My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

ecology system negligence resulting Chamoly incident

 लाॅकडाउन के चलते सब बंद रहापर पहाड़ों में घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति देने का काम चलता रहा

 हिमालय पहाड़ न केवल हर साल बढ़ रहा है बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं। यहां पेड़ भूमि को बांधकर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैंजब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ होती है तो दिल्ली तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैंयमुना में भी कम पानी का संकट भी खड़ा होता है। अधिक सुरंग या अविरल धारा को रोकने से पहाड़ अपने नैसर्गिक स्वरूप में रह नहीं पाता और उसके दूरगामी परिणाम विभिन्न प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ रहे हैं।

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पंकज चतुर्वेदी

पर्यावरण मामलों के वरिष्ठ लेखक



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चमोली हादसे से मोदी सरकार की नीतियों पर फिर सवाल हैं। छह फरवरी, 2021 की सुबह कोई साढे दस बजे नंदा देवी पर्वतमाला पर चंदी के मुकुट से दमकते  ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर तेजी से नीचे फिसला और ऋषिगंगा नदी में गिर गया। विश्वप्रसिद्ध फूलों की घाटी के करीबी रैणी गांव के पास चल रहे छोटे से बिजली संयत्र में देखते ही देखते तबाही आ गई। उसका असर पांच किलोमीटर दायरे में बहने वाली धौली गंगा पर पड़ा और वहां निर्माणाधीन एनटीपीसी का पूरा प्रोजेक्ट तबाह हो गया। रास्ते के कई पुल टूट गए और कई गांवों का संपर्क खत्म हो गया। सवाल यह है कि जो क्षेत्र पहले से संवेदनशील होंउससे छेड़छाड़ आत्मघाती हो सकती हैक्या यह बात नीतियां तय करने वालों को समझ में नहीं आ रहीइस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि हमें अभी अपने जल-प्राण कहलाने वाले उत्तरांचल के बारे में सतत अध्ययन और नियमित आकलन की बेहद जरूरत है। यह भी सोचने की बात है कि राज्य में पर्यटन को किस हद तक व किस शर्त पर बढ़ावा दिया जाए।

प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैंहमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो बमुश्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं होतेवे इलाके के जंगलजल और वायु की दशा और दिशा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकार पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजगी भी समय-समय पर सामने आती है। यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व जरूरी है। वृक्ष से पानीपानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए पहाड़ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी-सी उपेक्षित संरचना। विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बड़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों के लिए चौड़ी सड़कों के निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया।

हिमालय भारतीय उपमहाद्धीप के जल का मुख्य आधार है और यदि नीति आयोग के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा तीन साल पहले तैयार जल संरक्षण रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हिमालय से निकलने वाली 60 फीसदी जल धाराओं में दिनों-दिन पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होनाकार्बन उत्सर्जनजलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणामस्वरूप धरती को ठंडा करने का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विषेशज्ञों तक सीमित नहीं रह गई हैं। अब तो ऐसे दावों के दूसरे पहलू भी सामने आने लगे कि जल्द ही हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे जिसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके कारण जहां एक तरफ कई नगर-गांव जलमग्न हो जाएंगेवहीं धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली छतरी के नष्ट होने से भयानक सूखाबाढ़ व गरमी पड़ेगी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा।

गत मार्च महीने के तीसरे सप्ताह से भारत में कोरोना संकट के चलते लागू की गई बंदी में भले ही दफ्तर-बाजार आदि पूरी तरह बंद रहे लेकिन 31 विकास परियोजनाओं के लिए 185 एकड़ घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति देने का काम बदस्तूर जारी रहा। 7 अप्रैल, 2020 को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेस से आयोजित की गई और ढेर सारी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति दे दी गई। समिति ने पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील 2933 एकड़ के भू-उपयोग परिवर्तन के साथ-साथ 10 किलोमीटर संरक्षित क्षेत्र की जमीन को भी कथित विकास के लिए सौंपने पर समिति सहमत दिखती है। इस श्रेणी में प्रमुख प्रस्ताव उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी गढ़वाल जिलों में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना (300 मेगावाट) का निर्माण जारी है। यह परियोजना बिनोग वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से 3.1 किमी दूर स्थित है और अभयारण्य के डिफॉल्ट ईएसजेड में गिरती है। परियोजना के लिए 768.155 हेक्टेयर वन भूमि और 105.422 हेक्टेयर निजी भूमि की जरूरत होगी। परियोजनाओं को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने निलंबित कर दिया था। इसके बावजूद इस परियोजना पर राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा विचार किया जा रहा हे।

दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय की पर्यावरणीय छेड़छाड़ से उपजी सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी को भुलाकर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं उत्तराखंड राज्य के भविष्य के लिए खतरा बनी हुई हैं। नवंबर2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम-से-कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही जंगल कहा जाएगा। यही नहींवहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम न हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों। जाहिर है कि जंगल की परिभाषा में बदलाव का असल उद्देश्य ऐसे कई इलाकों को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कथित विकास के राह में रोड़ा बने हुए हैं। उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए। मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे। यही नहींसड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी से भी गुजर रहा है। उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल101 छोटे पुल3596 पुलिया12 बाइपास सड़कें बनाने का प्रावधान है। कोई 12 हजार करोड़ रुपये के अलावा ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है जिसमें न सिर्फ बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगेवन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाएंगे।

यह बात स्वीकार करनी होगी कि ग्लेशियर के करीब बन रही जल विद्युत परियोजना के लिए हो रहे धमाकों व तोड़-फोड़ से शांत-धीर-गंभीर रहने वाले जीवित हिम-पर्वत नाखुश हैं। हिमालय भू-विज्ञान संस्थान का एक अध्ययन बताता है कि गंगा नदी का मुख्य स्रोत गंगोत्री हिंम खंड भी औसतन 10 मीटर के बनिस्पत 22 मीटर सालाना की गति से पीछे खिसका है। सूखती जल धाराओं के मूल में ग्लेशियर क्षेत्र के नैसर्गिक स्वरूप में हो रही तोड़फोड है।

सनद रहेहिमालय पहाड़ न केवल हर साल बढ़ रहा है बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं। यहां पेड़ भूमि को बांधकर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है। ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है। जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैंजब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ होती है तो दिल्ली तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैंयमुना में भी कम पानी का संकट भी खड़ा होता है। अधिक सुरंग या अविरल धारा को रोकने से पहाड़ अपने नैसर्गिक स्वरूप में रह नहीं पाता और उसके दूरगामी परिणाम विभिन्न प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ रहे हैं।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

Why famers burn there waste in land

 पराली जलाने में किसान की मजबूरी का हल खोजें 

पंकज चतुर्वेदी 



 अभी तीन महीने पहले दिल्ली के सभी एफएम रेडियो, हिंदी के सभी खबरिया चैनल पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के मुस्कुराते फोटो व संवाद के साथ कोई पंद्रह दिन विज्ञापन चले जिसमें किसी ऐसे घोल की चर्चा थी , जिसके डालते ही पराली गायब हो जाती है व उसे जलानानहीं पड़ताजब दिल्ली’एनसीआर के पचास हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को स्माॅग ने ढंक लिया था, जब रेवाड़ी जिले के धारूहेडा से ले कर गाजियाबाद के मुरादनगर तक का वायु गुणवत्ता सूचकांक साढे चार सौ से अधक था तब दिल्ली सरकार द्वारा कई करोड़ के विज्ञापन उम्मीद जता रहे थे कि आने वाले दिन इतने घुटनभरे ना हों। ऐसा नहीं कि विज्ञापन में पराली जलाने से रोकने का काम केवल केजतरीवाल सरकार ही कर रही थी, हरियाणा व पंजाब सरकार के भी पूरे पन्ने के विज्ञापन स्वच्छ हवा के सपने दिखा रहे थे। अनुमान है कि यदि तीनो ंराज्यों के इस दिषा में विज्ञापन के खर्चा को जोड़ा जाए तो आधार अरब का व्यय हुआ होग लेकिन इसका हांसिल क्या हुआ ?  हाल ही में भारत सरकार के पर्यावरण और वन ंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा  दायर कर बताया कि पंजाब में पिछले साल की तुलना में कहीं ज्यादा पराली जलाई गई तो हरियाणा, उप्र में कुछ कम तो हुई लेकिन इतननी नहीं कि वायु गुणवत्तासुधर जाती। 

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि  फसल अवषेश या पराली के निस्तारण हेतु  किसान कल्याण विभाग ने  पंजाब, हरियाणा, उप्र व दिल्ली में 2018 से 2020-21 की अवधि में एक योजना लागू की है जिसका पूरा धन केंद्र दे रहा है। इसके लिए केंद्र ने कुल 1726.67 करेाड़ रूपए जारी किए जिसका सर्वाािक हिस्सा पंजाब को 793.18 करोड दिया गया। विडंबना है कि  इसी राज्य में सन 2020 के दौरान पराली जलाने की 76590 घटनाएं सामने आई, जबकि बीते साल 2019 में ऐसी 52991 घटनांए हुई थीं। जाहिर है कि पराली जलाने की घटना में इस राज्य में 44.5 फीसदी का इजाफा हुआ। हरियाण में जहां सन 2019 में पराली जलाने की 6652 घटनाएं हुई थीं, वे सन 2020 में 5000 रह गईं। 

दिल्ली की आवोहवा जैसे ही जहरीली हुई पंजाब-हरियाणा के खेतों में किसान अपने अवषेश या पराली जलाने पर ठीकरा फोड़ा जाने लगा, हालांकि यह वैज्ञानिक तथ्य है कि राजधानी के स्माॅग में पराली दहन का योगदान बहुत कम है , लेकिन यह भी बात जरूरी है कि खेतों में जलने वाला अवशेष असल में किसान के लिए भी नुकसानदेह है। पराली का ध्ुाआं उनके स्वास्थ्य का दुष्मन है, खेती की जमीन की उर्वरा षक्ति कम करने वाला है और दूभर भी है। हालांकि खेतों में अवषेश जलाना गैरकानूनी घोशित है फिर भी धान उगाने वाला ज्यादातर किसान पिछली फसल काटने के बाद खेतों के अवशेषों को उखाड़ने के बजाए खेत में ही जला देते हैं। 

विभिन्न राज्य सरकारें मुकदमें कायम कर रही हैं, किसानों की गिरफ्तारी भी हो रही है इसके बावजूद फसल अवषेश को खेत में जलाना ना रूक पाने के पीछे किसान की भी अपनी व्याहवारिक दिक्कतें हैं और विडंबना है कि नीतिनिर्धारक उस पर गौर करते नहीं। इन दिनों चल रहे किसान आंदोलन में पराली जलाने पर दर्ज मुकदमें भी एक मुद्दा बना हुआ है। जान लें देष में हर साल कोई 31 करोड़ टन फसल अवषेश को फूंका जाता है जिससे हवा में जहरीले तत्वों की मात्रा 33 से 290 गुणा तक बढ़ जाती है। एक अनुमान है कि हर साल अकेले पंजाब और हरियाणा के खेतों में कुल तीन करोड़ 50 लाख टन पराली या अवषेश जलाया जाता है। एक टन पराली जलाने पर दो किलो सल्फर डाय आक्साईड, तीन किलो ठोस कण, 60 किलो कार्बन मोनो आक्साईड, 1460 किलो कार्बन डाय आक्साईड और 199 किलो राख निकलती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कई करोड़ टन अवषेश जलते है तो वायुमंडल की कितनी दुर्गति होती होगी। इन दिनों सीमांत व बड़े किसान मजदूरों की उपलब्धता की चिक-चिक से बचने के लिए खरीफ फसल, खासतौर पर धान काटने के लिए हार्वेस्टर जैसी मषीनों का सहारा लेते हैं। इस तरह की कटाई से फसल के तने का अधिकांष हिस्सा  खेत में ही रह जाता है। खेत की जैवविविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है, खासतौर पर जब पूरी खेती ऐसे रसायनों द्वारा हो रही है जो कृशि-मित्र सूक्ष्म जीवाणुओं को ही चट कर जाते हैं। फसल से बचे अंष को इस्तेमाल मिट्टी जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ाने के लिए नही किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जहां गेहूं, गन्ने की हरी पत्तियां, आलू, मूली, की पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में उपयोग की जाती हैं तो कपास, सनई, अरहर आदि के तने गन्ने की सूखी पत्तियां, धान का पुआल आदि को जला दिया जाता है। 

कानून की बंदिष और सरकार द्वारा प्रोत्साहन राषि के बावजूद पराली के निबटान में बड़े खर्च और दोनो फसलों के बीच बहुत कम समय के चलते बहुत से किसान अभी भी नहीं मान रहे। उधर किसान का पक्ष है कि पराली को मषीन से निबटाने पर प्रति एकड़ कम से कम पांच हजार का खर्च आता है। फिर अगली फसल के लिए इतना समय होता नहीं कि गीली पराली को खेत में पड़े रहने दें। विदित हो हरियाणा-पंजाब में कानून है कि धान की बुवाई 10 जून से पहले नहीं की जा सकती है। इसके पीछे धारणा है कि भूजल का अपव्यय रोकने के लिए  मानसून आने से पहले धान ना बोया जाए क्योंकि धान की बुवाई के लिए खेत में पानी भरना होता है। चूंकि इसे तैयार होने में लगे 140 दिन , फिर उसे काटने के बाद गेंहू की फसल लगाने के लिए किसान के पास इतना समय होता ही नहीं है कि वह फसल अवषेश का निबटान सरकार के कानून के मुताबिक करे। जब तक हरियाणा-पंजाब में धान की फसल की रकवा कम नहीं होता, या फिर खेतों में बरसात का पानी सहेजने के कुंडं नहीं बनते और उस जल से धान की बुवाई 15 मई से करने की अनुमति नहीं मिलती ; पराली के संकट से निजात मिलेगा नहीं। हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रापिकल मेट्रोलोजी, उत्कल यूनिवर्सिटी, नेषनल एटमोस्फिियर रिसर्च लेब व सफर के वैज्ञानिकों के संयुक्त समूह द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि यदि खरीफ की बुवाई एक महीने पहले कर ली जाए जो राजधानी को पराली के धुए से बचाया जा सकता है। अध्ययन कहता है कि यदि एक महीने पहले किसान पराली जलाते भी हैं तो हवाएं तेज चलने के कारण हवा-घुटन के हालता नहीं होतेव हवा के वेग में यह धुआं बह जाता है। यदि पराली का जलना अक्तूबर-नवंबर के स्थान पर सितंबर में हो तो स्माॅग बनेगा ही नहीं। 

कहने को राज्य सरकारें मषीनें खरीदने पर छूट दे रही हैं परंतु किसानों का एक बड़ा वर्ग सरकार की सबसिडी योजना से भी नाखुष हैं। उनका कहना है कि पराली को नश्ट करने की मषीन बाजार में 75 हजार से एक लाख में उपलब्ध है, यदि सरकार से सबसिड़ी लो तो वह मषीन डेढ से दो लाख की मिलती है। जाहिर है कि सबसिडी उनके लिए बेमानी है। उसके बाद भी मजदूरों की जरूरत होती ही है। पंजाब और हरियाणा दोनों ही सरकारों ने पिछले कुछ सालों में पराली को जलाने से रोकने के लिए सीएचसी यानी कस्टम हाइरिंग केंद्र भी खोले हैं. आसान भाषा में सीएचसी मशीन बैंक है, जो किसानों को उचित दामों पर मशीनें किराए पर देती हैं।

किसान यहां से मषीन  इस लिए नहीं लेता क्योंकि उसका खर्चा इन मशीनों को किराए पर प्रति एकड़ 5,800 से 6,000 रूपए तक बढ़ जाता है। जब सरकार पराली जलाने पर 2,500 रुपए का जुर्माना लगाती है तो फिर किसान 6000 रूपए क्यों खर्च करेगा? यही नहीं इन मशीनों को चलाने के लिए कम से कम 70-75 हार्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत होती है, जिसकी कीमत लगभग 10 लाख रूपए है, उस पर भी डीजल का खर्च अलग से करना पड़ता है। जाहिर है कि किसान को पराली जला कर जुर्माना देना ज्यादा सस्ता व सरल लगता है। उधर  कुछ किसानों का कहना है कि सरकार ने पिछले साल पराली न जलाने पर मुआवजा देने का वादा किया था लेकिन हम अब तक पैसों का इंतजार कर रहे हैं।

दुर्भाग्य है कि पराली जलाना रोकने की अभी तक जो भी योजनाएं बनीं, वे मषीनी तो हैं लेकिन मानवीय नहीं, वे कागजों -विज्ञापनो पर तो लुभावनी हैं लेकिन खेत में व्याहवारिक नहीं।  जरूरत है कि माईक्रो लेबल पर किसानों के साथ मिल कर  उनकी व्याहवारिक दिक्कतों को समझतें हुए इसके निराकरण के स्थानीय उपाय तलाषें जाएं। मषीनें कभी भी प्र्यावरण का विकल्प नहीं होतीं।, इसके लिए स्वनिंयंत्रण ही एकमात्र निदान होता है। 



गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

Women murdered in the name of witch-hunt


            

             औरत को मारने के बहाने

                     पंकज चतुर्वेदी


यह घटना है आठ जनवरी 2021 की राजधानी रांची के कांके थाना के तहत  हुसीरपुर गांव की है - साठ साल की जैतून खातुन ने इस लिए जहर खा कर कर खुदकुशी  कर ली क्योंकि उसके कुछ पड़ोसी उन्हें यह मान कर प्रताड़ित कर रहे थे कि मृतका डायन है व उसके जादू-टोने के चलते उनका दामाद बीमार हो गया। इस बार झारखंड से जिन झुटनी मेहतो को पद्म सम्मान से अलंकरण के लिए चयनित किया गया है , वे इसी डायन प्रथा के प्रति लोगों को सामाजिक व कानूनी रूप से जागरूक करने के लिए लगी हैं। इसमें सरायकेला की छुटनी मेहतो तो स्वयं इस अंध विश्वास  की शिकार हुई व उसके बाद उन्होंने लोगों को इसके प्रति सजग बनाने का जिम्मा उठाया। झारखंड में सन 2015 से अक्तूबर 2020 के बीच डायन करार दे कर प्रताड़ित करने के 46581 मामले पुलिस ने दर्ज किए और इस त्रासदी में 211 औरतों को निर्ममता से मार डाला गया। राज्य के गढवा जिले में तो कुल 1825 दिनों में टोनही-डायन के 1278 मुकदमे कायम हुए। एक बात और जान लें कि डायन कुरीति अकेले झारखंड तक सीमित नहीं है, यह बिहार, असम, मध्यप्रदेष सहित कोई आधा दर्जन राज्यों में ऐसे ही हर साल सैंकड़ों औरतों को बर्बर तरीके से मारा जा रहा है । 

देश्  के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुईं जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है । कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य शासन ने एक जांच रिर्पोट तैयार की है जिसमें बताया गया है कि अंधविश्वास , अज्ञान  और अशिक्षा के कारण टोनही या डायन करार दे कर किस तरह निरीह महिलाओं की आदिकालीन लोमहर्षक ढ़ंग से हत्या कर दी जाती है । औरतों को ना केवल जिंदा जलाया जाता है, बल्कि उन्हें गांव में नंगा घुमाना, बाल काट देना, गांव से बाहर निकाल देना जैसे निर्मम कृत्य भी डायन या टोनही के नाम पर होते रहते हैं। इन शर्मनाक घटनाओं का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू यह है कि इन महिला प्रताडनाओं के पीछे ना सिर्फ महिला की प्रेरणा होती है,बल्कि वे इन कुकर्मों में बढ़-चढ़ कर पुरूषों का साथ भी देती हैं ।

आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में बेगा, गुनियाओं और ओझाओं के झांसे में आ कर पिछले तीन वर्षों में तीन दर्जन से अधिक औरतों को मार डाला गया है । कोई एक दर्जन मामलों में आदमियों को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी है । मरने वालों में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है । किसी को जिंदा जलाया गया तो किसी को जीवित ही दफना दिया गया । किसी का सिर धड़ से अलग करा गया तो किसी की आंखें निकाल ली गईं ।


 ये आंकड़े मात्र वही हैं जिनकी सूचना पुलिस तक पहुंची । खुद पुलिस भी मानती है कि दर्ज नहीं हो पाए मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है । किसी गांव में कोई बीमारी फैले या मवेशी मारे जाएं या फिर किसी प्राकृतिक विपदा की मार हो, आदिवासी इलाकों में इसे ‘टोनही’ का असर मान लिया जाता है । भ्रांति है कि टोनही के बस में बुरी आत्माएं होती हैं, इसी के बूते पर वह गांवों में बुरा कर देती है । 

ग्रामीणों में ऐसी धारणाएं फैलाने का काम नीम-हकीम, बेगा या गुनिया करते हैं । छत्तीसगढ़ हो या निमाड़, या फिर झारखंड व ओडिषा ; सभी जगह आदिवासियों की अंधश्रद्धा इन झाड़-फूंक वालों में होती है । इन लोगों ने अफवाह उड़ा रखी है कि ‘टोनही’ आधी रात को निर्वस्त्र हो कर शम्सान जाती है और वहीं तंत्र-मंत्र के जरिए बुरी आत्माओं को अपना गुलाम बना लेती है । उनका मानना है कि देवी अवतरण के पांच दिनों- होली,हरेली,दीवाली और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के मौके पर ‘टोनही’ सिद्धी प्राप्त करती है । गुनियाओं की मान्यता के प्रति इस इलाके में इतनी अगाध श्रद्धा है कि ‘देवी अवतरण’ की रातों में लोग घर से बाहर निकलना तो दूर, झांकते तक नहीं हैं । गुनियाओं ने लोगों के दिमाग में भर रखा है कि टोनही जिसका बुरा करना चाहती है, उसके घर के आस-पास वह अभिमंत्रित बालों के गुच्छे, तेल, सिंदूर, काली कंघी या हड्डी रख देती है । ये लोग केवल इशारा  करते हैं जैसे कि- डायन के घर का दरवाजा पश्चिम  को है या उसके दरवाजे साल का पेड़ है या कुआं है। फिर भीड़ सबसे कमजोर शिकार  का अंदाजा लगाती है और टूट पड़ती है। 


मप्र के झाबुआ-निमाड़ अंचल में भी महिलाओं को इसी तरह मारा जाता है ; हां, नाम जरूर बदल जाता है - डाकन । गांव की किसी औरत के शरीर में ‘माता’ प्रविष्ठ हो जाती है । यही ‘माता’ किसी दूसरी ‘माता’ को डायन घोषित कर देती है । और फिर वही अमानवीय यंत्रणाएं शुरू हो जाती हैं । 

यह समझना जरूरी है कि अधिकांश आदिवासी गांवों तक सरकारी स्वास्थ महकमा पहुंच नहीं पाया है । जहां कहीं अस्पताल खुले भी हैं तो कर्मचारी इन पुरातनपंथी वन पुत्रों में अपने प्रति विश्वास नहीं उपजा पाए है । तभी मवेशी मरे या कोई नुकसान हो, गुनिया हर मर्ज की दवा होता है । उधर गुनिया के दांव-पेंच जब नहीं चलते हैं तो वह अपनी साख बचाने कि लिए किसी महिला को टोनही घोषित कर देता है । गुनिया को शराग, मुर्गे, बकरी की भेंट मिलती है; बदले में किसी औरत को पैशाचिक कुकृत्य सहने पड़ते हैं । ऐसी महिला के पूरे कपड़े उतार कर गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां चारों तरफ से पत्थर बरसते हैं । ऐसे में हंसिए से आंख फोड़ दी जाती है ।


ठेठ आदिम परंपराओं में जी रहे आदिवासियों के  इस दृढ़ अंध विश्वास का फायदा इलाके के असरदार लोग बड़ी चालाकी से उठाते है । अपने विरोधी अथवा विधवा-बूढ़ी औरतों की जमीन हड़पने के लिए ये प्रपंच किए जाते हैं । थोड़े से पैसे या शराब के बदौलत गुनिया बिक जाता है और किसी भी महिला को टोनही घोषित कर देता है । अब जिस घर की औरत को ‘दुष्टात्मा’ बता दिया गया हो या निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाया गया हो, उसे गांव छोड़ कर भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है । कई मौकों पर ऐसे परिवार की बहु-बेटियों के साथ गुनिया या असरदार लोग कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं । यही नहीं अमानवीय संत्रास से बचने के लिए भी लोग ओझा को घूस देते हैं ।

मप्र शासन की जांच रपट में कई रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों का जिक्र है । लेकिन अब अधिकारी सांसत में हैं कि अनपढ़ आदिवासियों को इन कुप्रथाओं से बचाया कैसे जाए । एक तरफ आदिवासियों के लिए गुनिया-ओझा की बात पत्थर की लकीर होती है, तो दूसरी ओर इन भोले-भाले लोगों के वोटों के ठेकेदार ‘परंपराओं’ में सरकारी दखल पर भृकुटियां तान कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं । 



डायन प्रथा से निबटने के लिए बिहार में सन 1999 में व झारखंड में 2001 में अलग से कानून भी बना। कानून अपराध होने के बाद  काम करता है लेकिन आज जरूरत तो लोगों की मिथ्या धारणाओं से ओतप्रोत जनजातीय लोगों में औरत के प्रति दोयम नज़रिए को बदलना है। एक तो गांवों में स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं हों , दूसरा समाज के बीच से ही ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो पर्व-त्योहर पर आदिवासियों को सहज तरीके से इसकी जानकारी दे सकें।

   

पंकज चतुर्वेदी


बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

Problems of fishermen at Indo-srilankan sea border

 

समुद्री सीमा जानलेवा बन रही है मछुआरों के लिए

पंकज चतुर्वेदी



18 जनवरी को समुद्र में मछली पकड़ने गए तमिलनाडु के मछुआरों की नावों को पाल्क खाड़ी में श्रीलंका की नोसेना के गश्ती दल ने इस तरह कुचला कि चार मछुआरों की मौत हो गई। इसके बाद सीमावर्ती गाँवों के हज़ारों मछुआरे सनुद्र में जाने से डॉ रहे हैं हालाँकि भारत सरकार ने इस घटना पर श्रीलंका को कडा  ऐतराज जताया है लेकिन यह ऐसी पहली घटना नहीं है जब हमारे मछुआरे श्रीलंका गश्ती दल के हाथो मारे या पकड़े न गए हों, एक  अनुमान है कि आज भी कोई 107 भारतीय श्रीलंका की जेलों में हैं और इनमें से अधिकाँश मछुआरे ही हैं. यह बात सरकारी आंकड़े स्वीकार करते हैं कि  "जनवरी 2015 से जनवरी 2018 के बीच 185 भारतीय नौकाएं श्रीलंका नोसेना ने जब्त कीं , 188 भारतीय मछुआरे मारे गए और 82 भारतीय मछुआरे लापता हैं"

भारत और श्रीलंका  में साझा बंगाल की खाड़ी  के किनारे रहने वाले लाखों  परिवार सदियों से समुद्र  में मिलने  वाली मछलियों से अपना पेट पालते आए हैं। जैसे कि मछली को पता नहीं कि वह किस मुल्क की सीमा में घुस रही है, वैसे ही भारत और श्रीलंका की सरकारें भी तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर समुद्र  के असीम जल पर कैसे सीमा खींची जाए।  हालाँकि दोनों देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा सीमांकन के लिए दो समझौते सन 1974 और 1976में हुए। लेकिन तमिलनाडु के मछुआरे समझौतों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इसका बड़ा व्यवधान कैटचैहेवु द्वीप  है जिसे समझौते के तहत  श्रीलंका को दे दिया गया . भारत के मछुआरा समुदाय की आपत्ति है कि यह समझोता उनसे पूछे बगैर कर दिया गया . असल में समझौतों से पहले इस द्वीप का इस्तेमाल तमिलनाडु के मछुआरे अपनी मछलियों की छंटाई, जालों को सुखाया आदि, में करते थे . हमारे मछुआरे कहते हैं कि एक तो द्वीप छीन जाने से अब उन्हें अपने तट पर आ कर ही जपने काम करने पड़ते हैं फिर इससे उनका मछली पकड़ने का इलाका भी कम हो गया . जब तब भारतीय मच्छी मार उस तरफ टहल जाते हैं और श्रीलंका की नोसेना उनकी नाव तोड़ देती है , जाल नष्ट कर देती है और कई बार गिरफ्तारी और हमले भी होते हैं

यह भी कड़वा सच है कि जब से शहरी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही बढ़ी है तब से गोदी के कई-कई किलोमीटर तक तेल रिसने ,शहरी सीवर डालने व अन्य प्रदूषणों के कारण समुद्री  जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए बस्तियों, आबादियों और बंदरगाहों से काफी दूर निकलना पड़ता है। जो खुले सागर  में आए तो वहां सीमाओं को तलाशना लगभग असंभव होता है . जब उन्हें पकड़ा जाता है तो सबसे पहले सीमा की पहरेदारी करने वाला तटरक्षक बल अपने तरीके से पूछताछ व जामा तलाशी  करता है। चूंकि इस तरह पकड़ लिए  गए लोगों को वापिस भेजना सरल नहीं है, सो इन्हें स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है। इन गरीब मछुआरों के पास पैसा-कौडी तो होता नहीं, सो ये ‘‘गुड वर्क’’ के निवाले बन जाते हैं। घुसपैठिये, जासूस, खबरी जैसे मुकदमें उन पर होते हैं।

दोनों देशों के बीच मछुआरा विवाद की एक बड़ी वजह हमारे मछुआरों द्वारा इस्तेमाल नावें और तरीका  भी है , हमारे लोग बोटम ट्रालिंग के जरिये मछली पकड़ते हैं, इसमें नाव की तली से वजन बाँध कर जाल फेंका जाता है .अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह से मछली पकड़ने को पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदेह कहा जाता है . इस तरह जाल फैंकने से एक तो छोटी और अपरिपक्व मछलिया जाल में फंसती हैं, साथ ही बड़ी संख्या में ऐसे जल-जीव भी इसके शिकार होते हैं जो मछुआरे के लिए गैर उपयोगी होते हैं . श्रीलंका में इस तरह की नावों पर पाबंदी हैं, वहाँ गहराई में समुद्-तल से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं और इसके लिए नई तरीके की अत्याधुनिक नावों की जरूरत होती है . भारतीय मछुआरों की आर्थिक स्थिति इस तरह की है नहीं कि वे इसका खर्च उठा सकें . तभी अपनी पारम्परिक नाव के साथ भारतीय मछुआर जैसे ही श्रीलंका में घुसता है , वह अवैध तरीके से मछली पकड़ने का दोषी बन जाता है  वैसे भी भले ही तमिल इलम आंदोलन का अंत हो गया हो लेकिन श्रीलंका के सुरक्षा बल भारतीय तमिलों को संदिग्ध नज़र से देखते हैं .

भारत-श्रीलंका जैसे पडोसी के बीच अच्छे द्विपक्षीय संबंधों की सलामती के लिए मछुआरों का विवाद एक बड़ी चुनौतियों है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सीज़ (यू एन सी एल ओ एस) के अनुसार, किसी देश की आधार रेखा से 12 समुद्री मील की दूरी पर उसका क्षेत्रीय जल माना जाता है. चूँकि हमारे मछुआरों की नावें कई दिनों तक समुद्र में रह कर काम करने लायक नहीं होतीं और वे उसी दिन लौटते हैं सो वे मन्नार की खाड़ी जैसे करीबी इलाकों मने जाते है और यहा कई बार 12 समुद्री मील वाला गणित काम नहीं आता .

वैसे तो एमआरडीसी यानि मेरीटाईम रिस्क रिडक्शन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देश  का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तुओं जैसे- हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना 24 घंटे में ही दूसरे देश  को देना, दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायत मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। समुद्री सीमाई विवाद से सम्बंधित सभी कानूनों का यूएनसीएलओएस में प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उनके दिल से पालन करने की है।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

earthquake-being-aware-will-only-make-things

 



भूकंप : सचेत रहने से ही बनेगी बातवर्ष 2020 में दिल्ली और उसके आसपास के दायरे में कुल 51 बार घरती थर्राई। भारत के कुल क्षेत्रफल का 54 फीसद भूकंप संभावित क्षेत्र के रूप में चिह्नित है।



दिल्ली को खतरे के लिए तय जोन चार में आंका गया है अर्थात यहां भूकंप आने की संभावनांए गंभीर स्तर पर हैं। भूकंप संपत्ति और जन-हानि के नजरिए से सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा है, एक तो इसका सटीक पूर्वानुमान संभव नहीं, दूसरा इससे बचने के कोई सशक्त तरीके हैं नहीं। महज जागरूकता और अपने आसपास को इस तरह से सचेत करना कि कभी भी धरती हिल सकती है, बस यही है इसका निदान। हमारी धरती जिन सात टेक्टोनिक प्लेटों पर टिकी है, यदि इनमें कोई हलचल होती है, तो धरती कांपती है।
भारत ऑस्ट्रेलियन प्लेट पर टिका है, और हमारे यहां अधिकतर भूकंप इस प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने के कारण उपजते हैं। भूकंप के झटकों का कारण भूगर्भ से तनाव-ऊर्जा उत्सर्जन होता है। यह ऊर्जा अब भारतीय प्लेट की उत्तर दिशा में बढ़ने और फॉल्ट या कमजोर जोनों के जरिए यूरेशियन प्लेट के साथ इसके टकराने के चलते एकत्र हुई है। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है, और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है, जिससे क्रिस्टल छोटा हो जाता है, और चट्टानों का विरुपण होता है। यह ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है। हालांकि कोई भूकंप कब, कहां और कितनी अधिक ऊर्जा (मैगनिटय़ूड) के साथ आ सकता है, इसकी अभी कोई सटीक तकनीकी विकसित हो नहीं पाई है , केवल किसी क्षेत्र की अति संवेदनशीलता को उसकी पूर्व भूकंपनीयता, तनाव बजट की गणना, सक्रिय फाल्टों की मैपिंग आदि से समझा जा सकता है।

आज जरूरी है कि जिन इलाकों में बार-बार धरती डोल रही है, वहां भू वैज्ञानिक अध्ययनों का पूरी तरह उपयोग करते हुए उपसतही संरचनाओं, ज्यामिति तथा फाल्टों एवं रिजों के विन्यास की जांच की जानी है। चूंकि नरम मृदाएं संरचना की बुनियादों को सहारा नहीं दे पातीं, भूकंप-प्रवण क्षेत्रों में बेडरॉक या सख्त मृदा के सहारे वाली संरचनाओं में कम नुकसान होता है। इस प्रकार, नरम मृदाओं की मोटाई के बारे में जानने के लिए मृदा द्रवीकरण अध्ययन किए जाने की भी आवयकता है। सक्रिय फाल्टों को निरूपित किया जाना है, और जीवन रेखा संरचनाओं या अन्य अवसंरचनाओं को नजदीक की सक्रिय फाल्टों से बचा कर रखे जाने और उन्हें भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के मार्गदर्शी सिद्धांतों के अनुरूप निर्माण किए जाने की आवश्यकता है। राट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सवा तीन करोड़ लोगों की बसावट का चालीस फीसदी इलाका अनधिकृत है, तो 20 फीसदी के आसपास बहुत पुराने निर्माण। बाकी रिहाइशों में से बामुश्किल पांच प्रतिशत का निर्माण या उसके बाद यह सत्यापित किया जा सका कि यह भूकंपरोधी है। दोष भारत में भी आवासीय परिसरों के हालात कोई अलग नहीं हैं। एक तो लोग इस चेतावनी को गंभीरता से ले नहीं रहे कि उनका इलका भूकंप के आलोक में कितना संवेदनशील है, दूसरा उनका लोभ उनके घरों को संभावित मौत घर बना रहा है। बहुमंजिला मकान, छोटे से जमीन के टुकड़े पर एक के ऊपर एक डिब्बे जैसी संरचना, बगैर किसी इंजीनियर की सलाह के बने परिसर, छोटे से घर में ही संकरे स्थान पर रखे ढेर सारे उपकरण व फर्नीचर-भूकंप के खतरे से बचने कीे चेतावनियों को नजरअंदाज करने की मजबूरी भी हैं और कोताही भी।
वलेरेबिलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया की बिल्डिंग मैटीरियल एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन काउंसिल द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दिल्ली के 91.7 प्रतिशत मकानों की दीवारें पक्की ईटों से जबकि कच्ची ईंटों से 3.7 प्रतिशत मकानों की दीवारें बनी हैं। एक्सपर्ट के अनुसार, कच्ची या पक्की ईटों से बनी इमारतों में भूकंप के दौरान सबसे ज्यादा तबाही होती है। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), हैदराबाद के एक शोध से स्पष्ट हुआ है कि भूकंप का एक बड़ा कारण धरती की कोख से जल का अंधाधुंध दोहन करना भी है। भू-विज्ञानी के अनुसार भूजल को धरती के भीतर लोड यानी की एक भार के तौर पर उपस्थित होता है। इसी लोड के चलते फाल्ट लाइनों में भी संतुलन बना रहता है।
जरूरत है कि शहरों में आबादी का घनत्व कम किया जाए, जमीन पर मिट्टी की ताकत मापे बगैर कई मंजिला भवन खड़े करने, बेसमेंट बनाने पर रोक लगे। भूजल के दोहन पर सख्ती हो। साथ ही, भूकंप संभावित इलाकों के सभी मकानों में भूकंप रोधी रेट्रोफिटिंग करवाई जाए।

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

climate change is affecting ocean too Dedicated to young girl Disha Ravi

 जलवायु परिवर्तन की मार से बेहाल सागर


पंकज चतुर्वेदी

यह लेख बंगलुरु की उस युवा पर्यावरण कार्यकर्ता को समर्पित है जिसे दिल्ली पुलिस ने हिंसा की साजिश के झूठे मामले में फंसाया 




हाल ही में जारी पृथ्वी-विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र बहुत अधिक प्रभावित हो रहे हैं। सनद रहे ग्लोबल वार्मिंग से उपजी गर्मी का 93 फीसदी हिस्सा समुद्र पहले तो उदरस्थ कर लेते हैं फिर जब उन्हें उगलते हैं तो ढेर सारी व्याधियां पैदा होती हैं। हम जानते ही हैं कि बहुत सी चरम प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि बरसात, लू , चक्रवात, जल स्तर में वृद्धि आदि का उद्गम स्थल महासागर या समुद्र  ही होते हैं । जब परिवेश की गर्मी के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है तो अधिक बादल पैदा होने से भयंकर बरसात, गर्मी के केन्द्रित होने से चक्रवात , समुद्र की गर्म भाप के कारण तटीय इलाकों में बेहद गर्मी बढ़ना जैसी घटनाएँ होती हैं । 


भारत में पष्चिम के गुजरात से नीचे आते हुए कोंकण, फिर मलाबार और कन्याकुमारी से ऊपर की ओर घूमते हुए कोरामंडल और आगे बंगाल के सुंदरबन तक ंकोई 5600 किलोमीटर सागर तट है। यहां नेषनल पार्क व सेंचुरी जैसे 33 संरक्षित क्षेत्र हैं। इनके तटों पर रहने वाले करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन समुद्र से उपजे मछली व अन्य उत्पाद ही हैं । लेकिन विडंबना है कि हमारे समुद्री तटों का पर्यावरणीय संतुलन तेजी से गड़बड़ा रहा है।  मुंबई महानगर को कोई 40 किलोमीटर समुद्र तट का प्राकृतिक-आषीर्वाद मिला हुआ है, लेकिन इसके नैसर्गिग रूप से छेड़-छाड़ का ही परिणाम है कि यह वरदान अब महानगर के लिए आफत बन गया है। कफ परेड से गिरगांव चैपाटी तक कभी केवल सुनहरी रेत, चमकती चट्टानें और नारियल के पेड़ झूमते दिखते थे। कोई 75 साल पहले अंग्रेज षासकों ने वहां से पुराने बंगलों को हटा कर मरीन ड्राईव और बिजनेस सेंटर का निर्माण करवा दिया। उसके बाद तो मुंबई के समुद्री तट गंदगी, अतिक्रमण और बदबू के भंडार बन गए।  


“असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन” शीर्षक की यह रिपोर्ट भारत द्वारा तैयार आपने तरह का पहला दस्तावेज हैं जो देश को जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों के प्रति आगाह करता है व सुझाव भी देता है। इसमें बता दिया गया है कि यदि हम इस दिशा में संभले नहीं तो लू की मार तीन से चार गुना बढ़ेगी व इसके चलते  समुद्र के जलस्तर में 30 सेंटीमीटर तक उठ सकता है। यह किसी से छुपा नहीं है कि इस सदी के पहले दो दशकों (2000-2018) में भयानक समुद्री चक्रवाती तूफानों की संख्या में इजाफा हुआ है। यह रिपोर्ट कहती है कि मौसमी कारकों की वजह से उत्तरी हिन्द महासागर में अब और अधिक शक्तिशाली चक्रवात तटों से टकराएंगे। ग्लोबल वॉर्मिंग से समुद्र का सतह लगातार उठ रहा है और उत्तरी हिंद महासागर का जल स्तर जहां 1874 से 2004 के बीच 1.06 से 1.75 मिलीमीटर बढ़ा, ,वह बीते 25 सालों (1993-2017) में ं 3.3 मिलीमीटर सालाना की दर से बढ़ रहा है। 

यह रिपोर्ट सावधान करती है कि सदी के अंत तक जहां पूरी दुनिया में समुद्री जलस्तर में औसत वृद्धि 150 मिलीमीटर होगी वहीं भारत में यह 300 मिलीमीटर (करीब एक फुट) हो जाएगी। साफ जाहिर है कि यदि इस दर से समु्रद का जल-स्तर ऊंचा होता है तो मुंबई, कोलकाता और त्रिवेंद्रम जैसे शहरों का वजूद खतरे में होगा क्योंकि यहां घनी आबादी समु्रद से सट कर बसी हुई हे। 

समुद्र के बढ़ते तापमान के प्रति आगाह करते हुए रिपोर्ट बताती है कि हिंद महासागर की समुद्री सतह पर तापमान में 1951-2015 के दौरान औसतन एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है, जो कि इसी अवधि में वैश्विक औसत एसएसटी वार्मिंग से 0.7 डिग्री सेल्सियस अधिक है। समुद्री सतह के अधक गर्म होने के चलते उत्तरी हिंद महासागर में समुद्र का जल-स्तर 1874-2004 के दौरान प्रति वर्ष 1.06-1.75 मिलीमीटर की दर से बढ़ गया है और पिछले ढाई दशकों (1993-2017) में 3.3 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक बढ़ गया है, जो वैश्विक माध्य समुद्र तल वृद्धि की वर्तमान दर के बराबर है।

पृथ्वी मंत्रालय की रिपोर्ट में समझाईश दी गई है कि समुद्र में हो रहे परिवर्तनों की बारीकी से निगरानी, उन आंकड़ों का आकलन और अनुमान , उसके अनुरूप उन इलाकों की योजनायें तैयार करना समय की मांग हैं। भारत में जलवायु परिवर्तन की निरंतर निगरानी, क्षेत्रीय इलाकों में हो रहे बदलावों का बारीकी से आकलन , जलवायु परिवर्तन के नुक्सान , इससे बचने के उपायों को शैक्षिक सामग्री में शामिल करने, आम लोगों को इसके बारे में जागरूक करने  के लिए अधिक निवेश करने की जरुरत है । जैसे कि देश के समुद्री तटों पर जीपीएस के साथ ज्वार-भाटे का अवलोकन करना , स्थानीय स्तर पर समुद्र के जल स्तर में आ रहे बदलावों के आंकड़ों को एकत्र करना आदि । इससे समुद्र तट के संभावित बदलावों का अंदाजा लगाया जा सकता है और इससे तटीय शहरों में रह रही आबादी पर संभावित संकट से निबटने की तैयारी की जा सकती है।  समुद्र वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि सागर की निर्मल गहराईयां खाली बोतलों, केनों, अखबारों व षौच-पात्रों कें अंबार से पटती जा रही हैं । मछलियों के अंधाधुंध षिकार और मंूगा की चट्टानों की बेहिसाब तुड़ाई के चलते सागरों का पर्यावरण संतुलन गड़बड़ाता जा रहा है । 

पृथ्वी के अधिकांष हिस्से पर कब्जा जमाए सागरों की विषालता व निर्मलता मानव जीवन को काफी हद तक प्रभावित करती है , हालांकि आम आदमी इस तथ्य से लगभग अनभिज्ञ है । जिस गृह ‘‘प्ृाृथ्वी ’’ पर हम रहते हैं, उसके मौसम और वातावरण में नियमित बदलाव का काफी कुछ दारोमदार समुद्र पर ही होता है । जान लें समुद्र के पर्यावरणीय चक्र मे  जल के साथ-साथ उसका प्रवाह, गहराई में एल्गी की जमावट, तापमान , जलचर जैसे कई बातें शामिल हैं व एक के भी गड़बड़ होने पर समुद्र के कोप से मान जाति बच नहीं पाएगी। यही कारक जलवायु परिर्वतन जैसी त्रासदी को सुरसा मुख देते हैं , इसी लिए इन पर नियंत्रण कर ही सागरों को रौद्र होने से बचाया जा सकता है। 


बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

beyond bird flu more cause of bird death

 और कई भी कारण हैं पक्षियों की मौत के

पंकज चतुर्वेदी 



दिल्ली में संजय झील में जिन साढे तीन सौ से बत्तखों और जल मुर्गियों की चहलकदमी देखने लोग आते थे, शक हुआ कि उन पर वायरस का हमला है और पलक झपकते ही उनकी गर्दन मरोड़ कर मार डाला गया। बीते कुछ दिनों से देश में कहीं भी किसी पखी के संक्रमित हाने पर शक होता है, आसपास के सभी पक्षी निर्ममता से मार दिए जाते हैं। इस बार पंक्षियों के मरने की शुरूआत कौओं से हुई- कौआ एक ऐसा पक्षी है जिसकी प्रतिरोध क्षमता सबसे सशक्त कहलाती है। कौए भी  मध्य प्रदेश के मालवा के मंदसौर-नीमच व उससे सटे राजस्थान के झालावाड़ जिले में मरे मिले। जान लें इन  इलाकों में प्रवासी पक्षी कम ही आते हैं। उसके बाद हिमाचल प्रदेश में पांग झील में प्रवासी पक्षी मारे गए और फिर केरल में पालतु मुर्गी व बतख। एक बात जानना जरूरी है कि हमारे यहां बीते कई सालों से इस मौसम में बर्ड-फ्लू का शोर होता है और अभी तक किसी इंसान के इससे मारे जाने की खबर मिली नहीं। हां, यह मुर्गी पालन में लगे लोगों के लिए भारी नुकसान होता है। 

यह तो स्पष्ट है कि इसी मौसम में पक्षियों  के मरने की वजह हजारो किलोमीटर दूर से जीवन की उम्मीद के साथ आने वाले वे पक्षी होते हैं जिनकी पिछली कई पुष्तें, सदियों इस मौसम में यहां आती थीं। चूंकि ये तो सदियों से आते रहे हैं व उनके साथ नभचरों के मौत का सिलसिला कुछ ही दशकों का है तो जाहिर है कि असली वजह उनके प्राकृतिक पर्यावास में लगातार हो रही छेड़छाड़ व बहुत कुछ जलवायू परिवर्तन का असर भी है। यह सभी जानते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी ध्रुव में जब तापमान षून्य से चालीस डिगरी तक नीचे जाने लगता है तो वहां के पक्षी भारत की ओर आ जाते हैं ऐसा हजारों साल से हो रहा है, ये पक्षी किस तरह रास्ता  पहचानते हैं, किस तरह हजारों किलोमीटर उड़ कर आते हैं, किस तरह ठीक उसी जगह आते हैं, जहां उनके दादा-परदादा आते थे, विज्ञान के लिए भी अनसुलझी पहेली की तरह है। इन पक्षियों के यहां आने का मुख्य उद्देश्य भोजन की तलाश, तथा गर्मी और सर्दी से बचना होता है। 

हर साल भारत आने वाले पक्षियों में साइबेरिया से पिनटेल डक, शोवलर, डक, कॉमनटील, डेल चिक, मेलर्ड, पेचर्ड, गारगेनी टेल तो उत्तर-पूर्व और मध्य एशिया से पोचर्ड, ह्विस्लिंग डक, कॉमन सैंड पाइपर के साथ-साथ फ्लेमिंगो जैसे कई पक्षी आते हैं। भारतीय पक्षियों में शिकरा, हरियल कबूतर, दर्जिन चिड़िया, पिट्टा, स्टॉप बिल डक आदि प्रमुख हैं। अपनी यात्रा के दौरान हर तरह के पंक्षी अपने हिसाब से उड़ते हैं और उनकी ऊँचाई भी वे अपने हिसाब से निर्धारित कर लेते हैं। हंस जैसे पक्षी करीब 80 किलोमीटर प्रति घण्टे के हिसाब से भी उड़ान भरते हैं, तो जो पंछी बिना रुके यात्रा करते हैं, उनकी गति मुश्किल से 10 से 20 किलोमीटर प्रति घण्टे तक होती है। वे भले ही मंद गति से उड़ते हों, लेकिन अपने ठिकाने पर पहुँचकर ही दम लेते हैं। उदाहरण के लिये ईस्टर्न गोल्डन प्लॉवर लगातार उड़कर अपने निवास स्थान से भारत तक की 3200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी बिना रुके पूरी करता है। इस दौरान वह समुद्र भी पार करता है। पहाड़ी इलाकों में पंछी कई बार एवरेस्ट से भी ज्यादा ऊँचाई पर उड़ते हैं, वहीं समुद्री इलाके में वे बेहद नीची उड़ान भरते हैं।

कहते हैं कि दूर देष से आने वाले पंक्षी असल में सौभाग्य-पंख ले कर आते हैं। इनके साथ बीजों का हस्तातंरण होता है, जैव विविधता का संरक्षण होता है। लेकिन कई पक्षी ऐसे भी होते हैं जो अपनी आंतों में इस वायरस को लिए हर जगह घूमते हैं, लेकिन वे इससे बीमार नहीं होते। जैसे ही इन पक्ष्यिं का अपषिश्ट, लार या सांस अन्य पक्षियों के संपर्क में आती है, वे बीमार हो जाते हैं। खासकर मुर्गी और बत्तख में यह संक्रमण तेजी से फैलता है और उन्हें बीमार कर देता है।

भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग के अनुसार भारत में साल 2006, 2012, 2015 और अब 2021 में बर्ड फ्लू यानी एवियन इंफ्लूएंजा ने हमला किया है। नेशनल हेल्थ प्रोग्राम की साइट के अनुसार बर्ड फ्लू की वजह से भारत में अभी तक किसी इंसान की मौत नहीं हुई है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि बर्ड फ्लू का हमला तभी होता है जब प्रवासी पक्षी हमारी तरफ आता है।  

वास्तव में यह बीमारी एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस H5N1 की वजह से होती है। इस वायरस के बहुत से स्ट्रेन हैं. इसमें से कुछ माइल्ड होते हैं जबकि कुछ बहुत अधिक संक्रामक होते हैं और उससे बहुत बड़े पैमाने पर पक्षियों के मरने का खतरा पैदा हो जाता है। बर्ड फ्लू को एवियन इंफ्लूएंजा भी कहते हैं. यह बहुत संक्रामक और कोरोना की ही तरह घातक भी हो सता है । जान लें इंसानों को संक्रमित करने की क्षमता वोल कुल 11 किस्म के एनफ्लूएंजा वायरस होते हैं। हालांकि इनमें से सिर्फ पांच ही इंसानों के लिए जानलेवा होते हैं । ये हैं-H5N1, H7N3, H7N7, , H7N9 और  H9N2इन वायरस को एचपीएआई कहा जाता है। इनमें सबसे ज्यादा खतरनाक भ्5छ1 बर्ड फ्लू वायरस है.

चूंकि H5N1 बर्ड फ्लू वायरस का फैलाव हवा के साथ होता है और यह तेजी से म्यूटेशन भी करता है सो इसके फैलने की गति बहुत तेज होती है। यह संभव है कि उनके इस लंबे सफर में पंखों के साथ कुछ जीवाणु आते हों, लेकिन कोरोना संकट ने बता दिया है कि किस तरह घने जंगलों के जीवों के इंसानी बस्ती के लगातार करीब आने के चलते  जानवरों में मिलने वाले  वायरस इंसान के शरीर को प्रभावित करने के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। अभी तो इन पक्षियों के वायरस दूसरे पक्षियों के डीएनए पर हमला करने लायक ताकतवर बने हैं और इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि इनकी ताकत इंसान को नुकसान पहुंचाने लायक भी हो जाए। ऐसे में इस बारे में सतर्कता तो रखनी ही होगी। 

बर्ड फ्लू के प्रति जागरूकता और सतर्कता तो जरूरी है लेकिन इसके बारे में अल्प जानकारी के साथ भयभीत होना उचित नहीं। जान लें कि हर साल सर्दी में पक्षियों के मारे जाने की संख्या 15 से बीस फीसदी बढ़ ही जाती है और इसका मूल कारण ठंड से होने वाले रोग - ब्रोंकाईटीस और क्रॉनिक रेसपायरीटी जैसे रोग होते हैं। अभी दिल्ली में छह जनवरी से 21 जनवरी के बीच 1338 पक्षी मरे और इनमें से 207 के नमूनों की जांच करवाई गई। इनमें से 24 में बर्ड फ्लू के कोई लक्षण मिले ही नहीं। इस अवधि में दिल्ली के चिड़ियाघर में कुछ विदेषी सारस मरे मिले और वहां हड़कंप मच गया। इनके 12 नमूने जांच के लिए भोपाल स्थित  राश्ट्रीय उच्च सुरक्षा पषु रोग संस्थान(एनआईएचएसएडी) को भेजे गए व किसी में भी एविएषन एनफ्लूएंजा वायरस के लक्षण नहीं मिले।

जान लें कि देष के अधिकांष हिस्सों में  मरने वाले पक्षियों की पहले गर्दन लटकने लगी, उनके पंख बेदम हो गए, वे न तो चल पा रहे थे और न ही उड़ पा रहे थे। शरीर शिथिल हुआ और प्राण निकल गए। फिलहाल तो इसे ‘बर्ड-फ्लू ’ कहा जा रहा है लेकिन संभावना है कि जब वहां के पानी व मिट्टी के नमूने की गहन जांच होगी तब असली बीमारी पता चलेगी क्योंकि इस तरह के लक्षण ‘‘एवियन बॉटुलिज़्म ’’ नामक बीमारी के होते है। यह बीमारी क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म नाम के बैक्टीरिया की वजह से फैलती है। एवियन बॉटुलिज़्म को 1900 के दशक के बाद से जंगली पक्षियों में मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण माना गया है। यह बीमारी आमतौर पर मांसाहारी पक्षियों को ही होती है। इसके वैक्टेरिया से ग्रस्त मछली खाने या इस बीमारी का शिकार हो कर मारे गए पक्षियों का मांस खाने से इसका विस्तार होता है। 

संभावना यह भी है कि पानी व हवा में क्षारीयता बढ़ने से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाली बीमारी ‘हाईपर न्यूट्रिनिया’ से कुछ पक्षी, खासकर प्रवासी पक्षी मारे गए हों। इस बीमारी में पक्षी को भूख नहीं लगती है और इसकी कमजोरी से उनके प्राण निकल जाते हैं। पक्षी के मरते ही जैसे ही उसकी प्रतिरोध क्ष्षमता शून्य हुई, उसके पंख व अन्य स्थानों पर छुपे बैठे कई किस्म के वायरस सक्रिय हो जाते हैं व दूसरे पक्षी इसकी चपेट में आते हैं। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि दूषित पानी से मरी मछलियों को दूर देश से थके-भूखे आए पक्षियों ने खा लिया हो व उससे एवियन बॉटुलिज़्म के बीज पड़ गए हों। यह सभी जानते हैं कि एवियन बॉटुलिज़्म का प्रकोप तभी होता है जब विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक कारक समवर्ती रूप से होते हैं। इसमें आम तौर पर गर्म पानी के तापमान, एनोक्सिक (ऑक्सीजन से वंचित) की स्थिति और पौधों, शैवाल या अन्य जलचरों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण आदि प्रमुख हैं।  यह सर्वविदित है कि धरती का तापमान बढ़ना और जलवायु चक्र में बदलाव से भारत बुरी तरह जूझ रहा है। 

‘भारत में पक्षियों की स्थिति-2020’ रिपोर्ट के नतीजे बता चुके हैं कि पक्षियों की लगातार घटती संख्या ,नभचरों के लिए ही नहीं धरती पर रहने वाले इंसानों के लिए भी खतरे की घंटी हैं। बीते 25 सालों के दौरान हमारी पक्षी विविधता पर बड़ा हमला हुआ है, कई प्रजाति लुप्त हो गई तो बहुत की संख्या नगण्य पर आ गईं। पक्षियों पर मंडरा रहा यह खतरा षिकार से कही ज्यादा विकास की नई अवधारणा के कारण उपजा है। अधिक फसल के लालच में खेतों में डाले गए कीटनाषक, विकास के नाम पर उजाड़े गए उनके पारंपरिक पर्यावास, नैसर्गिक परिवेष  की कमी से उनकी प्रजनन क्षमता पर असर; ऐसे ही कई कारण है जिनकेचलते हमारे गली-आंगन में पंक्षियों की चहचहाहट कम होती जा रही है। ऐसे में पक्षियों में व्यापक संक्रामक हमले बेहद चिंताजनक हैं।

पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील पक्षी उनके प्राकृतिक पर्यावास में अत्यधिक मानव दखल, प्रदूषण, भोजन के अभाव से भी परेशान है। सनद रहे हमारे यहां साल-दर-साल प्रवासी पक्षियों  की संख्या घटती जा रही है। प्रकृति संतुलन और जीवन-चक्र में प्रवासी पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनका इस तरह से मारा जाना असल में अनिष्टकारी है।  अब पक्ष्यिं को रोका या टोका तो जा नहीं सकता, हमें ही अपने पर्यावास, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनो को नैसर्गिक रूप में अक्षुण्ण रखने पर गंभीर होना होगा। 


 



सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

glacier has to be monitor minutely

 ग्लेशियर की सतत निगरानी के लिए जरूरी है प्राधिकरण

पंकज चतुर्वेदी 


यह बात सभी जानते हैं कि हिमालय भारतीय उपमहाद्धीप के जल का मुख्य आधार है और यदि नीति आयोग के विज्ञान व प्रोद्योगिकी विभाग द्वारा तीन साल पहले तैयार जल संरक्षण पर रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हिमालय से निकलने वाली 60 फीसदी जल धाराओं में दिनों-दिन पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुश्परिणामस्वयप् धरती के षीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेषियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्व के खतरे की बातें अब महज कुछ पर्यावरण-विषेशज्ञों तक सीमित नहीं रह गई हैं। धीरे से  कुछ ऐसे दावों के दूसरे पहलु भी सामने आने लगे कि जल्द ही हिमालय के ग्लेषिय पिघल जाएंगे, जिसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके परिणामस्वरूप जहां एक तरफ कई नगर-गांव जल मग्न हो जाएंगे, वहीं धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली छतरी के नश्ट होने से भयानक सूखा, बाढ़ व गरमी पड़ेगी और जाहिर है कि ऐसे हालात में मानव-जीवन पर भी संकट होगा। असल संकट तो धरती के बढ़ते तापमान के चलते विशाल ग्लेशियरों के टूटने, फिसलने से खउ़ा हो रहा है।


सात फरवरी 2021 की सुबह कोई साढे दस बजे नंदा देवी पर्वतमाला पर चंदी के मुकुट से दमकते  ग्लेषियर का एक हिस्सा टूट कर तेजी से नीचख्े फिसला और ऋशिगंगा नदी में गिर गया। इतने विषाल हिम खंड के गिरने से नदी के जल-स्तर में अचानल उछाल आना ही था। विष्व प्रसि़द्ध फूलों की घाटी के करीबी रैणी गांव के पास चल रहे छोटे से बिजली संयत्र में देखते ही देखते तबाही थी और उसका असर वहीं पांच किलोमीटर दायरे में बहने वाली धौली गंगा पर पड़ा व वहां निर्माणाधीन एनटीपीसी का पूरा प्रोजैक्ट तबाह हो गया। रास्ते के कई पूल टूट गए और कई गांवों का संपर्क समाप्त हो गया। सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद देवभूमि में एक बार फिर विकास बनाम विनाष की बहस खड़ी हो गई है। जान लें जिस रैणी गांव के करीब ग्लेषियर गिरने की पहली धमक हुई वहां के निवासी सन 2019 में हाई कोर्ट गए थे कि  पर्यावरणीय दृश्टि से इतने संवेदनषील इलाके में बिजली परियोजना की आड़ में अवैध खनन हो रहा है जो तबाही ला सकता है। मामला तारीखो में उलझा रहा और हादसा हो ही गया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमें अभी अपने जल-प्राण कहलाने वाले ग्लेषियरों के बारे में सतत अध्ययन और नियमित आकलन की बेहद जरूरत है। 


इस घटना पर वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलोजी के वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि सर्दियों में आमतौर पर ग्लेशियर टूटने की घटना कम होती हैं।  विदित हो हाल के दिनों में यहां अच्छी बर्फबारी हुई थी और इससे हिमालय के उपरी हिस्सों में खासी बर्फ जमा हो गई थीं। तापमान कम हुआ तो ग्लेशियर सख्त हो गए व उनमें क्षणभंगूरता में इजाफा हुआ। इससे ग्लेशियर टूट गया। यह भी संभावना है कि ग्लेशियर की सबसे अंदरूनी परत व बाहरी के तापमान में बड़ा अंतर आने पर भी यह खिसक सकते हैं। हमारे यहां ‘अल्पाईन किस्म के ग्लेशियर हैं । जब ज्यादा बरसात या बर्फबारी हो तो इनके टूटने की संभावना ज्यादा होती हैं।

ऐसा नहीं है कि पहाड़ पर ग्लेशियर का खतरा टल गया है। नंदाकिनी नदी के कनिरे सदियों से डेरा जामए शिला समुद्र ग्लेशियर की तलहटी में जिस तरह दो बड़े सुराख देख्े जा रहे है ंवह एक बडी आपदा की चेतावनी हैं। कोई आठ किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस ग्लेशियर के पीछे विशल चट्टानों व मलवे का भंडार है। यदि यह ग्लेशियर किसी आपदा का शिकार होता है तो हरिद्वार तक इसके कारण तबाही होगी। ऐसे ही गढवाल में उत्तरकाशी स्थित यमुनोत्री, गंगोत्री,डोकरियानी, बंदरपुंछ ग्लेशियर पर खतरे मंडरा रहे है।। इसके अलावा चमोली के द्रोणगिरी, हमपरावमक, बद्रीनाथ, संतोपंथ और भीगरथी ग्लेशियर, रूद्रप्रयोग के  केदारनाथ धाम के पीछे  चोराबाड़ी, खतलिंग व केदार ग्लेश्यिर , पिथौरागढ़ के हीरपामणि, रालम आदि भी किसी दिन अपना रौद्र रूप दिखा सकते हैं।


 

यह बात चिंता की है कि लगातार बढ़ते धरती के तापमान के चलते ग्लेशियर पिघलने से समूचे हिमालय में कई सौ झीलें बन गई है। रिमोट सेंसिंग  के जरियो पता चला है कि भीगरथी नदी घाटी में 306 तो अलकनंदा घाटी में 635, धौलीगंगा घाटी, जहां यह हादसा हुआ है, में 75,गौरी गंगा में 92, मंदाकिनी घाटी में नौ व यमुना घाटी में 13 जलकुंड बन गए हैं। इनका क्षेत्रफल 500 मीटर से ज्यादा है। वहीं सन 2012 से 2020 के बीच उत्तराखंड में ग्लेशियर पिघलने के कारण कोई पांच बड़ी झील बन गई हैं और यदि ये फटती हैं तो भारी तबाही होगा। ये सभी झीलें 0.88 वर्ग किलोमीटर से 3.36 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की हैं।  ये झीलें कितनी तेजी से आकार लेती हैं , इसकी बानगी है ़ऋषिगंगा की वह झील जिसके कारण सात फरवरी 2021 वाला हादसा हुआ। अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के रिमोट सेंसिंग के आंकड़े बताते हैं कि ऋषिगंगा के केचमेंट क्षेत्र में सात दिन पहले तक कोई भी झील नहीं थी। यहां कुल 14 ग्लेशियर हैं इनका पानी पिघल कर नंदा देवी पर्वतमाला के बहता हुआ ़ऋषिगंगा नदी में मिलता हैं। चूंकि हिमालय बहुत युवा और जिंदा पहाड़ है व इसमें भूगर्भीय हरकतें तेजी से होती हैं सो इसमें भूस्खलन व मलवा निकलना आम बात है और यही भौगोलिक घटना कुछ ही देर में गहरी झील निर्मित कर देती है। विदित हो विकास योजनाओं के नाम पर पहाड़ों की अंधाधुध कटाई, खासकर जल विद्युत परियोजनाओं के लिए भारी मशीनों से गहरी सुरंगो के निर्माण से पहाड़ बहुत नाराज है और जब तब अपने गुस्से का इजहार कर देता हैं।ग्लेषियर के करीब बन रही जल विद्युत परियोजना के लिए हो रहे धमाकों व तोड़ फोड़ से षांत- धीर गंभीर रहने वाले जीवित हिम- पर्वत नाखुष हैं। हिमालय भू विज्ञान संस्थान का एक अध्ययन बताता है कि गंगा नदी का मुख्य स्त्रोत गंगोत्री हिंम खंड भी औसतन 10 मीटर के बनिस्पत 22 मीटर सालाना की गति से पीछे खिसका हैं।

हिमालय पर्वत के उत्तराख्ांड वाले हिस्से में छोटे-बड़े कोई 1439 ग्लेषियर हैं। राज्य के कुल क्षेत्रफल का बीस फीसदी इन बर्फ-षिलाओं से आच्छादित है। इन ग्लेषियर से निकलने वाला जल पूरे देष की खेती, पेय, उद्योग, बिजली, पर्यटन आदि के लिए जीवनदायी व एकमात्र स्त्रोत है। जाहिर है कि ग्लैषियर के साथ हुई कोई भी छेड़छाड़ पूरे देष के पर्यावरणीय, सामाजिक , आर्थिक और सामरिक संकट का कारक बन सकता है। इसी लिए सन 2010 में उत्तारांचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेष पोखरियाल निषंक ने राज्य में ‘‘स्नो एंड ग्लैषियर प्राधिकरण के गठन की पहल की थी। उन्होंने इसरो यानि इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाईजेषन के निर्देषन में स्नो एंड अवलांच स्टडीज इस्टेबलिषमेंट, चंडीगढ़ व देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालय स्टडीज के सहयोग से ऐसे प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी थी। दुर्भाग्य से वे उसके बाद कुछ ही दिन मुख्यमंत्री रहे व उसके बाद इस  महत्वाकांक्षी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। 

इससे पहले सन 2006 में आरएस टोलिया की अध्यक्षता में बनी माउंटेन टास्क फोर्स ने ऊपरी मिचल के बारे में कम जानकारी होने के कारण उसे अंधकार युग निरूपित किया था। इस कमेटी ने ग्लेशियर केबारे में सतत निरीक्षण की संस्तुति की थी। सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद उत्तराखंड अंतरिक्ष केंद्र और आईसीआईमोड के जरिए कुछ जानकारियां जुटाने के उपक्रम शुरू हुए लेकिन कारगर नहीं हो रहे। सन 2018 में आई रिपोर्ट ‘ ओशियन एंड क्रायोस्पेयर इन द चैंजिंग क्लाईमेंट’ में चेतावनी दे दी गई थी कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन तक ग्लेशियर पिघलने से भारत में जल संकट तो होगा ही, पहाड़ के लेगों का जीवन प्राकृतिक आपदाओं से परेशान होगा। इस पिर्ट में ग्लेशियर मॉनिटरिंग की ठोस व्यव्स्था का सुझाव दिया गया था। 

ग्लेषियर असल में एक छोटे बच्चे की तरह होते हैं, उनके साथ थोड़ी भी छेड़छाड़ की जाए तो वे खुद को समेट लेते हैं। असल में अभी तक ग्लेषियर के विस्तार, गलन, गति आदि पर नए तरीके से विचार ही नहीं किया गया है और हम उत्तरी घ्रुव पर पष्चिम देषों के सिद्धांत को ही हिमालय पर लागू कर अध्ययन कर रहे हैं। आज आवश्यकता है कि ग्लेशियरों की हर दिन की गतिविधयों के  अवलोकन, संभावना, खतरों, चेतावनी आदि कें लिए एक प्राधिकरण का गठन हो जो ग्लेशियर से अवतरित होने वाली जल धाराओं की घाटियों में विकास व पर्यावरण का संतुलन भी स्थापित कर सकें। 


Need of glacier study authority

 

जरूरी है ग्लेशियर के रहस्य जानना: हिमालय पर्वत शृंखला के उन क्षेत्रों में ग्लेशियर ज्यादा प्रभावित हैं, जहां मानव-दखल ज्यादा है



इस रविवार सुबह कोई साढ़े दस बजे उत्तराखंड के चमोली जिले में नंदा देवी पर्वतमाला का ग्लेशियर यानी हिमनद टूट कर तेजी से नीचे फिसला और ऋषिगंगा नदी में गिरा। इससे नदी के जल स्तर में अचानक उछाल आना ही था। देखते ही देखते रैणी गांव के पास चल रहे छोटे से बिजली संयत्र में तबाही थी और उसका असर पांच किमी के दायरे में बहने वाली धौली गंगा पर भी पड़ा। वहां भी निर्माणाधीन एनटीपीसी का पूरा प्रोजेक्ट तबाह हो गया। कई पुल ध्वस्त हो गए और कई गांवों से संपर्क टूट गया। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद देवभूमि में एक बार फिर विकास बनाम विनाश की बहस खड़ी हो गई है। जिस रैणी गांव के करीब ग्लेशियर गिरने की पहली धमक हुई, वहां के निवासी 2019 में हाई कोर्ट गए थे कि पर्यावरणीय दृष्टि से इतने संवेदनशील इलाके में बिजली परियोजना की आड़ में जो अवैध खनन हो रहा है, वह तबाही ला सकता है। मामला तारीखों में उलझा रहा और हादसा हो गया। इस तबाही ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमें अभी अपने जल-प्राण कहलाने वाले ग्लेशियरों के बारे में सतत अध्ययन और नियमित आकलन की सख्त जरूरत है।

ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणामस्वरूप ग्लेशियरों पर आ रहा संकट, नदियों में बढ़ेगा पानी

यदि नीति आयोग द्वारा तीन साल पहले तैयार जल संरक्षण पर बनी रिपोर्ट पर भरोसा करें तो हिमालय से निकलने वाली 60 फीसद जल धाराओं में पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणामस्वरूप ग्लेशियरों पर आ रहे संकट को लेकर ऐसे दावे सामने आने लगे हैं कि जल्द ही हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे। इसके चलते नदियों में पानी बढ़ेगा और उसके परिणामस्वरूप जहां एक तरफ कई नगर-गांव जलमग्न हो जाएंगे, वहीं धरती के बढ़ते तापमान को थामने वाली ओजोन परत के नष्ट होने से सूखे, बाढ़ की समस्या बढ़ेगी।

उत्तराखंड में छोटे-बड़े करीब 1400 ग्लेशियर हैं

हिमालय पर्वत के उत्तराखंड वाले हिस्से में छोटे-बड़े करीब 1400 ग्लेशियर हैं। राज्य के कुल क्षेत्रफल का बीस फीसद इनसे आच्छादित है। इन ग्लेशियरों से निकलने वाला जल देश के एक बड़े हिस्से की खेती, पीने के पानी, उद्योग, बिजली, पर्यटन आदि के लिए एकमात्र स्नोत है। जाहिर है, ग्लेशियरों के साथ कोई भी छेड़छाड़ देश के पर्यावरणीय, सामाजिक, र्आिथक और सामरिक संकट का कारक बन सकता है। इसीलिए 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने राज्य में स्नो एंड ग्लेशियर प्राधिकरण के गठन की पहल की थी। उन्होंने इसरो के निर्देशन में स्नो एंड एवलांच स्टडीज स्टैब्लिशमेंट, चंडीगढ़ और देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालय स्टडीज के सहयोग से ऐसे प्राधिकरण के गठन की प्रक्रिया भी प्रारंभ कर दी थी। दुर्भाग्य से उनके मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

हिमनद या ग्लेशियर नीचे की ओर खिसकते हैं, गर्मी में हिमनद पिघलते हैं

हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों पर बर्फ के वे विशाल पिंड जो कम से कम तीन फुट मोटे और दो किमी तक लंबे हों, हिमनद या ग्लेशियर कहलाते हैं। जिस तरह नदी में पानी ढलान की ओर बहता है, वैसे ही हिमनद भी नीचे की ओर खिसकते हैं। हिमालय क्षेत्र में साल में करीब तीन सौ दिन कम से कम आठ घंटे तेज धूप रहती है। जाहिर है थोड़ी-बहुत गर्मी में हिमनद पिघलने से रहे।

आइपीसीसी का दावा- 2035 तक हिमालय के ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट सकता है

कोई एक दशक पहले जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतरराष्ट्रीय पैनल-आइपीसीसी ने दावा किया था कि बढ़ते तापमान के चलते संभव है कि 2035 तक हिमालय के ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट जाए। इसके विपरीत फ्रांस की एक संस्था ने उपग्रह चित्रों के माध्यम से दावा किया था कि हिमालय के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग का कोई खास असर नहीं पड़ा है। तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने वीके रैना के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल को ग्लेशियरों की पड़ताल का काम सौंपा। इस दल ने 25 बड़े ग्लेशियरों को लेकर 150 साल के आंकड़ों को खंगाला और पाया कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने का सिलसिला काफी पुराना है और बीते कुछ सालों के दौरान इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला। इस दल ने इस आशंका को भी निर्मूल माना कि जल्द ही ग्लेशियर लुप्त हो जाएंगे और भारत में कयामत आ जाएगी। आइपीसीसी ने इन निष्कर्षों पर कोई सफाई नहीं दी।

ग्लेशियर वहां ज्यादा प्रभावित हुए, जहां मानव-दखल ज्यादा हुआ

असल में अभी तक ग्लेशियर के विस्तार, गलन, गति आदि पर समग्र विचार नहीं किया गया है और हम उत्तरी ध्रुव को लेकर पश्चिमी देशों के सिद्धांत को ही हिमालय पर लागू कर अध्ययन कर रहे हैं। इसके बाद भी हम विचार करें तो पाएंगे कि हिमालय पर्वत शृंखला के उन इलाकों में ही ग्लेशियर ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां मानव-दखल ज्यादा हुआ है। सनद रहे कि अभी तक एवरेस्ट की चोटी पर तीन हजार से अधिक पर्वतारोही झंडे गाड़ चुके हैं। अन्य पर्वतमालाओं पर पहुंचने वालों की संख्या भी हजारों में है। ये पर्वतारोही अपने पीछे कचरे का भंडार छोड़कर आते हैं। इस बेजा चहलकदमी से ही ग्लेशियर सिमट रहे हैं। कहा जा सकता है कि यह ग्लोबल नहीं लोकल र्वािमग का नतीजा है। यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि ग्लेशियरों के करीब बन रही जल विद्युत परियोजनाओं के लिए हो रही तोड़-फोड़ से हिमपर्वत प्रभावित हो रहे हैं।

ग्लेशियर उतने ही जरूरी हैं, जितनी साफ हवा या पानी

ग्लेशियर उतने ही जरूरी हैं, जितनी साफ हवा या पानी, लेकिन अभी तक हम ग्लेशियर के रहस्यों को जान नहीं पाए हैं। कुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी कहना है कि गंगा-यमुना जैसी नदियों के जनक ग्लेशियरों की गहराई में स्फटिक जैसी संरचनाएं भी स्वच्छ पानी का स्नोत हैं। कुछ देश इस संरचना के रहस्यों को जानने में रुचि केवल इसलिए रखते हैं ताकि भारत की किसी कमजोर कड़ी को तैयार किया जा सके। इसी फिराक में ग्लेशियर पिघलने का शोर होता है। आशंकाओं के निर्मूलन का एक ही तरीका है कि ग्लेशियर अध्ययन के लिए अधिकार संपन्न प्राधिकरण का गठन किया जाए, जिसका संचालन केंद्र के हाथों में हो।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

packed water : neither safe nor eco friendly

 


 दिक्कते बढ़ाता बोतलबंद पानी 

                                                                                                                पंकज चतुर्वेदी



हम भूल चुके हैं कि मई-2016 में केंद्र सरकार ने आदेष दिया था कि अब सरकारी आयोजनों में टेबल पर बोतलंबद पानी की बोतलें नहीं सजाई जाएंगी, इसके स्थान पर साफ पानी को पारंपरिक तरीके से गिलास में परोसा जाएगा। सरकार का यह षानदार कदम असल में केवल प्लास्टिक बोतलों के बढ़ते कचरे पर नियंत्रण मात्र नहीं था, बल्कि साफ पीने का पानी को आम लोगों तक पहुंचाने की एक पहल भी थी। दुखद है कि उस आदेष पर केबिनेट या सांसदों की बैठकों में भी पूरी तरह पालन नहीं हो पाया। कई बार महसूस होता है कि बोतलबंद पानी आज की मजबूरी हो गया है लेकिन इसी दौर में ही कई ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं जिनमें स्थानीय समाज ने बोतलबंद पानी पर पाबंदी का संकल्प लिया और उसे लागू भी किया।  कोई दो सालं पहले ही सिक्किम राज्य के लाचेन गांव ने किसी भी तरह की बोतलबंद पानी को अपने क्षेत्र में बिकने पर सख्ती से पाबंदी लगा दी। यहां हर दिन सैंकड़ों पर्यटक आते हैं लेकिन अब यहां कोई भी बोतलबंद पानी या प्लास्टिक की पैकिंग का प्रवेष नहीं होता। यही नहीं अमेरिका का सेनफ्रांसिस्को जैसा विषाल और व्यावसायिक नगर भी दो साल से अधिक समय से बोतलबंद पानी पर पाबंदी के अपने निर्णय का सहजता से पालन कर रहा है।  सिक्किम में ग्लेषियर की तरफ जाने पर पड़ने वाले आखिरी गांव लाचेन की स्थानीय सरकार ‘डीजुमा’  व नागरिकों ने मिलकर सख्ती से लागू किया कि उनके यहां किसी भी किस्म का बोतलबंद पानी  नहीं बिकेगा। 


भारत की लोक परंपरा रही है कि जो जल प्रकृति ने उन्हें दिया है उस पर मुनाफााखोरी नहीं होना चाहिए।  तभी तो अभी एक सदी पहले तक लोग प्याऊ, कुएं, बावड़ी और तालाब खुदवाते थे। आज हम उस सम्द्ध परंपरा को बिसरा कर पानी को स्त्रोत से शुद्ध करने के उपाय करने की जगह उससे कई लाख गुणा महंगा बोतलबंद पानी को बढ़ावा दे रहे है।ं पानी की तिजारत करने वालों की आंख का पानी मर गया है तो प्यासे लेागों से पानी की दूरी बढ़ती जा रही हे। पानी के व्यापार को एक सामाजिक समस्या और अधार्मिक कृत्य के तौर पर उठाना जरूरी है वरना हालात हमारे संविधान में निहित मूल भावना के विपरीत बनते जा रहे हैं जिसमें प्रत्येक को स्वस्थय तरीके से रहने का अधिकार है व पानी के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। 

घर पर नलों से आने वाले एक हजार लीटर पानी के दाम बामुश्किल चार रूपए होता है। जो पानी बोतल में पैक कर बेचा जाता है वह कम से कम बीस रूपए लीटर होता है यानि सरकारी सप्लाई के पानी से शायद चार हजार गुणा ज्यादा। इसबे बावजूद स्वच्छ, नियमित पानी की मांग करने के बनिस्पत दाम कम या मुफ्त करने के लिए हल्ला-गुल्ला करने वाले असल में बोतल बंद पानी की उस विपणन व्यवस्था के सहयात्री हैं जो जल जैसे प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी, परिवेश में प्लास्टिक घेालने जैसे अपराध और जल के नाम पर जहर बांटने का काम धड़ल्ले से वैध तरीके से कर रहे हैं। क्या कभी सोचा है कि जिस बोतलबंद पानी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसका एक लीटर तैयार करने के लिए कम से कम चार लीटर पानी बर्बाद किया जाता है।  आरओ से निकले बेकार पानी का इस्तेमाल कई अन्य काम में हो सकता है लेकिन जमीन की छाती छेद कर उलीचे गए पानी से पेयजल बना कर बाकी हजारों हजार लीटर पानी नाली में बहा दिया जाता है। 



प्लास्टिक बोतलों का जो अंबार जमा हो रहा है उसका महज बीस फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है, कीमतें तो ज्यादा हैं ही; इसके बावजूद जो जल परोसा जा रहा है, वह उतना सुरक्षित नहीं है, जिसकी अपेक्षा उपभोक्ता करता है। कहने को पानी कायनात की सबसे निर्मल देन है और इसके संपर्क में आ कर सबकुछ पवित्र हो जाता हे। विडंबना है कि आधुनिक विकास की कीमत चुका रहे नैसर्गिक परिवेश में पानी पर सबसे ज्यादा विपरीत असर पड़ा है। जलजनित बीमारियों से भयभीत समाज पानी को निर्मल रखने के प्रयासों की जगह बाजार के फेर में फंस कर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। 

दिल्ली एनसीआर सहित देष भर में ऐसे  अपार्टमेंट का प्रचलन बढ़ा है जिनके पास स्थानीय प्रषासन के नल कनेक्षन के स्थान पर अपने नलकूप होते हैं ंऔर भूजल बेहद खारा है। यदि पानी को कुछ घंटे बाल्टी में छोड़ दें तो उसके ऊपर सफेद परत और तली पर काला-लाल पदार्थ जम जाएगा। यह पूरी आबादी पीने के पानी के लिए या तो अपने घरों में आर ओ का इस्तेमाल करती है या फिर बीस लीटर की केन की सप्लाई लेती है। इस समय देश में बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कम्पनियां और 1200 बॉटलिंग प्लांट वैध हैं । इस आंकड़े में पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कम्पनियां शामिल नहीं है। इस समय भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार 14 अरब 85 करोड़ रुपये का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का 15 प्रतिशत है। बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10वें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबंद पानी की खपत एक अरब 50 करोड़ लीटर थी, आज यह दो अरब लीटर के पार है। 


पर्यावरण को  नुकसान कर, अपनी जेब में बड़ा सा छेद कर हम जो पानी खरीद कर पीते हैं, यदि उसे पूरी तरह निरापद माना जाए तो यह गलतफहमी होगी।  कुछ महीनों पहले  भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के एनवायर्नमेंटल मानिटरिंग एंड एसेसमेंट अनुभाग की ओर से किए गए शोध में बोतलबंद पानी में नुकसानदेह मिले थे।  हैरानी की बात यह है कि यह केमिकल्स कंपनियों के लीनिंग प्रोसेस के दौरान पानी में पहुंचे हैं।  यह बात सही है कि बोतलबंद पानी में बीमारियां फैलाने वाला पैथोजेनस नामक बैक्टीरिया नहीं होता है, लेकिन पानी से अशुद्धियां निकालने की प्रक्रिया के दौरान पानी में ब्रोमेट क्लोराइट और क्लोरेट नामक रसायन खुद ब खुद मिल जाते हैं। ये रसायन प्रकृतिक पानी में हाते ही नहीं है । भारत में ऐसा कोई नियमक नहीं है जो बोतलबंद पानी में ऐसे केमिकल्स की अधिकतम सीमा को तय करे। एक नए अध्ययन में कहा गया कि पानी भले ही बहुत ही स्वच्छ हो लेकिन उसकी बोतल के प्रदूषित  होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती है और इस कारण उसमें रखा पानी भी प्रदूषित हो सकता है। बोतलबंद पानी की कीमत भी सादे पानी की तुलना में अधिक होती है, इसके बावजूद इसके संक्रमण का एक स्त्रोत बनने का खतरा बरकरार रहता है । बोतलबंद पानी की जांच बहुत चलताऊ तरीके से होती है । महीने में महज एक बार इसके स्त्रोत का निरीक्षण किया जाता है, रोज नहीं होता है । एक बार पानी बोतल में जाने और सील होने के बाद यह बिकने से पहले महीनों स्टोर रूम में पड़ा रह सकता है । फिर जिस प्लास्टिक की बोतल में पानी है, वह धूप व गरमी के दौरान कई जहरीले पदार्थ उगलती है और जाहिर है कि उसका असर पानी पर ही होता है। घर में बोतलबंद पानी पीने वाले एक चैथाई मानते हैं कि वे बोतलबंद पानी इसलिए पीते हैं क्योंकि यह सादे पानी से ज्यादा अच्छा होता है लेकिन वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि नगर निगम द्वारा सप्लाई पानी को भी कठोर निरीक्षण प्रणाली के तहत रोज ही चेक किया जाता है । सादे पानी में क्लोरीन की मात्रा भी होती है जो बैक्टीरिया के खतरे से बचाव में कारगर है। जबकि बोतल में क्लोरीन की तरह कोई पदार्थ होता नहीं है। उल्टे रिवर आॅस्मोसिस के दौरान प्राकृतिक जल के कई महत्वपूर्ण लवण व तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसे केवल सरकारी आदेष नहीं, बल्कि अपनी परंपरा और सहूलियत का मसला माना जरिए और समाज  जल के व्यापार पर अंकुष लगाने के लिए खुद ही पहले छोटी बोतलों या पाउच और उसके बाद बड़ी बोतलों पर पाबंदी की खुद पहल करे। 


renewal energy can be solution of coal base electric crisis

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