तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

Indian memories in Cairo, Ejypy


कायरो में भारतीय निशानियाँ
पंकज चतुर्वेदी

इजिप्ट  यानि मिस्र की राजधानी काहिरा या कायरो अरब - दुनिया का सबसे बड़ा शहर है, नब्बे लाख से अधिक आबादी का, यहाँ इसाईओं की बड़ी आबादी है, कोई बारह फीसदी, लेकिन हिन्दू-सिख-जैन-बौध अर्थात भारतीय मूल के धर्म अनुयायी दीखते नहीं हैं, या तो नौकरी करने वाले या फिर अस्थायी रूप से लिखने-पढने आये लोग हेई गैर मुस्लिम-ईसाई मिलते हैं , ऐसा नहीं कि वहां हिन्दू धर्म के बारे में अनभिज्ञता है. वहां हिंदी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय हैं और हर दूसरा आदमी यह जानने को जिज्ञासु रहता है कि हिन्दू महिलाएं बिंदी या मांग क्यों भरती हैं, भारत का भोजन या संस्कार क्या-क्या हैं . एक युवा ऐसा भी मिलने आया कि उसके परबाबा सिखा थे और काम के सिलसिले में मिस्र आये थे , यहाँ उन्होंने इस्लाम ग्रहण कर लिया . एक युवा ऐसा भी मिला जिसका नाम नेहरु अहमद गांधी है, इसके बाबा का नाम गांधी है और बाबा ने ही भारत के प्रति दीवानगी के चलते अपने पोते का नाम नेहरु रखा.  इजिप्त की राजधानी कायरो के नए बने उपनगर हेलियोपोलिस में एक हिन्दू मंदिर की संरचना और ग्यारवीं सदी के पुराने सलाउद्दीन के किले यानि सीटा ड़ेल में गुरु नानकदेव के प्रवचन देने और ठहरने की कहानियाँ यहाँ भारतीय धर्म- आध्यात्म के चिन्हों को ज़िंदा रखे हैं .
सीटादेल

सीटादेल का किला 

इस स्थान पर गुरु महाराज ठहरे थे 



हेलियोपोलिस में मुख्य मार्ग, जिसे वहां रिंग रोड भी कहते हैं ; पर एक विशाल संरचना हिन्दू मंदिर जैसा भवन दिखता है , असल में यह मंदिर नहीं है,यह एक बड़े ठेकेदार और व्यापारी द्वारा बनवाया गया उसका आवास था, इसे ले कर काहिरा में कई अफवाहें हैं,- इसे लोग भुतहा महल मानते हैं, इसमें बुरी आत्माओं का वास, असगुन आदि कहा जाता है और आज इसमें कोई जाता नहीं हैं , हालांकि इन दिनों मिस्र की सरकार इसकी मरम्मत करवा रही हैं .
इस स्थान को "बेरोंन इम्पेन पेलेस या ला पलासिया हिन्दुओ " कहते हैं एडवर्ड लुईस जोजेफ एम्पेन ( १८५२-१९२९ एक स्कूल मास्टर का सौतेला बेटा था , वह अपनी काबिलियत के बल पर यूरोप का सबसे बड़ा निर्माण ठेकेदार बना, उसने बेल्जियम और फ़्रांस में रेलवे लायीं बिछायी और पेरिस मेट्रो का डिजाईन भी उन्ही का था . 

१९०५ के आसपास वह काहिरा में रेलवे लायीं के ठेके के लिए आया, ठेका उसके हाथ लगा नहीं, फिर उसने पुराने काहिरा से कोई दस किलोमीटर दूर रेगिस्तान में एक अत्याधुनिक शहर "हेलियोपोलिस " का निर्माण शुरू किया, इसमें बिजली, पानी कि सप्लाई, सीवर, पार्क आदि थे , तभी सने अपने निवास के लिए फ्रांस के मशहूर आर्किटेक अलेक्जेंडर मार्कल को काम सौंपा, सन १९०७ से १९११ के बीच इसे एक हिन्दू मंदिर की तरह निर्मित किया गया, इसमें कृष्ण, शिव, सर्प, गज , गरुड़ आदि की प्रतिमायें  गढ़ी गयी, कलाकार इंडोनेशिया से बुलाये गए थे . लाल पत्थर से निरिमित  यह तीन मंजिला शानदार इमारत कई साल तक लुईस जोजेफ एम्पेन और उनके बेटे का घर रही, प्रथम विश्व युध्ध से पहले बेल्जियम के किंक एडवर्ड और रानी भी यहाँ आ कर रुके थे , सन १९५७ में सऊदी अरबिया के निवासी एलेक्स्जेक और रेडा ने इसे ख़रीदा लेकिन तब से यह बियावान हैं .

आज इसमें चमगादड़ , आवारा कुत्ते ही रह गए हैं हालांकि इसके सौ साल होने पर मिस्र के संस्कृति मंत्रालय ने एक आयोजन भी किया था . अभी  इसकी मरम्मत का कार्य शुरू हुआ है, कहा जा रहा है कि यहाँ सरकार एक संग्रहालय शुरू कर सकती हैं , बहरहाल , इसे मंदिर मत मानना लेकिन इसमें मंदिर दिखेगा जरुर. काश भारत सरकार इस स्थान को ले कर यहाँ भारतीय आध्यात्म, धर्म का संग्रहालय बना ले, क्योंकि कायरो में सारी  दुनिया के पर्यटक आते हैं और जाहिर है कि यह स्थान उन्हें भारत की और प्रेरित करेगा .




गुरु नानक देव भी काहिरा , मिस्र आये थे लेकिन आज उनकी स्मृति के कोई निशाँ नहीं हैं, सन 1519 में कर्बला, अजारा होते हुए नानक जी और भाई मर्दाना कैकई नामक आधुनिक शहर में रुके थे, यह मिस्र का आज का काहिरा या कायरो ही है, उस समय यहाँ का राजा सुल्तान माहिरी करू था, जो खुद गुरु जी से मिलने आया था और उन्हें अपने महल में ठहराया था, पहले विश्व युध्ध में सूडान लड़ने गयी भारतीय फौज कि सिख रेजिमेंट के २० सैनिक उस स्थान पर गए भी थे जहां गुरु महाराज ठहरे थेकहते हैं कि यह स्थान आज के मशहूर पर्यटन स्थल सीटादेल के करीब मुहम्मद अली मस्जिद के पास कहीं राज महल में है, इस महल को सुरक्षा की द्रष्टि से आम लोगों के लिए बंद किया हुआ है, इसमें एक चबूतरा है जिसे – अल-वली-नानक कहते हैं, यहीं पर गुरु नानक ने अरबी में कीर्तन और प्रवचन किया था .  सीटाडेल में इस समय किले के बड़े हिस्से को बंद किया हुआ है. यहाँ पुलिस और फौज के दफ्तर हैं किले के बड़े हिस्से को सेना, पुलिस और जेल के म्यूजियम में बदल दिया गया है. भारत, सिख मत और गुरु नानक देव की स्मृतियों के लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण स्थान अहि और भारत सरकार को इस स्थान पर गुरु नानक देव के स्थल पर विशेष प्रदर्शनी के लिए इजिप्ट सरकार से बात करनी ही होगी, जब इजिप्ट सरकार को महसूस होगा कि इससे सिख पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तो निश्चित ही वह इसके लिए तैयार होगी, क्योंकि इजिप्ट की अर्थ व्यवस्था का आधार पर्यटन ही हैं . काश भारत सरकार इजिप्त सरकार से बात कर इसे सिखों के पवित्र स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए कार्यवाही करें . 
हालाँकि कायोर के मौलाना आजाद भारतीय सांस्क्रतिक केंद्र में हिंदी प्रशिक्षण कार्यक्रम और एनी गतिविधियों के जरिये बहुत से लोग भारत से जुड़े हैं, अल अज़हर यूनिवर्सिटी में भी भारत के सैंकड़ों छात्र हैं , लेकिन अभी यहाँ भारतीयता के लिए कुछ और किया जाना अनिवार्य है, वर्ना मिस्र की नयी पीढ़ी भारत को महज फिल्मों या टीवी सीरियल के माध्यम से अपभ्रंश के रूप में ही पहचानेगी .

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

car becoming disaster for India



कार से बेजार होती जिंदगी


पंकज चतुर्वेदी

हाल ही में दिल्ली के प्रगति मैदान और ग्रेटर नोएडा में गाड़ियों का सालाना मेला आटो एक्सपो संपन्न हुआ। जिस महानगर की छह लेन की सड़कें भी कारों का बोझ नहीं संभाल पा रही हैं वहां के लाखों बाशिंदे कारों के प्रति अपनी दीवानगी दिखाने 45 किलोमीटर दूर ग्रेटर नोएडा पहुंच गए। क्या जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जहरीली हवा से हताश शहर के लिए यह एक स्वाभाविक या अनिवार्य व्यावसायिक गतिविधि या फिर मनोरंजन स्थल था? क्या हमारे यहां इस तरह की कार की नुमाइश या प्रोत्साहन जरूरी है?
‘कार के मालिक हर साल अपने जीवन के 1600 घंटे कार में बिताते हैं, चाहे कार चल रही हो या खड़ी हो। कभी गाड़ी की पार्किंग के लिए जगह तलाशनी होती है तो कभी पार्किंग से बाहर निकालने की मशक्कत, या फिर ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा होना पड़ता है। पहले व्यक्ति कार खरीदने के लिए पैसे खर्च करता है, फिर उसकी किश्तें भरता है। उसके बाद अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा पेट्रोल, बीमा, टैक्स, पार्किंग, जुर्माने, टूटफूट पर खर्च करता रहता है। इनसान की प्रतिदिन जाग्रत अवस्था 16 घंटे में से चार घंटे सड़क पर कार में होती है। हर कार मालिक 1600 घंटे कार के भीतर बिताने के बाद भी सफर करता है मात्र 7500 मील, यानी एक घंटे में पांच मील।’ सियाम यानी सोसायटी आफ इंडियन आटोमोबाइल मेन्यूफेक्चरर्स के हालिया आंकड़े के अनुसार पिछले साल की तुलना में इस साल नवंबर में 10.39 फीसदी कारें ज्यादा बिकीं। दूसरी ओर दिल्ली के माहौल को दमघोटू बनाने का पूरा आरोप कारों पर आ रहा है।
सुदूर कस्बे भी कारों की दीवानगी के शिकार हैं जहां देश का बड़ा हिस्सा खाने-पीने की चीजों की बेतहाशा महंगाई से हलकान है वहीं सियाम के मुताबिक आने वाले तीन-चार सालों में भारत में कार के क्षेत्र में कोई 25 हजार करोड़ का विदेशी निवेश होगा। हमारे देश की विदेशी मुद्रा के भंडार का बड़ा हिस्सा पेट्रो पदार्थ खरीदने में व्यय हो रहा है। भले ही कार कंपनियां आंकड़ें दें कि चीन या अन्य देशों की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति कार की संख्या बहुत कम है, लेकिन आए दिन लगने वाले जाम के कारण उपज रही अराजकता इस बात की साक्षी है कि हमारी सड़कें फिलहाल और अधिक वाहनों का बोझ झेलने में सक्षम नहीं हैं। बीते साल भारत सरकार ने पेट्रोल-डीजल व अन्य ईंधन पर 1,03,000 करोड़ की सब्सिडी दी है। भारत जैसेे देश में ऊंची जीवनशैली पाने के लिए कीमत क्या चुकानी पड़ रही है। दिल्ली और उसके आसपास, जहां जमीन-जायदाद की कीमतें बुलंदी पर हैं, अपने पुश्तैनी खेत बेचकर मिले एकमुश्त धन से कई-कई कारें खरीदने और फिर उन कारों के संचालन में अपनी जमापूंजी लुटाकर कंगाल बनने के हजारों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे।
दरअसल, कारों का संसार आबाद करने की बड़ी कीमत उन लोगों को भी उठानी पड़ती है, जिनका कार से कोई वास्ता नहीं है। दुर्घटनाएं, असामयिक मौत व विकलांगता, प्रदूषण, पार्किंग व ट्रैफिक जाम व इसमें बहुमूल्य जमीनों का दुरुपयोग; ऐसी कुछ विकराल समस्याएं हैं जो कि कार को आवश्यकता से परे विलासिता की श्रेणी में खड़ा कर रही हैं। देश का बेशकीमती विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा महज दिखावों के निहितार्थ दौड़ रही कारों पर खर्च करना पड़ रहा है।

दिल्ली में कारों से सफर करने वाले बामुश्किल 15 फीसदी लोग होंगे लेकिन ये सड़क का 80 फीसदी हिस्सा घेरते हैं। यहां रिहायशी इलाकों का लगभग आधा हिस्सा कारों के कारण बेकार हो गया है। कई सोसायटियों में कार पार्किंग की कमी पूरा करने के लिए ग्रीन बेल्ट को ही उजाड़ दिया गया है। घर के सामने कार खड़ी करने की जगह की कमी के कारण अब लोग दूर-दूर बस रहे हैं।
कारों की बढ़ती संख्या सड़कों की उम्र घटा रही है। मशीनीकृत वाहनों की आवाजाही अधिक होने पर सड़कों की टूटफूट व घिसावट बढ़ती है। वाहनों के धुएं से हवा जहरीली होने व ध्वनि प्रदूषण से लोगों की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके बावजूद सरकार की नीतियां कार खरीदी को बढ़ावा देने वाली हैं। आज जेब में एक रुपया न होने पर भी कार खरीदने के लिए कर्ज देने वाली संस्थाएं व बैंक कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली, कस्बे-कस्बे तक पहुंच गये हैं। विदेशी निवेश के लालच में हम कार बनाने वालों को आमंत्रित तो कर रहे हैं लेकिन बढ़ती कारों के खतरों को जानने के बावजूद उसका बाजार भी यहीं बढ़ा रहे हैं।

कार पुलिस के लिए कानून-व्यवस्था का नया संकट बनती जा रही है। कारों की चोरी, दुर्घटनाएं, कारों के टकराने से होने वाले झगड़े; पुलिस की बड़ी ऊर्जा इनमें खर्च हो रही है। एक घर में एक से अधिक कार रखने पर कड़े कानून, सड़क पर नियम तोड़ने पर सख्त सजा, कार खरीदने से पहले उसकी पार्किंग की समुचित व्यवस्था होने का भरोसा प्राप्त करने जैसे कदम कारों की भीड़ रोकने में सक्षम हो सकते हैं।

सभी के लिए चेतावनी है केपटाउन

केपटाउन में पानी की भयंकर किल्लत पूरी दुनिया के लिए खतरे का संकेत है। यदि इससे सही सबक नहीं लिया गया तो आने वाले वक्त में हालात बद से बदतर हो सकते हैं

Dainik Jagran 22 feb 2018

दुनिया के खूबसूरत शहरों में से एक के तौर पर मशहूर दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर का वर्तमान जल संकट भारत के महानगरों के लिए बड़ी चेतावनी है। पिछले दिनों भारत की क्रिकेट टीम जब वहां मैच खेलने गई तो उन्हें होटल के कमरे में शॉवर से स्नान के लिए केवल दो मिनट दिए गए। जनता को पहले ही बता दिया गया है कि अप्रैल महीने के बाद ‘जीरो डे’ के लिए तैयार रहें। जीरो डे यानी सभी घरों में पानी की सप्लाई बंद। शहर में कोई 200 सार्वजनिक स्थल बनेंगे जहां से लोग अपनी जरूरत का पानी ले सकेंगे। हालांकि इस समय भी उस शहर में ‘जल-आपातकाल’ लागू है। अधिकांश रिहाइशी इलाकों में पुलिस व सेना की निगरानी में पानी बांटा जा रहा है। हाथ धोने के लिए केवल सेनेटाइजर का इस्तेमाल हो रहा है। कार धोने और ऐसे ही कई कार्यो पर पाबंदी है। लोगों को हफ्ते में दो दिन से ज्यादा नहाने से रोका गया है। इसका उल्लंघन करने पर भारी जुर्माने और जेल का प्रावधान है।1केपटाउन शहर की आबादी कोई 43 लाख है और हर दिन एक लाख से ज्यादा पर्यटक वहां होते हैं। समुद्र तट पर बसे उस शहर के बाग-बगीचे, हरियाली सबकुछ इन दिनों संकट में हैं। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव इस इलाके में सबसे ज्यादा देखने को मिल रहा है। अभी दो दशक पहले तक यहां सालाना बरसात औसतन 600 मिलीमीटर होती थी, जो कि देखते-देखते 425 मिलीमीटर पर आ गई। पिछले तीन साल से वहां सिर्फ 153, 221 और 327 मिलीमीटर ही बारिश हुई है। यही नहीं एक तो बरसात देर से हो रही है, दूसरा बरसात के दिन भी घट गए हैं। इससे जल-संरक्षण उपाय बेकार हो गए हैं। शहर को 41 फीसद पानी सप्लाई करने वाले दी वाटर स्कल्फ में मात्र 15.7 प्रतिशत जल बचा है। हालांकि इस भीषण संकट के लिए केपटाउन के बाशिंदे भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। जहां दुनिया में प्रति व्यक्ति औसत जल खपत प्रति दिन 173 लीटर है वहीं केपटाउन में यह आंकड़ा 235 लीटर का है। दूसरा वहां सीवर से निकले महज 60 फीसद पानी का ही परिशोधन होता है। सबसे बड़ा संकट वहां की जल सप्लाई करने वाली पाइपलाइन का है। खुद स्थानीय प्रशासन मानता है कि कोई 30 प्रतिशत पानी या तो लीकेज में बह जाता है या फिर लोग चोरी कर लेते हैं। सबसे बड़ी बात 1995 में 24 लाख आबादी वाला शहर अब 43 लाख के पार पहुंच रहा है, लेकिन इस अवधि में पानी को सहेजकर रखने की क्षमता में मात्र 15 फीसद की ही बढ़ोतरी हुई है। यही नहीं मौजूदा बांधों और जलाशयों में कई-कई मीटर गाद भर गई है, सो बरसात होने पर जो जलनिधियां लबालब भरी दिखती थीं, वे तनिक गरमी में ही सूखने लगती हैं। जल संकट के चलते सरकार ने वहां हर रोज पानी के निजी इस्तेमाल की प्रति व्यक्ति सीमा 87 से 50 लीटर कर दी है। अभी तो अस्पताल, सरकारी कार्यालयों और मंत्री-अफसरों के आवासीय इलाकों में कटौती नहीं हुई है, पर जल्द ही सारे शहर में यह हालात बन सकते हैं।1संयुक्त राष्ट्र ने आने वाले दिनों में दुनिया के जिन 11 शहरों में पानी के हालात केपटाउन जैसे होने की चेतावनी दी है, उसमें भारत का साइबर हब बेंगलुरु भी शामिल है, लेकिन दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, इंदौर, जयपुर और पटना के हालात भी इससे अलग नहीं हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कुछ इलाके इस बात पर गर्व करते नहीं अघाते हैं कि उनके घर पर ‘गंगा वाटर’ आता है। वह गंगा जल, जिसकी एक छोटी शीशी पूजा के करीब रखने में करोड़ों लोगों को पवित्रता का अहसास होता है। तनिक गौर करें, पवित्र मानकर आचमन करने वाले गंगाजल का हमारे घरों में शौच से लेकर कार साफ करने तक में इस्तेमाल होता है। भले ही कम बरसात होने पर सूखा, पलायन जैसे मसलों पर हमारे यहां सालों-साल सियासत होती रही है, लेकिन कभी कोई सवाल नहीं उठाता कि हम पेयजल का इस्तेमाल शौच या खेत में और गंदे पानी का इस्तेमाल नदी-तालाब आदि को दूषित करने में कर रहे हैं। और यही जल संकट का बड़ा कारण है। अभी जाड़े के दिन चल रहे हैं और बस्तर, बुंदेलखंड, तेलंगाना, मराठवाड़ा आदि अंचलों में पानी की कमी की खबरें आने लगी हैं। गांव के पटवारी, सरपंच और सयाने लोग उपलब्ध जल, आने वाले दिनों की मांग, भयंकर गरमी का सटीक आकलन रखते हैं, लेकिन सरकारी अमला इंतजार करता है कि जब प्यास व पलायन से हालात भयावह हों, तब कागजी घोड़े दौड़ाए जाएं। हमने अपने पारंपरिक जल संसाधनों की जो दुर्गति की है, जिस तरह नदियों के साथ खिलवाड़ किया है, खेतों में रासायनिक खाद व दवा के प्रयोग से सिंचाई की जरूरत में इजाफा किया है, इसके साथ ही धरती का बढ़ता तापमान, भौतिक सुखों के लिए पानी की बढ़ती मांग सहित और भी कई कारक हैं जिनसे पानी की कमी तो होनी ही है। ऐसे में पूरे साल पूरे देश में कम पानी से बेहतर जीवन और जल-प्रबंधन, ग्रामीण अंचल में पलायन थामने और वैकल्पिक रोजगार मुहैया करवाने की योजनाएं बनाना अनिवार्य हो गया है।1इन सभी शहरों में केपटाउन की ही तरह बढ़ती आबादी, अनियोजित शहरीकरण, पारंपरिक जल-स्रोतों की दुर्गति, पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल, खराब पानी का ठीक से पुनर्चक्रण नहीं करना, जल का असमान वितरण आदि विसंगतियां मौजूद हैं। असल में केपटाउन के हालात भारत के लिए तो भयंकर चेतावनी हैं, क्योंकि हम भी जलवायु परिवर्तन की मार के चलते बरसात ही नहीं मौसम के अस्वाभाविक बदलाव को ङोल रहे हैं। साथ ही विकास के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़, बेशुमार कार्बन उत्सर्जन को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। यदि केपटाउन जैसा संकट हमारे यहां भी खड़ा हुआ तो लोगों को अपने गांव की ओर पलायन का भी रास्ता नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा समाज गांवों को पहले ही ‘उपेक्षितों, बुजुर्गो और मजबूरों’ के निवास स्थान के रूप में बदल चुका है। आज जरूरत है कि गांवों और कस्बों को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य के रूप में इतना सक्षम बनाया जाए कि लोगों का महानगर की ओर पलायन कम हो।1(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

water needs to be proper managed

जरूरत है जल प्रबंधन की 

.                                                                                            पंकज चतुर्वेदी


राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कुछ इलाके इस बात पर गर्व करते नहीं अघाते हैं कि उनके घर पर ‘गंगा वाटर’ आता है। वह गंगा जल जिसकी एक छोटी  शीशी पूजा के करीब रखने में करोड़ो लेागों को पवित्रता का अहसास होता है। तनिक गौर करें पवित्र मन कर आचमन करने वाले गंगा जल का हमारे घरों में शौच  से लेकर पोछा लगाने व कार साफ करने तक में इस्तेमाल हेाता है। भले ही कम बरसात होने पर सूखे, पलायन, खेत सूखने जैसे मसलों पर हमारे यहां सालों साल सियासत होती रही है, लेकिन कभी कोई सवाल नहीं उठाता कि हम पेयजल का इस्तेमाल शौच  या खेत में और गंदे पानी को इस्तेमाल नदी-तालाब आदि को दूषित  करने में कर रहे है। और यही जल संकट का बड़ा कारण है। अभी जाड़े के दिन चल रहे हैं और बस्तर, बुंदेलखंड , तेलंगाना मराठवाड़ा आदि अंचलों में पानी की कमी की खबरे आने लगी हैं। गांव के पटवारी, सरपंच और सयाने लोग उपलब्ध जल, आने वाले दिनों की मांग, भयंकर गरमी  का सटीक आकलन रखते हैं, लेकिन सरकारी अमला इंतजार करता है कि जब प्यास व पलायन से हालात भयावह हों,तब कागजी घोड़े दौड़ाए जाएं। हमने अपने पारंपरिक जल संसाधनों की जो दुर्गति की है, जिस तरह नदियों के साथ खिलवाड़ किया है, खेतों में रासायनिक खाद व दवा के प्रयोग से सिंचाई की जरूरत में इजाफा किया है, इसके साथ ही धरती का बढ़ता तापमान, भौतिक सुखों के लिए पानी की बढ़ती मांग और भी कई कारक हैं जिनसे पानी की कमी तो होना ही है। ऐसे में सारे साल, पूरे देश में, कम पानी से बेहतर जीवन और जल-प्रबंधन, ग्रामीण अंचल में पलायन थामने और वैकल्पिक रोजगार मुहैया करवाने की योजनाएं बनाना अनिवार्य हो गया है।
आंखें आसमान पर टिकी हैं, तेज धूप में चमकता साफ नीला आसमान! कहीं कोई काला-घना बादल दिख जाए इसी उम्मीद में आषाढ़ निकल गया। सावन में छींटे भी नहीं पड़े। भादो में दो दिन पानी बरसा तो, लेकिन गरमी से बेहाल धरती पर बूंदे गिरीं और भाप बन गईं। अब.... ? अब क्या होगा.... ?  यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है। देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि  करती है। खतरा यह है कि ऐसे जिलों की संख्या अब बढ़ती जा रही है। जलवायु परिवर्तन की मार हमारे देश पर पड़ना षुरू हो गई है और इस तरह अचानक अल्प बरसात या भी असमय भारी बारिश को झेलना ही होगा। दोनो हालात में हमारे यहां पीने और उसके बाद खेती के लिए पानी का संकट रहता है।
असल में इस बात को लेाग नजरअंदाज कर रहे हैं कि यदि सामान्य से कुछ बारिश भी हो और प्रबधन ठीक हो तो समाज पर इसके असर को गौण किया जा सकता है। एक तो यह जान लें कि पानी उलीचने की मशीनों ने पानी की सबसे ज्यादा बर्बादी की हे। जब आंगन में एक कुंआ होता था तो इंसान अपनी जरूरत की एक बाल्टी खींचता था और उसी से काम चलाता था। आज एक गिलास पानी के लिए भी हैंड पंप या बिजली संचालित मोटर का बटन दबा कर एक बाल्टी से ज्यादा पानी बेकार कर देता है। दूसरा शहरी नालियों की प्रणाली, और उनका स्थानीय नदियों में मिलना व उस पानी का सीधा समुद्र के खारे पान में घुल जाने के बीच जमीन में पानी की नमी को सहेज कर रखने के साधन कम हो गए हे।ं कुएं तो लगभग खतम हो गए, बावड़ी जैसी संरचनांए उपेक्षा की खंडहर बन गईं व तालाब गंदा पानी निस्तारण के नाबदान । जरा इस व्यवस्था को भी सुधारना होगा या यों कहं कि इसके लिए अपने अतीन व परंपरा की
ओर लौटना होगा।
जरा सरकारी घोशणा के बाद उपजे आतंक की हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाध्नों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। हां, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य केश क्राप ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थेाड़ा भी कम पान बरसने पर किसान रोता दिखता है। देश के उत्तरी हिस्से में नदियो में पानी  का अस्सी फीसदी जूमन से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में  यह आंकडा 90 प्रतिशत का है। जाहिर है कि षेश आठ महीनों में पानी की जुगाड़ ना तो बारिश से होती है और ना ही नदियों से। जाहिर है कि इन समस्याओं के लिए इंद्र की कम कृपा की बात करने वाले असल में अपनी नाकामियों का ठीकरा ऊपर वाले पर फोड़ देते हैं ।

कहने को तो सूखा एक प्राकृतिक संकट है, लेकिन आज विकास के नाम पर इंसान ने भी बहुत कुछ ऐसा किया है जो कम बारिश के लिए जिम्मेदार है। राजस्थान के रेगिस्तान और कच्छ के रण गवाह हैं कि पानी कमी इंसान के जीवन के रंगो को मुरझा नहीं सकती है। वहां सदियों से, पीढ़ियों से बेहद कम बारिश्श होती है। इसके बावजूद वहां लोगों की बस्तियांॅ हैं, उन लोगों का बहुरंगी लोक-रंग है। वे कम पानी में जीवन जीना और पानी की हर बूंद को सहेजना जानते हैं। सबसे बड़ी बात अब यह विचार करना होगा कि किन इलाकों में किस तरह की फसल हो या कौन सी परियोजनाए हों। अब मराठवाड़ा के लेाग महसूस कर रहे हैं कि जिस पैसे के लालच में उन्होंने गन्ने की अंधाधंुध फसल उगाई वही उन्हें प्यासा कर गया है। गन्ने में पानी की खपत ज्यादा होती है, लेकिन इलाके के ताकतवर नेताओं की चीनी मिलों के लिए वहां गन्ना उगवाया गया था।

चीन की राजधानी पेईचिंग के बहुमंजिला मकानों में तीन किस्म के पानी की सप्लाई होती है- एक पीने लायक पानी, यह सबसे महंगा होता है और सारे दिन में बामुश्किल एक घंटे आता है।दूसरा पानी रसोई व स्नान के मतलब का होता है, यह कुछ कम दाम पर और दिन में बारह घंटे तक सप्लाई होता है। तीसरे किस्म का पानी घरें से निकले जल को ही परिशोधित कर सप्लाई होता है, यह षौचालय, पौधे आदि के काम आता है।एक बेहतर प्रबंधन से एक तो वहां पीने के पानी का दुरूपयोग रूका हुआ है, दूसरा नालियों में गंदे पानी की मात्रा कम होती है क्योंकि प्रत्येक परिशोधित कर ही पानी को सीवर लाईन में डालता है।यह एक बानगी है जिसका पालन कर हमारो देश भी पानी संरक्षित कर सकता है। नदी या तालाब  या भूजल का षुद्ध जल हम भी पेयजल के लिए प्रयोग में लाएं व घरों से निकली नानी का पानी खेतों तक ले जाएं। इससे खेतों में खाद की खपत भी कम होगी।
आज यह आवश्यक हो गया है कि किसी इलाके को सूखाग्रस्त घोशित करने, वहां राहत के लिए पैसा भेजने जैसी पारंपरिक व छिद्रयुक्त योजनाओं को रोका जाए, इसके स्थान पर पूरे देश के संभावित अल्प वर्शा वाले क्षेत्रों में जल संचयन, खेती, रोजगार, पशुपालन  की नई परियोजनाएं स्थाई रूप से लागू की जाएं जाकि इस आपदा को आतंक के रूप में नहीं, प्रकृतिजन्य अनियमितता मान कर सहजता से जूझा जा सके। कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक तो हर साल, हर महीने इस बात के लिए तैयारी करना होगा कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्शा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जिलाना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास है जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

story for children on democracy

अपनी पसंद का मॉनीटर
पंकज चतुर्वेदी 


पूरी कक्षा ठसा-ठस भरी थी। लगता है कोई भी अनुपस्थित नहीं है। हो भी कैसे ! आज पहला दिन जो है- इतने दिनों की छुट्टियों के बाद अपने दोस्तों  से मिलने का अवसर आया है!! अभी शिक्षक  कक्षा में आए नहीं है और पवन सभी को चुप करवाने का प्रयास कर रहा है। वह कुछ बच्चों को आगे बैठा रहा है तो कुछ को पीछे कर रहा है। बहुत से बच्चे उसकी बात मानने को राजी नहीं हैं। वह हल्ला करने को मना करता तो वे हो....हो करने लगते। कक्षा में शोर-शराबा  हो रहा है,कोई कागज के रॉकेट बना कर चला रहा है।




‘‘अरे भाई, पहले दिन ही इतना हंगामा? आने में दो मिनट देर क्या हो गई, आप लोगों ने तो सारे स्कूल को सिर पर उठा लिया?’’ वंदना टीचर की कड़कती आवाज जैसे ही गूंजी, साठ बच्चों की क्लास में सन्नाटा छा गया। इतनी शांति  कि सुई गिरने की आवाज सुन लो।
‘‘ टीचर कोई मेरी बात ही नहीं सुन रहा था.. यह राजेश्  तो मुंह चिढ़ा रहा था और वह अकरम और जोर से हल्ला कर रहा था....’’ पवन रूआंसा हो गया। पवन पिछले साल क्लास का मॉनीटर था। चॉक-डस्टर लाना हो या ऑफिस में कॉपी पहुंचाना,, टीचर की अनुपस्थिति में  अनुषासन बनाए रखना हो या और कोई काम, पूरे पवन के जिम्मे थे।
‘‘क्यों, क्या छुट्टी के दो महीनों में भूल गए थे कि क्लास में कैसे व्यवहार करना है? और ये पवन की बात कौन -कौन नहीं सुन रहा था? क्यों......क्यों?’’ वंदना टीचर से वैसे ही सभी बच्चे डरते हें। आज तो उनका गुस्सा साँतवे आसमान पर है। सभी ने सिर नीचे कर लिए।
‘‘ राजेश् , आप ? आपके तो सबसे ज्यादा  नंबर आए हैं और आप भी पवन को चिढ़ा रहे थे?’’ वंदना टीचर के सुर थोड़े षांत हुए। शायद उन्हें भी लगा कि पहले ही दिन बच्चों से इतनी कड़ाई ठीक नहीं है।
राजेष खड़ा हो गया। उसने धीरे से निगाह उठा कर देखा- ‘लगता है टीचर का गुस्सा शांत  हो गया है।’ मन ही मन उसने सोचा।
‘‘बोलो राजेश , आपकी शिकायत  क्यों आई?’’ मेंडम ने फिर पूछा।
‘‘‘टीचर वो बात ऐसी है कि...’’ राजेश्  बोलने में कुछ संकोच कर रहा था।
‘‘हां.... हां....बोलो.... क्या हो गया है आपको?’’ वंदना टीचर की आवाज में कुछ स्नेह टपक रहा था। इससे राजेश् को हिम्मत मिली।
‘‘ टीचर मैं  बिल्कुल चुपचाप बैठा था, यह जो पवन है, वह मुझसे दुश्मनी  मानता है। पिछली से पिछली बार परीक्षा में मुझसे यह एक सवाल पूछ रहा था। मैंने बताया नहीं था, तभी से यह ऐसा ही करता है।’’ राजेश्  सरपट रफ्तार में बोल गया।
राजेश्  का बोलना था कि संजय भी खड़ा हो गया, ‘‘टीचर टीचर, राजेश्  सही कह रहा है......पवन की बात नहीं मानो तो वह बोर्ड पर नाम लिख देता है.....’’
अब तो क्लास में बच्चों की होड़ लग गई पवन की शिकायत  करने की। वंदना टीचर ने बच्चों को चुप करवाया, ‘‘‘यह अच्छी बात नहीं है, अपने किसी साथी की चुगली नहीं करते।’’ हालांकि टीचर भी जानती थीं कि पवन गत दो सालों से मॉनीटर है और वह अब ईमानदारी से काम नहीं कर रहा है।
क्लास में हर समय शिक्षक  रह नहीं सकता। कई काम ऐसे होते हैं कि वह बच्चों से ही करवाने पड़ते हैं, ऐसे में एक अच्छे मॉनीटर की जरूरत तो होती ही है। जब पवन कक्षा छह में था  तो दूसरे बच्चों से कुछ बड़ा दिख्ता था। उसके डील डौल से बच्चे डरते भी थे। उसके पिताजी कस्बे की नगर पंचायत के प्रधान भी थे, सो उसे क्लास का मॉनीटर बना दिया गया था। अब दो साल बाद ऊसकी बहुत शिकायतें आ रही हैं- वह भेदभाव करता है, वह खुद होम वर्क दूसरे बच्चों से करवाता है...... और भी बहुत सी। आज जो कक्षा में हुआ, उसी का परिणाम था।
टीचर समस्या को समझ चुकी थीं। ‘‘‘चलो-चलो, ये शिकायतें करना छोड़ो। पहला दिन है। नए लोगों से परिचय लेते हैं। बात करते हैं कि छुट्टी में किसने क्या किया।’’ और फिर स्कूल की छुट्टी तक बच्चों ने क्लास में खूब मजे किए। नई किताबें देखीं, नए बच्चों से बातचीत हुई । बच्चे तो नए दिन की उम्मीदों के साथ अपने-अपने घर चले गए, लेकिन वंदना टीचर को पूरे साल कक्षा को सही तरीके से चलाने की चिंता सता रही थी। वे समझ गई थीं कि अब पवन के भरोसे बहुत से काम होने से रहे।
अगले दिन बच्चों की हाजिरी हुई और उसके बाद वंदना टीचर ने पूछा, ‘‘अच्छा बताओ, कौन-कौन चाहता है कि क्लास में नया मॉनीटर बने?’’
पहले कुछ बच्चों ने हाथ खड़ किए, फिर उनकी देखा-देखी कुछ और ने हाथ खउ़े कर दिए, फिर तो पूरी क्लास के हाथ ऊपर थे, यहां तक कि पवन के भी।
‘‘‘पवन आप भी चाहते हैं कि नया मॉनीटर बने?’’ टीचर ने पूछा।
‘‘जी, टीचरजी, मुझे दो साल हो गए यह काम करते हुए। पहले सब मेरे दोस्त थे। पर, अब देखिए ना क्लास के अधिकांश्  बच्चे मुझसे दुश्मनी  मानने लगे हैं। ऐसी मॉनीटरी से क्या ?’’
‘‘ बात तो आप ठीक कह रहे हैं पवन, लेकिन यह जिम्मेदारी भी तो किसी ना किसी को निभाना ही पड़ेगा ना?’’ टीचर ने कहा।
‘‘ तो इस बार हम आप सभी पसंद का ही मॉनीटर रखेंगे।’’
‘‘हमारी पसंद का ?’’ एक साथ कई बच्चों के स्वर निकले। ‘कैसे....‘कैसे होगा?’’
‘हम चुनाव के जरिए मॉनीटर का चुनाव करेंगे।‘’ टीचर बोलीं।
‘‘चुनाव! जैसे प्रधानमंत्री वाला चुनाव हुआ था अभी?’’ कैलाष ने पूछा।
‘‘ हां.......हां वैसा ही चुनाव, लेकिन बेटे हमने प्रधान मंत्री का चुनाव नहीं किया था। जनता तो अपना सांसद चुनती है और सांसद प्रधानमंत्री।’’ टीचर ने समझाया।
‘‘ यानी हम वोट डालेंगे।, हम भी मॉनीटर बन सकते हैं । सुनो हम तो रजनीश्  को अपना मॉनीटर बनाएंगे ...........’’ ऐसे ही कई सवाल कक्षा में गूंजने लगे।
शोर  नहीं, और आप किसको चुनोगे यह बताना गलत बात हे। वोट हर समय गोपनीय रहता है। ‘और याद रखें जो ईमानदारी से काम करना चाहे, जो भेदभाव ना करे, वही आगे आए। आप लोगों के पास एक घंटा है, खुद ही तय कर लें कि कौन-कौन मॉनीटर बनना चाहता है। कल हम चुनाव करेंगे।’’ यह कहते हुए वंदना टीचर क्लास से बाहर निकल गईं।
अब बच्चों के गुट बन रहे थे। कोई खुद को खड़ा बता रहा था तो कोई अपने दोस्त को मॉनीटर बनता देखना चाहता था। इतने हंगामें में पवन एक कोने में बैठा था, उसके दो ही  दोस्त साथ थे। ‘देखना अभी  जितना कूद रहे हैं ना जब मॉनीटर बन जाएंगे, तब समझ आएगा।’’ पवन बोला।
पता ही चला कि कब एक घंटा निकल गया और वंदना टीचर, कुरैशी  सर के साथ क्लास में आ गईं। ‘‘ तो बताओ, कौन-कौन बनना चाहता है मॉनीटर?’’
सबसे पहले फहीम खड़ा हुआ, फिर राजेश् , और नमन और गुरमीत भी।
‘‘ तो आप चार लोग मॉनीटर बनना चाहते हैं?’’ कुरेषी सर ने पूछा।
‘‘जी ....’’ चारों एकसाथ बोले ।
‘‘एक बात याद रखें, जिसने आज हां कर दिया, वह कल ना नहीं करेगा। और मॉनीटर बनने के बाद काम से घबरा कर बीच में से छोड़ कर भागेगा भी नहीं ! ठीक है ना!!’ टीचर ने चारों से पूछा।
‘‘ जी..... हां।’’ चारों बच्चों ने जवाब दिया।
‘‘ चलो, चारों बच्चे एक कागज पर लिख कर आवेदन करों कि वे मॉनीटर का चुनाव लड़ना चाहते हैं। प्रत्येक आवेदन पर कम से कम दो बच्चों के हस्ताक्षर भी होंगे कि वे समर्थन करते हैं।’ कुरेशी  सर ने कहा।
क्लास में कभी इतनी स्वतंत्रता मिली नहीं थी और ना ही यह सबकुछ हुआ था, सो बच्चे बउ़े उत्साह में थे। चुनाव लड़ने वाले बच्चों के पास उनके दोस्त-समर्थक पहुंच गए थे और होड लगी थी कि कौन किसका समर्थक बनकर हस्ताक्षर करेगा।
‘कल हम प्रार्थना के बाद ही‘नया मॉनीटर चुन लंेंगे। याद रखें कल कोई छुट्टी नहीं करेगा। आज आप लोगों को छूट दी जाती हे कि अपने दोस्तों को समझाएं कि आप ही मॉनीटर क्यों बना। बस , याद रखना कि आपके हल्ले-गुल्ले से दूसरी कक्षाओं में व्यवधान ना हो। ’’ टीचर व सर यह कहते हुए क्लास से बाहर निकल गए।
फहीम, राजेश् , नमन और गुरमीत - इन चारों के साथ कुछ-कुछ बच्चे थे। फहीम ने पुराने मॉनीटर पवन को ही पकड़ लिया और पवन उसके साथ बच्चों को फहीम का समर्थन करने की कहने लगा। गुरमीत बच्चों को कह रहा था कि जो उसे वोट देगा, उसे वह अपनी गाड़ी में बैठा कर स्कूल लाया करेगा। राजेश्  लालच दे रहा था कि उसका साथ देने वालों को वह गोलगप्पे खिलाएगा। नमन भी कहां पीछे रहता, उसने कह दिया कि यदि उसका साथ नहीं दिया तो वह किसी को भी अपने होम वर्क की कॉपी नहीं देगा। कोई लालच दे रहा था  कि उसके राज में हल्ला करने वालों या देर से आने वालों के नाम वह टीचर को नहीं बताएगा।, कोई चुपके से टेस्ट पेपर के नंबर बताने का झांसा दे रहा था। अपने बडे भाई-बहन से दोस्ती, पड़ोस में रहने, पुरानी दोस्ती जैसी बातें भी याद करवाई जा रही थीं।
स्कूल की छुट्टी के बाद कुछ बच्चे एक दूसरे के घर भी पहुंच गए। अब यह बात स्कूल की दूसरी कक्षाओं व उसके जरिए छोटे से कस्बे में फैल गई कि स्कूल की कक्षा आठ में इलेक्षन होने वाले है। हालांकि बच्चों में यह भी चर्चा थी कि आखिर इन चारों में से एक को चुना कैसे जाएगा। डर था कि कहीं टीचर ने सबके सामने हाथ खड़े करने को कह दिया तो बाकी तीन नाराज हो जाएंगे। बच्चो को इस बात का डर भी था और मन में जिज्ञासा भी थी कि आखिर चार में से एक कैसे मॉनीटर बनेगा ? कहीं टीचर ने पिछले रिजल्ट के अच्छे नंबर वाले को बना दिया तो  कहीं हेडमास्टरजी ने अपने मर्जी से चुन लिया तो ?
 ऐसे ही कई सवालों के साथ बच्चों की सुबह हो गई और अधिकांश्  बच्चे समय से पहले स्कूल भी पहुंच गए। आज तो कक्षा आठ के बाहर दूसरी कक्षा के बच्चे भी तांक-झांक कर रहे थे।  कक्षा में कुरेशी  सर व वंदना टीचर पहुंचीं । उनके हाथ में एक बड़ा सा डिब्बा भी था। जल्दी से बच्चों की हाजिरी ली गई। उसके बाद चारों बच्चों को सामने बुलाया गया।
‘‘ अब आप चारों को तीन-तीन मिनट में यह बताना है कि आप ही क्यों सबसे अच्छे मॉनीटर होगे। ’’ कुरेषी सर ने कहा।
‘‘ मुझे पुराने मॉनीटर का समर्थन मिला है। वह मुझे आगे भी सहयोग करेगा, इस लिए मैं अच्छा  मॉनीटर बनूंगा।’’ फहीम ने ऐसा ही कुछ भाषण  दिया। राजेश्  ने भाषण  में कहा कि उसे हर बार परीक्षा में सबसे ज्यादा नंबर मिलते हैं, इस लिए उसे मॉनीटर बनना चाहिए।
‘‘ मुझे कोई डरा नहीं सकता , मैं ईमानदारी से उधम करने वाले बच्चों के नाम लिखूगा। और मैं ताकतवर भी हूं, बहुत सारी कॉपी-किताब एकसाथ उठा कर टीचर जी की टेबल तक पहुंचा सकता हू।’’  गुरमीत अपनी बांह के डोले दिखा कर बोला और क्लास ठहाकों से गूंज गई। नमन तो इतने बच्चों के सामने कुछ बोल ही नहीं पाया ।
‘‘‘एक बात जान लें कि मॉनीटर कोई राजा नहीं है, वह अपनी मनमर्जी कुछ नहीं कर सकता। वह तो कक्ष की समस्याओं को टीचर तक पहुंचाने का माध्यम होता हे। कक्षा में बहुत से काम , जो अकेली टीचर नहीं कर पाती, उनको मदद करने के लिए होता है। यदि आप कुछ करना चाहते हैं, अपनी पढ़ाई-खेल के साथ-साथ अपने मित्रों के लिए, अपने स्कूल के लिए, तो ही मॉनीटर बनने की सोचें।’’वंदना टीचर ने समझाया।
‘‘अब हम चुनाव के जरिये अपना मॉनीटर चुनेंगे। सभी बच्चे एक-एक कर चुपचाप एक पर्ची पर अपने पसंद का नाम लिखेंगे व उस उिब्बे में डाल देंगे। जिसे सबसे ज्यादा लोग पसंद करेंगे, वही मॉनीटर होगा।’’ कुरेशी  सर ने बताया।
‘‘टीचर, मेरे मन में एक सवाल है, क्या पूछ सकता हूं ?’’ नमन थोड़ा डरा हुआ लगा रहा था।
‘‘हां....हां जरूर ..’’ मेडम ने उसकी हिम्मत बढ़ाई।
‘‘ टीचर हम चार में से कोई एक ही मॉनीटर बनेगा ना? जिसे सबसे ज्यादा बच्चे पसंद करेगे!’’
‘हां, यही होगा। यही तो होता है चुनावों में जिसे सबसे ज्यादो वोट मिलते हैं वही जीतता है।’’
‘‘ तो फिर , वह सबकी पसंद का मॉनीटर कैसे होगा। मान लो यदि फहीम जीत जाता है, उसे तो मैंने वोट दिया ही नहीं तो वह मेरी पसंद का कैसे हुआ?’’
‘‘देखो बेटे, दुनिया में सबकुछ हमारी मर्जी से नहीं होता। कुछ जगह हमें दूसरों की भावनाओं का भी सम्मान करना होता है। बहुमत का अर्थ यह हुआ कि जिसे सबसे ज्यादा लोगों ने पसंद किया।  और फिर इस चुनाव का मतलब यह तो हुआ नहीं कि फहीम या गुरमीत या राजेश  से आपका झगड़ा हो गया। यह तो एक खेल है। मान लो कि आपसे ज्यादा किसी दूसरे को ज्यादा लोग पसंद करते हैं।’’ कुरेशी  सर ने लोकतंत्र के सही मायने समझााने का प्रयास किया।
इसके बाद हाजिरी रजिस्टर से बोल कर एक-एक बच्चे का नाम पुकारा गया। छात्र आते दूर टेबल की आड़ में अपने पसंद के बच्चे का नाम लिखते और डिब्बे में डाल देते। कुरेशी  सर के पास हरे रंग का पेन था, जिसे वे हर बच्चे की उंगली पर निशान बना देते। बच्चों को याद आया कि ऐसा ही नीला-काला निशान उनके माता-पिता की उंगली पर चुनाव में लगाया गया था।
अब इस चुनाव के परिणाम क्या हुए? यह तो गिनती के बाद ही पता चलेगा। लेकिन वंदना टीचर ने एक बात कह दी,-अर्ध वार्षिक  परीक्षा के बाद ना जीत पाए तीनों बच्चों से एक बार फिर बात की जाएगी। यदि वर्तमान मॉनीटर के काम से सभी संतुष्ट  नहीं हुए तो एक बार फिर चुनाव होगा। वह चुनाव होगा इस बात के लिए कि क्या इस मॉनीटर की जगह नए का चुनाव किया जाए या नहीं!!







शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

An open forum for book lovers- Cairo book fair

काहिरा जैसे खुले पुस्तक भारत में क्यों नहीं ?

                                                                                                                                     पंकज चतुर्वेदी
jansandesh times, lucknow 10-2-18
यह महज पुस्तक मेला नहीं है, यह सारे षहर ही नहीं, पूरे इजीप्ट के लिए सालाना जलसा जैसा है। यहां किताबों के अलावा भी बहुत कुछ है जो समाज को जागरूक बनाता है, शिक्षा के लिए प्रेरित करता है और देश के लिए प्रतिबद्ध बनाता है। 26 जनवरी को जब पुस्तक मेला षुरू हुआ तो कड़कड़ाती ठंड, तेज हवाओं से थरथराता खुला मैदान था और समापन तक यहां दिन में 30 डिगरी वाली खासी गरमी हो गई, लेकिन बेशुमार किताबें, अनगिनत पाठक और असीमित गतिविधियांें का सिलसिला किसी भी दिन कम नहीं हुआ।  ऐसा पुस्तक मेला दुनिया में कहीं नहीं होता, और उसके बीच बनी पक्की सड़कों के दोनो तरफ पुस्तकों के स्टॉल- कोई टेंट-तंबू में तो किसी का लकड़ी, षीशे की सजावट, किसी ने स्टॉल को सुदर डिजाईन किया हुआ है तो बहुत से केवल खुले में हैं। यही नहीं कोई दो हजार से अधिक दुकानों में कोई ताला नहीं, कोई सुरक्षा गार्ड नहीं, कहीं तलाशी नहीं और कमाल है कि किसी का एक पन्ना भी चोरी हो जाए। लोग टॉयलेट के बाहर अपने मोबाईल, कोट छोड़ कर बेफिक्र जाते हैं। यह सब तब जबकि भारी भीड़, पार्क में बैठ कर किताबें पलटते युवा, खाने के टिफिन के साथ बातें करतीं महिलाएं व बच्चे, हर स्टॉल में तिल रखने को स्थान नहीं। युुवा लड़कियां स्वयंसेवक के रूप में घूमती हैं और लोगों को उनकी वांछित पुस्तकों के स्टॉल का रास्ता बताती हैं। दुनिया की पुरानी सभ्यता में से एक मिस्त्र या इजीप्ट की राजधानी काहिरा या कायरो का यह पुस्तक मेला अपने बेतरतीब बाजार की तरह बिखरे स्वरूप के कारण दुनिया में विरला व अनूठा है। एक बात और इस पुस्तक मेले की अवधि भी दुनिया में सबसे ज्यादा है- पूरे पंद्रह दिन। इस बार यह 27 जनवरी से 10 फरवरी तक है, सुबह 10 बजे से षाम सात बजे तक। षुक्रवार को जरूर आधे दिन का अवकाश होता है।
prayukti, delhi 8-2-18

सन 1969 में काहिरा या कायरो षहर की स्थापना का एक हजारवां साल था और तब से इस पुस्तक मेले की षुरूआत हुई। इस साल मेले का 49वां संस्करण है। अल्जीरिया को अतिथि देश का सम्मान दिया गया है। मेले में कुल 848 प्रकाशकों के 1200 से अधिक स्टॉल हैं। विदेश से 27 देशों की भागीदारी है जिनमें 17 देश अरब के ही है।। इसके अलावा रूस, चीन, इटली, से ले कर सूडान, फिलिस्तीन, जार्डन आदि सहभागी हैं। इतने पुराने पुस्तक मेले में भारत ने पहली बार हिस्सा लिया । इजीप्ट की संस्कृति मंत्री एनस अब्ेदल दायेम और अल्जीरिया के संस्कृति मंत्राी एजाज्दीन महबूबी ने पुस्तक मेले का प्रारंभ किया और इस अवसर पर इजीप्ट के अन्य चार केबिनेट मंत्री भी मौजूद थे। उद्धाटन एक दिन पहले षाम को हुआ और विदेशी भागीदारों के लिए अलग से एक षानदार इमारत में बनाए गए मंडप में मंत्रीद्वय छह घंटे तक प्रत्येक स्टॉल पर गए। भारत की ओर से नेशनल बुक ट्रस्ट ने भागीदारी की। भारत के स्टॉल पर ट्रस्ट व कई अन्य प्रकाशकों की 100 से अधिक पुस्तकें प्रदर्शित की गईं, जिनमें गांधी, योगा, विज्ञान बच्चों की पुस्तकें आदि षामिल हैं। उदघाटन के समय अल्जीरिया के मंत्री ने भारत के स्टॉल पर आ कर कमर तक झुक कर नमस्ते बोल कर भारत के प्रति अपना सम्मान जाहिर किया।






कायरो पुस्तक मेले के अंतरराश्ट्रीय पवेलियन में एक बात स्पश्ट होती है कि वहां के लोगों को अंग्रेजी सीखने का कोई मोह नहीं है। वे केवल अरबी में बात करते हैं, अरबी में ही उनके सूचना पट्ट व सामग्री हैं, यदि आप उसे पढ नहीं पाते तो यह आपकी दिक्कत है। दूसरा इजीप्ट की हर पीढ़ी के लोगों के लिए भारत बेहद आदर का प्रतीक है। बुजुर्ग लोग नेहरू-नासेर, इंदिरा गांधी-मुबारक की दोस्ती, सहयोग और इजीप्ट के आधुनिकीकरण में भारत के योगदान के प्रति कृतज्ञ महसूस करते हैं। यहां एक युवक ऐसा भी आया जिसका नाम नेहरू अहमद गांधी है। गांधी उसके बाबा का नाम है, वालिद का अहमद और उसका नेहरू।
इसके बाद वहां गांधी और टैगोर को याद किया जाता है। यहां कई स्टॉल पर गांधी की पुस्तकें अरबी में मौजूद है।। भारत के लोकतंत्र, धर्म आदि की भी कई पुस्तकें हैं। लेकिन सबसे ज्यादा कोई लोकप्रिय है तो वह है अमिताभ बच्चन, फिर षाहरूख और सलमान भी। बच्चों व युवाओं में होड़ रहती है कि वे अपना नाम हिंदी में कागज पर लिखवाएं । इस बात को भी वे सम्मान से देखते हैं कि वे भारत के स्टॉल पर रखे आगंतुक रजिस्टर में ‘आई लव इंडिया’ लिखते हैं। कुछ तो केवल दिल का निशान और उसमें बिधे तीर के एक तरफ इजीप्ट और दूसरे तरफ इंडिया लिख कर हाले-दिल का इजहार करते हैं।
कायरो के पुस्तक मेले में मर्द से कहीं ज्यादा औरतें दिखती हैं खरीदार के तौर पर और वहां काम करने वालों में भी। औरतें बुरके वाली, हिजाब वाली, जिंस-टीशर्ट वाली--- किसी भी पोशाक में, लेकिन कहीं कोई पांबदी नहीं। असल में यहां औरत व आदमी की जनसंख्या लगभग समान है। यहां की साक्षरता दर भी षानदार है - 83.24 प्रतिशत पुरूश और 67.29 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं। 15 से 24 साल के युवाओं में साक्षरता का प्रतिशत 94.27 है और इसका असर पुस्तक मेले में साफ दिखता है। पिछले साल पुस्तक मेले में कुल बीस लाख लोग आए थे यानि हर दिन औसतन एक लाख तैंतीस हजार लोग। यह आंकड़े बानगी हैं कि अरब के इस आखिरी और अफ्रीका के षुरूआती देश में पढ़ने के प्रति कितना लगाव है। वैसे भी इजीप्ट में पुस्तक प्रकाशन एक महत्वपूर्ण उद्योग है। नील नदी की कृपासे पैदा होने वाली फसल में वे ‘‘पापयरस’ पेड़ भी है जिससे कागज बनता है और यहां से कागज दूर दूर निर्यात होता है। एक मोटा अनुमान है कि यहां पुस्तकों का व्यापार सालाना 204 मिलियन अमेरिकी डालर का है। कुछ ऐसे आंकड़े भी गौरतलब है जो दर्शाते हैं कि इजीप्ट के पुस्तक मेले में इतनी भीड़ क्यों होती है। असल में यहां गत तीन सालो में प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा जहां बढ़ रहा है वहीं इस अवधि में महंगाई की दर में तीन फीसदी की कमी आई और बेरोजगारी की दर लगभग स्थिर 12.4 फीसदी है। लोगों के पास अपने घर में ही रोजगार है, सो वे किसी विदेशी भाशा के महातजा नहीं हैं। तभी पुस्तक मेले में नब्बे फीसदी पुस्तकें अरबी में ही हैं। अमेरिका या यूरोप के देशों को रिमायंडर यानि कचरा होग या साहित्य यहां अरबी अनुवाद के तौर पर पटा पड़ा है। अरबी लेाग किसी श्री नए षब्द के लिए अपना खुद का लफ्ज गढते हैं और अंग्रेजी से उधार नहीं लेते जैसे -टेलीफोन को हातिब और कंप्यूटर को हासूब नाम दे रखा है।
एक बात और इजीप्ट पुस्तक मेला वैचारिक टकराव का भी बड़ा अड्डा है और यहां हर साल वामपंथी लेखकों व अरब के कट्टर मुस्लिम लेखकां की पुस्तकों को ले कर विवाद होते हैं। कई बार चेक गंणराज्य, लेबनान आदि देशोेंकं की पुस्तकें जब्त होने की नौबत भी आई है, लेकिन यहां के लेखक मंच सभी तरह के लेागों को स्थान देते हैं। यहां चे गोवेरा, मार्क्स, ओसाम बिन लादेन, गांधी , मार्लिन मुनरो, नासेर और कट्टर इस्लामिक विचार , सभी कुछ एक ही दुकान की पुस्तकों में साथ बैठे संवाद करते दिखते है। कुल मिला कर कायरो पुस्तक मेला महज खुले आसमान के नीचे ही नहीं होता, यहां विचारों, इंसानों, नस्लों सभी के लिए खुला स्थान है। इतना खुला कि यहां पुस्तकों के बीच सिगरेट पीने पर कोई रोक नहीं है, यहां तक कि जहां ‘नो स्मोकिंग’ लिखा हो वहां भी। हर दूसरे हाथ में सिगरेट यहां की खासियत ही त्रासदी है।
पन्द्रह दिन के इस पुस्तक मेले में औसतन हर दिन सवा लाख लोग आते हैं । इनमें चालीस फीसदी बच्चे होते हैं । वैसे तो पुस्तक मेले का प्रवेश षुल्क महज एक इजीप्ट पाउंउ यानि लगभग तीन रूपण् साठ पैसे हैं, लेकिन बच्चों के लिए प्रेवश निशुल्क है।  जाहिर है कि पुस्तक मेले में बच्चों के लिए कुछ ख़ास तो होता ही है . यहाँ खुले मंच पर बच्चों के लिए दिनभर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं- इनमें गीत, नाटक, डांस--। कुछ बच्चों द्वारा और कई एक प्रोफेशनल समूहों द्वारा। यहां चल रहा जादू का शो में बिलकुल भारत के आम जादू की शो की ही तरह तमाशे थे । कागज जला कर बर्त में रखना और कबूतर निकालना, रंगबिरंगी चिंदियों को रूमाल में बदल देना अदि। यहां सर्कस के तमाशे, बच्चों का ग्रीक-रोमन डांस, गीत-संगीत, अरबी षछठों के उच्चारण की प्रतियोगिता आदि सारे दिन चलती हैं।
एक बात तो तय है कि भारत का जिस तरह यहां सम्मान और भरोसा है, उसको देखते हुए यहां बच्चों की पुस्तकें, भारतीय साहित्य, इतिहास व कला की पुस्तकें अधिक से अधिक अरबी में अनूदित कर बिक्री की व्यवस्था करना चहिए, क्योंकि इस खाली स्थान को चीन व पश्चिमी देश अपने रंग से भरने में लगे हैं।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

pulicot wetland in danger

खतरे में क्यों पड़ गई है राजहंसों की शरणस्थली

पंकज चतुर्वेदी
देश के सबसे महत्वपूर्ण सामरिक व अंतरिक्ष महत्व के स्थान श्रीहरिकोटा की पड़ोसी पुलीकट झील को दुर्लभ हंसावर या राजहंस का सबसे मुफीद आश्रय-स्थल माना जाता रहा है। विडंबना है कि थोड़ी सी इंसानी लापरवाही के चलते देश की इस दूसरी सबसे विशाल खारे पानी की झील का अस्तित्व खतरे में है। चैन्नई से कोई 60 किलोमीटर दूर स्थित यह झील महज पानी का दरिया नहीं, लगातार सिकुड़ती जल-निधि पर कई किस्म की मछलियां, पक्षी और हजारों मछुआरे परिवारों का जीवन भी निर्भर है। यहां के पानी में विषैले रसायनों की मात्रा बढ़ रही है, वहीं इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र से हुई लगातार छेड़छाड़ का परिणाम है कि समुद्र व अन्य नदियों से जोड़ने वाली प्राकृतिक नहरें गाद से पट रही हैं। समुद्र से जुड़ी ऐसी झीलों को अंग्रेजी में लेगून और हिंदी में अनूप या समुद्र-ताल कहते हैं। पुलीकट, चिल्का के बाद देश का सबसे विशाल अनूप है। 
हिंदुस्तान ८ फरवरी १८ 
पुलीकट झील आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमाओं में फैली है। स्थानीय लोग इसे ‘पलवेलकाड’ कहते हैं। इसके बीच कोई 16 द्वीप हैं। तकली के आकार का लंबोतरा श्रीहरीकोटा द्वीप, इस झील को बंगाल की खाड़ी के समुद्र से अलग करता है, जहां पर मशहूर सतीश धवन स्पेस सेंटर भी है। इसके साथ ही दो छोटे-छोटे द्वीप - इरकाम व वेनाड भी हैं, जो इस झील को पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में विभाजित करते हैं। इससे ठीक सटा हुआ है पुलीकट पक्षी अभयारण्य। 
यह इलाका कभी समुद्र के किनारे शांत हुआ करता था। इसीलिए सदियों से ठंड के दिनों में साठ हजार से अधिक प्रवासी पक्षी यहां आते रहे हैं। विशेषरूप से पंद्रह हजार से अधिक राजहंस (फ्लेमिंगो) और साइबेरियन क्रेन यहां की विशेषता रही हैं। यह अथाह जल निधि 59 किस्म की वनस्पतियों का उत्पादन-स्थल भी है, जिनमें से कई का इस्तेमाल खाने में होता है। एक ताजा सर्वे बताता है कि पिछले कुछ दशकों में इस झील का क्षेत्रफल 460 वर्ग किलोमीटर से घटकर 350 वर्गकिलोमीटर रह गया है। पहले इसकी गहराई चार मीटर हुआ करती थी, जो अब बमुश्किल डेढ़ मीटर रह गई है। 
झील में मछली पकड़ने के लिए जाल फेंकने के बढ़ते निरंकुश चलन से इसमें मौजूद पारंपरिक वनस्पतियों का नुकसान हो रहा है। रही-सही कसर मछली पकड़ने के लिए डीजल से चलने वाली नावों व मशीनों को अनुमति देने से पूरी हो गई। इसने मछलियों की पारंपरिक किस्मों और मात्रा पर विपरीत प्रभाव डाला। 
आंध्र प्रदेश वाले हिस्से से अरनी व कलंगी नदी का पानी सीधे इसी झील में गिरता है, जो अपने साथ बड़ी मात्रा में नाली की गंदगी, रासायनिक अपमिश्रण और औद्योगिक कचरा लाता है। तमिलनाडु की ओर झील के हिस्से को सबसे अधिक खतरा गाद के बढ़ते अंबार से है, जिस कारण समुद्र से झील में साफ पानी की आवाजाही धीरे-धीरे कम हो रही है। यह रास्ता संकरा व उथला हो गया है। झील को समुद्र से जोड़ने वाले रास्ते की 20वीं सदी में औसत गहराई डेढ़ मीटर थी, जो आज घटकर एक मीटर से भी कम हो गई है। यहां गाद जमने की गति प्रत्येक सौ साल में एक मीटर आंकी गई है। यही नहीं, यदि उपाय नहीं किए गए, तो आने वाली सदी में इस अनूप का अस्तित्व ही समाप्त होने का खतरा है। बीते 20 वर्षों में यहां पारंपरिक रूप से मिलने वाली मछलियों की कम-से-कम 20 और झींगों की कोई दो किस्में बिल्कुल लुप्त हो चुकी हैं। पुलीकट झील के किनारें खुलते गए व्यावसायिक प्रतिष्ठानों-कारखानों ने भी इसे खूब नुकसान पहुंचाया।
प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय संगठन आईयूसीएन ने इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व का स्थान घोषित कर रखा है, तो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की सूची में यह ‘संरक्षित क्षेत्र’ है। इस इलाके के पर्यावरण पर दूरगामी योजना बनाकर काम नहीं हुआ, तो पुलीकट झील देश के लुप्त हो रहे ‘वेट-लैंड’ की अगली कड़ी हो सकती है। सनद रहे, वेट-लैंड के नष्ट होने से ‘ग्लोबल वार्मिंग’ जैसे कुप्रभाव का दायरा बढ़ रहा है। वेट-लैंड की दुर्गति का मतलब है, तापमान में बढ़ोतरी, बारिश में कमी और प्राकृतिक विपदाओं को न्योतना

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

India has to develop own system on glacier study

ग्लेशियर पर हो भारत का अपना अध्ययन

पंकज चतुर्वेदी 

जन्संदेश टाईम्स लखनउ , ६-२-१८ 
संयुक्त राष्ट्र  की वैश्विक पर्यावरण पूर्वानुमान कमेटी ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि जिस तरह से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे सन 2050 तक समुद्र  के किनारे बसे दुनिया के दस श हरों में तबाही आ सकती है। इसमें भारत के मुंबई, कोलकाता जैसे श हरों पर भी गंभीर खतरा बताया गया है। अनियोजित विकास,बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र में पानी की मात्रा बढ़ेगी और इस विस्तार से तटों पर बसे षहर तबाह हो सकते हैं। हालंाकि यह कोई नई या पहली बार दी गई चेतावनी नहीं है। फरवरी 1981 में रायल स्विस सोसायटी के तत्वावधान में स्टोकहोम में संपन्न एक गोष्ठी  में कार्बन डाय आक्साईड की बढ़ती मात्रा पर चिंता व्यक्त की गई थी। हां बस उस गोश्ठी में यह तथ्य सामने आया था कि कार्बन की मात्रा बढ़ने का फायदा भारत सहित एशिया के कई देशेां व अफ्रीकी दुनिया को होगा। धरती के बढ़ते तापमान से भरत के लिए सबसे बड़ा खतरा ग्लैशियर गलने का है क्योंकि हमारी नदियां हमारे समाज, प्रकृति और अर्थ का मूल आधार हैं व ग्लैशियर के गलने से इस पर विपरीत असर पड़ सकता है।


विडंबना है कि अत्याधुनिक मशीनों, कार्बन उर्जा के अंधाधुंध इस्तेमाल से दुनिया का मिजाज बिगाड़ने वाले पश्चिमी देश अब भारत व तीसरी दुनिया के देशेां पर दवाब बना रहे हैं कि धरती को बचाने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करकें। हालांकि आज भी भारत जैसे देशेां में इसकी मात्रा कम ही है। इसके बावजूद पश्चिमी देश हमें अपने शोध के माध्यम से भयभीत कर कार्बन मात्रा कम करने या यों कहें कि विकास परियोजनाआंे, परिवहन आदि की गति को नियंत्रित करने केलिए धमकाते रहते हैं।
जनवाणी मेरठ १ फरवरी १८ 

कोई दो दशक पहले प्रिंस्टन विश्वविद्यायल के एक शो ध में बताया गया था कि जिस तरह से धरती पर कार्बन की मात्रा बढ़ रही है उससे अनुमान है कि धरातल पर तापमान में 20 डिगरी तक की बढ़ौतरी हो सकती है। इससे भारत सहीत उत्तरी व पूर्वी अफ्रीका, पश्चिम एशिया आदि इलाकों में बारिश की मात्रा बढेगी, जबकि अमेरिका, रूस सहीत पश्चिमी देशों में बारिश कम होगी। अनुमान है कि इस बदलाव से आने वाले 50 सालों में भारत सहित वर्शा संभावित देशेां में खेती संपन्न होगी। इन इलाकों में खेत इतना सोना उगलेंगे कि वे खाद्य मामले में आत्मनिर्भर हो जाएंगे तथा आयात पूरी तरह बंद कर देंगे। यह भी सही है कि कार्बन डाय आक्साईड के कारण तापमान में बढ़ौतरी के चलते एंटार्कटिका, ग्रीन लैंड और आर्कटिक प्रदेशों में बर्फ पिघलेगी। समझा जाता है कि वहां से इतनी बर्फ पिघलेगी कि विश्व में सागर का जल स्तर तीन से 18 मीटर तक ऊपर उठेगा और इससे 10 प्रतिशत तटीय भूमि जल-मग्न हो सकती है।
धरती में कार्बन का बड़ा भंडार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़ , प्रकाश संश्लेशण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानि पांच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते है। आज विश्व में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन डाय आक्साईड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है।  उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देशो में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 20 लाख सत्तर हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाय आक्साईड ही उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 203 तक तीन गुणा यानि अधिकतम पांच तक जा सकता है। इसमें कोई षक नहीं कि प्राकृतिक आपदाएं देशों की भौगोलिक सीमाएं देख कर तो हमला करती नहीं हैं। चूंकि भारत नदियों का देश है,  वह भी अधिकांश ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बरफ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हरसंभव प्रयास करने ही चाहिए। प्रकृति में कार्बन की मात्रा बढने का प्रमुख कारण है बिजली की बढती खपता। सनद रहे हम द्वारा प्रयोग में लाई गई बिजली ज्यादातर जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल जैसी प्राकृतिक चीजों) से बनती है। इंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है। हम जितनी ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करेंगे, बिजली के उत्पादन के लिए उतने ही ज्यादा ईंधन की खपत होगी और उससे उतना ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होगा। फिर धरती पर बढती आबादी और उसके द्वारा पेट भरने के लिए उपभेाग किया गया अन्न भी कार्बन बढौतरी का बड़ा कारण है। खासकर तब जब हम तैयार खाद्य पदार्थ खाते हैं, या फिर हम ऐसे पदार्थ खाते हैं जिनका उत्पादन स्थानीय तौर पर नहीं हुआ हो।
नवज्योति , राजस्थान, ९ फ़रवर १८ 

यहां एक बात और गौर करने वाली है कि भले ही पश्चिमी देश इस बात से हमें डरा रहे हों कि जलवायु परिवर्तन से हमारे ग्लेशियर पिघल रहे हैं व इससे हमारी नदियांें के अस्तित्व पर संकट है, लेकिन वास्तविकता में हिमालय के ग्लेशियरों का आकार बढ़ रहा है।  हमारे पांच से 10 वर्ग किलोमीटर आकार के किछकुंदन, अख्ताश और च्योंकुंदन के अलावा अन्य सात बगैर नाम वाले ग्लेशियरों का आकार साल दर साल बढ़ रहा है। कोई चार साल पहले तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को भी दाल में कुछ काला लगा था और उन्होंने विदेशी धन पर चल रहे षोध के बजाए वीके रैना के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल को हिमनदों की हकीकत की पड़ताल का काम सौंपा था। इस दल ने 25 बड़े ग्लेशियरों को लेकर गत 150 साल के आंकड़ों को खंगाला और पाया कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने का सिलसिला काफी पुराना है और बीते कुछ सालों के दौरान इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला है। पश्चिमी हिमालय की हिंदुकुश और कराकोरम पर्वत श्रंखलाओं के 230 ग्लेशियरों के समूह समस विकसित हो रहे है। पाकिस्तान के के-2 और नंदा पर्वत के हिमनद 1980 से लगातार आगे बढ़ रहे है। जम्मू-कश्मीर के केंग्रिज व डुरंग ग्लेशियर बीते 100 सालों के दौरान अपने स्थान से एक ईंच भी नहीं हिले है।।  सन 200 के बाद गंगोत्री के सिकुड़ने की गति भी कम हो गई है।  इस दल ने इस आशंका को भी निर्मूल माना था कि जल्द ही ग्लेशियर लुप्त हो जाएंगे व भारत में कयामत आ जाएगी। यही नहीं ग्लेशियरों के पिघलने के कारण सनसनी व वाहवाही लूटने वाले आईपीसीसी के दल ने इन निश्कर्शों पर ना तो कोई सफाई दी और ना ही इस का विरोध किया। जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय के प्रो. आरके गंजू ने भी अपने षोध में कहा है कि ग्लेशियरों के पिघलने का कारण धरती का गरम हो ना नहीं हैं। यदि ऐसा होता तो पश्मिोत्तर पहाड़ों पर कम और पूर्वोत्तर में ज्यदा ग्लेशियर पिघलते, लेकिन हो इसका उलटा रहा है।
इसमें कोई षक नहीं  कि ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर हमारे लिए उतने ही जरूरी है जितना साफ हवा या पानी, लेकिन यह भी सच है कि अभी तक हम इन तीनों मसलों के अनंत सत्यों को पहचान ही नहीं पाए है और पूरी तरह पश्चिमी देशों के षोध व चेतावनियों पर आधारित अपनी योजनांए बनाते रहते हैं। ग्लेशियर हमारे देश के अस्तित्व की पहचान हैं और इनका अस्तित्व मौसम के चक्र में आ रहे बदलाव पर काफी कुछ निर्भर है। हमें यह समझना होगा कि कुछ पश्चिमी देश इस अभेद संरचना के रहस्यों को जाननेे में रूचि केवल इस लिए रखते हैं ताकि भारत की किसी कमजोर कड़ी को तैयार किया  जा सके। इसी फिराक में ग्लोबल वार्मिंग व ग्लेशियर पिघलने के षोर होते हैं और ऐसे में षोध के नाम पर अन्य हित साधने का भी अंदेशा बना हुआ है। ऐस अंतरविरोधों व आशंकाओं के निर्मूलन का एक ही तरीका है कि राज्य में ग्लैशियर अध्ययन के लिए  सर्वसुविधा व अधिकार संपन्न प्राधिकारण का गठन किया जाए जिसका संचालन केंद्र के हाथों में हो। इससे हमें एक तो यह पता चलेगा कि क्या वास्तव में दुनिया में कार्बन प्रिट कम करने का ज्यादा जिम्मा भारत व ऐसे ही विकासशील देशे ंपर ज्यादा है और दूसरा कि क्या पश्चिमी देशों की चेतावनियां हकीकत में तथ्यपूर्ण हैं?

मेरे बारे में