशबाजियों में प्रयुक्त सामग्री व आवाज पर नियंत्रण, दीपावली के दौरान हुए अग्निकांड, बीमार लोग , बेहाल जानवरों की सच्ची कहानियां सतत प्रचार माध्यमों व पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से आम लेागों तक पहुंचाने का कार्य षुरू किया जाए। यह जानना जरूरी है कि दीपावली असल में प्रकृति पूजा का पर्व है, यह समृद्धि के आगमन और पशु धन के सम्मान का प्रतीक है । इसका राश्ट्रवाद और धार्मिकता से भी कोई ताल्लुक नहीं है। यह गैरकानूनी व मानव-द्रोही कदम है। ऐसा नहीं है कि दीपावली चली गई और अब आतिशबाजी पर बहस के लिए एक साल को बात टल गई, सभ्य समाज और जागरूक सरकार को अभी से ही सारे साल पटाखें के दुश्प्रभाव के सच्चे-किस्से, उससे हैरान-परेशान जानवरों के वीडियो, उससे फैली गंदगी से कुरूप होई धरती के चित्र आदि व्यापक रूप से प्रसारित-प्रचारित करना चाहिए , विद्यसलयों और आरडब्लूए में इस पर सारे साल कार्यक्रम करना चाहिए। ताकि अपने परिवेश की हवा को स्वच्छ रखने का संकल्प महज रस्मअदायगी ना बन जाये ।

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

Biodiversity in India is under threat

पेड़-पौधे भी हैं तस्करों के निशाने पर !

पंकज चतुर्वेदी

सीमा सुरक्षा बल यानि एसएसबी की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बीते तीन सालों के दौरान केवल भूटान और नेपाल की सीमा पर जंगली जानवरों कें अंगों और वनस्पति जैसी दुर्लभ जैवविधिता वाले प्राकृतिक संसाधनों की तस्करी कई सौ गुना बढ़ गई है।  इस अवधि में तस्करों से मिली वन संपदा की कीमत 2.21 करोड़ रुपए से बढ़कर 187.69 करोड़ रुपए हो चुकी है। एसएसबी की रिपोर्ट बताती है कि सन  2014 में वन संपदा की तस्करी के महज  39 प्रकरण दर्ज हुए थे, जो आज बढ़ कर 82 हो गए हैं। इसी साल अप्रैल महीने में सरकार ने राज्यसभा में माना था कि जहां 2014 में बाघ के अवैध शिकार के कुल 19 मामले दर्ज हुए वहीं 2016 में यह संख्या 31 हो गई थी। यह पाया गया कि जिन पांचराज्यों में बाघों का अधिक अवैध शिकार हुआ उनमें उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, बिहार, कर्नाटक व उत्तर प्रदेश शामिल हैं।
उधर, एसएसबी की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल तीन साल में वन संपदा की तस्करी का गढ़ बन चुका है। नेपाल और भूटान के सीमावर्ती पांच भारतीय राज्यों के घने जंगलों से वन्य जीवों की होने वाली तस्करी में लगभग आधी हिस्सेदारी पश्चिम बंगाल की हो गई है। एसएसबी ने 2014 से 2017 के दौरान की गई वन्य जीवों की तस्करी का मूल्य 244.56 करोड़ रुपए आंका है। तस्करों के निशाने पर इन इलाकों के वन्य जीवों में हिम तेंदुआ, सफेद हिरण, बाघ, एशियाई हाथी, हिमालयन नीली भेड़ और किंग कोबरा शामिल हैं।
 भारत में तस्करों की पसंद वे नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका था , लेकिन पाश्चात्य देश उनका महत्व समझ रहे हैं । गौरतलब है कि यह महज नैतिक और कानूनसम्मत अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविश्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातयों के पौधों की जानकारी है , जिनमें से कई भोजन या दवाईयों के रूप  में बेहद महत्वपूर्ण हैं । दुर्लभ कछुओं, कैंकडों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतर्राष्ट्रीय  हवाई अड्डे पर पकड़े जा चुके हैं । पिछले दिनों दिल्ली में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय  कृषि  जैवविविध्ता कांग्रेस को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जैव विविधता संरक्षण को भुखमरी, गरीबी और कुपोषण  से जूझने का महत्वपूर्ण साधन निरूपित किया था।  विडंबना है कि देश के दूरस्थ अंचलों में स्थानीय पेड़-पौधे , पशु -पक्षी, तितली-कीट की प्रजातियां या तो कीटनाशक दवाओं व अन्य रसायनों के अंधाधुध इस्तेमाल या फिर तस्करों के हाथों विलुप्त होती जा रही है।

हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य से सतत चलता है । खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी । सांप पर काबू पाने के लिए मोर व नेवले भी हैं । लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जाने केा व्याकुल वैज्ञानिकों के प्रयोगों के लिए भारत के जैव संसार  पर तस्करेंा की निगाहें गहरे तक लगी हुई हैं ।  भारत ही साक्षी है कि पिछले कुछ वर्शों के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पंक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं  और इसका खामियाजा भी समाज भुगत रहा है ।
वैसे तो भारत सरकार ने इलाके की 41 जड़ी बूटियों के दोहन पर रोक लगा रखी है । इसके बावजूद अतीश, दंदासा, तालीस, कुटकी, डोलू, गंद्रायण, सालम मिस्री, जटामोसी, महामेदा, सोम आदि स्थानीय बाजार में सस्ते दामों में बिकती मिल जाती है । यहां हालात इतने गंभीर हैं कि गढ़वाल की भिलंगना घाटी में गत एक दशक के दौरान 22 पादप प्रजातियां  विलुप्त हो गईं, 60 प्रजातियों का जीवन-चक्र सिर्फ 3-4 साल का रह गया है । अनुमान है कि कुमाऊं और पिथौरागढ़ की शारदा नदी के किनारे के वनों से कोई 40 प्रजाति के पौघे आगामी पांच सालों में नदारत हो जाएंगे ।
नेपाल की सीमा पर धनगढ़ी, रक्सौल, वीरगंज,  हेटोडा, नेपालगंज के महंगे होटलों में लेपटाप, फैक्स, मोबाईल से लैस सारे साल डटे रहते हैं । ये लोग उन जड़ी-बूटियों और उनके खरीदारों के सतत संपर्क में रहते हैं, जिनकी मांग अमेकिा व यूरोप में है, लेकिन भारत में उन पर पाबंदी है । भारत के हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों व दवाईयों की बाहर जबरदस्त मांग है। अरब के अय्याश शेखों को र्यान-शक्ति बढ़ाने वाली दवाओं के नाम पर केवल भारतीय जड़ी-बूटियां ही भाती हैं व इसके लिए वे कुछ भी भुगतान करने को तैयार रहते हैं ।
नेशनल केंसर इंस्टीट्यूट , अमेरिका(एनसीआई) के एक षोध के मुताबिक भारत के पहाड़ों पर मिलने वाली आयुर्वेदिक वनौषधि ‘ टेक्सोल’ में गर्भाशय का कैंसर रोकने की जबरदस्त क्षमता है ।  फिर क्या था , देखते ही देखते नेपाल की सीमा से सटे हिमालय इलाके के ‘तालीस पत्र’ नामक पेड़ पर जैसे कहर आ गया हो । यही तालीस पत्र टेक्सोल है और अब कभी चप्पे-चप्पे पर मिलने वाले इसके पेड़ अब दुलर्भ हो गए हैं । डाबर, नेपाल ने तो बाकायदा इसकी खेती व उसे अमेरिका व इटली को बेचने के अनुबंध कर रखे हैं ।
अरूणाचल प्रदेश की दिबांग और लोहित घाटियों में ‘‘ मिशामी टोटा’’ का टोटा होना अभी की ही बात हैं । डिब्रुगढ़ के बाजार में अचानक इसकी मांग बढ़ी और देखते ही देखते इसकी नस्ल ही उजाड़ दी गई । स्थानीय लोग इस जड़ी का इस्तेमाल पेट दुखने व बुखार के इलाज के लिए सदियों से करते आ रहे थे । डिब्रुगढ़ में इसके दाम दो हजार रूपए किलो हुए तो कोलकाता के बिचौलियों ने इसे पांच हजार में खरीदा । वहां से इसे तस्करी के पंख लगे और जापान व स्वीट्जरलैंड में इसके जानकारों ने पचास हजार रूपए किलो की दर से भुगतान कर दिया ।
ठीक यही हाल ‘अगर’ नाम सुगंधित औषधि का हुआ । इसके तेल की मांग अरब देशो में बहुत है ।  यहां तक कि सौ ग्राम तेल के एक लाख रूपए तक मिलते हैं । अरब के कामुक शेख इसके लिए बेकरार रहते हैं । इन सभी जड़ी-बूुटियों  को जंगल से बाहर निकालने व उन्हें भूटान या नेपाल के रास्ते तस्करी करने के काम पर वहां के उग्रवादियों का एकछत्र राज्य है ।
एड्स और कैंसर जैसी खतरनाक रोगों का इलाज खोज रहे विदेशी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर हैं, । अमेरिका व यूरोप के कुछ वनस्पति वैज्ञानिक और दवा बनाने वाली कंपनियों के लेाग गत कुछ वर्शों से पर्यटक बन कर भारत आते हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां प्राप्त करते हैं । विदित हो सन 1998 में मध्यप्रदेश के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया था, जब वे स्थानीय आदिवासियों की मदद से कुछ पौधों की पहचान कर रहे थे ।
राजस्थान के रणथंभौर अभ्यारण इलाके में विदेशी लोगों द्वारा कतिपय पौधों के बारे में जानकारी मांगने की बात राजस्थान विश्वविद्यालय के एक षोध में भी उल्लेखित की गई है ।
देश के रेगिस्तानी इलाकों में मिलने वाली गूगल(कांपीफोरा वाईट्री) की एक विशेश प्रजाति में द्ददय रोग के कारक कोलेस्ट्रोल को कम करने की क्षमता है । अश्वगंधा यानी विथानिया सोम्नीफेर तो याददाश्त, मानसिक रोगों, षारीरीक दुर्बलता जैसे विकारों में राम बाणा माना जाता है । इस बूटी में कैंसर -रोधी गुण भी हैं और इसी कारण इसकी बड़ी मात्रा में तस्करी हो रही है । सांस संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए पुश्तैनी रूप से इस्तेमाल होने वाले एक पौधे की भी खासी मांग है, इसे वैज्ञानिक भाशा में ‘‘ इफेड्रा फोलियाटा’’ कहा जाता है । अमेरिका में इस पौघे से दिल की ओर जाने वाली धमनियों को खेालने की दवा बनाने के प्रयोग चल रहे हैं । यदि ये सभी प्रयोग सफल हुए तो विदेशी कंपनियां हमारी इन जड़ी-बूटियों को अपने तरीके से पैटंट करवा कर सारी दुनिया में व्यापार करेंगी ।
राजधानी दिल्ली का खारी बावली इलाका कई दुलर्भ व प्रतिबंधित औषधियों की खरीद-फरोक्ष्त का अड्डा है ।
कैंसर के इलाज के लिए प्रयुक्त दवा ‘ आईसो हैक्सनीलन्पथाइजरिंस’’ भले ही आज विदेशी औशधि है, लेकिन यह मध्य भारत में लावारिस से मिलने वाले पौधे ‘अर्नेबिया हिस्पीडिसीमा’’ से बनी है । अरावली पर्वतमाला में मिलने वाले पौधे ‘बैलानाईट्स एजीप्टीनिया’ से ऐसा गर्भनिरोधक तैयार किया गया है , जिसके कोई साईड-इफैक्ट नहीं हैं । हिमालय क्षेत्र में मिलने वाले गुलाबी फूलों ‘ बरबेरिस एरिस्टाका’ से आंख की बेहतरीन  दवा तैयार की गई है । यहीं मिलने वाले टेक्सस बकाठा से कैंसर निदान में महत्वपूर्ण दवा मिली है । हैपीटाइटस जैसे घातक रोग का इलाज भी भारत में मिलने वाली बूटी फाइलान्थर निसरी में खोजा गया है ।
हमारे लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा नीम का कई बीमारियों व खेती-किसानी में उपयोग होता है । परंपरागत रूप से नीम भारतीय पेड़ है, इसके बावजूद सन 1995 में यूरोपीय पेटेंट प्राधिकरण ने अमेरिका के कृषि विभाग व अमेरिका की रसायन कंपनी डब्लू.जी. ग्रेस एंड कंपनी के नाम नीम के तेल से कीटनाशक बनाने का पेटेंट  जारी कर दिया । समय रहते इस निर्णय को चुनौती दी गई, तब डब्लू. जी. ग्रेस कंपनी ने कई प्रमाण प्रस्तुत किए कि वे लंबे समय से इस दिशा में शोध कर रहे हैं । हालांकि कंपनी का दवा खारिज हुआ, लेकिन उस घटना से पता चला कि किस तरह अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत से नीम के तेल की तस्करी कर ही थीं ।  ठीक ऐसा ही हल्दी के साथ भी हो चुका है ।  दक्षिण एशिया के किसानों के बासमती के पेटेेट पर भी अमेरिकी दावे हो चुके हैं ।
यहां जानना जरूरी है कि हमारे  देश की पारंपरिक जड़ी-बूटियों की थोड़ी सी मात्रा ही विदेशी वैज्ञानिकों के लिए काफी होती है । ये लोग इन औशधियों के गुणों व उसके मुख्य तत्वों का विश्लेशण करते हैं और फिर उन्हीं तत्वों के आधार पर दवाएं बना कर पैटेंट करवा लेते हैं । हमारे पारंपरिक ज्ञान की रासायनिक बनावट को विदेशों में भेजने वाले कई गिरोह बाकायदा काम कर रहे हैं । यह बड़ा सुरक्षित धंधा है , ना तो कोई बड़ा सा कंसाईमेंट बनाना है और ना ही ढृलाई का झंझट है । इस काम में कई पर्यटक तो कुछ योग के विशेशज्ञ और कुछ तो दोहरी नागरिकता वाले अप्रवासी लगे हैं।

भारत जैसे जैव-संपन्न देश में इस बाबत सशक्त कानून ना होना विडंबना ही है । संसद ने सन 2002 में जैव विविधता कानून को मंजूरी दी थी । एक राष्टीय जैव विविधता प्राधिकरण के गठन की भी योजना बनाई गई थी । गोया यह सरकार में बैठे लोग भी स्वीकारते हैं कि जैव तस्करी पर कारगर रूप से अंकुश लगाने की दृष्टि से यह कानून बेहद कमजोर है ।  हमारे बौद्धिक व पारंपरिक ज्ञान व जैव विविधता का सौदा करने वाले लेाग एक तरह से देश की अर्थ व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं । इस बाबत सरकार भले ही देर से चेते पर समाज को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना होगा ।

पंकज चतुर्वेदी

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

Tajmahal under threat due to polluted Yamuna

यमुना के सूखने से कमजोर होता ताज

                                                                                               पंकज चतुर्वेदी


आगरा का ताजमहल अब केवल एक ऐतिहासिक इमारत, या दुनिया के सात अजूबों में से एक ही नहीं रह गया है, प्रेम की यह निशानी अब यह विवाद, राजनीतिक दांवपेचं और सांप्रदायकि धु्रवीकरण के जरिये वोट उगाहने की मशीन भी बनता जा रहा है।  आज इसकी इसकी चमक बरकरार रखने के लिए पुश्तों से यहां रह रहे लोगों पर तमाम बंदिशेां लगाई जाती हैं, जबकि हकीकत यह है कि ताजमहल के अस्तित्व को खतरे का मूल कारण बेपानी व जहरीली हो रही यमुना नदी है। ताजमहल के सफेद संगमरमर के पीला पड़ने पर सरकार चिंतित है। एक संसदीय दल वहां के हालात देखने को भेजा जा रहा है। आगरा में गोबर कें उपलों को जलाने पर रोक की योजना है ताकि सदियों से प्रेम का संदेश दे रहे ताजमहल की सफेद रंग बरकरार रखा जा सके। इन दिनों ताजमहल को ‘फेस पैक’ लगाया जा रहा है , कोशिश है कि ‘मसाज’ कर उसकी रंगत को वापिस लाया जाए । दुनिया के कई देशों के लोग ताज महल को आश्चर्य मानते हैं । आश्चर्य इसकी बनावट या खूबसूरती के कारण नहीं, बल्कि इतनी लापरवाही से उसकी देखभाल करने के बावजूद इतने लंबे समय तक इसका अस्तित्व बरकरार रहने के कारण ! ताज की खूबसूरती पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं ।

प्रमाण हैं कि इस बेशकीमती इमारत की मीनारों में झुकाव आ रहे हैं । ताज की ताजतरीन समस्या उसके पत्थरों व नक्कासी के जगह-जगह से चटकने की है । मुख्य इमारत के बाहरी हिस्से में जहां बेहतरीन, नफीस नक्कसी है, वहां गहरी दरारें देखी जा सकती हैं । इसके खंबों पर संगमरमर भी कई जगह चटक गया है । सरकारी अफसर इसे कोई बड़ी समस्या नहीं मानते, लेकिन कई-कई हजार किलोमीटर दूर से इस अजूबे को देखने आने वालेां की आंख में तो यह खटकता है ।  इस वैज्ञानिक तथ्य को  लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है कि ताजमहल की आलीशान इमारत जिस नींव पर टिकी है उसमें नमी बरकरार रखना जरूरी है, वरना यह ढ़ांचा कभी भी अपना संतुलन खो सकता हे।
सनद रहे यूनेस्को ने सन् 1983 में ताज को विश्व विरासत घेाषित किया था । ऐसी सभी इमारतों के संरक्षण के लिए यूनेस्को समय-समय पर धन और तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाता है । ताज के साथ भी ऐसा हुआ, लेकिन सन् 2000 में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कडे निर्देशों के बावजूद ताजमहल और आगरा के किले के बीच कॉरीडोर बनाने का काम शुरू हुआ था, उससे प्यार के इस नायाब तोहफे को बहुत कुछ नुकसान हुआ । हालांकि काम रूक गया, उत्तर प्रदेश की सरकार पलट गई, लेकिन यमुना में जो बंधान का काम हुआ, उससे नदी का बहाव प्रभावित हुआ है,। जाहिर है कि इसका असर ताज की संरचना पर पड़ रहा है ।  यही नहीं इस अधूरे पड़े कारीडोर को आगरा नगर निगम ने शहरभर का कचरा डंप करने की खंदक बना लिया हैं । यहां यह भी याद रखना होगा कि कचरे के सड़ने से निकलने वाली मीथेन गैस संगमरमर की सेहत के लिए बेहद नुकसानदेय होती हैं ।
ताजमहल को सबसे बड़ा खतरा तो यमुना का बहाव बदलने से हैं । सनद रहे कि ताजमहल को बनाते समय उसकी नींव को नदी के जल स्तर तक खोदा गया था । फिर ककईर्या इंटों(पतली ईंटें)और चूने से कुएं की आकृति की नींव तैयार की गई थी । यहां कोई साढ़े तीन सौ कुएं हैं जिनमें चूना व लकड़ी का बुरादा भरा है। इस इमारत को गढ़ते समय कारीगरों ने इस बात को ध्यान में रखा था कि इसकी नींव सदैव पानी से तर रहे । यमुना के नैसर्गिक बहाव के साथ हुए लगातार खिलावड़ों के कारण आगरा में यह ताज से छिटक गई है । तभी इसकी मीनारों का झुकाव नदी की ओर बढ़ रहा है । मुख्य इमारत में आ रही दरारों का कारण भी मीनारों का झुकाव बढ़ना ही है ।
सन 1965 में प्रसिद्ध इतिहासविद् प्रो. रामनाथ ने ताजमहल का एक सर्वेक्षण किया था । उसमें उन्होंने बताया था कि यदि ताज के सौंदर्य को अक्षुण्ण रखना है तो जरूरी है कि यमुना में पानी का स्तर उतना ही रखा जाए, जितना 17वी शताब्दी में यहां हुआ करता था । दुर्भाग्य है कि प्रो. रामनाथ की सिफारिशों को कहीं सरकारी बस्ते लील गए और बीसवीं सदी आते-आते नदी किनारे का पानी सुखा कर वहां बाजार बसाने की योजनांए बनने लगीं । गौरतलब है कि मीनारों के झुकने का खतरा आजादी से पहले अंग्रेज सरकार ने भांप लिया था । तभी सन् 1942  में मीनारों पर पर्यटकों के जाने पर रोक लगा दी गई थी, जो आज भी जारी है । वैसे जब ताज का मूल डिजाईन बनाया गया था, तब यमुना नदी में साफ और शुद्ध जल निरंतर बारहों महीने बना रहता था । जब तक यमुना में पावन जल रहेगा,तभी तक ताजमहल का अस्तित्व है । विडंबना है कि इस तथ्य को जानते परखते हुए भी आगरा में यमुना नदी को रासायनिक अपशिष्ठ और शहरी गंदगी का नाला बना दिया गया है । शहर के सभी नाले बगैर किसी उपचार के यमुना में गिर रहे हैं । ताज से सटा श्मसान घाट सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यथावत हैं । धोबी घाट भी नहीं हटा हैं । केद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक ताजमहल के आसपास नाईट्रोजन आक्साईड, सल्फरडाई आक्साईड और एसपीएम की मात्रा निर्धारित मात्रा से चार गुणा अधिक हैं ।
सन् 1993 रूड़की विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के तीन विशेषज्ञों के दल ने एक जांच में चेताया था कि ताजमहल स्वयं के वजन के कारण जमीन में 80 मिलीमीटर धंस गया है ।
आगरा से सटे मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस, भरतपुर और अलीगढ़ के कई कारखाने हर रोज सैंकड़ों टन सल्फर डाय आक्साईड गैस छोड़ रहे हैं । इससे ईरानी संगमरमरर के काले होने का खतरा है । एक जनहित याचिका पर सन् 1993 में सुप्रीम कोर्ट नेेेे लगभग साढ़े पांच सौ उद्योगों को ताजमहल की खातिर बंद करवा दिया था । बाद में इनमें से अधिकांश कारखानों ने प्रदूषणरेाधी संयत्र लगवाने की सूचना दी । बाद में अदालत ने फीरोजाबाद क्षेत्र के 65 उद्योगों को छोड़ कर शेष सभी को चलाने की अनुमति दे दी थी । यह चर्चा आम है कि न तो कारखानों से निकलने वाला ध्ुाआं कम हुआ है और नही ताजमहल को होने वाला नुकसान, लेकिन सरकारी कागजों पर तो सब कुछ ठीक बताया जा रहा है । ताजमहल को स्थानीय उद्योगों से होने वाले नुकसान की जांच के लिए केंद्र सरकार की वरदराजन कमेटी व उत्तरप्रदेश शासन की त्रिपाठी समिति की रिपोर्ट देखें तो पता चलेगा कि इलाके के कारखानांे से ताजमहल को कोई नुकसान है ही नहीं ।
सन् 1631 में अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाने वाले मुगल बादशाह शाहजाहां को यह सपने में भी गुमान नहीं होगा कि जिस ताज को वह प्रंेम की अमर कृति के रूप में बना रहा है, उस पर मुल्ला-मौलवी, मंदिर-मस्जिद विवाद का साया मंडराएगा । आजादी से पहले सन् 1942 में सर्वेे आफ इंडिया की एक रिपोर्ट को उजागर किया गया था, जिसमें बताया गया था कि ताज यमुना नदी में 1.4र्4 इंच धंस गया है । सरकार भले ही लाख मना करे, लेकिन धंसने की क्रिया आज भी जारी है । सन 1993 में रूड़की विश्वविद्यालय के इंजीनियरों के एक दल ने ताज का अध्ययन किया था, जिसमें मीनारों के लगातार झुकने की बता कही थी । इसका मुख्य कारण यमुना में पानी की कमी ही है । समिति ने यह भी चेताया था कि ताज को औद्योगिक प्रदूषण से बचाने के लिए तो बड़े-बड़े कदम उठाए जा रहे हें, लेकिन भवन के निर्माण दोष या उसकी पारिस्थितिकी पर कतई गौर नहीं किया जा रहा है ।
आज ताज को बचाने के नाम पर कई कारखानों का विस्थापन हो चुका है ं। शहर में चलने वाले डीजल के टेंपो को हरे रंग से पोत कर शहर को हरा-भरा बताने का मजाक हो रहा है । ताज के करीबी कालोनियों में गैस के सिलेंडर बांटने में हुई बंदर-बांट की तो काई चर्चा भी करता है । ताज को बचाने के फेर में लाखों लोगों की रोजी-रोटी के साधन नहीं बच पाए , लेकिन हालत जस के तस हैं । यह अब आम धारणा बनती जा रही है कि ताज केा खतरा प्रदूषण से कम और बाजारवाद से ज्यादा है । तभी तो धुआं, धूल और धूप से इसके संगमरमर पर पड़ रहे विषम प्रभावों पर तो लगातार बयान, आदेश और कार्यवाहियां हो रही हैं । जाहिर है कि इसकी चपेट में अधिकांश गरीब पुश्तैनी कारीगर व छोटे उद्योग आ रहे  हैं । जबकि इमारत की वास्तु, बनावट और आधार पर जल व जमीन के साथ हो रही छेड़छाड़ के कारण पड़ रहे भयंकर परिणामों पर कोई चर्चा करने को भी तैयार नहीं है । यहां तक कि जब कोई तकनीकी विशेषज्ञ इस पर टिप्पणी करता है, सरकारी बयान उसे झूठा साबित करने में जुट जाते हैं ।
जब ताजमहल इतने प्रदूषण से जूझ रहा है, तब पुरातत्व विभाग इस पर मुल्तानी मिट्टी का लेप कर इसकी चमक वापिसी का दावा कर रहा हैं । हालंाकि पिछले अनुभव सामने हैं कि इस तरह के लेप से कुछ महीनों तक तो ताज चमकता है, लेकिन बाद में इसकी हालत पहले जैसी ही हो जाती हैं । वास्तव में मुल्तानी मिट्टी ‘ फुलर्ज अर्थ’ है, जिसका मूल रसायन एल्यूमिनियम सिलिकेट हेाता हैं । इस रसायन का इस्तेमाल भेड़ों की ऊन साफ करने में एक रंजक या ब्लीच के तौर पर होता है। इस मिट्टी के पेस्ट को ताजमहल की बाहरी दीवारों पर लगाया जाता हैं । दो दिनों में यह पेस्ट अपने आप गिर जाता हैं । इसके बाद संगमरमर की सतह को डिस्टिल वाटर से साफ किया जाता हैं । इससे पहले सन 1994 ,2001 और 2008 में भी ऐसे लेप लगाए गए थे । यहां विचारणीय है कि जो ताज तीन सौ साल से अपनी नैसर्गिक चमक से दमकता रहा है, यदि उसे बार-बार बाहरी रसायनों का आदी बन दिया गया तो कहीं ऐसे लेप की जरूरत हर साल ना पड़े । क्या हम अपनी राष्ट्रीय धरोहरों को इस तरह के प्रयोग कर जोखिम में नहीं डाल रहे हैं ?
हो सकता है कि कुछ दिनों के लिए ताजमहल फिर चमक जाऐ, लेकिन यदि यमुना की गति और प्रदूषण की रफ्तार ऐसी ही रही तो यह गर्व के गुंबद अर्रा कर  दरक भी सकते हैं ।

पंकज चतुर्वेदी

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

Jail reforms needs to be fasten for proper human resource management

जेल बनें इंसानों के रहने लायक

पंकज चतुर्वेदी 
देश के चर्चित मुकदमों में से एक आरूशि-हेमराज हत्या प्रकरण में डाक्टर तलवार दंपत्ति कोई आठ साल जेल में रह कर लौटे। देशभर के छोटे-मझोल अखबारों में हर दिन दो किस्म की खबरें जरूर छपती हैं - अमुक व्यक्ति 10 या इतने ही साल जेल में रहने के बाद अदालत से बाइज्जत बरी। और दूसरी खबर कि  जेल में बंदी की मौत। बिडंबना है कि ऐसी खबरों पर अब पीड़ित के परिवार के अलावा अन्य कोई विचार भी नहीं करता। रिहाई में ‘‘बाइज्ज्त’’ के क्या मायने हैं लेकिन इस काल में उसका जीवन जरूर बदल गया। बाहर आ कर समाज व पुलिस दोनों उसे संदिग्ध नजर से देख रहे हैं, उसे काम पर रखने वाले तैयार नहीं हैं। वही आठ साल जेल में विचाराधीन कैदी के तौर पर हर दिन के तनावों के चलते उसका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ा गया है। कहा नहीं जा सकता है कि इस कुंठा व बेज्जती से कब उबर पाएगा।  अब तो सुप्रीेम कोर्ट ने भी कह दिया कि  जेल में विचाराधीन कैदियों की हालत बहुत बुरी है और  क्षमता से कई सौ गुना ज्यादा भीड़ से भरे जेल इंसान के आत्म सम्मान के मूलभूत अधिकार पर प्रश्न चिन्ह है।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता ने सभी उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीशों को  से कहा है कि जेल में खुदकुशी समेत सभी अस्वाभाविक मौत के मामलों में कैदी के परिवार को उचित मुआवजा देने के लिए स्वतः संज्ञान लें । सुप्रीम कोर्ट ने जेल सुधार के लिए ‘ओपन जेल’ की व्यवस्था पर विचार करने की भी बात कही । अदालत ने कैदियों के सुधार के लिए समाज के प्रबुध्द लोगों को शामिल कर एक बोर्ड बनाने मॉडल जेल मैन्युअल लागू करने के भी निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि ये वांछनीय है कि जेलों में भी संविधान के दिए अनुच्छेद 21 के तहत जीने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाए। वरना ये अनुच्छेद 21 संविधान में एक मृत कागज बना रहेगा। कोर्ट ने कैदियों की परिवार से मुलाकात, फोन व वीडियो कान्फ्रेंकसिग से जल्दी-जल्दी करवाने, विचाराधीन बंदियों को वकील से सतत संपर्क करने, पहली बार अपराध करने वालों की काउंसलिंग  करवाने ताकि वे अपराध से विमुख हों, जैसी कई बातें कहीं। सबसे बड़ी बात कैदियों को चिकित्सा सुविधा को ले कर कही। स्वास्थ्य का अधिकार मानवाधिकार है और राज्य सरकारों को चाहिए कि वह इस ओर ध्यान दें। तमाम कैदियों को उचित मेडिकल सुविधा मुहैया कराई जाए।
हालांकि यह भी कटु सत्य है कि सुप्रीम कोर्ट के लगातार निर्देशों के बावजूद भी निचली अदालतें जमानत योग्य अपराधों में भी लेागों को जेल भेज देती है और पुलिस भी अपने हथकंडे अपना कर जेलों को नरक बना रही है। यहां जानना जरूरी है कि जेल व्यवस्था में सुधार के लिए समुचित व्यवस्था हेतु बीते 35 सालों से सुप्रीम कोर्ट में कई-कई मामले चल रहे हैं व कई में कोर्ट ने निर्देश भी दिए हैं ,लेकिन लचल न्यायिक व्यवस्था के चलते बेगुनाह सालों-साल जेल में रहते हैं व बाहर आते हैं तो उनका तन व मन श्रम करने लायक नहीं रह जाता है।
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ मंडल की जेलों कें ताजे आंकड़े जरा देखें- मेरठ जेल की क्षमता 1707, निरूद्ध बंदी 3357, गाजियाबाद की क्षमता  1704 व बंदी 3631, बुलंदशहर में बंद हैं 2300, जबकि क्षमता है 840। भारत की जेलों में बंद कैदियों के बारे में  सरकार के रिकार्ड में दर्ज आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं।  अनुमान है कि इस समय कोई चार लाख से ज्यादा लोग देशभर की जेलों में निरूद्ध हैं जिनमें से लगभग एक लाख तीस हजार सजायाफ्ता और कोई दो लाख 80 हजार विचाराधीन बंदी हैं। आगरा जिला जेल की क्षमता 1015 है जबकि बंदी 2600 से ज्यादा।पांचों केंद्रीय कारागारों में क्षमता से दुगने बंदी हैं।
यही नहीं उत्तर प्रदेश की जेल कैदियों के लिए कब्रगाह साबित हो रही है।ंराज्य में कुल 62 जिला जेल, पांच केंद्रीय जेल और तीन विशेश कारागार है।। यहां सन 2012 से जुलाई 2017 के बीच 2002 कैदियों की मृत्यु हुई। इनमें कुछ तो ऐसे मासूम हैं जिनका जन्म भी वहीं हुआ और मौत भी। मरने वालों में आधे तो विचाराधीन बंदी थे यानि जिन पर कोई अपराध साबित हुआ ही नहीं। यही नहीं मौत का बड़ा कारण दमा और टीबी रहा है। जो कि क्षेमा से अधिक बंदियों के संक्रमण, कुपोशण के चलते होता है। देश में दलित, आदिवासी व मुसलमानों की कुल आबादी 40 फीसदी के आसपास है, वहीं जेल में उनकी संख्या आधे से अधिक यानि 67 प्रतिशत है। इस तरह के बंदियों की संख्या तमिलनाडु और गुजरात में सबसे ज्यादा है। हमारी दलित आबादी 17 प्रतिशत है जबकि जेल में बंद  लेागों का 22 फीसदी दलितों का है। आदिवासी लगातार सिमटते जा रहे हैं व ताजा जनगणना उनकी जनभागीदारी नौ प्रतिशत बताती है, लेकिन जेल में नारकीय जीवन जी रहे लोगों का 11 फीसदी वनपुत्रों का है। मुस्लिम आबादी तो 14 प्रतिशत है लेकिन जेल में उनकी मौजूदगी 20 प्रतिशत से ज्यादा है। एक और चौंकाने वाला आंकड़ा है कि पूरे देश में प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियों जैसे- धारा 107,116,151 या अन्य कानूनों के तहत बंदी बनाए गए लेागें में से आधे मुसलमान होते है। गौरतलब है कि इस तरह के मामले दर्ज करने के लिए पुलिस को वाह वाही मिलती है कि उसने अपराध होने से पहले ही कार्यवाही कर दी। आंचलिक क्षेत्रों में ऐसे मामले न्यायालय नहीं जाते हैं, इनकी सुनवाई कार्यपालन दंडाधिकारी यानि नायब तहसीलदार से ले कर एसडीएम तक करता है और उनकी जमानत पूरी तरह सुनवाई कर रहे अफसरों की निजी इच्छा पर निर्भर होती है।
बस्तर अंचल की चार जेलों में निरूद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरह मांगी गई जानकारी पर जरा नजर डालें - दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं। कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं , इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें महिलाएं 53 हैं, नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और आठ लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेशी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं इनमें से 134 आदिवासी व छह औरते हैं इसकी कुल बंदी क्षमता 85 है। दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां चार औरतों सहित 57 ‘‘नक्सली’’ बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं। सामने है कि केवल चार जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासियों को बंद किया गया है। यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो पांच हजार से पार पहुंचेगी। नारायणपुर के एक वकील बताते हैं कि कई बार तो आदिवासियों को सालों पता नहीं होता कि उनके घर के मर्द कहां गायब हो गए है। बस्तर के आदिवासियों के पास नगदी होता नहीं है। वे पैरवी करने वाले वकील को गाय या वनोपज देते हैं।  कई मामले तो ऐसे है कि घर वालों ने जिसे मरा मान लिया, वह बगैर आरोप के कई सालों से जेल में था। ठीक यही हाल झारखंड के भी हैं।
 यहां यह भी जानना जरूरी है कि जेल में श्रम कार्य केवल सजायाफ्ता बंदियो के लिए होता है। विचाराधीन बंदी न्यायिक अभिरक्षा में कहलाते हैं। भारतीय जेलों में 65 प्रतिशत से ज्यादा विचारधीन कैछी ही हैं। जेलों में बढ़ती भीड़, अदालतों पर भी बोझ हैं और हमारे देश की असल ताकत‘‘मानव संसाधन’’ का दुरूपयोग भी। एक तो ऐसे कैदियों के कारण सरकार का खर्च बढ़ रहा है दूसरा सुरक्षा एजेंसियों पर भी भार बढ़ता है। जितने अधिक विचाराधीन बंदी हांेगे, उन्हें अदालत ले जाने के लिए उतना ही अधिक सुरक्षा बल चाहिए। तभी देश में हर दिन सैंकड़ो मामलों में बंदी अदालत नहीं नहीं पहुंच पाते हैं और यह भी अदालतों में मामलों के लंबे खींचने की वजह बनता है। क्या यह संभव नहीं है कि जिन मामलों में जांच पूरी हो गई हो या फिर मामले ज्यादा गंभीर ना हों, उनपके बंदियों को किसी रचनात्मक कार्य में उनकी योग्यता के अनुसार लगा दिया जाए। इस तरह शिक्षक, तकनीकी इंस्ट्रक्टर, यातायात संचालन सहयोगी, अस्पताल में सहायक जैसे कई कामों के लिए  कर्मियों की कमी से  निबटा जा सकता है। साथ ही बंदी के मानव संसाधन के सही इस्तेमाल, उसके सम्मनपूर्वक जीवन के अदालती निर्देशों का भी पालन किया जा सकता है। ऐसे बंदियों को घर मंे रहने की छूट कुछ बंदिशों के साथ दी जा सकती है।
हालांकि प्रयास तो यह होना चाहिए कि अपराध कम हों या गैरनियत से किए गए छोटे-मोटे अपराधों के लिए या कम सजा या सामान्य प्रकरणों को अदालत से बाहर निबटाने, पंचायती राज में न्याय को षामिल करने जैसे सुधार कानून में किए जाएं।

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

Understand root-feelings of Diwali

दीवाली की मूल भावना को भी समझो




सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों की जहरीली हवा के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी  क्षेत्र में आतिशबाजी की बिक्री पर रोक लगा दी है। सनद रहे, यह आदेश पिछले साल नवंबर में दिया गया था। हालांकि इस आदेश में एक पैंच है - क्या आतिशबाजी चलाने पर रोक है या फिर केवल खरीद-बिक्री पर । विडंबना यह है कि कुछ लोग इसे दीपावली मनाने की परंपरा पर अदालती दखल या दीपावली-विरोधी या हिंदू-विरोधी आदेश बता रहे है। सनद रहे कि सनातन धर्म का प्रत्येक पर्व-त्योहार एक वैज्ञानिक, तर्कसंगत और समय व काल के अनुरूप होता है। उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई आकाश दीप की परंपरा को कलयुग में दीवाली के रूप में मनाया जाता है।  श्राद्ध पक्ष में भारत में अपने पुरखों को याद करने के बाद जब वे वापस अपने लोकों को लौटते थे तो उनके मार्ग को आलोकित करने के लिए लंबे-लंबे बाँसों पर कंदील जलाने की परंपरा बेहद प्रचीन रही है। फिर द्वापर युग में राजा राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने अपने-अपने घर के दरवाजों पर दीप जला कर उनका स्वागत किया।
हो सकता है कि किसी सैनिक परिवार ने कुछ आग्नेय अस्त्र-शस्त्र चलाए हों, लेकिन दीपावली पर आतिशबाजी चलाने की परंपरा के बहुत पुराना होने के कोई प्रमाण मिलते नहीं हैं। कहा जाता है कि पटाखे चलाने का कार्य देश में मुस्लिमों के आने के बाद षुरू हुआ था। हालांकि अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कह दिया कि दिल्ली एनसीआर में आतिशबाजी खरीदी-बेची नहीं जाएगी। लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि समाज व संस्कृति का संचालन कानून या अदालतों से नहीं बल्कि लोक कल्याण की व्यापक भावना से होता रहा है और यही इसके सतत पालन व अक्षुण्ण रहे का कारक भी है।


दीपावली की असल भावना को ले कर कई मान्यताएं हैं और कई धार्मिक आख्यान भी। यदि सभी का अध्ययन करें तो उनकी मूल भावना भारतीय समाज का पर्व-प्रेम, उल्लास और सहअस्तित्व की अनिवार्यता है। विडंबना है कि आज की दीपावली दिखावे, परपीड़न, परंपराओं की मूल भावनाओं के हनन और भविष्य के लिए खतरा खड़ा करने की संवेदनशील औजार बन गई हे। अभी दीपावली से दस दिन पहले ही देश की राजधानी दिल्ली की आवोहवा इतनी जहरीली हो गई है कि हजारों ऐसे लेाग जो सांस की बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें मजबूरी में शहर छोड़कर जाना पड़ रहा है, हालांकि अभी आतिशबाजी शुरू नहीं हुई है। अभी तो बदलते मौसम में भारी होती हवा, वाहनों के प्रदूषण, धूल व कचरे को जलाने से उत्पन्न धुंए के घातक परिणाम ही सामने आए हैं।  भारत का लोक गर्मियों में खुले में,छत पर सोता था,। किसान की फसल तैयार होती थी तो वह खेत में होता था। दीपावली ठंड के दिनों की शुरूआत होता हे। यानि लोक को अब अपने घर के भीरत सोना शुरू करना होता था। पहले बिजली-रोशनी तो थी नहीं। घरों में सांप-बिच्छू या अन्य कीट-मकोड़े होना आम बात थी। सो दीपावली के  पहले घरें की सफई की जाती थी व घर के कूड़े को दूर ले जा कर जलाया जाता था। उस काल में घर के कूड़े में काष्ठ, कपड़ा या पुरना अनाज ही हेाता था। जबकि आज के घर कागज, प्लास्टिक, धातु व और ना जाने कितने किस्म के जहरीले पदार्थों के कबाड़े से भरे होते हैं। दीवारों पर लगाया गया इनेमल-पैंट भी रसायन ही हेाता है। इसकी गर्द हवा को जबरदस्त तरीके से दूषित करती हे।

सनद रहे कि दीपावली से पहले शहर की हवा विषैली होनो के लिए दिल्ली का उदाहरण तो बानगी है, ठीक यही हालात देश के सभी महानगरों, से ले कर कस्बों तक के हैं।
दुखद है कि हम साल में एक दिन बिजली बंद कर ‘पृथ्वी दिवस’ मानते हैं व उस दौरान धरती में घुलने से बचाए गए कार्बन की मात्रा का कई सौ गुणा महज दीपावली के चंद घंटों में प्रकृति में जोड़ देते हैं। हम जितनी बिजली बेवजह फूंकते हैं, उसके उत्पादन में प्ररूकुर्त इंधन, तथा उसे इस्तेमाल से निकली उर्जा उतना ही कार्बन प्रकृति में उड़ेल देता हे। कार्बन की बढती मात्रा के कारण जलवायु चक्र परिवर्तन,  धरती का तापमान बढना जैसी कई बड़ी दिक्कतें समाने आ रही हैं। काश हम दीपावली पर बिजली के बनिस्पत दीयों को ही प्राथमिकता दे। इससे कई लोगों को रोजगार मिलता है, प्रदूषण कम होता है और पर्व की मूल भावना जीवंत रहती है।

दीपावली में सबसे ज्यादा जानलेवा भूमिका होती है आतिशबाजी या पटाखों की। खासतौर पर चीनी पटाखों में तो बेहद खतरनाक रसायन होते हैं जो सांस लेने की दिक्कत के साथ-साथ फैंफडों के रोग दीर्घकालिक हो सकते हैं।  दीवाली पर आतिशबाजी के कारण होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों का यह खुलासा चौंकाने वाला है कि इससे न केवल सांस की बीमारी बढ़ती है, बल्कि गठिया व हड्डियों के दर्द में भी इजाफा हो जाता है। संस्थान द्वारा इस बार शोध किया जाएगा कि दीपावली पर आतिशबाजी जलाने के कारण हवा में प्रदूषण का जो जहर घुलता है, उसका गठिया व हड्डी के मरीजों पर कितना असर पड़ता है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक हुए शोध में यह पाया गया है कि वातावरण में पार्टिकुलेट मैटर 2.5 का स्तर अधिक होने पर गठिया के मरीजों की हालत ज्यादा खराब हो जाती है। चूंकि दीपावली में आतिशबाजी के कारण प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है, लिहाजा इस बार गठिया के मरीजों पर दीपावली में होने वाले प्रदूषण के असर पर शोध किया जाएगा।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण भी गठिया की बीमारी के लिए जिम्मेदार कारक हैं। इस मामले में पिछले दो वर्षो से शोध चल रहा है। केंद्र सरकार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की मदद से किए जा रहे देश में अपनी तरह के इस अनूठे शोध के तहत गठिया के 400 व 500 सामान्य व्यक्तियों पर अध्ययन किया जा रहा है। यह शोध रिपोर्ट वर्ष 2016 तक आएगी। दिल्ली में दीपावली सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाई जाती है। इस त्योहार पर राजधानी सचमुच किसी दुल्हन की तरह सजाई-संवारी जाती है। लेकिन इस साज-सज्जा का एक स्याह पक्ष यह भी है कि दीपों के त्योहार के इस मौके पर दिल्ली में इतनी ज्यादा आतिशबाजी होती है कि कई बार तो दीवाली के अगले दिन तक पूरे वातावरण में प्रदूषण की धुंध सी छाई रहती है। यह प्रदूषण बीमार लोंागें के लिए तो मुसीबत खड़ा करता ही है, स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना देता है।
आतिशबाजी के धुंए, आग, आवाज के शिकार इंसान तो होते ही हैं, पशु-पक्षी, पेड़, जल स्त्रोत भी इसके कुप्रभाव से कई महीनों तक हताश-परेशान रहते हैं। विडंबना है कि आज पढा लिखा व आर्थिक रूप से संपन्न समाज महज दिखावे के लिए हजारों-हजार करोड़ की आतिशबाजी फूंक रहा हे। इससे पैसे की बर्बादी तो होती ही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है पर्यावरण को। ध्वनि और वायु प्रदूषण दीपावली पर बेतहाशा बढ़ जाता है। जो कई बीमारियों का कारण है।
दीवाली के बाद अस्पतालों में अचानक 20 से 25 प्रतिशत ऐसे मरीजों की संख्या में वृद्धि हो जाती है जिसमें अधिकतर लोग सांस संबंधी व अस्थमा जैसी समस्या से पीड़ित होते हैं। हर साल  विश्व में 2 से चार लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। वातावरण में धूल व धुएं के रूप में अति सूक्ष्म पदार्थ मुक्त तत्वों का हिस्सा होता है, जिसका व्यास 10 माइक्रोमीटर होता है, यही वजह है कि यह नाक के छेद में आसानी से प्रवेश कर जाता है, जो सीधे मानव शरीर के श्वसन प्रणाली, हृदय, फेफड़े को प्रभावित करता है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे बच्चे और अस्थमा के मरीजों पर होता है।  धुंध (स्मॉग) की वजह से शारीरिक परिवर्तन से लेकर सांस फूलना, घबराहट, खांसी, हृदय व फेफड़ा संबंधी दिक्कतें, आंखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि की परेशानी होती है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार दिल्ली में पटाखों के कारण दीपावली के बाद वायु प्रदूषण छह से दस गुना और आवाज का स्तर 15 डेसिबल तक बढ़ जाता है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। तेज आवाज वाले पटाखों का सबसे ज्यादा असर बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा दिल और सांस के मरीजों पर पड़ता है। मनुष्य के लिए 60 डेसिबल की आवाज सामान्य होती है। इससे 10 डेसिबल अधिक आवाज की तीव्रता दोगुनी हो जाती है, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए घातक होती है। दुनिया के कई देशों में रंगारंग आतिशबाजी करने की परंपरा है। आकाश को जगमग करने के लिए बनाए जाने वाले पटाखों में कम से कम 21 तरह के रसायन मिलाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि 20 मिनट की आतिशबाजी पर्यावरण को एक लाख कारों से ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।
जाहिर है कि दीपावली का मौजूदा स्वरूप ना तो शास्त्र सम्मत है और ना ही लोक परंपराओं के अनूरूप और ना ही प्रकृति, इंसान व जीवजगत के लिए कल्याणाकरी, तो  फिर क्यों ना दीपावली पर लक्ष्मी को घर बुलाएं, सरस्वती का स्थाई वास कराएं ओर एकदंत देव की रिद्धी-सिद्धी का आव्हान करें- दीपावली दीयों के साथ, अपनों के साथ, मुसकान के साथ आतिशबाजी रहित ही मनाएं।

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

Soil turning poison due to pesticides

रसायनों से जहरीली होती जमीन

दवा का जहर किसानों के शरीर में समा गया। कई की आंखें खराब हुर्इं तो कई को त्वचा रोग हो गए। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रुपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीट-कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं।


हाल ही में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशक की चपेट में आकर अठारह किसानों और खेत में काम कर रहे मजदूरों की मौत हो गई है। बीते बीस दिनों के दौरान कोई पांच सौ किसान और श्रमिक अस्पताल में भर्ती हुए हैं। असल में, इस इलाके में कपास की खेती होती है। इस बार कपास में गुलाबी कीड़े (पिंक बोलवर्म) आ गए हैं। मजबूरन किसानों ने प्रोफेनोफॉस जैसे जहरीले कीटनाशक का छिड़काव किया। छिड़काव के लिए उन्होंने चीन में बने ऐसे पंप का इस्तेमाल किया, जिसकी कीमत कम थी और गति ज्यादा। किसान नंगे बदन खेत में काम करते रहे, न दस्ताने, न नाक-मुंह ढंकने की व्यवस्था।
तिस पर तेज गति से छिड़काव वाला पंप। दवा का जहर किसानों के शरीर में समा गया। कई की आंखें खराब हुर्इं तो कई को त्वचा रोग हो गए। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रुपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीट-कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं। इस बर्बादी से बचने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा है। जहां 1950 में इसकी खपत 2000 टन थी, आज कोई 90 हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल रही हैं। इसका लगभग एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत छिड़का जा रहा है। 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टेयर खेत में कीटनाशकों का छिड़काव होता था। 1988-89 में यह रकबा बढ़ कर अस्सी लाख हो गया और आज इसके कोई डेढ़ करोड़ हेक्टेयर होने की संभावना है। ये कीटनाशक पानी, मिट्टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। कई कीटों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई है और वे दवाओं को हजम कर रहे हैं। इसका असर खाद्य शृंखला पर पड़ रहा है और उनमें दवाओं और रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर पर आ गई है। दवाओं का महज दस से पंद्रह फीसद ही असरकारक होता है, बाकी जहर मिट्टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है।
कर्नाटक के मलनाड इलाके में 1969-70 के आसपास एक अजीब रोग फैला। लकवे से मिलते-जुलते इस रोग के शिकार गरीब मजदूर थे। शुरू में उनकी पिंडलियों और घुटने के जोड़ों में दर्द हुआ, फिर रोगी खड़े होने लायक भी नहीं रह गया। 1975 में हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रिशन ने चेताया- ‘एंडमिक एमिलियिन आर्थराइटिस आॅफ मलनाड’ नामक इस बीमारी का कारण ऐसे धान के खेतों में पैदा हुई मछली, केकड़े खाना है, जहां कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ हो। इसके बावजूद वहां धान के खेतों में पैराथिया और एल्ड्रिन का बेतहाशा इस्तेमाल जारी है, जबकि बीमारी एक हजार से अधिक गांवों में फैल चुकी है। औसत भारतीय के दैनिक भोजन में लगभग 0.27 मिलीग्राम डीडीटी पाई जाती है।
पंजाब में कपास की फसल पर सफेद मक्खियों के लाइलाज हमले का मुख्य कारण रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना है। इन दिनों अच्छी प्रजाति के ‘रूपाली’ और ‘रश्मि’ किस्म के टमाटरों का सर्वाधिक प्रचलन है। इन प्रजातियों को सर्वाधिक नुकसान हेल्योशिस आर्मिजरा नामक कीड़े से होता है। टमाटर में सूराख करने वाले इस कीड़े के कारण आधी फसल बेकार हो जाती है। इन्हें मारने के लिए बाजार में रोगर हाल्ट, सुपर किलर, रेपलीन और चैलेंजर नामक दवाएं मिलती हैं।इन दवाओं पर दर्ज है कि इनका इस्तेमाल एक फसल पर चार-पांच बार से अधिक न किया जाए। मगर किसान इसका इस्तेमाल पच्चीस से तीस बार कर देता है। शायद टमाटर पर कीड़े तो नहीं लगते हैं, लेकिन उसको खाने वाले इंसान के कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की पुष्टि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी कर चुकी है।
इन दिनों बाजार में मिल रही चमचमाती भिंडी और बैंगन देखने में तो बेहद आकर्षक हैं, लेकिन खाने में उतने ही कातिल! बैंगन को चमकदार बनाने के लिए उसे फोलिडज नामक रसायन में डुबोया जाता है। बैंगन में घोल को चूसने की अधिक क्षमता होती है, जिससे फोलिडज की बड़ी मात्रा बैंगन जज्ब कर लेते हैं। इसी प्रकार भिंडी को छेद करने वाले कीड़ों से बचाने के लिए एक जहरीली दवा का छिड़काव किया जाता है। ऐसे कीटनाशकों से युक्त सब्जियों का लगातार सेवन करने से सांस की नली बंद होने की प्रबल संभावना होती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फार्माकोलॉजी विभाग के एक अध्ययन से पता चला है कि कॉक्रोच को मारने वाली दवाओं का कुप्रभाव सबसे ज्यादा चौदह साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ता है। ग्रीन पीस इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि कीटनाशक बच्चों के दिमाग को घुन की तरह खोखला कर रहे हैं। संस्था ने बच्चों के मानसिक विकास पर कीटनाशकों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए देश के छह अलग-अलग राज्यों के जिलों में शोध किया। ये जिले थे- बठिंडा (पंजाब), भरूच (गुजरात), रायचूर(कर्नाटक), यवतमाल (महाराष्ट्र), थेनी (तमिलनाडु) और वारंगल (आंध्रप्रदेश)। रिपोर्ट के मुताबिक कीटनाशकों के अंधाधुंध, अवैज्ञानिक और असुरक्षित इस्तेमाल के कारण भोजन और जल में रासायनिक जहर की मात्रा बढ़ रही है। इसका सेवन करने वाले बच्चों का मानसिक विकास अपेक्षाकृत धीमा है।
सभी कीट, कीड़े या कीटाणु नुकसानदायक नहीं होते हैं। लेकिन बगैर सोचे-समझे प्रयोग की जा रही दवाओं के कारण पर्यावरण मित्र कीट-कीड़ों की कई प्रजातियां जड़-मूल से नष्ट हो गई हैं। विषैले और जनजीवन के लिए खतरा बने हजारों कीटनाशकों पर विकसित देशों ने अपने यहां तो पाबंदी लगा दी है, लेकिन अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए इन्हें भारत में उड़ेलना जारी रखा है।केंद्र सरकार ने जून 1993 में बारह कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध और तेरह के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियोंं की औपचारिकता निभाई थी। इनमें ‘सल्फास’ के नाम से कुख्यात एल्युमीनियम फास्फाइड भी है।
आज शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा, जब अखबारों में सल्फास खा कर खुदकुशी करने की खबर न छपी हो। डीडीटी और बीएचसी जैसे बहुप्रचलित कीटनाशक भी प्रतिबंधित हैं। ऐसी अन्य दवाएं हैं- डाय ब्रोमो क्लोरो, पेंटा क्लोरो नाइट्रो बेंजीन, पेंटा क्लोरो फेनाल, हेप्टा क्लोरो एल्ड्रिन, पैरा क्वाट डाई मिथाइल सल्फेट, नोइट्रोफेन और टेट्राडाइफेन। लेकिन ये सभी दवाएं अलग-अलग नामों से बिक रही हैं। सरकार ने इन दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध (भले ही कागजों पर) लगाया है, लेकिन उत्पादन पर नहीं। सरकारी महकमों के लिए खरीद के नाम पर इनके कारखानों के लाइसेंस धड़ल्ले से जारी किए जाते हैं, जबकि इनमें बना माल बेरोकटोक पीछे के दरवाजे से बाजार में भेज दिया जाता है।
विडंबना यह है कि देश में हरित क्रांति का झंडा लहराने वालों ने हमारे खेतों और उत्पादों को विषैले रसायनों का गुलाम बना दिया है। लगता है कि पैदावार बढ़ गई है, लेकिन जल्दी ही इसके कारण जमीन के बंजर होने और जनस्वास्थ्य की हानि का पता चल जाता है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है, साथ ही मानव संसाधन का नुकसान और स्वास्थ्य पर खर्चों में बढ़ोतरी हो रही है। हमारा देश कई युगों से खेती करता आ रहा है। हमारे पास कम लागत में अच्छी फसल उगाने का पारंपरिक ज्ञान है। लेकिन यह ज्ञान जरूरत तो पूरी कर सकता है, लिप्सा को नहीं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार गुणवत्ता, उपभोक्ता और प्रशोधन जैसे नारों पर खेती चाहता है, जबकि हमारी परंपरा धरती को माता और खेती की पूजा करने की रही है। हमारे पारंपरिक बीज, गोबर की खाद, नीम, गौमूत्र जैसे प्राकृतिक तत्त्वों के कीटनााशक शायद पहले से कम फसल दें, लेकिन यह तय है कि इनसे जहर नहीं उपजेगा।
इन दिनों देश में कई जगहों पर बगैर रासायनिक दवा और खाद के फसल उगाने का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन यह फैशन से ज्यादा नहीं है और ऐसे उत्पादों के दाम इतने ज्यादा हैं कि आम आदमी इसे खरीदने से बेहतर जहरीले उत्पाद खरीदना श्रेयस्कर समझता है।


रविवार, 8 अक्तूबर 2017

India is running towards another drought

बरसात के तुरंत बाद ही आ धमका सूखे का अंदेशा



देश के बड़े राज्यों में से एक मध्य प्रदेश के कुल 51 में से 29 जिलों में अभी से जल-संकट के हालात हैं। राजधानी भोपाल की प्यास बुझाने वाले बड़े तालाब व कोलार में बमुश्किल चार महीने का जल शेष है। ग्वालियर के तिघरा डैम का जल जनवरी तक ही चल पाएगा। विदिशा में नल सूख चुके हैं। फिलहाल नौ जिलों को सूखा-ग्रस्त घोषित करने की तैयारी है, क्योंकि अल्प वर्षा और उसके बाद असामयिक बरसात ने किसानों की कंगाली में आटा गीला कर दिया है- या तो बुवाई ही नहीं हुई और हुई, तो बेमौसम बारिश से बीज मर गए। भले ही देश के कुछ हिस्सों में अभी पश्चिमी विक्षोभ के चलते बारिश हो रही हो, लेकिन यह खेती के काम की है नहीं। नवरात्रि के साथ ही बादल व बारिश भी विदा हो जाते हैैं। बिहार व पूर्वोत्तर राज्यों में बीते एक दशक की सबसे भयावह बाढ़ को अलग रख दें, तो भारतीय मौसम विभाग का यह दावा देश के लिए चेतावनी देने वाला है कि पिछले साल की तुलना में इस साल देश के 59 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है। ऐसे में, खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अगली बरसात में कम से कम नौ महीने का इंतजार है। भारत का बड़ा हिस्सा अभी से सूखे, पानी की कमी और पलायन से जूझने लगा है। उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, समूचा पूर्वोत्तर, केरल से लेकर अंडमान तक देश के बड़े हिस्से में आठ से लेकर 36 प्रतिशत तक कम बरसात हुई है। बुंदेलखंड में तो सैकड़ों गांव वीरान होने शुरू भी हो गए हैं। सच है कि हमारे सामने लगभग हर तीसरे साल यह सवाल खड़ा हो जाता है कि ‘औसत से कम’ पानी बरसा या बरसेगा, अब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती है। यह भी सच है कि कम बारिश में भी उगने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, तो ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य कैश क्रॉप ने अपना स्थान बढ़ाया है। इसने पानी पर निर्भरता बढ़ाई है और किसानों को रोने का कारण दिया है। 
पानी को लेकर हम अपनी आदतें भी खराब करते गए हैं। जब कुएं से रस्सी डालकर या चापाकल से पानी भरना होता था, तो जरूरत के अनुसार ही पानी निकालते थे। टोंटी वाले नलों और बिजली या ट्यूब वेल ने हमारी आदतें बिगाड़ीं, जो पानी बर्बाद करने का कारण बनीं। सूखा जमीन के सख्त होने, बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट का जरिया बनता है। जानना जरूरी है कि भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है, जो अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम बारिश के कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं, शेष बेकार जाता है। गुजरात के जूनागढ़, भावनगर, अमरेली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद सीखा। विछियावाड़ा गांव के लोगों ने डेढ़ लाख व कुछ दिन की मेहनत के साथ 12 रोक बांध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नल कूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्य प्रदेश में झाबुआ और देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें, तो कर्नाटक से लेकर असम तक और बिहार से लेकर बस्तर तक ऐसे हजारों हजार सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लोगों ने सुखाड़ को मात दी है। ऐसे छोटे-छोटे प्रयास पूरे देश में करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस हर साल, हर महीने इस बात के लिए तैयार होना होगा कि पानी की कमी है। दूसरा, ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्षा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने की बजाय इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जिलाना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना बनाना ऐसे प्रयास हैं, जो सूखे पर भारी पडे़ंगे।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

collapsing Mathura , A men made tragedy

सावधान ! ढह रहा है मथुरा ?

                                                               पंकज चतुर्वेदी


देश के प्राचीन नगरों में से एक मथुरा की पुरानी बस्ती बीते कई सालों से एक अजीब समस्या से जूढ रही है- यहां अचानक ही मकान फट जाते हैं। मकानों की दरारें इतनी गहरी हैं कि उनको भरने का कोई भी प्रयास सफल नहीं होता। राश्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने उत्तर प्रदेश के 26 जिलों को भूकंप के प्रति संवेदनशील जोन-4 में रखा है। जोन 4 का अर्थ है कि पांच क्षमता के भूकंप आने की प्रबल संभावना व उससे कमजोर संरचनाओं की पूरी तरह तबाही। इसमें से एक मथुरा भी है, जो बीते दो दशकों से पल-पल दरक रहा है। लोग चिंता में हैं और प्रशासन किसी बड़े हादसे के इंतजार में है। द्वारिकाधीश मंदिर के पीेछे की सघन बस्ती चौबिया पाड़ा, मथुरा की पहचान है। पहाड़ी  के ढलान पर स्थित इस बसावट में गजापायसा लगभग चोटी पर है। अभी एक दशक पहले तक यहां बने मकान एक दूसरे से सटे हुए थे, आज इनके बीच तीन से छह फुट की दूरी है। कोई भी घर ऐसा नहीं है जिसकी दीवारें चटक नहीं गई हों। जब कहीं से गड़गड़ाहट की आवाज आती है तो लोग जान जाते हैं कि किसी का आशियाना उजड़ गया है। किसी का संकल्प है तो किसी की आस्था व बहुत से लोगों की मजबूरी, वे जानते हैं कि यह मकान किसी भी दिन अर्रा कर जमींदोज हो सकता है, लेकिन वे अपने पुश्तैनी घरों को छोड़ने को राजी नहीं हैं। आए रोज मकान ढह रहे हैं व सरकारी कागजी घोड़े अपनी रफ्तार से बेदिशा दौड़ रहे हैं।

कृश्ण की नगरी के नाम से विश्व प्रसिद्ध मथुरा असल में यमुना के साथ बह कर आई रेत-मिट्टी के टीलों पर बसी हुई हैं। जन्मभूमि से लेकर होली गेट तक की मथुरा की आबादी लगभग नदी के तट पर ही हैं।  नगर के बसने का इतिहास सात सौ साल पहले का है, लेकिन अभी दो षतक पहले तक यहां टीलों पर केवल अस्थाई झुग्गियां हुआ करती थीं। वैसे तो मथुरा ब्रज में कंकाली टीला, भूतेश्वर टीला, सोंख टीला, सतोहा टीला, गनेशरा टीला कीकी नगला, गौसना, मदनमोहन मंदिर टीला जैसे कई बस्तियां हैं। लेकिन सबसे घनी बस्ती वाले हैं - चौबों का टीला, उसके बगल में गोसाईयों की बस्ती व पीछे का कसाई पाड़ा। जब चौबों के यहां जजमान आने लगे, परिवहन के साधन बढ़े तो असकुंडा घाट के सामने द्वारिकाधीश मंदिर के पीछे चौबों ने टिकाने बना लिए। देखते ही देखते पूरी पहाड़ी पर बहुमंजिला भवन बन गए। फिर उनमें षौचालय, सीवर, बिजली, एसी लगे।
कोई दो दशक पहले इप बस्तियों में मकान में दरार आना षुरू हुईं, पहले तो इसे निर्माण के दौरान कोई कमी मान लिया गया, लेकिन जब मकानों के बीच की दूरियां बढ़ीं और उसके बाद मकान का ढह कर बिखर जाने का सिलसिला षुरू हुआ तो लोगों की चिंताएं बढ़ने लगीं। अभी तक चौबच्चा, काला महल, सतघड़ा, ताजपुरा, महौली की पौर, घाटी बहालराय, सरवरपुरा, काजी पाड़ा, रतन कुंड, नीम वाली गली सहित 35 मुहल्लों में हजार से ज्यादा मकान ताश के पत्तों की तरह बिखर चुके हैं। नगर पालिका ने जब इसी प्रारंभिक जाच की तो पता चला कि लगभग 90 साल पहले पड़ी पानी सप्लाई की भूमिगत लाईन जगह-जगह से लीक कर रही थी व उससे जमीन दलदल बन कर कमजोर हुई। लगातार लीकेज ठीक करने का काम भी हुआ, लेकिन मर्ज काबू में नहीं आया। आठ साल पहले आईआईटी रूड़की का एक दल भी यहां जांच के लिए आया। उन्होंने जमीन के ढहने के कई कारण बताए- जमीन की सहने की क्षमता से अधिक वजन के पक्के निर्माण, अंधाधुंध बोरिंग करने से भूगर्भ जल की रीता होना व उससे निर्वात का निर्माण तथा, जल निकासी की माकूल व्यवस्था ना होना।  शहर का ये प्राचीन हिस्सा यमुना के किनारे टीलों पर बसा है। जानकारों का कहना है कि ये टीले अब धंस रहे हैं, जिससे ये समस्या पैदा हो रही है। यहां पानी के लिए बेहिसाब हो रहीं बोरिंग भी हैं। इन बोरिंग से भू-गर्भ जल की कमजोर होती स्थिति भी इन टीलों के धंसने का कारण बन रही है और मकान फट रहे हैं।

यह भी सामने आया है कि सीवर व पानी की लाईन में अवैध कनेक्शन लीकेज का सबसे बड़ा कारण हैं। मामला विधान सभा में भी उठा, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को ना तो समस्या की सटीक जानकारी रही और ना ही उसके समाधान का सलीका। अब हर दिन समस्या पर विमर्श तो होता है, लेकिन समाधान के प्रयास नहीं।
जवाहरलाल नेहरू षहरी परियोजना के तहत यहां सीवर व ड्रेनेज के अलावा पेयजल लाईनें नए सिरे से बिछाने का बजट भी कें्रद को भेजा गया, लेकिन स्वीकृत नहीं हुआ। चौबच्चा, काला महल, गजापाइस, गोलपाड़ा, नगला पाइसा, नीम वाली गली, मानिक चौक, काजी पाड़ा, रतनकुंड, छौंकापाड़ा, सरवरपुरा, सतघड़ा, ताजपुरा, महोली की पोर, तुलसी चबूतरा, घाटी बहालराय आदि कुछ ऐसे मुहल्ले हें जहां हर घर दहशत के साये में है।

असल में इस समस्या को बुलाया तो बाशिंदों ने ही है। रेत व पीली मिट्टी के टीलों पर मनमाने ढंग से मकान तान दिए गए। फिर सन साठ के बाद मकानों में ही षौचालय बने व उसकी माकूल तकनीकी निकासी का जरिया बना नहीं। जब बढ़ी आबादी के लिए पानी की मांग हुई तो जमीन का सीना चीर कर नलकूप रोपे गए। दो से पांच फुट चौड़ी गलियो ंमें जम कर एयरकंडीशनर लगे। यही नहीं बस्ती से सट कर बह रही यमुना को होली गेट के करीब बैराज बना कर बांधा गया। इनका मिला-जुला परिणाम है कि जमीन भीतर से खोखली, दलदली व कमजोर हो गई। एसी व अन्य कारकों से तापमान बढ़ने ने इस समस्या को और विकराल बनाया। सरकार में बैठे लोग समस्या को समझते हैं लेकिन ऐसा कोई फैसला लेने से बचते हैं जिसमें  जनता को कोई नसीहत हो। परिणाम सामने हैं आए दिन मकान ढहते हैं, बयानबाजी होती है और हालात जस के तस रह जाते हैं।

एक आशंका यह भी है कि पूरा मथुरा शहर बीस किमी दायरे वाली सुरंग के उपर है और अब सुरग ढह रही है।यह सुरग मधुवन से श्रीकृष्ण जन्मभूमि के नीचे होकर कंस किला व कंस टीला तक फैली है। किवदंति है कि लवणासुर ने मधुवन में सुरंग बनाई थी। जो मंशा टीला, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, कंस टीले के नीचे होते कंस किले के समीप यमुना तक बनी है। उन्होंने बताया कि चार दशक पहले लोग लवाणसुर की बनाई सुरंग में काफी अंदर तक घुस जाते थे। इसमें एक कुआं भी था। कच्ची सुरंग जगह-जगह से ढह गई, तो इसको बंद कर दिया है। अब सिर्फ इसके अवशेष ही रह हैं। कुछ साल पहले दिल्ली-आगरा रेलवे ट्रैक के काम के दौरान लक्ष्मीनगर के समीप गुफा के सबूत मिले थे। रेलवे ने मिट्टी भरवाकर सुरंग को बंद करा दिया।
हालांकि अभी तक किसी भी भूकंप के दौरान मथुरा में कभी कोई नुकसान नहीं हुआ है लेकिन अब पुरानी बस्ती में मकानों के बच बढ़ती दरारें किसी अनहोनी की आशंका से डरा रही हैं। यदि मथुरा की पुरानी बस्ती को बचाना है तो सबसे पहले वहां हर तरीके के नए निर्माण पर रोक लगनी चाहिए। फिर बैराज के बनने से  बढ़े दलदल व जमीन के कमजोर होने का अध्ययन होना चाहिए। भूजल पर पाबंदी तो है लेकिन उस पर अमल नहीं। यह जान लें कि पहाड़ पर बनी बस्तिययों में नीचे की ओर जल निकासी निर्बाध होना चाहिए व कहीं भी लीकेज बेहद खतरनाक हो सकता हे। यदि इन ंिबदुओं के साथ पुराने मथुरा के पुनर्वासन पर काम किया जाए तो मकानों के ढहने की समस्या का निराकरण करना कठिन नहीं है।

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

Safai Karmchari Aayog needs more power

स्वच्छता के मोर्चे पर अनदेखी उचित नहीं

सफाई कर्मचारियों की उपेक्षा कर स्वच्छ भारत मिशन पूरा नहीं हो सकता, लिहाजा उनकी मांगों पर विचार करना ही होगा


राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष आहत हैं कि उनकी संस्था को न तो संवैधानिक दर्जा हासिल है और न ही वित्तीय अधिकार। न तो हर राज्य में आयोग की शाखा है और न ही कोई निर्णय लेने का हक। मैला ढोने की प्रथा आज भी जारी है। संवेदनहीनता और नृशंस अत्याचार की यह मौन मिसाल सरकारी कागजों में दंडनीय अपराध है। जबकि सरकार के ही महकमे इस घृणित कृत्य को बाकायदा जायज रूप देते हैं। नृशंसता यहां से भी कही आगे तक है, समाज के सर्वाधिक उपेक्षित तबके के उत्थान के लिए बनाए गए महकमे खुद ही सरकारी उपेक्षा से आहत रहे हैं। संसद में पारित सफाई कर्मचारी निषेध अधिनियम-2012 के तहत सीवर और सैप्टिक टैंक को हाथों से साफ कराने को भी अपराध घोषित किया गया है, लेकिन मानव-मुक्ति के लिए बने ढेर सारे आयोग, कमेटियों को देखें तो पाएंगे कि सरकार इस मलिन कार्य से इंसान को मुक्त नहीं कराना चाहती है।1रेलवे अब भी ट्रेनों में शौचालय सफाई में मानवीय सेवाएं ले रहा है। रेलवे के पास एक लाख से ज्यादा यात्री बोगिया हैं, जिनमें औसतन चार लाख शौचालय हैं। इनमें से अधिकांश की सफाई इंसानों के हाथ से हो रही है। देशभर में इस अमानवीय व्यवस्था को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई वित्त पोषित योजनाएं चलाती रही हैं, लेकिन यह सामाजिक नासूर यथावत बना हुआ है। इसके निदान के लिए अब तक कम से कम 10 अरब रुपये खर्च हो चुके हैं। इसमें वह धन शामिल नहीं है, जो इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए पले ‘सफेद हाथियों’ के मासिक वेतन व सुख-सुविधाओं पर खर्च होता रहा है। मगर हाथ में झाडू-पंजा व सिर पर टोकरी बरकरार है। उत्तर प्रदेश में पैंतालिस लाख मकान हैं। इनमें से एक तिहाई में या तो शौचालय है ही नहीं या फिर सीवर व्यवस्था नहीं है। तभी यहां ढाई लाख लोग मैला ढोने के अमानवीय कृत्य में लगे हैं। इनमें से अधिकांश राजधानी लखनऊ या शाहजहांपुर में हैं। वह भी तब जबकि केंद्र सरकार इस मद में राज्य सरकार को 175 करोड़ रुपये दे चुकी है। यह किसी स्वयंसेवी संस्था की सनसनीखेज रिपोर्ट या सियासती शोशेबाजी नहीं, बल्कि एक सरकारी सर्वेक्षण के ही नतीजे हैं। यदि सड़क या पार्क या स्मारक बनाने के नाम पर बसी बस्तियों या लहलहाते खेतों को उजाड़ने में सरकार एक पल नहीं सोचती है तो आजादी के 63 साल बाद भी यदि कहीं पर इंसान द्वारा साफ करने वाले शौचालय हैं तो यह सरकारी लापरवाही और संवेदनहीनता ही है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग जैसे अन्य सांविधिक आयोगों के कार्यकाल की तो कोई सीमा निर्धारित की नहीं गई, लेकिन सफाई कर्मचारी आयोग को अपना काम समेटने के लिए महज ढाई साल की अवधि तय कर दी गई थी। इस प्रकार मांगीलाल आर्य की अध्यक्षता वाला पहला आयोग 31 मार्च, 1997 को खत्म हो गया और फिर देवगौड़ा सरकार ने ‘सियासती-लालीपॉप’ के रूप में कतिपय लोगों को पदस्थ कर दूसरा आयोग बना दिया। तब से लगातार सरकार बदलने के साथ आयोग में बदलाव होते रहे हैं, लेकिन नहीं बदली तो सफाईकर्मियों की तकदीर और अयोग के काम करने का तरीका। आयोग के प्रति सरकारी भेदभाव महज समय-सीमा निर्धारण तक ही नहीं है, बल्कि अधिकार, सुविधाओं व संसाधन के मामले में भी इसे दोयम दर्जा दिया गया। समाज कल्याण मंत्रलय के प्रशासनिक नियंत्रण में गठित अन्य तीनों आयोगों को अपने कामकाज के लिए सिविल कोर्ट के अधिकार दिए गए हैं जबकि सफाई कर्मी आयोग के पास सामान्य प्रशासनिक अधिकार भी नहीं है। इसके सदस्य राज्य सरकारों से सूचनाएं प्राप्त करने का अनुरोध मात्र कर सकते हैं। तभी राज्य सरकारें सफाई कर्मचारी आयोग के पत्रों का जबाव तक नहीं देतीं। चूंकि सफाई कर्मचारी आयोग सीमित समय वाला अस्थाई संगठन है, सो इसके हाथ वित्तीय मामलों में भी बंधे हुए हैं। आयोग के गठन का मुख्य उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षण आयोजित करना था, ताकि गंदगी के संपर्क में आए बगैर सफाई को अंजाम दिया जा सके। मैला ढोने से छुटकारा दिलाना, सफाई कर्मचारियों को अन्य रोजगार मुहैया कराना भी इसका मकसद था। आयोग जब शुरू हुआ तो एक अरब 11 करोड़ की बहुआयामी योजनाएं बनाई गई थीं। इसमें 300 करोड़ पुनर्वास और 125 करोड़ कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करने का प्रावधान था। मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। आयोग व समितियों के जरिए भंगी मुक्ति के सरकारी स्वांग आजादी के बाद से जारी रहे हैं। संयुक्त प्रांत(अब उत्तर प्रदेश) ने मानव मुक्ति बाबत एक समिति का गठन किया था। आजादी के चार दिन बाद 19 अगस्त 1947 को सरकार ने इसकी सिफारिशों पर अमल के निर्देश दिए थे। पर वह एक रद्दी का टुकड़ा ही साबित हुआ। 1963 में मलकानी समिति ने निष्कर्ष दिया था कि जो सफाई कामगार अन्य कोई रोजगार अपनाना चाहें, उन्हें लंबरदार, चौकीदार, चपरासी जैसे पदों पर नियुक्ति कर दिया जाए। परंतु 46 साल बाद भी सफाई कर्मचारी के ग्रेजुएट संतानों को सबसे पहले ‘झाडू-पंजे’ की नौकरी के लिए बुलाया जाता है। 1नगर पालिका हो या फौज, सफाई कर्मचारियों के पद कुछ विशेष जातियों के लिए ही आरक्षित हैं। 1964 और 1967 में भी दो राष्ट्रीय आयोग गठित हुए थे। उनकी सिफारिशों या क्रियाकलाप की फाइलें तक उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि उन दोनों आयोगों की सोच दिल्ली से बाहर विस्तार नहीं पा सकी थीं। 1968 में बीएस बंटी की अध्यक्षता में गठित न्यूनतम मजदूरी समिति की सिफारिशें भी लागू नहीं हो पाई हैं। सैंकड़ों ऐसे स्थानीय निकाय हैं, जहां के सफाई कर्मचारियों को वाजिब वेतन नहीं मिलता है। महीनों वेतन न मिल पाने की शिकायतों की तो कहीं सुनवाई नहीं है। आजाद भारत में सफाई कर्मचारियों के लिए गठित आयोग, समितियों, इस सबके थोथे प्रचार व तथाकथित क्रियान्वयन में लगे अमले के वेतन, कल्याण योजनाओं के नाम पर खर्च व्यय का यदि जोड़ करें तो यह राशि अरबों-खरबों में होगी। काश, इस धन को सीधे ही सफाई कर्मचारियों में बांट दिया जाता तो हर एक परिवार करोड़पति होता।1(लेखक जलसंरक्षण अभियान से जुड़े हैं)

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

rivers can not be saved in such way

ऐसे तो न बच पाएंगी नदियां

सब को पता है कि बुंदेलखंड एक बार फिर भयंकर जल-संकट की ओर बढ़ रहा है, इसके बावजूद गत एक महीने से वहां के रहे-बचे जल-संसाधनों को जहरीला बनाने में समाज ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पहले गणपति, फिर दुर्गा विसर्जन और ताजिये। हालांकि बुंदेलखंड में गणपित या दुर्गा पूजा स्थापना की कोई परंपरा नहीं रही है, लेकिन बाजारवाद और प्रचार माध्यमों के बल पर अकेले छतरपुर जिले में 300 से अधिक स्थान पर दुर्गा प्रतिमा बैठाई गई, यह संख्या अभी आठवें दशक तक पांच भी नहीं हुआ करती थी। अजीब विडम्बना है कि जो नेता अभी एक सप्ताह पहले इलाके को सूखाग्रस्त घेषित करने की मांग पर प्रदर्शन कर रहे थे, वे ही भगवा फटका बांधे सूख रहे तालाब-नदियों में देवी प्रतिमा का विसर्जन कर रहे थे। यह भी समझना जरूरी है कि एनजीटी से ले कर अदालतें तक ताकीद करती रही हैं कि जल-निधियों में प्रतिमा-विसर्जन गैरकानूनी है, प्रधानमंत्री अपने ‘‘मन की बात’ में प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं के बहिष्कार की अपील कर चुके हैं; लेकिन भीड़-तंत्र के सामने किसे परवाह होती है कानून की। 

बुंदेलखंड तो बहुत दूर है। देश की राजधानी दिल्ली के बीच से बहने वाली यमुना का देवी प्रतिमाओं ने दम निकाल दिया है। यहां बस अड्डे के करीब कुदेशिया और गीता घाट का नजारा भयावह है। दूर-दूर तक नदी में तेल की परत, रंग, कपड़ों, लकड़ी का ढेर है। मूर्तियां बनाने में लगा प्लास्टर ऑफ पेरिस की कीचड़ कई किलोमीटर तक नदी को मृत बना रही है। पूजा में इस्तेमाल फूल और फलों के सड़ने से बदबू दूर तक लोगों की सांस फूला रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्ष के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़ रहा है। कोलकाता के हुगली तट पर हालात लगभग ऐसे ही ही हैं। उत्तर बंगाल में महानंदा व उसकी सहायक नदियों में हर साल तीन लाख प्रतिमाएं नदी के जल को पूरे साल के लिए जहरीला कर देती हैं। हाल ही में हुई बरसात से जैसे ही नदी में नया जल आता है गणोश चतुर्थी, विश्वकर्मा पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा और भंडारी पूजा के नाम पर मूर्तियों व पूजा सामग्री से नदी को हांफने पर मजबूर कर दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी के शहर गोरखपुर में प्रशासन ने अदालती आदेश के चलते प्रतिमा विसर्जन के लिए कृत्रिम कुंड बनवाए थे, लेकिन जबरई से धर्मभीरुओं ने 6500 से ज्यादा प्रतिमाएं राप्ती नदी में ही विसर्जित कीं। जमशेदपुर में सुवर्णरेखा, खरकई नदी व अन्य घाटों पर आस्था के अवशेष बिखरे पड़े हैं। पूजन सामग्री, भगवान पर चढ़े कपड़े, चुनरी, कला घट, दीया, फोटो, छोटी-बड़ी सैकड़ों मूर्तियों के लिए बनाए गए (बांस-लकड़ी के स्ट्रक्चर) आदि प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। सबसे अधिक गंदगी सुवर्णरेखा नदी घाट किनारे दिख रही है। अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान 10 लाख से ज्यादा प्रतिमाएं बनती हैं और इनमें से 90 फीसद प्लास्टर ऑफ पेरिस की होती है। इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिल जाती है। पीओपी ऐसा पदार्थ है, जो कभी समाप्त नहीं होता है। इससे वातावरण में प्रदूषण बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है, जो कि जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट डिहाइड्रेट) से बनता है। चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती हैं, उन्हें विषैले एवं पानी में न घुलने वाले नन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है, जो जल-जन्य जीवों के लिए कहर बनता है। देश के हर कस्बे-टोले के जल संसाधनों के यह दुखद हालात तब हैं, जब देश में मिस्ड-कॉल मार कर नदियों की सफाई के संकल्प के बड़े-बड़े विज्ञापन छप रहे हैं। स्वच्छता अभियान के नाम पर खूब नारे लगे, लेकिन जब आस्था के सवाल आए तो प्रकृति, पर्यावरण, कानून के सवाल गौण हो गए। पर्व-त्योहारों को अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी समाज की है। इस अनुशासन के बल पर ही प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

We Indians are never nonviolent

 हम  मूलरूप से हिंसक ही हैं !
पंकज चतुर्वेदी

अल्सुबह लोग राजघट पहुँच  जाएंगे, वहां रामधुन बज रही होगी, फूल चढेंगे, कुछ जलसे, नारे, रैली......इस तरह कुछ और रस्म अदायगी होगी और याद किया जाएगा कि आज वह इंसान पैदा हुआ था  जो हिंसा का शिका र हो कर गोलोकवासी हो गया था और जिसके बारे में कहा जाता है कि उनकी अहिंसा की नीति के बल पर देश  को आजादी मिली। भारत की आजादी की लड़ाई या समाज के बारे में देश -दुनिया की कोई भी किताब या नीति पढ़े ंतो पाएंगे कि हमारा मुल्क अहिंसा के सिद्धांत चलता है। एक वर्ग जो अपने पर ‘‘पिलपिले लोकतंत्र’ का आरोप लगवा कर गर्व महसूस करता है, खुद को गांधीवादी बताता है तो दूसरा वर्ग जो गांधी को देष के लिए अप्रासंगिक और बेकार मानता है वह भी ‘देष की गांधीवादी’(?) नीतियों को आतंकवाद जैसी कई समस्याओं का कारक मानता है। असल में इस मुगालते का कभी आकलन किया ही नहीं गया कि क्या हम गांधीवादी या अहिंसक हैं?
आए रोज की छोटी-बड़ी घटनाएं गवाह हैं कि हम भी उतने ही हिंसक और अषांति प्रिय हैं जिसके लिए हम पाकिस्तान या अफगानिस्तान या अमेरिका को कोसते हैं। भरोसा ना हो तो अभी आज का अखबार देख लें, छोटे-छोटे विवादों में रिश्तों  की हत्या, बदला लेने के लिए साजिशें , किसी की मौत पर जश्न , युद्धोन्मादी बयानात जैसी घटनाएं सुर्खियों में रंगी। आम इंसान का मूल स्वभाव इसे उभरता है। जाहिर है कि बदला पूरा होने की बात करना हमारे मूल हिंसक स्वभाव का ही प्रतीक है।
यह सवाल क्यों खड़ा कर रहा हूं ? इंसानियत या इंसान को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं , बल्कि इस लिए कि यदि एक बार हम मान लेगें कि हमारे साथ कोई समस्या है तो उसके निदान की अनिवार्यता या विकल्प पर भी विचार करेंगे। जब सिद्धांततः मानते हैं कि हम तो अहिंसक या शान्ति प्रिय समाज हैं तो  यह स्वीकार नहीं कर रहे होते हैं कि हारे समाज के सामने कोई गूढ समस्या है जिसका निदान महति है। अफजल  गुरू या कसाब की फांसी पर आतिशबाजी चलाना, या मिठाई बांटना उतना ही निंदनीय है जितना उनको मुकर्रर अदालती सजा के अमल का विरोध । जब समाज का कोई वर्ग अपराधी की फांसी पर ख़ुशी  मनाता है तो एकबारगी लगता है कि वह उन निर्दोष  लोगों की मौत और उनके पीछे छूट गए परिवार के स्थाई दर्द की अनदेखी कर रहा है। ऐसा इसी लिए होता है क्योंकि समाज का एक वर्ग मूलरूप् से हिंसा-प्रिय है। देष में आए रोज ऐसे प्रदर्षन, धरने, षादी-ब्याह, धार्मिक जुलूस देखे जा सकते हैं जो उन आत्ममुग्ध लोगों के षक्ति प्रदर्षन का माध्यम होते हैं और उनके सार्वजनिक स्थान पर बलात अतिक्रमण के कारण हजारों बीमार, मजबूर, किसी काम के लिए समय के के साथ दौड़ रहे लोगों के लिए षारीरिक-मानसिक पीड़ादायी होते हैं। ऐसे नेता, संत, मौलवी बेपरवाह होते हैं उन हजारों लेगों की परेषानियों के प्रति। असल में हमारा समाज अपने अन्य लोगों के प्रति संवेदनषील ही नहीं है क्योंकि मूलरूप से हिंसक-कीड़ा हमारे भीतर कुलबुलाता है। ऐसी ही हिंसा, असंवेदनषीलताऔर दूसरों के प्रति बेपरवाही के भाव का विस्तार पुलिस, प्रषासन और अन्य सरकारी एजेंसियो में होता है। हमारे सुरक्षा बल केवल डंडे  - हथियार की ताकत दिखा कर ही किसी समस्या का हल तलाषते हैं।
हकीकत तो यह है कि गांधीजी षुरूआत से ही जानते थे कि हिंसा व बदला इंसान का मूल स्वभाव है व वह उसे बदला नहीं जा सकता। सन 1909 में ही , जब गांधीजी महात्मा गांधी नहीं बने थे, एक वकील ही थे, इंग्लैंड से अफ्रीका के अपनी समुद्री यात्रा के दौरान एक काल्पनिक पाठक से बातचीत में माध्यम से ‘हिंद स्वराज’’ में लिखते हैं (द कलेक्टेड वर्कस आफ गांधी, प्रकाषन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, खंड 10 पेज 27, 28 और 32) - ‘‘ मैंने कभी नही कहा कि हिंदू और मुसलमान लड़ेंगे ही नही। साथ-साथ रहने वाले दो भाईयों के बीच अक्सर लड़ाई हो जाती है। कभी-कभी हम अपने सिर भी तुड़वाएंगे ही। ऐसा जरूर होना नहीं चाहिए, लेकिन सभी लेग निश्पक्ष नहीं होते .....।.’’ देष के ‘अहिंसा-आयकान’ गांधीजी अपने अंतिम दिनों के पहले ही यह जान गए थे कि उनके द्वारा दिया गया अहिंसा का पाठ महज एक कमजोर की मजबूरी था। तभी जैसे ही आजादी और बंटवारे की बात हुई समग्र भारत में दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा कत्लेआम हो गया। जून-जुलाई 1947 में गांधीजी ने अपने दैनिक भाशण में कह दिया था -‘‘ परंतु अब 32 वर्श बाद मेरी आंख खुली है। मैं देखता हूं कि अब तक जो चलती थी वह अहिंसा नहीं है, बल्कि मंद-विरोध था। मंद विरोध वह करता है जिसके हाथ में हथियार नहीं होता। हम लाचारी से अहिंसक बने हुए थे, मगर हमारे दिलों में तो हिंसा भरी हुई थी। अब जब अंग्रेज यहां से हट रहे हैं तो हम उस हिंसा को आपस में लड़ कर खर्च कर रहे हैं।’’ गांधीजी अपने आखिरी दिनों इस बात से बेहद व्यथित, हताष भी थे कि वे जिस अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देष से निकालने का दावा करते रहे थे , वह उसे आम लोगों में स्थापित करने में असफल रहे थे। कैसी विडंबना है कि जिस हिंसा को ले कर गांधी दुखी थे, उसी ने उनकी जान भी ली।  जिस अहिंसा के बल पर वे स्वराज पाने का दावा कर रहे थे, जब स्वराज आया तो दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार, विस्थाप, भुखमरी व लाखों लाषों को साथ लेकर आया।
षायद हमें उसी दिन समझ लेना था कि भारत का समाज मूल रूप से हिंसक है, हमारे त्योहर-पर्व में हम तलवारें चला कर , हथियार प्रदर्षित कर खुष होते हैं। हमारे नेता सम्मान में मिली तलवारें लहरा कर गर्व महसूस करते हैं। हर रोज बाघा बॉर्डर पर आक्रकामक तेवर दिखाकर लोगों में नफरत की आड़ में उत्साह भरना सरकार की नीति है। आम लोग भी कार में खरोंच, गली पर कचरे या एकतरफा प्यार में किसी की हत्या रकने में संकोच नहीं करता है। अपनी मांगों को समर्थन में हमारे धरने-प्रदर्षन दूसरों के लिए आफत बन कर आते हैं,लेकिन हम इसे लोकतंत्र का हिस्सा जता कर दूसरों की पीड़ा में अपना दवाब  होने का दावा करते हैं।
हम आजादी के बाद 70 सालों में छह बड़े युद्ध लड़ चुके हैं जिनमें हमारे कई हजार सैनिक मारे जा चुके हैं। हमारे मुल्क का एक तिहाई हिस्सा  सषस्त्र अलगाववादी आंदोलनों की चपेट में हैं जहां सालाना तीस हजार लोग मारे जाते हैं, जिनमें सुरक्षा बल भी षामिल हैं। देष में हर साल पैंतीस से चालीस हजार लोग आपसी दुष्मनियों में मर जाते हैं जो दुनिया के किसी देष में हत्या की सबसे बड़ी संख्या होती है। हमारा फौज व आंतरिक सुरक्षा का बजट स्वास्थ्य या षिक्षा के बजट से बहुत ज्यादा होता है।
सवाल फिर खड़ा होता है कि आखिर हम यह क्यों मान लें कि हम हिंसक समाज हैं ? हमें स्वीकार करना होगा कि असहिश्णुता बढ़ती जा रही है। यह सवाल आलेख के पहले हिस्से में भी था। यदि हम यह मान लेते हैं तो हम अपनी षिक्षा, संस्कार, व्यवस्था, कानून में इस तरह की तब्दीली करने पर विचार कर सकते है जो हमारे विषाल मानव संसाधन के सकारात्मक इस्तेमाल में सहायक होगी। हम गर्व से कह सकेंगे कि जिस गांधी के जिस अहिंसा के सिद्धांत को नेल्सन मंडेला से ले कर बराक हुसैन ओबामा तक सलाम करते रहे हैं; हिंदुस्तान की जनता उस पर अमल करना चाहती है।  हमारी षिक्षा, नीतियों, महकमों में गांधी एक तस्वीर से आगे बढ़कर क्रियान्वयन स्तर पर उभरे, इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी हिंसक प्रवृति को अप रोग मानें। वैसे भी गांधी के नषा का तिजारत ना करने, अनाज व कपास पर सट्टा ना लगाने जैसी नीतियों पर सरकार की नीतियां बिल्कुल विपरीत हैं तो फिर आज अहिंसा की बात करना एक नारे से ज्यादा तो हैं नहीं ।

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