तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

Who is afraid of powerful TALAB VIKAS PRADHIKARAN

कहां गुम हो गया तालाब विकास प्राधिकरण का सपना 

पंकज चतुर्वेदी 
उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन और भाजपा को विशाल बहुमत मिलने के अलग-अलग लोगों अपने-अपने सरोकार बहुत हैं, लेकिन जल-जंगल जमीन से प्रेम करने वालों को एक उम्मीद बंधी थी कि अब राज्य के उपेक्षित, पारंपरिक और समृद्ध तालाबों के दिन बहुरेंगें। कब्जों, गंदगी और जल-हीनता के शिकार हजारों तालाबों का स्वामी प्रदेश पेय-जल व सिंचाई संकट का सबसे अधिक प्रभावित रहा है। यदि षासन संभालने वाले दल ने अपने चुनाव के संकल्प पत्र पर ईमानदारी से काम किया तो यहां सशक्त ‘तालाब विकास प्राधिकरण’ का गठन होगा, जोकि राज्यभर के तालाबों को एक छतरी के नीचे ला कर उनको संपन्न व समृद्ध करेगा।  योगी सरकार के पहले सौ दिनों के प्राथमिकता वाली सूची में प्राधिकरण गठन की बात भी थी। शपथ समारोह के कोई बीस दिन बाद ही मेंरे पास राज्य के सिंचाई महकमे के एक आला अफसर ने प्राधिकरण की संभावित रूपरेखा व यासेच के बारे में जानने को फोन भी किया। उन्हें ईमेल पर इसका खाका भेजा गया। उसके बाद कुछ कुछ फाईलें भी दौड़ीं जाहिर है कि ऐसे लोग भी सक्रिय होंगे जिन्होने तालाब सुखा कर कालेानी काट लीं या खेत बना लिए । सो, अब एक सशक्त प्राधिकरण की मांग एक सपना ही प्रतीत होती है।
यह सच्चाई है कि साल-दर-साल बढ़ती आबादी का कंठ तर करने और उसका पेट भरने के लिए अन्न उगाने के लिए पानी की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं जलवायु परिवर्तन के चलते बरसात कर  हो रही है, साथ ही जल स्त्रोतों को ढंक कर उसकी जमीन पर मॉल-सड़क बनाने की प्रवृति में भी इजाफा हुआ हे। तीन दशक पहले सरकार ने पानी की कमी को पूरा करने के लिए भूजल पर जोर दिया, लेकिन वहां भी इतना उत्खनन हो गया कि पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में बंजर जमीन का खतरा पैदा हो गया। गंगा-यमुना जैसी नदियों के स्वामी उप्र को जगह’जगह बंध रहंे बांध और प्रदूशण के चलते सर्वाधिक जल-हानि झेलना पड़ा हे। संकट अकेले पानी की कमी का नहीं, असल विकराल समस्या, धरती के लगातार गरम होने और उसे षीतल रखने में कारगर तालाबों, जलाशयों के नश्ट होने का है। उप्र की राजधानी लख्नउ में अभी एक दशक पहले तक 12,653 ताालाब-पोखर-बावड़ी-कुएं हुआ करते थे।

सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि इनमें से चार हजार को भूमाफिया ने पाट कर बहमंजिला इमारतें खड़ी कर दी हैं, जबकि 2023 पर अभी भी अवैध कब्जे हैं। ऐसे ही इलाहबाद में तेरह हजार, आजमगढ में 10,535, गोरखपुर में 3971 कानुपर में 377, सहारनपुर में 6858, मेरठ 1853 आगरा में 591, बनारस में 1611 जल निधियों को मटियामेट करने के आंकड़े सरकारी फाईलो ंमें दर्ज हैं। बंुदेलखंड तो अपने पारंपरिक तालबों के लिए मशहूर था। सबसे अधिक प्यास, पलायन व मुफलिसिी के लिए बदनाम हो गए, बुंदेलखंड के हर गांव में कई-कई तालाब होते थे। आज यहां का कोई भी षहर, कस्बा ऐसा नहीं है जो पानी की कमी से बेहाल ना हो और उसका विस्तार तालाबों के कब्रिस्तान पर ना हुआ हो। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर और बरेली जिलों में आजादी के समय लगभग 182 तालाब हुआ करते थे। उनमें से अब महज 20 से 30 तालाब ही बचे हैं। जो बचे हैं, उनमें पानी की मात्रा न के बराबर है।


पिछले साल ही उत्तर प्रदेश के इटावा की नगर पालिका ने वहां के एक पुराने तालाब को सुंदर बनाने के नाम पर उसके संकरा कर रंगीन नीली टाईल्स लगाने की योजना पर काम षुरू किया है। हो सकता है कि उससे कुछ दिनों शहर में रौनक आ जाए, लेकिन ना तो उसमें पानी एकत्र होगा और ना ही वहां एकत्र पानी से जमीन की प्यास बुझेगी। यह भी तय है कि ऐसे तालाब में बाहर से पानी भरना होगा। ऐसा ही पूरे देश के सरोवरों के साथ लगातार हो रहा है - तालाब के जलग्रहण व निकासी क्षेत्र में पक्के निर्माण कर उसका आमाप समेट दिया जाता है, सौंदर्यीकरण के नाम पर पानी के बीच में कोई मंदिर किस्म की स्थाई आकृति बना दी गई व इसकी आड़ में आसपास की जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर दिया गया। बलिया का सुरहा ताल तो बहुत मशहूर है, लेकिन इसी जिले का एक कस्बे का नाम रत्सड़ इसमें मौजूद सैंकड़ों निजी तालाबों के कारण पड़ा था, सर यानि सरोवर से ‘सड़’ हुआ।  कहते हैं कि कुछ दशक पहले तक वहां हर घर का एक तालाब था, लेकिन जैसे ही कस्बे को आधुनिकता की हवा लगी व घरों में नल लगे, फिर गुसलखाने आए, नालियां आई, इन तालाबों को गंदगी डालने का नाबदान बना दिया गया। फिर तालाबों से बदबू आई तो उन्हें ढंक कर नई कालेानियां या दुकानंे बनाने का बहाना तलाश लिया गया।
यह दुखद है कि आधुकिनता की आंधी में तालाब को सरकार भाशा में ‘‘जल संसाधन‘‘ माना नहींे जाता है , वहीं समाज और सरकार ने उसे जमीन का संसाधन मान लिया। देशभर के  तालाब अलग-अलग महकमोे में बंटे हुए हैं। मछली विभाग, सिंचाई, वन, स्थानीय प्रशासन आदि। जब जिसे सड़क, कालोनी, मॉल, जिसके लिए भी जमीन की जरूरत हुई, तालाब को पुरा व समतल बना लिया। आज षहरों में आ रही बाढ़ हो या फिर पानी का संकट सभी के पीछे तालाबों की बेपरवाही ही मूल कारण है। इसके बावजूद पारंपरिक तालाबों को सहेजने की कोई साझी योजना नहीं है।
यह देश के किसी राज्य में पहली बार होना था जब किसी सरकार ने लगभग 74 साल पुरानी एक ऐसी रपट को गंभीरता से अमल करने की सोचेगी जो कि सन 1943 के भयंकर बंगाल दुर्भिक्ष में तीन लाख से ज्यादा मौत होने के बाद ब्रितानी सरकार द्वारा गठित एक आयोग की सिफारिशों में थी। सन 1944 में आई अकाल जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत जैसे देश में नहरों से सिंचाई के बनिस्पत तालाब खोदने व उनके रखरखाव की ज्यादा जरूरत है। सन 1943 में ‘ग्रो मोर कैंपेन’ चलाया गया था जोकि बाद में देश की पहली पंचवर्शीय योजना का हिस्सा बना, उसमें भी लघु सिंचाई परियोजनाओं यानि तालाबों की बात कही गई थी।  उसके बाद भी कई-कई योजनाएं बनीं, मप्र जैसे राज्य में ‘‘सरोवर हमारी धरोहर’’ जैसे अभियान चले, लेकिन जब आंकड़ों पर गौर करें तो दिल्ली हो या बंगलूरू या फिफर छतरपुर या लखनउ, सभी जगह विकास के लिए रोपी गई कालेानियां, सड़कांे,, कारखानों, फ्लाई ओवरों को तालाब को समाप्त कर ही बनाया गया। तालाब विकास प्राधिकरण इसी लिए आवश्यक है कि वह पहले राज्य के सभी तालाब, पोखरों का सर्वेक्षण कर उनके आंकड़े तो ईमानदारी से एकत्र करे, जिसमें बच गए जल संसाधन, कब्जा किए गए इलाकों , उपलब्ध तालाबों की मरम्मत, उससे जुड़े अदालती पचड़ों के निबटारे जैसे मसलों पर अधिकार संपन्न संस्था के रूप में निर्णायक हो।
 पहले बताया गया था कि राज्य सरकार की प्राथमिकता सिंचाई संसाधन विकसित करने की है और इसके तहत तालाब प्राधिकरण का गठन महत्वपूर्ण कदम होगा। परंतु अब कहीं सुगबुगाहट है जिसमें मौजूदा तालबों के सौंदर्यीकरण या क्षमता विकसित करने के लिए किसी संस्था को बनाने की बात है। लेकिन इसमें तालाब अलग-अलग महकमों के मालिकाना हक और उद्देश्यों में अटके रहेंगे। तालाबों पर कब्जे के मुकदमें वैसे ही दीवानी अदालतों में दशकांें तक चलते रहेंगें।
काश उप्र सरकार अपने मूल इरादे पर गंभीर होती तो देश के अन्य राज्यों में भी जल संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओ के लिए यह एक नजीर होगा। यदि जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर्र इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है । एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए । इस पूर कार्य का संचालन तालाब प्राधिकरण के अंतर्गत हो। जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी ।




मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

Beware of drought

सावधान ! देश भयंकर सूखे की ओर बढ रहा है 

.पंकज चतुर्वेदी


देश के बड़े राज्यों मेें से एक मध्यप्रदेश के कुल 51 में से 29 जिलों में अभी से जल-संकट के हालात हैं। राजधानी भोपाल की प्यास बुझाने वाले बड़े तालाब व कोलार में बामुश्किल चार महीने का जल षेश है। ग्वालियर के तिघरा डेम का जल जनवरी तक ही चल पाएगा। विदिशा में नल रीते हैं और सुबह-शाम मुहल्लों के हैंडपंपों पर लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं। फिलहाल नौ जिलों को सूखा-ग्रस्त घोशित करने की तैयारी है क्योंकि अल्प वर्शा और उसके बाद असामयिक बरसात ने किसानों की कंगाली  में आटा गिला कर दिया है - या तो बुवाई ही नहीं हुई और हुई तो बैमौसम बरसने से बीज मर गए।
नवरात्रि के विदा होते ही बादल व बारिश भी विदा हो जाते है। यदि बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में आई बीते एक दशक की सबसे भयावह बाढ़ को अलग रख दे ंतो भारतीय मौसम विभाग का यह दावा देश के लिए चेतावनी देने वाला है कि पिछले साल की तुलना में इस साल देश के 59 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है। आंकड़ों के अनुसार, देश के 630 जिलों में से 233 में औसत से कम बारिश हुई है। इससे देश में सूखे का संकट खड़ा हो गया है। जून से सितंबर के मानसून सीजन में करीब 6 फीसदी कम बारिश हुई। अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा । देश में कृषि ज्यादातर हिस्सों में मानसून पर निर्भर करती है। ऐसे में कम बारिश होने से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में जीडीपी 5.7 फीसदी रही जबकि पिछले साल इसी दौरान जीडीपी 7.9 फीसदी थी। 2014 में एनडीए के केंद्र की सत्ता में आने के बाद इस वित्त वर्ष में जीडीपी अपने सबसे निचले स्तर है। फसल वर्ष 2017-18 में (जुलाई-जून) में 273 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा।
अगली बरसात के लिए कम से कमपांच महीने का इंतजार करना होगा। अभी से ही भारत का बड़ा हिस्सा सूखे, पानी की कमी और पलायन से जूझ जा रहा है। उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, उत्त्राचंल, पश्चिमी उप्र, मप्र, उड़िसा, समूचा पूर्वोत्तर, केरल से ले कर अंडमान तक देश के बड़े हिस्से में सामान्य से आठ से ले कर 36 प्रतिशत कम बरसात हुई है। बुंदेलखंड में तो सैंकड़ों गांव वीरान होने षुरू भी हो गए हैं। यहां या तो बुवाई हुई नहीं, हुई तो बीज बगैर बरसात के ही जमीन में मर गया। एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जल संचयन स्थलों(जलाशयों) में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। सवाल उठता है कि हमारा विज्ञान मंगल पर तो पानी खोज रहा है लेकिन जब कायनात छप्पर फाड़ कर पानी देती है उसे सारे साल सहेज कर रखने की तकनीक नहीं। आम लेाग जल-संकट से बेखबर हैं और उन्होंने पहले गणपति और उसके बाद दुर्गा की लाखें-लाख प्रतिमांए जल भंडारों में विसर्जन कर ना क ेवल जल को दूशित किया, वरन उसकी बड़ी मात्रा का भी क्षय कर दिया।  ना कोई धार्मिक और ना ही सामाजिक और ना ही सरकार ने यह जगरूकता फैलाई  िकइस बार जल संकट है, प्रतिमाओं को जल में ना डालें।
हालांकि हम अभागे हैं कि हमने अपने पुरखों से मिली ऐसे सभी ज्ञान को खुद ही बिसरा दिया। जरा गौर करें कि यदि पानी की कमी से लोग पलायन करते तो हमारे राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके तो कभी के वीरान हो जाने चाहिए थे, लेकिन वहां रंग, लेाक, स्वाद, मस्ती, पर्व सभी कुछ है। क्योंकि वहां के पुश्तैनी बाशिंदे कम पानी से बेहतर जीवन जीना जानते थे। यह आम अदमी भी देख सकता है कि जब एक महीने की बारिश में हमारे भंडार पूरे भर कर झलकने लगे तो यदि इससे ज्यादा पानी बरसा तो वह बर्बाद ही होगा। फिर भी वर्शा के दिनों में पानी ना बरसे तो लोक व सरकार दोनों ही चिंतित हो जाते है।
यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘‘औसत से कम’’ पानी बरसा या बरसेगा, अब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि  करती है। हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। हां, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य केश क्राप ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थेाड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है। अब गंगा-यमुना के दोआब के पश्चिमी उ.प्र को ही लें, ना तो यहां के लेागों का भेाजन धान था और ना ही यहां की फसल। लेकिन ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में सबने धान बो कर जमीन बर्बाद की और आदत बिगड़ी सो अलग।
देश के उत्तरी हिस्से में नदियो में पानी  का अस्सी फीसदी जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में  यह आंकडा 90 प्रतिशत का है। जाहिर है कि षेश आठ महीनों में पानी की जुगाड़ ना तो बारिश से होती है और ना ही नदियों से।
असल में हमने पानी को ले कर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुंए से रस्सी डाल कर पानी खंीचना ोता था या चापाकल चला कर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल उलींचा जाता था। घर में टोंटी वाले नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूब वेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलवा डालने, कूडा मिलाने जैसी गतिविधियों से बच कर, पारंपरिक जल स्त्रोतों- तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है । अब कस्बाई लोग बीस रूपए में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव मं कई बार षौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है।
सूखे के कारण जमीन के कड़े होने, या बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभरते है। यहां जानना जरूरी है कि भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम हमारे यहां बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जा कर मिल जाता है और बेकार हो जाता है। गुजरात के जूनागढ, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुरू खुद ही सीखा। विछियावाडा गांव के लेागों ने डेढ लाख व कुछ दिन की मेहनत के साथ 12 रोक बांध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नल कूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्यप्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें तो कर्नाटक से ले कर असम तक और बिहार से ले कर बस्तर तक ऐसे हजारों हजार सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लेागो ने सुखाड़ को मात दी है। तो ऐसे छोटे प्रयास पूरे देश में करने में कहीं कोई दिक्क्त तो होना नहीं चाहिए।
कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक तो हर साल, हर महीने इस बात के लिए तैयारी करना होगा कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्शा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जिलाना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास है जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

paramilitary forces require tension free duty hours

तनावमुक्त रहना होगा इन्हें


पंकज चतुर्वेदी 
09 दिसम्बर 2017 को बस्तर के बीजापुर जिले के बासागुड़ा के सीआरपीएफ कैंप में संतलाल नामक सिपाही ने अपनी सरकारी इंसास राइफल से अपने ही चार साथियों को गोलियां से भून दिया। इस साल केवल बस्तर में केंद्रीय बलों के 40 जवान या तो आत्महत्या या फिर अपने ही साथियों द्वारा चलाई गई गोलियों से मारे जा चुके हैं। गत एक दशक में बस्तर में 115 जवान ऐसी घटनाओं में मारे गए। कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोई भी जवान ऐसे कदम बेहद तनाव या असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो कर उठाता है। आखिर वे दवाब में क्यों न हों?जानकर दुख होगा कि नक्सली इलाके में सेवा दे रहे जवनों की मलेरिया जैसी बीमारी का आंकड़ा उनके लड़ते हुए शहीद होने से कहीं ज्यादा होता है। हालांकि अभी सरकार ने बस्तर जैसे स्थानों पर बेहद विषम हालात में सेवाएं दे रहे अर्धसैनिकों को तनावमुक्त रखने के लिए ‘‘म्यूजिक थेरेपी’ यानी संगीत के इस्तेमाल का प्रयेग करना शुरू किया है, लेकिन अभी इसका लाभ आम जवान तक पहुंचता नहीं दिख रहा है। ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने कोई दस साल पहले एक जांच दल बनाया था, जिसकी रिपोर्ट जून-2004 में आई थी। इसमें घटिया सामाजिक परिवेश, प्रमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, तनावग्रस्त कार्य, पर्यावरणीय बदलाव, वेतन-सुविधाएं जैसे मसलों पर कई सिफारिशें की गई थीं। इनमें संगठन स्तर पर 37 सिफारिशें, निजी स्तर पर आठ और सरकारी स्तर पर तीन सिफारिशें थीं। इनमें छुट्टी देने की नीति में सुधार, जवानों से नियमित वार्तालाप, शिकायत निवारण को मजबूत बनाना, मनोरंजन व खेल के अवसर उपलब्ध करवाने जैसे सुझाव थे। इन पर कागजी अमल भी हुआ, लेकिन जैसे-जैसे देश में उपद्रवग्रस्त इलाका बढ़ता जा रहा है, अर्धसैनिक बलों व फौज के काम का दायरे में विस्तार हो रहा है। ड्यूटी की अधिकता में उस समिति की सिफारिशें जमीनी हकीकत बन नहीं पाई। यह एक कड़वा सच है कि हर साल दंगा, नक्सलवाद, अलगाववादियों, बाढ़ और ऐसी ही विकट परिस्थितियों में संघर्ष करने वाले इस बल के लोग मैदान में लड़ते हुए मरने से कहीं ज्यादा गंभीर बीमारियों से मर जाते हैं। यह बानगी है कि जिन लोगों पर हम मरने के बाद नारे लुटाने का काम करते हैं, उनकी नौकरी की शत्रे किस तरह असहनीय, नाकाफी और जोखिम भरी हैं। संसद के पिछले सत्र में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने बताया था कि पिछले साल सीआरपीएफ के 92 जवान नौकरी करते हुए हार्ट अटैक से मर गए, वहीं डेंगू या मलेरिया से मरने वालों की संख्या पांच थी। 26 जवान अवसाद या आत्महत्या के चलते मारे गए तो 353 अन्य बीमारियों की चपेट में असामयिक कालगति को प्राप्त हुए। वर्ष 2015 में दिल के दौरे से 82, मलेरिया से 13 और अवसाद से 26 जवान मारे गए। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी-2009 से दिसम्बर-2014 के बीच नक्सलियों से जूझते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस यानी सीआरपीएफ के कुल 323 जवान देश के काम आए। वहीं इस अवधि में 642 सीआरपीएफ कर्मी दिल का दौरा पड़ने से मर गए। आत्महत्या करने वालों की संख्या 228 है। वहीं मलेरिया से मरने वालों का आंकड़ा भी 100 से पार है। अपने ही साथी या अफसर को गोली मार देने के मामले भी आए रोज सामने आ रहे हैं। कुल मिला कर सीआरपीएफ दुश्मन से नहीं खुद से ही जूझ रही है। हाल ही में बुरकापाल के पास हुए संहार को ही लें, यहां गत चार साल से सड़क बन रही है और महज सड़क बनाने के लिए सीआरपीएफ की दैनिक ड्यूटी लगाई जा रही थी। सीआरपीएफ की रपट में यह माना गया है कि लंबे समय तक तनाव, असरुक्षा व एकांत के माहौल ने जवानों में दिल के रोग बढ़ाए हैं। वहीं घरवालों का सुख-दुख न जान पाने का दर्द भी उनको भीतर-ही-भीतर तोड़ता रहता है। तिस पर वहां मनोरंजन के कोई साधन हैं नहीं और न ही जवान के पास उसके लिए समय है। यह भी चिंता का विषय है कि सीआरपीएफ व अन्य सुरक्षा बलों में नौकरी छोड़ने वालों की संख्या में 450 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। साफ दिख रहा है कि जवानों के काम करने के हालात सुधारे बगैर बस्तर के सामने आने वाली चुनौतियों से निबटना कठिन होता जा रहा है। नियमित अवकाश, अफसर से बेहतर संवाद, सुदूर नियुक्त जवान के परिवार की स्थानीय परेशानियों के निराकरण के लिए स्थानीय प्रशासन की तत्परता, मनोरजंन के अवसर, पानी, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं को पूरा करना ऐसे कदम हैं, जो जवानों में अनुशासन व कार्य प्रतिबद्धता, दोनों को बनाए रख सकते हैं। 



सोमवार, 25 दिसंबर 2017

Only slogans can not clean the rivers


नदियां साफ करने के नाम पर नारेबाजी

जीवनदायी नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां अभी तक महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं

पंकज चतुर्वेदी



हाल में नियंत्रक-महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट से पता चला कि गंगा सफाई की परियोजना ‘नमामि गंगे’ के तहत बजट राशि खर्च ही नहीं हो पाई है। अब तक गंगा की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन न तो गंगा में पानी की मात्र बढ़ी और न ही उसका प्रदूषण घटा। यह हाल केवल गंगा का ही नहीं है। अन्य नदियों को स्वच्छ करने के अभियान भी कागजी साबित हो रहे हैं। वे नारेबाजी और बजट को ठिकाने लगाने तक अधिक सीमित हैं। लखनऊ में गोमती पर छह सौ करोड़ खर्च किए गए, लेकिन हालत जस की तस है। कई सौ करोड़ खर्च हो जाने के बाद यमुना भी दिल्ली से आगे मथुरा-आगरा तक नाले की तरह है। सभी जानते हैं कि इंसान के पीने और साथ ही खेती-मवेशी के लिए अनिवार्य मीठे जल का सबसे बड़ा जरिया नदियां ही हैं। जहां-जहां से नदियां निकलीं, वहां-वहां बस्तियां बसती गईं और इस तरह विविध संस्कृतियों का भारत बसता चला गया। समय के साथ नदियां पवित्र मानी जाने लगीं-केवल इसलिए नहीं कि उनसे जीवनदायी जल मिल रहा था, इसलिए भी कि उनकी छत्र-छाया में मानव सभ्यता पुष्पित पल्लवित होती रहीं। गंगा और यमुना को भारत की अस्मिता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन विडंबना है कि विकास की बुलंदियों की ओर बढ़ते देश में अमृत बांटने वाली नदियां आज खुद जहर पीने को अभिशप्त हैं। नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। सरकार में बैठे लेाग खुद ही नदियों में गिरने वाले औद्योगिक प्रदूषण की सीमा में जब विस्तार करेंगे तो यह उम्मीद रखना बेमानी है कि वे जल्द ही निर्मल होंगी। 1हमारी नदियां कई तरह के हमले ङोल रही हैं। उनमें पानी कम हो रहा है, वे उथली हो रही हैं और उनसे रेत निकाल कर उनका मार्ग भी बदला जा रहा है। नदियों के किनारे पर हो रही खेती से बह कर आ रहे रासायनिक पदार्थ और कल-कारखानों के साथ घरेलू गंदगी भी नदियों में जा रही है। नदी केवल एक जल मार्ग नहीं होती। जल के साथ उसमें रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति, उसके किनारे की नमी, उसमें पलने वाले सूक्ष्म जीव, उसका जल इस्तेमाल करने वाले इंसान और पशु-इन सभी की महत्ता होती है। यदि इनमें से एक भी कड़ी कमजोर या नैसर्गिक नियम के विरूद्ध जाती है तो नदी की दशा बिगड़ जाती है। हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है जहां से पानी बहकर नदियों में आता है। इसमें हिमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रrापुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, माही, महानदी, साबरमती आदि बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां-गंगा, सिंधु और ब्रrापुत्र को सदानीरा ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष पठारी नदी कहलाती हैं, क्योंकि वे मूलत: वर्षा पर निर्भर होती हैं। देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किमी है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलित जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किमी है। हमारी नदियों से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसद बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।12009 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या 121 पाई थी जो अब 275 हो चुकी हैं। आठ साल पहले नदियों के कुल 150 हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था, जो अब 302 हो गया है। बोर्ड ने 29 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 445 नदियों पर अध्ययन किया, जिनमें से 225 का जल बेहद खराब हालत में मिला। इन नदियों के किनारे बसे शहरों में 2009 में 38 हजार एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो अब बढ़ कर 62 हजार एमएलडी हो गया है। चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। सरकारी अध्ययन में 34 नदियों में बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्र 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई और यह नदियों के अस्तित्व के लिए बड़े संकट की ओर इशारा करता है। भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका 12,363 किमी मापा गया है। इनमें से 1,145 किमी का क्षेत्र बेहद दूषित श्रेणी का है। दिल्ली में यमुना इस शीर्ष पर है। इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां 43 नदियां मरने के कगार पर हैं। असम में 28, मध्यप्रदेश में 21, गुजरात में 17, कर्नाटक में 15, केरल में 13, बंगाल में 17, उप्र में 13, मणिपुर और ओडिशा में 12-12, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसी नदियों के कोई 50 किमी इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग समाप्त हो गई है। इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है। भूजल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि वह न तो पीने के लायक है,न ही खेती के। 1आज के दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि के निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ एक अन्य अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू। यह एक ऐसा उत्पाद है जिसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता। प्रकृति का नियम यही है कि किनारे पर स्वत: आई इस रेत को समाज अपने काम में लाए, लेकिन गत एक दशक के दौरान हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है। इसके लिए नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है। उसे बेतरतीब खोदा या गहरा किया जाता है। नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत न केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि वह उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भूगर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है। नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में लगातार जेसीबी जैसी भारी मशीनें और ट्रक आने से उसका पर्यावरण खराब होता है। भले ही हम कारखानों को दोषी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल है। इस मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे के बेतरतीब अतिक्रमण भी उनके बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैं।1(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

Voter list need too be update carefully

मतदाता सूची तैयार करने में कोताही क्यों ?

पंकज चतुर्वेदी
लोकतंत्र की मूल आत्मा को बचाने के लिए अधिक से अधिक लोगों को मतदान केंद्र तक पहुचाना जरूरी होता है । यह एक निर्विवाद सत्य है, लेकिन उन परिस्थितियों का क्या किया जाए, जब मतदाता अपना मतदाता पहचान पत्र ले कर मतदान केंद्र जाता है और वहां से उसे यह कह कर भगा दिया जाता है कि उसका नाम तो मतदाता सूची में ही नहीं है। संवेदनशील नागरिक को एकबारगी लगता है कि क्या वह इससे देश का नागरिक ही नहीं है या आने वाले पांच साल इस निर्वाचित निकाय में ना तो उसकी कोई भागीदारी होगी और ना ही दावेदारी। उसके पास मतदाता पहचान पत्र है, आवास का प्रमाण है, आधार है, कई एक तो सरकारी महकमों में काम करने वाले होते हैं। इसके बावजूद वे मतदाता नहीं हैं।
पिछले दिनों देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए। इलाहबाद में महज 34 फीसदी और लखनउ में 39 प्रतिशत ही वोट गिरे। सर्वाधिक मतदान हमीरपुर और अमेठी में 69 प्रतिशत के करीब था। इसके बावजूद हर षहर, कस्बे में हजारों लेागे विरोध दर्शाते दिखे कि उनका नाम ही मतदाता सूची में नहीं है। उनमें से अधिकांश वे थे जिन्होंने पिछले विधानसभा और लेकसभा में वोट डाला था।

गुजरात में भी कई ऐसे मतदाता चिल्लाते दिखे जिन्होंने पिछले साल स्थानीय निकाय में तो वोट दिया लेकिन विधानसभा की मतदाता सूची में वे नहीं थे।  जाहिर है कि एक आम धारणा यही बनती है कि कतिपय पूर्वाग्रह के चलते किसी ताकतवर राजनीतिक दल ने उनका नाम उड़ा दिया। जबकि असल में यह सारा खेल महज प्रशासनिक अव्यवस्था का होता है। यह कैसी विडंबना है कि एक ही देश के एक ही हिस्से में दो मतदाता सूची होती हैं - एक राज्य निर्वाचन आयोग की और दूसरी केंद्रीय निर्वाचन आयोग की। हालांकि दोनों को तैयार करने वाली मशीनरी एक ही होती है, लेकिन मतदाता सूची का रिकार्ड, पंजीयन अलग-अलग होता है। केंद्रीय मतदाता सूची के आधार पर राज्य व केंद्र के चुनाव होते हैं, जबकि राज्य की सूची पर स्थानीय निकाय अर्थात नगरपालिका या पंचायत चुनाव।
होता यह है कि मतदाता को यह भेद पता नहीं होता और वह एक जगह अपना नाम पंजीकृत करवा कर मतदाता पहचान पत्र पा जाता है, लेकिन कहीं राज्य तो कहीं केंद्र की सूची से उसका नाम नदारत होता है। अब मतदाता सूची तैयार करने के जिम्मेदार बीएलओ, जोकि अधिकाश्ंा सरकारी स्कूल के शिक्षक होते हैं, बहुत ही कम घर-घर जा कर मतदाता सूची अपडेट करते हैं। अब स्थानीय निकाय चुनाव के पहले बीएलओ को जो मतदाता सूची अपडेट करने को दी गई , वह पांच साल पहले हुए स्थानीय निकाय के चुनाव वाली थी। यदि कहीं ईमानदारी से अपडेट हुआ तो ठीक, वरना बीते पांच सालों के दौरान नए पंजीकृत मतदाता(भले ही उनका नाम केंद्र की सूची में दर्ज था), इस सूची से गायब होता है।

वहीं आम मतदाता को या तो सूचना नहीं मिलती या फिर निर्धारित तारीख पर मतदान केंद्र पर बीएलओ पहुंचता हीं नहीं है और उसका नाम किसी सूची से वंचित रह जाता है। यह भी दुखद है कि लेाकतंत्र के मूल आधार-मतदाता सूची के निर्माा में अनयिमितता या कोताही पर कोई कड़ा दंड दिया जाता नहीं हे। कभी कोई सस्पेंड होता है तो कुछ ही दिनों में राजनीतिक दखल के बाद बहाल हो जाता है। यह भी दुखद है कि मतदाता सूची तैयार करने जैसा महत्वपूर्ण कार्य पहले से ही कई जिम्मेदारी निभाने वाले शिक्षक के गले बांध दिया गया हे। हालांकि अब आनलाईन मतदाता पंजीयन की सुविवधा है, लेकिन तकनीकी साक्षरता इतनी अधिक है नही कि लोगों को इसका व्यापक लाभ मिल सके।
एक साधारण सा उपाय मतदाताओं को अपना नाम जानबूझ कर सूची से उड़ाने के अविश्वास को दूर कर सकता है कि मतदात सूची राज्य या केंद्र की अलग-अलग ना हों। जो एक बार केंद्रीय मतदाता सूची में दर्ज है, वह सभी चुनावों के लिए अधिकृत होगा, साथ ही जब कभी मतदाता सूची अद्यतन करने का कार्य हो तो अंतिम सूची पर वह काम करे। इससे प्रशासनिक जटिलता, व्यय से तो मुक्ति मिलेगी ही , समय की भी बचत होगी और संस्था के प्रति विश्वास बहाली की राह भी निकलेगी।         
                                                                                                                                                                                                       
इसमें कोई षक नहीं कि भारत के षहरी क्षेत्रों में मतदान के प्रति लेागों में ज्यादा उत्साह नहीे होता । कुछ सालों पहले चुनाव आयोग ने सभी राजनैतिक दलों के साथ एक बैठक में प्रतिपत्र मतदान का प्रस्ताव रखा था । इस प्रक्रिया में मतदाता अपने किसी प्रतिनिधि को मतदान के लिए अधिकृत कर सकता है । इस व्यवस्था के लिए जन प्रतिनिधि अधिनियम 1951 और भारतीय दंड संहिता में संशोधन करना जरूरी है । संसद में बहस का आश्वासन दे कर उक्त अहमं मसले को टाल दिया गया । गुजरात में स्थानीय निकायों के निर्वाचन में अनिवार्य मतदान की कानून लाने का प्रयास किया गया था लेकिन वह सफल नहीं हुआ। यहां जानना जरूरी है कि दुनिया के कई देशों में मतदान अनिवार्य है। आस्ट्रेलिया सहित कोई 19 मुल्कांे में वोट ना डालना दंडनीय अपराध है। क्यों ना हमारे यहां भी बगैर कारण के वोट ना डालने वालों के कुछ नागरिक अधिकार सीमित करने या उन्हें कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित रखने के प्रयोग किये जाएं। लेकिन साथ ही मतदाता सूची निरापद हों, इसके भी कड़े प्रावधान हों। यदि यह सरकार लोकतंत्र की मूल भावना को जीवित रखने के लिए मतदाता सूची तैयार करने में आमूल-चूल परिवर्तन करती है तो आम आदमी खुद को लोकतंत्र के करीब समझेगा। इसके लिए देश के सबसे बड़े  नागरिक डाटा - आधार का सहारा लिया जा सकता है।

आज चुनाव से बहुत पहले बड़े-बड़े रणनीतिकार  मतदाता सूची का विश्लेशण कर तय कर लेते हैं कि हमें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां चाहे एक वोट से जीतो या पांच लाख वोट से , दोनों के ही सदन में अधिकार बराबर होते है। ऐसे में राजनीतिक दलों की इसमें कतई रूचि नहीं होती कि अधिक से अधिक लेागां के नाम मतदाता सूची में हों, वे तो बस अपने लेागों के ही वोट चाहते हैं। यदि राश्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैंसियत, सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, ना कि केवल गूजर, मुसलमान या ब्राहण वोट के।  केबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को ले कर निर्वाचित प्रतिनिधियों का उनको मिले कुछ वोटो का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक मतदान भी जुटाने को मजबूर करेगा। ऐसा करने पर राजनीतिक दल व चुनाव लड़ने के आकंाक्षी भी अधिक से अधिक मतदाताओं को पंजीकृत करवाने के कार्य के लिए प्रेरित होंगे।

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

Society and government is responsible for deterioration of Rivers

समाज-सरकारों की करतूतों से उपजी त्रासदी

मरणासन्न नदियां
पंकज चतुर्वेदी
मानवता का अस्तित्व जल पर निर्भर है और आम इनसान के पीने-खेती-मवेशी के लिए अनिवार्य मीठे जल का सबसे बड़ा जरिया नदियां ही हैं। जहां-जहां से नदियां निकलीं, वहां-वहां बस्तियां बसती गईं और इस तरह विविध संस्कृतियों, भाषाओं, जाति-धर्मों का भारत बसता चला गया। तभी नदियां पवित्र मानी जाने लगीं-केवल इसलिए नहीं कि इनसे जीवनदायी जल मिल रहा था, इसलिए भी कि इन्हीं की छत्र-छाया में मानव सभ्यता पुष्पित-पल्लवित होती रही। गंगा और यमुना को भारत की अस्मिता का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन विडंबना है कि विकास की बुलंदियों की ओर उछलते देश में अमृत बांटने वाली नदियां आज खुद जहर पीने को अभिशप्त हैं। इसके बावजूद देश की नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही है। सरकार में बैठे लेाग खुद ही नदियों में गिरने वाले औद्योगिक प्रदूषण की सीमा में जब विस्तार करेंगे तो यह उम्मीद रखना बेमानी है कि देश की नदियां जल्द ही निर्मल होंगी।
असल में हमारी नदियां इन दिनों कई दिशाओं से हमले झेल रही हैं। उनमें पानी कम हो रहा है, वे उथली हो रही हैं, उनसे रेत निकाल कर उनका मार्ग बदला जा रहा है, नदियों के किनारे पर हो रही खेती से बहकर आ रहे रासायनिक पदार्थ, कल-कारखानों और घरेलू गंदगी का नदी में सीधा मिलान हो रहा है। नदी केवल एक जलमार्ग नहीं होती, जल के साथ उसमें रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति, उसके किनारे की नमी, उसमें पलने वाले सूक्ष्म जीव, उसका इस्तेमाल करने वाले इनसान व पशु सभी मिलकर एक नदी का चक्र संपूर्ण करते हैं। यदि इसमें एक भी कड़ी कमजोर या नैसर्गिक नियम के विरुद्ध जाती है तो नदी की तबीयत खराब हो जाती है।
साल 2009 में  केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या 121 पाई थी जो अब 275 हो चुकी है। यही नहीं आठ साल पहले नदियों के कुल 150 हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था, जो अब 302 हो गया है। बोर्ड ने 29 राज्यों व छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 445 नदियों पर अध्ययन किया, जिनमें से 225 का जल  बेहद खराब हालत में मिला। इन नदियों के किनारे बसे 650 शहरों के 302 स्थानों पर सन 2009 में 38 हजार एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो कि आज बढ़ कर 62 हजार एमएलडी  हो गया। चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। सरकारी अध्ययन में 34 नदियों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्रा 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई।
भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका 12,363 किलोमीटर मापा गया है इनमें से 1,145 किलोमीटर का क्षेत्र पहले स्तर यानी बेहद दूषित श्रेणी का है। दिल्ली में यमुना इस मामले में शीर्ष पर है, महाराष्ट्र  में 43 नदियां मरने की कगार पर हैं। असम में 28, मध्यप्रदेश में 21, गुजरात में 17, कर्नाटक में 15, केरल में 13, बंगाल में 17, उप्र में 13, मणिपुर और ओडिशा में 12-12, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए तड़प रही हैं। ऐसी नदियों के कोई 50 किलोमीटर इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है। इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है।
भू-जल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि यह न तो पीने लायक है, न ही खेती के। हमारी नदियों के सामने मूलरूप से तीन तरह के संकट हैं- पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण। इन नदियों को मरने की कगार पर पहुंचाने वाला यही समाज और सरकार की नीतियां हैं। इस दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि। निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ दूसरी अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू। यह नदियों के बहाव के साथ तट पर एकत्र होती है। हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है। नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है, उसे खोदा या गहरा किया जाता है।
नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत न केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भू-गर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है। जब नदी के बहाव पर पॉकलैंड व जेसीबी मशीनों से प्रहार होता है तो उससे पूरा पर्यावरण ही बदल जाता है। दरअसल कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र 20 प्रतिशत की ही खपत होती है, शेष 80 फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल ही है। हर घर में शौचालय, घरों में स्वच्छता के नाम पर बहुत से साबुन और केमिकल का इस्तेमाल, शहरों में मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे हुए बेतरतीब अतिक्रमण नदियों के बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैं।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

Now potato farmers are crying

अब आलू रूला रहा है  किसानों को
पंकज चतुर्वेदी
उत्त प्रदेश के षाहजहांपुर के जलालपुर स्थित कोल्ड स्टोरेज के मालिक ने पिछले दिनों अपने गोदाम में एक साल से भरा आलू निकाल कर सड़क पर फैंक दिया। लोगों ने लूटा, जानवरों ने खाया, फिर भी चारों ओर आलू सड़ रहा है। कोई बीस लाख दाम का बीस हजार बोरी आलू सड़क पर पड़ा हमारी कृशि नीति पर सवाल उठा रहा है। चूंिक पचास किलो की एक बोरी कोल्ड स्टोरेज में रखने का किराया नब्बे रूप्ए होता है और आज इतनी कीमत तो नए आलू की नहीं मिल रही अतः किसान को अपने श्रम को बिसरा देने की मजबूरी ही है। असल में बाजार में आलू की नई फसल आ गई है, नए आलू को ही माकूल दाम नहीं मिल रहे है।। वहीं बीते एक साल के दौरान जिन किसानों ने दाम बढ़ने की उम्मीद में आपना माल कोल्ड स्टारेज में रखा था, उनकी उम्मीदें नोटबंदी के चलते धराशाही हो गईं। किसानों को कोल्ड स्टोरेज से माल ढोने व किराया चुकाने में इतना पैसा लग रहा था कि उतना तो उन्हें माल बेच कर भी नहीं मिलता। किसानों ने अपना माल लावारिस छोड़ दिया। गौर करें इस तरह माल को छोड़ देना यानि एक साल की लागत, मेहनत सबकुछ बेकार गई।
विदित हो किसान 50-55 किलोग्राम आलू का एक बोरा बनाता है। इसको कोल्ड स्टोरेज में रखने का  किराया 90 से 110 रुपया तक होता है। खाली बोरी 17 या 18 रुपये में मिलती है । सुतली, पल्लेदारी, ट्रैक्टर का किराया आदि मिलाकर 25 रुपये और खर्च होते हैं। अभी आलू 80 से 90 रुपये में एक बोरा व्यापारी खरीद रहे हैं। इससे कोल्ड स्टोरेज का किराया ही नहीं निकल रहा है। किराया की बची रकम और बोरी के दाम के साथ मालिकों से लिया गया लोन किसानों पर चढ़ा हुआ है। अब यह कोल्ड स्टोरेज मालिक किसानों के लोन के खाते में डालकर अगले वर्ष वसूलेंगे। आलू की आर्थिकी किसान को घाटे में डालने के साथ कर्ज को बढ़ाने वाली बन चुकी है। किसान अपने खेत की मिट्टी भी बेचता है तो आलू उत्पादन की स्थिति से बेहतर हालात होते हैं। पूर्वाचंल के अकेले एक जिले गाजीपुर  के कोलड स्टोरेज में लगभग 13 मीट्रिक टन आलू पड़ा है। बीते एक साल के दौरान इसका आठ फीसदी भी नहीं बिका ।

समूचे उत्तर प्रदेश का आलू किसान अपने खेत में षानदार फसल देख कर ही तनाव में है। राज्य के कोल्ड स्टोरेज में पहले से ही 90 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा आलू भरा है। बाहरी राज्यों से मांग न होने से निकासी हो नहीं रही है। उधर अगस्त महीने में कर्नाटक में आलू की फसल आ गई सो दक्षिणी राज्यों के निर्यात का रास्ता बंद हो गया। स्थानीय बाजार के लिए आलू के दाम अधिकतम 100 रूपए क्विंटल भी नहीं हैं। इससे किसान की लागत भी नहीं निकल रही। हालात यही रहे तो इस बार कोल्ड स्टोरेज में आलू सड़ेगा। वैसे भी सरकारी समर्थन मूल्य 487 रुपये प्रति क्विंटल की दर से तो कोल्ड स्टोरेज किराया व रखरखाव आदि की पूर्ति भी बामुश्किल हो पाती है।

पंजाब के हालात भी अलग नहीं है। वहां इस साल आलू की पैदावार में 10-15 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहां के किसानों को पिछले साल भी लागत का पैसा भी नहीं मिला था। भारत के कुल आलू उत्पादन में पंजाब का योगदान पांच प्रतिशत रहता है और जालंधर, कपूरथला, एसबीएस नगर तथा होशियारपुर जिले प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं। वैसे पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश आलू के बड़े उत्पादक हैं लेकिन लेकिन वे बीज पंजाब से खरीदते हैं।
सनद रहे कि इस साल जुलाई में जब मध्यप्रदेश का किसाना प्याज के दाम को ले कर आंदोलन कर रहा था , तभी  सरकार को चेतावनी दे दी गई थी कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश के आलू किसान भी मप्र की तरह बंपर फसल का स्यापा करने वाले हैं। इसके बावजूद सरकार इस दिशा में फिलहाल कुछ नहीं सोचा। दुखद है कि हुक्मरान इंतजार करते हैं कि  संकट होगा, बवाल होग, मुआवजा बंटेंगा- समूची सियासत इसी पर चलती है।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेशियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आश्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चौपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।
आज आलू किसानों को कर्ज से दबने से बचाने के लिए सरकारी संस्थाओं को पहले वेयर हाउसमें रखा माल न्यूनतम मूल्य पर खरीद कर उसे राशन की दुकानों या मिड डे मील जैसी योजनओं में तत्काल खपाने पर विचार करना चाहिए। नश्ट होती फसल केवल पैसे का अपव्यय ही नहीं है, यह श्रम, प्रकृति और देख में हर दिन भूखे सो रहे लाखों लोगों का अपमान भी है।


रविवार, 10 दिसंबर 2017

After rain now rivers are unhappy with Meghalay

वहां मेघ से बरसने वाली हर अमृत बूंद सहेजकर समाज तक पहुंचाने के लिए प्रकृति ने नदियों का जाल भी दिया है।
प्रदूषण बढ़ने के साथ ही मेघालय की तमाम छोटी-बड़ी नदियां अब लुप्त होती जा रही हैं।

मेघ के बाद नदियां भी रूठीं तो क्या बचेगा मेघालय में


बीते दिनों की बात हो गई, जब कहा जाता था कि चेरापूंजी में दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश होती है। बारिश बुलाने वाले पहाड़, नदियां, हरियाली सब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कभी समाज की जीवन रेखा कही जाने वाली मेघालय की नदियां अब विदा हो रही हैं। ये एक-एक कर लुप्त होती जा रही हैं। इनकी मछलियां नदारद हैं और इलाके की बड़ी आबादी पेट के कैंसर का शिकार हो रही है। लेकिन सरकारी महकमे नहीं मानते कि नदियों का प्रदूषण जीवन के लिए खतरनाक हो चुका है। प्रदूषण के असल कारण औद्योगिक इकाइयों पर न राजनेता बोलते हैं, और न ही सरकारी महकमे।जहां मेघों का डेरा है, वहां मेघ से बरसने वाली हर अमृत बूंद सहेजकर समाज तक पहुंचाने के लिए प्रकृति ने नदियों का जाल भी दिया है। आए दिन मेघालय से बाहर बांग्लादेश की ओर जाने वाली दो बड़ी नदियों- लुका और मिंतदु का पानी पूरी तरह नीला हो जाता है। बिल्कुल नील घुले पानी की तरह। सनद रहे कि इधर की नदियों का पानी साफ या फिर गंदला-सा होता है, लेकिन साल में कम से कम तीन बार ये नदियां नीली पड़ जाती हैं। यह 2007 से ही जारी है, जब हर साल ठंड शुरू होते ही पहले मछलियों की मौत शुरू होती है, फिर पानी का रंग गहरा नीला हो जाता है। इलाके के कोई दो दर्जन गांवों के लिए ये एकमात्र जलस्नेत हैं। सरकारी रिकॉर्ड भी बताते हैं कि क्षेत्र की 30 फीसदी आबादी पेट की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है और इसमें कैंसर के मरीज सर्वाधिक हैं।मेघालय जमीन के भीतर छिपी प्राकृतिक संपदा के मामले में बहुत संपन्न है। यहां चूना है, कोयला है और यूरेनियम भी है। शायद यही नैसर्गिक वरदान अब इसकी मुश्किलों का कारण बन रहा है। सन 2007 में पहली बार लुका व मिंतदु नदियों का रंग नीला पड़ने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच की थी और 2012 की अपनी रिपोर्ट में इलाके के जल प्रदूषण के लिए कोयला खदानों से निकलने वाले अम्लीय अपशिष्ट और अन्य रासायनों को जिम्मेदार ठहराया था। क्षेत्र के प्रख्यात पर्यावरणविद् एचएच मोर्हमन मानते हैं कि नदियों के अधिकांश भागों में तल में कई प्रकार के कण देखे जा सकते हैं, जो संभवत: नदियों के पास चल रहे सीमेंट कारखानों से उड़ती राख है। बीच में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कोयला खनन और परिवहन पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन वह ज्यादा दिन चला नहीं। नदियों की धीमी मौत का यह उदाहरण केवल लुका या मिंतदु तक सीमित नहीं हैं, आयखेरवी, कुपली नदियों का पानी भी अब इंसान के प्रयोग लायक नहीं बचा है। लुका नदी पहाड़ियों से निकलने वाली कई छोटी सरिताओं से मिलकर बनी है। इसमें लुनार नदी मिलने के बाद इसका प्रवाह तेज होता है। इसके पानी में गंधक, सल्फेट, लोहा व कई अन्य जहरीली धातुओं की उच्च मात्र और पानी में ऑक्सीजन की कमी पाई गई है। ठीक यही हालत अन्य नदियों की भी है, जिनमें सीमेंट कारखाने या कोयला खदानों का अवशेष आकर मिलता है। लुनार नदी के उद्गम स्थल सुतुंगा पर ही कोयले की सबसे ज्यादा खदानें हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जयंतिया पहाड़ियों पर कानूनी से कई गुना ज्यादा गैरकानूनी खनन होता है। यही नहीं, नदियों में से पत्थर निकालकर बेचने पर तो यहां कोई ध्यान ही नहीं देता, जबकि इससे नदियों का इको सिस्टम खराब हो रहा है। कटाव और दलदल बढ़ रहा है और इसी के चलते मछलियां कम आ रही हैं। ऊपर से जब खनन का मलवा इसमें मिलता है, तो जहर और गहरा हो जाता है। मेघालय ने गत दो दशकों में कई नदियों को नीला होते, फिर उसके जलचर को मरते और आखिर में जलहीन होते देखा है। विडंबना है कि यहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर एनजीटी तक सभी विफल हैं। समाज चिल्लाता है, गुहार लगता है और स्थानीय निवासी आने वाले संकट की ओर इशारा भी करते हैं, लेकिन स्थानीय निर्वाचित स्वायत्त परिषद खदानों से लेकर नदियों तक को निजी हाथों में सौंपने के फैसले पर चिंतन नहीं करती हैं। अभी तो मेघालय पर बादलों की कृपा भी कम हो गई है। चेरापूंजी अब सर्वाधिक बारिश वाला गांव नहीं रहा। नदियां भी चली गईं, तो दुनिया के इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य वाली धरती पर मानव जीवन संकट में आ जाएगा।(ये लेखक के अपने विचार हैं)

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

Kannur can be a model for waste management

केरल से सीखें कचरा कम करना
पंकज चतुर्वेदी 

‘कन्नन’ का अर्थ है श्रीकृष्ण  और ‘उर’ यानि स्थान। केरल के दक्षिणी-पूर्व में स्थित तटीय श हर कन्नूर, देश का ऐसा पहला श हर बन गया है जहां ना ता कोई प्लास्टिक कचरा बचा है और ना ही वहां किसी तरह के प्लास्टिक सामग्री को कचरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। केरल राज्य की स्थापना के दिवस एक नवंबर 2016 को जिले ने ‘ नलनाडु-नल्ला मन्नू’  अर्थात ‘सुंदर गांव-सुंदर भूमि’ का संकल्प लिया और पांच महीने में यह मूर्तरूप में आ भी गया।  यह तो बानगी है, राज्यभर में ‘हरित केरलम’ परियेाजना के तहत कचरा कम करने के कई ऐसे उपाय प्रारंभ किए गए हैं जोकि देश के लिए अनुकरणीय मिसाल हैं।
समृद्ध अतीत और सर्वधर्म समभाव के प्रतीक कन्नूर ने जब तय किया कि जिले को देश का पहला प्लास्टिक-मुक्त जिला बनाना है तो इसके लिए जिला प्रशासन से ज्यादा समाज के अन्य वर्ग को साथ लिया गया। बाजार, रेस्तरां, स्कूल, एनजीओ, राजनीतिक दल आदि एक जुट हुए। पूरे जिले को छोटे-छोटे क्लस्टर में बांटा गया, फिर समाज के हर वर्ग, खासकर बच्चों ने इंच-इंच भ्ूामि से प्लास्टिक का एक-एक कतरा बीना गया उसे ठीक से पैक किया गया और नगर निकायों ने उसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी निभाई। इसके साथ ही जिले में हर तरह की पॉलीथिन थैली, डिस्पोजेबल बर्तन, व अन्य प्लासिटक पैकिंग पर पूर्ण पांबदी लगा दी गई। कन्नूर के नेशनल इंस्टीट्यूट और फेशन टेक्नलाजी के छात्रों ने इवीनाबु बुनकर सहकारी समिति और कल्लेतेरे ओद्योगिक बुनकर सहकारी समिति के साथ मिल कर बहुत कम दाम पर बेहद आकर्शक व टिकाऊ थैले बाजार में डाल दिए। सभी व्यापारिक संगठनों, मॉल आदि ने इन थैलों को रखना षुरू  किया और आज पूरे जिले में कोई भी पन्नी नहीं मांगता है। खाने-पनीने वाले होटलों ने खाना पैक करवा कर ले जाने वालों को घर से टिफिन लाने पर छूट देना षुरू कर दिया और घर पर सप्लाई भी अब स्टील के बर्तनों में की जा रही है जो कि ग्राहक के घर जा कर खाली कर लिए जाते हैं।

नेशनल इनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है।  हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकलात है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा,  घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढो कर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है।  यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है। 
असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। हमरा बाथ्रूम और किचन तो कूड़े का बड़ा उत्पादनकर्ता बन गया है।

अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई  और खुशबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है।
केरल राज्य ने इस विकराल समस्या के समझा और पूरे राज्य में कचरा कम करने के कुछ कदम उठाए। इस दिशा में जारी दिशा-निर्देशों में सबसे ज्यादा सफल रहा है डिस्पोजेबल बॉल पेन के स्थान पर इंक पेन इस्तेमाल का अभियान। सरकार ने पाया कि हर दिन लाखेां रिफिल और एक समय इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पेन राज्य के कचरे में इजाफा कर रहे हैं। सो, कार्यालयीन आदेश निकाल कर सभी सरकारी दफ्तरों में बॉल पाईंट वाले पेनों पर पांबदी लगा दी गई। अब सरकारी खरीद में केवल इंक पेन खरीदे व इस्तेमाल किए जा रहे हैं। राज्य के स्कूल, कालेजों और चौराहों पर कचरा बन गए बॉल पेनों के एकत्रीकरण के लिए डिब्बे लगाए गए हैं। कई जिलों में एक दिन में पांच लाख तक बेकार प्लास्टिक पेन एकत्र हुए। इस बीच इंक पेन और ष्याही पर भी छूट दी जा रही है। अनुमान है कि यदि पूरे राज्य में यह येाजना सफल हुई तो प्रति दिन पचास लाख प्लास्टिक पेन का कचरा र्प्यावरण में मिलने से रह जाएगा। इन एकत्र पेनों को वैज्ञानिक तरीके से निबटाया भी जा रहा है।
राज्य सरकार ने इसके अलावा कार्यालयों में पैक्ड पानी की बोतलों के स्थान पर स्टील के बर्तन में पानी, सरकारी आयोजनों में फ्लेक्स बैनर और गुलदस्ते के फूलों को पनी में लपेटने पर रेक लगा दी है। प्रत्येक कार्यालय में कचरे को अलग-अलग करना, कंपोस्ट बनाना, कागज के कचरे को रिसाईकिल के लिए देना और बिजली व इलेक्ट्रानिक कचरे को एक. कर प्रत्येक तीन महीने में वैज्ञानिक तरीके से उसको ठिकाने लगाने की योजनाएं जमीनी स्तर पर बेहद कारगर रही है।
कचरा कम करने के ये प्रयास देश के लिए अनुकरणीय है।। इनके साथ ही विभिन्न् आयोजनों में फ्लेक्स की जगह कपड़े या कागज के बैनर लगवाना, उपहार लेते-देते समय उस पर पैकिंग कागज का इस्तेमाल ना करना, प्लास्टिक कवर के स्थान पर पुनर्चक्रित कागज के फाईल कवर ही प्रयोग में लाना, कुछ ऐसे उपाय है जो कि किसी भी श हर या कस्बे को कम कचरा उपजाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

Industry Must take responsibility of garbage from there products

उत्पादक का उत्तरदायित्व तय किए बगैर नहीं बचेगा पर्यावरण
पंकज चतुर्वेदी

भारत  में हर साल कोई 4.4 खरब लीटर पानी को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। यह बाजार 7040 करोड़ रूपए सालाना का हे। जमीन के गर्भ से या फिर बहती धारा से प्रकृति के आर्शीवाद स्वरूप निशुल्क मिले पान को कुछ मशीनों से गुजार कर बाजार में लागत के 160 गुणा ज्यादा भाव से बेच कर मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने वाली ये कंपनियां हर साल देश में पांच लाख टन प्लास्टिक बोतलों का अंबार भी जोड़ती हैं। षीतल पेय का व्यापार तो इससे भी आगे है और उससे उपजा प्लास्टिक कूड़ा भी यूंह ी इधर-उधर पड़ा रहता है। चूंकि ये बोतलें इस किस्म की प्लास्टिक से बनती हैं जिनका पुनर्चकण हो नहीं सकता, सो कबाड़ी इन्हें लेते नहीं हैं। या तो यह प्लास्टिक टूट-फूट कर धरती को बंजर बनाता है या फिर इसे एकत्र कर ईंट भट्टे या ऐसी ही बड़ी भट्टियों में झोंक दिया जाता है, जिससे निकलने वाला धुआं दूर-दूर तक लेागां का दम घोंटता है। ठीक यही हाल हर दिन लाखें की संख्या में हबिकने वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों , दूध की थैलियों, चिप्स आदि के पैकेट का है।  हमारे देश के नीति निर्धारक बढ़ते प्रदूषण के कारक, कारण निदान पर बड़े-बड़े आयोजन, परियोजनाएं और भाषण देते हैं, लेकिन पानी की बोतलों का छोटा सा तथ्य बानगी हैं कि देश के जल-जंगल-जमीन को संकट में डालने वाले उत्पादों को मुनाफा कमाने की तो छूट है लेकिन उनके उत्पाद से उपजे जहरीले कचरे के प्रति उनकी केाई जिम्मेदारी नहीं हैं।

असल में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के चलते नैसर्गिकता में आए बदलाव का मूल कारण हमारा प्रकृति पर निर्भरता से दूर होना है। विउंबना है कि कुछ संगठन व व्यापारी यह कहते नहीं अघाते कि प्लास्टिक के आने से पेड़ बच गए। हकीकत यह है कि पेड़ से मिलने वाले उत्पाद, चाहे वे रस्सी हों या जूट या कपड़ा, या कागज, इस्तेमाल के बाद प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। पेड़ का देाहन करें तो उसे फिर से उगा कर उसकी पूर्ति की जा सकती है, लेकिन एक बार प्लास्टिक धरती पर किसी भी स्वरूप में आ गई तो उसका नष्ट होना असंभव है और वह समूचे पर्यावरणीय-तंत्र को ही हानि पहुंचाती है। यह मसला अकेले पानी की बेातलों का ही नहीं है, खने-पीने की वस्तुओं से ले कर हर तरह के सामान की पैकिंग में प्लासिटक या थर्मोकाले का इस्तेमाल बेधडक है, लेकिन कोई भी निर्माता यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि इस्तेमाल होने वाली वस्तु के बाद उससे निकलने वाले इस जानलेवा कचरे का उचित निबटान करने कौन करेगा।
मोबाईल, कंप्यूटर व अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणें की कंपनियों का मुनाफा असल उत्पादन लागत का कई सौ गुणा होता है लेकिन करोड़ो-करोड़ विज्ञापनों में ख्सर्च करने वाली ये कंपनियां इसे उपजने वाले ई-कचरे की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं होतीं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांश सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है। इनसे निकलनेवाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देते हैं। फसलों और पानी के जरिए ये तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर बीमारियों को जन्म देते हैं।
रंगीन टीवी, माईक्रोवेव ओवन, मेडिकल उपकरण, फैक्स मशीन , टेबलेट, सीडी, एयर कंडीशनर, आदि को भी जोड़ लें तो हर दिन ऐसे उपकरणो में से कई हजार खराब होते हैं या पुराने होने के कारण कबाड़े में डाल दिए जाते हैं। ऐसे सभी इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। इस कबाड़ को भगवान भरोसे प्रकृति को नष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही नहीं ऐसे नए उपकरण खरीदने के दौरान पैकिंग व सामान की सुरक्षा के नाम पर कई किलों थर्मोंकोल व पॉलीथीन का इस्तेमाल होता है जोकि उपभोक्ता कूड़े में ही फैंकता है। क्या यह अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए  िकइस तरह का पैकेजिंग मटेरियल कंपनी  खुद तत्काल उपभौकता से वापिस ले ?
इन दिनों बड़े जोर-शोर से ई-रिक्शे को पर्यावरण-मित्र बता कर प्रचरित किया जा रहा हे। इसने साईकिल रिक्शों को निगलना भी शुरू कर दिया है। यह बात दीगर है कि ई-रिक्श को विदेश से मंगवाने व उसे बेचने में चूंकि कई ताकतवर राजनेतओं के व्यावसायिक हित है सो यह नहीं बताया जा रहा कि ई-रिक्शेे के महत्वपूर्ण तत्व बैटरी के कारण देश का जल और जमीन तेजी से बंजर हो रही हे। औसतन हर साल एक रिक्शे की बैटरी के चलते दो लीटर तेजाब वाला पानी या तो जमीन पर या फिर नालियों के जरिये नदियों तक जा रहा है। हर साल खराब बैटरियों के कारण बड़ी मात्रा में सीसा धरती को बेकार कर रहा है। ई7रिक्श बे कर खासी कमाई करने वले उस रिक्शे की चार्जिंग, उसकी बैटरी की पर्यावरण-मित्र देखभाल की कहीं जिम्मेदारी नहीं लेते। ठीक यही हाल देश के सबसे बड़े व्यवसायों में से एक ‘आटोमोबाईल क्षेत्र’ का है। कंपनियों जमे कर वाहन बेच रही हैं, लेकिन ईंधन से उपजने वाले प्रदूषण, खराब वाहनों  या पुराने वाहनों को चलने से प्रतिबंधित करने जैसे कार्यों के लिए कोई कदम नहीं उठातीं । हर साल करोड़ों टायर बेकार हो कर जलाए जा रहे हैं और उनका जहरीला धुआं परिवेश को दूषित कर रहा है, लेकिन केाई भी टायर कंपनी पुराने टायरों के सही तरीके से निबटान को आगे नहीं आती।
यह तो किसी छिपा नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए लिए करों से उनका खजाना जरूर भरा हो, कभी पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदम तो उठे नहीं। भारत जैसे विशाल और दिन-दुगनी, रात चैागुनी प्रगति कर रहे उपभोक्तावादी देश में अब अनिवार्य हो गया है कि प्रत्येक सामान के उत्पादक या निर्यातक को यह जिम्मेदारी लेने को बाध्य किया जाय कि उसके उत्पाद से उपजे कबाड़ या प्रदूषण के निबटारे की तकनीकी और जिम्मेदारी वह स्वयं लेगा। यह कहां तक नैतिक व न्यायाचित है कि कंपनियां मोबाईल, कार, पानी बेच कर मुनाफा कमाएं और उससे निकले प्रदूषण से समाज व सरकार जूझे ।

रविवार, 3 दिसंबर 2017

Bundelkhand again tends to drought



फिर सूखे की ओर बुंदेलखंड

बुंदेलखंड की असली समस्या अल्पवर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों से, पीढ़ियों से रही है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीना जानते थे। पर आधुनिकता के अंधड़ में पारंपरिक जल-प्रबंधन नष्ट हो गया और उसकी जगह सूखा व सरकारी राहत ने ले ली। इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं बल्कि यहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है।

बुंदेलखंड के गांवों के लोग पलायन कर रहे हैं- पानी की कमी के चलते। अगली बरसात दस महीने दूर है और बुंदेलखंड से जल संकट, पलायन और बेबसी की खबरें आने लगी हैं। वैसे मध्यप्रदेश के तेईस जिलों की एक सौ दस तहसीलों को राज्य सरकार ने सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है, जिनमें बुंदेलखंड में आने वाले सभी जिले शामिल हैं। हालांकि इस घोषणा से सूखा प्रभावितों की दिक्कतों में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। असल में यहां सूखा पानी का नहीं है, पर्यावरणीय तंत्र ही सूख गया है। इस चक्र में जल संसाधन, जमीन, जंगल, पेड़, जानवर व मवेशी, पहाड़ और वहां के बाशिंदे, सभी शामिल हैं। इन सभी के क्षरण को रोकने के एकीकृत प्रयास के बगैर यहां के हालात सुधरेंगे नहीं।  टीकमगढ़ जिले के गांवों की चालीस फीसद आबादी अभी से महानगरों की ओर रोजगार के लिए पलायन कर चुकी है। छतरपुर, दमोह, पन्ना के हालात भी लगभग ऐसे ही हैं। असल में इस इलाके में जीविका का मूल जरिया खेती है, और खेती बरसात पर निर्भर है। बीते दस सालों में यह आठवां साल है जब औसत से बहुत कम बरसात से यहां की धरती रीती रह गई है। अनुमान है कि मप्र के हिस्से के बुंदेलखंड में कुल 30 लाख हैक्टर जमीन है जिसमें से 24 लाख हैक्टर खेती के लायक है। लेकिन इसमें से सिंचाई की सुविधा महज चार लाख हैक्टर को ही उपलब्ध है। केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि बुंदेलखंड में बरसात का महज दस फीसद पानी जमा हो पाता है। शेष पानी बड़ी नदियों में बह कर चला जाता है।
असल में यहां की पारंपरिक जल-संचय व्यवस्था का दुश्मन यहीं का समाज बना है। बुंदेलखंड के सभी गांवों, कस्बों, शहरों की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है- चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैयां और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूंद संरक्षित हो जाती थी। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को, सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे-बचे तालाब शहरों की गंदगी को ढोने वाले नाबदान बन गए। बुंदेलखंड का कोई गांव-कस्बा ले लें, हर जगह चार दशक पहले की सीमा तय करने वाले पहाड़ों पर जमकर अतिक्रमण हुआ। छतरपुर में तो पहाड़ों पर दो लाख से ज्यादा आबादी बस गई। पहाड़ उजड़े तो उसकी हरियाली भी गई। और इसके साथ ही पहाड़ पर गिरने वाले पानी की बूंदों को संरक्षित करने का गणित भी गड़बड़ा गया। जो बड़े पहाड़ जंगलों में थे, उनको खनन माफिया चाट गया। आज जहां पहाड़ होना था, वहां गहरी खाइयां हैं। पहाड़ उजड़े तो उनकी तली में सजे तालाबों में पानी कहां से आता? इस तरह गांवों की अर्थव्यवस्था का आधार कहलाने वाले चंदेलकालीन तालाब सामंती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे बुंदेलखंड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहां न तो कल-कारखाने हैं और न ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहां का जीवनयापन टिका हुआ है।
यहां मवेशी न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार होते हैं, बल्कि उनके खुरों से जमीन का बंजरपन भी समाप्त होता है। सूखे के कारण सख्त हो गई भूमि पर जब गाय के पग पड़ते हैं तो वह जल सोखने लायक भुरभुरी होती है। विडंबना है कि समूचे बुंदेलखंड में सार्वजनिक गोचर भूमियों पर जमकर कब्जे हुए और आज गोपालकों के सामने पेट भरने का संकट है, तभी इन दिनों लाखों-लाख गायें सड़कों पर आवारा घूम रही हैं। जब तक गोचर, गाय और पशुपालक को संरक्षण नहीं मिलेगा, बुंदेलखंड की तकदीर बदलने से रही। कभी बुंदेलखंड के पैंतालीस फीसद हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर छह प्रतिशत रह गई है। छतरपुर सहित कई जिलों में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी भी दो सौ किलोमीटर दूर से मंगवानी पड़ रही है। यहां के जंगलों में रहने वाले सौर, कौंदर, कौल और गोंड आदिवासियों की यह जिम्मेदारी होती थी कि वे जंगल की हरियाली बरकरार रखें। ये आदिवासी वनोपज से जीविकोपार्जन चलाते थे, सूखे-गिरे पेड़ों को र्इंधन के लिए बेचते थे। लेकिन आजादी के बाद जंगलों के स्वामी आदिवासी वनपुत्रों की हालत बंधुआ मजदूर से बदतर हो गई। ठेकेदारों ने जमकर जंगल उजाड़े और सरकारी महकमों ने कागजों पर पेड़ लगाए। बुंदेलखंड में हर पांच साल में दो बार अल्प वर्षा होना कोई आज की विपदा नहीं है। फिर भी जल, जंगल, जमीन पर समाज की साझी भागीदारी के चलते बुंदेलखंडी इस त्रासदी को सदियों से सहजता से झेलते आ रहे थे।
बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों से, पीढ़ियों से रही है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीना जानते थे। पर आधुनिकता के अंधड़ में पारंपरिक जल-प्रबंधन नष्ट हो गया और उसकी जगह सूखा व सरकारी राहत ने ले ली। अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इंतजार अफसरों, नेताओं सभी को होता है! लेकिन प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होते आ रहे इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं बल्कि यहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है। इलाके में पहाड़ कटने से रोकना, पारंपरिक बिरादरी के पेड़ों वाले जंगलों को सहेजना, पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिए मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये पांच उपचार बुंदेलखंड की तकदीर बदल सकते हैं।
यदि बुंदेलखंड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहां के तालाबों, जंगलों और गोचर का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाबों को सरकार की बनिस्बत समाज की संपत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। इसके लिए ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थायी संगठन बनाने होंगे। दूसरा, इलाके के पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहुंचाने के लिए उसके रास्ते में आए अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुंदेलखंड में बेतवा, केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियां उथली हो गई हैं। दूसरे, उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। इन नदियों पर छोटे-छोटे बांध बांधकर या नदियों को पारंपरिक तालाबों से जोड़ कर पानी रोका जा सकता है। हां, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रुपए की योजना पर फिर से विचार करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बुंदेलखंड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी। यह क्षेत्र जल संकट से निबटने में स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के मद््देनजर परियोजनाएं तैयार की जाएं। विशेषकर यहां के पारंपरिक जल-स्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाए। यदि बुंदेलखंड के विकास का मॉडल नए सिरे से नहीं बनाया गया तो न सूरत बदलेगी और न ही सीरत।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

Migration for employments turning cities in slum

गांवो से बढ़ते पलायन के कारण बढ़ते ‘‘अरबन स्लम’’
पंकज चतुर्वेदी

‘आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी किसको कहा जा सकता है ?’ यदि इस सवाल का जवाब ईमानदारी से खोजा जाए तो वह होगा -कोई पचास करोड़ लोगों का अपने पुश्तैनी घर, गांव, रोजगार से पलायन। और ‘आने वाले दिनों की सबसे भीशण त्रासदी क्या होगी ?’ आर्थिक-सामाजिक ढ़ांचे में बदलाव का अध्ययन करें तो जवाब होगा- पलायन से उपजे षहरों का --अरबन-स्लम’ में बदलना। देश की लगभग एक तिहाई आबादी  31.16 प्रतिशत अब षहरों में रह रही हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर षहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब 37 करोड 70 लाख लोग षहरों के बाशिंदे हैं । सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में षहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ जबकि गांवंों की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी। और अब 16वीं लोकसभा के चुनाव में दोनों बड़े दलों ने अपने घोशणा पत्रों में कहीं ना कहीं नए षहर बसाने की बात कही है।
देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहंुच गया है जबकि खेती की भूमिका दिनो-दिन घटते हुए 15 प्रतिशत रह गई है। जबकि गांवोे की आबादी अभी भी कोई 68.84 करोड़ है यानी देश की कुल आबादी का दो-तिहाई। यदि आंकड़ों को गौर से देखें तो पाएंगे कि देश की अधिकांश आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी षहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है। यही कारण है कि गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट,  शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी  है और लोगों बेहतर जीवन की तलाश में षहरों की ओर आ रहे हैं। षहर बनने की त्रासदी की बानगी है सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश । बीती जनगणना में यहां की कुल आबादी का 80 फीसदी गांवों में रहता था और इस बार यह आंकड़ा 77.7 प्रतिशत हो गया। बढ़ते पलायान के चलते  2011 में राज्य की जनसंख्या की वृद्धि 20.02 रही , इसमें गांवों की बढौतरी 18 प्रतिशत है तो षहरों की 28.8। सनद रहे पूरे देश में षहरों में रहने वाले कुल 7.89 करोड परिवारों में से 1.37 करोड झोपड़-झुग्गी में रहते हैं और देश के 10 सबसे बड़े षहरी स्लमों में मेरठ व आगरा का षुमार है। मेरठ की कुल आबादी का 40 फीसदी स्लम में रहता है, जबकि आगरा की 29.8 फीसदी आबादी झोपड-झुग्गी में रहती है।
राजधानी दिल्ली में जन सुविधाएं, सार्वजनिक परिवहन और सामाजिक ढांचा - सब कुछ बुरी तरह चरमरा गया है। कुल 1483 वर्ग किमी में फैले इस महानगर की आबादी कोई सवा करोड़ से अधिक हो चुकी है। हर रोज तकरीबन पांच हजार नए लोग यहां बसने आ रहे हैं। अब यहां का माहौल और अधिक भीड को झेलने में कतई समर्थ नहीं हैं। ठीक यही हाल देश के अन्य सात महानगरों, विभिन्न प्रदेश की राजधानियों और औद्योगिक वस्तियों का है। इसके विपरीत गांवों में ताले लगे घरों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था का कभी मूल आधार कही जाने वाली खेती और पशु-पालन के व्यवसाय पर अब मशीनधारी बाहरी लोगों का कब्जा हो रहा है। उधर रोजगार की तलाश में गए लोगों के रंगीन सपने तो चूर हो चुके हैं, पर उनकी वापसी के रास्ते जैसे बंद हो चुके हैं। गांवों के टूटने और शहरों के बिगडने से भारत के पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संस्कारों का चेहरा विद्रूप हो गया है। परिणामतः भ्रष्टाचार, अनाचार, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है।

षहर भी  दिवास्वप्न से ज्यादा नही ंहै, देश के दीगर 9735 षहर भले ही आबादी से लबालब हों, लेकिन उनमें से मात्र 4041 को ही सरकारी दस्तावेज में षहर की मान्यता मिली हे। षेश 3894 षहरों में षहर नियोजन या नगर पालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़ कर बेढब अधपक्के मकान खड़े कर दिए गए हैं जहां पानी, सड़क, बिजली आदि गांवों से भी बदतर हे। सरकार कारपोरेट को बीते पांच साल में कोई 21 लाख करोड़ की छूट बांट चुकी है। वहीं हर साल पचास हजार करोड़ कीमत की खाद्य सामग्री हर साल माकूल रखरखाव के अभाव में नश्ट हो जाती है और सरकार को इसकी फिकर तक नहीं होती। बीते साल तो सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका कि यदि गोदामों में रखो अनाज को सहजे नहीं सकते हो तो उसे गरीबों को बांट दो, लेकिन इसके लिए हुक्मरान तैयार नहीं है। विकास और सबसिडी का बड़ा हिस्सा षहरी आबादी के बीच बंटने से विशमता की खाई बड़ी होती जा रही है।
शहरीकरण की त्रासदी केवल वहां के बाशिंदें ही नहीं झेलते हैं, बल्कि उन गांवों को अधिक वेदना सहनी होती है, जिन्हें उदरस्थ कर शहर के सुरसा-मुख का विस्तार होता है। शहर, गांवों की संस्कृति, सभ्यता और पारंपरिक सामाजिक ढांचे के क्षरण के तो जिम्मेदार होते ही हैं, गांव की अर्थनीति के मूल आधार खेती को चौपट भी करते हैं। किसी शहर को बसाने के लिए आस-पास के गांवों के खेतों की बेशकीमती मिट्टी को होम किया जाता है। खेत उजड़ने पर किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर मिट्टी की तात्कालिक अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक ऐश करता है। फिर आने वाली पीढियों के लिए दुर्भाग्य के दिन शुरु हो जाते हैं।
कोई एक दशक पहले दिल्ली नगर निगम द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट महान चिंतक कार्ल मार्क्स की उस चर्चित उक्ति की पुष्टि करती है, जिसमें उन्होने कहा था कि अपराथ, वेश्यावृति तथा अनैतिकता का मूल कारण भूख व गरीबी होता है। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं अन्य महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों के कारणों का खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं।

गांवों में ही उच्च या तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज खाद और  दवाओं को प्रोत्साहित करना, ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके चलते गांवों से युवाओं के पलायन को रोका जा सकता है । इस राष्ट्रीय समस्या के निदान में पंचायत समितियां अहमं भूमिका निभा सकती हैं । पंचायत संस्थाओं में आरक्षित वर्गो की सक्रिय भागीदारी कुछ हद तक सामंती शोषण पर अंकुश लगा सकती , जबकि पानी ,स्वास्थ्य, सड़क, बिजली सरीखी मूलभूत जरूरतेंा की पूर्ति का जिम्मा स्थानीय प्रशासन को संभालना होगा ।
विकास के नाम पर मानवीय संवेदनाओं में अवांछित दखल से उपजती आर्थिक विषमता, विकास और औद्योगिकीकरण की अनियोजित अवधारणाएं और पारंपरिक जीवकोपार्जन के तौर-तरीकेां में बाहरी दखल- शहरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित करने वाले तीन प्रमुख कारण हैं । इसके लिए सरकार और समाज दोनो को साझा तौर पर आज और अभी चेतना होगा ।, अन्यथा कुछ ही वर्षों में ये हालात देश की सबसे बड़ी समस्या का कारक बनेंगें - जब प्रगति की कहानी कहने वाले महानगर बेगार,लाचार और कुंठित लोगों से ठसा-ठस भरे होंगे, जबकि देश का गौरव कहे जाने वाले गांव मानव संसाधन विहीन पंगु होंगे ।
पंकज चतुर्वेदी
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