My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 31 मार्च 2015

Farmers needs cost of each particle of his agri product

किसान को हर दाने की कीमत चाहिए

                                             पंकज चतुर्वेदी
Raj Express M.P.1-04-2015 
पंद्रह फरवरी से जो बेमौसम बारिश , ओले  और आंधी का सिलसिला शुरू  हुआ कि मार्च के अंत तक चला। अभी मौसम विभाग कह रहा है कि बारिश  का यह कहर अप्रेल के तीसरे सप्ताह तक भी चल सकता है। जब खेत में फसल सूखने को तैयार होती है तो किसान के सपने हरे हो जाते हैं। किसान के ही नहीं देश  भी खुश हाली, भोजन पर आत्मनिर्भरता, महंगाई जैसे मसलों पर निष्चिंत हो जाता है।  लेकिन इस बार प्रकृति जो खेल कर रही है, वह देश  के सबसे बड़े रोजगार के साधन, हमारी सांस्कृति पहचान व अथ की रीढ़ को चकनाचूर करने वाला है। बीते डेढ़ महीने में देश भर में कम से कम 300 किसान इस सदमें से खुदकुशी  कर चुके हैं कि उसकी महीनों की दिन रात की मेहनत के बाद भी अब वह कर्जा उतार नहीं पाएगा, उसे कहीं से कोई भरोसा नहीं मिला कि इस विपदा की घड़ी में समाज या सरकार उसके साथ है। अलग-अलग राज्यों व सरकारों ने कई हजार करोड़ की राहत की घोषणाएं , नेताओं के वायदे, अखबारों में छप रहे बड़े-बड़े इष्तेहार किसान को यह आष्वस्त नहीं कर पा रहे हैं कि वह अगली फसल उगाने लायक अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा।
यह देश  के हर गांव के हर किसान की शिकायत है कि गिरदावरी यानि नुकसान के जायजे का गणित ही गलत है। और यही कारण है कि किसान जब कहता है कि उसकी पूरी फसल चैपट हो गई तो सरकारी रिकार्ड में उसकी हानि 16 से 20 फीसदी दर्ज होती है और कुछ दिनों बाद उसे बीस रूपए से लेकर दौ सौ रूप्ए तक के चैक बतौर मुआवजे मिलते हैं। सरकार प्रति हैक्टर दस हजार मुआवजा देने के विज्ञापन छपवा रही है, जबकि यह तभी मिलता है जब नुकसान सौ टका हो और गांव के पटवारी को ऐसा नुकसान दिखता नहीं है।  यही नहीं मुआवजा मिलने की गति इतनी सुस्त होती है कि राशि  आते-आते वह खुदकुशी  के लिए मजबूर हो जाता हे। हाल की ही बानगी है कि असामयिक बारिश  का पहला कहर 15 फरवरी का था लेकिन पूरे देश  में डेढ़ महीने बाद भी किसी को फूटी छदाम का मुआवजा नहीं मिला है।
jansandesh times UP 2-4-15
अभी एक मोटा हिसाब है कि बीते पैतालिस दिनों में असामयिक बारिश व ओलों से 50 लाख एकड में फसल चैपट हुई है, जिसमें अधिकांश गेहू, चना, मसूर, सरसो की है। अनुमान है कि एक एकड में कम से कम 20 कुंटल गल्ला होता है, गेहूं का सरकारी दाम या एमएसपी 1450 रूप्ए प्रति कुंटल है, चने का 3175/, मसूर का 3075/ और सरसों का 3100/। इस तरह लगभग 10 करोड कुंटल अन्न का नाश हुआ, जिसमें 15 लाख से ज्यादा घरों के सपने, अरमान, हवन हो गए । कहीं बच्चे स्कूल जाने लायक नहीं रहे तो कही बच्ची की शादी रूक गई। हताश  किसानों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। मोटा अनुमान है कि इसका घाटा एक खरब, 45 अरब के आसपास है, सरकार गिरदावरी करवा रही है , यानि नुकसान का आकलन पटवारी से । इसके बाद नुकसान का आकलन होगा फिर मुआवजा राशि आएगी, फिर बंटेगी, जूतें में दाल की तरह । तब तक अगली फसल बोने का वक्त निकल जाएगा, किसान या तो खेती बंद कर देगा या फिर साहूकार के जाल में फंसेगा। हर गांव का पटवारी इस सूचना से लैस होता है कि किस किसान ने इस बार कितने एकड़ में क्या फसल बोई थी। होना तो यह चाहिए कि जमीनी सर्वे के बनिस्पत किसान की खड़ी-अधखड़ी-बर्बाद फसल पर सरकार को कब्जा लेना चाहिए तथा उसके रिकार्ड में दर्ज बुवाई के आंकड़ों के मुताबिक तत्काल अधिकतम खरीदी मूल्य यानि एमएसपी के अनुसार पैसा किसान के खाते ंमंे डाल देना चाहिए। इसके बाद गांवों में मनरेगा में दर्ज मजदूरों की मदद से फसल कटाई करवा कर जो भी मिले उसे सरकारी खजाने में डालना चाहिए। जब तक प्राकृतिक विपदा की हालत में किसन आष्वस्त नहीं होगा कि उसकी मेहनत, लागत का पूरा दाम उसे मिलेगा ही, खेती को फायदे का व्यवसाय बनाना संभव नहीं होगा।
 अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश  का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिश्ठा, तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि  उसके लिए जले पर नमककी मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दषा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञा होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचैलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है।  एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देश  के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण  हो रहा है । किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेश  पर प्रतिबंध -जैसे कदम देश  का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं । विडंबना है कि हमारे आर्थिक आधार की मजबूत कड़ी के प्रति ना ही समाज और ना ही सियासती दल संवेदनषील दिख रहे हैं। काश  कोई किसान को फसल की गारंटेड कीमत का आष्वासन दे पाता  तो किसी भी किसान कोे कभी जान ना देनी पड़ती।


पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
9891928376




शनिवार, 28 मार्च 2015

Earth hour is only "elephant teath"

‘अर्थ अवर’ का अनर्थ

गांवो में अंधेरा कर, स्टेडियम में उजाला

दैनिक जागरण 2 मार्च 15
                                                        पंकज चतुर्वेदी

28 मार्च को ही पूरे देश में रात में एक घंटा बिजली बंद कर बिजली बचाने और उसके मार्फत पर्यावरण-संरक्षण का बड़ा हल्ला हुआ। आंकडों में बताया जा रहा है कि एक घंटे बिजली बंद रख कर हम पृथ्वी को कितना बचा लेते है। लेकिन उस कवायद की नौटंकी जगजाहिर होने में एक सप्ताह ही लगेगा - आई.पी.एल के नाम पर आने वाले आठ अप्रेल से 24 मई तक तक इतनी बिजली स्टेडियमों में फूंक दी जाएगी, जितनी कि कई-कई ‘अर्थ अवर’ में बचाई भी नहीं थी। बिजली की बढ़ती मांग और कम उत्पादन से सरकार हताश है। ज्यादा बिजली का उत्पादन यानी ज्यादा कार्बन उत्सर्जन, जिसका सीधा असर होता है धरती के पर्यावरण पर। एक तरफ तो हम एक घंटे बिजली बंद कर हिसाब लगा रहे हैं कि कितनी बिजली बची और दूसरी ओर चमकदार रेाशनी में विश्‍व कप के क्रिकेट-मैच का आयोजन कर रहे हैं। जब देश का बड़ा हिस्सा खेतों में सिंचाई या घरों में रोशनी के लिए बिजली आने का इंतजार कर रहा होगा, तब देश के किसी महानगर में हजारों लोग ऊंचे खंबों पर लगी हजारों फ्लड-लाईटों में मैच का लुत्फ उठा रहे होंगे। जनता के प्रति जवाबदेह कहलाने वाले स्थानीय अफसर, नेता रात्रि क्रिकेट का लुत्फ उठाते हैं । उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं रहती कि स्टेडियम को जगमगाने के लिए कई गांवों में अंधेरा किया गया होगा । सनद रहे कि आईपीएल के दौरान भारत के विभिन्न शहरों में कुल 60 मैच खेले जाएंग, जिनमें से 36 तो रात आठ बजे से ही हैं। बाकी मैच भी दिन में चार बजे से शुरू होंगे यानी इनके लिए भी स्टेडियम में बिजली से उजाला करना ही होगा। यानी इन मैचों में कम से कम आठ घंटे स्टेडियम को जगमगाने के लिए बिजली फूंकी जाएगी।
कहने को तो ‘असली भारत’ गांवों में बसता है, लेकिन बिजली के मामले में गांवों को अभी भी हिकारत की नजर से देखा जाता है । जहां एक ओर हफ्तों तक बिजली के लट्टू चमकने का इंतजार करती देश की तीन-चैथाई आबादी हैं, तो दूसरी ओर कुछ सैंकड़ाभर लोगों के कुछ घंटों के मनोरंजन के लिए बेशकीमती बिजली की बर्बादी की गई । क्रिकेट भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है । पिछले एक दशक के दौरान यह एक खेल के बनिस्पत ग्लैमर, धंधे या फैशन के रूप में अधिक चर्चित हुआ हैं । सो इसके मूल रूप में बदलाव आना ही था - रंग बिरंगी पोशाकें, सफेद गंेद और घुप्प अंधियारी रात में भी दिन के उजाले की तरह दमकते स्टेडियम । अब हर साल आईपीएल और एक टीवी चैनल द्वारा शुरू किए गए प्रीमियर लीग के मैच तो कई महीनों तक रात में दिन का उजाला कर खेले जा रहे हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि आखिर किस कीमत पर रात को दिन बना कर क्रिकेट खेलने का जुनून पूरा किया जाता हैं ?
रात के क्रिकेट मैचों के दौरान आमतौर पर स्टेडियम के चारों कोनों पर एक-एक प्रकाशयुक्त टावर होता है । हरेक टावर में 140 मेटल हेडलाईड बल्ब लगे होते हैं  इस एक बल्ब की बिजली खपत क्षमता 180 वाट होती है । यानी एक टावर पर 2,52000 वाट या 252 किलो वाट बिजली फुंकती हैं । इस हिसाब से समूचे मैदान को जगमगाने के लिए चारों टावरों पर 1008 किलोवाट बिजली की आवश्यकता होती हैं । रात्रिकालीन मैच के दौरान कम से कम छह घंटे तक चारों टावर की सभी लाइटें जलती ही हैं । अर्थात एक मैंच के लिए 6048 किलो वाट प्रति घंटा की दर से बिजली की जरूरत होती हैं । इसके अलावा एक मैच के लिए दो दिन कुछ घंटे अभ्यास भी किया जाता हैं । इसमें भी 4000 किलो वाट प्रति घंटा (केवीएच) बिजली लगती हैं । अर्थात एक मैच के आयोजन में दस हजार केवीएच बिजली इसके अतिरिक्त हैं ।
दूसरी तरफ एक गांव का घर जहां दो लाईटें, दो पंखे, एक टीवी और अन्य उपकरण हैं, में दैनिक बिजली खपत दशमलव पांच केवीएच हैं । एक मैच के आयोजन में खर्च 10 हजार केवीएच बिजली को यदि इस घर की जरूरत पर खर्च किया जाए तो वह बीस हजार दिन यानी 54 वर्ष से अधिक चलेगी । यदि किसी गांव में सौ घर हैं और प्रति घर में औसतन 0.5 केवीएच बिजली खर्च होती है, तो वहां 50 केवीएच प्रतिदिन की बिजली मांग होगी । जाहिर है कि यदि एक क्रिकेट मैच दिन की रोशनी मेें खेल लिया जाए तो उससे बची बिजली से एक गांव में 200 दिन तक निर्बाध बिजली सप्लाई की जा सकती हैं । काश ये सभी मैच सूर्य के प्रकाश में आयोजित किए जाते तो कई गांवों को गरमी के तीन महीने बिजली की किल्लत से निजात मिल सकती थी । और यह तथ्य सभी खेल विशेषज्ञ भी स्वीकारते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश में खेल का मजा ही कुछ और होता हैं ।
हमारे देश के कुल 5,79,00 आबाद गांवों में से 82,800 गांवों तक बिजली की लाईन ना पहुंचने की बात स्वयं सरकारी रिकार्ड कबूल करता हैं । जरूरत की तुलना में 16.5 प्रतिशत बिजली का उत्पादन कम हो पा रहा है, यह अलग से है । चोरी, बिजली सप्लाई में तारों द्धारा अवशोषण व अन्य कारणों के चलते उपभोक्ताओं की आवश्यकता से लगभग 40 फीसदी बिजली की कमी हैं ।  एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में कुल उत्पादित बिजली के मात्र 35 फीसदी का ही वास्तविक उपभोग हो पाता हैं । वरना देश में कभी बिजली की कमी ही नहीं रहे । हर साल देश के कोने-कोने में खेतों को बिजली की बाधित आपूर्ति के कारण माकूल सिंचाई नहीं हो पाने से हजारों एकड़ फसल नष्ट होने के किस्से सुनाई देते हैं । इस अत्यावश्यक मांग से बेखबर तथाकथित खेल प्रेमी बिजली मांग के पीक-आवर यानी शाम छह बजे से रात साढ़े नौ के बीच सैंकडों गांवों में अंधेरा कर एक स्टेडियम को रोशन करते हैं । यह कहां तक न्यायोचित है ? इसके अलावा देर रात तक मैच देख कर अगले दिन अपने दफ्तरों में देर से पहुंचने या सोने के कारण होने वाले काम के हर्जे से हुए सरकारी नुकसान का तो कोई आकलन नहीं हैं ।
जनता की मूलभूत जरूरतों में जबरिया कटौती कर कतिपय लोगांे के ऐशो-आराम के लिए रात में क्रिकेट मैच आयोजित करना कुछ यूरोपीय देशों की नकल से अधिक कुछ नहीं हैं । यूरोपीय देशों में साफ आसमान नहीं रहने और जल्दी सूर्यास्त होने की समस्या रहती है । साथ ही वहां बिजली का उत्पादन मांग से बहुत अधिक है । चूंकि उन देशों में लोग दिन के समय अपने जीविकोपार्जन के कार्यों में व्यस्त रहते हैं ,अतएव वहां कृत्रिम प्रकाश में रात में क्रिकेट खेलना लाजिमी व तर्कसंगत है । लेकिन भारत में जहां एक तरफ बिजली की त्राहि-त्राहि मची है, वहीं सूर्य देवता यहां भरपूर मेहरबान है । फिर यहां का क्रिकेट प्रेमी जगत अपनी शान बघारने के लिए जरूरी काम छोड़ कर मैच देखने के लिए स्टेडियम में दिन भर बैठने को तत्पर रहता हैं । फिर भी रात्रि मैच की अंधी नकल करना क्या खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं है ?

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005

फोन:9891928376, 120-4241060


शुक्रवार, 27 मार्च 2015

A CHILDREN STORY KILLED BY EDITORIAL OF NANDAN



अप्रेल 2015 की 'नंदन'' में छपी मेरी कहानी जिसकी आत्‍मा संपादकीय अनुभाग ने निर्ममता से मार दी,कहानी थी 1800 शब्‍दों की व उसे 800 का बना दिया, यही नहीं इसके लिए बनाया गया चित्र भी कहानी से कोई तारतम्‍य ही नहीं रखता है, 'नंदन' जैसी पञिका की यह नादाना से लगता है यह बच्‍चों की नहीं बचकानी पञिका बन गई है 

रहस्यमयी पेन ड्राईव

                                              पंकज चतुर्वेदी


लगातार दो दिन ऐसा हुआ कि दो छोटे जहाज हमारी सीमा से होकर गुजरी गए। उनके जाने का रास्ता भी इतना चतुराई भरा था कि वे कुछ मीटर की उस पतली सी पट्टी से सरक-सरक कर निकले, जहां हमारे जहाज, राडार और पनडुब्बी की रेंज या तो थी नहीं या कमजोर थी। जब तक समझ आती कि कोई घुसपैठ हो रही है, चट से दोनों जहाज हमारी सीमा से पार हो गए। पहले तो लगा कि यह महज इत्तेफाक है, आखिर हमारे चाक-चैबंद सुरक्षा चक्र की इतनी बारीक जानकारी किसी को हो ही नहीं सकती है। लेकिन तीन दिन बाद ही एक ऐसी भयंकर घटना हुई जिसने सोचने को मजबूर कर दिया कि कहीं ना कहीं कोई ना कोई गड़बड़ है।
हमारी विशाल समुद्री सीमा पिछले कुछ सालों से सुरक्षा के लिए चुनौती रही है। मुंबई में हमले के लिए जिस तरह समुद्री मार्ग का इस्तेमाल किया गया, उसके बाद तटरक्षक दल ज्यादा चौकस  हो गया था। निगरानी के लिए कई अत्याधुनिक उपकरण भी लगाए गए,लेकिन समुद्र है ही इतना अथाह व अनंत कि इस पर हर समय संपूर्ण नजर रखना कठिन ही है। 
कार निकोबर द्वीप से 50 नाटिकल माईल्स की दूरी पर एक वीरान द्वीप में नौसेना की एक छोटी सी टुकड़ी ने सागर की लहरों पर होने वाली हर हलचल पर निगाह रखने के लिए एक केंद्र बनाया है। दूर-दूर तक केवल और केवल समुद्र का नीला जल ही दिखता है। यह केंद्र  दूसरे लेागों की दृष्टि  में ना आए, इस लिए यहां पदस्थ नौसेनिकों  को हेलीकाप्टर के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है। बस छोटी नौका से आना-जाना। हर कर्मचारी की ड्यूटी एक-एक महीने की, यहां ड्यूटी के दौरान बाहरी दुनिया से केवल अपने वायरलेस से संपर्क, यानी मोबाईल भी काम नहीं करते हैं। यूं कहा जाए कि कहने को दिल्ली व मुंबई में नौसेना का मुख्यालय है, लेकिन असल आपरेशन व नियंत्रण बस यहीं से होता है। सेटेलाईट से मिलने वाले चित्र, खुफिया एजेंसियों की सूचनाएं, नौसेना के जहाज, राडार, आदि की नियुक्ति सबकुछ यहीं से तय होता है। कहने की जरूरत नहीं कि यहां पदस्थ कर्मचारी भी बेहद अनुभवी, भरोसे के और जांबाज हैं।
वैसे तो हर देश  अपनी सैन्य क्षमता का खूब प्रचार करता है। हमारा देश  गणतंत्र दिवस पर अपने सभी नए सैन्य साजो-सामान की झांकी निकालकर देषवासियों को भरोसा दिलाता है कि हमारी फौज के बदौलत  हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं। लेकिन इजराईल से मिली पांच पनडुब्बियों की खबर किसी को लगी ही नहीं। सौदा और फिर हमारे देश  तक  उन नायाब पनडुब्बियों का पहुंचना इतना गोपनीय रहा कि अमेरिका को भी इसकी भनक बहुत बाद मे लगी। इन पनडुब्बियों की विशेषता  है कि ये समुद्र की गहराई में एक किलोमीटर नीचे कई-कई दिन तक बनी रहती हैं। इन्हें सेटेलाईट, इन्फ्रारेड या अन्य किसी तरीकों से खेाजा नहीं जा सकता । जबकि इसमें लगे कैमरे, राडार कई-कई किलोमीटर की समुद्री हलचलों को भांप लेती हें। इनमें लगी बंदूकों से पानी से पानी में और आकाश  में भी लंबी मार की जा सकती है। इसके "हार्पुन" बड़े से बड़े जहाजी बेड़े की तली में छेद कर सकते हैं।
नौसेना के गोपनीय केंद्र में इनमें से तीन को हिंद महासागर व दो को बंगाल की खाड़ी में  रखने की येाजना बनी। इन्हें ऐसी जगह पर रखा गया, जहां से आईएनएस के जहाजी बेड़े  इतनी दूर हों कि पनडुब्बी की निगरानी रखने की सीमा समाप्त होने के कुछ ही मीटर बाद जहाज द्वारा निगरानी के उपकरण काम करने लगें। निगरानी की रेंज को विस्तार देने के लिए पनडुब्बी व जहाज के बीच कुछ सौ मीटर की दूरी रखी गई, ताकि उत्तर-पश्चिम दिशा  में चौकसी  ज्यादा हो। अब तटरक्षक भी निश्चिन्त थे कि जहाजों के होते हुए कोई घुसपैठ संभव नहीं होगी। लेकिन दो विदेशी जहाजों के इस तरह निकल जाने से चिंता की लकीरें गहरा गईं।
घुसपैठी जहाजों के मार्ग को जब नक़्शे पर देखा गया तो साफ नजर अया कि पनडुब्बी व जहाज से बीच की पट्टी से ही वे निकले थे।  बात चिंता की तो थी ही।  खुफिया केंद्र  में एडमिरल जोशी  ने तत्काल एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई।  आमतौर पर सभी का कहना था कि पनडुब्बी की नियुक्ति के स्थान की जानकारी तो गिने-चुने लोगों को है और विदेशी  जहाजों का इस तरह बच कर निकलना महज एक तात्कालिक घटना है। फिर भी  आईएनएस के बेड़े व पनडुब्बियों के स्थानों को बदल दिया गया। इसके लिए फिर से समुद्र के नक़्शे, अंतर्राष्ट्रीय  जहाजों के रास्तों, संभावित घुसपैठ के रास्तों का अध्ययन किया गया।
समुद्र में रात बेहद डरावनी होती है। वह अमावस्या की रात थी।  समुद्र की लहरें वीरान द्वीप की चट्टानों से टकरा कर भयानक आवाज पैदा करती हैं। बीच-बीच में व्हेल के उछलने या किसी व्यापारिक जहाज  के गुजरने से पानी में हलचल होती रहती है। गार्ड की ड्यूटी करने वालों के अलावा सभी नौसेनिक सो रहे थे। लेकिन एडमिरल जोशी  को नींद नहीं  आ रही थी, उनका मन अभी भी मानने को तैयार नहीं था कि दो जहाज सुरक्षा घेरा तोड़कर निकल गए वह महज इत्तेफाक था। अचानक ही सन्नाटे में  सुरक्षा सायरन का स्वर गूंज गया। एडमिरल जोशी   बिस्तर से उछलकर बाहर की ओर भागे। दूर समुद्र में जैसे आग लगी हुई थी।
तत्काल एक छोटी सी मोटरबोट में सवार हो कर जोशी  व उनके पांच साथी उसी और दौड़ पड़े। इस बीच कोस्टलगार्ड के हेलीकोप्टर  को खबर कर आग बुझाने का फोम छिड़कने की व्यवस्था करने को कहा गया।  और करीब  गए तो लगा कि समुद्र की गहराई से जैसे ज्वालामुखी फट गया हो।  कुछ धमाके होते,  फिर आग आकाश  की ओर लपकती। ज्वाला इतनी तेज थी कि जोशी  की मोटर बोट उस जगह से कोई दो नाॅटिकल माईल (एक नाॅटिकल माईल में लगभग 1.85 किलोमीटर होता है) दूर ही रूकना पड़ा।
इतना बड़ा धमाका कैसे छुप पाता। मीडिया को भी खबर लग गई कि कई हजार करोड़ कीमत की पनडुब्बी में आग लग गई थी।  नैासेना के खुफिया मिशन पर सवाल खड़े होने लगे। सेना की खुफिया एजेंसी ने पहली ही नजर में कह दिया कि किसी को यह पता था कि ठीक इस जगह पर पनडुब्बी है और साजिश  के तहत उसे उड़ाया गया।
रक्षा मंत्री इस घटना से बेहद नाराज थे। इतने गोपनीय योजना आखिर कैसे लीक हुई। एडमिरल जोषी को जिम्मा दिया गया कि 15 दिन में उन कारणों का पता लगाया जाए जिनके चलते जानकारी बाहर गई व इतनी बड़ी घटना हुई।
श्री जोशी की टीम के लोग घटना के कारण जांचने के लिए घटना वाले समुद्री क्षेत्र से हर संभवित संदिग्ध सूचना जमा कर रहे थे, लेकिन जोशी जी की दिमाग अपने ही केंद्र में लगा था। उन्होंने एक बार फिर दो जहाजों की घुसपैठ की घटना, उसके बाद पनडुब्बी व जहाजों के स्थान को बदलने की पूरी प्रक्रिया पर ही बारिकी से देखना शुरू  किया। केंद्र में पदस्थ हर एक कर्मचारी का रिकार्ड जांचा गया, लेकिन कहीं से कुछ सुराग नहीं मिला।
इस खुफिया केंद्र की हर योजना कंप्यूटर पर ही होती है व किसी का कभी भी कोई प्रिंट नहीं लिया जाता। नौसेना के अपने आप्टिक्ल फाईबर हैं जिनके जरिये इंटरनेट काम करता है और इस वेबलेंग्थ पर अन्य कोई संस्था जुड़ी ही नहीं है। और यह भी तो देखें कि नई योजना बनाए कुछ ही घंटे हुए व दुशमन को नए स्थान की जानकारी भी मिल गई।  इस उधेड़बुन में दो दिन बीत गए व कोई भी तथ्य हाथ नहीं आ रहा था। इधर दिल्ली से इतना दवाब था कि जोशी  व उनकी टीम का खाना, सोना सब बंद सा हो गया था।
जोशी जी ने  खुफिया केंद्र पर तैनात सभी लोगों को बुला भेजा। सभी विश्राम की मुद्रा में पंक्तियों में खड़े थे।
" मुझे आप लोगों पर इतना भरोसा है जितना कि मुझे अपने-आप पर भी नहीं है । लेकिन हमारे सामने जो संकट आया है उसमें हमें खुद अपने पर ही शक करना होगा।" जोशी जी बोले।
"सर, हम अपनी निष्ठा दर्शाने के लिए अभी अपनी जान दे सकते हैं। आप कहें तो हमें क्या करना हैं। आप बिल्कुल संकोच ना करें।" कमांडर पेट्रिक ने सभी साथियों की ओर देखकर कहा।
सभी एक स्वर में बोल पड़े, "सर इस संकट में हम सभी आपके हर फैसले के साथ हैं।"
" तो फिर सभी अपना सभी कुछ सामान बाहर ले आयें । मेरा भी । हम हर एक के सामान की हर छोटी-बड़ी चीज को देखेंगे। सबसे पहले मेरे ही सामान की तलाशी होगी।"
जोशी जी का यह कहना था कि दो मिनट में सभी अपना-अपना सामान लेकर कर खुले में आ गए। सबसे पहले जोशी जी के सामान  की तलाशी  हुई।  बाकी सभी के सामान में तो कुछ मिला नहीं, हां मिश्राजी के पास एक पेन ड्राईव जरूर मिला।
" सर, मेरा बेटा अपने स्कूल के लिए नौसेना पर प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था। वह कुछ फोटो चाहता था, सो मैने अपने कैमरे से खींचे थे और कंप्यूटर में कापी कर इसे पेन ड्राईव पर लिया था। यह तो अभी  यहीं है आप देख सकते हैं कि इसमें फोटो के अलावा कुछ है नहीं।" मिश्राजी ने बताया।
जोशी को लगा कि शायद सही जा रहे हैं। मिश्राजी व यहां पदस्थ अधिकांश  लोगों के परिवार पोर्ट ब्लेयर में ही रहते हैं। जोशी जी ने पेन ड्राईव लिया व उसी समय पोर्ट ब्लेयर रवाना हो गए। वे बाजार में कंप्यूटर के सामान व स्टेशनरी बेचने वाली कई दुकानों पर गए, सभी जगह उसी कंपनी के पेन ड्राईव मिले जोकि मिश्राजी के पास था। उन्होंने पूछताछ की तो पता चला कि अभी एक महीने पहले ही एक एजेंट आया था व दस रूपए में चार जीबी के पेन ड्राईव बेच गया था, जिसे दुकान वाले दो सौ रूपए तक बेच रहे थे। जोशी जी ने ऐसे कई पेन ड्राईव अलग-अलग दुकानों से खरीद डाले।
जोशी जी ने नौसेना के कंप्यूटर विषेशज्ञ को तत्काल बुला भेजा व इन पेन ड्राईव की जांच करने को कहा। इसके साथ ही उस रहस्य से परा उठ गया कि उनके केंद्र से सूचना बाहर गई कैसे। असल में उन सभी पेन ड्राईव में एक माईक्रो वाईरस लगाया गया था । जैसे ही वह पेन ड्राईव किसी कंप्यूटर में लगाया जाता, वायरस सक्रिय हो जात व पलक झपकते ही उस कंप्यूटर का पूरा डेटा चुरा लेता। यही नहीं वह यह पूरी सूचना उसी समय एक ईमेल पर भेज देता व यह काम करने के बाद चुप बैठ जाता। यह इस तरह का स्पाई यानी जासूसी कीड़ा था कि किसी भी तरह के एंटी वायरस की पकड़ में आता नहीं था। दुशमन देश ने  पूरे शहर में यह पेन ड्राईव यही सोचकर बांटे थे कि कभी ना कभी किसी ना किसी कंप्यूटर से गोपनीय सूचना मिल ही जाएगी। हुआ भी ऐसा ही, जैसे ही मिश्राजी ने फोटो काॅपी करने के लिए पेन ड्राईव लगाया, उनके कंप्यूटर में दर्ज पनडुब्बी व जहाज की स्थापना की सूचना  सुदूर कंप्यूटर पर पहुँच गई।
अब यह किसी से छुपा नहीं था कि हमारी सुरक्षा कड़ी को तोड़ने वाले जहाज, पनडुब्बी को नष्ट  करने का टाईमर आदि लेकर ही निकले थे। पनडुब्बी के स्थान परिवर्तन की सूचना मिलते ही रिमोट से टाईमर डिवाईस का स्थान भी बदल दिया गया था।
मामला बेहद जटिल था। किसी ने भी जानबूझ कर ऐसा नहीं किया था। बारहवें दिन जोशी जी ने अपनी रिपोर्ट दिल्ली भेज दी। हमारे रक्षा मंत्रालय ने दुशमन देश को कड़ी चेतावनी भी दी। और उसके बाद सख्त आदेश  हो गया कि किसी भी मंत्रायल, सुरक्षा संस्थान या कार्यालय में कोई भी बाहर ड्राईव यानि पेन ड्राईव या हार्ड डिस्क लगाना गैरकानूनी होगा।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

River converting in severs

सौभाग्य और संस्कृति की जीवन रेखाओं में बह रहा है जहर

                                                                                                                    पंकज चतुर्वेदी
बहुत-बहुत पुरानी बात है- हमारे देश  में एक नदी थी, सिंधु नदी। इस नदी की घाटी में खुदाई हुई तो मोईन जोदड़ों नाम का पूरा शहर मिला, ऐसा षहर जो बताता था कि हमारे पूर्वजों के पूर्वजों के पूर्वज बेहद सभ्य व सुसंस्कृत थे और नदियों से उनका षरीर-स्वांस का रिष्ता था।  नदियों किनारे समाज विकसित हुआ, बस्ती, खेती, मिट्टी व अनाज का प्रयोग, अग्नि का इस्तेमाल के अन्वेशण हुए। मंदिर व तीर्थ नदी के किनारे बसे, ज्ञान व अध्यात्म का पाठ इन्हीं नदियों की लहरों के साथ दुनियाभर में फैला। कह सकते हैं कि भारत की सांस्कृतिक व भावात्मक एकता का सम्वेत स्वर इन नदियों से ही उभरता है। इंसान मशीनों की खोज करता रहा, अपने सुख-सुविधाओं व कम समय में ज्यादा काम की जुगत तलाषता रहा और इसी आपाधापी में सरस्वती जैसी नदी गुम हो गई। गंगा व यमुना पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। बीते चार दशकों के दौरान समाज व सरकार ने कई परिभाषाएं , मापदंड, योजनाएं गढ़ीं कि नदियों को बचाया जाए, लेकिन विडंबना है कि उतनी ही तेजी से पावनता और पानी नदियों से लुप्त होता रहा।
डेली न्यूज जयपुर २७-३-१५ http://dailynewsnetwork.epapr.in/466873/Daily-news/27-03-2015#page/6/1
हमारे देश  में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है, जहां से पानी बह कर नदियों में आता है। इसमें हिंमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि षामिल होते हैं। जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 20 हजार वर्ग किलोमीटर से बड़ा होता है , उन्हें बड़ा-नदी जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। 20 हजार से दो हजार वर्ग किजरेमीटर वाले को मध्यम, दो हजार से  कम वाले को लघु जल ग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। इस मापदंड के अनुसार गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृश्णा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, पेन्नार, माही, ब्रह्मणी, महानदी, और साबरमति बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां - गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमालय के हिमखंडों के पिघलने से अवतरित होती हैं। इन सदानीरा नदियों को ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। षेश दस को पठारी नदी कहते हैं, जो मूलतः वर्शा पर निर्भर होती हैं।
यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देष का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिषत है।  आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विशय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिष के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।
नदियों के सामने खड़े हो रहे संकट ने मानवता के लिए भी चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। हमारी नदियों के सामने मूलरूप से तीन तरह के संकट हैं - पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूशण।
 धरती के तापमान में हो रही बढ़ौतरी के चलते मौसम में बदलाव  हो रहा है और इसी का परिणाम है कि या तो बारिष अनियमित हो रही है या फिर बेहद कम।  मानसून के तीन महीनों में बामुष्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधंुध बारिष हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। बड़ी नदियों में ब्रह्मपुत्र, गंगा, महानदी और ब्राह्मणी के रास्तों में पानी खूब बरसता है और इनमें न्यूनतम बहाव 4.7 नख घनमीटर प्रति वर्गकिलोमीटर होता है। वहीं कृश्णा, सिंधु, तापी, नर्मदा और गोदावरी का पथ कम वर्शा वाला है सो इसमें जल बहाव 2.6 लख घनमीटर प्रति र्वकिमी ही रहता है। कावेरी, पेन्नार, माही और साबरमति में तो बहाव 0.6 लख घनमीटर ही रह जाता है। सिंचाई व अन्य कार्यों के लिए नदियों के अधिक दोहन, बांध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूपों के साथ भी छेड़छाड़ र्हुअ व इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है।
नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टकुड़े व बहुत सा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अंधाधंुध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थेाडी सी बारिष में ही बहुत सा मलवा बह कर नदियों में गिर जाता है। परिणामस्वरूप् नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही ववे बाढ़ का रूप् ले लेती हैं।
आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूशण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रायायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र 20 प्रतिषत की ही खपत होती है, षेश 80 फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। यही अपषिश्ट या माल-जल कहा जाता है, जो नदियों का दुष्मन है। भले ही हम कारखानों को दोशी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चैथाई  हिस्सा घरेलू मल-जल ही है।

आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेडी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंदा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर 10 नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। हालत यह है कि देश की 27 नदियां नदी के मानक में भी रखने लायक नहीं बची हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलुज, चिनाव, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा हो या बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवणर्रेखा, सरयू हो या रामगंगा, गौला हो या सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक हो या गंडक, कमला हो या फिर सोन हो या भगीरथी या फिर इनकी सहायक, कमोेबेश सभी प्रदूषित हंै और अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं। दरअसल पिछले 50 बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चंूकि नदी से जंगल, पहाड़, वन्य जीव, पक्षी और जन जीवन गहरे तक जुड़ा है, इसलिए जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सभी सजीव-निर्जीव प्रभावित हुए बिना न रहे और उनके अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा। असल में जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, प्रदूषण ने नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत्र प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। जून- 2014 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि राज्यवार प्रदूषित नदियों की सूची में पहले स्थान पर महाराष्ट्र है जहां 28 नदियां प्रदूषित हैं. दूसरे स्थान पर गुजरात है जहां ऐसी 19 नदियां हैं ।  सूची में 12 प्रदूषित नदियों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर हैं। कर्नाटक की 11 नदियां प्रदूषित नदियों की सूची में हैं, जबकि मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक में नौ नदियां ऐसी हैं । राजस्थान की पांच और झारखंड की तीन नदियां इस सूची में हैं. साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल की तीन तीन नदियां शामिल हैं।  दिल्ली से गुजरने वाली एक ही नदी यमुना है और वह भी इस सूची में शामिल है।

To Save agriculture get rid of Paddy farming

 खेत बचाना हो तो धान का मोह छोड़ें पंकज चतुर्वेदी इस बार मानसून आने में देर हो गई, लेकिन जिन इलाकों की रोजी रोटी ही खेती से चलती हो, वह बुवाई...