My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 30 मार्च 2022

If there is water, then be pure!

 जल हो तो निर्मल हो !

पंकज चतुर्वेदी


अभी गर्मी  शुरू ही हुई है और देश  के अलग-अलग हिस्सों से नलों में पानी के साथ  गंदगी व बदबू आने की शिकायतें आने लगीं। हरिद्वार में तो होली के अगले ही दिन घरों में ऐसा पानी आया
, जैसे कि सीवर का निस्तार हो। राजधानी के करीबी पष्चिम उ.प्र के सात जिलों में पीने के पानी से कैंसर से मौत का मसला जब गरमाया तो एनजीटी में प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक इसका कारण हैंडपंप का पानी पाया गया। अक्तूबर 2016 में ही एनजीटी ने नदी के किनारे के हजारों हैंडपंप बंद कर गांवों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था का आदेश  दिया था। कुछ हैंडपंप तो बंद भी हुए , कुछ पर लाल निषान की औपचारिकता हुई लेकिन विकल्प ना मिलने से मजबूर ग्रामीण वही जहर पी रहे हैं।

 अभी 4 मार्च को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बिहार सरकार को  नोटिस जारी कर पूछा है कि राज्य के 38 में से 31 जिलों में  लाखेां लोगो को  दूशित जल पिलाया जा रहा है जिससे वे गंभीर बीमार हो रहे हैं और हर एक नागरिक को स्वच्छ जल पाना उसका मानवाधिकार है। अतीत में झांकें तो केंद्र सरकार की कई योजनाएं, दावे और नारे फाईलों मेें तैरते मिलेंगे जिनमें भारत के हर एक नागरिक को सुरक्षित पर्याप्त जल मुहैया करवाने के सपने थे। इन पर अरबों खर्च भी हुए लेकिन आज भी  कोई करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं । अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद होते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रूपए का नुकसान होता है।


भारत के नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन सूचकांक से जाहिर हो गया है कि देश का विकास कहीं बाधित होगा तो वह होगा पानी की भीषण कमी से देश के 84 फीसदी ग्रामीण आबादी जलापुर्ति से वंचित है तो जो पानी उपलब्ध भी है तो उसमें से 7 प्रतिशत दूषित है।  इसके विपरीत देश की जल कुंडली एकबारगी देखें तो सभी गृह-नक्षत्र ठीक-ठाक घरों में ही बैठे दिखते हैं। देश में सालाना जल उपलब्धता 1869 अरब घन मीटर है इसमें से 1123 इस्तेमाल योग्य है।  लेकिन इन आंकड़ों का जब आगे विश्लेषण करते हैं तो पानी की बेतरतीब बर्बादी, गैरजरूरी इस्तेमाल, असमान वितरण जैसे भयावह तथ्य सामने आते हैं जो कि सारी कुंडली पर राहू का साये के मानिंद हैं।


हर घर जल  की केंद्र की येाजना इस बात में तो सफल रही है कि  गांव-गांव में हर घर तक पाईप बिछ गए, लेकिन आज भी इन पाईपों में आने वाला  75 प्रतिषत जल भूजल है । गौरतलब है कि ग्रामीण भारत की 85 फीसदी आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है।  एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है , दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है जो यदि दूशित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। यह संसद में बताया गया है कि करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं, इन्हें दांत खराब होने , हाथ पैरे टेड़े होने जैसे रोग झेलने पड़ रहे हैं।  जबकि करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में लोहे (आयरन) की ज्यादा मात्रा भी बड़ी परेशानी का सबब है।


नेषनल सैंपल सर्वे आफिस(एनएसएसओ) की ताजा 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश  में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी  मिल नहीं पा रहा है। देश  के महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है।  सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिषत बुरी तरह प्रदूशित है।  यह सरकार स्वीकार रही है कि 78 फीसदी ग्रामीण और 59 प्रतिषत षहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं। है। यह भी विडंबना है कि अब तक हर एक को पानी पहुंचाने की परियोजनाओं पर 89,956 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद, सरकार परियोजना के लाभों को प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45053 गाँवों को नल-जल और हैंडपंपों की सुविधा मिली है, लेकिन लगभग 19000 गाँव ऐसे भी हैं जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है।


पूरी दुनिया में, खासकर विकासशील देशों जलजनित रोग एक बड़ी चुनौती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ का अनुमान है कि अकेले भारत में हर रोज 3000 से अधिक लोग दूषित पानी से उपजनेे वाली बीमारियों का शिकार हो कर जान गंवा रहे हैं।  गंदा पानी पीने से दस्त और आंत्रशोथ, पेट में दर्द और ऐंठन, टाइफाइड, हैज़ा, हेपेटाइटिस जैसे रोग अनजाने में शरीर में घर बना लेते हैं।


यह भयावह आंकड़े सरकार के ही हैं कि भारत में करीब 1.4 लाख बच्चे हर साल गंदे पानी से उपजी बीमारियों के चलते मर जाते हैं। देश के 639 में से 158 जिलों के कई हिस्सों में भूजल खारा हो चुका है और उनमें प्रदूषण का स्तर सरकारी सुरक्षा मानकों को पार कर गया है। हमारे देश में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले तकरीब 6.3 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी तक मयस्सर नहीं है। इसके कारण हैजा, मलेरिया, डेंगू, ट्रेकोमा जैसी बीमारियों के साथ-साथ कुपोषण के मामले भी बढ़ रहे हैं।

पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसी एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आईएमआईएस) द्वारा सन 2018 में पानी की गुणवत्ता पर करवाए गए सर्वे के मुताबिक राजस्थान में सबसे ज्यादा 19657 बस्तियां और यहां रहने वाले 77.70 लाख लोग दूषित जल पीने से प्रभावित हैं। आईएमआईएस के मुताबिक पूरे देश में 70736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं। इस पानी की उपलब्धता के दायरे में 47.41 करोड़ आबादी आ गई है।

देश  के पेय जल से जहर के प्रभाव को शून्य  करने के लिए जरूरी है कि पानी के लिए भूजल पर निर्भरता कम हो और नदी-तालाब आदि सतही जल में गंदगी  मिलने से रोका जाए। भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन भूजल को दूशित करने वालों पर अंकुश  के कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं । यह अंदेशा  सभी को है कि आने वाले दशकों में पानी को ले कर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी ।

 

मंगलवार, 29 मार्च 2022

Missing musk deer

  

गायब होता कस्तूरी मृग

पंकज चतुर्वेदी

 

 वह एक मूक प्राणी है, अपनी सुरक्षा के लिए उसके पास सींग तक नहीं - ऊपर से प्रकृति ने उसकी नाभि में खुशबु का ऐसा खजाना दे दिया जो कई किलोमीटर दूर से उसकी उपस्थिति  का एहसास करवा देता है और यही खुशबु उसकी बैरन बन गई है।  कस्तूरी मृग हिमालयी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश की चम्बा घाटी से लेकर सिक्किम तक पाये जाते हैं । कस्तूरी केवल नर मृग में ही पाया जाता है । कस्तूरी के औषधीय व प्रसाधन महत्व के कारण बड़े पैमाने पर इन मृगों का अवैध शिकार हुआ है ,जिसके परिणामस्वरूप यह विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं । आईयूसीएन यानी इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर द्वारा जारी लाल सूची या  रेड लिस्ट में दर्ज इसको दुर्लभ प्राणी माना गया है।

 


कस्तूरी मृग उत्तराखंड राज्य का पशु है । कस्तूरी मृग के प्राकृतिक संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय  संघ के सहयोग से वर्ष 1970 के दशक में उत्तराखण्ड के केदारनाथ अभयारण्य में कस्तूरी मृग परियोजना की शुरूआत की गयी । कस्तूरी मृग के लिए हिमाचल प्रदेश का शिकारी देवी अभयारण्य तथा उत्तराखण्ड का बद्रीनाथ अभयारण्य प्रसिद्ध है । धरती पर कस्तूरी मृग की 4 प्रजातियां पाई जाती हैं यह चारों प्रजातियां रूस, चीन, नेपाल सीमा और भारत के दक्षिण हिमालय में पाई जाती हैं ।  भारत में गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में यह बड़ी संख्या में मिलता है। इसकी संभावना है कि आने वाले पांच सालों में  बगैर सींग वाला  एक छोटा सा हिरण भारत में शायद एक भी ना बचे। फिलहाल पाकिस्तान और अफ्गानिस्तान में यह पूरी तरह समाप्त हो चुका  है।

यह भले ही एक सामान्य हिरन या मृग जैसा दिखता हो लेकिन यह कई मायनों में अन्य  हिरणों से बहुत अलग है। इसका जीवन चक्र, खानपान व शारीरिक विशेषताएं सामान्य हिरन से बहुत अलग हैं। जैसे सभी हिरन जहां झुण्ड में रहते हैं वहीं कस्तूरी मृग एकान्तप्रिय है । यह  कुछ खास किस्म की जड़ी बूटियां, पत्ते व घास ही खाता है । ऊंचे बर्फीले पहाड़ों पर पाए जाने वाले इस मृग की केवल नर प्रजाति की नाभि के निकट एक नींबू के आकार की गांठ होती है जिसमें खुशबूदार  कस्तूरी विकसित होती है।  कुदरत ने जानवर को जनन प्रक्रिया को सामान्य बनाए रखने के लिए खुशबू का उपहार दिया ,लेकिन यही खुशबू इसके लिए मौत का पैगाम लेकर आती है। उल्लेखनीय है कि केवल प्रजनन प्रक्रिया के लिए मादा मृग इसकी सुगंध से आकृष्ट होती है और वह कुछ ही समय नर के साथ रहती है, फिर ये दोनों अलग हो कर स्वतंत्र रहते हैं। मादा कस्तूरी के गर्भधारण अवधि छ माह की होती है। अकेले रहने, दौड़ने में बहुत चपल ना होने के कारण जंगल में भी इनका शिकार अन्य जंगली जानवर या अवैध शिकारी सहजता से कर लेते हैं।

इस विलक्ष्ण जानवर की जान की दुश्मन बन गयी खुशबु का इस्तेमाल कुछ दवाएं और परफ्यूम बनाने में होता है । यह मृग  भारत में हिमालय के अलावा कश्मीर और सिक्किम में भी है मिलता है । कस्तूरी का औषधि उद्योग में  प्रयोग दमाए मिर्गीए हृदय संबंधी रोग और दवाई बनाने में प्रयोग किया जाता है।

आज एक  किलो कस्तूरी की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 45000  अमेरिकी डॉलर है। कस्तूरी विश्व का बेशकीमती उत्पाद है। इत्र का परंपरागत व्यवसाय करने वाला यूरोपीय देश फ़्रांस इसका प्रमुख खरीदार हैं । एक  किलो कस्तूरी के लिए 80 हिरणों को मारा जाता है। कस्तूरी मृग से कस्तूरी 3 से 4 वर्ष के अंतराल 30 से 45 ग्राम तक प्राप्त किया जा सकता है । चीन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कस्तूरी की पूर्ति करने वाला मुख्य देश है। चीन की रूस से लगने वाली सीमा पर यह बहुतायत पाया जाता था लेकिन बेरहमी से हुए शिकार ने वहां भी इसे दुर्लभ बना दिया ।  अकेले जापान को हर साल 250 किलोग्राम कस्तूरी की जरूरत होती है और इसके लिए 20000 से अधिक मृगों को मारना होता है।  यह भी कटु सत्य है कि कस्तूरी किसी ग्राहक को मूल शुध्ध अवस्था में मिलता नहीं है, इसमें कुछ ना कुछ मिलावट होती ही है।

उत्तराखंड राज्य के इनकी थोड़ी सी आबादी जंगलों में  केदारनाथ, फूलों की घाटी, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी में 3600 से 4400 मीटर की ऊंचाई पर बची है। यह भूरे रंग का होता है और  काले पीले रंग के धब्बे पाए जाते हैं । इसके पैरों में चार खुर , बाहर निकले दांत और यह लगभग 20 इंच या लंबा होता है। कस्तूरी मृग की औसतन आयु लगभग 20 वर्ष की होती हैं उत्तराखंड में कस्तूरी मृग की चार  प्रजातियां पाई जाती हैं ।

 कस्तूरी मृग संरक्षण के लिए 1972 में केदारनाथ वन्य जीव विहार के अंतर्गत कस्तूरी विहार की स्थापना की गई ।महरूडी कस्तूरी मृग अनुसंधान की स्थापना 1977 में की गई थी। सर्वाधिक मात्रा में कस्तूरी मृग अस्कोट वन्य जीव अभ्यारण में पाए जाते हैं ।चमोली  जिले के कंचुला खर्क में 1982 को कस्तूरी में प्रजनन व संरक्षण केंद्र की स्थापना की गई थी ।राज्य में 2005 तक 279 कस्तूरी में पाए गए थे। सन 2008 में यह  लगभग 376  रह गयी वह भी  इसके लिए संरक्षित पार्क में ही ।

बेरोकटोक शिकार के कारण इस भोले.भाले जीव की संख्या तेजी से घट रही है इंडियन वाइल्डलाइफ बोर्ड ने 1952 में ही देश के उन 12 वन्य प्राणियों में कस्तूरी मृग को प्रमुख रूप से शामिल किया था जिसकी नस्ल  धीरे.धीरे समाप्त हो रही है।  इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तथा देश के जागरूक पर्यावरण ने इस संकट की ओर ध्यान खींचा तब कस्तूरी मृग की बात उच्च स्तर पर उठने लगी। 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्ट के पास होते ही इस जीव को शुरू हुई इस कानून के तहत कस्तूरी मारना अपने पास रखना खरीदना या बेचना दंडनीय अपराध माना गया मादा कस्तूरी के गर्भधारण अवधि छ माह की होती है। कस्तूरी संरक्ष्ण के मकसद से उत्तर प्रदेश सरकार ने गढ़वाल हिमालय में 9672 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इस वर्ग के संरक्षण का राष्ट्रीय पार्क 1972 शुरू किया यह दोनों क्षेत्र चमोली जनपद में विश्व विख्यात बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के ठीक बीच में है। गोपेश्वर से 32 किलोमीटर दूर स्थित काछोला खर्क कस्तूरी मृग के प्रजनन का स्थल बनाया गया। इतना होते हुए भी लापरवाही, पशु डॉक्टर के ना होने व अन्य कारणों से अभी तक इन केंद्रों में कस्तूरी मृग की संख्या बढ़ नहीं पा रही है ।

 

revival of sahibi River will change ecology of Delhi NRC

 साहबी नदी को जिंदा करना  ही होगा

पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली से सटा गुरूग्राम अभी चार दशक पहले तक गुड़गांव के नाम से एक छोटा सा कस्बा ही था। 90 के दशक में दिल्ली


में व्यापारिक गतिविधियां  तेज हुई, दिल्ली में जमीन की कीमतें बढ़ीं और दिल्ली से जयपुर के लिए चौड़ा हाईवे बना  तो गुरूग्राम एक आदर्श शहर  के रूप में उभरा। गगनचुंबी इमारतें, दुनिया की सभी साईबर कंपनियों के दफ्तर और दूर राजस्थान की सीमा तक फैला औद्योगिक क्षेत्र। दुनिया में इसे ‘‘साईबर सिटीकहा जाने लगा और रियल एस्टेट के लिए हॉट स्पॉट।  लेकिन यहाँ बरसात होने पर  16  लेन  चौड़ी सड़कों पर कई कई किलोमीटर लम्बा जाम  हमारे विकास के छद्म दावे की पोल खोलता है .यहाँ आठ घंटे तक बीस किलोमीटर के जाम हर साल की त्रासदी हैं . जब लोग सड़कों पर जमा पानी में ही फंसते हैं तो कोई पुरानी सरकार पर ठीकरा फोड़ता है तो कोई दिल्ली पर तो कोई मौजूदा सरकार को। असल में इस जाम का कारण गुड़गांव की बेशकीमती जमीन और उसको हड़पने के लोभ में हडप़ी गई वह नदी  हैं जो असल में अधिकतम बरसात में भी पानी को अपने में समा कर नजफगढ़  झील तक ले जाने का प्राकृतिक रास्ता हुआ करती थीं।

दिल्ली सरकार के नए बजट में एक संकल्प है कि साहबी नदी को पुनर्जीवित किया जाएगा .अभी डेढ दशक पहले तक एक नदी हुआ करती थी- साहबी या साबी नदी । जयपुर जिले के सेवर की पहाड़ियों  से निकल कर कोटकासिमत के रास्ते धारूहेड़ा के रास्ते। बहरोड़, तिजारा , पटौदी, झझ्झर के रास्ते नजफगढ़ झील तक आती थी यह नदी। इस नदी का प्रवाह नए गुरूग्राम में घाटा, ग्वालपहाड़ी, बहरामपुर, मेरावास, नंगली होते हुए बादशाहपुर तक था। कई जगह नदी का पाट एक एकड़ तक था। जान कर आश्चर्य होगा कि इस नदी का गुरूग्राम की सीमा में कोई राजस्व रिकार्ड ही नहीं रहा।  अभी सन 2010 में  हरियाणा विकास प्राधिकरण यानि हुडा ने नदी के जल ग्रहण क्षेत्र को आर जोन में घोषित  कर दिया। इससे पहले यहां नदी के रीवरबेडकी जमीन कुछ किसानों के नाम लिखी थी। आर जोन में आते ही पचास लाख प्रति एकड़ की जमीन बिल्डरों की निगाह में आई औ इसके दाम पंद्रह करोड़ एकड हो गई।  जहां नदी थी, वहां सेक्टर 58 से ले कर सेक्टर 65 की कई कालेनियां व बहुमंजिला आवास तन गए। अब बरसात तो पहले भी होती थी और उसका पानी इस नदी के प्रवाह के साथ नजफगढ़ के विशाल जल-क्षेत्र में समा जाता था।, जब नदी के रास्ते में भवन बन गए तो पानी भवनों के करीब ही जमा होना लाजिमी है। थोडी सी बरसात में ही गुरूग्राम के पानी-पानी होने और और फिर सालभर बेपानी रहने का असल कारण केवल साबी नदी का लुप्त होना मात्र है.

 

आज दिल्ली के भूजल के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बना नजफगढ़ नाला कभी जयपुर के जीतगढ़ से निकल कर अलवर, कोटपुतली, रेवाड़ी व रोहतक होते हुए नजफगढ़ झील व वहां से दिल्ली में यमुना से मिलने वाली साबी, साहिबी या रोहिणी नदी हुआ करती थी । इस नदी के जरिये नजफगढ़ झील का अतिरिक्त पानी यमुना में मिल जाया करता था। सन 1912 के आसपास दिल्ली  के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ आई व अंग्रेजी हुकुमत ने नजफगढ़ नाले को गहरा कर उससे पानी निकासी की जुगाड़ की। उस दौर में इसे नाला नहीं बल्कि ‘‘नजफगढ लेक एस्केपकहा करते थे। इसके साथ ही नजफगढ झील के नाबदान और प्राकृतिक नहर के नाले में बदलने की दुखद कथा शुरू हो गई। सन 2005 में ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोउर् ने नजफगढ नाले को देश के सबसे जयादा दूषित 12 वेट लैंड में से एक निरूपित किया था। आज लोग कहते हैं कि पानी उनके घर-सडक में घुस गया जबकि मौन नदी कहती है कि वह तो जब संपन्न  हुई तो अपने घर लौटी है .

आज भी समान्य बारिश की हालत में नजफगढ़ झील में 52 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में पानी भरता है।  कभी इस झील के रखरखाव के लिए सरकार द्वारा प्राधिकृत इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट, कल्चर  एंड  हेरीटेज(इनटेक) इस झील पर आवासीय प्रोजेक्ट  स्वीकृत करने के खिलाफ एनजीटी गया था तो हरियाणा सरकार ने अपने हलफनामें में कहा कि नजफगढ झील नहीं है बल्कि बारिश के अतिरित जल के जमा होने का निचला हिस्सा मात्र है। इस पर न्यायाधीश ने सरकार से ही पूछ लिया कि यदि यह झील नहीं है तो आखिर झील किसे कहेंगे।

कभी नजफगढ़ झील से अरावली की सरिताओं से आए पानी का संकलन और यमुना में जल स्तर बढ़ने-घटने पर पानी का आदान-प्रदान होता था। जब दिल्ली में यमुना ज्यादा भरी तो नजफगढ़ में उसका पानी जमा हो जाता था। जब यमुना में पानी कम हुआ तो इस वेट लैंड का पानी उसे तर रखता था। एनजीटी ने फिर दिल्ली व हरियाणा सरकार को नजफगढ़ के पर्यावरणीय संरक्षण की योजना पेश  करने की याद दिलाई। दिल्ली ने योजना तो बनाई लेकिन अमल नहीं किया, वहीं हरियाणा  ने योजना तक नहीं बनाई।

साहबी नदी कि जिलाने की अनिवार्यता पर विचार करते समय एक वैश्विक  त्रासदी को ध्यान में रखना जरूरी है - जलवायु परिवर्तन। साहबी केवल जल का जरिया नहीं है , यह उस अरावली की हरियाली और नमी को सहेजने के लिए भी जरुरी है जो पाकिस्तान की तरफ से आने वाले रेतीली गर्म हवाओं को रोकता है और मौसमी संतुलन बनाए रखता है . साहबी से यदि नजफगढ़ जील के जरिये यमुना में साफ़ पानी का वागमन शुरू हो गया तो जान लें दिल्ली की पानी के लिए दीगर राज्यों पर निर्भरता कम होगी , गुरुग्राम में  बरसात में जल जमाव से मुक्ति मिलेगी और वहां का भू जल स्तर भी सुधरेगा . बस संकट यही है कि  साहबी को पुराना स्वरुप देने के लिए तीन राज्यों – राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में सामंजस्य कैसे हो ? खासकर नदी के नैसर्गिक रास्तों में बन गये बेजा निर्माण को हटाने और अरावली से यमुना तक अविरल धारा  में आये कथित “विकास” से कैसे निजात मिलेगी .

शुक्रवार, 25 मार्च 2022

save the traditional water saving system

 पानी बचाना है तो बचांए पारंपरिक जल-प्रणालियां

पंकज चतुर्वेदी

कोई साल बारिश का रूठ जाना तो कभी ज्यादा ही बरस


जाना हमारे देष के लिए नियति है। थोड़ा ज्यादा बरसात हो जाए तो उसके समेटने के साधन नहीं बचते और कम बरस जाए तो ऐसा रिजर्व स्टॉक नहीं दिखता जिससे काम चलाया जा सके। अनुभवों से यह तो स्पष्ट है कि भारीभरकम बजट, राहत, नलकूप जैसे षब्द जल संकट का निदान नहीं है। करोड़ों-अरबों की लागत से बने बंाध सौ साल भी नहीं चलते, जबकि हमारे पारंपरिक ज्ञान से बनी जल संरचनांए  ढेर सारी उपेक्षा, बेपतवाही के बावजूद आज भी पानीदार हैं। जलवायु परिवर्तन के खतरे के सामने आधुनिक इंजीनियरिंग  बेबस है । यदि भारत का ग्रामीण जीवन और खेती बचाना है तो बारिष की हर बूंद को सहेजने के अलावा और कोई चारा नहीं है। यही हमारे पुरखों की रीत भी थी। 

बुंदेलखंड में करोड़ों के राहत पैकेज के बाद भी पानी की किल्लत के चलते निराषा, पलायन व बेबसी का आलम है। देश के बहुत बड़े हिस्से के लिए अल्प वर्शा नई बात नही है और ना ही वहां के समाज के लिए कम पानी में गुजारा करना, लेकिन बीते पांच दषक के दौरान आधुनिकता की आंधी में दफन हो गए हजारों चंदेल-बुंदेला कालीन  तालाबों  और पारंपरिक जल प्रणालियों के चलते यह हालात बने। 

मप्र के बुरहानपुर शहर की आबादी तीन लाख के आसपास है। निमाड़ का यह इलाका पानी की कमी के कारण कुख्यात है , लेकिन आज भी शहर में कोई अठारह लाख लीट पानी प्रतिदिन एक ऐसी प्रणाली के माध्यम से वितरित होता है जिसका निर्माण सन 1615 में किया गया था। यह प्रणाली जल संरक्षण और वितरण की दुनिया की अजूबी मिसाल है, जिसे ‘भंडारा’ कहा जाता है। सतपुड़ पहाड़ियों से एक-एक बूंद जल जमा करना और उसे नहरों के माध्यम से लोगों के घ्एरों तक पहुंचाने की यह व्यवस्था मुगल काल में फारसी जल-वैज्ञानिक तबकुतुल अर्ज ने तैयार की थी। समय की मार के चलते दो भंडारे पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। सनद रहे कि हमारे पूर्वजांे ने देष-काल परिस्थिति के अनुसार बारिष को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। हरियाणा से मालवा तक जोहड़ या खाल जमीन की नमी बरकरार रखने की प्राकृतिक संरचना हैं। ये आमतौर पर वर्शा-जल के बहाव क्षेत्र में पानी रोकने के प्राकृतिक या कृत्रिम बांध के साथ छोटा तालाब की मानिंद होता है। तेज ढलान पर तेज गति से पानी के बह जाने वाले भूस्थल में पानी की धारा को काटकर रोकने की पद्धति ‘‘पाट’’ पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रही है। एक नहर या नाली के जरिये किसी पक्के बांध तक पानी ले जाने की प्रणाली ‘‘नाड़ा या बंधा’’ अब देखने को नहीं मिल रही है। कुंड और बावड़िया महज जल संरक्षण के साधन नहीं,बल्कि हमारी स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना रहे हैं।  आज जरूरत है कि ऐसी ही पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के लिए खास योजना बनाई जाए व इसकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की ही हो। 

यह देष-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्शा, मरूस्थल, जैसी विशमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं- यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुष्तैनी घरों- पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं। बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ।  हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेषी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देष के कस्बे-षहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था। 

राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नगालेंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराश्ट्र में पैट, उत्तराखंड में गुल, हिमाचल प्रदेष में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और अब आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है। गुजरात के कच्छ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिष की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिष भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो षाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि षाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए।

तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिले में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अंतर्श्रखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बंुदेलखंड में भी पहाडी के नीचे तालाब, पहाडी पर हरियाली वाला जंगल और एक  तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीेचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाके की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है। वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कालोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो  पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताष रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है। 

भारत में हर साल कोई 40 करोड हेक्टेयर मीटर पानी मिलता है । उसका खर्च तीन प्रकार से होता है: सात करोड़ हेक्टेयर मीटर भाप बन कर उड़ जाता है, 11.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर नदियों आदि से बहता है, षेश 21.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर जमीन में जज्ब हो जाता है। फिर इन तीनों में लेन-देन चलता रहता है । जमीन में जज्ब होने वाले कुल 21.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी में से 16.5 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिट्टी की नमी बनाए रखता है और बाकी पांच करोड़ हेक्टेयर मीटर जल भूमिगत जल स्त्रोतेां में जा मिलता है । पिछले कुछ सालों के दौरान पेड़ों की कटाई अंधाधुंध हुई, सो बारिष का पानी सीधे जमीन पर गिरता है और मिट्टी की ऊपरी परत को काटते हुए बह निकलता है । इससे नदियों में मिट्टी अधिक पहुंचने के कारण वे उथली तो हो रही है, साथ ही भूमिगत जल का भंडार भी प्रभावित हुआ है । इसके विपरीत नलकूप, कुंओं आदि से भूमिगत जल का खींचना बेतरतीब बढ़ा है ।

सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई  और देष की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देष के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे । मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा , कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  । शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है ।


यदि देष की महज पांच प्रतिषत जमीन पर पांच मीटर औसत गहराई में  बारिष का पानी जमा किया जाए तो पांच सौ लाख हैक्टर पानी की खेती की जा सकती है। इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी प्रति व्यक्ति पूरे देष में दिया जा सकता है।  और इस तरह पानी जुटाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारंपरिक जल प्रणालियों को खेाजा जाए, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मान दिया जाए और एक बार फिर समाज को ‘‘पानीदार’’ बनाया जाए। यहां ध्यान रखना जरूरी है कि आंचलिक क्षेत्र की पारंपरिक प्रणालियों को आज के इंजीनियर षायद स्वीकार ही नहीं पाएं सो जरूरी है कि इसके लिए समाज को ही आगे किया जाए। 

सनद रहे कि हमारे पूर्वजांे ने देष-काल परिस्थिति के अनुसार बारिष को समेट कर रखने की कई प्रणालियां विकसित व संरक्षित की थीं, जिसमें तालाब सबसे लोकप्रिय थे। घरों की जरूरत यानि पेयजल व खाना बनाने के लिए मीठे पानी का साधन कुआं कभी घर-आंगन में हुआ करता था। धनवान लोग सार्वजनिक कुएं बनवाते थे। जल संचयन के स्थानीय व छोटे प्रयोगों से जल संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका व जागरूकता दोनों बढे़गेी, साथ ही इससे भूजल का रिचार्ज तो होगा ही जो खेत व कारखानों में पानी की आपूर्ति को सुनिष्चित करेगा।




How congress lost battel in Uttra pradesh

 उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की दुर्गती क्यों

पंकज चतुर्वेदी

 


उत्तर प्रदेश में यदि सबसे महंगे वोट किसी को पड़े तो कांग्रेस को—जितना खर्च,  समय और संसाधन लगाये गए , उसके मुताबिक़ शायद  एक वोटर  दस हज़ार से ज्यादा का पड़ा . 62 सीटों पर तो कांग्रेस के उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिले. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सालों बाद जमींन पर दिखी थी लेकिन उसकी पराजय ने सालों का रिकार्ड तोड़ दिया महज सवा दो फीसदी वोट मिले . लड़की हूँ लड़ सकती हूँ अभियान की आगरा, मेरठ, झाँसी, लखनऊ आदि में आयोजित दौड़, चित्रकूट और अन्य कई जगह संपन्न महिला सम्मलेन में आई औरतों- लड़कियों के संख्या से भी कम ---- प्रियंका गांधी ने तीन साल से यूपी में मेहनत की हर मुद्दे चाहे सोनभद्र में उम्मा गोलीकांड हो या फिर कोविड में लोगों को घर पहुँचाने या हाथरस या उससे पहले मुस्लिम लोगों की चिंता वाला सी ए ए आन्दोलन- हर जगह प्रियंका दिखीं फिर भी वोट नहीं मिले सीट की बात जाने दें ---.  पता नहीं कांग्रेस अभी भी इसका आकलन किसी इवेंट मेनेजमेंट कम्पनी की तरह कर रही है या  राजनितिक दल की तरह .

 उन्नाव विधानसभा क्षेत्र को ही लें - वहीं कांग्रेस ने आशा सिंह पर दांव खेला. आशा सिंह उन्नाव रेप पीड़िता की मां हैं. यहां से कांग्रेस प्रत्याशी आशा सिंह को 1544 वोट मिले. अब जरा उस प्रोपेगेंडा को याद करें कि आशा सिंह के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने उम्मीदवार उतारने से मना कर दिया . जबकि हकीकत यह थी कि वहां 10 उम्मीदवार मैदान में थे. समाजवादी पार्टी की ओर से अभिनव कुमार और बसपा से देवेंद्र सिंह  और भारतीय जनता पार्टी ने यहां से पंकज गुप्ता को उतारा. पंकज को यहां 126303 वोट मिले हैं. वहीं समाजवादी पार्टी के अभिनव कुमार को 94743 वोट मिले.  हलाल हो गया की आशा देवी के खिलाफ किसी ने उम्मीदवार उतारा  नहीं लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और कई कांग्रेसी इस ट्रेप में फंस गए जिसे शातिर तरीके से संघ ने बिछाया था , यह सन्देश देने को कि वोट कांग्रेस को दो या सपा को एक ही जगह जाएगा और इसका असर आगे चल कर कांग्रेस के लिए नुकसानदेह रहा .


यूपी में कांग्रेस ने ब्लोक लेबल तक टीम बनाई थी योजना के अनुसार टीम को हर दिन कुछ गाँवों में जाना था , महिला- लड़कियों से सम्पर्क आकर लड़की हूँ लड़ सकती हूँ केम्पेन की जानकारी और हाथ में पिंक कलर का सिलिकोन बेंड बाँधना था बहुत सारी जगह यह कम हुआ भी जाहिर है कि कांग्रेस की गाँव गाँव तक औरतो तक पहुँचने की योजना भ्रष्ट,निकम्मे और गणेश परिक्रमा के आदी कांग्रेसी कागजों से आगे ले नहीं जा पाए ?

बनारस की जाग्रति राही और उनकी टीम जिलों में जा जा कर प्रशिक्षण कर रही थी चुनाव केम्पेन में सभा, सम्पर्क आदि में भीड़ भी आई और स्थानीय कवरेज भी हुआ फिर आखिर वोट कौन से को -को गई ?


शर्मनाक हार और उससे पहले भी कांग्रेस में संदीप सिंह ,मोहित पांडे आदि की टीम पुराने कांग्रेसियों के निशाने पर रही दुर्व्यवहार , पुराने कांग्रेसियों कि उपेक्षा , टिकट के लिए पैसे लेने , प्रचार सामग्री और सिस्टम का पैसा हडप जाने जैसे आरोप लगते रहे कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने वाले वी पी सिंह का फोटो अपनी प्रोफाइल में लगाने वाले कांग्रसी सोशल मीडिया पर आरोप लगाते रहे लेकिन कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाए केवल पद नाम के भूखे जिन सामंत किस्म के कांग्रेसियों को पद हीन कर दिया गया था वे इस केम्पेन में आगे रहे सवाल यही है कि जब संदीप आदि नहीं थे तो पुराने कांग्रेसियों ने ऐसा क्या कर डाला था कि कांग्रेस का प्रभाव बढ़ा ? जाहिर है कि पुराने कांग्रेसी निष्क्रिय थे तभीलाल सलाम टीम को लाना पड़ा बिहार में भी शकील अहमद दो बार से विधायक हैं और वे इसी जे एन यू अध्यक्ष से "लाल सलाम" से थे यह कोई नई या बड़ी बात नहीं है साम्यवादी विचारधार के लोग कांग्रेस में आते जाते रहे हैं --- लेकिन यह टीम भी जमीनी बदलाव क्यों नहीं ला पाई ?

पंकज श्रीवास्तव ने जब से मिडिया केम्पेन सम्भाला तब से फोटो वीडियो प्रेस नोट, सूचना बाकायदा प्रेस और जिले तक जा रही थी लेकिन जिला स्तर पर गठित टीम उन्हें कितना आगे बढ़ा रही थी ? यह भी कि मीडिया कैंपन का अर्थ था प्रियंका गांधी के कार्यकम फोटो। इमरान प्रतापगढ़ी या सचिन पायलट के 60 से अधिक आयोजन हुये,उनका कोई नोट, फोटो क्यों जारी नहीं हुआ? इसका कोई आकलन हुआ नहीं ? जान लें पंकज और उनकी टीम का काम सूचना को सही समय पर सही तरीके से सही लोगों तक पहुंचाना था उससे वोट बनाना कांग्रेस कार्यकर्ता की जिम्मेदारी थी .

कांग्रेस की निर्मम शिकस्त का अध्याय उस समय लिख दिया गया था जब पार्टी ने एक साल पहले मतदाता सूची पर काम करना तो दूर, उस पर कोई तवज्जो ही नहीं दी.जब मतदाता सूची बन गई तो पता चला ढेर सारा कोर वोटर लिस्ट से गायब है या उनका मतदान केंद्र बदल दिया गया खैर इस सलीके से शायद एक फीसदी वोट शेयर ही बढ़ता. हर बूथ पर स्थाई बी एल ओ रखने की साजिश को कांग्रेस ने ध्यान ही नहीं दिया और इस तरह नाम जोड़ने-घटाने, मतदान केंद्र बदल देने  जैसे खेल चलते रहे और कांग्रेसी महज सोशल मिडिया पर उछल कूद करते रहे .

कांग्रेस जमीन पर यह सन्देश देने में विफल रही कि बीजेपी का विकल्प बन सकती है संघ ने यह एजेंडा तय किया कि प्रमुख विपक्षी दल सपा है समझ लें बीजेपी को सपा से निबटना आसान है उनका असली संकट गांधी नेहरु हैं --- यदि कांग्रेस इस लड़ाई को निर्णायक बनाना चाहती थी तो उसे सपा आर एल डी , चंद्रशेखर आदि के महा गठबंधन की तैयारी करनी थी एक बार सत्ता का स्वाद लग जाता तो कांग्रेस ताकत पा जाती नहीं तो २०२४ में प्रशासन तो साथ होता ही

प्रत्याशी चयन में भी गड़बड़ियां रहीं पूनम पंडित, अर्चना गौतम , आशा सिंह एक आदर्श नाम थे लेकिन उन्हें चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं था न ही पुराने कांग्रेसियों ने उन्हें समर्थन दिया वे दिखे तो बहुत लेकिन जब मतदाता घर से निकला तो उसे पोलिंग सेंटर के पास कांग्रेस की टीम ही नहीं दिखी और इस भी से कि उसका वोट खराब न हो जाय उसने सपा या अन्य को वोट दिया

एक बात और राज्य का कांग्रेस अध्यक्ष जमीनी संघर्ष का कार्यकर्ता तो है लेकिन उनके पास सांगठनिक कौशल नहीं था- वह केवल प्रियंका गांधी की पसंद थे और उन्ही की परिक्रमा लगते रहे पांच साल कई जगह प्रदर्शन , गिरफ्तारी तो देते रहे लेकिन कहीं रूक कर जिला स्तर पर संगठन खड़े करने की कौशल उनमें नहीं था अखबार की सुर्खी में बने रहना और एक टीम तैयार करने में जमीन आसमान का भेद होता है ---

आखिर कांग्रेस ने ऐसे 30 लोगों की सूची क्यों जारी की जिन्हें विशिष्ठ प्रचारक बनाया जबकि जमीन पर इमरान प्रतापगढ़ी , दीपेन्द्र हुड्डा, सचिन पायलेट , सलमान खुर्शीद ही दिखे . कार्य समिति की बैठक में प्रियंका ने कहा कि बहुत से सूचीबद्ध प्रचारकों ने यूपी में आने से ही मना कर दिया . तो क्या उनसे पूछे बगैर लिस्ट बनाई थी ?  या उन्हें अभी तक दल से बाहर क्यों नहीं किया ?

अंत में टीम प्रियंका --- लल्लू का इस्तीफा हो गया लेकिन वह तो बेचारा न निर्णय लेने में था और न ही किसी योजना में सारा काम तो टीम कर रही थे , फिर उन्हें क्यों छोड़ दिया गया ?

कांग्रेस को मध्य प्रदेश की तर्ज पर घर घर जा कर घर वापिसी अभियान चलाना चाहिए जो पुराने कांग्रेसी हैं उन्हें चिन्हित करना , उन्हें फिर से जोड़ना जरुरी है सभी फ्रन्टल ओर्गेनाय्जेशन के सजावटी पदाधिकारी भगाए जाएँ टीम प्रियंका की योजनायें लड़की हूँ, रोजगार चार्टर आदि शानदार थे लेकिन वे जमीन तो पहुंचे ही नहीं .

जरुरी है कि जिला स्तर से ले कर प्रदेश स्तर तक टिकट के लिए पैसे लेने , प्रचार सामग्री बेच खाने , पुराने कांग्रेसी नेताओं की बेज्जती करने , टीम प्रियंका द्वारा अनियमितता पर अलग अलग जांच कमिटी बने- एक महीने में जाँच हो और जो भी दोषी हो उसे बगैर चेहरा देखे बाहर किया जाए- उन लोगों की पहचान भी जरुरी है जो बीच युद्ध में सोशल मिडिया अपर अपने ही उम्मीदवार और पार्टी की बखिया उधेड़ रहे थे दुसरे खेमों में टहल रहे थे .

बस बात वही है कि आखिर यह सब करेगा कौन यूपी में हर कांग्रसी बस सीधे प्रियंका को अपनी बात कहना चाहता है , बीच में कोई नहीं और प्रियंका न सभी को सुन सकती हैं और न ही उनके कोटरी उन्हें ऐसा करने देगी .

 

 

गुरुवार, 17 मार्च 2022

Holi Festival of cleanness

 स्वच्छता का पर्व है होली

पंकज चतुर्वेदी


होली भारत में


किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र विशेष  का पर्व नहीं है, इसकी पहचान देश  की संस्कृति के रूप में होती है । वसंत ऋतु जनजीवन में नई चेतना का संचार कर रही होती है, फागुन की सुरमई हवाएं वातावरण को मस्त बनाती हैं, तभी होली के रंग लोकजीवन में घुल जाते हैं । इन्हीं दिनों नई फसल भी तैयार होती है और किसानों के लिए यह उल्लास का समय होता है । तभी होली के बहाने नए अन्न की पूजा पूरे देष में की जाती है । यही नहीं पूरी दुनिया में होली की ही तरह  अलग-अलग समय में त्योहार मनाये जाते हैं जिनका असल मकसद तनावों से दूर  कुछ पल मौज-मस्ती के बिताना और अपने परिवेश  के गैरजरूरी सामान से मुक्ति पाना होता है। 


विडंबना है कि अब होली का स्वरूप भयावह हो गया है। वास्तव में होली का अर्थ है - हो ली, यानि जो बीत गई सो बीत गई , अब आगे की सुध है। गिले-शिकवे  मिटाओ, गलतियों को माफ करो और एक दूसरे का रंगों में सराबोर कर दो- रंग प्रेम के, अपनत्व के, प्रकृति के। विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की पहचान कहलाने वाला यह पर्व, पर्यावरण का दुष्मन, नषाखोरी, रंग की जगह त्वचा को नुकसान पहुंचाने, आनंद की जगह भोंडे उधम के लिए कुख्यात हो गया है। पानी की बर्बादी और पेड़ों के नुकसान ने असल में हमारी आस्था और परंपरा की मूल आत्मा को ही नश्ट कर दिया है। 

कहानियां, किवदंतियां के बिंब को समझें इस पर्व का वास्तविक संदेष तो - स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण ही है। यह दुखद है कि अब इस त्योहार ने अपना पारंपरिक रूप और उद्देश्य   खो दिया है और इसकी छबि पेड़ व हानिकारण पदाथों को जला कर पर्यावरण को हानि पहुंचाने और रंगों के माध्यम से जहर बांटने की बनती जा रही है। हालांकि देश  के कई श हरों और मुहल्लों में बीते एक दषक के दौरान होली को प्रकृति-मित्र के रूप में मनाने के अभिनव प्रयोग भी हो रहे हैं।  हमारा कोई भी संस्कार या उत्सव उल्लास की आड़ में पर्यावरण को क्षति की अनुमति नहीं देता। होलिका दहन के साथ सबसे बड़ी कुरीति हरे पेड़ों को काट कर जलाने की है। वास्तव में होली भ्ी दीपावली की ही तरह खलिहान से घर के कोठार में फसल आने की खुषी व्यक्त करने का पर्व है।  


कुछ सदियों पहले तक ठंड के दिनों में भोज्य पदार्थ, मवेशियों  के लिए चारा, जैसी कई चीजें भंडार कर रखने की परंपरा थी। इसके अलावा ठंड के दिनों में कम रोषनी के कारण कई तरह का कूड़ा भी घर में ही रह जाता था। याद करें कि होली में गोबर के बने उपले, माला अवष्य डाली जाती है। असल में ठंड के दिनों में जंगल जा कर जलावन लाने में डर रहता था, सो ऐसे समय के लिए घरों में उपलों को भी एकत्र कर रखते थे। चूंकि अब घर में नया अनाज आने वाला है सो, कंडे-उपले की जरूरत नहीं ; तभी उसे होलिका दहन में इस्तेमाल किया जाता है। उपले की आंच धीमी होती है, लपटें ऊंची नहीं जातीं, इसमें नए अन्न - गेंहूं की बाली या चने के छोड़ को भूना भी जा सकता है, सो हमारे पूर्वजों ने होली में उपले के प्रयोग किए। दुर्भाग्य है कि अब लोग होली की लपेटें आसमान से ऊंची दिखाने के लिए लकड़ी और कई बार प्लास्टिक जैसा विशैला कूड़ा इस्तेमाल करते हैं।  एक बात और आदिवासी समाज में प्रत्येक कृशि उत्पाद के लिए ‘‘नवा खाई’ पर्व होता है - जो भी नई फसल आई , उसके लिए प्रकृति का धन्यवाद। होली भी किसानों के लिए कुछ ऐसा ही पर्व है।


होलिका पर्व का वास्तविक समापन शीतला अष्टमी को होता है। पूर्णिमा की होली और उसके आठ दिन बाद अश्टमी का यह अवसर! षक संवत का पहला महीना चैत्र और इसके कृश्ण पक्ष पर  बासी खाना खाने का बसौड़ा। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पहले ही पक्की रसोई यानि पूड़ी कचौडी, चने , दही बड़े आदि बन जाते हैं। सुबह सूरज उगने से पहले होलिका के दहन स्थल पर षीतला मैया को भोग लगाया जाता है। 


स्कंद पुराण शीतलाषक स्त्रोत  के अनुसार 

‘‘वन्देहं शीतलां देवींरासभस्थां दिगम्बराम। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम।।’’ 

,अर्थात गर्दभ पर विराजमान दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से स्पष्ट है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाड़ू) होने का अर्थ है कि समाज को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत को रखने से शीतला देवी प्रसन्न होती हैं और व्रती के कुल में चेचक, खसरा, दाह, ज्वर, पीतज्वर, दुर्गधयुक्त फोड़े और नेत्रों के रोग आदि दूर हो जाते हैं।  हकीकत में संदेष यही है कि यदि स्वच्छता रखेगे तो ये रोग नहीं हो सकते। 



तनिक गौर करें, होली का प्रारंभ हुआ, घर-खलिहान से कूड़ा-कचरा बुहार कर होली में जलाने से, पर्व में षरीर पर विभिन्न रंग लगाए अैर फिर उन्हें छुड़ाने के लिए रगड़-रगड़ कर स्नान किया। पुराने कपड़े फटे व नए वस्त्र धारण किए और समापन पर स्वच्छता की देवी की पूजा-अर्चना की। लोगों को अपने परिवेष व व्यक्तिगत सफाई का संदेष दिया। गली-मुहल्ले के चौराहे पर होली दहन स्थल पर बसौड़ा का चढ़ावा चढ़ाया जिसे समाज के गरीब और ऐसे वर्ग के लेगों ने उठा कर भक्षण किया जिनकी आर्थिक स्थिति उन्हें पौष्टिक  आहार से वंचित रखती है। चूंकि भोजन ऐसा है जो कि दो-तीन दिन खराब नहीं होना , सो वे घर में संग्रह कर भी खा सकते है।। और फिर यही लोग नई उमंग-उत्साह के साथ फसल की कटाई से ले कर अगली फसल के लिए खेत को तैयार करने का कार्य तपती धूप में भी लगन से करेंगे।  इस तरह होली का उद्देश्य  समाज में समरसता बनाए रखना, अपने परिवेष की रक्षा करना और जीवन में मनोविनोद बनाए रखना है, यही इसका मूल दर्षन है। 



fire is a good friend but a very bad master

  आग से बेपरवाह क्यों हैं पंकज चतुर्वेदी दिल्ली  के मुंडका में एक व्यावसायिक  परिसर में एक इलेक्ट्रानिक कंपनी के कर्मचारियों के लिए मोटि...