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शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

flood destroy rural economy too

पंकज चतुर्वेदी

अर्थव्यवस्था को पीछे धकेल देता है सैलाब

28 Aug 2021


साल
 भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा जारी भारत में जलवायु परिवर्तन' पर पहली रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि देश में न केवल गर्मी बढ- रही हैबल्कि बरसात के दिनों की संख्या घटने के साथ अचानक तेज बरसात की मात्रा में भी इजाफा हो रहा है। स्पष्ट बताया गया था कि जलवायु परिवर्तन की त्रासदी का सबसे भयावह रूप बाढ- के रूप में हमें देखने में मिलेगा। इस साल अभी भादौ का महीना बकाया हैलेकिन जहां जितना भी पानी बरसा हैउसने अपनी तबाही का दायरा बढ-ा दिया है। पिछले कुछ सालों में बारिश की मात्रा भले कम हुई हैलेकिन बाढ- से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ-ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ- से मुक्त क्षेत्र माना जाता थाअब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैंऔर मौसम बीतते ही उन इलाकों में पानी का संकट फिर छा जाता है। असल में बाढ- महज प्राकृतिक आपदा नहीं हैबल्कि देश के गंभीर पर्यावरणीयसामाजिक और आर्थिक संकट का कारक भी बन गई है। हमारे पास बाढ- से निबटने को महज राहत कार्य या यदाकदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प हैजबकि बाढ- के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होनाजलवायु परिवर्तनबढ-ती गरमीरेत की खुदाई व शहरी प्लास्टिक व खुदाई के मलबे का नदी में बढ-नाजमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनोंदिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन सड-खेत या मकान बनाने में सरकार या समाज को दशकों लग जाते हैंउन्हें बाढ- का पानी पलक झपकते ही उजाड- देता है। हम नये कार्यों के लिए बजट की जुगत लगाते हैंऔर जीवनदायी जल उनका काल बन जाता है। ॥ जल संसाधननदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के ताजा आंकड-े बताते हैं कि भारत में १९५३ से २०१७ के ६४ वर्षों के दौरान बाढ- से १०७४८७ लाख लोगों की मौत हुईआठ करोड- से अधिक मकान नष्ट हुए और २५.६ करोड- हेक्टेयर क्षेत्र में १०९२०२ करोड- रुûपये मूल्य की फसलों को नुकसान पहुंचा। इस अवधि में बाढ- से देश में २०२४७४ करोड- रुûपये मूल्य की सड-पुल जैसी सार्वजनिक संपत्ति पानी में मिल गई। मंत्रालय बताता है कि बाढ- से प्रति वर्ष औसतन १६५४ लोग मारे जाते हैं९२७६३ पशुओं का नुकसान होता है। लगभग ७१.६९ लाख हेक्टेयर क्षेत्र जल प्लावन से प्रभावित होता हैजिसमें १६८० करोड- रुûपये मूल्य की फसलें बर्बाद होती हैंऔर १२.४० लाख मकान क्षतिग्रस्त। ॥ त्रासदी का एक समान चलन॥ २००५ से २०१४ के दौरान देश के जिन कुछ राज्यों में नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में बाढ- की त्रासदी और जलस्तर के खतरे के निशान को पार करने का एक समान चलन देखा गया हैउनमें पश्चिम बंगाल की मयूराक्षीअजयमुंडेश्वरीतीस्ता नदियां शामिल हैं। ओडिशा में सुवर्णरेखाबैतरनीब्राह्मणीमहानंदा‚ @षिकुल्यावामसरदा नदियों में रही। आंध्र प्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रात्रिपुरा में मनु और गुमतीमहाराष्ट्र में वेणगंगागुजरात और मध्य प्रदेश में नर्मदा नदियों में यह स्थिति देखी गई॥। सरकारी आंकड-े बताते हैं कि १९५१ में भारत की बाढ-ग्रस्त भूमि की माप एक करोड- हेक्टेयर थी। १९६० में बढ- कर ढ-ाई करोड- हेक्टेयर हो गई। १९७८ में यह ३.४ करोड- हेक्टेयर थी। आज देश के कुल ३२९ मिलियन (दस लाख) हेक्टेयर में से चार करोड- हेक्टेयर इलाका बाढ- की चपेट में हर साल बर्बाद होता है। १९९५२००५ के दशक के दौरान बाढ- से नुकसान का सरकारी अनुमान १८०५ करोड- था जो अगले दशक यानी २००५२०१५ में ४७४५ करोड- हो गया। यह आंकड-ा ही बानगी है कि बाढ- किस निर्ममता से अर्थव्यवस्था को चट कर रही है। बिहार का ७३ प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ- और शेष दिन सुखाड- का दंश झेलता हैऔर यही वहां के पिछड-ेपनपलायन और परेशानियों का कारण है। राज्य का लगभग ४० प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। ॥ असम में इन दिनों १८ जिलों के कोई साढ-े सात लाख लोग नदियों के रौद्र रूप के चलते घरगांव से पलायन कर गए हैंऔर ऐसा हर साल होता है। अनुमान है कि असम में सालाना कोई २०० करोड- रुûपये का नुकसान होता हैजिसमेंमकानसड-मवेशीखेतपुलस्कूलबिजलीसंचार आदि शामिल हैं। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड-ी करने में दस साल लगते हैंजबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो ही जाता है यानी असम हर साल विकास की राह पर १९ साल पिछड- जाता है। केंद्र हो या राज्यसरकारों का ध्यान बाढ- के बाद राहत कार्यों व मुआवजे पर रहता हैदुखद ही है कि आजादी के ७४ साल बाद भी हम बाढ- नियंत्रण की कोई मुकम्मल योजना नहीं बना पाए हैं। इस अवधि में राज्य में बाढ- से नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड-ें तो पाएंगे कि इतने धन में नया सुरक्षित असम खड-ा किया जा सकता था। ॥ विकास पर भारी ॥ देश में सबसे ज्यादा सांसद व प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में उर्वरा धरतीकर्मठ लोगअयस्क व अन्य संसाधन उपलब्ध होनेे के बावजूद विकास की सही तस्वीर न उभर पाने का सबसे बड-ा कारण हर साल आने वाली बाढ- से नुकसान हैं। बीते दशक के दौरान राज्य में बाढ- के कारण ४५ हजार करोड- रुûपये कीमत की तो महज खड-ी फसल ही नष्ट हो गई। सड-सार्वजनिक संपत्तिइंसानमवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट के मुताबिक २०१३ में राज्य में नदियों के उफनने से ३२५९.५३ करोड- रुûपये का नुकसान हुआ था जो आजादी के बाद का सबसे बड-ा नुकसान था। अब तो देश के शहरी क्षेत्र भी बाढ़ø की चपेट में आ रहे हैंइसके कारण भौतिक नुकसान के अलावा मानव संसाधन का जाया होना तो असीमित है। सनद रहे कि देश के ८०० से ज्यादा शहर नदी किनारे बसे हैंवहां तो जलभराव का ंसकट है हीकई कस्बेजो अनियोजित विकास की पैदाईश हैंशहरी नालों के कारण बाढ-–ग्रस्त हो रहे हैं। ॥ १९५३ से २०१० तक हम बाढ- के उदर में ८१२५०० करोड- फूंक चुके हैं जबकि बाढ- उन्मूलन के नाम पर व्यय राशि १२६००० करोड- रुûपये है। यह धनराशि मनरेगा के एक साल के बजट का कोई चार गुणा है। २०१७ तक ८६ हजार करोड- इस मद में और व्यय होने का अनुमान है। आम तौर पर यह धनराशि नदी प्रबंधनबाढ- चेतावनी केंद्र बनाने और बैराज बनाने पर खर्च की गई लेकिन ये सभी उपाय बेअसर ही रहे हैं। आने वाले पांच साल के दौरान बाढ- उन्मूलन पर होने वाले खर्च का अनुमान ५७ हजार करोड- रुûपये आंका गया है। सनद रहे कि हम अभी तक एक सदी पुराने ढर्रे पर बाढ- को देख रहे हैं यानी कुछ बांध या तटबंध बनानाकुछ राहत सामग्री बांट देनाकुछ ऐसे कार्यालय बना देना जो बाढ- की संभावना की सूचना लोगों को दे सकें। बारिश के बदलते मिजाजभूउपयोग के तरीकों में परिवर्तन ने बाढ- के संकट को जिस तरह बदला हैउसको देखते हुए तकनीक व योजना में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक है। ॥ वैसे शहरीकरणवन विनाश और खननतीन ऐसे प्रमुख कारण हैंजो बाढ- विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। जब प्राकृतिक हरियाली उजाड- कर कंक्रीट का जंगल सजाया जाता हैतो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही हैसतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ- जाती है। फिर शहरीकरण के कूड-े ने समस्या को बढ-ाया है। यह कूड-ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। आज भी गांव में बाढ- से बचाव के लिए कोई व्यवस्थित तंत्र नहीं है। उन क्षेत्रों की पहचान करने की भी जरूरत हैजहां बाढ- में गड-बड-ी की ज्यादा आशंका रहती है। आज बारिश का पानी सीधे नदियों में पहुंच जाता है। वाटर हार्वेस्टिंग की सुनियोजित व्यवस्था नहीं है ताकि बारिश का पानी जमीन में जा सके। शहरी इलाकों में नाले बंद हो गए हैंऔर उन पर इमारतें बन गई हैं। ऐसे में थोड-ी बारिश में शहरों में जल जमाव हो जाता है। ॥ मानवीय हस्तक्षेप भी बड़़ा कारण॥ अनेक स्थानों पर बाढ- का कारण मानवीय हस्तक्षेप है। मध्य भारत की बड-ी बसावट पंजाब और हरियाणाउत्तराखंड़जम्मूकश्मीर और हिमाचल प्रदेश जमीन के अनियंत्रित शहरीकरण के कारण बाढ-ग्रस्त हो रहे हैं। भूस्खलन की घटनाएं बढ- रही हैंऔर इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड-ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। हरियाली उजड-ती है और खदानों से निकली धूल और मलबा नदीनालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। सनद रहे हिमालय पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड- है। इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी हैतभी इसे जीवितपहाड-' भी कहा जाता है। इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड-ा भाग कठोरचट्टानें न हो करकोमल मिट्टी है। बारिश या बरफ पिघलने पर पानी नीचे की ओर बहता है तो पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है। पर्वतीय नदियों में बाढ- से मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ-ता हैउसी तेजी से उतर जाता है। इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजा> हुआ करते हैंलेकिन अब इन नदियों को जगहजगह बांधा जा रहा हैइसलिए बेशकीमती मिट्टी बांधों में ही रुक जाती हैऔर नदियों को उथला बनाती रहती है। पहाड-ी नदियों में पानी चढ- तो जल्दी जाता हैपर उतरता बड-े धीरेधीरे है॥। मौजूदा हालात में बाढ- महज प्राकृतिक प्रकोप नहींबल्कि मानवजन्य संसाधनों की त्रासदी है। अतएव बाढ- के बढ-ते सुरसामुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड-ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहावतरीकोंविभिन्न नदियों के >ंचाईस्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निपक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदारसीमेंट के कारोबारी और जमीनलोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकनानदियों को उथला होने से बचानाबड-े बांध पर पाबंदीनदियों के करीबी पहाड-ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़़-छाड- को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैंजो बाढ- सरीखी भीषण विभीषिका का मुंहतोड- जवाब हो सकते हैं। ॥ द॥ जल संसाधननदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड-े बताते हैं कि भारत में १९५३ से २०१७ के ६४ वर्षों के दौरान बाढ- से १०७४८७ लाख लोगों की मौत हुइÈ‚ आठ करोड- से अधिक मकान नष्ट हुए और २५.६ करोड- हेक्टेयर क्षेत्र में १०९२०२ करोड- रुûपये मूल्य की फसलों को नुकसान पहुंचा। इस अवधि में बाढ- से देश में २०२४७४ करोड- रुûपये मूल्य की सड-पुल जैसी सार्वजनिक संपत्ति पानी में मिल गई। मंत्रालय बताता है कि बाढ- से प्रति वर्ष औसतन १६५४ लोग मारे जाते हैं२७६३ पशुओं का नुकसान होता है। लगभग ७१.६९ लाख हेक्टेयर क्षेत्र जल प्लावन से प्रभावित होता हैजिसमें १६८० करोड- की फसलें बर्बाद होती हैं॥ लेखक एवं पर्यावरण मामलों के जानकार॥

 


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