तालाब की बातें

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बुधवार, 1 अगस्त 2018

Mobile use in school should be ban


आखिर क्यों न लगे भारत में भरी स्कूलों में मोबाईल फोन पर रोक

पंकज चतुर्वेदी 

पिछले दिनों फ्रांस की संसद ने एक कानून बना कर देश के प्राथमिक और जूनियर हायर सेकेंडरी स्कूलों में बच्चों द्वारा मोबाईल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गयी है । यह कानून अगले स्कूली सत्र यानि सितम्बर 2018 से लागू हो जाएगा । इसके बाद दुनियाभर में इस पर बहस शुरू हो गयी है , कई लोग स्कूल में मोबाईल के फायदे गिना रहे हैं जबकि फ्रांस  के युवा राष्ट्रपति इमानुअल मकरन ने विभिन्न सर्वेक्षण, रिपोर्ट को आधार बना आकर बच्चों के स्कूल में सेल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी का बिल खुद पेश किया और सांसदों से इसके लिए समर्थन माँगा । जान लें कि फ्रांस  में स्कूल के भीतर बच्चों के मोबाईल फोन पर रोक की बहस लम्बे समय से चल रही हैं । सन 2006 में भी इस पर एक बिल पेश किया गया था, लेकिन तब संसद से उसे माकूल समर्थन नहीं मिला था । फ्रांस जैसे विकसित देश के इस कदम से भारत में भी कुछ लोग ऐसी पाबंदी के कानून की बात कर रहे हैं क्योंकि हमारे यहां मोबाईल फोन के दुरूपयोग, वह भी स्कूल व किशोरों में , के मामले बए़ते जा रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों के दोैरान देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे वीडियो खूूब टीवी समाचारों की सुर्खियां बनीं हैं जिनमें कम उम्र के लड़के किसी अवयस्क लड़की के साथ जोर-जबरदस्ती कर रहे थे या कहीं किसी को महज किसी शक में पीट-पीट कर जान से मार दिया गया। हाथ में मोबाईल व उसमें इंटरनेट कनेक्शन ने इन युवाओं के दिल में अपराध की गंभीरता के बनिस्पत जल्दी कुख्यात होने या व्यापक भय पैदा करने की अपाराधिक भावना को बलवती बनाया। हमारा देश दुनिया में सबसे तेजी से मोबाईल उपभौक्ता में विस्तार वाले देशों में से एक है। यह किसी से छुपा नहीं है कि भारत  में सस्ता इंटरनेट और साथ में कम दाम का स्मार्ट फोन अपराध का बड़ा कारण बना हुआ है,- खासकर किशोरों में यौन अपराध हों या मारापीटी या फिर शेखी बघारने को किये जा रहे दुःसाहस। । मोबाईल के कमरे व् वीडियो और उसे इन्टरनेट के जरिये पलक झपकते ही दुनिया तक पहुंचा कर अमर-अजर होने की आकांक्षा युवाओं को कई गलत रास्ते की और मोड़ रही है। दिल्ली से सटे नोयडा में स्कूल के बच्चों ने अपनी ही टीचर का गन्दा वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाल दिया । क्षणिक आवेश में किसी के प्रति आकर्षित हो गयी स्कूली लड़कियों के अश्लील  वीडियो क्लिप से इन्टरनेट संसार पटा  पडा हैं । इसके विपरीत कई बच्चों के लिए अनजाना रास्ता तलाशना हो या, किसी गूढ़ विषय का हल या फिर देश दुनिया के जानकारी या फिर अपने विरुद्ध हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ; इन सभी में हाथ की मुट्ठी में सिमटी दुनिया के प्रतीक मोबाईल ने नयी ताक़त और राह दी है, खासकर युवा लड़कियों को मोबाईल ने बेहद सहारा दिया है ।
हालांकि यह भी सच है की भारत और फ्रांस  के सामजिक- आर्थिक समीकरण बेहद भिन्न हैं, फ्रांस  में किये गए एक सर्वे के अनुसार देश के 12 से 17 साल आयु वर्ग के नब्बे प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्ट मोबाईल है । भारत में यह आंकडा बहुत कम होगा । असल में फ्रांस  के शिक्षकों  की शिकायत थी कि कम उम्र के बच्चे क्लास में फोन ले कर बोर्ड और पुस्तकों के स्थान पर मोबाईल पर ज्यादा ध्यान देते हैं, वे एक दुसरे को मेसेज भेज कर चुहल करते है या फेसबुक, इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं । इससे उनके सीखने और याद रखने की गति तो प्रभावित हो ही रही है, बच्चों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर हो रहा है । अब वे खेल के मैदान में पसीना बहाने के बनिस्पत आभासी दुनिया में व्यस्त रहते है, इससे उनमें मोटापा, आलस आ रहा है, आँखें कमजोर होना , याददाश्त कमजोर होना भी इसके प्रभाव दिखे, पहले बच्चे जिस गिनती, पहाड़े, स्पेलिंग या तथ्य को अपनी स्मृति में रखते थे, अब वे सर्च इंजन  की चाहत में उसे याद नहीं रखते , यहाँ तक की कई बच्चों को अपने घर का फोन नम्बर तक याद नहीं था,
हालांकि फ्रांस के कोई इक्यावन हज़ार प्रायमरी और सात हज़ार जूनियर सेकेंडरी स्कूलों में से आधे में स्कूल प्रशासन ने पहले से ही फोन पर रोक लगा रखी है , लेकिन अब यह एक कानून बन गया है, कानूनन बच्चा स्कूल में फोन तो ले कर आ सकता है लेकिन उसे फोन को अपने बसते के भीतर या ऐसे स्थान पर रखना होगा, जहां से वह दिखे नहीं , वैसे इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है की यदि कोई बच्चा इसका उलंघन कर्फे तो उसके साथ क्या किया जाये, फ्रांस  के स्कूलों में अभी तो फोन मिलने पर टीचर उसे अपने पास रख लेते हैं और अगले दिन उनके माता-पिता  को बुला कर उन्हें सौंप देते हैं । वैसे जानकार इसे फ़िज़ूल की कवायद मान रहे हैं, बस्ते में रखे फोन से चेटिंग या सोशल मीडिया इस्तेमाल करना बच्चों के लिए कोई कठिन नहीं होगा ।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में अमेरिका के कुछ राज्यों में भी बच्चों के स्कूल में सेल फोन पर पाबंदी लग चुकी है लें बाद में उसे उठा लिया गया। जमैका में सन 2005 में , नाईजीरिया में 2012 में मलेशिया में, 2014 में ऐसे नियम बने - जापान, बेल्जियम में । इंडोनेशिया आदि देशों  में  बच्चों के फोन के इस्तेमाल पर कुछ सीमायें हैं, जैसे जापान में रात में नौ बजे के बाद बच्चे फोन के इस्तेमाल से परहेज करते हैं ।
यह कटु सत्य है कि स्कूल में फोन कई किस्म की बुराइयों को जन्म दे रहा है । इसके साथ ही आज फ़ोन में खेल, संगीत, वीडियों,  जैसे कई ऐसे  एप उपलब्ध है जिसमें बच्चे का मन लगना ही है और इससे उसकी शिक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं । लेकिन इम्तेहान में धोखाधड़ी और नक़ल का एक बड़ा औजार यह बन गया हैं। यही नहीं इसके कारण अपराध भी हो रहे हैं।
निर्कुश अश्लीलता स्मार्ट फोन पर किशोर बच्चों के लिए सबसे बड़ा जहर है , चूँकि ये फोन महंगे भी होते हैं इस लिए अक्सर बेहतर फोन खरीदने या ज्यादा इन्टरनेट  पेक खरीदने के लिए बच्चे चोरी जैसे काम भी करने लगते हैं । विद्यालयों में फोन ले कर जा रहे बच्चों में से बड़ी संख्या धमकियों को भी झेलती है , कई एक शोषण का शिकार भी होते हैं ।
वैसे बगैर किसी दंड के फ्रांस का कानून कितना कारगर होगा यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन डिजिटल दुनिया पर आधुनिक हो रहे विद्यालयों में इस कदम से एक बहस जरुर शुरू हो गयी है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां अशिक्षा , असमानता , बेरोजगारी और गरीबी से कुंठित युवाओं की संख्या बढती जा रही है , जहां कक्षा आठ के बाद स्कूल से ड्राप आउट दर बहुत ज्यादा है , लेकिन कई राज्यों में स्कूल के मास्टर को स्मार्ट फोन पर सेल्फी के साथ हाजिरी लगाना अनिवार्य है, ऐसे देश में विद्यालय में बच्चे ही नहीं शिक्षक के भी सेल फोन के इस्तेमाल की सीमाएं, पाबंदियां अवश्य लागु होना चाहिए।
खेद है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट गत तीन साल से सरकार से अश्लील वेबसाईट पर पाबंदी के आदेश दे रहा है और सरकार उस पर अधूरे मन से कार्यवाही अक्रती है और अगले ही दिन वे नंगी साईट फिर खुल जाती हैं , देश के झारखण्ड राज्य के जामताड़ा जिले के आंचलिक क्षेत्रों में अनपढ़ युवा मोबाईल से बेंक फ्रौड का अंतर्राष्ट्रीय गिरोह चलाते हैं लेकिन  सरकार असहाय रहती हैं । ऐसे में हमारे यहाँ ऐसे कानून की सोचना दूर की कौड़ी है लेकिन इस पर व्यापक बहस अवश्य होना चाहिए ।

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