तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 29 जुलाई 2018

Why Delhi do not listen pain of daughter of Mujaffarpur

Independent mail. bhopal 30-7-18

बिहार की बच्चियों का दर्द और समाज का यह मौन

कभी लगता ही नहीं है कि भारत वह देश है, जहां महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है या फिर साल की दो नवरात्रियों और न जाने कितने अवसरों पर छोटी बच्च्यिों को पैर पूजकर देवी-तुल्य माना जाता है। दिल्ली के निर्भया कांड ने भले ही सरकारें बदल दी हों, कानून में पॉक्सो एक्ट और जुड़ गया हो लेकिन नहीं बदले तो छोटी बच्चियों की अस्मिता के सवाल। कठुआ कांड में राजनीति, इंदौर में दुधमुंही बच्ची के साथ कुकर्म में एक महीनेे के भीतर फांसी की सजा या मंदसौर कांड पर हंगामा, सब कुछ बेमानी है। हमारा समाज इन सभी को एक घटना मान कर भूल जाता है और इंसानों के बीच मौजूद पिशाच बेखौफ बने रहते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह समूचे देश के लिए शर्मनाक है। 
वे बच्चियां, जो निराश्रित थीं जिनको पालने-पोसने का जिम्मा सरकार ने लिया था, जिनका पालन-पोषण जनता के पैसे से हो रहा था, उनका शारीरिक शोषण उन्हीं के संरक्षक कर रहे थे। चार बच्चियां गायब हैं। दुखद यह भी है कि इस हैवानी कृत्य में आश्रम में काम करने वाली महिला कर्मचारी भी शामिल या मौन थीं। बिहार सरकार ने सीबीआई जांच का लालीपाॅप पकड़ाकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। सारा देश 2019 के चुनाव में अधिक वोट की लूट के लिए योजना का औजार बना हुआ है। छात्रावास की बच्चियों से हुए कुकर्म को पूरा सुन लें तो हमें शक होने लगेगा कि क्या हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करने लायक हैं भी या नहीं। मीडिया कुंभ में डुबकी, राजनीतिक चितंन और पाकिस्तान से युद्ध के उन्माद में लिप्त है, जबकि बिहार की बच्चियां सोचने पर मजबूर हैं कि उनमें और दिल्ली में इतना फासला क्यों है? 

बता दें कि बिहार के मुजफ्फरपुर शहर के साहू रोड पर निराश्रित बच्चियों के लिए राज्य शासन द्वारा एक आश्रम संचालित होता है। इस बालिका गृह के संचालन का जिम्मा स्वयंसेवी संस्था 'सेवा संकल्प एवं विकास समिति' को 24 अक्टूबर, 2013 को सौंपा गया था। यह संस्था एक नवंबर, 2013 से इसका संचालन कर रही थी। राज्य सरकार ने ही टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस को राज्य के बाल एवं बालिका गृहों के सोशल ऑडिट का जिम्मा 30 जून, 2017 को सौंपा था। उसने सरकार को इसी वर्ष 27 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में यौन हिंसा, अमानवीय व्यवहार और उत्पीड़न की घटनाओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के आधार पर 30 मई, 2018 को महिला थाना, मुजफ्फरपुर में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी। उसके लगभग दो महीने बाद कार्रवाई की सुगबुगाहट हुई। यह समूचे सिस्टम के सड़ जाने की बानगी है। 
बीते 55 महीने में वहां 47 लड़कियों की इंट्री हुई। इनमें से तीन की मृत्यु हो गयी। वर्ष 2015 में एक लड़की, जबकि वर्ष 2017 में दो की मृत्यु हुई थी। इनमें दो लड़कियों की मौत अस्पताल में हुई थी। बालिका गृह के रिकॉर्ड में तीन लड़कियां गायब थीं। जब ज्यादा होहल्ला हुआ तो बालिका गृह की कुल 44 में से 42 बालिकाओं की मेडिकल जांच करायी गयी। इनमें से 34 बालिकाओं के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई है। ये लड़कियां कुपोषण की शिकार हैं। उनके शरीर पर जलाकर दागने और चोटों के निशान हैं। बच्चियों को नशा दिया जाता था। आश्रम से मिर्गी में बेहोश करने के लिए दिये जाने वाले इंजेक्शन भी जब्त हुए हैं। कई लड़कियों के गर्भवती होने, कुछ को मार कर गायब कर देने की बातें भी समने आ रही हैं। जब आश्रयदाता ही हैवान बन जाए तो किस पर भरोसा हो? 
लड़कियों के बयान के आधार पर गिरफ्तार लोगों में सबसे चर्चित नाम ब्रजेश ठाकुर का है, जो इस आश्रम को चलाने वाले एनजीओ का संचालक है। उसके पिता राधामोहन ने सन 1982 में 'प्रातःकमल' के नाम से एक अखबार प्रारंभ किया था। बाद में ब्रजेश ने अपने पिता की विरासत को विस्तार देकर एक अंग्रेजी और एक उर्दू अखबार भी शुरू किया। जमीन के धंधे से भी अकूत दौलत कमायी। रुतबा इतना कि सन 2005 में उसके बेटे के जन्मदिन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार खुद उसके घर गये थे। यह किसी से छिपा नहीं है कि ब्रजेश के अखबारों को राज्य सरकार के सबसे ज्यादा विज्ञापन क्यों मिलते हैं? बच्चियों के लिए बना आश्रम, ब्रजेश का घर और तीनों अखबारों के कार्यालय परस्पर सटे हुए हैं। कह सकते हैं कि एक ही परिसर में हैं। पैसे का रुतबा, आखबार-नवीसी की ठसक और अफसर-नेताओं की संलिप्तता से यह पाप सालों तक होता रहा। तभी यहां की लड़कियों को बाहर भेजने, दोस्तों को भीतर लाने व हर दिन लड़कियों की अस्मत से खेलने के घिनौने कृत्य की खबरें बाहर नहीं आ पायीं। ये बच्चियां उस समाज से आती हैं, जो शोषण को अपनी नियति मानता है। इन्हें दबाना, चुप करना आसान होता है। जिस उम्र में इन्हें अपनी मां के आंचल में होना चाहिए, उसमें वे उज्जवल भविष्य की उम्मीदों के साथ घर से दूर रह रही थीं। अब ये बच्चियां कभी बाहरी समाज पर भरोसा नहीं कर पाएंगी। यह विडंबना ही है कि इन बच्चियों के साथ घिनौना काम करने वालों के प्रति कहीं जन आक्रोश जैसी बात सामने नहीं आ रही है। यदि सरकार इन बच्चियों को सुरक्षित, स्वस्थ और सकारात्मक माहौल नहीं दे सकती, तो बेहतर होगा कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता।
एक बात और, यह कहानी केवल मुजफ्फरपुर के आश्रम की ही नहीं है। टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस ने बिहार के कई अन्य आश्रमों में भी ऐसे ही हालात होने की आशंका जतायी है। शक तो यह भी है कि कई आश्रमों में एक संगठित गिरोह यह सब कर रहा था। विडंबना यह है कि दिल्ली इस पाशविकता से निर्विकार है। वहां कोई मोमबत्ती या जुलूस-जलसा नहीं। एक बात जान लें कि इन बच्चियों की देखभाल पर हमारे-आपके कर से व्यय हो रहा था। यानी हम भी उनके पालकों में से एक हुए लेकिन हमारा मौन हमारे ही गैर-जिम्मेदाराना रवैये को उजागर कर रहा है। कभी उन छोटी बच्चियों से मिलें, उनकी आंखों से बहते हुए आंसुओं और मौन को पढ़ें, लगता है कि वे पूछ रही हैं कि उनका दर्द इंडिया गेट पर भीड़ क्यों नहीं जुूटा पाया? हंसने-खेलने के दिनों में जीवन के प्रति उनकी निराशा हर देशवासी से सवाल करती दिखती है कि क्या मेरी देह का दंश आपको भीतर से झकझोरता नहीं है?

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

SHAHAR turning river

क्यों  आ रही है शहरों में बाढ़
 पंकज चतुर्वेदी

आशाढ की पहली बरसात में एक घंटे पानी क्या बरसा राजधानी दिल्ली व उससे सटे षहर ठिठक गए। सड़ाकं पर दरिया था और नाले उफान पर। दिल्ली से सटे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव जैसे षहरों के बडे नाम घुटने-घुटने पानी में डूबते दिखे। मप्र का छोटा सा कस्बा शिवपुरी भी पानी-पानी हो गया और छह महीने से बारिश की कामना कर रहे लोग आने वाले तीन महीनों की आश्ंाका भांप कर कांप गए। एसी ही खबरें गोंडा हो या औरेया, गुवाहाटी हो या फिर मुंबई से आ रही हैं। पूरे देश में गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं।
विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं । वैसे इस बात की जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का इंतजार क्यों होता है । इसके हल के सपने, नेताओं के वादे और पीड़ित जनता की जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की हड़बड़ाहट सब कुछ भुला देती है । यह सभी जानते हैं कि दिल्ली में बने ढेर सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सबवे हलकी सी बरसात में जलभराव के स्थाई स्थल हैं,लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं कर रहा है कि आखिर निर्माण की डिजाईन में कोई कमी है या फिर उसके रखरखाव में ।
देश की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
बारिश के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकोंू से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिश में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाई में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
अब षायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे।
हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । और यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और, उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचाैंंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृति का परिणाम है कि देश में षहरों में और षहरों की आबादी बढ़ती जा रही है।
दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । नागपुर का सीवर सिस्टम बरसात के जल का बोझ उठाने लायक नहीं है, साथ ही उसकी सफाई महज कागजों पर होती है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। बंगलौर में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।
महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा । दिल्ली में तो हाई कोर्ट लगभग हर साल नगर निगम को नालों की सफाई को लेकर  फटकारता है, लेकिन जिम्मेदर अफसर इससे बेपरवाह रहते हैं।
नदियों या समु्रद के किनारे बसे नगरों में तटीय क्षेत्रों में निर्माण कार्य पर पांबदी की सीमा का कड़ाई से पालन करना समय की मांग है । तटीय क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण जल बहाव के मार्ग में बाधा होते हैं, जिससे बाढ़ की स्थिति बन जाती है । सीआरजेड कानून में तटों पर निर्माण, गंदगी आदि पर कड़े प्रावधान हैं, लेकिन सरकार अमले कभी भी इन पर क्रियान्वयन की सोचते तक नहीं हैं ।
विभिन्न नदियों पर बांधे जा रहे बड़े बांधों के बारे में नए सिरे से विचार करना जरूरी है । गत वर्श सूरत में आई बाढ़ हो या फिर उससे पिछले साल सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के कई जिलों का जलप्लावन, यह स्पष्ट होता है कि कुछ अधिक बारिश होने पर बांधों में क्षमता से अधिक पानी भर जाता है । ऐसे में बांधेंा का पानी दरवाजे खोल कर छोड़ना पड़़ता है । अचानक छोड़े गए इस पानी से नदी का संतुलन गड़बड़ाता है और वह बस्ती की ओर दौड़ पड़ती है । सनद रहे ठीक यही हाल दिल्ली में भी यमुना के साथ होता है । हरियाणा के बांधों में पानी अधिक होने पर जैसे ही पानी छोड़ा जाता है राजधानी के पुश्तों के पास बनी बस्तियां जलमग्न हो जाती हैं । बांध बनाते समय उसकी अधिकतम क्षमता, अतिरिक्त पानी आने पर उसके अनयंत्र भंडारण के प्रावधान रखना शहरों को बाढ़ के खतरे से बचा सकता है ।
महानगरों में बाढ़ का मतलब है परिवहन और लोगों का आवागमन ठप होना। इस जाम के ईंधन की बर्बादी, प्रदूशण स्तर में वृद्धि और मानवीय स्वभाव में उग्रता जैसे कई दीर्घगामी दुश्परिणाम होते हैं। इसका स्थाई निदान तलाशने के विपरीत जब कहीं शहरों में बाढ़ आती है तो सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य लगाना होता है, जोकि तात्कालिक सहानुभूतिदायक तो होता है, लेकिन बाढ़ के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में अक्षम होता है । जल भराव और बाढ़ मानवजन्य समस्याएं हैं और इसका निदान दूरगामी योजनाओं से संभव है ; यह बात शहरी नियोजनकर्ताओं को भलींभांति जान लेना चाहिए और इसी सिद्धांत पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए ।

पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),

बुधवार, 25 जुलाई 2018

save every drop of rain

जरा सोचें हम कितना पानी बर्बाद करते हैं

पंकज चतुर्वेदी

janwani, meerut 

कहा जा रहा है कि देश के तिहाई हिस्से में बरसात कमजोर है और वहां सूखे के हालात की संभावना है। दूसरी तरफ देश के कई हिस्सो में पानी तबाही मचाए है। खासकर महानगर व बड़े शहर जोकि सारे साल बूंद-बूंद पानी को तरसते हैं, थोड़ी सी बरसात से पानी-पानी हो रहे हैं। लेकिन विडंबना है कि पानी से लबालब दिख रही प्रकृति कुछ ही दनिों में पानी के लिए तरसती दिखेगी। बारिकी से देखें तो पानी की कमी से ज्यादा उसको व्यर्थ करने या कोताही से खर्च करने या अपेक्षित रूप से संचय नहीं कर पाने का ही परिणाम होता है कि हम पानी की कमी का रोना रोते हैं। खासतौर पर इस समय जब पानी की अफरात है, उसे सालभर संचय करने के लिए उसकी आवक-जावक पर नजर रखना जरूरी है। जान लें कि बाढ़ और सूखा प्रकृति के दो पहलू हैं, बिल्कुल धूप और छांव की तरह,। लेकिन बारिष बीतते ही देषभर में पानी की त्राहि-त्राहि की खबरें आने लगती हैं, । कही पीने को पानी नहीं है तो कहीे खेत को । लेकिन क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि बारिश का इतना सारा पानी आखिर जाता कहां है?  इसका कुछ हिस्सा तो भाप बनकर उड़ जाता है और कुछ समुद्र में चला जाता है। कभी सोचा आपने कि यदि इस पानी को अभी सहेजकर न रखा गया तो भविष्य में क्या होगा और कैसे पूरी होगी हमारी पानी की आवश्यकता।

दुनिया के 1.4 अरब लोगाों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति जीवनदायी संपदा यानी पानी हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है और इस चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है हमारी जिंदगी का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं उसे वापस भी हमें ही लौटाना होता है। पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं जिसे जानकर लगेगा कि सचमुच अब हममें थोड़ा सा भी पानी नहीं बचा है। कुछ तथ्य इस प्रकार हैं-मुंबई में रोज गाड़ियां धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण 17 से 44 प्रतिशत पानी प्रतिदिन बेकार बह जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी का प्रतिदिन 2.16 घन मीटर पानी बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। भारत में हर वर्ष बाढ़ के कारण करीब हजारों मौतें व अरबों का नुकसान होता है। इजरायल में औसत बारिष 10 सेंटीमीटर है , इसके बावजूद वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात करता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटीमीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद सिंचाई के लिए जरूरी जल की कमी बनी रहती है।

पिछले 70 वर्षो में भारत में पानी के लिए कई भीषण संघर्ष हुए हैं, कभी दो राज्य नदी के जल बंटवारे पर भिड़ गए तो कहीं सार्वजनिक नल पर पानी भरने को ले कर हत्या हो गई। खेतों में नहर से पानी देने को हुए विवादों में तो कई पुष्तैनी दुष्मिनियों की नींव रखी हुई हैं।  यह भी कडवा सच है कि हमारे देष में औरत पीने के पानी की जुगाड़ के लिए हर रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती हैं। पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है। पूरी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलोलीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है जोकि खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में धु्रव प्रदेशों में है। बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुआं, झरना और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का 60वां हिस्सा खेती और उद्योगों में खपत होता है। बाकी का 40वां हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं। यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है तो पांच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है। बॉथ टब में नहाते समय धनिक वर्ग 300 से 500 लीटर पानी गटर में बहा देते हैं। मध्यम वर्ग भी इस मामले में पीछे नहीं हैं जो नहाते समय 100 से 150 पानी लीटर बरबाद कर देता है। हमारे समाज में पानी बरबाद करने की राजसी प्रवृत्ति है जिस पर अभी तक अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं हुई है। हकीकत में जब से देश आजाद हुआ है तब से आज तक इस दिशा में कोई भी काम गंभीरता से नहीं हुआ है। विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है। ऐसे में प्रति वर्ष 6 अरब लीटर बोतलबंद पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

पानी का स्रोत कही जाने वाली नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोजने में लगे हुए हैं, किंतु जब तक कानून में सख्ती नहीं बरती जाएगाी तब तक अधिक से अधिक लोगाों को दूषित पानी पीने को विवश होना पड़ सकता है। पृथ्वी का विस्तार 51 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। उसमें से 36 करोड़ वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र पानी से घिरा हुआ है। दुर्भाग्य यह है कि इसमें से पीने लायक पानी का क्षेत्र बहुत कम है। 97 प्रतिशत भाग तो समुद्र है। बाकी के तीन प्रतिशत हिस्से में मौजूद पानी में से 2 प्रतिशत पर्वत और ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है, जिसका कोई उपयोग नहीं होता है। यदि इसमें से करीब 6 करोड़ घन किलोमीटर बर्फ पिघल जाए तो हमारे महासागारों का तल 80 मीटर बढ़ जाएगाा, किंतु फिलहाल यह संभव नहीं। पृथ्वी से अलग यदि चंद्रमा की बात करें तो वहां के ध्रुवीय प्रदेशों में 30 करोड़ टन पानी का अनुमान है। पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियां भी जलजन्य है। आलू में और अनन्नास में 80 प्रतिशत और टमाटर में 95 प्रतिशत पानी है। पीने के लिए मानव को प्रतिदिन कम से कम पांच लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए। एक लीटर गााय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, जबकि एक किलो गेहूं उगााने के लिए एक हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए चार हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलापन आने के बाद निजीकरण का जोर बढ़ा है। एक के बाद एक कई क्षेत्र निजीकरण की भेंट चढ़ते गए। सबसे बड़ा झटका जल क्षेत्र के निजीकरण का है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया तब कोई बहस नहीं हुई। बड़े पैमाने पर बिजली गुल होने का डर दिखाकर निजीकरण को आगे बढ़ाया गया जिसका नतीजा आज सबके सामने है। सरकारी तौर पर भी यह स्वीकार किया जा चुका है कि सुधार औंधे मुंह गिरे हैं और राष्ट्र को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अब पानी के क्षेत्र में ऐसी ही निजीकरण की बात हो रही है। कई जगह नदियों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। विकास के नाम पर तालबा व नदियों को उजाड़ने में कोई परहेज नहीं हो रहा है।
Raj express 30-7

यदि अभी बरसात के पानी की हर बूंद को सहेजा नहीं गया तय मानें कि फिर पानी केवल हमारी आंखों में ही बच पाएगा। हमारा देश वह है जिसकी गोदी में हजारों नदियां खेलती थीं, आज वे नदियां हजारों में से केवल सैकड़ों में रह गई हैं। आखिर कहां गई ये नदियां कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ें, हमारे गांव-मोहल्लों तक से तालाब, कुएं, बावडी आदि लुप्त हो रहे हैं। जान लें, पानी की कमी, मांग में वृद्धि तो साल-दर-साल ऐसी ही रहेगी। अब मानव को ही बरसात की हर बूंद को सहेजने और उसे किफायत से खर्च करने पर विचार करना होगा। इसमें अन्न की बर्बादी सबसे बड़ा मसला है- जितना अन्न बर्बाद होता है, उतना ही पानी जाया होता है।

बुधवार, 18 जुलाई 2018

Identify supporter of violence in the name of religion

हिंसा पर अट्टहास करने वालों के असली मकसद को पहचानें। 

पंकज चतुर्वेदी 


17 जुलाई 2018 को जब देश की शीर्ष अदालत कानून के भीड़ के हाथों बंधक बनाने की बढ़ती प्रवृति पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए इस पर सख्त कानून का आदेश दे रही थी, ठीक उसी समय देश के छोर पर झारखंड के पाकुड़ जिले के एक गांव में अस्सी साल के स्वामी अग्निवेश को सरे राह पीटा जा रहा था। जयश्री राम के उदघोष के साथ मां-बहन की गालियां और निर्मम पिटाई होती रही। अग्निवेश के बोल विवादास्पद होते हैं, वे हरियाणा सरकार में पूर्व मंत्री रहे हैं, यह सूचना स्थानीय प्रशासन के लिए पर्याप्त थी कि उनके साथ सुरक्षा व्यवस्था हो, लेकिन लगता है कि सारे कुएं में भांग घुली थी और घटना के घंटाभर बाद पुलिस पहुंची। मसला बस यहीं तक नहीं रूका, उसके बाद देश में इस घटना के विरोध में जितने स्वर उठे, उतने ही लोग इस पर हर्ष-आनंद जताने वाले भी मुखर थे। ठीक उसी तरह जैसे गौरी लंकेश की हत्या, अखलाक या पहलु खां या ऐसी ही अन्य  सार्वजनिक रूप से पीट-पीट कर मारने की घटनाओं के बाद हुआ। फेसबुक को एक व्यापक सर्वे तो नहीं कह सकते, लेकिन वह पांच हजार लेागों के मिजाज का आईना जरूर है। सबसे दुखद यह है कि इस तरह धर्म-रक्षा के नाम पर सार्वजनिक हत्या करने वालों के पक्ष में कुतर्क गढ़ने वालों में सबसे अधिक वे लोग होते हैं जिन्हें सनातन समाज में श्रेष्ठ, शिक्षित और समाज का मार्गदर्शक माना जाता है।

देश में सांप्रदायिक दंगों का काला अतीत दो दशक से ज्यादा पुराना है। यह बात दीगर है कि धर्म की आउ़ में भउ़के दंगों की जब जांच हुई तो पता चला कि अधिकांश के पीछे जमीन पर कब्जे, व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा जैसे मसले थे। अयोध्या के विवादास्पद ढांचे को गिराने का प्रयोग भीड़तंत्र को कानून व संविधान के खिलाफ नैतिक बनाने का प्रयोग संभवतया पहला था। उसके बाद सोशल मीडिया के आगमन के बाद अफवाहों, कुतर्क, असत्य के आधार पर एक आम आदमी में इतना भय पैदा कर देना कि वह एक ऐसी भीड़ की हिस्सा बन जाए जोकि किसी की भी जान ले सकती है, बेहद आसान हो गया। धर्म, संस्कृति, देश, बच्चे, भाषा , विचार ऐसे ही कुछ भावनात्मक मुद्दों को आए रोज की सियासत का हिस्सा बना कर अजीब सा खैफ का माहौल बनाया जाता है फिर जब भय अपने चरम पर होता है तो इंसान आक्रामक हां जता है, उसका विवेक शुन्य हो जाता है और वह संविधान-कानून’ नैतिकता, सभी से परे हट कर महज भीउ़ का अंजान चैहरा बन जाता है।

भीउ़ का उन्माद तो ठीक है, आखिर वे लोग कौन हें जोकि भीउ़ के किसी कृत्य को अपना नैतिक समर्थन देते है। जैसे कि स्वामी अग्निवेश की पिटाई के लिए लेागों ने उनके हिंदू देवी-देवता या पूजा पर दिए गए बयानों की आउ़ ली, कुछ ने उन्हें नक्सली समथक या ईसाई मिशिनरी का आदमी कहा। कुछ लोग अन्ना आंदोलन में उनके कपिल सिब्बल से बातचीत का वीडियो ले कर आ गए। लेकिन कोई यह नहंी स्पष्ट कर पाया कि क्या वैचारिक असहमति या प्रतिरोध-स्वर होने पर किसी की पिटाई या हत्या जायज है। मान लेंकि अलवर का पहलू खांन गाय का अवैध व्यापार कर रहा था तो उसे सरे राह पीटने व उसकी जान लेने के अधिकार किस कानून-धर्म-संथा ने अपराधियां को दे दिए थे। यदि अग्निवेश नक्सली समर्थक है तो पंद्रह साल से छत्तीसगड़ में और दस साल की झारंखंड की सरकार ने उन्हें जेल में क्यों नहीं डाल दिया। मूर्तिपूजा के विरोध में तो स्वामी दयानंद सरस्वती ने क्या कुछ नहीं कहा तो क्या उनकी हत्या को जायज ठहराया जा सकता है? ये हत्यारे, ये विचार और ये तेवर असल में देश के लोकतंत्रात्मक प्रणाली के लिए ही खतरा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि देश की लोकतंत्रात्मक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के लिए भीड़ तंत्र नुकसानदेह है।
सोशल मीडिया पर अग्निेवेश की पिटाई या गौरी लंकेश की हत्या या फिर ऐसी ही अन्य मॉब लिंचिंग की घटनाओं का समर्थन करने वाले एक ही विचारधारा के लोग हैं। उनका तर्क भी एक ही है कि हिंदू धर्म खतरे में है और ऐसी घटनांए धर्म-रक्षा के लिए हैं। असल में ऐसे लेाग किसी कुभ, सिंहस्था या माघ मेले में जाते नहीं हैं, ये लोग हर महीने की अमावस पर गंगा के तट को देखते नहीं है, जहां बगैर किसी परिषद, संघ या संगठन के आमंत्रण के लाखों लोग सदियों से आते हैं और आस्था के साथ अपने पीढ़ियों से चले आ रहे  पुराने संस्कार निभाते हैं। विडंबना है कि फेसबुक पर धर्म रक्षा के नाम पर  हिंसा को जायद ठहराने वालों में सबसे बड़ी संख्या उस समाज के लोगों की होती है जिस पर जिम्मेदारी है कि वह लोगों को धर्म के सही मायने, धर्मग्रंथों का असली मकदसद बताए आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि सबसे अधिक बुद्धिजीवी कहे जाना वाले समाज को ही धर्म खतरे में दिख रहा है?
हकीकत यह ह कि अभी कुछ दशक पहले तक शिक्षा और साक्षरता पर सीमित लोगों का अधिकार था। सरकार, नौकरी, समाज सभी जगह उनकी पेठ सबसे ज्यादा थी। वैश्वीकारण के बाद सभी समाज, वर्ग, जाति के लोग शिक्षा पा रहे हैं। सभी धर्म को अपने नजरिये से आंक रहे हैं। सभी के पास वदे को सरल भाषा में पढ़ने व समझने की अवसर पर समझ है। ऐसे में सदियों से अपने ज्ञान के बल पर अल्प श्रम के बद भी शाही जीवकोपार्जन करने की प्रवृति वाले लोगों को अपना सिंहासन डगमगाता दिख रहा है। । हालांकि यह हर गांव’कस्बे की कहानी है कि नवरात्रि जैसे पर्व में मुर्गा व शराब की बिक्री कम हो जाती है, जाहिर है कहने की जरूरत नहीं कि इसके सेवन मे कौन लेाग शािमल हैं। शायद जान कर आश्चर्य होगा कि सन्यास व संत परंपरा में अधिकांश लोग गैर ब्राहम्ण है और अखाड़ों में रहेन वाले साध्ुाओं में सर्वाधिक ओबीसी कहलाने वाले वर्ग से होते हैं। इसे बावजूद खुद को धर्म की शीर्ष मानने वाले स्वयंभु लोग  अब उन लोगों को भयभीत कर, भड़का कर धर्म के संकट का हौआ खड़ा कर रहे हैं। असल में संकट में उनका जातिय आधार पर स्थावित स्वयंभु श्रेष्ठता का दंभ है। जो उन्होने स्वयं अपने मन-वचन और कर्म से गंवाया है। ऐसे ही लोग सोशल मीडिया पर मुखर स्वर में धर्म के नाम पर हुडदंगई को जायज ठहराते हैं। एक बात और इस भीउ़ को धार देने में बेरोजगारी, खाली दिमाग,  बेहद कम दाम पर मोाबईल पर चौवीसों घंटे उपलब्ध डाटा और ऐसे मसलों में राजनीतिक नेत्त्व का ढीला रवैया आग में पानी का काम करता है।
यदि असमति या अपने विचार को स्थापित करने के लिए अग्निवेश को पीटने को जायज ठहराया जा सकता है तो फिर पनी कथित विचारधारा के लिए सरेआम हत्या व लूट कने वाले नक्सली या पूर्वोत्र या कश्मीर में अलगाववादियों के भी अपने तर्क सामने हैं।  अराजकता, और कानून से परे समानांतर  हरकतें करना, देश के अस्तित्व, अस्मिता और अवसर के लिए बेहद खतरनाक हैं। इससे हमारी आर्थिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय छबि पर भी असर पउ़ रहा हे। आम युवाओं को  सोचना होगा कि सोशल मीडिया या अन्य माध्यामों से उन्हें भयभीत कर उकसाने वाले लोगो का असल मकसद क्या है?  जब तक संविधान है तब तक ना तो देश को खतरा है और ना ही सनातन धर्म को।

रविवार, 15 जुलाई 2018

City has to prepare himself for rain

खुद संभलना होगा शहरों को


jagran , national edition, 16-7-18




अब तो बरसात वाले बादल पूरे देश में जम कर बरस रहे हैं। लगभग आधा देश बाढ़ की चपेट में हैं, लेकिन देश के विकास का पैमाना कहे जाने वाले बड़े शहर राजधानी दिल्ली हो, जयपुर या फिर भोपाल या बेंगलुरु या फिर हैदराबाद कुदरत की इस मेहरबानी के कारण बेहाल हैं। भले ही वहां पूरे साल एक-एक बूंद पानी के लिए मारामार होती हो, लेकिन जब पानी खुल कर बरसता है तो वहां की अव्यवस्थाएं उन्हें पानी-पानी कर देती हैं। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसद झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह जर्जर है। मुंबई या कोलकाता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं।

आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लोगों को मोह भंग हुआ और जमीन को बेच कर शहरों में मजदूरी करने का प्रचलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही, पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनाधिकृत कॉलोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक न तो नालियां बनीं, न सड़क और धीरे-धीरे इलाका ‘अरबन-स्लम’ में बदल गया। लोग रहें कहीं भी, लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्थ्य का दबाव तो उसी ‘चार दशक पुराने’ नियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है। 1परिणाम सामने हैं कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकता जैसे महानगर ही नहीं देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है और औसतन बीस फीसद जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है। जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे से भूकंप से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कॉलोनियां के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं। यह दुखद है कि हमारे नीति निर्धारक अभी भी अनुभवों से सीख नहीं रहे हैं और आंध्रप्रदेश जैसे राज्य की नई बन रही राजधानी अमरावती कृष्णा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बनाई जा रही है। 1शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई ना होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े का भंडार व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था न होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी को नाली तक जाने या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। पॉलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्र, कुछ ऐसे कारण हैं, जो गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के सही उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे।

एक बात और बेंगलुरु या हैदराबाद या दिल्ली में जिन इलाकों में पानी भरता है यदि वहां की कुछ दशक पुरानी जमीनी संरचना का रिकॉर्ड उठा कर देखें तो पाएंगे कि वहां पर कभी कोई तालाब, जोहड़ या प्राकृतिक नाला था। अब पानी के प्राकृतिक बहाव के स्थान पर सड़क या कालोनी रोपी गई है तो पानी भी तो धरती पर अपने हक की जमीन चाहता है? न मिलने पर वह अपने पुराने स्थानों की ओर रुख करता है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही हैं। बेंगलुरु में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है। शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्नोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा। यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं। परिणामत: थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है। यदि अभी भी समाज संभल जाए और प्राकृतिक नदी, नालों, पहाड़ों पर अतिक्रमण की प्रवृति से बचे तो कम से कम उनकी बसी-बसाई गृहस्थी जलपवित होने से बच सकती है।

शहरीकरण व वहां बाढ़ की दिक्कतों पर विचार करते समय एक वैश्विक त्रसदी को ध्यान में रखना जरूरी है-जलवायु परिवर्तन। इस बात के लिए हमें तैयार रहना होगा कि वातावरण में बढ़ रहे कार्बन और ग्रीन हाउस गैस प्रभावों के कारण ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा रहा है और इसकी दुखद परिणति है-मौसमों का चरम। गरमी में भयंकर गर्मी तो ठंड के दिनों में कभी बेतहाशा जाड़ा तो कभी गरमी का अहसास। बरसात में कभी सुखड़ तो कभी अचानक आठ से दस सेमी पानी बरस जाना। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि धरती का तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा और उसके चलते कई शहरों पर डूब का खतरा होगा।

अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं हैं, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा निस्तारण पर काम करें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानी कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों, नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी किस्म के निर्माण से मुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।


शनिवार, 14 जुलाई 2018

how can we get rid off bangladeshi



कैसे बाहर हों बगैर बुलाए बांग्लादेशी 

पंकज चतुर्वेदी


इन दिनों देश की सुरक्षा एजंसियों के निशाने पर बांग्लादेशी हैं। उनकी भाषा, रहन-सहन और नकली दस्तावेज इस कदर हमारी जमीन से घुलमिल गए हैं कि उन्हें विदेशी सिद्ध करना लगभग नामुमकिन हो चुका है। जब - जब हमारेे पड़ोसी देशों में अशांति हुई, अंदरूनी मतभेद हुए या कोई प्राकृतिक विपदा आई ; वहां के लोग षरण लेने के लिए भारत में घुस आए । ये लोग आते तो दीन हीन याचक बन कर हैं, फिर अपने देशों को लौटने को राजी नहीं होते हैं । आजादी मिलने के बाद से ही हमारा देश ऐसे बिन बुलाए मेहमानों को झेल रहा है । ऐसे लोगो को बाहर खदेड़ने के लिए जब कोई बात हुई, सियासत व वोटों की छीना-झपटी में उलझ कर रह गई । आधार , राष्ट्रीय पहचान पंजी जैसे प्रयोगों में ये घुसपैठिये सेंध लगा चुके हैं। गौरतलब है कि राजस्थान में ऐसे कई हिन्दु हैं जो कि पाकिस्तान से हमारे यहां आ कर अवैध रूप से रह रहे हैं और उनको ध्यान में रख कर सरकार अवैध प्रवासियों के बारे में किसी दौहरी नीति पर विचार कर रही है । असम में भी विदेशियों को बाहर करने की प्रक्रिया में धर्मगत भेदभाव विवाद का कारण बना हुआ है।

आज जनसंख्या विस्फोट से देश की व्यवस्था लडखड़ा गई है । मूल नागरिकों के सामने भोजन, निवास, सफाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव दिनों -दिन गंभीर  होता जा रहा है । तब लगता है कि षरणार्थी बन कर आए या घुसपैठिये  करोड़ों विदेशियों को बाहर निकालना ही श्रैयस्कर होगा । हमारे देश में बसे विदेशियों का महज 10 फीसदी ही वैध है । षेश लोग कानून को धता बता कर भारतीयों के हक नाजायज तौर पर बांट रहे हैं । ये लोग यहां के बाशिंदों की रोटी तो छीन ही रहे हैं, देश के सामाजिक व आर्थिक समीकरण भी इनके कारण गड़बड़ा रहे हैं  । और अब तो देश के कई गंभीर अपराधों में विदेशियों के दिमाग होने से आंतरिक सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है ।
अनुमान है कि आज कोई दस करोड़ के करीब बांग्लादेशी हमारे देश में जबरिया रह रहे हैं। 1971 की लड़ाई के समय लगभग 70 लाख बांग्लादेशी(उस समय का पूर्वी पाकिस्तान) इधर आए थे । अलग देश बनने के बाद कुछ लाख लौटे भी । पर उसके बाद भुखमरी, बेरोजगारी के शिकार बांग्लादेशियों का हमारे यहां घुस आना अनवरत जारी रहा । पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, त्रिपुरा  के सीमावर्ती  जिलों की आबादी हर साल बैतहाशा बढ़ रही है । नादिया जिला (प बंगाल) की आबादी 1981 में 29 लाख थी । 1986 में यह 45 लाख, 1995 में 60 लाख और आज 65 लाख को पार कर चुकी है । बिहार में पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार, सहरसा आदि जिलों की जनसंख्या में अचानक वृद्धि का कारण वहां बांग्लादेशियों की अचानक आमद ही है ।
raj express bhopal 16-7-18

असम में 50 लाख से अधिक विदेशियों के होने पर सालों खूनी राजनीति हुई । सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय के बाद विदेशी नागरिक पहचान कानून को लागू करने में राज्य सरकार का ढुलमुल रवैया राज्य में नए तनाव पैदा कर सकता है । अरूणाचल प्रदेश में मुस्लिम आबादी में बढ़ौतरी सालाना 135.01 प्रतिशत है, जबकि यहां की औसत वृद्धि 38.63 है । इसी तरह पश्चिम बंगाल की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर औसतन 24 फीसदी के आसपास है, लेकिन मुस्लिम आबादी का विस्तार 37 प्रतिशत से अधिक है । यही हाल मणिपुर व त्रिपुरा का भी है । जाहिर है कि इसका मूल कारण बांग्लादेशियों का निर्बाध रूप से आना, यहां बसना और निवासी होने के कागजात हांसिल करना है । कोलकता में तो अवैध बांग्लादेशी बड़े स्मगलर और बदमाश बन कर व्यवस्था के सामने चुनौति बने हुए हैं ।
राजधानी दिल्ली में सीमापुरी हो या यमुना पुश्ते की कई किलोमीटर में फेैली हुई झुग्गियां, लाखेंा बांग्लादेशी डटे हुए हैं । ये भाशा, खनपान, वेशभूशा के कारण स्थानीय बंगालियों से घुलमिल जाते हैं । इनकी बड़ी संख्या इलाके में गंदगी, बिजली, पानी की चोरी ही नहीं, बल्कि डकैती, चोरी, जासूसी व हथियारों की तस्करी बैखौफ करते हैं । सीमावर्ती नोएडा व गाजियाबाद में भी इनका आतंक है । इन्हें खदेड़ने के कई अभियान चले । कुछ सौ लोग गाहे-बगाहे सीमा से दूसरी ओर ढकेले भी गए । लेकिन बांग्लादेश अपने ही लोगों को अपनाता नहीं है । फिर वे बगैर किसी दिक्कत के कुछ ही दिन बाद यहां लौट आते हैं । जान कर अचरज होगा कि बांग्लादेशी बदमाशों का नेटवर्क इतना सशक्त है कि वे चोरी के माल को हवाला के जरिए उस पार भेज देते हैं । दिल्ली व करीबी नगरों में इनकी आबादी 10 लाख से अधिक हैं । सभी नाजायज बाशिंदों के आका सभी सियासती पार्टियों में हैं । इसी लिए इन्हें खदेड़ने के हर बार के अभियानों की हफ्ते-दो हफ्ते में हवा निकल जाती है ।
सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ की मानें तो भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित आठ चेक पोस्टों से हर रोज कोई 6400 लोग वैध कागजों के साथ सीमा पार करते हैं और इनमें से 4480 कभी वापिस नहीं जाते। औसतन हर साल 16 लाख बांग्लादेशी भारत की सीमा में आ कर यहीं के हो कर रह जाते हैं।सरकारी आंकड़ा है कि सन 2000 से 2009 के बीच कोई एक करोड़ 29 लाख बांग्लादेशी बाकायदा पासपोर्ट-वीजा ले कर भारत आए व वापिस नहीं गए। असम तो अवैध बांग्लादेशियों की  पसंदीदा जगह है। सन 1985 से अभी तक महज 3000 अवैध आप्रवासियों को ही वापिस भेजा जा सका है।  राज्य की अदालतों में अवैध निवासियों की पहचान और उन्हें वापिस भेजने के कोई 40 हजार मामले लंबित हैं। अवैध रूप से घुसने व रहने वाले स्थानीय लोगों में षादी करके यहां अपना समाज बना-बढ़ा रहे हैं।
भारत में बस गए करोडों़ से अधिक विदेशियों के खाने -पीने, रहने, सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग का खर्च न्यूनतम पच्चीस रूपए रोज भी लगाया जाए तो यह राशि सालाना किसी राज्य के कुल बजट के बराबर हो जाएगी । जाहिर है कि देश में उपलब्ध रोजगार के अवसर, सरकारी सबसिडी वाली सुविधाओं पर से इन बिन बुलाए मेहमानों का नाजायज कब्जा हटा दिया जाए तो भारत की मौजूदा गरीबी रेखा में खासा गिराव आएगा ।
इन घुसपैठियों की जहां भी बस्तियां होती हैं, वहां गंदगी और अनाचार का बोलबाला होता है । ये कुंठित लोग पलायन से उपजी अस्थिरता के कारण जीवन से निराश होते हैं । इन सबका विकृत असर हमारे सामाजिक परिवेश पर भी बड़ी गहराई से पड़ रहा है । हमारे पड़ोसी देशों से हमारे ताल्लुकात इन्हीं घुसपैठियों के कारण तनावपूर्ण भी हैं । इस तरह ये विदेशी हमारे सामाजिक, आर्थिक और अंतरराश्ट्रीय पहलुओं को आहत कर रहे हैं ।
दिनों -दिन गंभीर हो रही इस समस्या से निबटने के लिए सरकार तत्काल ही कोई अलग से महकमा बना ले तो बेहतर होगा, जिसमें प्रशासन, पुलिस के अलावा मानवाधिकार व स्वयंसेवी संस्थाओं के लेाग भी हों ं। साथ ही सीमा को चोरी -छिपे पार करने के रैक्ेट को तोड़ना होगा । वैसे तो हमारी सीमाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन यह अब किसी से छिपा नहीं हैं कि बांग्लादेश व पाकिस्तान सीमा पर मानव तस्करी का बाकायदा धंधा चल रहा है, जो कि सरकारी कारिंदों की मिलीभगत के बगैर संभव ही नहीं हैं ।
आमतौर पर विदेशियों को खदेड़ने की बातें सांप्रदायिक रंग ले लेती हैं । सबसे पहले तो इस समस्या को किसी जाति या संप्रदाय के विरूद्ध नहीं अपितु देश के लिए खतरे के रूप में लेने की सशक्त राजनैतिक इच्छा षक्ति का प्रदर्शन करना होगा । इस देश में देश का मुसलमान गर्व से और समान अधिकार से रहे, यह सुनिश्चित करने के बाद इस तथ्य पर आम सहमति बनाना जरूरी है कि ये बाहरी लोग हमारे संसाधनों पर डाका डाल रहे हैं और इनका किसी जातिविशेश से कोई लेना देना नहीं है ।
यहां बसे विदेशियों की पहचान और फिर उन्हें वापिस भेजना एक जटिल प्रक्रिया है । बांग्ला देश अपने लोगों की वापिसी सहजता से नहीं करेगा । इस मामले में सियासती पार्टियों का संयम भी महति है । वर्ग विशेश के वोटों के लालच में इस सामाजिक समस्या को धर्म आधारित बना दिया जाता है ।

सावधान सुलग रहा है असम

पंकज चतुर्वेदी

बहुप्रतिक्षित राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानि एनआरसी का पहला ड्राफ्ट आते ही सीमावर्ती राज्य असम में तनाव बढ़ गया है। सूची में घोषित आतंकी व लंबे समय से विदेश में रहे परेश बरूआ , अरूणोदय दहोटिया का नाम तो है लेकिन दो सांसद सहित कई विधायकों का नाम इसमें है ही नहीं। होजाई से भाजपा विधायक शिलादित्य देव, गोलकगंज विधायक अश्विनी राय सरकार रूपालीहाट से कांग्रस विधायक नूरूल हूदा, अंगूरलता डेका, बदरूद्दीन अजमल सहित कई ऐसे नामों को राज्य या देश की नागरिकता सूची में स्थान नहीं मिला है जोकि पीढ़ियों से राज्य में रह रहे हैं। अपना नाम देखने के लिए केंद्रों पर भीड़ है तो वेबसाईट ठप्प हो गई। इस बीच सिल्चर में एक व्यक्ति ने अपना नाम ना होने के कारण आत्महत्या कर ली। हजारों मामले ऐसे हैं जहां परिवार के आधे लेागों को तो नागरिक माना गया और आधों को नहीं। हालांकि प्रशासन कह रहा है कि यह पहला ड्राफ्ट है और उसके बाद भी सूचियों आएंगी। फिर भी कोई दिक्कत हो तो प्राधिकरण में अपील की जा  सकती है। यह सच है कि यह दुनिया का अपने आप में ऐसा पहला प्रयोग है जब साढ़े तीन करोड़ से अधिक लोगों की नागरिकता की जांच की जा रही है। लेकिन इसको ले कर बीते कई दिनों से राज्य के सभी कामकाज ठप्प हैं। पूरे राज्य में सेना लगा दी गई है।
असम समझौते के पूरे 38 साल बाद असम से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की जो कवायद शुरू हुई, उसमें राज्य सरकार ने सांप्रदायिक तउ़का दे दिया, जिससे आशंकाएं, भय और अविश्वास का महौल विकसित हो रहा है। असम के मूल निवासियों की बीते कई दशकों से मांग है कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से घुसपैठ कर आए लोगों की पहचान कर उन्हें वहां से वापिस भेजा जाए। इस मांग को ले कर आल असम स्टुडंेट यूनियन(आसू) की अगुवाई में सन 1979 में एक अहिंसक आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें सत्याग्रह, बहिष्कार, धरना और गिरफ्तारियां दी गई थीं। आंदोलनकारियों पर पुलिसिया कार्यवाही के बाद हालात और बिगड़े। 1983 में हुए चुनावों का इस आंदोलन के नेताओं ने विरोध किया।  चुनाव के बाद जम कर हिंसा शुरू हो गई।  इस हिंसा का अंत केंद्र सरकार के साथ 15 अगस्त 1985 को हुए एक समझौते (जिसे असम समझौता कहा जाता है) के साथ हुआ। इस समझौते के अनुसार जनवरी-1966 से मार्च- 1971 के बीच प्रदेश में आए लोगों को यहां रहने की इजाजत तो थी, लेकिन उन्हें आगामी दस साल तक वोट देने का अधिकार नहीं था। समझौते में केंद्र सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि सन 1971 के बाद राज्य में घुसे बांग्लादेशियों को वापिस अपने देश जाना होगा। इसके बाद आसू की सरकार भी बनीं। लेकिन इस समझौते को पूरे 38 साल बीत गए हैं और विदेशियों- बांग्लादेशी व म्यांमार से अवैध घुसपैठ जारी है। यही नहीं ये विदेशी बाकायदा अपनी भारतीय नागरिकता के दस्तावेज भी बनवा रहे हैं।
सन 2009 में मामला सुप्रीम केार्ट पहुचा। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी बनाने का काम शुरू हुआ तो जाहिर है कि अवैध घुसपैठियों में भय तो होगा ही। लेकिन असल तनाव शुरू होने जब राज्य शासन ने नागरिकता कानून संशोधन विधेयक को विधान सभा में पेश किया। इस कानून के तहत बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए हिंदू शरर्णाथियों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। यही नहीं घुसपैठियों की पहचान का आधार वर्ष 1971 की जगह 2014 किया जा रहा है। जाहिर है कि इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान करने का असल मकसद तो भटक ही जाएगा। हालांकि राज्य सरकार के सहयोगी दल असम गण परिषद ने इसे असम समर्झाते की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सरकार से अलग होने की धमकी भी दे दी है। हिरेन गोहाईं, हरेकृष्ण डेका, इंदीबर देउरी, अखिल गोर्गो जैसे हजारों सामाजिक कार्यकर्ता भी इसके विरेध में सड़कों पर हैं, लेकिन राज्य सरकार अपने कदम पीदे खींचने को राजी नहीं है ।
यह एक विडंबना है कि बांग्लादेश को छूती हमारी 170 किलोमीटर की जमीनी और 92 किमी की जल-सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसी का फायदा उठा कर बांग्लादेश के लोग बेखौफ यहां आ रहे हैं, बस रहे हैं और अपराध भी कर रहे हैं। हमारा कानून इतना लचर है कि अदालत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी बांग्लादेशी घोशित कर देती है, लेकिन बांग्लादेश की सरकार यह कह कर उसे वापिस लेने से इंकार कर देती है कि भारत के साथ उसका इस तरह का कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं हैं। असम में बाहरी घुसपैठ एक सदी से पुरानी समस्या है।  सन 1901 से 1941 के बीच भारत(संयुक्त) की आबादी में बृद्धि की दर जहां 33.67 प्रतिशत थी, वहीं असम में यह दर 103.51 फीसदी दर्ज की गई थी। सन 1921 में विदेशी सेना द्वारा गोलपाड़ा पर कब्जा करने के बाद ही असम के कामरूप, दरांग, सिबसागर जिलो में म्यांमार व अन्य देशों से लोगों की भीड़ आना षुरू हो गया था। सन 1931 की जनगणना में साफ लिखा था कि आगामी 30 सालों में असम में केवल सिवसागर ऐसा जिला होगा, जहां असम मूल के लोगों की बहुसंख्यक आबादी होगी।
असम में विदेशियों के षरणार्थी बन कर आने को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है - 1971 की लड़ाई या बांग्लादेश बनने से पहले और उसके बाद। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन 1951 से 1971 के बीच 37 लाख सत्तावन हजार बांग्लादेशी , जिनमें अधिकांश मुसलमान हैं, अवैध रूप से अंसम में घुसे व यहीं बस गए। सन 70 के आसपास अवैध षरणार्थियों को भगाने के कुछ कदम उठाए गए तो राज्य के 33 मुस्लिम विधायाकें ने देवकांत बरूआ की अगवाई में मुख्यमंत्री विमल प्रसाद चालिहा के खिलाफ ही आवाज उठा दी। उसके बाद कभी किसी भी सरकार ने इतने बड़े वोट-बैंक पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटाई। षुरू में कहा गया कि असम में ऐसी जमीन बहुत सी है, जिस पर ख्ेाती नहीं होती है और ये घुसपैठिये इस पर हल चला कर हमारे ही देश का भला कर रहे हैं। लेकिन आज हालात इतने बदतर है कि कांजीरंगा नेशनल पार्क को छूती कई सौ किलोमीटर के नेशनल हाईवे पर दोनों ओर केवल झुग्गियां दिखती हैं, जनमें ये बिन बुलाए मेहमान डेरा डाले हुए हैं। इनके कारण राज्य में संसाधनों का टोटा तो पड़ ही रहा है, वहां की पारंपरिक संस्कृति, संगीत, लोकचार, सभी कुछ प्रभावित हो रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि कोई आठ साल पहले राज्य के राज्यपाल व पूर्व सैन्य अधिकारी रहे ले.ज. एस.के. सिन्हा ने राश्ट्रपति को भेजी एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि राज्य में बांग्लादेशियों की इतनी बड़ी संख्या बसी है कि उसे तलाशना व फिर वापिस भेजने के लायक हमारे पास मशीनरी नहीं है।
एनआरसी के पहले मसौदे के करण लेागों में बैचेनी की बानगी केवल एक जिले नगांव के आंकड़ों से भांपी जा सकती है। यहां कुल 20,64,124 लेागों ने खुद को भारत का नागरिक बताने वाले दस्तावेज जमा किए थे। इसमें से पहली सूची में केवल 9,11,604 लेागों के नाम शामिल हैं। यानि कुल आवेदन के 55.84 प्रतिशत लोगों की नागरिकता फिलहाल संदिग्ध है। राज्य में केवल 1.9 करोड़ लेाग ही इस सूची में हैं जबकि नागरिकता का दावा करने वाले 1.39 करोड़ लेागों के नाम इसमें नदारत हैं। ऐसे ही हालत कई जिलों के हैं। इनमें कई सौ लेाग तो वे हैं जो सेना या पुलिस में तीस साल नौकरी कर रिटायर हुए, लेकिन उन्हें  इस सूची में नागरिकता के काबिल नहीं माना गया। भले ही राज्य सरकार संयम रखने व अगली सूची में नाम होने का वास्ता दे रही हो, लेकिन राज्य में बेहद तनाव, अनिश्तिता का माहौल है। ऐसे में कुछ लेाग अफवाहे फैला कर भी माहौल खराब कर रहे हैं।




शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

water foot print can prevent water scarcity in India

जल पद चिन्ह बचा सकते हैं बेपानी होने से

पंकज चतुर्वेदी


भारत के नीति आयोग द्वारा जारी जल पंबंधन सूचकांक से जाहिर हो गया है कि देश का विकास कहीं बाधित होगा तो वह होगा पानी की भीषण कमी से देश के 84 फीसदी ग्रामीण आबादी जलापुर्ति से वंचित है तो जो पानी उपलब्ध भी है तो उसमें से 7 प्रतिशत दूषित है।  इसके विपरीत देश की जल कुंडली एकबारगी देखें तो सभी गृह-नक्षत्र ठीक-ठाक घरों में ही बैठे दिखते हैं। देश में सालाना जल उपलब्धता 1869 अरब घन मीटर है इसमें से 1123 इस्तेमाल योग्य है।  लेकिन इन आंकड़ों का जब आगे विश्लेषण करते हैं तो पानी की बेतरतीब बर्बादी, गैरजरूरी इस्तेमाल, असमान वितरण जैसे भयावह तथ्य सामने आते हैं जो कि सारी कुंडली पर राहू का साये के मानिंद हैं। पानी के सही इस्तेमाल पर कड़ाई से नजर रखने के लिए ‘‘वाटर फुट प्रिंट’’ यानि जल पद चिन्ह का निर्धारण बेहद महत्वपूर्ण व निर्णायक हो सकता  है। दुर्भाग्य है कि इस बारे में हमारे नीति निर्धारक व आम लेाग बहुत कम जागरूक हैं।
हाल ही में देश में इस बात को  लेकर खुशी है कि चीन ने गैर बासमती चावल को भारत के मंगवाने की भी अनुमति दे दी है। हम भले ही इसे व्यापारिक सफलता समझों लेकिन इसके पीछे असल में चीन का जल-प्रबंधन है।  सनद रहे इजीप्ट दुनिया का ऐसा दूसरा सबसे बड़ा देश है जो सबसे ज्यादा गेंहूद आयात करता है। जो चीन सारी दुनिया के गली-मुहल्लों तक अपने सामान के साथ कब्जा किए है वह आखिर भारत व अन्य देशों से चावल क्यों मंगवा रहा है ? असल में इन दोनों देशों ने ऐसी सभी खेती-बाउ़ी को नियंत्रित कर दिया है जिसमें पानी की मांग ज्यादा होती है। भारत ने बीते सालों में कोई 37 लाख टन बासमती चावल विभिन्न देशों को बेचा। असल में हमने केवल चावल बेच कर कुछ धन नहीं कमाया, उसके साथ 1 खरब लीटर पानी भी उन देशो को दे दिया जो इतना चावल उगाने में हमारे खेतों में खर्च हुआ था।  हम एक किलो गेहू उगाने में 1700 लीटर और एक कप कॉफी के लिए 140 लीटर पानी का व्यय करते हैं।एक किलो बीफ के उत्पादन में 17 हजार लीटर पानी खर्च होता है। 100 ग्राम चाकलेट के लिए 1712 लीटर व 40 ग्राम चीनी के लिए 72 लीटर पानी व्यय होता है।
यह जानना जरूरी है कि भारत में दुनिया के कुल पानी का चार फीसदी है जबकि  आबादी 16 प्रतिशत है।  हमारे यहां एक जिन्स की पैंट के लिए कपास उगाने से ले कर रंगने, धोने आदि में 10 हजार लीटर पानी उड़ा दिया जाता है जबकि समझदार देशो ंमे यह मात्रा बामुश्किल पांच सौ लीटर होती है।  तभी हमारे देश का जल पद चिन्ह सूचकांक 980 क्यूबिक मीटर है जबकि इसका वैश्विक औसत 1243 क्यूबिक मीटर है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में भी पानी के लिए बुरे हालात का मूल कारण खराब जल प्रबंधन बताया है। यह सामने दिख रहा है कि बढ़ती आबादी, उसके  पेट भरने के लिए विस्तार पा रही खेती व पशु पालन,औद्योगिकीकरण आदि के चलते साल दर साल पानी की उपलब्धता घटती जा रही है।  आजादी के बाद सन 1951 में हमारे यहां प्रत्येक व्यक्ति के लिए औतन 14,180 लीटर पानी उपलब्ध था।सन 201 में यह आंकड़ा 1608 पर आ गया और अनुमान है कि 2025 तक यह महज 1340 रह जाएगा।  भले ही कुछ लोग बोतलबंद पानी पी कर खुद को निरापद समझते हों, लेकिन यह जान लें कि एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने के लिए पांच लीटर पानी बर्बाद किया जाता है। यह केवल बड़े कारखानें में ही नहीं, बल्कि घर-घर में लगे आर ओ  में भी होता है।
हम किस काम में कितना जल इस्तेमाल कर रहे हैं और असल में उसकी मिल रही कीमत में क्या उस पानी का दाम भी जुड़ा है कि नहीं जिससे अमुक उत्पाद तैयार हुआ है, इस मसले पर अभी हमारे देश में गंभीरता से कोई कार्य योजना शुरू नहीं की गई हैे। जल पद चिन्ह  हमारे द्वारा उपयोग में  लाए जा रहे सभी उत्पादों और सेवाओं में प्रयुक्त पानी का आकलन होता है। जल पद चिन्ह या वाटर फुट प्रिट के तीन मानक हैं - ग्रीन जल पद चिन्ह उस ताजा पानी की मात्रा का प्रतीक है जो नम भूमि, आर्द्रभूमि, मिट्टी, खेतों आदि से वाष्पित होता है। ब्लू जल पद चिन्ह झीलों, नदियों, तालाबों, जलाशयों और कुओं से संबंधित है। ग्रे जल पद चिन्ह उपभाक्ता द्वारा इस्तेमाल की जा रही सामग्री को उत्पादित करने में प्रदूषित हुए जल की मात्रा को इंगित करता है।
यदि सभी उत्पादों का आकलन इन पद चिन्हों के आधार पर होने लगे तो जाहिर है कि सेवा या उत्पादन में लगी संस्थओं के जल स्त्रोत , उनके संरक्षण  व किफायती इस्तेमाल, पानी के प्रदूषण जैसे मसलों पर विस्तार से विमर्श शुरू हो सकता है। हमारी आयात और निर्यात नीति कैसी हो, हम अपने खेतों में क्या उगाएं, पुनर्च्िरकत जल के प्रति अनिवार्यता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे स्वतः ही लोगो के बीच जाएंगे। उल्लेखनीय है कि इस साल हरियाणा सरकार ने पानी बचाने के इरादे से धान की जगह मक्का की खेती करने वालों को निशुल्क बीज व कई अन्य सुविधाएं देने का फैसला किया है। ऐसे ही कई प्रयोग देश को पानीदार बनाने की दिशा में कारगर हो सकते हैं , बस हम खुद यह आंकना शुरू कर दें कि किन जगहों पर पानी का गैर जरूरी या बेजा इस्तेमाल हो रहा है।

शनिवार, 7 जुलाई 2018

न्यूज लांड्री पर मेरा लेख

नर्मदा की कहानी सहयात्री के शब्द
शुक्रवार को अमृतलाल वेंगड़ का देहांत हो गया. नर्मदा नदी पर लिखे गए उनके यात्रा वृत्तांत हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साहित्य में है.
https://www.newslaundry.com/2018/07/07/narmada-river-amritlal-vengad-travelogue

उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे-किनारे पूरे चार हजार किलोमीटर की यात्रा पैदल कर डाली. कोई साथ मिला तो ठीक, ना मिला तो अकेले ही. कहीं जगह मिली तो सो लिये, कहीं अन्न मिला तो पेट भर लिया. सब कुछ बेहद मौन, चुपचाप और जब उस यात्रा से संस्मरण शब्द और रेखांकनों के द्वारा सामने आये तो नर्मदा का सम्पूर्ण स्वरूप निखरकर सामने आ गया
अमृतलाल वेगड़ अपनी अंतिम सांस तक यानि नब्बे साल की उम्र तक नर्मदा के हर कण को समझने, सहेजने और संवारने की उत्कंठा में युवा रहे. उन्होंने अपनी यात्रा के सम्पूर्ण वृतान्त को तीन पुस्तकों में लिखा. पहली पुस्तक ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ 1992 में आई थी और अभी तक इसके आठ संस्करण बिक चुके हैं. वेगड़जी अपनी इस पुस्तक का प्रारम्भ करते हैं- “कभी-कभी मैं अपने-आप से पूछता हूं, यह जोखिम भरी यात्रा मैंने क्यों की? और हर बार मेरा उत्तर होता, अगर मैं यात्रा न करता, तो मेरा जीवन व्यर्थ जाता. जो जिस काम के लिये बना हो, उसे वह काम करना ही चाहिए और मैं नर्मदा की पदयात्रा के लिये बना हूं.’’

वेंगड़जी ने अपनी पहली यात्रा सन 1977 में शुरू की थी जब वे कोई 48 साल के थे और यह यात्रा सं १९८८ तक चली - कु ल १८०० किलोमीटर / फिर  १९९६ से १९९९ तद नर्मदा के उत्तरी छोर के आठ सौ किलोमीटर  को पैदल नाप कर उन्होंने परिक्रमा पूरी की - पूरी २४०० किलोमीटर . अन्तिम यात्रा 2007 में 82 साल की उम्र में. कोई चार हज़ार किलोमीटर से अधिक वे इस नदी के तट पर पैदल चलते रहे. इन ग्यारह सालों की दस यात्राओं का विवरण इन पुस्तकों में है. लेखक अपनी यात्रा में केवल लोक या नदी के बहाव का सौन्दर्य ही नहीं देखते, बरगी बांध, इंदिरा सागर बांध, सरदार सरोवर आदि के कारण आ रहे बदलाव, विस्थापन की भी चर्चा करते हैं.

नर्मदा के एक छोर से दूसरे छोर का सफर 1,312 किलोमीटर लम्बा है. यानी पूरे 2614 किलोमीटर लम्बी परिक्रमा. कायदे से करें तो तीन साल, तीन महीने और 13 दिन में परिक्रमा पूरी करने का विधान है. जाहिर है इतने लम्बे सफर में कितनी ही कहानियां, कितने ही दृश्य, कितने ही अनुभव सहेजता चलता है यात्री और वो यात्री अगर चित्रकार हो, कथाकार भी हो तो यात्राओं के स्वाद को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखता.

वे मूल रूप से चित्रकार थे और उन्होंने गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर के शान्ति निकेतन से 1948 से 1953 के बीच कला की शिक्षा ली थी, फिर जबलपुर के एक कॉलेज में चित्रकला के अध्यापन का काम किया. तभी उनके यात्रा वृतान्त में इस बात का बारीकी से ध्यान रखा गया है कि पाठक जब शब्द बांचे तो उसके मन-मस्तिष्क में एक सजीव चित्र उभरे. जैसे कि नदी के अर्धचन्द्राकार घुमाव को देखकर लेखक लिखते हैं, ‘‘मंडला मानो नर्मदा के कर्ण-कुण्डल में बसा है.’’

उनके भावों में यह भी ध्यान रखा जाता रहा है कि जो बात चित्रों में कही गई है उसकी पुनरावृति शब्दों में ना हो, बल्कि चित्र उन शब्दों के भाव-विस्तार का काम करें. वे अपने भावों को इतनी सहजता से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक उनका सहयात्री बन जाता है. लेखक ने ‘छिनगांव से अमरकंटक’ अध्याय में ये उदगार तब व्यक्त किये जब यात्रा के दौरान दीपावली के दिन वे एक गांव में ही थे.

‘‘आखिर मुझसे रहा नहीं गया. एक स्त्री से एक दीया मांग लिया और अपने हाथ से जलाकर कुण्ड में छोड़ दिया. फिर मन-ही-मन बोला, ‘मां, नर्मदे, तेरी पूजा में एक दीप जलाया है. बदले में तू भी एक दीप जलाना- मेरे हृदय में. बड़ा अन्धेरा है वहां, किसी तरह जाता नहीं. तू दीप जला दे, तो दूर हो जाये. इतनी भिक्षा मांगता हूं. तो दीप जलाना, भला?’’ एक संवाद नदी के साथ और साथ-ही-साथ पाठक के साथ भी.

इस पुस्तक की सबसे बड़ी बात यह है कि यह महज जलधारा की बात नहीं करती, उसके साथ जीवन पाते जीव, वनस्पति, प्रकृति, खेत, पंक्षी, इंसान सभी को इसमें गूंथा गया है और बताया गया है कि किस तरह नदी महज एक जल संसाधन नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन से मृत्यु तक का मूल आधार है. इसकी रेत भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी जल धारा और इसमें मछली भी उतनी ही अनिवार्य है जितना उसके तट पर आने वाले मवेशियों के खुरों से धरती का मंथना.

अध्याय 13 में वे लिखते हैं- ‘‘नर्मदा तट के छोटे-से-छोटे तृण और छोटे-से-छोटे कण न जाने कितने परव्राजकों, ऋषि-मुनियों और साधु-सन्तों की पदधूलि से पावन हुए होंगे. यहां के वनों में अनगिनत ऋषियों के आलम रहे होंगे. वहां उन्होंने धर्म पर विचार किया होगा, जीवन मूल्यों की खोज की होगी और संस्कृति का उजाला फैलाया होगा. हमारी संस्कृति आरण्यक संस्कृति रही. लेकिन अब? हमने उन पावन वनों को काट डाला है और पशु-पक्षियों को खदेड़ दिया है या मार डाला है. धरती के साथ यह कैसा विश्वासघात है.’’

वेगड़जी कहते हैं कि यह उनकी नर्मदा को समझने-समझाने की ईमानदार कोशिश है और वे कामना करते हैं कि सर्वस्व दूसरों पर लुटाती ऐसी ही कोई नदी हमारे सीनों में बह सके तो नष्ट होती हमारी सभ्यता-संस्कृति शायद बच सके. नगरों में सभ्यता तो है लेकिन संस्कृति गांव और गरीबों में ही थोड़ी बहुत बची रह गई है.

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद नर्मदा को समझने की नई दृष्टि तो मिलती ही है, लेखक की अन्य दो पुस्तकों को पढ़ने की उत्कंठा भी जागृत होती है. यह जानना जरुरी है कि लोग बेस्ट सेलर के भले ही बड़े-बड़े दावे करें लेकिन अनुपम मिश्र की आज भी खरे है तालाब के बाद बेगड़जी की पुस्तकें संभवतया सर्वाधिक बिकने वाली हिंदी कि पुस्तकों में होगी. इनकी संख्या दो लाख से अधिक है.

सौन्दर्य की नदी नर्मदा,

तीरे–तीरे  नर्मदा

अमृतस्य नर्मदा

लेखक: अमृतलाल वेगड़

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

rumours are going killer

हत्यारी बनती अफवाहें

पंकज चतुर्वेदी

janwani meerut 
बीते पचास दिनपों के दौरान देश के दस राज्यों में 27 लोग महज इस अफवाह  के फैलते भीड़ की  पाशविकता  का शिकार हो कर मारे जा चुके हैं कि उनके इलाके में कोई बच्चा-चोर घूम रहा है। आश्चर्य है कि ये अफवाहें असम, त्रिपुरा से ले कर महाराष्ट्र और झारखंड से ले कर आंध्र प्रदेश तक की हैं। गौर करें इन सभी राज्यों की भाषाएं अलग-अलग हैं लेकिन हर जगह वाट्सएप पर लगभग एक जैसे संदेश भेजे गए और लेागों को बच्चा चोर गिरोह से सतर्क रहने को कहा गया। यही नहीं प्रत्येक भाषा के संदेश की प्रस्तुति भी लगभग एक जैसी है, बस उसे स्थानीय भाषा में अनूदित किया गया। जाहिर है कि लोगांे को जागरूक करने के नाम पर ऐसी अफवाह को चित्र, वीडियो और कथित उदाहरणों के साथ फैलाने वाले की सूत्रधार कही एक ही है और उसकी घातक साजिश भी समान ही है। जान लें कि यह कोई नादानी या भोलेपन या महज मजा लेने के लिए फैलाई गई अफवाह नहीं है जो गांव-गांव में भीड़ को खुद के असुरक्षित होने के भाव से इतना गहरे तक आतंकित कर देती है कि वे किसी अंजान की बगैर किसी प्रमाण-तथ्य के जान ेलने में भी नहीं हिचक रहे हैं।

यह एक शोध का विषय है कि इस तरह की अफवाहें फैलाने का असली मकसद क्या होता है? कोई निजी हित, व्यावसायिक हित, कोई परीक्षण या केवल परपीड़़ा का मानसिक विकार। कई बार तो अफवाहें बेहद अमानवीय और मानव-द्रोही हो जाती है। कोई चार साल पहले नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों में जब भूकंप से आई तबाही की दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आ रही थीं, जब संवेदनषील लोग व सरकारें इस आपदा से पीड़ित लोगों तक त्वरित राहत पहुंचाने के लिए चिंतित थे, कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके दिमाग में भूकंप के कारणों को लेकर चुटकुले कूद रहे थे व अपनी राजनीतिक कुंठा के इस गुबार को उन्होंने सोषल मीडिया के निरंकुष हाथी पर सवार करवा दिया था। कुछ लोग एसएमएस , व्हाट्सएप और अन्य संचार माध्यमों से चांद का मुंह टेढ़ा होने, नासा के हवाले से अगले भूकंप का समय बताने जैसे अफवाहें उड़ा रहे थे। कई लोग ऐसे भी थे कि वे अंजान थे कि वे इस तरह के संदेषों को अपने परिचितों को भेज कर अपराध कर रहे हैं।
jansandesh times lucknow 

वैसे कुछ साल साल पहले आए नए आईटी एक्ट की धारा 66 ए को समाप्त करने के लिए काफी हंगामा हुआ था लेकिन आज हवा में तैरती बगैर सिर -पैर की अफवाहों को सोशल मीडिया के जरिये मिल रही हवा पर विचार करंे तो लगता है कि ऐसे सख्त कानून अनिवार्य हैं जोकि  अफवाहबाजों पर कुछ लगाम लगा सके। सनद रहे देश में गाय के नाम पर हुई अधिकांश भीड़-हत्याओं का असली कारक सोशल मीडिया का दुष्प्रचार ही रहा है। कई बार तो कम समय से खुद को मशहूर करने या कुख्यात बना कर वसूली जैसे धंधों में सहजता होने सरीखे सुनियोजित आपराधिक षडयंत्र के तहत भी लोग अपने वीडियो  बना कर जानबूझ कर वायरल करते हैं। कई बार ऐसे वीडियो या संदेश एक उपद्रवी भीड की शक्ल में किसी बेगुनाह के लिए काल बन जाते हैं।
अफवाहें अब बेहद खतरनाक होती जा रही हैं- कभी बिहार में नमक की कमी का हल्ला तो कभी किसी बाबा की भविश्यवाणी पर खजाने की उत्तेजना, असल में इसके छुपे हुए मकसद कुछ और ही होते हैं। बीते सालों में घटित दुर्भाग्यपूर्ण बिसाहड़ा कांड हो या अलवर में गौ रक्षकों की गुंडागिर्दी , या फिर बिहार में रामनवमी के दंगे; हर जगह आग को भड़काने में सोषल मीडिया के जरिये फैली अफवाहों का महत्वपूर्ण भमिका रही है । यह बात सभी स्वीकार रहे हैं कि फेस बुक-ट्वीटर जैसे व्यापक असर वाले सोषल मीडिया अफवाह फैलाने वालों के पसंदीदा अस्त्र बनते जा रहे हैं, एक तो इसमें फर्जी पहचान के साथ पंजीकृत लोगों को खोजना मुष्किल होता है, फिर खोज भी लिया तो इनते सर्वर अमेरिका में होने के कारण मुकदमें को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त सबूत जुटाना लगभग नामुमकिन होता है। अब आईटी एक्ट की धारा 66 ए का भय भी समाप्त हो गया है जिसमें इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों के माध्यम से अफवाह, गलत सूचना, मॉर्फ फोटो, फर्जी एकांड बना कर गलत सूचना देने पर कड़ी सजा का प्रावधान था। उस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त क्या किया, अफवाही, उपद्रवी लोगों की उड़ की लग गई हैं।  अब फेसबुक और ट्वीटर पर हजारों पेास्ट भड़काऊ, नकली चित्रों के साथ और आग उगलने वाली लगाई जा रही हैं ं। कहीं गाय को जिबह करने के दृष्य हैं तो कतिपय उपद्रवी विदेषी फोटो लगा कर भारत में दंगों की झूठी कहानी गढ रहे हैं। लगता है कि संचार के आधुनिक साधन लोगों को भड़काने के ज्यादा काम आ रहे हैं।
यह भी हकीकत है कि भारत में अफवाहें कभी भी सोशल मीडिया या इलेक्ट्रानिक माध्यमों की मोहताज नहीं रहीं। दो दशक पहले का गणेश जी का दूध पीना हो या कुछ साल पहले का उ.प्र-दिल्ली में रात में आने वाले बड़े बंदर की अफवाह, घरों के दरवाजे पर हल्दी के थापे या भाई को नारियल देने के संदेश, ना जाने कैसे दबे पैर समाज  में आंचलिक स्थानों तक भरोसे के साथ पहुंचते रहे हैं। पंजाब में तो ब्लेक-व्हाईट मोबाई ले दौर में किी ऐसे नंबर से फोन आने वा फोन की स्क्रीन लाल होने के बाद इंसान की मौत की अफवाह ने महीनों तमाशा दिखया था। चूंंिक पहले की अफवाहें कहीं जान-माल का न ुकसान नहीं करती थीं, सो कुछ दिनों भय-तनाव के बाद लेाग उसे भूल जाते थे।, लेकिन आज तो इन अफवाहों के मंुह में खून लग चुका है।
अफवाहें फैला कर फिजा बिगाड़ने के लिए आधुनिक संचार का दुरूपयोग करने का चलन बीते छह सालों से देश में बखूबी हुआ है। बेहतर आर्थिक स्थिति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने वाले राज्यों में अफवाहों का बाजार भी उतना ही तेजी से विकसित हो रहा है, जितनी वहां की समृद्धता । ये अफवाहें लोगों के बीच भ्रम पैदा कर रही हैं, आम जन-जीवन को प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ के हालात निर्मित कर रही हैं । विडंबना है कि बेसिर पैर की इन लफ्फाजियों के पीछे असली मकसद को पता करने में सरकार व समाज दोनो ही असफल रहे हैं ।
अफवाहों की बयार के पीछे कुछ ऐसे संगठनों का दिनों-दिन मजबूत होना भी कहा जा रहा है जोकि झूठ को बार-बार बोल कर सच बनाने के सिद्धांत का हिमायती हैं । कहा जाता है कि किसी खबर के फैलने व उसके समाज पर असर को आंकने के सर्वें के तहत ऐसी लप्पेबाजियों को उड़ाया जा रहा है । आज तकीनीकी इतनी एडवांस है कि किसी एस एम एस का षुरूआत या सोषल साईट पर भउ़काऊ संदेष देने वाले का पता लगाना बेहद सरल है, इसके बावजूद इतने संवेदनषील मसले पर पुलिस व प्रषासन का टालू रवैया  अलग तरह की आष्ंाका  खड़ी करता है।
बहरहाल अफवाहों की परिणति आम लेागों में भय व तानव के साथ-साथ आपदा की आंशका व पूर्वानुमान में भ्रम, संकटकाल में चल रहे राहत कार्यों में व्यवधान, तनावग्रस्त इलाकों में स्थिति सामान्य बनाने के सरकारी व सामाजिक प्रयासों में व्यवधान के तौर पर भी होती है। अफवाहें अनैतिक व गैरकानूनी भी हैं । फिर ऐसे में संवेदनशील रहे इलाकों  की सरकारों में बैठे लोगों का इस मामले में आंखें मूंदे रखना कहीं कोई गंभीर परिणाम भी दे सकता है । दुखद यह भी है कि पढ़े-लिखे लोग कई बार नासमझाी में, यहां तक कि बगैर पढ़े ही किसी भी वहाट्सएप संदेश केा आगे ढकेल देते हैं और उनके पाठक, अपने प्रेषक की वरिष्ठता और सम्मान को ध्यान में रख कर उनके संदेश को सत्य मान लेते हैं। बहरहाल अफवाहों की परिणति ‘‘ भेड़िया आया’’ वाली कहानी की तरह भी होती है । अफवाहें अनैतिक व गैरकानूनी भी हैं । दुखद है कि सरकार के स्तर पर आम जन-जीवन को प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ और अविश्वास के हालात निर्मित कर रही अफवाहों के कारक और कारणों की खोज के कोई प्रयास नहीं हुए हैं।

पंकज चतुर्वेदी


The real illustrator of Narmada : Amritlal Vaigad

नर्मदा को कण-कण सहेजने वाले साधक का मौन

वह कामना करते हैं कि अपना सर्वस्व लुटाती ऐसी ही कोई नदी हमारे सीने में भी बहे, तो हमारी सभ्यता शायद बच सके।


उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे-किनारे पूरे चार हजार किलोमीटर की यात्रा पैदल कर डाली। कोई साथ मिला तो ठीक, न मिला तो अकेले ही। कहीं जगह मिली तो सो लिए, कहीं अन्न मिला तो पेट भर लिया। सब कुछ बेहद मौन, चुपचाप और जब उस यात्रा से संस्मरण शब्द और रेखांकनों के रूप में सामने आए,तो नर्मदा का संपूर्ण स्वरूप निखरकर सामने आ गया। अमृतलाल वेगड़ अपनी अंतिम सांस तक यानी 90 साल की उम्र तक नर्मदा के हर कण को समझने, सहेजने और संवारने की उत्कंठा में युवा रहे। उन्होंने अपनी यात्रा के संपूर्ण वृत्तांत को तीन पुस्तकों में लिखा। पहली पुस्तक सौंदर्य की नदी नर्मदा 1992 में आई थी और अब तक इसके आठ संस्करण बिक चुके हैं। वेगड़ अपनी इस पुस्तक का प्रारंभ करते हैं- ‘मैं अपने-आप से पूछता हूं, यह जोखिम भरी यात्रा मैंने क्यों की? और हर बार मेरा उत्तर होता, अगर मैं यात्रा न करता, तो मेरा जीवन व्यर्थ जाता। जो जिस काम के लिए बना हो, उसे वह करना ही चाहिए और मैं नर्मदा की पदयात्रा के लिए बना हूं।'.
अमृतलाल वेगड़ ने अपनी पहली यात्रा सन 1977 में शुरू की थी, जब वह कोई 50 साल के थे और अंतिम यात्रा 1987 में 82 की उम्र में। लगभग 4,000 किलोमीटर से अधिक वह इस नदी के किनारे पैदल चलते रहे। इन 11 वषार्ें की 10 यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में है। वह इसमें लोक या नदी के बहाव के सौंदर्य ही नहीं, बरगी बांध, इंदिरा सागर बांध, सरदार सरोवर आदि के कारण आ रहे बदलाव और विस्थापन की भी चर्चा करते हैं। नर्मदा के एक छोर से दूसरे छोर का सफर 1,312 किलोमीटर लंबा है। यानी पूरे 2,624 किलोमीटर लंबी परिक्रमा। कायदे से करें, तो तीन साल, तीन महीने और 13 दिन में परिक्रमा पूरी करने का विधान है। जाहिर है, इतने लंबे सफर में कितनी ही कहानियां, कितने ही दृश्य, कितने ही अनुभव सहेजता चलता है यात्री और वह यात्री अगर चित्रकार हो, कथाकार भी, तो यात्राओं के स्वाद को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखता।.
वेगड़ मूल रूप से चित्रकार थे और उन्होंने गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन से 1948 से 1953 के बीच कला की शिक्षा ली थी, फिर जबलपुर के एक कॉलेज में चित्रकला का अध्यापन किया। तभी उनके यात्रा वृत्तांत में इस बात का बारीकी से ध्यान रखा गया है कि पाठक जब शब्द बांचे, तो उसके मन-मस्तिष्क में एक सजीव चित्र उभरे। उनके भावों में यह भी ध्यान रखा जाता रहा है कि जो बात चित्रों में कही गई है, उसकी पुनरावृत्ति शब्दों में न हो, बल्कि चित्र उन शब्दों के भाव-विस्तार का काम करें। वे अपने भावों को इतनी सहजता से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक उनका सहयात्री बन जाता है। लेखक ने छिनगांव से अमरकंटक अध्याय में ये उद्गार तब व्यक्त किए थे, जब यात्रा के दौरान दीपावली के दिन वह एक गांव में ही थे- ‘आखिर मुझसे रहा नहीं गया। एक स्त्री से एक दीया मांग लिया और अपने हाथ से जलाकर कुंड में छोड़ दिया। फिर मन ही मन बोला, मां, नर्मदे, तेरी पूजा में एक दीप जलाया है। बदले में तू भी एक दीप जलाना- मेरे हृदय में। बड़ा अंधेरा है वहां, किसी तरह जाता नहीं। तू दीप जला दे, तो दूर हो जाए। इतनी भिक्षा मांगता हूं। तो दीप जलाना, भला?' यहां एक संवाद नदी के साथ है और साथ ही साथ पाठक के साथ भी।.
वेगड़ यहां पर मानते हैं कि यह उनकी नर्मदा को समझने-समझाने की ईमानदार कोशिश है और वह कामना करते हैं कि सर्वस्व दूसरों पर लुटाती ऐसी ही कोई नदी हमारे सीने में भी बह सके, तो नष्ट होती हमारी सभ्यता-संस्कृति शायद बच सके। नगरों में सभ्यता तो है, लेकिन संस्कृति गांव और गरीबों में ही थोड़ी-बहुत बची रह गई है। यह पुस्तक नर्मदा को समझने की नई दृष्टि तो देती ही है, उनकी अन्य पुस्तकों को पढ़ने की उत्कंठा भी जगाती है। अब जब अमृतलाल वेगड़ हमारे बीच नहीं हैं, तो कहने में संकोच नहीं कि हमने एक ऐसी अप्रतिम प्रतिभा को खो दिया है, जो नर्मदा का सहयात्री तो था ही, अनूठा गद्यकार, अप्रतिम चित्रकार और सबसे पहले एक विरल इंसान भी था।.

बुधवार, 4 जुलाई 2018

supreme court order can not stop confrontation between LG an CM in Delhi



    कोर्ट के फैसले के बाद भी जारी रहेगा विवाद

    बचपन में शायद आपमें से बहुतों ने वह तमाशा देखा होगा जिसमें मदारी किसी बच्चे को कपड़े से ढंक कर उसकी जीभ चाकू से काटने वाला होता है और वह उसे काला जादू करना कहता है। ठीक उसी समय भीड़ से कोई आदमी निकलता है, फिर उसकी मदारी से तीखी बहस होती है और फिर वह आदमी मदारी के काले जादू की काट बताकर कुछ ताबीज आदि बेच जाता है। मजमा खत्म होने के बाद जब भीड़ बिखर जाती है तो मदारी और वह आदमी पैसे आपस में बांट लेते हैं। दिल्ली में सरकार, केंद्र सरकार एवं उपराज्यपाल आदि के बीच ऐसा ही कुछ चार सालों से चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने एक सधा हुआ निर्णय देकर इस पर विराम लगा दिया है लेकिन भाजपा और आप लड़ने का कोई नया बहाना फिर खोज सकते हैं। 
    आपको याद होगा कि राजनीति में केजरीवाल की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई थी? दिल्ली में 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित की असली ताकत एनजीओ थे। भाजपा इस चक्र को तोड़ नहीं पा रही थी और तभी ऐसे ही एनजीओ से निकले एक आम से दिखने वाले व्यक्ति को सबसे ईमानदार के तौर पर पेश कर दिया गया। रामलीला मैदान के अन्ना आंदोलन में संघ का कैडर शामिल था ही। इसीलिए बुधवार को आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केजरीवाल के प्रति सहानुभूति प्रकट करने से पहले एक बार सोच लें कि आम आदमी पार्टी (आप) के गठन का मूल आधार भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम थी और उसका नारा था, लोकपाल। तनिक याद करें कि क्या लोकपाल के लिए आप सरकार ने अभी तक कुछ किया? नहीं लेकिन दिल्ली में उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री के टकराव से विकास के काम नहीं हो पा रहे हैं, यह हल्ला तीन सालों से हो रहा है। इसके जरिये केजरीवाल को भाजपा के विरुद्ध प्रमुख विपक्षी दल बताने की कोशिश की जाती रही। कुछ मुकदमे, कुछ विधायकों को जेल, कुछ आरोप प्रत्यारोप, सबकुछ ठीक उसी तरह जैसे मदारी का खेल। अब सुप्रीम कोर्ट ने इतना स्पष्ट फैसला दिया है कि किसी विवाद की गुंजाइश बचना ही नहीं चाहिए। 

    दिल्ली जैसे अर्द्धराज्य के लिए ये दिशा-निर्देश दूरगामी हैं। कोर्ट ने कहा कि उप-राज्यपाल राज्य सरकार को सिर्फ सलाह दे सकते हैं, फैसले नहीं रोक सकते। तीन जजों की पीठ ने मिलकर कहा कि कैबिनेट के साथ मिलकर ही उप-राज्यपाल काम करें। बता दें कि चार अगस्त, 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उप-राज्यपाल यानी एलजी को दिल्ली का बॉस बताया था। उसने कहा था कि उप-राज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं और दिल्ली सरकार एलजी की मर्जी के बिना कानून नहीं बना सकती। अब चार जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस, जमीन और पब्लिक ऑर्डर के अलावा दिल्ली विधानसभा कोई भी कानून बना सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनता द्वारा चुनी गयी सरकार ही दिल्ली चलाएगी। फैसलों पर उप-राज्यपाल की सहमति जरूरी नहीं है। चुनी हुई सरकार के पास ही असली ताकत है। उपराज्यपाल फैसले अटकाकर नहीं रख सकते। दरअसल, दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि उप-राज्यपाल के पास फैसले लेने की समस्त शक्तियां हैं। याचिका में दिल्ली की चुनी हुई सरकार और उप-राज्यपाल के अधिकार स्पष्ट करने का आग्रह किया गया था। अब साफ हो गया कि उप-राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। 
    अदालत ने कहा कि दिल्ली सरकार और उप-राज्यपाल के बीच किसी खास मामले में मतभेदों की स्थिति में फाइल राष्ट्रपति के पास भेजी जाए। न्यायालय ने कहा कि उप-राज्यपाल और दिल्ली सरकार को सामंजस्यपूर्ण तरीके से काम करना होगा। उपराज्यपाल को महसूस करना चाहिए कि मंत्रिपरिषद लोगों के प्रति जवाबदेह है और वह राष्ट्रीय राजधानी की सरकार के हर निर्णय को रोक नहीं सकते। पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे। उल्लेखनीय है कि केजरीवाल की तरफ से गोपाल सुब्रमन्यम और पी. चिदंबरम ने पैरवी की। यहां यह भी याद रखना होगा कि जब कुछ विपक्षी दल न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे थे, तब केजरीवाल से इस मुहिम से खुद को दूर रखा था। जो भी हो, अदालत का फैसला एकदम सही है। अलबत्ता, उल्लेखनीय यह भी है कि केजरीवाल सरकार को 40 महीने हो गये हैं। उसका केवल डेढ़ साल का कार्यकाल बचा है। यदि केंद्र सरकार की चली और राज्यों और लोकसभा के चुनाव साथ होने का प्रस्ताव आ गया, तो फिर केजरीवाल सरकार के पास सात-आठ महीने ही बचे हैं। इस समय दिल्ली का विकास ठप्प है, प्रदूषण जैसे मसलों पर शून्य कार्यवाही हुई है। जिन मुहल्ला क्लीनिक का ढोल पीटा गया, उनमें से अधिकांश बदतर हालत में हैं। कुछेक स्कूलों के हालात सुधरे लेकिन राज्य के स्कूलों के परीक्षा परिणाम पहले से बेहतर नहीं हुए। बिजली के बिल में फिक्स चार्ज बढ़ा कर यूनिट दर कम करने की घोषणा आम उपभोक्ता को महंगी पड़ रही है। इधर केजरीवाल ने दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग का आंदोलन शुरू कर दिया है। यह भारतीय राजनीति की विडंबना है कि अब सुनियोजित तरीके से बाकायदा विदेश से संचालित एजेंसियों की मदद से किसी अंजान की छवि चमकाई जाती है, उसे बेहद काबिल, इतिहास पुरुष घोषित कर दिया जाता है और उसका सत्ता आरोहण होता है। ठीक यही प्रक्रिया से केजरीवाल को उभारा जा रहा है। असल में इसके पीछे मुख्य खेल विपक्ष का मुख्य स्थान अपने किसी प्यादे को सुरक्षित कर देने का है। यह किसी से छिपा नहीं है कि केजरीवाल ने आज तक सांप्रदायिकता, केंद्र सरकार द्वारा लोकपाल का गठन न करने या दिल्ली में ही मेरठ एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजना के पहली ही बारिश में धंस जाने जैसे मसले पर कभी कोई आवाज नहीं उठायी। आप के तीन चौथाई फाउंडर मेंबर आज भाजपा में ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए हैं। अब चुनाव जीतने के लिए जनता का दिल जीतने की जरूरत नहीं रह गयी है। अब इसके लिए केवल भ्रम फैलाना काफी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच नए मोर्चे खुल जाएंगे। भाजपा और आप का मकसद जनता में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने का भ्रम फैलाकर एक-दूसरे की राजनीतिक जमीन को मजबूत करने का है।

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