My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 25 जून 2021

 


जरूरी है प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का मजबूत होना

पंकज चतुर्वेदी


बीते डेढ साल में देश  को यह समझ आ गया कि भारत की मजबूती के लिए जितना जरूरी सेना की तैयारी है , सुगठित चिकित्सा सेवा उससे कम नहीं है। बीमारियां देश  के अर्थ तंत्र, शिक्षा  सहित लगभग सभी पक्षों को कमजोर कर रही हैं। आज सवाल यह है कि हमारी चिकित्या नीति क्या हो? बीते कुछ सालों में अधिक से अधिक एम्स खोलना, निजी क्षेत्र में मेडिकल कालेज शुरू  करना और जिला स्तर के अस्पतालों में अधिक से अधिक मूलभूत सुविधांए जोड़ना हमारी प्राथमिकता रही।  कोविड ने चेता दिया है कि यदि ग्रामीण अंचल में प्रिवेटिव हैल्थ का मूलभूत ढांचा होता तो बड़े अस्पतालों पर इतना जोर नहीं होता । यह बानगी है कि प्रधानमंत्री सहायता कोष से सारे देश  को गए अधिकांष वैंटिलेटर इस्तेमाल में ही नहीं आए और इसका मूल कारण था कि कहीं बिजली नहीं थी तो कहीं इस मषीन को चलाने को स्टाफ नहीं था। एक बात समझना होगा कि सरकार की प्राथमिकता  लोगों का रोग  अधिक गंभीर ना हो और उसे अपने घर के पास प्राथमिक उपचार ऐसा मिल जाए ताकि कम से कम लोगों को बड़े अस्पताल या मेडिकल कालेज तक जाना पड़े। यह कड़वा सच है कि स्वास्थ्य  सेवाओं में बड़े कारपोरेट के आगमन के बाद यही हुआ कि दूरस्थ अंचल पर रोगों के बारे में ना तो जागरूकता रही और ना ही उपचार, जब हालात बहुत खराब हो गए तो बड़े षहरों के नामचीन अस्पताल की ओर दौड़ना पड़ा। 

राश्ट्रीय स्वास्थ्य मिषन का मानक है कि प्रत्येक तीस हजार आबादी(दुर्गम, आदिवासी और रेगिस्तानी इलाकों में बीस हजार) पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या पीएचसी और पग्रत्येक चार पीएचसी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अर्थात सीएचसी हो। इसके अलावा प्रत्येक पांच हजार आबादी (दुर्गम, आदिवासी और रेगिस्तानी इलाकों में तीन हजार) एक उप केंद्र का भी प्रावाधान है। इस तरह देष में कोई एक लाख 58 हजार उप केंद्र, 24,885 पीएचासी और 5335 सीएचसी होने का सरकारी दवा है। इसके अलावा 1234 उपखंड  व 756 जिला अस्पताल भी सरकारी रिकार्ड में हैं।  हालांकि देष की एक अरब 36 करोड के लगभग आबादी के सामने यह स्वास्थ्य तंत्र बहुत जर्जर हैं। वैसे भी देष की 70 करोड़ से अधिक आबादी 664369 गांवों में रहती हैं। उप्र में सबसे गांव हैं, जिनकी संख्या 97941 है, उसके बाद उड़िसा में 51352, मप्र में 55392, महाराश्ट्र में 43,772, पष्चिम बंगाल में 40,783 और बंगाल में 45113 गांव है।  जिस तरह से इन दिनों इदूरस्थ अंचल में कोरोना संक्रमण फैल रहा है  और कई राज्यों में बीस-बीस किलोमीटर में डाक्टर तो क्या नर्स भी नहीं है, अंदाज लगाया जा सकता है कि हालात कैसे होंगे।  हमारे देष में एक डाक्टर औसतन 11,082 लोगों की देखभाल करता है जो कि विष्व स्वास्थय संगठन के मानक का दस गुणा है। 


केाविड के समय दूरस्थ गांव का मरीज षहर में भटकता परेषान दिखा, उसका कारण है कि गांव व षहर के बीच की सीएचसी नाम मात्र की ही है। नियमानुसार हर सीएचसी में एक सर्जन, एक महिलया रोग, बल रोग विषेशज्ञ व एक फिजीषियन होना चाहिए। तीस बिस्तरों के अस्पताल में नर्स, पेथोलाजी, एक्सरे जैसी मूलभूत सुविधाओ की अपेक्षा है। जमीनी आंकड़ े बताते हैं कि सीएचसी में डाक्टर के 63 फीसदी पद खाली हंै। इनमें सर्जन के 68.4 प्रतिषत, महिला रोग विषेशज्ञ के 56.1, फिजीषियन के 68.8 और बाल रोग विषेशज्ञ के 63.1 प्रतिषत पद खाली हैं। कुल मिला कर यहां 12.5 प्रतिषत डाक्टर व 3.71 प्रतिषत विषेशज्ञ ही काम कर रहे हैं। इसके अलावा एक्सरे मषीन चलाने वाले के 3266, फार्मासिस्ट के 327 सहित अधिकांष पद खाली हैं। उप केंद्र में हजारों की संख्या में स्वास्थ्य सहायक हैं ही नहीं। देष के 63 जिले ऐसे हैं जहां कोई ब्लड बैंक ही नहीं है और 350 से ज्यादा जिला व तहसील अस्पताल में एक भी वैंटिलेटर नहीं हैं। जान लें यदि हमारा दूरस्थ अंचल का स्वास्थ्य नेटवर्क काम ही करता होता और महज जागरूकता, प्राथमिक उपचार पर काम करता तो ना ही इतनी आक्सीजन लगती और ना ही इतने वेंटिलेटर की जरूरत होती। 


चूंकि अब षहरों की ओर गांव से पलायन बढ़ा है और कोविड में देखा गया कि ऐसे लोग बेरोजगारी के डर से फिर गांव लौटे, जाहिर है कि इस तरह गांव की चिकित्या व्यवस्था दुरूस्त ना होने का खामियाजा भुगताना पड़ा। हजारेां ऐसे गांव हैं जहां एक भी थर्मामीटर नहीं है। जब दवा नहीं, सही सूचना नहीं तो ऐसे में अंध विष्वास के पैर फैलाने की पूरी संभावना भी रहती है और इससे संक्रमण जैसे रोग खूब फैलते हैं। देष के आंचलिक कस्बें की बात तो दूर राजधानी दिल्ली के एम्स यया सफदरजंग जैसे अस्पतालों की भीड़ और आम मरीजों की दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। एक तो हम जरूरत के मुताबिक डाक्टर तैयार नहीं कर पा रहे, दूसरा देष की बड़ी आबादी ना तो स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त जागरूक है और ना ही उनके पास आकस्मिक चिकित्सा के हालात में  केाई बीमा या अर्थ की व्यवस्था है।  हालांकि सरकार गरीबों के लिए मुफ्त इलाज की कई योजनाएं चलाती है लेकिन व्यापक अषिक्षा और गैरजागरूकता के कारण ऐसी योजनाएं माकूल नहीं हैं।

आज यदि देष के स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करना है तो बड़े अस्पताल या एम्स जैसे लुभावने  वायदों के बनिस्पत प्रत्येक पीएचसी में बिजली, पानी सहित डाक्टर व स्टाफ के रहने की व्यवस्था, , हर दिन सीएचसी से एक वाहन का पीएचसी में आगमन जो कि पैथालाजी लेब के संेपल ले जाने, जरूरी दवा की सप्लाई के अलावा स्टज्ञफ के निजी इस्तेमाल की ऐसी चीजें जो गांव में नहीं मिलती, उसके लाने ले जाने का कमा करे। ग्रामीण अंचलों में सेवा कर रकहे डाक्टरों के बच्चों की उच्च षिक्षा का जिम्मा सरकार ले व यदि वे बच्चे षहर में पढ़ते हैं तो उनके हास्टल आदि की व्यवस्था हो।  डाक्टर भी तभी काम कर पाएगा जब उसके पास मूलभूत सुविधांए होंगी। इसी तरह पीएचसी में सेवा करने वाले डाक्टर का दस साल में सीएससी और सीएएसी में सात साल सेवा करने वाले को जिला या तहसील पर तबादले की नीति बने। दवा व मरहम पट्टी जैसी आवष्यक खरीदी का स्थानीय बजट, हर स्त्र के अस्पताल में निरापद बिजली व पानी की व्यवस्था , वहां काम करने वालों की सुरक्षा पर काम करना जरूरी है। 

कुछ साल पहले तब के केंद्र के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से डाक्टर तैयार करने के चार साला कोर्स की बात कही थी। इसके लिए प्रत्येक जिला अस्पताल में 40 सीटों के मेडिकल कालेज की बात थी। जाहिर हैकि निजी मेडिकल कालेज चलाने वालों के हितो पर इससे चोट पहुंचनी थी सो वह योजना कभी परवान चढ़ नहीं सकी। आज जरूरत है कि उस योजना का क्रियान्वयन हो, साथ ही आयुष चिकित्सकों को भी आपात स्थिति में सरकारी अस्पतालों में इंजेक्षन आदि लगाने के लिए तैयार किया जाए। 

#health 

# not AIIMS needs PHC

#Primary health center 


रविवार, 20 जून 2021

The existence of the Queen of Hills is in danger - Mussoorie Tunnel Project

 
पहाड़ों की रानी के अस्तित्व को खतरा है - मसूरी सुरंग परियोजना

पंकज चतुर्वेदी

अमर उजाला २१ जून २१ 


 पहाड़ों की रानी कहलाने वाले मसूरी में विकास के नाम पर जो योजना बन रही हैं , वह कई मायनों में न केवल विचित्र हो, बल्कि पहाड़ के लिए आफतों का न्योता भी है . कितना अजब है कि केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी सीधे सोशल मिडिया पर घोषणा कर देते हैं मसूरी में सडक जाम से बचने के लिए 2.74 किलोमीटर के लिए लंबी सुरंग के लिए 700 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए गए हैं, दूसरी तरफ राज्य के वन विभाग से ले कर सार्वजनिक निर्माण विभाग तक तो इसकी कोई जानकारी ही नहीं है . श्री गटकरी ने "प्रगति का हाई वे" हेश टेग मॉल रोड, मसूरी शहर और लाल बहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी की ओर निर्बाध यातायात के जिस दावे की घोषणा की है, वास्तव में वह पहाड पर विनाश का न्योता हो सकता है . जान लें मसूरी के लिए सुरंग बनाए के प्रयास पहले भी होते रहे हैं, यहाँ तक कि अंग्रेज शासन में वहाँ ट्रेन लाने  के लिए जब सुरंग की बात आई तो जन विरोध के चलते उस काम को रोकना पड़ा था और आधी अधूरी पटरियां  पड़ीं रह गयी थीं .


जानना जरुरी है कि हिमालय भारत के लिए महज एक भोगोलिक संरचना नहीं है, इसे देश की जीवन रेखा खा जाना चाहिए-- नदियों का जल हो या मानसून की गति-- सब कुछ हिमालय के पहाड़ तय करते हैं .भले ही यह कोई सात करोड साल पुरना हो लेकिन दुनिया में यह युवा पहाड़ है और इसमें लगातार आंतरिक गतिविधियां चलती रहती हैं . केदारनाथ त्रासदी से सबक न लेते हुए उत्तराखंड के हिमालय पर बेशुमार सड़कों का जो दौर शुरू हुआ है उससे आये रोज, मलवा खिसकने, जंगल गायब होने जैसी त्रासदियाँ उपज रही हैं . खासकर  जलवायु परिवर्तन की मार से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखंड के पहाड़ जैसे अब अपना संयम खो रहे हैं -देश को सदानीरा गंगा-यमुना जैसे नदिया देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने की कगार पर हैं। ऐसे में बगैर किसी आकलन के महज यातायात के लिए हिमालय की छाती खोदना किसी अनिष्टकारी  त्रासदी का आमंत्रण प्रतीत होता है .

मसूरी के वन विभाग को इस परियोजना की कोई जानकारी ही नहीं है . मसूरी की उप वन संरक्षक कहकंशां नसीम का कहना है कि उनके विभाग के पास अभी इसका कोई आधिकारिक पत्र आया नहीं हैं न ही उनसे इस परियोजना के पर्यावरणीय नुक्सान पर कोई जानकारी ली गयी . यह  एक ऐसे पहाड़ और वहाँ के वाशिंदों को खतरे में धकेलने जैसा है जिसे जोन-4 स्तर का अति भूकंपीय संवेदनशील इलाका खा जाता हो . जाहिर है कि इसके लिए पेड़ भी काटेंगे और हज़ारों जीवों के प्राकृतिक पर्यावास पर भी डाका डाला जायेगा . वैसे तो भारत सरकार का नियम यह कहता है कि इस तरह की किसी भी योजना की पहले  विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) बनायी जानी चाहिए जिसमें उसके पर्यावरणीय निक्साना और उसके निदान पर विमर्श हो. यह कार्य तो जंगल महकमे का होता है . मसूरी सुरंग योजना गवाह है कि इसके  पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की परवाह किये बगैर ही इसके लिए धन स्वीकृत कर दिया गया है.

यह बात कई सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है कि मसूरी के आसपास का इलाका भूस्खलन के मामले ने बहुत संवेदनशील है , यहाँ कि भूगर्भ संरचना में छेड़ करना या कोई निर्माण करना कहीं बड़े स्तर पर पहाड़  का मालवा न गिरा दे .सन 2010 में मसूरी की आईएएस अकादमी ने एक शोध में बता दिया था कि मसूरी के संसाधनों पर दबाव सहने की क्षमता चुक चुकी है.हिमालय के सम्वेदना से परिचित पर्यावरणविद मसूरी में सुरंग बनने को आत्म हत्या निरुपित कर रहे हैं क्योंकि मसूरी के पास फाड में बहुत बड़ी दरारें पहले से हैं , ऐसे में यदि वहाँ भारी मशीनों से ड्रिलिंग हुई तो परिणाम कितने भयावह होंगे? कोई  नहीं कह सकता .

इससे पहले सन 2014 में लोक निर्माण विभाग ने बाईपास पर चार सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें कार्ट मैकेंजी रोड से कैंपटी फॉल तक सुरंग बनाने की योजना थी . लोंबार्डी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने जांच भी की थी लेकिन पर्यावरणीय कारणों से उस परियोजना को शुरू नहीं किया जा सका था

ब्रितानी सरकार के दौर में हिंदुस्तान के कुछ राजे-रजवाड़ों ने वर्ष 1928  में अंग्रेजों के साथ मिलकर मसूरी-देहरा ट्रॉम-वे कंपनी बनाई थी। इस कंपनी ने 23 लाख रुपये की लागत से मसूरी के लिए रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था। वर्ष 1924 में एक सुरंग बनाते समय हाद्स्सा हो गया-- फिर स्थानीय किसानों को लगा कि रेल की पटरी से उनके बासमती के खेत और घने जंगल उजाड जायेंगे , बड़ा आंदोलन हुआ और उस परियोजना को अंग्रेजों  ने रोक दिया था .

इतने पुराने कटु अनुभवों के बाद भी सन 2020  में ही  राज्य सरकार ने गुपचुप  सुरंग की योजना पर काम करना शुरू कर दिया था, कोविड की पहली लहर के दौरान  जब सारे देश में काम-काज बंद थे तब इस योजना  की कागज तैयार कर लिए गए लेकिन स्थानीय प्रशासन की जानकारी के बगैर.  .उत्तराखंड में हिमालय की हर गैतिविधि के घन शोध में रत संस्था वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक  डॉ. विक्रम गुप्ता , भूस्खलन के विशेषग्य हैं और उनका कह्मना है कि का कहना है कि जमीन खिसकने के प्रति अति संवेदनशील मसूरी और उसके करीबी पहाड़ों में बगैर किसी जांच पड़ताल के इस तरह की योजना, वह भी बगैर किसी भूगर्भीय पड़ताल के, , बेहद चौंकाने वाली है . श्री गुपता बताते हैं कि देहरादून- मसूरी के इलाके में चूने की चट्टाने हैं जो सदियों से पानी को अवशोषित करती हैं और इन चट्टानों की पानी को ग्रहण करने की अपनी क्षमता होती है। ये चट्टाने कभी भी खिसकने लगती हैं और भूस्खलन की घटनाएं घट जाती हैं। इस लिहाज से तमाम पहलुओं को पहले अध्ययन किए जाने के बाद ही सुरंग पर काम हो . एक मोटा अनुमान है कि यदि यह योजना मूर्तरूप लेती है कि कोई ओक , देवदार जैसे तीन हजार ऐसे पेड़ काटेंगे जिनकी उम्र कई दशा कैन और जो नैसर्गिक जंगल का हिस्सा हैं .

वरिष्ठ राजनेता और पर्यावरण प्रेमी किशोर उपाध्याय का कहना है कि बगैर पर्यावरणीय मंजूरी, बगैर किसी तकनिकी परिक्षण के इस तरह बजट की घोषण अक्रना एक अपराध हैं , श्री उपाध्याय बताते हैं कि किस तरह  जब सन 1981 में अंधाधुंध चूना खुदाई से मसूरी एक कोढ़- कस्बा जीसस दिखने लगा था तब "सेव मसूरी सोसाईट" से जुड़े अव्देश कौशल, आदि इंदिरा गांधी से मिलने गए थे और इंदिराजी ने चूना खदानों पर रोक के आदेश दिए थे, टब उत्तर प्रदेश सरकार ने राजस्व हानि का वास्ता भी दिया था , श्री उपाध्याय कहते हैं कि मसूरी से थोड़ी भी पर्यावरणीय छेड़छाड़  बन्दर पूछ ग्लेशियर पर असर करेगी और यह अकेले उत्तरांचल ही नहीं देश के लिए भयावह होगा . इस तरह चोरी छुपे, सरकारी कायदों के बेपरवाही के साथ मसूरी जैसे स्थान के पर्यावरण के लिए खतरा बनने वाली सात  सौ करोड की परियोजना से स्थानीय नागरिक खुश नहीं हैं , कई संगठन इस पर विरोध  की योजना बना रहे हैं.

शुक्रवार, 18 जून 2021

The effect of the rising temperature of the earth is the fall of celestial lightning

 

धरती के बढ़ते तापमान का कुप्रभाव है आकाशीय बिजली का गिरना

पंकज चतुर्वेदी



इसकी शुरुआत बादलों के एक तूफ़ान के रूप में एकत्र होने से होती है । इस तरह बढ़ते तूफान के केंद्र में, बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े और बहुत ठंडी पानी की बूंदें आपस में टकराते हैं और इनके बीच विपरीत ध्रुवों के विद्युत कणों का प्रवाह होता है । वैसे तो धन और ऋण एक-दूसरे को चुम्बक की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किंतु वायु के एक अच्छा संवाहक न होने के कारण विद्युत आवेश में बाधाएँ आती हैं। अतः बादल की ऋणावेशित निचली सतह को छूने का प्रयास करती धनावेशित तरंगे भूमि पर गिर जाती हैं। चुनी धरती विद्युत की सुचालक है। यह बादलों की बीच की परत की तुलना में अपेक्षाकृत धनात्मक रूप से चार्ज होती है। तभी इस तरह पैदा हुई  बिजली का अनुमानित 20-25 प्रतिशत प्रवाह धरती की ओर हो जाता है।  भारत में हर साल कोई दो हज़ार लोग इस तरह बिजली गिरने से मारे जाते हैं, मवेशी और मकान आदि का भी नुक्सान होता है


 मानसून की आमद होते ही बीते एक सप्ताह में पश्चिम बंगाल में 27 लोगों की मौत बिजली गिरने से हो गयी , घायल कि संख्या भी 30 से पार है . राज्य के दक्षिणी हिस्से में हुगली में 11 और मुर्शिदाबाद में 09 लोग इस विपदा के शिकार हुए. मिदनापुर, बाँकुड़ा में भी मौत हुयीं, सटे हुए राज्य झारखण्ड में भी आकाशीय तड़ित की चपेट में आ कर दुमका और रामगढ़ में पांच  लोग मारे गये, बिहार के गया में  भी पांच की मौत आकाशीय बिजली से दर्ज की गयी, अभी दिनांक 09 अप्रैल 2021 को पूर्वांचल-उत्तर प्रदेश के दो जिलों- मिर्ज़ापुर व् भदोही  में बिजली गिरी और कोई तीन लोग मारे गये और कई घायल भी हुए . अचानक ही इतने बड़े स्तर पर बिजली गिरना और उसकी चपेट में इसानों का आना एक असामान्य घटना है .


जहाँ अमेरिका में हर साल बिजली गिरने से तीस, ब्रिटेन में औसतन तीन लोगों की मृत्यु होती है , भारत में यह आंकडा बहुत अधिक है- औसतन दो हज़ार . इसका मूल कारण है कि हमारे यहाँ आकाशीय बिजली के पूर्वानुमान और चेतावनी देने की व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है . आंकड़े गवाह हैं कि हमारे यहाँ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में बिजली गिरने की घटनाएँ ज्यादा होती हैं , सनद  रहे बिजली के शिकार आमतौर पर दिन में ही होते हैं , यदि तेज बरसात हो रही हो और बिजली  कडक रही हो तो ऐसे में पानी भरे खेत के बीच में, किसी पेड़ के नीचे , पहाड़ी स्थान पर जाने से बचना चाहिए . मोबाईल का इस्तेमाल भी खतरनाक होता है . पहले लोग अपनी इमारतों में ऊपर एक त्रिशूल जैसी आकृति लगाते थे- जिसे तड़ित-चालक कहा जाता था , उससे बिजली गिरने से काफी बचत होती थी , असल में उस त्रिशूल आकृति से एक धातु का मोटा तार या पट्टी जोड़ी जाती थी और उसे जमीन में गहरे गाडा जाता था ताकि आकाशीय बिजली उसके माध्यम से नीचे उतर जाए और इमारत को नुक्सान न हो .


यह समझना होगा कि इस तरह बहुत बड़े इलाके में एक साथ घातक बिजली गिरने का असल कारण धरती का लगातार बदल रहा तापमान है . यह बात सभी के सामने है कि आषाढ़ में पहले कभी बहुत भारी बरसात नहीं होती थी लेकिन अब ऐसा होने लगा है, बहुत थोड़े से समय में अचानक भारी बारिश हो जाना और फिर सावन-भादों सूखा जाना- यही जलवायु परिवर्तन की त्रासदी  है और इसी के मूल में बेरहम बिजली गिरने के कारक भी हैं । जैसे-जैसे जलवायु बदल रही है, बिजली गिरने की घटनाएँ ज्यादा हो रही हैं ।

एक बात और बिजली गिरना जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम तो है लेकिन अधिक बिजली गिरने से जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को भी गति मिलती है । सनद रहे बजली गिरने के दौरान नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है और यह एक घातक ग्रीनहाउस गैस है।हालांकि अभी दुनिया में बिजली गिरने और उसके जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव के शोध बहुत सीमित हुए हैं लेकिन कई महत्वपूर्ण शोध इस बात को स्थापित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने बजली गिरने के खतरे को बढ़ाया है इस दिशा  में और गहराई से कम करने के लिए ग्लोबल क्लाइमेट ऑब्जर्विंग सिस्टम (GCOS) - के वैज्ञानिकों ने  विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)  के साथ मिल कर एक विशेष शोध दल (टीटीएलओसीए) का गठन  किया है ।

धरती के प्रतिदिन बदलते तापमान का सीधा असर वायुमंडल पर होता है और इसी से भयंकर तूफ़ान भी बनते हैं । बिजली गिरने का सीधा सम्बन्ध धरती के तापमान से है जाहिर है कि जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है , बिजली की लपक उस और ज्यादा हो रही है । यह भी जान लें कि बिजली गिरने का सीधा सम्बन्ध बादलों के उपरी ट्रोपोस्फेरिक या क्षोभ-मंडल जल वाष्प, और ट्रोपोस्फेरिक ओजोन परतों से हैं और दोनों ही खतरनाक ग्रीनहाउस गैस हैं। जलवायु परिवर्तन के अध्ययन से पता चलता है कि भविष्य में यदि जलवायु में अधिक गर्माहट हुई तो गरजदार तूफ़ान कम लेकिन तेज आंधियां ज्यादा आएँगी और हर एक डिग्री ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती तक बिजली की मार की मात्रा 10% तक बढ़ सकती है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के वैज्ञानिकों ने मई 2018 में वायुमंडल को प्रभावित करने वाले अवयव और बिजली गिरने के बीच सम्बन्ध पर एक शोध किया जिसका आकलन था कि आकाशीय बिजली के लिए दो प्रमुख अवयवों की आवश्यकता होती है: तीनो अवस्था (तरल, ठोस और गैस) में  पानी और बर्फ बनाने से रोकने वाले घने बादल । वैज्ञानिकों ने 11 अलग-अलग जलवायु मॉडल पर प्रयोग किये और पाया कि भविष्य में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में गिरावट आने से रही और इसका सीधा  परिणाम होगा कि आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएँ बढेंगी ।

एक बात गौर करने की है कि हाल ही में जिन इलाकों में बिजली गिरी उमे से बड़ा हिस्सा धान की खेती का है और जहां धान के लिए पानी को एकत्र किया जता है, वहां से ग्रीन हॉउस गैस जैस मीथेन का उत्सर्जन अधिक होता है । जितना मौसम अधिक गर्म होगा, जितनी ग्रीन हॉउस गैस उत्सर्जित होंगी, उतनी ही अधिक बिजली, अधिक ताकत से धरती पर गिरेगी ।

“जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स” नामक ऑनलाइन जर्नल के मई-2020  अंक में प्रकाशित एक अध्ययन में अल नीनो-ला नीना, हिंद महासागर डाय  और दक्षिणी एन्यूलर मोड के जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव और उससे दक्षिणी गोलार्ध में बढ़ते तापमान के कुप्रभाव स्वरुप  अधिक आकाशीय विद्धुत-पात की संभावना पर प्रकाश डाला गया है ।

विदित हो मानसून में बिजली चमकना बहुत सामान्य बात है। बिजली तीन तरह की होती है- बादल के भीतर कड़कने वाली, बादल से बादल में कड़कने वाली और तीसरी बादल से जमीन पर गिरने वाली। यही सबसे ज्यादा नुकसान करती है। बिजली उत्पन्न करने वाले बादल आमतौर पर लगभग 10-12 किमी. की ऊँचाई पर होते हैं, जिनका आधार पृथ्वी की सतह से लगभग 1-2 किमी. ऊपर होता है। शीर्ष पर तापमान -35 डिग्री सेल्सियस से -45 डिग्री सेल्सियस तक होता है। स्पष्ट है कि जितना तापमान बढेगा , बिजली भी उतनी ही बनेगी व् गिरेगी

यह सारी दुनिया की चुनोती है कि कैसे ग्रीन हॉउस गैसों पर नियंत्रण हो और जलवायु में अनियंत्रित परिवर्तन पर काबू किया जा सके , वरना, समुद्री तूफ़ान, बिजली गिरना, बादल फटना जैसी भयावह त्रासदियाँ हर साल बढेंगी ।

रविवार, 13 जून 2021

Aravali saves existence due to court

 अदालत के बदौलत अस्तित्व बचाता अरावली

पंकज चतुर्वेदी 

सात जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट के ओदष के बाद फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में सूरजकुड से सटे खोरी गांव की


कोई साठ हजार आबादी का सोना-खाना सबकुछ छूट गया है। वहां बस डर है, अनष्चितता है और भविश्य का अंदेषा है। मानवीय नजरिये से भले ही यह बहुत मार्मिक लगे कि एक झटके में 80 एकड़ में फैले षहरी गांव के कोई दस हजार मकान तोडे जाने हैं व उसमें रहने वालों को कोई वैकल्पिक आवास व्यवस्था के अनुरोध को भी कोर्ट ने ठुकरा दिया। लेकिन यह भी कड़वा सच है कि राजस्थान के बड़े हिस्से, हरयाणा, दिल्ली और पंजाब को सदियों से रेगिस्तान बनने से रोकने वाले अरावली पर्वत को बचाने को यदि अदालत सख्त नाहो तो नेता-अफसर और जमीन माफिया अभी तक समूचे पहाड़ को ही चट कर गया होता। कैसी विडंबना है कि जिस पहाड़ के कारण हजारों किलोमीटर में भारत का अस्तित्व बचा हुआ है उसको बचाने के लिए अदालत को बार-बार आदेष देने होते हैं। जान लें सन 2016 में ही पंजाब -हरियाणा हाई कोर्ट अरावली पर अवैध कब्जा कर बनाई कालोनियों को ध्वस्त करने के आदेष दे चुका था, उसके बाद फरवरी-2020 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस ओदष को मोहर लगाई थी। प्रषासनिक अमला कुछ औपचारिकता करता लेकिन इस बार अदालत ने छह सप्ताह में वन भूमि पर से पूरी तरह कब्जा हटा कर उसकी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेष करने का सख्त आदेष देते हुए इसके लिए ुपलिस अधीक्षक को जिम्मेदार अफसर निरूपित किया है। 

यह भी समझना होगा कि अरावली के जंगल में अवैध कब्जा केवल खेरी गांव ही नहीं है, फरीदाबाद में ही हजारों फार्म हाउस भी हैं। पिछले साल लाॅक डाउन के दौरान गुरूग्राम के घाटा गांव में किला नंबर 92 पर कई डंपर मलवा डाल कर कुछ झुग्गियां डाल दी गई थीं। अरावली के किनारे समूचे मेवात में - नगीना, नूह, तावड़ू से तिजारा तक अरावली के तलहटी पर लोगों के अवैध कब्ज हैं और जहां कभी वन्य जीव देखे जाते थे अब वहा खेत-भवन हैं। 

अरावली पर कब्जे हटाने के लिए राज्य सरकारों की कभी ईमानदार मंषा नहीं रही तभी हरियाणा सरकार ने  तीन मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दे कर पर्यावरणीय मंजूरी सहित सभी वैधानिक अनुमति के अनुपालन के साथ अरावली पर्वतमाला में खनन फिर से शुरू करने की मांग की थी। सनद रहे सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई 2002 को अरावली में अवैज्ञानिक तरीके से हो रहे खनन कार्य पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब से हरियाणा से लगते अरावली क्षेत्र में खनन कार्य पूरी तरह बंद है। उसके बाद सन 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इको सेंसिटिव क्षेत्र में सभी प्रमुख और मामूली खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। जान लें कि दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान का अस्तित्व ही अरावली पर टिका है और यदि इससे जुड़ै सरंक्षण के कानूनों में थोड़ी भी ढील दी गई तो भले ही सरकारी खजाने में कुछ धन आ जाए लेकिन तय मानें कि हजारों हैक्टर के कृशि व हरियाली क्षेत्र रेगिस्तान मं बदेल जाएगा। यह भी याद करना जरूरी है कि  सन 2019 के 27 फरवरी को हरियाणा विधानसभा में जो हुआ था उसने अरावली के प्रति सरकारों की संवेदनहीनता जाहिर कर दी थी। बहाना था कि महानगरों का विकास करना है, इस लिए करोड़ों वर्श पुरानी ऐसी संरचना जो कि रेगिस्तान के विस्तार को रोकने से ले कर जैवविधिता संरक्षण तक के लिए अनिवार्य है, को कंक्रीट का जंगल रोपने के लिए खुला छोड़ दिया गया। सनद रहे सन 1900 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने पंजाब लैंड प्रीजर्वेशन एक्ट (पीएलपीए) के जरिए अरावली के एक बड़े हिस्से में खनन व निर्माण जैसी गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। 27 फरवरी को इसी एक्ट में हरियाणा विधानसभा ने ऐसा बदलाव किया कि अरावली पर्वतमाला की लगभग 60 हजार एकड़ जमीन षहरीकरण के लिए मुक्त कर दी गई। इसमें 16 हजार 930 एकड़ गुड़गांव में और 10 हजार 445 एकड़ जमीन फरीदाबाद में आती है। अरावली की जमीन पर बिल्डरों की शुरू से ही गिद्ध दृष्टि रही है। हालांकि एक मार्च को पंजाब भूमि संरक्षण (हरियाणा संशोधन) अधिनियम-2019 पर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए हरियाणा विधान सभा के प्रस्ताव के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेता दिया था कि यदि अरावली से छेड़छाड़ हुई तो खैर नहीं। हालांकि लगता है कि अरावली का अस्तित्व केवल अदालत के बदौलत ही बचा है। इससे पहले राजस्थान सरकार भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन रोकने को ले कर अदालत में बचती दिखी है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानि यूनेप की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाउ या हरियाली वाली जमीन  रेत के ढेर से ढक रही है औा इसका असर एक अरब लेागों पर पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले इलाकों से इतर है। बेहद हौले से और ना तत्काल दिखने वाली गति से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। इस बात पर बहुत कम लोग ध्यान देतें हैं कि भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीशण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है और यह हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसकी सुरक्षा का काम अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। विडंबना है कि बीते चार दषकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है। 

गुजरात के खेड ब्रह्म से षुरू हो कर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देष के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राश्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दषक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग षिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असर में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही। अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेष 07 मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में एमसी मेहता की जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई-कई ओदष आते रहे लेकिन दिल्ली में ही अरावली पहाड़ को उजाड़ कर एक सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रालय की बड़ी आवासीय कालोनी बना दी गई। अब जब दिल्ली में गरमी के दिनों में पाकिस्तान से आ रही रेत की मार व तपन ने तंग करना षुरू किया तब यहां के सत्ताधारियों को पहाड़ी की चिंता हुई। देष में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्ष है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराष-हताष से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।

सितंबर-2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया था कि वह 48 घंटे में अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए। दरअसल राजस्थान के करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था. इसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन को निषिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक, जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया. इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है, जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को मानता है तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चैंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है।

यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिषत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बामुष्किल सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए। सनद रहे अरावली  रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है। अरावली  की प्राकृतिक संरचना नश्ट होने की ही त्रासदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृश्णावति, दोहन जैसी नदियां अब लुप्त हो रही है। वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट की एक सर्वें रिपोर्ट बताती है कि जहां 1980 में अरावली क्षेत्र के महज 247 वर्ग किलोमीटर पर आबादी थी, आज यह 638 वर्ग किलोमीटर हो गई है। साथ ही इसके 47 वर्गकिमी में कारखाने भी हैं। 

सोहना से लेकर महेंद्रगढ़ की कई पहाड़ियां गायब

पिछले कुछ सालों के दौरान वैध एवं अवैध खनन की वजह से सोहना से आगे तीन पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। होडल के नजदीक, नारनौल में नांगल दरगु के नजदीक, महेंद्रगढ़ में ख्वासपुर के नजदीक की पहाड़ी गायब हो चुकी है। इनके अलावा भी कई इलाकों की पहाड़ी गायब हो चुकी है। रात के अंधेरे में खनन कार्य किए जाते हैं। सबसे अधिक अवैध रूप से खनन की शिकायत नूंह जिले से सामने आती है। पत्थरों की चोरी की शिकायत सभी जिलों में है।

वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर है लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षों पहले ही खरीद चुके हैं। वन संरक्षण कानून के कमजोर होते ही सभी अपनी जमीन पर गैर वानिकी कार्य शुरू कर देंगे। फिलहाल वे गैर वानिकी कार्य नहीं कर सकते। जहां पर वन संरक्षण कानून लागू होता है वहां पर सरकार से संबंधित विकास कार्य ही केवल किए जा सकते हैं। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के रहने के लिए इमारत तक नहीं बना सकते।


शुक्रवार, 4 जून 2021

Corona virus RNA in urban water body " A big threat to human kind


 

कोरोना वायरस का घर बन रहे हैं हमारे नदी-तालाब

 


गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.रमेश चंद्र दुबे अपने शोध से दावा कर चुके हैं कि कुंभ से गंगा में कोरोना वायरस की संभावना बढ़ गई है। उनका कहना है कि जल में कोरोना वायरस लंबे समय तक सक्रिय रहता है और जब मनुष्य उस जल में स्नान करता है तो वह उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। शोध कहता है कि कुंभ में कोरोना फैलाने का सबसे बड़ा कारण संक्रमित साधु-श्रद्धालु का गंगा में स्नान करना रहा। यह संक्रमण क्लेमसियाल निमोनी संक्रमण के साथ मिलकर और घातक साबित हुआ।
 


जब यह खबर सुर्खी बनी कि लखनऊ के सीवरेज में कोरोना वायरस  मिला है, तो हंगामा हो गया। वैसे, शहरों में मल-जल का लापरवाह निस्तारण व बढ़ते मेडिकल कचरे से परिवेश में इस वायरस के होने की संभावना पर दुनियाभर में काम हो रहा है। हैदराबाद की हुसैन सागर व अन्य शहरी झीलों में भी वायरस की जेनेटिक सामग्री मिली है। वैसा ही अध्ययन हैदराबाद के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाके की झीलों में भी हुआ लेकिन वहां यह नहीं मिला। जाहिर है शहर की गैर-शोधित गंदगी के सीधे झीलों में जाने का यह कुप्रभाव है। शोध में कहा गया है कि जो जेनेटिक मैटेरियल मिला हैवो वास्तविक वायरस नहीं। ऐसे में, पानी से चेहरे या मुंह से इंफेक्शन फैलने की गुंजाइश कम है।


काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्चइंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजीसेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी और एकेडमी ऑफ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च ने यह अध्ययन किया जिसमें सात महीने के दौरान भारत में कोविड की दोनों लहरों को कवर किया गया। इसके लिए हैदराबाद की हुसैन सागर और कुछ अन्य झीलों को चुना गया। हुसैन सागर के अलावा नाचारम की पेद्दा चेरुवु और निजाम तालाब में भी वायरस के मैटेरियल मिले। पता चला कि पानी में ये जेनेटिक मैटेरियल इसी साल फरवरी में बढ़ना शुरू हुए जब दूसरी लहर की शुरुआत हुई। ठीक इसी समय घाटकेसर के पास इदुलाबाद के अर्धशहरी इलाके व ग्रामीण अंचल की पोतुराजू झील में भी अध्ययन हुआ और वहां संक्रमण नहीं मिला।



मेडरक्सिव’ शोध पत्रिका में 12 मई को ‘‘ काम्प्रहेन्सिव एंड टेंपोरल सरलिेंस ऑफ सार्स एंड कोविड इन अरबन वाटर बॉडीज: अर्ली सिग्नल ऑफ सेकंड वेव ऑनसेट’’ शीर्षक रिपोर्ट में मनुपति हेमलताअथमकुरी तारकउदय किरण आदि वैज्ञानिकों के दल ने लिखा कि शोध के दौरान जब हैदराबाद की झीलों का अध्ययन किया गया तो पता चला कि कोविडग्रस्त लोगों के घरों व अस्पतालों के मल-जल के बगैर शोधित झीलों में जाने से यह संकट खड़ा हुआ।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.रमेश चंद्र दुबे अपने शोध से दावा कर चुके हैं कि कुंभ से गंगा में कोरोना वायरस की संभावना बढ़ गई है। उनका कहना है कि जल में कोरोना वायरस लंबे समय तक सक्रिय रहता है और जब मनुष्य उस जल में स्नान करता है तो वह उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। संक्रमित व्यक्ति यह संक्रमण तेजी अन्य लोगों में फैला सकता है। प्रो. दुबे का शोध कहता है कि कुंभ में कोरोना फैलाने का सबसे बड़ा कारण संक्रमित साधु-श्रद्धालु का गंगा में स्नान करना  रहा। यह संक्रमण क्लेमसियाल निमोनी संक्रमण के साथ मिलकर और घातक साबित हुआ। दुबे के मुताबिक गंगाजल के इन तीन संक्रमणों को जीवाणु विमोजी यानी बैक्टीरिया फाज नष्ट करता है। परंतु कुंभ में कोरोना संक्रमण को नष्ट करने का काम गंगाजल में मौजूद फाज क्यों नहीं कर पायाइस पर शोध चल रहा है।

इससे पहले अप्रैल महीने में ही रुड़की विश्वविद्यालय के वाटर रिसोर्स डिपार्टमेंट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप शुक्ला और उनके विभागाध्यक्ष डॉ. संजय जैन ने 12 सदस्यों के साथ ठहरे एवं बहते पानी में कोरोना वायरस की सक्रियता अवधि पर शोध किया था। दल का निष्कर्श था कि वायरस सूखे धरातल और धातु की तुलना में नमी और पानी में अधिक सक्रिय रहता है।




संजय गांधी मेडिकल कालेजलखनऊ का माइक्रोबायोलॉजी विभाग पानी में कोरोना वायरस का पता लगाने के लिए सीवेज सैंपल जुटा रहा है। लखनऊ के तीन जगहों से सैंपल लिए गए। लखनऊ में ऐसे तीन जगहें चुनी गईं जहां पूरे मोहल्ले का सीवेज एकसाथ गिरता है। पहला- खदरा का रूकपुरदूसरा- घंटाघर और तीसरा- मछली मोहाल का है। लैब में जांच में रूकपुर खदरा के सीवेज के पानी में वायरस पाया गया। मुंबई में भी ऐसा वायरस मिला है।

फरवरी-2021 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध बताता है कि यह तो कोविड की पहली लहर में भी झलकने लगा था कि जल निधियां कोरोना वायरस के खतरे से अछूती नहीं हैं। सार्स-कोविड-2: कोरोना वायरस इन वाटर एंड वेस्टवाटर: ए क्रिटिकल रिव्यू अबाउट प्रेजेंस एंड कन्सर्न’ में बताया गया है कि चीनजहां से यह शुरू हुआ वहां फौज के अस्पताल- 309 पीएलए और शायो देंग शान अस्पताल के सीवर में पिछले साल ही कोविड के जेनेटिक मटेरियल मिल चके थे और तब से सारी दुनिया में इसपर काम हो रहा था। चीन का दावा था कि 20 डिग्री तापमान पर यह सीवर में दो दिन और चार डिग्री पर 14 दिन सक्रिय रहता है। नीदरलैंड में भी एम्सट्रेडमडेन हैगयूत्रेयय सहित छह शहरों में ऐसा ही परीक्षण हुआ और वहां हवाईअड्डे के पास के सीवरेज में कोरोना के अंश मिले। इटली की लाम्ब्रो नदी में भी यह देखा गया। शोध कहता है कि दुनिया में सबसे पहले इक्वाडोर के क्योटो शहर की नदी में इसके अंष दिखे। यहां गंदा पानी सीधे नदी में डाला जाता है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि खासकर महानगरों के अस्पतालों और घर पर ही एकांतवास कर रहे लोगों के नहानेशौच आदि का पानी उसी नाली से बहा जहां से आम पानी जाता है। यह विषैला जल कैसे जल निधियों में मिल रहा हैउसके लिए दिल्ली के इस आंकड़े पर गौर करें। दिल्ली में औसतन हर दिन 3273 मिलियन लीटर (एममलडी) सीवर का निस्तार होता हैजबकि यहां कुल 2715 एममलडी क्षमता के परिशोधन सयंत्र हैं और इनकी काम करने की  ताकत 2432 एममलडी है। जाहिर है, करीब 800 एममलडी अशोधित जल नदी-तालाबों में मिल रहा है और इनमें संक्रमितों का मल-मूत्र भी है। फिर कोविड के कारण अस्पतालों से निकलने वाले संक्रमित कूड़े की मात्रा बहुत बढ़ गई है। कई अस्पतालों में इनके निबटान की व्यवस्था नहीं है। कई जगह ऐसा कचरा आम घर के कचरे के साथ ढोया जाता है और यह कड़वा सच है कि अधिकांश महानगरों में कूड़े की खंतियां भर गई है व सफाई वाले चोरी-छुपे कूड़े जलातें है या वीरान जल निधियों में ढकेल देते हैं। शोध के दौरान संक्रमित वयस्कों व बगैर लक्षण के कोविडग्रस्त बच्चों के मल के नमूने जांचे गए तो पता चला कि कोरोना वायरस इंसान के गेस्ट्रोइंटाइटिस ट्रैक अर्थात जठरांत्र मार्ग में जगह बना चुका है।

यदि लखनऊ खतरनाक हालत में समाहित हो गया तो मानवता का अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा। इंसान को नुकसान पहुंचाने की ताकत रखने वाला कोरोना वायरस-229 ई 23 डिग्री तापमान पर सात दिन तक पानी में सक्रिय रहता है। जरूरी है कि कोविड अस्पतालों के जल-मल का परिशोधन अस्पताल में ही हो।


 

पंकज चतुर्वेदी


renewal energy can be solution of coal base electric crisis

  वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत में है दम मुद्दा पंकज चतुर्वेदी  दिनों  देश में कोयले की कमी के चलते दमकती रोशनी और सतत विकास पर अंधियारा दिख रहा है।...