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रविवार, 12 जनवरी 2014

जनसंदेश टाईम्‍स, उ प्र दिनांक 12 जनवरी 2014 रविवारी http://jansandeshtimes.com/Default.aspx?goto=home#


हिंदी में पुस्तकों की नहीं लेखकों की समीक्षा होती है
पंकज चतुर्वेदी

हिंदी की सर्वाधिक पाठक संख्या वाली पत्रिकाओं - इंडिया टुडे, षुक्रवार, कादंबिनी  आउटलुक आदि में पुस्तकों की समीक्षा पर नियमित दो-तीन पृश्ठ होते हैं । दैनिक पत्रों - जनसत्ता और हिंदुस्तान में प्रत्येक सप्ताह पुस्तकों पर आधा पृश्ठ होता है । प्रकाषन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’, साहित्य अकादेमी की ‘‘ समकालीन ’’ व अन्य छोटी साहित्यिक पत्रिकाएं पुस्तकों की चर्चा केा पर्याप्त स्थान दे रही हैं । दैनिक जागरण और हिंदुस्तान के सभी संस्करणों में पुस्तक-समीक्षा को स्थान दिया जा रहा है । जनसंदेष(उ.प्र.)नईदुनिया(इंदौर), राजस्थान पत्रिका(जयपुर), लोकमत समाचार(नागपुर) के अलावा कई अन्य दैनिक पत्र साहित्य चर्चा में नई पुस्तकों को स्थान अवष्य देते हैं । हंस , कथादेष, साहित्य अमृत जैसी पत्रिकाएं तो पुस्तक चर्चा पर कई पृश्ठ प्रकाषित करती हैं । यदि इन सभी प्रकाषनेां के पाठकों की संख्या जोड़े ंतो करोड़ों में होगी । लिहाजा इस बात की चर्चा बेमानी हैं कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तकों के लिए स्थान घट रहा है । हां, इस बात की चिंता जरूर करना होगी कि करोड़ों की पाठक संख्या वाली समीक्षाओं की पुस्तकों की मुद्रण संख्या बामुष्किल 1000 होती है और लाखें की पाठक संख्या वाले अखबारों में उन पर कागद कारे होने के बावजूद हजार कापी का एक संस्करण बामुष्किल बिकता है ।
यह सर्वविदित है कि आज अखबार या पत्रिका छापना एक व्यवसाय है और किसी भी पत्र-पत्रिका को महज ग्राहकों से मिले बिक्री के पैसे के बल पर चलाया नहीं जा सकता है । इसमें छपने वाले विज्ञापन इसके जीवन का मूल आधार होते हैं । आम उपभोग की कई ऐसी वस्तुओं के विज्ञापन देखे जा सकते हंै, जिसकी कीमत एक या दो रुपए होती है । उत्पादक व विज्ञापनदाता को भरोसा होता है कि यह एक-दो रुपए कीमत की वस्तु इस विज्ञापन के माध्यम से इतनी लोकप्रिय होगी कि उससे लाखों कमाया जा सकता है । विडंबना है कि विज्ञापन से अटे पड़े अखबारों में साहित्यिक या पाठ्येत्तर पुसतकों के विज्ञापन लगभग न के बराबर होते हैं, जबकि पुस्तक की कीमत आमतौर पर दहाई अंक में तो होती ही है । विभिन्न व्यावसायिक व साहित्यिक पत्रिकाओं द्वारा पुस्तक-परिचय प्रकाषित करने की मंषा भी यही है कि साहित्य के प्रति अनुराग रखने वाले लोग पुस्तक को एक उपभोक्ता वस्तु न मान कर एक पूज्य, आदरणीय या निरीह सामग्री मानते हैं । जिस पृश्ठ पर विज्ञापन की दर दस हजार रूपए है, उस पर किसी पुस्तक की चर्चा निषुल्क होती है और फिर भी बिक्री का आंकड़ा सैंकड़ा तक पहुंचते हुए दम तोड़ देता है ।
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि पुस्तक प्रकाषन के क्षेत्र में भारत विष्व में तीसरे स्थान पर है , यहां हर साल 50 से 60 हजार पुस्तकें छपती हैं । इनमें से लगभग 20 हजार हिंदी की होती हैं और इसका लगभग 40 प्रतिषत हिस्सा पाठ्येत्तर पुस्तकों का होता है । यानी हजारों-हजार पुस्तकें, जिनके उत्पादन पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं । इसके बावजूद यह व्यवसाय से अधिक स्वान्तः सुखाय का माध्यम अधिक है ।
ऊपर दी जानकारी से स्पश्ट है कि पुस्तकें हैं, लेखक हैं, प्रकाषक हैं, इस पर पूंजीगत खर्चा भी है, लेकिन नहीं है तो खरीददार । हां, खरीददार ! पाठक तो हैं ही, तभी तो इतनी किताबों की खपत हो जाती है । पुस्तकों के लोकार्पण के समाचारों से छोटे-बड़े रिसाले आबाद रहते हैं । एक व्यवसाय, जिसमें पूंजी है, बाजार है, उपभोक्ता है  और इसके प्रति आम लोगों में पावनता का भाव है ; बावजूद इसके इसे गंभीरता से व्यवसाय के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है ।
क्या पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाषित समीक्षाओं में वह बात नहीे होेती है जोकि ़एक विज्ञापन में होती है ? क्या समीक्षा लिखने वाले लोगों की लेखनी में वह दिषा नहीं होती है कि पाठक उस किताब को खरीदने के लिए प्रेरित हो ? या फिर किताब को लोग महत्व नहीं देते हैं । मैं सबसे पहले तीसरे प्रष्न को ही उठाउंगा । दस साल पहले गांधी षांति प्रतिश्ठान ‘‘ आज भी खरे हैं तालाब ’’ पर काम कर रहा था । उसके बाद ‘‘ राजस्थान की रजत बूंदें’’ पुस्तक भी आई । पुस्तक आने से पहले ही उसकी चर्चा पत्र-पत्रिकाओं में हुई और पुस्तक छपने से पहले ही गांधी षंाति प्रतिश्ठान के पास हजारों किताबों की खरीद की अग्रिम राषि पहुंच चुकी थी । यहां यह भी ध्यान देना होगा कि दोनों पुस्तकें कथेतर हैं तथा उनकी कीमत दो सौ रुपए है । जाहिर है कि पैसे दे कर किताब तभी खरीदी जाती है जब उसका परिचय इस तरह से दिया जाए जैसे अमिताभ बच्चन केडबरी चाकलेट बेच रहा हो । केडबरी के छद्म स्वाद को बेचने के लिए अमिताभ के फिल्मी लटके-झटके जरूरी हैं, लेकिन किताब के लिए लटकांे-झटकों की नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को उभारने की आवष्यकता होती है । ऊपर उल्लेखित दोनों पुस्तकों के प्रकाषन-पूर्व परिचय में वह बात थी कि उसके लक्षित पाठक को तत्काल महसूस हुआ कि जिस तरह जीवन के लिए भोजन जरूरी है, उसी तरह उसके व्यक्तिगत संग्रह में ये किताबें ।
यह तय है कि प्रत्येक पुस्तक से इस तरह की विशय-वस्तु, प्रस्तुति और लेाकप्रियता की उम्मीद नहीं की जा सकती है, लेकिन यह तो उम्मीद की जा सकती है कि जब कागज का सीधा संबंध पर्यावरण से हो तथा कागज के रास्ते पेड़ों के संरक्षण का सूत्र अनिवार्यता है तब किताब के रूप में कागद कारे करते समय यह अवष्य ध्यान रखा जाए कि यह किस उद्देष्य से मुद्रित की जा रही है ।
यह तो तय है कि छपने वाली पुस्तकों की विशयवस्तु और लिखी जा रही समीक्षाओं में कहीं न कहीं कमी जरूर है, तभी वह उपभोक्ता यानी पाठक को आकर्शित नहीं कर पा रही है । प्रत्येक लेखक की रचना उसकी निगाह में सर्वश्रेश्ठ हेाती है, लेकिन जब समालोचक भी उसका चेहरा देख कर रचना को नहीें, बल्कि लेखक को जयषंकरप्रसाद सिद्ध करने पर तुल जाता है तो पत्रिका, आलोचक व पुस्तक तीनों की विष्वनीयता पर संकट आना लाजिमी है । किसी पुस्तक की समीक्षा के लिए टी.एस. इलियट की धारणा को उल्लेख करना चाहूंगा - श् प्ज पे ंिजनवने जव ेंल जींज बतपजपबपेउ पे वित जीम ेंाम व िबतमंजपवद वत बतमंजपवद वित जीम ेंाम व िबतपजपबपेउण्श्
यानी ‘‘ यह कहना अविवेकपूर्ण होगा कि आलोचना रचना के लिए होती है और रचना आलोचना के लिए ।’’
अज्ञेय ने भारत में पुस्तको की समीक्षा के संदर्भ में लिखा है - ‘‘ मैं अध्यापक नहीं रहा, पर साहित्य के मूल्यों की चिंता से, और उन मूल्यों के आध्धर पर समकालीन साहित्य की परख के सवाल से, हमेषा परेषान रहा ।’’
आज आम पाठक भी ऐसी ही परेषानियों से जूझ रहा है । पुस्तक की समीक्षा के मूल मानदंड - मौलिकता, प्रासंगिकता, भाव, प्रस्तुति, भाशा आदि गौण हो गए हैं । हिंदी में छप रही समीक्षाओं में रचना से अधिक लेखक के व्यक्तित्व की चर्चा होती है । अमुक पुस्तक किस पाठक वर्ग के लिए उपयोगी हो सकती है, इसका उल्लेख षायद ही कोई समीक्षक करता है । यह समीक्षा का आम तरीका है कि रचना की तुलना किसी महान लेखक की रचना से कर दी जाए । आमतौर पर देखा गया है कि पुस्तक का समीक्षा लेखक यदि बड़ा लेखक है तो उसकी समीक्षा की प्रस्तुति इतनी ऊंचे स्तर की होती है कि आम पाठक के लिए उबाऊ हो जाती है । समीक्षक यह मान कर लिखता है उसके पाठक उसी की तरह आलोचक हैं । जबकि इंडिया टुडे या जनसत्ता पढ़ने वाला आम पाठक होता है, हो सकता है कि उसका साहित्य या किसी तकनीकी विशय से कोई सरोकार हो ही नहीं । ऐसे में यदि समीक्षक विशय वस्तु को यह सोच कर सरल करता है कि उसका पाठक कुछ नया जानना चाहता है तो समीक्षा रोचक भी होती है औ उसका पाठक आगे चल कर किताब खरीदता भी है ।
कविता की पुस्तक है तो भाव, बिंब, भाशा, का सपाटपन जैसे षब्द और कथा साहित्य हो तो संवेदना, विदू्रूपता, समाज जैसे षब्दों का प्रयोग कर समीक्षा की इतिश्री मान ली जाती है । कुछ समीक्षक अपना ज्ञान बघाारने के लिए जटिल संस्कृतनिश्ठ हिंदी तथा विदेषी लेखकों की उक्तियों से समीक्षा को बोज्ञिल बना देते हैं । वे यह भूल जाते हैं कि उनका लेखन किसी अन्य कृति की विषेशता, विविधता या उसकी कमियों को उजागर करने के लिए है न कि स्वयं के ज्ञान के स्खलन के लिए ।  यह विडंबना है कि अधिकांष पुस्तकों की समीक्षा, पुस्तक के चतुर्थ आवरण सामग्री या भूमिका की सामग्री का पुनर्लेखन मात्र होती हैं । बहुत से लेखक तो अपनी पुस्तक की समीक्षा स्वयं या अन्य किसी मित्र से लिखवा कर पुस्तक के साथ ही भेज देते हैं ।
‘‘चैथा सप्तक’’ की भूमिका में अज्ञेय लिखते हैं - ‘‘समकालीन आलोचना की त्रुटियों और उसकी एकांगिता को भी अनदेखा न करना होगा । इस एकांगिता ने नई रचना का बहुत अहित किया है । उसने रचनाकारों को दिग्भ्रमित किया है और पाठक को भी इसलिए पथभ्रश्ट किया है कि उसने पाठक के सामने जो कसौटियां दी हैं वे स्वयं झूठी हैं । ’’ यह वक्तव्य कविता के संदर्भ में है । लेकिन यह टिप्पणी आज प्रकाषित हो रही सभी तरह की पुस्तक-समीक्षाओं पर सटीक प्रतीत होती है ।
यह आवष्यकता महसूस की जाने लगी है कि राश्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए पुस्तकों के प्रकाषन पर कहीं न कहीं नियंत्रण अवष्य होना चाहिए, गोया, प्रकाषकोें का पंजीकरण ही अनिवार्य कर दिया जाए तो स्वान्तः सुखय के लिए अपने धन से पुस्तकों के प्रकाषन के लोभ संभ्भरण पर कहीं अंकुष लगेगा । जब कम पुस्तकें आएंगी तो तुलनात्मक रूप से उनकी गुणवत्ता सुधरेगी ।  ऐसे में पुस्तकों की समीक्षा या फिर परिचय के स्तंभ में भी सुधार आएगा ।
पुस्तकों की समीक्षा लेखन की एक महत्वपूर्ण विधा है। दुर्भाग्य है कि स्कूली स्तर के पाठ्यक्रम में इसका कोई स्थान नहीं है । किसी कहानी पर प्रष्न-उत्तर या उसमें छिपा संदेष तलाषने जैसे प्रयोग तो पाठ्यक्रम में हैं, लेकिन पुस्तक की समीक्षा पाठ्यक्रमों में अछूती ही है ।
पुस्तक की समीक्षा किस आधार पर हो, पुस्तक का परिचय अन्य पाठकों से करवाने के मानदंड क्या हों, किसी पुस्तक की तुलना अन्य पुस्तकों से करने पर किस सावधानी की आवष्यकता होती है ; इन विशयों को बच्चों के प्रारंभिक पाठ्यक्रम में ही षामिल करना आवष्यक है । यह आने वाली पीढ़ी को पुस्तकों के प्रति संवेदनषील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । तब पुस्तकों की समीक्षा उसकी खरीद के लिए ललक व आकर्शण पैदा करेगी । जब पाठकों के बीच समीक्षओं व समीक्षकों की विष्वनीयता स्थापित होगी, तब पुस्तक परिचय की चार पंक्तियां एक सषक्त विज्ञापन का काम करेंगी ।
इस दिषा में एक सुझाव और है - पुस्तकों की समीक्षा के लिए नवोदित लोगों को अधिक अवसर देना चाहिए । नए लिखने वाले पुस्तकों को पूरा व उत्साह से पढ़ेंगे, फिर उनके मन में वरिश्ठ लेखकों की तरह अन्य लेखकों के प्रति पूर्वाग्रह कम होगा । हिंदी लेखन जगत में अलग-अलग अखाड़ों, खेमों में बंटा हुआ है और पुस्तकों की समीक्षा में ये ‘‘वर्गवाद’’ कई बार उभर आता है । नए लेखकों को अवसर देने से निश्पक्षता की संभावना अधिक होगी ।
हिंदी बाजार की भाशा बन गई है अतः उसका भवष्‍य उज्जवल है । हिंदी में पाठक बढ़ रहे हैं, लेखक बढ़ रहे हैं और पुस्तकें भी बढ़ रही हैं । आवष्यकता है तो पाठक की पठन रुचि को श्रेष्‍ठ पुस्तकों की ओर मोड़ने के कुछ सषक्त प्रयास किए जाएं । इसमें पुस्तकों की समीक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है ।

पंकज चतुर्वेदी


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