My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

threat on agriculture

देश की खाद्य सुरक्षा के लिए चेतावनी हैं उजड़ते खेत
पंकज चतुर्वेदी
सदियों से लोगों का पेट भरने के प्रयोजन में आने वाली धरती को जब गैरकृषि कार्य में इस्तेमाल का प्रचलन बढ़ जाए तो मान लें कि यह भारत के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर बड़ी चचोट है। भारत के गामीण विकस मंत्रालय के भूमि संसधन विभाग और इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा जारी ‘वैस्टलैंड एटलस-2019’  में उल्लेखित बंजर जमीन को खेती लायक बदलने की सरकारी गौरव गाथाओं के बीच यह दुखद तथ्य भी छुपा है कि हमारे देश में खेती के लिए जमीन साल-दर-साल कम हो रही है, जबकि आबादी बढ़ने से खाद्य की मांग बढ़ रही है और इस दिशा में देश की दुनिया के दीगर देशों पर निर्भरता  बढ़ती जा रही है।  जानना जरूरी है कि भारत के पास दुनिया की कुल धरती का 2.4 प्रतिशत है, जबकि विश्व की आबादी के 18 फीसदी हमारे बाशिंदे हैं।  भारत में खेती की जमीन प्रति व्यक्ति औसतन 0.12 हैक्टर रह गई है, जबकि विश्व में यह आंकड़ा 0.28 हैक्टर है।
सरकार भी मानती है कि पंजाब जैसे कृषि  प्रधान राज्य में देखते ही देखते 14 हजार हैक्टर अर्थात कुल जमीन का 0.33 प्रतिशत  पर खेती बंद हो गई।  पश्चिम बंगाल में 62 हजार हैक्टर खेत सूने हो गए तो केरल में 42 हजार हैक्टर से किसानों का मन उचट गया। देश  के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश  का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हैक्टर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांष अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यह भी सच है कि मनरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और  मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं।

नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक देश में 14 करोड़ हैक्टर खेत हैं।  विभाग की ‘‘भारत में पारिवारिक स्वामित्व एवं स्वकर्षित जोत’’ संबंधित रिपोर्ट का आकलन बहेद डरवना है। सन 1992 में ग्रामीण परिवारों के पास 11.7 करोड़ हैक्टर भूमि थी जो 2013 तक आते-आते महज 9.2 करोड़ हैक्टर रह गई।  यदि यही गति रही तो तीन साल बाद अर्थात 2023 तक खेती की जमीन आठ करोड़ हैक्टर ही रह जाएगी।
आखिर खेत की जमीन कौन खा जाता है ?  इसके मूल कारण तो खेती का अलाभकारी कार्य होना, उत्पाद की माकूल दाम ना मिलना, मेहनत की सुरक्षा आदि तो हैं ही, विकास ने सबसे ज्यादा खेतों की हरियाली का दमन किया है। पूरे देश में इस समय बन रहे या प्रस्तावित छह औद्योगिक कॉरीडोर के लिए कोई 20.14 करोड़ हैक्टर जमीन की बली चढ़ेगी, जाहिर है इसमें खेत भी होंगे। हमारे समय ने खड़ी फसल वाले खेतों को हाईवे की भेट चढ़ते हर रेाज देखा है।  सरकारी रिपोर्ट में भले ही बहुत से आंकड़े दर्ज हो कि कितनी सारी बंजर या बेकार जमीन को काम लायक बदल दिया गया है, लेकिन यह कटु सत्य है कि इन जमीनों के खेत में और खेतों के कंक्रीट में बदलने के आंकड़े निराशाजनक हैं।

  जरा सोचिय जो देश सन 2031 तक डेढ सौ करोड़ की आबादी पार कर जाएगा, वहां की खाद्य सुरक्षा बगैर खेती का इजाफा किए कैसे संभव होगी।

किसानेां के प्रति अपनी चिंता को दर्षाने के लिए सरकार के प्रयास अधिकांषतः उसकी चिंताओं में इजाफा ही कर रहे हैं । बीज को ही लें, गत् पांच साल के मामले सामने हैं कि बीटी जैसे विदेषी बीज महंगे होने के बावजूद किसान को घाटा ही दे रहे हैं । ऐसे बीजों के अधिक पैदावार व कीड़े न लगने के दावे झूठे साबित हुए हैं । इसके बावजूद सरकरी अफसर विदेषी जेनेटिक बीजों के इस्तेमाल के लिए किसानों पर दवाब बना रहे हैं । हमारे यहां मानव संसाधन प्रचुर है, ऐसे में हमें मषीनेां की जरूरत नहीं है, इस तथ्य को जानते-बूझते हुए सरकार कृशि क्षेत्र में आधुनिकता के नाम पर लोगों के रोजगार के अवसर कम कर रही है । रासायनिक खाद व कीटनाषकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के दुश्परिणाम किसान व उसके खेत झेल रहे हैं । इसके बावलूद सरकार चाहती है कि किसान पारंपरिक खेती के तरीके को छोड़ नए तकनीक अपनाए । इससे खेती की लागत बढ़ रही है और इसकी तुलना में लाभ घट रहा है ।
गंभीरता से देखें तो इस साजिष के पीछे कतिपय वित्त संस्थाएं हैं जोकि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाष रही हैं । खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है । हकीकत में किसान कर्ज से बेहाल है । नेषनल सैंपल सर्वें के आंकड़े बताते हैं कि आंध्रप्रदेष के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं । पंजाब और महाराश्ट्र जैसे कृशि प्रधान राज्यों में यह आंकड़ा औसतन 65 प्रतिषत है । यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुषी की सबसे अधिक घटनाएं प्रकाष में आई हैं । यह आंकड़े जाहिर करते हैं कि कर्ज किसान की चिंता का निराकरण नहीं हैं । किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देष के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।

किसान भारत का स्वाभिमान है और देष के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण किस स्तर पर है, इसकी बानगी यही है कि देष के किसान को गेहूं का दाम साढ़े छह रूपए किलो मिल रहा है, जबकि आस्ट्रेलिया से मंगवाए जा रहे गेंहूं की कीमत 10 रूपए से अधिक चुकाई जा रही है । जबकि बाजार में ब्रांडेड आटे का दाम बीस रूपए किलो है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेष पर प्रतिबंध -जैसे कदम देष का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 प्रतिषत है ,जबकि भारत में यह गत 20 सालों से दो को पार नहीं कर पाई है।




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

examination system is enemy of learning process

सीखने के आनंद को समाप्त करता परीक्षा का दवाब
पंकज चतुर्वेदी

15 फरवरी से सीबीएसई के 10वीं और 12वीें के बोर्ड इम्तेहान षुरू होने वाले हैं। खुद को बेहतर साबित करने के लिए इन परीक्षाओं में अव्वल नंबर लाने का भ्रम इस तरह बच्चों व उससे ज्यादा उनके पालाकों पर लाद दिया गया है कि अब ये परीक्षा नहीं, गला-काट युद्ध सा हो गया हैं । बच्चों के बचपन, षारीरीक और मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर एक बढ़िया नंबरों का सपना देष के ज्ञान- संसार पर भारी पड़ रहा है। क्ेसी विडंबना है कि डाक्टर-इंजीनियर या ऐसे ही सपनों को साकार करने के लिए लालायित कक्ष दस के बच्चे , जो बीते दस साल से स्कूल जा रहे बच्चे और उनके द्वारा वहां बिताया समय और बांची गई पुस्तकें उसको इतनी सी असफलता को स्वीकार करने और उसका सामना करने का साहस नहीं सिखा पाते हैं। उसमें अपने परिवार , षिक्षक व समाज के प्रति भरोसा नहीं पैदा हो पाता कि महज एक इम्तेहान के नतीजे के अच्छे नहंी होने से वे लेाग उसे स्वीकार करेंगे, अपनों की तरह। उसे ढांढस बंधाएंगे व आगे की तैयारी के लिए साथ देंगे। परीक्षा देने जा रहे बच्चे खुद के याद करने से ज्यादा इस बात से ज्यादा चिंतित दिखते हैं कि उनसे बेहतर करने की संभावना वाले बच्चें ने ऐसा क्या रट लिया है जो उसे नहीं आता। असल में प्रतिस्पर्धा के असली मायने सिखाने में पूरी षिक्षा प्रणाली असफल ही रही है। मैं अपनी क्षमता के अनुरूप सबसे बेहतर करूं यही स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा का मूल मंत्र होता है, लेकिन आज की प्रणाली दूसरों से तुलना में अपनी क्षमता आंकने का पाठ पढ़ाती है।

यह तो साफ जाहिर है कि बच्चे ना तो कुछ सीख रहे हैं और ना ही जो पढ रहे हैं उसका आनंद ले पा रहे हैं, बस एक ही धुन है या दवाब है कि परीक्षा में जैसे-तैसे अव्वल या बढ़िया नंबर आ जाएं। कई बच्चों का खाना-पीना छूट गया है । याद करें कुछ साल पहले के अखबारों में छपे समाचारों को, जिनमें एनसीईआरटी और सीबीएसई के हवाले से कई समाचार छपे थे कि अब बच्चों को परीक्षा के भूत से मुक्ति मिल जाएगी । अब ऐसी नीतियां व पुस्तकें बन गई हैं जिन्हें बच्चे मजे-मजे पढ़ेंगे । घोशणा की थी कि 10वीं के बच्चों को अंक नहीं ग्रेड दिया जाएगा, लेकिन इस व्यवस्था से बच्चों पर दवाब में कोई कमी नहीं आई है। यह विचारणीय है कि जो षिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना ना सिखा सके, जो विशम परिस्थिति में अपना संतुलन बनाना ना सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक है ?
बारहवीं बोर्ड के परीक्षार्थी बेहतर स्थानों पर प्रवेष के लिए चिंतित हैं तो दसवी के बच्चे अपने पसंदीदा विशय पाने के दवाब में । एक तरफ स्कूलों को अपने नाम की प्रतिश्ठा की चिंता है तो दूसरी ओर हैं मां-बाप के सपने । बचपन, षिक्षा, सीखना सब कुछ इम्तेहान के सामने कहीं गौण हो गया है । रह गई हैं तो केवल नंबरों की दौड़, जिसमें धन, धर्म , षरीर, समाज सब कुछ दांव पर लग गया है ।  बारहवी के बच्चे कालेज में प्रवेष के लिए आयोजित हुई अनगिनत इम्तेहानों के लिए भी चिंतित हैं। एक तरफ बोर्ड का दवाब तो दूसरे तरफ दीगर प्रवेष परीक्षाओं का ।
क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमता का तकाजा महज अंकों का प्रतिषत ही है ? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में , जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है । सीबीएसई की कक्षा 10 में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत से बच्चों के कम अंक रहे । जबकि हिंदी के मूुल्यांकन की प्रणाली को गंभीरता से देखंे तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है । कोई बच्चा ‘‘हैं’’ जैसे षब्दो ंमें बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी केा छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है । कोई बच्चा ‘स’ , ‘ष’ और ‘श’ में भेद नहीं कर पाता है । स्पश्ट है कि यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए । यानी मूल्यांकन का आधार बच्चों की योग्यता ना हो कर उसकी कमजोरी है । यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पर्चे बेचने-खरीदने की प्रवृति, नकल व झूठ का सहारा लेना जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं । षिक्षा का मुख्य उद्देष्य इस नंबर- दौड़ में गुम हो कर रह गया है ।

छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के लगातार नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देष के आठ षिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी, जिसकी अगुआई प्रो. यषपाल कर रहे थे । समिति ने देषभर की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया व जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी । उसमें साफ लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है ना समझ पाने का बोझ । सरकार ने सिफारिषों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं । फिर देष की राजनीति मंदिर-मस्जद जैसे विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही ।
वास्तव में परीक्षाएं आनंददायक षिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है । इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए । यह बात सभी षिक्षाषास्त्री स्वीकारते हैं ,इसके बावजूद बीते दो दषक में कक्षा में अव्वल आने की गला काट में ना जाने कितने बच्चे कुंठा का षिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं । हायर सैकेंडरी के रिजल्ट के बाद ऐसे हादसे सारे देष में होते रहते हैं । अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो में ही पालक युद्ध सा लड़ने लगते हैं ।
दैनिक ट्रिब्युन १९ फरवरी २० 

कुल मिला कर परीक्षा व उसके परिणामों ने एक भयावह सपने, अनिष्चितता की जननी व बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप  ले लिया है । कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर षर्तों की बाधाएं खड़ी कर दी हैं । सवाल यह है कि षिक्षा का उद्देष्य क्या है - परीक्षा में स्वयं को श्रेश्ठ सिद्ध करना, विशयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायाद ? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व षिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं । सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ‘‘ड्राप आउट’’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है । लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपने पसंद के विशय या संस्था में प्रवेष ना मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं । एम.ए और बीए की डिगरी पाने वालों में कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने अपनी पसंद के विशय पढ़े हैं । विशय चुनने का हक बच्चों को नहीं बल्कि उस परीक्षक को है जो कि बच्चों की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी गलतियों की गणना के अनुसार कर रहा है ।
आजादी के बाद हमारी सरकार ने शिक्षा विभाग को कभी गंभीरता से नहीं लिया । इसमें इतने प्रयोग हुए कि आम आदमी लगातार कुंद दिमाग होता गया । हम गुणात्मक दृष्टि से पीछे जाते गए, मात्रात्मक वृद्वि भी नहीं हुई । कुल मिला कर देखें तो षिक्षा प्रणाली का उद्देष्य और पाठ्यक्रम के लक्ष्य एक दूसरे में उलझ गए व एक गफलत की स्थिति बन गई । क्या कोई अपने पुराने अनुभवों से कुछ सीखते हुए बच्चों की बौद्धिक समृद्धता व अपने प्रौढ़ जीवन की चुनौतियों से निबटने की क्षमता के विकास के लिए कारगर कदम उठाते हुए नंबरों की अंधी दौड़ पर विराम लगाने की सुध लेंगे ?

पंकज चतुर्वेदी
9891928376ए 0120.6546008


शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

Desert destroying Farm land

खेतों की तरफ बढ़ता मरूस्थल

पंकज चतुर्वेदी 
Jnasandesh Times
एक तरफ परिवेश में कार्बन की मात्रा का बढना, साथ में ओजोन परत में हुए छेद में दिनों-दिन विस्तार से उपजे पर्यावरणीय संकट का कुप्रभाव लगातार जलवायु परिवर्तन के रूप में तो सामने आ ही रहा है, जंगलों की कटाई व कुछ अन्य कारकों के चलते दुनिया में तेजी से पांव फैला रहे रेगिस्तान का खतरा धरती पर जीवन की उपस्थिति को दिनों-दिन कमजोर करता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानि यूनेप की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाऊ या हरियाली वाली जमीन  रेत के ढेर से ढक रही है और इसका असर एक अरब लेागों पर पड़ रहा है। भारत में रेगिस्तान के विस्तार को भूजल के मनमाने दुरूपयोग ने पंख दे दिए  हैं।
इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। हमारे 32 प्रतिशत भूभाग की उर्वर क्षमता कम हो रही है, जिसमें से महज 24 फीसदी ही थार के इर्द गिर्द के हैं। सन 1996 में थार का क्षेत्रफल एक लाख 96 हजार 150 वर्ग किलोमीटर था जो कि आज दो लाख आठ हजार 110 वर्ग किलोमीटर हो गया है। भारत की कुल 328.73 मिलियन जमीन में से 105.19 मिलियन जमीन पर बंजर ने अपना डेरा जमा लिया है, जबकि 82.18 मिलियन हैक्टर जमीन रेगिस्तान में बदल रही है। यह हमारे लिए चिंता की बात है कि देश के एक-चौथाई हिस्से पर आने वाले सौ साल में मरूस्थल बनने का खतरा आसन्न है। हमारे यहां सबसे ज्यादा रेगिस्तान राजस्थान में है, कोई 23 मिलियन हैक्टर। गुजरात, महाराष्ट्र, मप्र, और जम्मू-कश्मीर की 13 मिलियन भूमि पर रेगिस्तान है तो अब उड़ीसा व आंध््राप्रदेश में रेतीली जमीन का विस्तार देखा जा रहा है। अंधाधुंध सिंचाई व जम कर फसल लेने के दुष्परिणाम की बानगी पंजाब है, जहां दो लाख हैक्टर जमीन देखते ही देखते बंजर हो गई। बंिटंडा, मानसा, मोगा, फिरोजपुर, मुक्तसर, फरीदकोट आदि में जमीन में रेडियो एक्टिव तत्व की मात्रा सीमा तोड़ चुकी है और यही रेगिस्तान की आमद का संकेत हैं।
Janwani meerut

पांच सदानीरा नदियों का पंजाब अब पानी के बढ़ते संकट के चलते रेगिस्तान में तब्दील होने को बढ़ रहा है। इस खतरे को राज्य सरकार ने भी भांप लिया है लेकिन  संकट यह है कि इस त्रासदी को न्योता देने वाला मुख्य कारक,खेती,  राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पंजाब के खेतों की सालाना पानी की मांग 43.7 लाख हैक्टेयर मीटर है और इसका 73 फीसदी भूजल से उगाहा जा रहा है। यही नहीं राज्य की नदियों में जल की उपलब्धता भी 17 मिलियन एकड़ फुट से घट कर 13 मिलियन एकड़ फुट रह गई है।  जब सरकार ने ज्यादा पानी पीने वाली फसलों और धरती की छाती चीर कर पानी निकालने वाली योजनाओं को खूब प्रोत्साहन दिया तो पानी की खपत के प्रति आम लोगों में बेपरवाही भी बढ़ी और देष के औसत जल इस्तेमला- 150 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रति दिन की सीमा यहां दुगनी से भी ज्यादा 380 लीटर हो गई।
पंजाब मृदा संरक्षण और केंद्रीय भूजल स्तर बोर्ड के एक संयुक्त सैटेलाईट सर्वें में यह बात उभर कर आई कि यदि राज्य ने इसी गति से भूजल दोहन जारी रखा तो आने वाले 18 साल में केवल पांच फीसदी क्षेत्र में ही भूजल बचेगा। सभी भूजल स्त्रोत पूरी तरह सूख जाएंगे और आज के बच्चे जब जवान होंगे तो उनके लिए ना केवल जल संकट, बल्कि जमीन के तेजी से रेत में बदलने का संकट भी खड़ा होगा। सन 1985 में पंजाब के 85 फीसदी हिस्से की कोख में लबालब पानी था। सन 2018 तक इसके 45 फीसदी में बहुत कम और छह फीसदी में लगभग खतम के हालात बन गए हैं। आज वहां 300 से एक हजार फीट गहराई पर नलकूप खोदे जा रहे हैं।

राज्य में 14 लाख से अधिक ट्यूब वेल रोप दिए गए । यही कारण है कि यहां हर साल औसतन 50 सेंटीमीटर भूजल स्तर नीचे जा रहा है।  सारे देष का पेट भरने के लिए मषहूर पंजाब में सन 1960 में महज 2.27 हैक्टेयर में धान की खेती होती थी- आखिरकार धान पंजाब के लोगों के भेाजन का हिस्सा था ही नहीं। वे मोटा अनाज, गेहूं, चना आदि उगाते थे- पहले खुद के लिए रखा फिर पूरे देष को बांट दिया।  उसके बाद यहां धान लगाने का चस्का ऐसा लगा कि सन 2018 तक इसका रकवा बढ़ कर 64.80 लाख हैक्टर हो गया।  सन 2009 में सरकार को इस संकट की थाह लगी तो धान बोआई  का एक कानून बना दिया और बोआई का महीना तपती गरमी के मई से खिसक कर जून कर दिया गया। इस उम्मीद में कि कुछ दिन में बरसात होगी और किसान की जल की जरूरत प्रकृति पूरा कर देगी। लेकिन नीति निर्धारक जलवायु परिवर्तन के संकट को भांप नहीं पाए, उसी का कुप्रभाव है कि बरसात होने के दिन भी ना केवल खिसक रहे हैं, बल्कि अनियमित भी हो रहे हैं। वैसे बीते साल राज्य सरकार ने धान की खेती से उपज रहे जल संकट के प्रति लोगों को  जागरूक किया तो उसका असर भी दिखा। सन 2019 में कोई साढे साल लाख हैक्टर कम रकवे में धान बोया गया है। इसकी जगह किसानों ने कपास, मक्का और फल-सब्जी बोई।

भारत के संदर्भ में यह तो स्पष्ट है कि हम वैश्विक प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के शिकार तो हो ही रहे हैं, जमीन की बेतहाशा जुताई, मवेशियों द्वारा हरियाली की अति चराई, जंगलों का विनाश और सिंचई की दोषपूर्ण परियोजनाएं हैं। बारिकी से देखेें तो इन कारकों का मूल बढ़ती आबादी है। हमारा देश आबादी नियंत्रण में तो सतत सफल हो रहा है, लेकिन मौजूदा आबादी का ही पेट भरने के लिए हमारे खेत व मवेशी कम पड़ रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर मोटे अनाज को अपने आहार में शामिल करने, ज्यादा पानी  वाली फसलों को अपने भोजन से कम करने जैसे प्रयास किया जाना जरूरी हैं। सिंचाई के लिए भी छोटी, स्थानीय तालाब , कुओं पर आधारित रहने की अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। यह स्पष्ट है कि बड़े बांध जितने महंगे व अधिक समय में बनते हैं, उनसे उतना पानी तो मिलता नहीं है, वे नई-नई दिक्कतों को उपजाते हैं, सो छोटे तटबंध, कम लंबाई की नहरों के साथ-साथ रासायनिक खाद व दवाओं का इस्तेमाल कम करना रेगिसतान के बढ़ते कदमों पर लगाम लगा सकता है। भोजन व दूध के लिए मवेशी पालन तो बढ़ा लेकिन उनकी चराई की जगह कम हो गई। परिणामतः मवेशी अब बहुत छोटी-छोटी घास को भी चर जाते हैं और इससे जमीन नंगी हो जाती है। जमीन खुद की तेज हवा और पानी से रक्षा नहीं कर पाती है. मिट्टी कमजोर पड़ जाती है और सूखे की स्थिति में मरुस्थलीकरण का शिकार हो जाती है। मरुस्थलों के विस्तार के साथ कई  वनस्पति और पशु प्रजातियों की विलुप्ति हो सकती है. गरीबी, भुखमरी और पानी की कमी इससे जुड़ी अन्य समस्याएं हैं।

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

Dug Wells Can Quench Thirst of Bundelkhand

 कुओं से ही बुझेगी बुंदेलखंड की प्यास 

पंकज चतुर्वेदी 

अमर उजाला 5-2-2020
बुंदेलखंड की प्यास, पलायन, अल्प वर्षा  अब किसी की संवेदना का जाग्रत नहीं करती। सभी मान बैठे हैें कि यह इस इलाके की नियति है। अभी जरा होली बीतने दें, गांव के गांव खाली हो जाएंगे। कई हजार करोड़ का बुंदेलंखंड विशेष  पैकेज यहां के कंठ तर नहीं कर पाया। एक दशक के दौरान कम से कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं,तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इं्रद्र की बेरूखी के सामने झुकने नहीं देते थे। यह बात अब समझना होगा कि इस क्षेत्र की प्यास का हल किन्ही बड़ी परियोजनाआं में नहीं है, इसका स्थाई समाधान पारंपरिक जल स्त्रोतों को स्थानीय स्तर पर सहेजने में ही है। खासकर मजरे-गांव- मुहल्लों की प्यास की कुंजी उन कुओं के पास ही है, जिन्हें समाज नल से घर तक पानी आने की आस में नष्ट  कर चुका है।
बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्षा  नहीं है, वह तो यहां सदियों, पीढ़ियों से होता रहा है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आंधी में पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र नश्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली।  बड़े करीने से यहां के आदि-समाज ने बूंदों को बचाना सीखा था। । दो तरह के तालाब- एक केवल पीने के लिए , दूसरे केवल मवेशी व ंिसंचाई के। पहाड़ की गोदी में बस्ती और पहाड़ की तलहटी में तालाब। तालाब के इर्द गिर्द कुएं ताकि समाज को जितनी जरूरत हो, उतना पानी खींच कर इस्तेमाल कर ले। अभी सन 60 तके इस अंचल में 60 हजार से ज्यादा कुएं और कोई 25 हजार छोटे-बड़े तालाब हुआ करते थे।
 बुंदेलखंड की पुश्तों पुरानी परंपरा रही है कि घर में बच्चे का जन्म हो या फिर नई दुल्हन आए, घर-मुहल्ले के कुंए की पूजा की जाती है-- जिस इलाके में जल की कीमत जान से ज्यादा हो वहां अपने घर के इस्तेंमाल का पानी उगाहने वाले कुंए को मान देना तो बनता ही है।  बीते तीन दशकों के दौरान भले ही प्यास बढ़ी हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था ने घर में नल या नलकूप का ऐसा प्रकोप बरपाया कि पुरखों की परंपरा के निशान कुएं गुम होने लगे। यह सभी जानते हैं कि बुंदेलखंड की जमीन की गहराई में ग्रेनाईट जैसे  कठोर चट्टानों का बसेरा है और इसे चीर कर भूजल निकालना लगभग नामुमकिन। असल में  यहां स्थापित अधिकांश हैंडपंप बरसात के सीपेज जल पर टिके हैं जोकि गरमी आते सूखने लगते हैं। 
छतरपुर जिला मुख्यालय के पुराना महोबा नाके की छोटी तलैया के आसपास अभी सन 90 तक दस से ज्यादा कुएं होते थे। इनमें से एक कुंए पर तो बाकायदा नगर पालिका का पंप था जिससे आसपास के घरों को जल-आपूर्ति होती थी। पुराने नाके के सामने का एक कुआं लगभग दो सौ साल पुराना है। पतली ककैया ईंटों व चूने की लिपाई वाले इस कुएं के पानी का इस्तेमाल पूरा समाज करता था। यहां से निकलने वाले पानी की कोई बूंद बरबाद ना हो, इस लिए इसकी पाल को बाहर की तरफ ढलवां बनाया गया था। साथ ही इसके ‘‘ओने’’ यानी जल निकलने की नाली को एक टैंक से जोडा गया था ताकि इसके पानी से मवेशी अपना गला तर कर सकें। सिद्धगनेशन, कोरियाना मुहल्ला, साहू मुहल्ला आदि के कुओं में सालभर पानी रहता था और समाज सरकार के भरेसे पानी के लिए नहीं बैठता था। यह गाथा अकेले महोबा रेाड की नहीं, शहर के सभी पुराने मुहल्लों की थी- गरीबदास मार्ग, तमरहियाई, शुक्लाना, कड़ा की बरिया, महलों के पीछे, हनुमान टौरिया सभी जगह शानदार कुएं थे, जिनकी सेवा-पूजा समाज करता था। ठीक यही हाल टीकमगढ़,पन्ना और दमोह के थे।
बांदा शहर में तो अभी भी 67 कुएं जिंदा है।ं इस शहर के मुहल्लों के नाम कुओं पर ही थे जैसे- राजा का कुआं,कुन्ना कुआं आदि। सन 2018 में वहां जिला प्रशासन ने 470 पंचायतों में जनता के सहयोग से कुओं को जिंदा करने का एक कार्यक्रम चलाया था और उसका सकारात्मक असर पिछले साल यहां दिखा भी। सागर जिले की रहली तहसील के रजवांस गांव में तो एक सदानीरा कुएं पर हैंड पंप लगा कर सारे गांव की प्यास बुझाई जा रही है। वहीं इलाके के सैंकड़ों कुए ऐसे भी जहां यदि किसी ने कूद कर आत्महत्या कर ली तो समाज ने उसे मिट्टी से भर कर समाप्त कर दिया। झांसी के खंडेराव गेट के षीतलामाता मंदिर की पंचकुईयां में आज भी सैंकड़ों मोटरें पड़ी हैं जो यहां के कई सौ परिवारों के पानी का साधन हैं । यह कुंए कभी भी सूखे नहीं।
प््रााचीन जल संरक्षण व स्थापत्य के बेमिसाल नमूने रहे कुओं को ढकने, उनमें मिट्टी डाल पर बंद करने और उन पर दुकान-मकान बना लेने की रीत  सन 90 के बाद तब शुरू  हुई जब लोगों को लगने लगा कि पानी, वह भी घर में मुहैया करवाने की जिम्मेदारी सरकार की है और फिर आबादी के बोझ ने जमीन की कीमत प्यास से महंगी कर दी। पुराने महोबा नाके के सामने वाले कुएं की हालत अब ऐसी है कि इसका पानी पीने लायक नही रहा। सनद रहे जब तक कुएं से बालटी डाल कर पाानी निकालना जारी रहता है उसका पानी शुद्ध रहता है, जैसे ही पानी ठहर जाता है, उसकी दुर्गति शुरू हो जाती है।
कई करोड़ की जल- आपूर्ति योजनाएं अब जल-स्त्रोत की कमी के चलते अपने उद्देयों को पूरा नहीं करपा रही हैं। यह समझना जरूरी है कि बुंदेलखंड में लघु व स्थानीय परियोजनाएं ही जल संकट से जूझने में समर्थ हैं। चूंकि बुंदेलखंड में पर्यावास तथा उसके बीच के कुएं ताल-तलैयों के ईदगिर्द ही बसती रही हैं, ऐसे में कुएं , तालाबों से पानी का लेन-देन कर धरती के जल-स्तर को सहेजने, मिट्टी की नमी बनाए रखने जैसे कार्य भी करते हैं।  छतरपुर षहर में अभी भी कोई पांच सौ पुराने कुएं इस अवस्था में है कि उन्हें कुछ हजार रूप्ए खर्च कर जिंदा किया जा सकता हे। ऐसे कुंओं को जिला कर उनकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की जल बिरादरी बना कर सौप दी जाए तो हर कंठ को प्याप्त जल मुहैया करवाना कोई कठिन कार्य नहीं होगा। यदि बुंदेलखंड के सभी कुओं का अलग से सर्वेक्षण करा कर उन्हें पुनर्जीवित करने की एक योजना शुरू की जाए तो यह बहुत कम कीमत पर जन भागीदारी के साथ हर घर को पर्याप्त पानी देने का सफल प्रयोग हो सकता है।



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