My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शनिवार, 30 मई 2020

How super cyclone destroy ?

                                                आखिर क्यों उठता है बवंडर 

                                                                                                                                        पंकज चतुर्वेदी 

हवा की विशाल मात्रा के तेजी से गोल-गोल घूमने पर उत्पन्न तूफान उष्णकटिबंधीय चक्रीय बवंडर कहलाता है। यह सभ्ी जानते हैं कि पृथ्वी भौगोलिक रूप से दो गोलार्धाें में विभाजित है। ठंडे या बर्फ वाले उत्तरी गोलार्द्ध में उत्पन्न इस तरह के तूफानों को हरिकेन या टाइफून कहते हैं । इनमें हवा का घूर्णन घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में एक वृत्ताकार रूप में होता है। जब बहुत तेज हवाओं वाले उग्र आंधी तूफान अपने साथ मूसलाधार वर्षा लाते हैं तो उन्हें हरिकेन कहते हैं। जबकि भारत के हिस्से  दक्षिणी अर्द्धगोलार्ध में इन्हें चक्रवात या साइक्लोन कहा जाता है। इस तरफ हवा का घुमाव घड़ी की सुइयों की दिशा में वृत्ताकार होता हैं। किसी भी उष्णकटिबंधीय अंधड़ को चक्रवाती तूफान की श्रेणी में तब गिना जाने लगता है जब उसकी गति कम से कम 74 मील प्रति घंटे हो जाती है। ये बवंडर कई परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता वाले होते है।
धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवती तूफानों का उठना। भूमध्य रेखा के नजदीकी जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां इस तरह के चक्रवातों के उभरने  की संभावना होती है। तेज धूप में जब समुद्र के उपर की हवा गर्म होती है तो वह तेजी से ऊपर की ओर उठती है। बहुत तेज गति से हवा के उठने से नीसे कम दवाब का क्ष्ज्ञेत्र विकसित हो जाता है। कम दवाब के क्षेत्र के कारण वहाँ एक शून्य या खालीपन पैदा हो जाता है। इस खालीपन को भरने के लिए आसपास की ठंडी हवा तेजी से झपटती है । चूंकि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर एक लट्टू की तरह गोल घूम रही है सो हवा का रुख पहले तो अंदर की ओर ही मुड़ जाता है और फिर हवा तेजी से खुद घूर्णन करती हुई तेजी से ऊपर की ओर उठने लगती है। इस तरह हवा की गति तेज होने पर नीेचे से उपर बहुत तेज गति में हवा भी घूमती हुई एक बड़ा घेरा बना लेती है। यह घेरा कई बार दो हजार किलोमीटर के दायरे तक विस्तार पा जाता है। सनद रहे भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की घूर्णन गति लगभग 1038 मील प्रति घंटा है जबकि ध्रुवों पर यह शून्य रहती है।
इस तरह उठे बवंडर के केंद्र को उसकी आंख कहा जाता है। उपर उठती गर्म हवा समुद्र  से नमी को साथ ले कर उड़ती है। इन पर धूल के कण भी जम जाते हैं और इस तरह संघनित होकर गर्जन मेघ का निर्माण होता है। जब ये गर्जन मेघ अपना वजन नहीं संभाल पाते हैं तो वे भारी बरसात के रूप में धरती पर गिरते हैं। चक्रवात की आँख के इर्द गिर्द 20-30 किलोमीटर की गर्जन मेघ की एक दीवार सी खड़ी हो जाती है और इस चक्रवाती आँख के गिर्द घूमती हवाओं का वेग 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो जाता है। कल्पना करें कि एक पूरी तरह से विकसित चक्रवात एक सेकेंड में बीस लाख टन वायु राशि खींच लेता है। तभी कुछ ही घंटों में सारे साल की बरसात हो जाती है। 
इस तरह के बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालीक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता हे। भीषण बरसात के कारण बन गए दलदली क्षेत्र, तेज आंधी से उजड़ गए प्राकृतिक वन और हरियाली, जानवरों का नैसर्गिक पर्यावास समूची प्रकृति के संतुलन को उजाड़ देता है। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे वे पलक झपकते नेस्तनाबूद हो जाते हैं। तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी मे खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुए क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। 
बहरहाल हम केवल ऐसे तूफानों के पूर्वानुमान से महज जनहानि को ही बचा सकते हैं। एक बात और किस तरह से तटीय कछुए यह जान जाते हैं कि आने वाले कुछ घंटों में समुद्र में उंची लहरें उठेंगी और उन्हें तट की तरफ सुरक्षित स्थान की ओर जाना, एक शोध का विषय है। हाल ही में फणी तूफान के दौरान ये कछुए तट पर रेत के धोरों में कई घंटे पहले आ कर दुबक गए और तूफान जाने के बाद खुद ब खुद समुद्र में उतर गए। यह एक आश्चर्य से कम नहीं है। 


आपदा से निबटने में भारत की तारीफ 
संयुक्त राष्ट्र की आपदा न्यूनीकरण एजेंसी ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से चक्रवाती तूफान अम्फान की पूर्व चेतावनियों की “लगभग अचूक सटीकता” की सराहना की है। इन चेतावनियों ने लोगों को बचाने और जनहानि को काफी कम करने की सटीक योजना तैयार करने में अधिकारियों की मदद की और तट के पास इस चक्रवाती तूफान के टकराने के बाद ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सकी। भारत में पिछले 20 साल में आए इस सबसे भयंकर तूफान ने भारत के पूर्वी राज्यों में कम से कम 84 लोगों की जान ले ली। कोलकाता शहर बुरी तरह तबाह हुआ। अस्सी टन के हवाई जहाज हिल गए। पश्चिम बंगाल, उड़िसा में समुद्र तट के पास स्थित इलाके और अन्य स्थान भारी बारिश के बाद जलमग्न हो गए जिससे करीब 11 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। भारतीय मौसम विभाग ने अम्फान को “अत्यंत भयावह चक्रवाती तूफान” की श्रेणी में रखा है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां अम्फान की गति पर करीब से नजर बनाए हुए हैं और बांग्लादेश में शरणार्थी शिविरों में रह रहे परिवारों को बचाने के इंतजाम कर रही हैं। यह तूफान पश्चिम बंगाल में दस्तक देने के बाद बांग्लादेश पहुंचेगा जिसे अलर्ट पर रखा गया है।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष प्रतिनिधि मामी मिजुतोरी ने कहा, “अत्यंत प्रतिकूल स्थितियों के प्रबंधन में भारत का हताहतों की संख्या बेहद कम रखने का दृष्टिकोण सेनदाई रूपरेखा के क्रियान्वयन में और ऐसी घटनाओं में अधिक जिंदगियां बचाने में बड़ा योगदान है।” मिजुतोरी आपदा जोखिम न्यूनीकरण 2015-2030 के सेनदाई ढांचे की ओर इशारा करता है। यह 15 साल का ऐच्छिक, अबाध्यकारी समझौता है जिसके तहत आपदा जोखिम को कम करने में प्रारंभिक भूमिका राष्ट्र की है लेकिन इस जिम्मेदारी को अन्य पक्षधारकों के साथ साझा किया जाना चाहिए।



जलवायु परिवर्तन और चक्रवात 
यह तो हुआ चक्रवाती तूफान का असली कारण लेकिन भारत उपमहाद्वीप में बार-बार और हर बार पहले से घातक तूफान आने का असल कारण इंसान द्वारा किये जा रहे प्रकृति के अंधाधुध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल के प्रारंभ में ही अमेरिका की अंतरिक्ष शोध संस्था नेशनल एयरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ‘नासा ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और खूंखार होते जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान बढ़ने से सदी के अंत में बारिश के साथ भयंकर बारिश और तूफान आने की दर बढ़ सकती है। यह बात नासा के एक अध्ययन में सामने आई है। अमेरिका में नासा के ‘‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’’ (जेपीएल) के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों की शुरुआत के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर अंतरिक्ष एजेंसी के वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर (एआईआरएस) उपकरणों द्वारा 15 सालों तक एकत्र आकंड़ों के आकलन से यह बात सामने आई। अध्ययन में पाया गया कि समुद्र की सतह का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर गंभीर तूफान आते हैं। ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’(फरवरी 2019) में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं। ‘जेपीएल’ के हार्टमुट औमन के मुताबिक गर्म वातावरण में गंभीर तूफान बढ़ जाते हैं। भारी बारिश के साथ तूफान आमतौर पर साल के सबसे गर्म मौसम में ही आते हैं।


चेतावनी की चुनौती  डेढ शती
कोई 155 साल पहले, जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था, सन 1864 में देश के पूर्वी समुद्री तट पर दो भीषण तूफान आए - अक्तूबर में कोलकाता में और फिर नवंबर में मछलीपट्टनम में। अनगिनत लोग मारे गए और अकूत संपत्ति इस विपदा के उदरस्थ हो गई। उन दिनों कोलकाता देश की राजधानी था और व्यापार व फौज का मुख्य अड्डा। ब्रितानी सरकार ने तत्काल एक कमेटी गठित की ताकि ऐसे तूफानों की पहले से सूचना पाने का कोई तंत्र विकसित किया जा सके। और एक साल के भीतर ही सन 1865 में  कोलकाता बंदरगाह ऐसा पहला समुद्र तट बन गया जहां समुद्री बवंडर आने की पूर्व सूचना की प्रणाली स्थापित हुई। सनद रहे भारत में मौसम विभाग की स्थापना इस केंद्र के दस साल बाद यानि 1875 में हुई थी। 
सन 1880 तक भारत के पश्चिमी समुद्री तटों - मुंबई, कराची, रत्नागिरी, कारवाड़, कुमरा आदि में भी तूफान पूर्व सूचना के केंद्र स्थापित हो गए थे।  मौसम विभाग की स्थापना और विज्ञान-तकनीक के विकास के साथ-साथ आकलन , पूर्वानुमान और सूचनओ को त्वरित प्रसारित करने की प्रणाली बदलती रहीं। 
आजादी के बाद सन 1969 में भारत सरकार ने आंध्रप्रदेश में बार-बार आ रहे तूफान, पलरायन व नुकसान के हालातों के मद्देनजर एक कमेटी - सीडीएमसी (साईक्लोन डिस्ट्रेस मिटिगेशन कमेटी) का गठन किया ताकि चक्रवाती तूफान की प्राकृतिक आपदा से जन और संपत्त की हानि को कम से कम किया जा सके।  उसी दौरान ओडिसा और पश्चिम बंगाल में भी ऐसी कमेटियां बनाई गईं जिनमें मौसम वैज्ञानिक, इंजीनियर, समाजशास्त्री आदि शामिल थे। इस कमेटियों ने सन 1971-72 में अपनी रिपोर्ट पेश कीं और सभी में कहा गया कि तूफान आने की पूर्व सूचना जितनी सटीक और पहले मिलेगी, हानि उतनी ही कम होगी।  कमेटी के सुझाव पर विशाखपत्तनम और भुवनेश्वर में अत्याधुनिक मशीनों से लैस सूचना केंद्र तत्काल स्थापित किए गए। 
भारतीय उपग्रहों के अंतरिक्ष में स्थापित होने और धरती की हर पल की तस्वीरें त्वरित मिलने के शानदार तकनीक के साथ ही अब तूफान पूर्वानुमान विभाग, चित्रों, इन्फ्रारेड चैनल, बादलों की गति व प्रकृति, पानी के वाष्पीकरण, तापमान आकलन जैसी पद्यतियों से कई-कई दिन पहले बता देता है कि आने वाला तूफान कब, किस स्थान पर कितने संवेग से आएगा। इसी की बदौलत ‘फणी’ आने से पहले ही ओडिशा सरकार ने 11 लाख से अधिक लोगों को 4400 से अधिक सुरक्षित आश्रय घरों में पहुंचा दिया। उनके लिए साफ पानी, प्राथमिक स्वास्थय , भेजन जैसी व्यवसथाएं बगैर किसी हड़बडाहट के हो गईं। जब 240 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से बवंडर उठेगा तो सड़क, पुल, इमारत, बिजली के खंभे, मोबाईल टावर आदि को नुकसान तो होगा ही, लेकिन इसनते भयावह तूफान को देखते हुए जन हानि बहुत कम होना और पुनर्निमाण का काम तेजी से शुय हो जाना सटीक पूर्वानुमान प्रणाली के चलते ही संभव हुआ। 
तबाही का नाम क्यों व कैसे
इस बार के तूफान को ‘अम्फान’ नाम थाईलैंड ने दिया हैं। इसका थाई में उच्चारण होता है ‘उम पून’ और इसका अर्थ है आकाश। इसका सुझाव थाईलैंड ने सन 2004 में ही दे दिया था। पिछले साल ं आए तूफान का नाम था -फणी, यह सांप के फन का बांग्ला अनुवाद है। इस तूफान का यह नाम भी बांग्लादेश ने ही दिया था। जान लें कि प्राकृतिक आपदा केवल एक तबाही मात्र नहीं होती, उसमें भविष्य के कई राज छुपे होते हैं। तूफान की गति, चाल, बरसात की मात्रा जसे कई आकलन मौसम वैज्ञानिकों के लिए एक पाठशाला होते हैं। तभी हर तूफान को नाम देने की प्िरक्रया प्रारंभ हुई। विकसित देशो में नाम रखने की प्रणाली 50 के दशक से विकसित है लेकिन हिंद महासागर इलाके के भयानक बवंडरों के ठीक तरह से अध्ययन करने के इरादे से सन 2004 में भारत की पहल पर आठ देशों ने एक संगठन बनाया। ये देश चक्रवातों की सूचना एकदूसरे से साझा करते हैं। ये आठ तटीय देश हैं - ं भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका, ओमान और थाईलैंड ं। 
दरअसल तूफानों के नाम एक समझौते के तहत रखे जाते हैं। इस पहल की शुरुआत अटलांटिक क्षेत्र में 1953 में एक संधि के माध्यम से हुई थी। अटलांटिक क्षेत्र में हेरिकेन और चक्रवात का नाम देने की परंपरा 1953 से ही जारी है जो मियामी स्थित नैशनल हरिकेन सेंटर की पहल पर शुरू हुई थी। 1953 से अमेरिका केवल महिलाओं के नाम पर तो ऑस्ट्रेलिया केवल भ्रष्ट नेताओं के नाम पर तूफानों का नाम रखते थे। लेकिन 1979 के बाद से एक नर व फिर एक नारी नाम रखा जाता है।
भारतीय मौसम विभाग के तहत गठित देशों का क्रम अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षर से तय होते हैं। जैसे ही चक्रवात इन आठ देशों के किसी हिस्से में पहुंचता है, सूची में मौजूद अलग सुलभ नाम इस चक्रवात का रख दिया जाता है। इससे तूफान की न केवल आसानी से पहचान हो जाती है बल्कि बचाव अभियानों में भी इससे मदद मिलती है। भारत सरकार इस शर्त पर लोगों की सलाह मांगती है कि नाम छोटे, समझ आने लायक, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और भड़काऊ न हों ।किसी भी नाम को दोहराया नहीं जाता है। अब तक चक्रवात के करीब 64 नामों को सूचीबद्ध किया जा चुका है। कुछ समय पहले जब क्रम के अनुसार भारत की बारी थी तब ऐसे ही एक चक्रवात का नाम भारत की ओर से सुझाये गए नामों में से एक ‘लहर’ रखा गया था। 
इस क्षेत्र में जून 2014 में आए चक्रवात नानुक का नाम म्यांमार ने रखा था। साल 2013 में भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर आए पायलिन चक्रवात का नाम थाईलैंड ने रखा था । इस इलाक़े में आए एक अन्य चक्रवात ‘नीलोफ़र का नाम पाकिस्तान ने दिया था। पाकिस्तान ने नवंबर 2012 में आए चक्रवात को ‘नीलम’ नाम दिया था। .इस सूची में शामिल भारतीय नाम काफ़ी आम नाम हैं, जैसे मेघ, सागर, और वायु। चक्रवात विशेषज्ञों का पैनल हर साल मिलता है और ज़रूरत पड़ने पर सूची फिर से भरी जाती है.
 
जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तर हिन्द महासागर की सीमा वाले देशों को प्रभावित करने वाले तूफानों की ताकत में इजाफा हो रहा है। इससे भारतए बांग्लादेश समेत कई देश प्रभावित हो रहे हैं। पर्यावरण थिंक टैंक क्लाईमेट ट्रेंड ने अपने अध्ययन में यह दावा किया है।

अध्ययन कहता है कि मौजूदा तूफान अम्फान इसी के चलते सुपर साइक्लोन में परिवर्तित हो गया। क्लाईमेट ट्रेंड के अनुसारए समुद्र के सतह और धरती के ज्यादा गर्म होने से चक्रवाती तूफानों की ताकत में इजाफा हो रहा है। यदि समुद्र की सतह का तापमान ज्यादा है तो इसका असर यह होता है कि चक्रवाती हवा की गति बढ़ जाती है। भारती उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ राक्सी मैथ्यू कौल ने कहा कि हमारे शोध में पता चलता है कि बंगाल की खाड़ी तेजी से गर्म हो रही है। जो एक कमजोर तूफान को शक्तिशाली बना रही है।


 
अधिक तापमान ने चक्रवात को सुपर चक्रवात बनाया बंगाल की खाड़ी में मई के पहले दो सप्ताह के दौरान कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 32.34 डिग्री के बीच रहा जो सर्वाधिक है। यहएक चक्रवात को ताकत देकर सुपर चक्रवात बना देता है। आईआईटी भुवनेश्वर के पृथ्वीए महासागर और जलावयु विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ वीण् विनोज ने कहा कि देश में हर साल मानसून पूर्व चक्रवातों की संख्या बढ़ रही है जिसकी वजह महासागरों की सतह का लगातार गर्म होते जाना है। उन्होंने कहा कि इस तूफान को सुपर साइक्लोन बनाने में लाकडॉण्उन की भी एक तरह से भूमिका है

मानव गतिविधियों और जलवायु और पर्यावरण पर उनके प्रभाव नेए चक्रवात अम्फान को कई तरीकों से प्रभावित किया हैए कई विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया है।

जलवायु परिवर्तन उस क्षति को बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है जो चक्रवात कई तरह से उत्पन्न करता हैए जिसमें समुद्र की सतह का तापमान बढ़ाना शामिल है जो एक तूफान तक पहुंचने वाली अधिकतम संभावित ऊर्जा को बढ़ाता हैय तूफान के दौरान गिरने वाली वर्षा में वृद्धिय समुद्र का बढ़ता स्तरए जिससे बढ़ती दूरी अंतर्देशीय है कि तूफान बढ़ता हैय और तूफान के कारण और अधिक तेज़ी से ताकत मिलती है।

वैज्ञानिक वायु प्रदूषण और चक्रवात के बीच एक जटिल संबंध की खोज कर रहे हैंए और यह संभव है कि सीओवीआईडी .19 प्रतिबंधों के कारण क्षेत्र में वायु प्रदूषण में कमी ने चक्रवात अम्फान को प्रभावित किया हो। हालांकि वे इस बात से सहमत हैं कि आगे की जांच की आवश्यकता है।

मानव.कारण वायु प्रदूषण से एरोसोलए विभिन्न तरीकों से चक्रवातों की ताकत को आंशिक रूप से कम कर सकते हैंए क्योंकि वे सूर्य की रोशनी को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकते हैंए जिससे यह थोड़ा ठंडा हो जाता है। वायु प्रदूषण में कमी से बंगाल की खाड़ी में समुद्र की सतह का तापमान थोड़ा बढ़ सकता हैए जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को बढ़ाएगा।

इसके अलावाए एरोसोल बादलों को अधिक आसानी से वर्षा का उत्पादन कर सकता हैए जो चक्रवातों के गठन को सीमित करता है। इन कारकों से पता चलता है कि वायु प्रदूषण में कमी से चक्रवात की ताकत बढ़ेगी।

लेकिन एक अन्य कारक जो चक्रवात की ताकतए विंड शीयर को प्रभावित करता हैए इसका वायु प्रदूषण के साथ विपरीत संबंध है। उच्च वायु प्रदूषण पवन कतरनी को कम करता हैए जो आम तौर पर मजबूत चक्रवातों को बनाने की अनुमति देता है। तो वायु प्रदूषण कम हो सकता हैए इस संबंध मेंए चक्रवात की ताकत को सीमित करें।

जबकि वायु प्रदूषण में कमी और चक्रवात अम्फान के बीच एक संबंध हो सकता हैए यह कहना जल्द ही ठीक है कि तूफान पर क्लीनर हवा का किस तरह का प्रभाव पड़ा है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक और जलवायु परिवर्तन ;प्च्ब्ब्द्ध और क्रायोस्फीयर पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल के प्रमुख लेखकए रॉक्सी मैथ्यू कोल्ल ने कहारू ष्हमारे अनुसंधान से पता चलता है कि उच्च महासागर का तापमान चक्रवातों के तीव्र तीव्रता के लिए अनुकूल है। उत्तर हिंद महासागर में।

श्वर्तमान मामले मेंए बंगाल की खाड़ी विशेष रूप से गर्म रही हैए जिसने एक अवसाद से एक चक्रवात तक और फिर बहुत कम समय में एक सुपर चक्रवात की तीव्र तीव्रता में कुछ भूमिका हो सकती है।

ष्उदाहरण के लिएए बंगाल की खाड़ी में कुछ ख़ुशबूओं ने मई के पहले दो हफ्तों तक लगातार 32.34 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान दर्ज किया। ये जलवायु परिवर्तन द्वारा संचालित रिकॉर्ड तापमान हैं जो हमने अब तक इतने उच्च मूल्यों को कभी नहीं देखा है। । ष्

कोल्ल ने कहा कि ये उच्च तापमान एक चक्रवात को सुपर.चार्ज कर सकते हैंए क्योंकि उष्णकटिबंधीय चक्रवात मुख्य रूप से समुद्र की सतह पर वाष्पीकरण से अपनी ऊर्जा खींचते हैं।

भुवनेश्वर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में पृथ्वीए महासागर और जलवायु विज्ञान के स्कूल के सहायक प्रोफेसर वी। विनोज ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग दुनिया भर के ऊपरी महासागरों की गर्मी सामग्री में वृद्धि के लिए अग्रणी है।

ष्यह भारतीय क्षेत्र के आसपास के समुद्री क्षेत्रों के लिए भी सही है। यह प्री.मानसून समय के दौरान हमारे क्षेत्र में चक्रवाती गतिविधियों की बढ़ती संख्या के कारणों में से एक है। हालांकिए अतीत की तुलना में अब जो अलग है वह दुनिया का सबसे बड़ा ब्व्टप्क् है। .19 ने भारत की अगुवाई में दक्षिण एशियाई क्षेत्र में तालाबंदी की।
ष्इस लॉकडाउन ने वायुमंडल में मानव उत्सर्जन को काफी कम कर दिया है। इस कमी का मतलब है कि मानव निर्मित एरोसोल को हटाने के कारण सतह के वार्मिंग में वृद्धि हुई है और वायुमंडलीय वार्मिंग ;ब्लैक कार्बन जैसे एयरोसोल को अवशोषित करने वाले लोगों के कारणद्ध में इस दौरान काफी कमी आई है।

ष्यह सतह वार्मिंग बंगाल की खाड़ी में पानी के ऊपर फैली हुई है। इसलिएए ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव जो चक्रवात की ताकत को बढ़ाता हैए यदि कोई हैए तो अब इस मानव.प्रेरित लॉकडाउन प्रभाव के कारण प्रवर्धित किया गया है। यही कारण हो सकता है। ।उचींद एक सुपर साइक्लोन में मजबूत हो गया हैए दूसरा केवल 1999 के सुपर साइक्लोन के लिए।

उन्होंने कहाए ष्कुल मिलाकरए मुझे लगता है कि बंगाल की खाड़ी के ऊपर समुद्र के पानी के अतिरिक्त गर्म होने के कारण लॉकडाउन ने इस चक्रवात को मजबूत किया है। भविष्य में इसकी जांच की जरूरत होगी।ष्
 
जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तर हिन्द महासागर की सीमा वाले देशों को प्रभावित करने वाले तूफानों की ताकत में इजाफा हो रहा है। इससे भारत, बांग्लादेश समेत कई देश प्रभावित हो रहे हैं। पर्यावरण थिंक टैंक क्लाईमेट ट्रेंड ने अपने अध्ययन में यह दावा किया है।

अध्ययन कहता है कि मौजूदा तूफान अम्फान इसी के चलते सुपर साइक्लोन में परिवर्तित हो गया। क्लाईमेट ट्रेंड के अनुसार, समुद्र के सतह और धरती के ज्यादा गर्म होने से चक्रवाती तूफानों की ताकत में इजाफा हो रहा है। यदि समुद्र की सतह का तापमान ज्यादा है तो इसका असर यह होता है कि चक्रवाती हवा की गति बढ़ जाती है। भारती उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ राक्सी मैथ्यू कौल ने कहा कि हमारे शोध में पता चलता है कि बंगाल की खाड़ी तेजी से गर्म हो रही है। जो एक कमजोर तूफान को शक्तिशाली बना रही है।


 
अधिक तापमान ने चक्रवात को सुपर चक्रवात बनाया बंगाल की खाड़ी में मई के पहले दो सप्ताह के दौरान कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 32-34 डिग्री के बीच रहा जो सर्वाधिक है। यहएक चक्रवात को ताकत देकर सुपर चक्रवात बना देता है। आईआईटी भुवनेश्वर के पृथ्वी, महासागर और जलावयु विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ वी. विनोज ने कहा कि देश में हर साल मानसून पूर्व चक्रवातों की संख्या बढ़ रही है जिसकी वजह महासागरों की सतह का लगातार गर्म होते जाना है। उन्होंने कहा कि इस तूफान को सुपर साइक्लोन बनाने में लाकडॉ.उन की भी एक तरह से भूमिका है

मानव गतिविधियों और जलवायु और पर्यावरण पर उनके प्रभाव ने, चक्रवात अम्फान को कई तरीकों से प्रभावित किया है, कई विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया है।

जलवायु परिवर्तन उस क्षति को बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है जो चक्रवात कई तरह से उत्पन्न करता है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान बढ़ाना शामिल है जो एक तूफान तक पहुंचने वाली अधिकतम संभावित ऊर्जा को बढ़ाता है; तूफान के दौरान गिरने वाली वर्षा में वृद्धि; समुद्र का बढ़ता स्तर, जिससे बढ़ती दूरी अंतर्देशीय है कि तूफान बढ़ता है; और तूफान के कारण और अधिक तेज़ी से ताकत मिलती है।

वैज्ञानिक वायु प्रदूषण और चक्रवात के बीच एक जटिल संबंध की खोज कर रहे हैं, और यह संभव है कि सीओवीआईडी -19 प्रतिबंधों के कारण क्षेत्र में वायु प्रदूषण में कमी ने चक्रवात अम्फान को प्रभावित किया हो। हालांकि वे इस बात से सहमत हैं कि आगे की जांच की आवश्यकता है।

मानव-कारण वायु प्रदूषण से एरोसोल, विभिन्न तरीकों से चक्रवातों की ताकत को आंशिक रूप से कम कर सकते हैं, क्योंकि वे सूर्य की रोशनी को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से रोकते हैं, जिससे यह थोड़ा ठंडा हो जाता है। वायु प्रदूषण में कमी से बंगाल की खाड़ी में समुद्र की सतह का तापमान थोड़ा बढ़ सकता है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को बढ़ाएगा।

इसके अलावा, एरोसोल बादलों को अधिक आसानी से वर्षा का उत्पादन कर सकता है, जो चक्रवातों के गठन को सीमित करता है। इन कारकों से पता चलता है कि वायु प्रदूषण में कमी से चक्रवात की ताकत बढ़ेगी।

लेकिन एक अन्य कारक जो चक्रवात की ताकत, विंड शीयर को प्रभावित करता है, इसका वायु प्रदूषण के साथ विपरीत संबंध है। उच्च वायु प्रदूषण पवन कतरनी को कम करता है, जो आम तौर पर मजबूत चक्रवातों को बनाने की अनुमति देता है। तो वायु प्रदूषण कम हो सकता है, इस संबंध में, चक्रवात की ताकत को सीमित करें।

जबकि वायु प्रदूषण में कमी और चक्रवात अम्फान के बीच एक संबंध हो सकता है, यह कहना जल्द ही ठीक है कि तूफान पर क्लीनर हवा का किस तरह का प्रभाव पड़ा है।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक और जलवायु परिवर्तन (प्च्ब्ब्) और क्रायोस्फीयर पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल के प्रमुख लेखक, रॉक्सी मैथ्यू कोल्ल ने कहारू ष्हमारे अनुसंधान से पता चलता है कि उच्च महासागर का तापमान चक्रवातों के तीव्र तीव्रता के लिए अनुकूल है। उत्तर हिंद महासागर में।

“वर्तमान मामले में, बंगाल की खाड़ी विशेष रूप से गर्म रही है, जिसने एक अवसाद से एक चक्रवात तक और फिर बहुत कम समय में एक सुपर चक्रवात की तीव्र तीव्रता में कुछ भूमिका हो सकती है।

ष्उदाहरण के लिए, बंगाल की खाड़ी में कुछ ख़ुशबूओं ने मई के पहले दो हफ्तों तक लगातार 32-34 डिग्री सेल्सियस अधिकतम तापमान दर्ज किया। ये जलवायु परिवर्तन द्वारा संचालित रिकॉर्ड तापमान हैं जो हमने अब तक इतने उच्च मूल्यों को कभी नहीं देखा है। । ष्

कोल्ल ने कहा कि ये उच्च तापमान एक चक्रवात को सुपर-चार्ज कर सकते हैं, क्योंकि उष्णकटिबंधीय चक्रवात मुख्य रूप से समुद्र की सतह पर वाष्पीकरण से अपनी ऊर्जा खींचते हैं।

भुवनेश्वर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में पृथ्वी, महासागर और जलवायु विज्ञान के स्कूल के सहायक प्रोफेसर वी। विनोज ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग दुनिया भर के ऊपरी महासागरों की गर्मी सामग्री में वृद्धि के लिए अग्रणी है।

ष्यह भारतीय क्षेत्र के आसपास के समुद्री क्षेत्रों के लिए भी सही है। यह प्री-मानसून समय के दौरान हमारे क्षेत्र में चक्रवाती गतिविधियों की बढ़ती संख्या के कारणों में से एक है। हालांकि, अतीत की तुलना में अब जो अलग है वह दुनिया का सबसे बड़ा ब्व्टप्क् है। -19 ने भारत की अगुवाई में दक्षिण एशियाई क्षेत्र में तालाबंदी की।
ष्इस लॉकडाउन ने वायुमंडल में मानव उत्सर्जन को काफी कम कर दिया है। इस कमी का मतलब है कि मानव निर्मित एरोसोल को हटाने के कारण सतह के वार्मिंग में वृद्धि हुई है और वायुमंडलीय वार्मिंग (ब्लैक कार्बन जैसे एयरोसोल को अवशोषित करने वाले लोगों के कारण) में इस दौरान काफी कमी आई है।

ष्यह सतह वार्मिंग बंगाल की खाड़ी में पानी के ऊपर फैली हुई है। इसलिए, ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव जो चक्रवात की ताकत को बढ़ाता है, यदि कोई है, तो अब इस मानव-प्रेरित लॉकडाउन प्रभाव के कारण प्रवर्धित किया गया है। यही कारण हो सकता है। ।उचींद एक सुपर साइक्लोन में मजबूत हो गया है, दूसरा केवल 1999 के सुपर साइक्लोन के लिए।

उन्होंने कहा, ष्कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि बंगाल की खाड़ी के ऊपर समुद्र के पानी के अतिरिक्त गर्म होने के कारण लॉकडाउन ने इस चक्रवात को मजबूत किया है। भविष्य में इसकी जांच की जरूरत होगी।ष्

शुक्रवार, 29 मई 2020

Reverse migrated women can change face of rural India

अपनी मिट्टी की तकदीर बदल देंगी घर लौटी महिलाएं

पंकज चतुर्वेदी

कोरोना वायरस के कारण हो रहे लंबे लॉकडाउन के कारण अनुमान है कि आने वाले कुछ महीनों में कोई छह करोड़ लोगों के सामने नौकरी का संकट खड़ा होगा। देश  के कुल रेाजगार का 88 प्रतिश त गैरनियोजित क्षेत्र से आता है और यही देश  की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।  लॉकडाउन की घोशणा होते ही श हरों व औद्योगिक क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्र के कर्मचारियों गांव लौटने का जो सिलसिला शुरू  हुआ, वह पचास दिन बाद भी जारी है।  विभिन्न माध्यमों से आई छबियां बानगी हैं कि अपने घरों की ओर पैदल लौट रही इस जज्बाती भीड़ का बड़ा हिस्सा आधी आबादी भी है। यह विस्थापन, इसके पीछे के कारण-अव्यवस्थाएं आदि को यदि परे रखे दें  तो यह बात सारी दुनिया स्वीकार करेगी कि भारतीय महिलाओं जैसा जीवट, परिश्रम, इच्छाशक्ति और सहनशीलता शा यद ही और कहीं मिलें।  कहीं गर्भवती महिला कई सौ किलोमीटर चल रही है तो कहीं बच्चों को कंधे पर लादे वह दौड़ रही है। दूसरी तरफ इस लंबे बंदी-काल और छोटी-मझौली कंपनियों के सामने खड़े वित्तीय संकट ने होटल, आईटी, पर्यटन जैसे कई कार्यो में लगी महिलाओं को बेरोजगारी की श्रेणी में खड़ा कर दिया है और ऐसी कई महिलाएं अपने घर लौट रही हैं।
जरा गौर करें, ये कारखानों या निर्माण कार्य में लगी औरतें हों या कार्यालय संभालने वाली युवतियां, जब ये अपने दूरस्थ कस्बों-गांव से चली थीं तो एक अकुश ल या कच्ची मिट्टी की मांनिंद थीं। आज वे महानगरों की चुनौतियों, दवाब में लक्ष्य को पूरा करने की काबिलियत के साथ-साथ किसी न किसी कार्य को करने में पारंगत हो कर घर लौट रही हैं। यदि श्रम शक्ति का सकारात्मक इस्तेमाल पर दूरगामी योजना बनाई जाए तो यही सरकार के लिए सटीक समय है कि देश  की अर्थ गतिविधियों को फिर से ग्रामीण अंचल तक ले जाया जा सकता है। इसे भविष्य की संभावना के रूप में देखें तो ‘आपदा’ को ‘अवसर’ के रूप में भी बदला जा सकता है। इसमें आत्म निर्भरता का व्यापक स्वरूप छिपा है, गृह और कुटीर उद्योग की संभावनांए छिपी हैं।
कोरोना की त्रासदी को अवसर में बदलने के संकल्प का उदाहरण ग्वालियर की वे महिलाएं हैं जो कि गांव की हैं। जिले में आठ महिला समूहों की सदस्यों ने मास्क बनाना शुरू कर दिया है। ये मास्क फूलबाग स्थित हाट बाजार में सरकार द्वारा तय रेट 10 रुपए प्रति नग की दर से उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जबकि, बाजार में इन्हें 25 रुपए तक बेचा जा रहा है। अभी तक यह समूह एक लाख मास्क बना चुका हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के अधिकांश जिलों में समूहों की महिला सदस्यों ने मास्क बनाने का काम शुरू कर दिया है। अभी तक 1927 समूहों द्वारा 25 लाख 42 हजार से अधिक मास्क तैयार किये  जा चुके हैं। इसके साथ ही, 26 हजार 431 लीटर सेनेटाइजर , 3 हजार 866 पी.पी.ई. किट्स भी तैयार किए जा चुके हैं। इन समूहों द्वारा 52 हजार 246 हेंड-वाश साबुन  का भी उत्पादन  किया गया है।
उ.प्र. के श्रावस्ती खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से मिले दो हजार मीटर सूती कपड़े से 38 समूह की महिलाएं मास्क बना रही हैं। इसके लिए भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक की ओर से तय मानक का पालन किया जा रहा है। थ्री लेयर के मास्क की कीमत 13 रुपये 60 पैसे रखे गए हैं। इसमें चार रुपये प्रति मास्क सिलाई का भुगतान है। झारखंड के गिरिडीह जिले में की महिलाएं मास्क और सैनिटाइजर बनाने का काम कर रोजाना 500 से 800 रुपया तक कमा रही हैं। ये महिलाएं अब तक 1 लाख 40 हजार से ज्यादा मास्क और 1 लाख बॉटल से ज्यादा सैनिटाइजर बना चुकी हैं। गांडेय स्वयं सहायता समुह की महिला रेखा देवी ने बताया की इस कोरोना बंदी में वे काम कर रही हैं जिससे अच्छी आमदनी हो रही हैं और घर परिवार का वे ठीक से भरण-पोषण कर पा रही हैं । वे 150 से 200 मास्क प्रत्येक दिन बना रही हैं । प्रति मास्क बनाने के लिए उन्हें 5 रुपया मिल रहा हैं । पैसे का भुगतान प्रत्येक दिन मिल जाता हैं जिससे वे काफी खुश हैं।
आंध्र प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी करीब 40,000 महिलाएं मास्क बनाकर प्रतिदिन 500 रुपये कमा रही हैं. ये महिलाएं के प्रसार को रोकने के लिए प्रदेश भर के लोगों के बीच 16 करोड़ मुफ्त मास्क बांटने के राज्य सरकार के कार्यक्रम के तहत कार्य कर रही हैं। प्रत्येक नागरिक को तीन मास्क प्रदान करने के सरकार के कार्यक्रम ने महिलाओं को एक ऐसे समय में रोजगार दिया है, जब लोग कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण बड़ी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। स्वयं सहायता समूह 3.5 रुपये प्रति मास्क की दर से मास्क बना रहे हैं । यहां 40,000 महिला दर्जी प्रतिदिन 500 रुपये कमा रही हैं।
देषभर के कुछ ये ऐसे उदाहरण है जो बताते हैं कि यदि महिलाओ को अवसर और दिषा मिल जाए तो वह अपनी मेहनत और लगन के बदौलत कुछ भी हांसिल कर लेती है। सवा अरब की आबादी वाले हमारे देष में कोरोना ने मास्क की मांग बढ़ा दी और यह जान लें कि जापना-चीन-ताईवान की तरह मास्क अब भारतीय षहरी जीवन का अभिन्न अंग बन रहा है। एक अनुमान है कि अभी भी देष में हर महीने बीस करोड़ लाख से ज्यादा मास्क की मांग है और इस लक्ष्य की प्राप्ति में ये घर लौट गई औरतें  बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
यह सटीक समय है कि हर जिले के हर गांव में वापिस लौट रही महिलाओं का एक रिकार्ड तैयार कर लिया जाए जिसमें उनकी आयु, वे क्या काम करते थे,कहां करते थे , षैक्षिक योग्यता का उल्लेख हो। साथ ही इसकी जानकारी भी हो कि उनके पति(यदि विवाहित हैं तो) क्या काम करती थे ,, उनके बच्चे स्कूल जाते थे या नहीं । इन लोगों को फिर से महानगर जाने से रोकने की  सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है । यदि अपने गांव में ही उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों , कृशि उत्पादों का उचित प्रबंधन, कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की दूरगामी योजना प्रत्येक जिले में निर्माण या अन्य कार्य में  योग्यता के अनुसार लोगों को रोजगार देने की पहल की जाए तो ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का सुदृढीकरण कठिन नहीं होगा। महानगरों की भीड़ कम होने से वहां मूलभूत सुविधाएं ध्वस्त होने, पर्यावरणीय संकट जैसी दिक्कतों से छुटकारा मिलेगा व उस पर व्यय होने वाले सरकारी बजट में कमी आएगी।  इस प्रक्रिया से ग्रामीणेां की लगन, प्रतिभा और कौशल का उपयोग हो सकेगा एवं स्थानीय स्तर पर  श्रम शक्ति को कुशलता से रोजगार की संभावना प्रबल होगी। मनरेगा या स्थानीय निर्माण कार्य में श्रकिों की आपूर्ति भी इसी डाटा बैंक से की जा सकती है।
यह जान लें कि  पलायन रोकने व स्थानीय रोजगार के लिए जिला स्तर की ओर आने वाली सड़कों पर ही रोजगार के साधन स्थापित करना जरूरी है। जैसे कि देष में इन दिनों कई जगह टमाटर की बंपर फसल को सड़क पर फैंका जा रहा है या आलू के माकूल दाम नहीं मिल रहे या कर्नाटक में अंगूर व बस्तर में मिर्ची की बंपर फसल की बेकदरी है। इन सभी स्थानों पर दस से पचास लाख लागत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की स्थापना से किसान से ले कर महिलाओं तक व षिक्षित लोगों को विपणन से ले कर कार्यालयीन कार्य तक में रोजगार दिया जा सकता हैं। यदि यह कार्य कुछ कंप्यूटर षिक्षित हिलाएं, कुछ एमबीए और इंजीनियर लड़किया मिल कर कर लें तो बड़ा बदलाव होगा।
किसी छोटे कस्बे या गांव में कम चर्चित स्थान को ले कर पर्यटन की संभावना विकसित करनाइंटरनेट के माध्यम से स्थान को चर्चित करना, उसका टूर पैकेज बनाना , स्थानीय घरों को प्रषासन की अनुमति से पर्यटकों के लिए तैयार करने जैसे काम से महिलाएं अपने मूल-स्थान पर रह कर वैष्विक व्यापार व प्रसिद्धि दोनों पर सकती हैं।
यह माकूल समय है कि महिलाएं ग्रामीण स्तर पर सहकारी खेती, दुग्ध उत्पादों   और फसल का सहकारी भंडारण, विपणन को अपने हाथ में लें ।  सबकुछ अपेक्षा कस्बे-गांव वालों से ही ना की जाए, जरूरी है कि आंचलिक स्तर पर षिक्षा, स्वास्थय, पेयजल, सड़क परिवहन पर भी काम करना होगा और इसकी कार्ययोजना जिला स्तर पर ही बने। इस कार्य में भी ये महिलाएं  सर्वें, योजना तैयार करने, क्रियान्वयन में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। जब ग्रामीण स्तर पर औरतों के हाथ पैसाहोगा तो बाजार- चाहे षिक्षा का हो या स्वास्थ्य का, खुद ब खुद गांव की तरफ जाएगा।
पषु धन, मुर्गी व मछली पालन, निरामिष भोजन का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण , अनाज रखने के लिए बोरे तैयार करना, पॉलीथीन पाबंदी की दषा में कपड़ों के थैले या तात्कालिक मांग के अनुसार मास्क व गमछे तैयार करना , लाख, रेषम, मधुमक्खी पालन के साथ नारियल, जड़ीबूटी , बांस की खेती, स्थानीय भोज्य, षिल्प व अन्य पदार्थों की इंटरनेट की मदद से वैष्विक मार्केटिंग भी ऐसा कदम हो सकता है जो महिलाओं को घर-गांव में ही रोजगार दे। 

गुरुवार, 28 मई 2020

Migration causes community spread of Corona

विस्थापन से हुआ कोरोना विस्फोट !

पंकज चतुर्वेदी 

कार्बी आंगलाग असम का बेहद आंचलिक और षांत जिला है। गांव भी बेहद स्वच्छ और शांत । बीते दिनों वहां की नैसर्गिकता में खलल पड़ गया, जब पता चला कि गांव के एक लड़के को कोरोना संक्रमण है। असल में यह 26 साल का युवक तमिलनाडु मजदूरी करने गया था और हाल ही में घर लौटा था। मप्र में खजुराहो जैसे अंतर्राष्ट्रीय  पर्यटन स्थल के कारण कोरोना के प्रति संवेदनशील कहा जाने वाला छतरपुर जिला बीते पचास दिनों में ग्रीन जोन में होने के बाद अचानक ही नारंगी हो गया, क्योंकि यहां नौगांव व कैथेंाकर के दो युवकोे को कोरोना के लक्षण पाए गए। ये दोनों दिल्ली में नौकरी करते थे और पिछली 16 मई को कुछ पैदल तो कुछ बस और ट्रैक्टर में सवार हो कर घर आए थे।अब यहाँ कुल 9 प्रवासी पोजिटिव मिले हैं , वह  भी ग्रामीण अंचल में .  यदि पूरे देश पर निगाह डालें तो जैसे-जैसे लॉकडाउन के तार ढीले हो रहे हैं और और लोगों  का अपने मूल घरों की ओर पलायन बढ़ रहा है, कोरोना वायरस महानगरों से कस्बों और गांव तक पहुंचता साफ दिख रहा है। यह कड़वा सच है कि ग्रामीण अंचलों में ना तो जागरूकता है और ना ही माकूल स्वास्थ्य सेवाएं या जांच की सुविधा और यही बात आशंका को प्रबल करती है कि पलायन से उपजी त्रासदी कही भारत में करोना का सामुदायिक विस्तार न कर दे।

19 मई तक उप्र के बस्ती जिले में 50 लोग कोरोना पाजीटिव दर्ज हो गए थे। ये सभी उन 78 लोगों में से हैं जो सूरत और मुंबई से अपनी बसें किराए पर ले कर घर आए थे। पूरे उत्तरप्रदेश में केवल एक दिन 19 मई को 166 संक्रमित पाए गए और ये सभी विभिन्न महानगरों से हताश हो कर लौटे थे। इस तरह कोई 691 प्रवासी कमागारों के वायरस संक्रमित होने की बात उप्र सरकार स्वीकार कर रही हैं। इनमें रामपुर में 13, बुलंदशहर में 12, हापुड़ में चार लोग हैं। चित्रकूट और संतकबीर नगर में एक-एक प्रवासी व्यक्ति के मौत की भी खबर है। बिहार के हालत तो और बुरे हैं जहां अभी तक 748 प्रवासी मजदूर  संक्रमित चिन्हित किए गए हैं। इनमें से 24 फीसदी अकेले दिल्ली से लौटे हुए हैं। 179 लोग महाराश्ट्र व 160 गुजरात से आए हैं। झारखंड के गढवा में गुजरात से लौटे 20 लोग,हजारी बाग में 06 और गिरीडीह में चार ऐसे लोग पाए गए जो काम-धंध छूटने के बाद लुटे-पिटे घर लौटे और उनमें कोरोना के लक्षण हैं। उत्तराखंड में भी यह खतरा मंडरा रहा हैं। मध्यप्रदेश के 44 जिलो में चार लाख से ज्यादा प्रवासी श्रमिक लौटने के बाद खतरे के बादल घने हो गए हैं। हरियाणा के करनाल, पानीपत, सोनीपत में हर दिन मिल रहे मरीजों का यात्रा-अतीत दिल्ली से लौटने का ही है। सबसे हास्यास्पद यह है कि दिल्ली से नोएडा-गाजियाबाद की सीमा को तो सील किया जाता है लेकिन राज्य में दूसरे राज्य से आ रहे लाखों प्रवासी कामगारों के लिए कोई रोकटोक नहीं।

प्रवासी कामगारों के अपने घर  आने के साथ कोरोना ले कर आना ही एकमात्र चिंता का विशय नहीं है, असल चिंता यह है कि दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर जहां से वे लौटे हैं, कोरोना के विस्फोट केंद्र बन चुके हैं। यह भी लगता है कि अपने इलाके में आंकड़े की बाजीगरी से खुद की पीठ ठोकने की झूठी लिप्सा ने इन श्रमिकों के सामने ऐसे हालात साजिशन पैदा करे गए ताकि ये अपने सुदूरवर्ती मूल निवासों को लौटे ंव वहां के आंकड़े बिगाड़ें। दिल्ली में लॉकडाउन लगभग खतम सा है लेकिन बिहार,मप्र और हरियाणा में दिल्ली से आए लोगों में जिस तरह कोरोना पाजीटिव पाया गया है, इससे स्पश्ट है कि राजधानी के भीतर ही भीतर कोरोना ने तगड़ी पकड़ बना ली है।
यह स्वीकार करना होगा कि कोरोना से उपजे भय, बाजार-बंदी , बेरोजगारी के चलते पूरे देश में सड़कों पर आए कई करोड़ लोगों को हमारा नेतृत्व अपनी बात कहने में असफल रहा है। तंत्र उन लोगों को अपने ही स्थान पर बने रहने के दौरान कोई दिक्कत ना होने का आश्वासन देने में असफल रहा है। वरना कोई भी अपने परिवार के साथ पाचं सौ से हजार किलोमीटर तक पैदल जाने की जिद नहीं करता। यह भी जान लें कि इतने बड़े स्तर पर हो रहा पलायन नोबल कोरोना वायरस के विस्तार को थामने के लिए  की गई 50 से ज्यादा दिन की  ‘बंदी’ या लॉक डाउन के समूचे सकारात्मक उद्देश्य को मिट्टी में मिला चुका है। आजादी के बाद के सबसे बड़े सड़क मार्ग के पलायन ने कोरोना से कही अधिक बड़े संकट को जन्म दे दिया है। सरकारें तात्त्कलिक लोकप्रियता या अपने इलाके में रहने वाले नागरिकों को भोजन-मकान-स्वास्थ्य आदि की सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहीं और इसी के कारण बेबस-हताश लोग अपने उस घर की ओर जाने को अधीर हो गए, जहां से कभी वे भूख व बेराजगारी से तंग हो कर महानगरीय जीवन में गुम हुए थे।

दिल्ली-मुंबई-सूरत जैसे महानगर की आबादी का 40 फीसदी उन कामगारेां का है जो इन षहरों का असल में संचालन करते हैं। उन पर बाजार, सुरक्षा, श्रम सब कुछ निर्भर है लेकिन एक कोरोना संकट ने उनके व पूंजीपतियों के बीच स्थापित विश्वास की दीवार को गिरा दिया। महज 40 दिन में ही ‘सभी को भोजन’ की हमारी तैयारी बिखर गई। जो समाज पहले ताली-थाली बजा कर देश के प्रधानमंत्री की बात पर अपनी सहमति दे रहा था, वह उन्हीं की यह बात नहीं माना कि लोगों का वेतन ना काटें, किराएदारों को घर से ना निकालें। परिणाम सामने है कि कितने लाख लोग घरों की तरफ निकल गए। आदर्श स्थिति तो यह होती कि इतनी बड़ी बंदी करने से पहले ऐसे श्रमिकों के आंकड़े होते, उनके लिए खुले स्थानो ंपर पर्याप्त दूरी के साथ आवास बनाए जाते- चाहे सरकारी स्कूल-भवनों में या खुले में टैंट के साथ। इतने लोगों के लिए भोजन, षौच, स्वास्थ्य व्यवस्था की एक कार्ययोजना होती। भारत में आपदा प्रबंधन हर समय समस्या के विकट रूप लेने के बाद प्रारंभ होता है। यह सत्य है कि सड़क पर आ गए इतने सारे लोगों को इतने दिनों तक आसरा देना अब किसी सिस्टम के बस का है नहीं। वैसे तो अंततराश्ट्रीय मानवाधिकार संधि की धारा 11 में कहा गया है कि दुनिया के प्रत्येक नागरिक को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का अधिकार है। दुखद है कि इतनी बड़ी संख्या में पलायन हो रही आबादी के पुनर्वास की भारत में कोई योजना नहीं है, साथ ही पलायन रोकने, विस्थापित लोगों को न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करवाने व उन्हें षोशण से बचाने के ना तो कोई कानून है और ना ही इसके प्रति संवेदनशीलता।

इसे लापरवाही कहें या तंत्र की हीला हवाली, पलायन ना रोक पाने, लोगों को घर पहुंचाने के लिए बसें-ट्रैने चलाने के कोरोना को और गति मिल गई हे। भले ही इससे महानगरों में मरीजों की संया कम हुई हो लकिन इससे इससे पीड़ित लोग दूर-दूर तक आंचलिक क्षेत्र तक पहुंच गए हैं और अब उनकी पहचान, एकांतवास, इलाज आदि और दूभर होने वाला है।



बुधवार, 27 मई 2020

A powerful Authority is require for conservation of traditional water tank

जरूरत है तालाबों को बचाने के लिए एक सशक्त निकाय की 

पंकज चतुर्वेदी


यह बात किसी से छुपी नहीं है कि देश के 32 फीसदी हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है- बारहों महीने, तीसों दिन यहां ‘जेठ’ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। वहीं जिन इलाकों की जनता जुलाई-अगस्त में अतिवृश्टि के लिए हाय-हाय करती दिखती है, सितंबर आते-आते उनके नल सूख जाते हैं। बारिश से सड़क व नदियां उफनती हैं और पानी देखते ही देखते गायब हो जाता है। इस पानी को सहेजने के लिए पारंपरिक स्त्रोत ताल-तलैया को तो सड़क, बाजार, कालोनी के कंक्रंीट जंगल खा गए । दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्त्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था।
समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्त्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है - तालाब, कुंए, बावड़ी। लेकिन एक बार फिर पीढ़ियों का अंतर सामने खड़ा है, पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी ओर काम में लग गए और अब तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई है। यही नहीं सरकार का भी कोई एक महकमा मुकम्मल नहीं है जो सिमटते तालाबों के दर्द का इलाज कर सके। तालाब कहीं कब्जे से तो कहीं गंदगी से तो कहीं तकनीकी ज्ञान के अभाव से सूख रहे है।। कहीं तालाबों को जानबूझ कर गैरजरूरी मान कर समेटा जा रहा है तो कही उसके संसाधनों पर किसी एक ताकतवर का कब्जा है। ऐसे कई मसले हैं जो अलग-अलग विभागों, मंत्रालयों, मदों में बंट कर उलझे हुए हैं। देश के इतने बड़े प्राकृतिक संसाधन, जिसकी कीमत खरबों-खरब रूप्ए हैं के संरक्षण के लिए एक स्वतंत्र, ताकतवर प्राधिकरण महति है।
तालाब केवल इस लिए जरूरी नहीं हैं कि वे पारंपरिक जल स्त्रोत हैं, तालाब पानी सहेजते हैं, भूजल का स्तर बनाए रखते हैं, धरती के बढ़ रहे तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और उससे बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है। सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई । आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे । मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा , कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  । शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है ।
वैसे तो मुल्क के हर गांव-कस्बे- क्षेत्र के तालाब अपने समृद्ध अतीत और आधुनिकता की आंधी में बर्बादी की एक जैसी कहानी कहते हैं। जब पूरा देश पानी के लिए त्राहि-त्राहि करता है, सरकारी आंकड़ो के षेर दहाड़ते हैं तब उजाड़ पड़े तालाब एक उम्मीद की किरण की तरह होते हैं। इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीटयूट फार द सेडिएरीडट्रापिक्स के विशेषज्ञ बोन एप्पन और श्री सुब्बाराव का कहना है कि तालाबों से सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक और अधिक उत्पादक होता है । उनका सुझाव है कि पुराने तालाबों के संरक्षण और नए तालाब बनाने के लिए ‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’ का गठन किया जाना चाहिए । पूर्व कृषि आयुक्त बी. आर. भंबूला का मानना है कि जिन इलाकों में सालाना बारिश का औसत 750 से 1150 मिमि है, वहां नहरों की अपेक्षा तालाब से सिंचाई अधिक लाभप्रद होती है ।
एक आंकड़े के अनुसार, मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था, जो भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में ही पचास हजार तालाब और मैसूर राज्य में 39 हजार होने की बात अंग्रेजों का रेवेन्यू रिकार्ड दर्शाता है। दुखद है कि अब हमारी तालाब-संपदा अस्सी हजार पर सिमट गई है। देश भर में फैले तालाबों ,बावड़ियों और पोखरों की 2001-02 में गिनती की गई थी। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पांच लाख से ज्यादा है, इसमें से करीब 4 लाख 70 हजार जलाशय किसी न किसी रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। यानी आजादी के बाद के 53 सालों में हमारा समाज कोई 20 लाख तालाब चट कर गया। बीस लाख तालाब बनवाने का खर्च आज बीस लाख करोड़ से कम नहीं होगा। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों  की मरम्मत , नवीकरण और जीर्णोध्दार ( आर आर आर ) के लिए योजना बनाई। ग्यारहवीं योजना में काम शुरू भी हो गया, योजना के अनुसार राज्य सरकारों को योजना को अमली जामा पहनाना था। इसके लिए कुछ धन केंद्र सरकार की तरफ से और कुछ विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मिलना था। इस योजना के तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक  स्तर पर  बुनियादी ढाँचे का विकास करना था। गाँव ,ब्लाक, जिला व राय स्तर पर योजना को लागू किया गया है। हर स्तर पर तकनीति सलाहकार समिति का  गठन किया जाना था। केंद्रीय जल आयोग और  केंद्रीय भूजल बोर्ड को इस योजना को तकनीकी सहयोग देने का  जिम्मा दिया गया, जबकि निरीक्षण का काम जल संसाधन मंत्रालय कर रहा है। बस खटका वही है कि तालाब का काम करने वाले दीगर महकमें तालाब तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन तालाब को तालाब के लिए नहीं। मछली वाले को मछली चाहिए तो सिंचाई वाले को खेत तक पानी। जबकि तालाब र्प्यावरण, जल, मिट्टी, जीवकोपार्जन की एक एकीकृत व्यवस्था है और इसे अलग-अलग आंकना ही बड़ी भूल है। एक प्राधिकरण ही इस काम को सही तरीके से संभाल सकता है।
असल में तालाबों पर कब्जा करना इसलिए सरल है कि पूरे देश के तालाब अलग-अलग महकमों के पास हैं - राजस्व, विभाग, वन विभाग, पंचायत, मछली पालन, सिंचाई, स्थानीय निकाय, पर्यटन ...षायद और भी बहुत कुछ हों। कहने की जरूरत नहीं है कि तालाबों को हड़पने की प्रक्रिया में स्थानीय असरदार लोगों और सरकारी  कर्मचारी की भूमिका होती ही है। अभी तालाबों के कुछ मामले राश्ट्रीय हरित प्राधिकरण के पास हैं और चूंकि तालाबों के बारे में जानकारी देने का जिम्मा उसी विभाग के पास होता हे, जिसकी मिली-भगत से उस की दुर्गति होती है, सो हर जगह लीपापोती होती रहती हैं। आज जिस तरह जल संकट गहराता जा रहा है, जिस तरह सिंचाई व पेयजल की अरबों रूप्ए वाली योजनाएं पूरी तरह सफल नहीं रही हैं, तालाबों का सही इस्तेमाल कम लागत में बड़े परिणाम दे सकता है। इसके लिए जरूरी है कि केंद्र में एक सशक्त तालाब प्राधिकरण गठित हो, जो सबसे पहले देशभर की जल-निधियों का सवे।ं करवा कर उसका मालिकाना हक राज्य के माध्यम से अपने पास रखे, यानी तालाबों का राश्ट्रीयकरण हो,। फिर तालाबों के संरक्षण, मरम्मत की व्यापक योजना बनाई जाए। यहां उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड के टीकमगढ जिले में  बराना के चंदेलकालीन तालाब को 35 किलोमीटर लंबी नहर के माध्यम से जामनी नदी से जोड़ा जा रहा है। इससे 18 गांव लाभान्वित होंगे। अब इस इलाके में केन-बेतवा नदी को जोड़ने की कई अरब की योजना लागू करने पर सरकार उतारू है, जबकि उसके बीस फीसदी व्यय पर छोटी, मौसमी नदियों को तालाबों से जोड़ने, तालाबों की मरम्मत और सहेजने का काम आसानी से हो सकता है। इस तरह की लघु योजनाएं तभी संभव है जब न्यायिक, राजस्व अधिकार प्राप्त तालाब प्राधिकरण पूरे देश के तालाबों को संरक्षित करने की जिम्मेदारी ले।
हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है ,ना ही इसके लिए भारीभरकम मशीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ठ पदार्थो के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देशी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे वे सहर्ष राजी हो जाते हैं।यदि जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर्र इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है । एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए । जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी ।





शुक्रवार, 22 मई 2020

time to invest in health services


ऐसा डॉक्टर तो पैसा कमाएगा ही
पंकज चतुर्वेदी
 कोरोना जैसी वैश्विक बीमारी के भारत में पांव पसारते ही हमारी यह कलई खुलने लगी कि भारत का चिकित्सा तंत्र किसी भी तरह के आकस्मिक आपदा के लिए तैयार हैं। जनवरी के आखिरी सप्ताह में केरल में पहला मामला सामने आया और तब चीन में इसका आतंक बुरी तरह था, इसके बावजूद हम अपने डाक्टर, चिकित्साकर्मियों को ही इससे नहीं बचा पाए। दुर्भाग्य है कि दिल्ली में तो सभी बड़े सरकारी अस्पताल ही कोरोना के हॉट स्पाट बन गए। यह सच है कि आने वाले दिनों में सारी दुनिया में विकास, विज्ञान और विचार के मापदंड बहुत बदले-बदले होंगे। पूरे विश्व की गतिविधियां कोरोना- पूर्व और उत्तर-कोरोना काल में स्पष्ट विभाजित दिखेंगी। ऐसे में भारत को भी प्रगति की परिभाषा को बदलते हुए देखना होगा कि हम स्वास्थ्य सेवाओं में इतने पिछड़े क्यों हैं।  केरल जैसे राज्य ने अपनी स्वास्थ्य सेवओं पर लगातार निवेश किया था तभी वहां विदेश से आने वालों की बड़ी संख्या के बावजूद कोरोना ना केवल सबसे कम फैला, बल्कि उससे ठीक होने वालों का औसत भी देश में सबसे बेहतर है।
पिछले सत्र में  ही सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि देष में कोई 8.18 लाख डॉक्टर मौजूद हैं , यदि आबादी को 1.33 अरब मान लिया जाए तो औसतन प्रति हजार व्यथ्तिक पर एक डाक्ट का आंकडज्ञ भी बहुत दूर लगता है। तिस पर मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी है कि जो भी बच्चा डाक्टर बनेगा, उसकी मजबूरी होगी कि वह दोनेा हाथों से केवल नोट कमाए। मेडिकल कालेज में प्रवेश के आकांक्षी बच्चे दसवीं कक्षा पास कर ही नामी-गिरामी कोचिंग संस्थानों  की शरण में चले जाते हैं जिसकी फीस कई-कई लाख होती है। इतनी महंगी है मेडिकल की पढ़ाई, इतना अधिक समय लगता है इसे पूरा करने में , बेहद कठिन है उसमें दाखिला होना भी---- पता नहीं क्यों इन तीन समस्याओं पर सरकार कोई माकूल कदम क्यों नही उठा पा रह है। हर राजनीतिक दल चुनाव के समय ‘सभी को स्वास्थ्य’’ के ंरंगीन सपने भी दिखाता है, लेकिन इसकी हकीकत किससी सरकारी अस्पताल में हनीं बल्कि कसिी पंच सितारा किस्म के बड़े अस्पताल में जा कर उजागर हो जाती है- भीड़, डाक्टरों की कमी, बेतहाशा फीस और उसके बावजूद भी बदहवास तिमारदार। सनद रहे हमारे देष में पहले से ही राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना, ईएसआई, सीजीएचएस जैसी कई स्वास्थ्य योजनाएं समाज के विभिन्न वर्गों के लिए हैं व सभी के हितग्राही असंतुश्ट, हताष  हैं। देषभर के सरकारी अस्पताल मषीनरी, डाक्टर तकनीषियनों के स्तर पर कितने कंगाल हैं, उसके किस्से आए रोज हर अखबार में छपते रहते हैं । भले ही केाई कुछ भी दावे कर ले, लेकिन हकीकत तो यह है कि हमारे यहां इतने डाक्टर ही नहीं है कि सभी को इलाज की कोई भी योजना सफल हो। यदि डाक्टर मिल भी जाएं तो आंचलिक क्षेत्र की बात दूर है, जिला स्तर पर जांच-दवा का इस स्तर का मूलभूत ढ़ांचा विकसित करने में दषकों लगेंगे ताकि मरीज महानगर की ओर ना भागे। 
सुप्रीम कोर्ट के निर्देष पर इस बार मेडिकल कालेजों में प्रवेष की परीक्षा राश्ट्रीय स्तर पर आयोजित की गई। अब बच्चे हर राज्य में जा कर वहां के मेडिकल कालेजों में अपनी प्राथमिकता दर्ज करवा रहे हैं, इसके लिए उन्हें उस राज्य की यात्रा करनी पड़ रही है। मान लें कि यदि दिल्ली का कोई बच्चा कर्नाटक, महाराश्ट्र और त्रिपुरा राज्यों के कालेजों में जा कर अपना विकल्प भरता है। यानि बच्चा और उसके माता या पिता को साळथ जाना होगा, वक्त कम है अर्थात हवाई यात्रा की मजबूरी होगी। फिर उस राजधानी में जा कर कम से कम दो दिन ठहरना, भोजन, परिवहन आदि यानि तीन राज्यों के कालेजों के लिए ही कम से कम दो लाख जेब में होना जरूरी है। इसके बाद भी यह गारंटी नहीं कि प्रवेष हो ही जाएगा। खर्च यहीं नहीं थमते , यदि प्रवेष मिल गया तो एक साल की ट्यूषन फीस कम से कम आठ लाख। हॉस्टल, पुस्तकें व अन्य व्यय हर महीने कम से कम चालीस हजार  यानि पांच साल में चालीस लाख फीस और न्यूनतम पच्चीस लाख उपर से। अब महज एमबीबीएस करने से काम चलता नहीं है, यदि पोस्ट ग्रेजुएट किया तो एक से डेढ करोड प्रवेष व ट्यूषन फीस। आठ साल लगा कर दो करोड़ रूप्ए व्यय कर जो डाक्टर बनेगा, वह किसी गांव में जा कर सेवा करेगा या फिर मरीजों पर दया करेगा, इसकी संभावना बहुत कम रह जाती है।
गाजियाबाद  दिल्ली से सटा एक विकसित जिला कहलाता है, उसे राजधानी दिल्ली का विस्तार कहना ही उचित होगा। कोई 43 लाख आबादी वाले इस जिले में डाक्टरों की संख्या महज 1800 है, यानी एक डाक्टर के जिम्मे औसतन तीस हजार मरीज। इनका बीस फीसदी भी आम लोगों की पहुंच में नहीं है, क्योंकि अधिकांष डाक्टर उन बड़े-बड़े अस्पतालो में काम कर रहे है, जहां तक औसत आदमी का पहुंचना संभव नहीं होता। राजधानी दिल्ली में ही चालीस फीदी आबादी झोला छाप , नीमहकीमों या छाड़-फूंक वालों के बदौलत अपने स्वास्थ्य की गाड़ी खींचती है। कहने की जरूरत नहीं है कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ सेवा की बानगी उ.प्र. का ‘‘एन एच आर एम’’ घेाटाला है। विष्व स्वास्थ्य सांख्यिकी संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में 13.3 लाख फीजिषियन यानी सामान्य डाक्टरों की जरूरत है जबकि उपलब्ध हैं महज 6.13 लाख।  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति 1667 व्यक्ति पर औसतन एक डाक्टर उपलब्ध है। अब गाजियाबाद जैसे षहरी जिले और सरकार के आंकड़ों को आमने-सामने रखें तो सांख्यिकीय-बाजीगरी उजागर हो जाती है। यहां जानना जरूरी है कि अमेरिका में आबादी और डाक्टर का अनुपात 1ः 375 है, जबकि जर्मनी में प्रति 283 व्यक्ति पर एक डाक्टर उपलब्ध है। भारत में षहरी क्षेत्रों में तो डाक्टर हैं भी, लेकिन गांव जहां 70 फीसदी आबादी रहती है, डाक्टरों का टोटा है। षहरों में भी उच्च आय वर्ग या आला ओहदों पर बैठे लोगों के लिए तो स्वास्थ्य सेवाएं सहज हैं, लेकिन आम लोगों की हालत गांव की ही तरह है।
जब तब संसद में जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा होती है तो सरकार डाक्टरों का रोना झींकती है, लेकिन उसे दूर करने के प्रयास कभी ईमानदारी से नहीं हुए। हकीकत में तो कई सांसदों या उनके करीबियों के मेंडिकल कालेज हैं और वे चाहते नहीं हैं कि देष में मेडिकल की पढ़ाई सहज उपलब्ध हो। बकौल मेडिकल कांउसिंल भारत में 335 मेडिकल कालेजों में 40,525 सीटें एमबीबीएस की हैं। कुछ साल पहले तब के केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से डाक्टर तैयार करने के चार साला कोर्स की बात कही थी, लेकिन सरकारी दम पर उसका क्रियान्वयन संभव था हीं नहीं, और प्राईवेट कालेज वाले ऐसी किसी को परवान चढ़ने नहीं देना चाहते।  हमारे देश के लगभग 400 जिलो में विशाल व सुविधा संपन्न सरकारी जिला अस्पताल हैं जहां अनुभवी डाक्टर भी हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं है कि ऐसे  अस्पतालों में महज 20 या 40 सीट के मेडिकल कालेज शुरू कर दिए जाएं। इससे स्थानीय डाक्टर को ऐकेडमिक येागदान का अवसर भी मिलेगा, साथ ही सरकारी अस्पतालों की परिसंपत्ति व संसाधन का इस्त्ेमाल बहुत कम लागत में एक रचनात्मक कार्य के लिए हो सकेगा।  तात्कालीक जरूरत तो इस बात की है कि हर राज्य में जा कर काउंसलिंग के नाम पर अपने दस्तावेज परीक्षण करवाने के आदेष पर रोक लगा कर इसकी कोई केंद्रीकृत व आनलाईन व्यवस्था लागू की जाए। साथ ही निजी या सरकारी मेडिकल कालेज में ट्यूषन फीस कम करना, सबसिडी दर पर पुस्तकें उपलब्ध करवाने जैसे प्रयोग किये जा सकते है। ताकि भारत में सभी को स्वास्थ्य का नारा साकार रूप ले सके।
हाल के वर्शों में इंजीनियरिंग और बिजनेस की पढ़ाई के लिउ जिस तरह से कालेज खुले, उससे हमारा देष तकनीकी षिक्षा और विषेशज्ञता के क्षेत्र में दुनिया के सामने खड़ा हुआ है। हमारे यहां महंगी मेडिकल की पढ़ाई, उसके बाद समुचित कमाई ना होने के कारण ही डाक्टर लगातार विदेषों की ओर रूख कर रहे हैं। यदि मेडिकल की पढ़ाई सस्ती की जाए, अधिक मेडिकल कालेज खोलने की पहल की जाए, ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों को समुचित सुविधाएं दी जाएं तो देष के मिजाज को दुरूस्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन मेडिकल की पढ़ाई में जिस तरह सरकार ने निजी क्षेत्र को विस्तार से रोक रखा है, जिस तरह अंधाधुंध फीस ली जा रही है; उससे तो यही लगता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि हमारे यहां डाक्टरों की संख्या बढ़े। और जब तक डाक्टर नहीं बढ़ेंगे सबके लिए स्वास्थ्य की बात महज लफ्फाजी से ज्यादा नहीं होगी।

केरल ने कैसे हराया कोरोना
यदि पुराने सरकारी रिकार्ड को खंगालेंगे तो पता चलेगा कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1929 में पहली बार एकीकृत स्वास्थ्य परियोजना लागू की थी जिसमें संक्रमित रेागों से आम लोगों को बचाने आदि का उल्लेख था लेकिन केरल में गैरसरकारी स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र का प्रारंभ लगभग 1921 में हो गया था। इसमें कोई शक नहीं कि उच्च साक्षरता दर के कारण केरल में स्वास्थ्य के प्रति आम लेाग भी जागरूक हैं। केरल ने कोविड 19 से लड़ने के उपाय जनवरी में ही शुरू कर दिए थे जबकि देश ने मार्च तक का इंतज़ार किया। अस्ल में साल 2018 में राज्य ने निपाह वायरस का प्रकोप देखा था इसलिए वायरस के खिलाफ जंग छेड़ते हुए केरल ने बहुत पहले ही अतीत से सबक लिया और अपने अस्पतालों को तैयार किया और कॉंटैक्ट ट्रेसिंग, आइसोलेशन व टेस्ट रणनीति संबंधी असरदार निर्देश जारी किए।
राज्य की सबसे बड़ी ताकत ग्राम स्तर तक स्वास्थ्य कार्यकताओं का सशक्त नेटवर्क है।  यहां ग्रामीण इलाक़ों में लिंक वर्कर्स या आशा (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) हैं. शहरी इलाक़ों में ऊषा (अर्बन सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) वर्कर्स हैं। इन्हें प्रशिक्षित किया जाता है कि कि आम लोगों को कैसे समझाना है। हर आशा क़रीब 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है। इनके साथ जूनियर पब्लिक हेल्थ नर्स (जेपीएचएन) भी होती हैं जो कि 10,000 लोगों की आबादी की इंचार्ज होती हैं. इनके ऊपर एक जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर होता है जो 15,000 लोगों के लिए उत्तरदायी होता है । इसके अलावा, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक न्याय विभाग के बीच एक लिंक आंगनवाड़ी वर्कर्स का भी होता है. एक आंगनवाड़ी वर्कर 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है।

शुक्रवार, 15 मई 2020

rural image can be changed by reversed migrated labor

मौका मिले तो अपनी मिट्टी की तकदीर बदल देंगे घर लौटे मजदूर 

पंकज चतुर्वेदी 

कोरोना वायरस के कारण हो रहे लंबे लॉकडाउन के कारण अनुमान है कि आने वाले कुछ महीनों में कोई छह करोड़ लोगों के सामने नौकरी का संकट खड़ा होगा। देश  के कुल रेाजगार का 88 प्रतिशत गैरनियोजित क्षेत्र से आता है और यही देष की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।  असर तो औपचारिक क्षेत्र पर भी पड़ सकता है, लेकिन इसमें अधिकांश  सरकारी व बड़ी कंपनियों है। जिन पर असर तो होगा लेकिन बहुत कम। लॉकडाउन की घोषणा  होते ही षहरों व औद्योगिक क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्र के कर्मचारियों गांव लौटने का जो सिलसिला शु रू हुआ, वह चालीस दिन बाद भी जारी है। कई जगह मजबूरी में रहना पड़ रहा है तो वहां आए दिन विद्रोह व बैचेनी का इजहार हो रहा है। भले ही बड़ी कंपनी के मालिक इस बात से आषंकित हैं कि अब ये मजदूर शायद ही वापिस लौटें और इसी को ले कर भविश्य के कल-कारखानों में काम  का आकलन कर  व्यावसायिक घराने  देष की आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी के आंकड़े जारी कर रहे हों लेकिन यही सरकार के लिए सटीक समय है कि देश  की अर्थ गतिविधियों को फिर से ग्रामीण अंचल तक ले जाया जा सकता है। इसे भविष्य की संभावना के रूप में देखें तो ‘आपदा’ को ‘अवसर’ के रूप में भी बदला जा सकता है।

सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में शहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ जबकि गावंो की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी। देश  के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहंुच गया है जबकि खेती की भूमिका दिनो-दिन घटते हुए 15 प्रतिषत रह गई है। जबकि गांवोे की आबादी अभी भी कोई 68.84 करोड़ है यानी देष की कुल आबादी का दो-तिहाई। यदि आंकड़ों को गौर से देखें तो पाएंगे कि देष की अधिकांष आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी षहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है।
कोविड-19 आपदा के कारण गांव लौटनेवालों की संख्या कई करोड़ में होगी । जान लें कि इतना बड़ा गांवंों की ओर ‘‘प्रतिलोम पलायन ’’ सरकार कभी भी नियोजित नहीं कर पाती।  अभी एक साल पहले तक उत्तराखंड राज्य 1700 भुतहा गांवों के लिए बदनाम था। वहां बाकायदा पलायन आयोग बना और उसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि क्यों पहाड़ पर  गांव वीरान हो रहे हैं। कोरोना की बंदी के चलते गत दस दिनों में कोई 60 हजार लोग अपने ‘वतन’ लौट आए हैं और हर व्यक्ति अब कसम खा रहा है कि चाहे भूख रह जाएगा लेकिन वापिस नहीं लौटेगा। यह भी सच है कि घर लौटे कई लेाग कल-कारखानों में काम करते हुए अर्धकुषल तकनीकी कर्मचारी बन गए हैं तो कुछ एक महज चौकीदारी, घरेलू काम या निर्माण कार्य में ही पारंगत हैं । बहुत से लोग छोटी-मोटी लिपकीय दक्षता हांसिल कर चुके हैं। कई एक बैटरी रिक्ष या टैक्सी के ड्रायवर या मैकेनिक हो सकते हैं। मूल बात यह है कि ये सभी महानगरीय जीवन के कड़े परिश्रम और विशमताओं को झेलने में सक्षम हैं।


यह सटीक समय है कि हर जिले के हर गांव में वापिस लौंटे लोगों का एक रिकार्ड तैयार कर लिया जाए जिसमें उनकी आयु, वे क्या काम करते थे,कहां करते थे , शैक्षिक योग्यता का उल्लेख हो। साथ ही इसकी जानकारी भी हो कि यदि उनकी पत्नी या घर की महिला काम करती थी  तो क्या करती थी, उनके बच्चे स्कूल जोते थे या नहीं । इन लोगों को फिर से महानगर जाने से रोकने की  सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है । यदि अपने गांव में ही उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों , कृशि उत्पादों का उचित प्रबंधन, कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की दूरगामी योजना प्रत्येक जिले में  निर्माण या अन्य कार्य में  योग्यता के अनुसार लोगों को रोजगार देने की पहल की जाए तो ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का सुदृढीकरण कठिन नहीं होगा। महानगरों की भीड़ कम होने से वहां मूलभूत सुविधाएं ध्वस्त होने, पर्यावरणीय संकट जैसी दिक्कतों से छुटकारा मिलेगा व उस पर व्यय होने वाले सरकारी बजट में कमी आएगी।  इस प्रक्रिया से ग्रामीणेां की लगन, प्रतिभा और कौशल का उपयोग हो सकेगा एवं स्थानीय स्तर पर  श्रम शक्ति को कुशलता से रोजगार की संभावना प्रबल होगी। मनरेगा या स्थानीय निर्माण कार्य में श्रकिों की आपूर्ति भी इसी डाटा बैंक से की जा सकती है।

यह जान लें कि  पलायन रोकने व स्थानीय रोजगार के लिए जिला स्तर की ओर आने वाली सड़कों पर ही रोजगार के साधन स्थापित करना जरूरी है। जैसे कि देश  में इन दिनों कई जगह टमाटर की बंपर फसल को सड़क पर फैंका जा रहा है या आलू के माकूल दाम नहीं मिल रहे या कर्नाटक में अंगूर व बस्तर में मिर्ची की बंपर फसल की बेकदरी है। इन सभी स्थानों पर दस से पचास लाख लागत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की स्थापना से खेत से ले कर महिलाओं तक व शिक्षित लोगों को विपणन से ले कर कार्यालयीन कार्य तक में रोजगार दिया जा सकता हैं। किसान के आंसू तो पोंछे जा ही सकते हैं। उल्लेखनीय है कि महानगरों में मजदूरी करने गए अधिकांष लेागों के पास खेती तो है लेकिन बहुत छोटा रकबा। इससे सिंचाई या आधुनिक उपकरणों से बुवाई व कटाई उनके लिए संभव नहीं होती और श्रम आधारित खेती में उन्हे कुछ बचता नहीं। यह सटीक समय है कि ग्रामीण स्तर पर सहकारी खेती, फसल का सहकारी भंडारण व विपणन को शुरू किया जाए। 


सबकुछ अपेक्षा गांव वालों से ही ना की जाए, आंचलिक स्तर पर षिक्षा, स्वास्थय, पेयजल, सड़क परिवहन पर भी काम करना होगा और इसकी कार्ययोजना जिला स्तर पर ही बने।
पशु  धन, मुर्गी व मछली पालन, निरामिश  भोजन का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण , अनाज रखने के लिए बोरे तैयार करना, पॉलीथीन पाबंदी की दषा में कपड़ों के थैले या तात्कालिक मांग के अनुसार मास्क व गमछे तैयार करना , लाख, रेशम, मधुमक्खी पालन के साथ नारियल, जड़ीबूटी , बांस की खेती, स्थानीय भोज्य, शिल्प व अन्य पदार्थों की इंटरनेट की मदद से वैश्विक  मार्केटिंग भी ऐसा कदम हो सकता है जो पूरे परिवार को घर-गांव में ही रोजगार दे।  यदि सरकार आर्थिक समृद्धि के बड़ी कंपनियों और विशा ल उद्योगों के मॉडल को तिलांजलि दे दे , जिला स्तर पर स्थानीय उत्पाद पर आधांरित  लघु व मध्यम उद्योग की स्थापना  और साथ ही स्थानीय उत्पाद की बेहतरीन मार्केटिंग पर काम करे तो  किसी संभावित छह करोड़ में से अस्सी फीसदी लोगों को बगैर पलायन के रोजगार दिया जा सकता है, लेकिन यह सबकुछ आने वाले तीन महीनों में ही करना होगा, वरना असंतोश, बेगारी इन्हें फिर से महानगरीय या औद्योगिक नारकीय जीवन की ओर ढकेल देगी।

गुरुवार, 14 मई 2020

grasshopper conspiracy of Pakistan against India


पाकिस्तान की टिड्डा साजिश
पंकज चतुर्वेदी

हाल ही में उ.प्र,म.प्र सहित कई राज्य सरकारों ने जिला स्तर पर चेतावनी भेजी है कि किसी बड़े टिड्डी हमले से बचाव की तैयारी व इस मसले पर ग्रामीणों को जागरूक किया जाए। विदित हो राजस्थान के थार में पिछले साल बरसात के बाद ही पाकिस्तान की तरफ से टिड्डी हमले षुरू हो गए थे। अभी गर्मी षुरू होते ही भारत-पाकिस्तान की सीमा पर हजारों किलोमीटर में फैले रेगिस्तान में अंधड़ चलने लगे हैं और इस रेतीले बवंडर के साथ बह कर आ रहे टिड्डों के गिरोह भारत के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहे हैं। अंधड़ के साथ उड़ने से टिड्डी दल एक रात में सत्तर किलोमीटर तक सफर तय कर रहे है। और गुरूवार तक इनका व्यापक असर फलौदी तक हो चुका था। सुनते ही डर लगता है कि फसलों को  पलक झपकते ही चट करने वाले इन टिड्उों के गिरोह का फैलाव कोई चार वर्ग किलोमीटर हैं । यह जहां से गुजर रहा है, वहां आसमान नहीं दिखता और दिन में अंधेरा छा जाता है। यह बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान जानबूझ कर ऐसी हरकतें कर रहा है जिससे टिड्डी दल भारत में नुकसान करें।


राजस्थान सरकार के दस्तावेज बताते हैं कि मई-2019 से फरवरी 2020 तक  पाकिस्तान से आए टिड्डी दल  ने सात जिलों में कोई एक हजार करोड़ का नुकसान किया है। बाडमेर में 22 हजार हैक्टर, जेसलमेर में 75 हजार , जोधपुर में 4500 हैक्टर खेतों सहित कुल 2.25 लाख हैक्टर की खड़ी फसल यह टिड्डी दल चबा चुके हैं। टिड्डी दल का इतना बड़ा हमला आखिरी बार 1993 में यानि 26 साल पहले हुआ था।
बीते साल आषाढ़ लगते ही राजस्थान के रेतीले शेखावटी में दो दिन धुंआधार बारिश  हुई जिसने रेगिस्तान में कई जगह नखलिस्तान बना दिया था। सूखी, उदास सी रहने वाली लूनी नदी लबालब हो गई । पानी मिलने से लोग बेहद खुश  थे और जम कर खेतों में मेहनत भी की गई।

सोमालिया जैसे उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी देषों से ये टिड्डे बारास्ता यमन, सऊदी अरब और पाकिस्तान भारत पहुंचते रहे हैं । विश्व  स्वास्थ संगठन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ये कीट एक बार इलाके में घुस गए तो इनका प्रकोप कम से कम तीन साल जरूर रहेगा । अतीत गवाह है कि 1959 में ऐसे टिड्डों के बड़े दल ने बीकानेर की तरफ से धावा बोला था, जो 1961-62 तक टीकमगढ़(मध्यप्रदेश ) में तबाही मचाता रहा था । इसके बाद 1967- 68, 1991--92 में भी इनके हमले हो चुके हैं। अफ्रीकी देशों  में महामारी के तौर पर पनपे टिड्डी दलों के बढ़ने की खबरों में मद्देनजर हाल ही में राजस्थान सरकार ने अफसरों की मींटंग बुला कर इस समस्या ने निबटने के उपाय तत्काल करने के निर्देश दिए हैं ।

हमारी फसल और जंगलों के दुष्मन टिड्डे, वास्तव में मध्यम या बड़े आकार के वे साधारण टिड्डे(ग्रास होपर) हैं, जो हमें यदा कदा दिखलाई देते हैं । जब ये छुटपुट संख्या में होते हैं तो सामान्य रहते हैं, इसे इनकी एकाकी अवस्था कहते हैं । प्रकृति का अनुकूल वातावरण पा कर इनकी संख्या में अप्रत्याषित बढ़ौतरी हो जाती है और तब ये बेहद हानिकारक होते हैं। रेगिस्तानी टिड्डे इनकी सबसे खतरनाक प्रजाति हैं । इनकी पहचान पीले रंग और विषाल झुंड के कारण होती हैं। मादा टिड्डी का आकार नर से कुछ बड़ा होता हैं और यह पीछे से भारी होती हैं। तभी जहां नर टिड्डा एक सेकंड में 18 बार पंख फड्फड़ाता है,वहीं मादा की रफ्तार 16 बार होती हैं । गिगेरियस जाति के इस कीट के मानसून और रेत के घोरों में पनपने के आसार अधिक होते हैं ।

एक मादा हल्की नमी वाली रेतीली जमीन पर ं40 से 120 अंडे देती है और इसे एक तरह के तरल पदार्थ से ढंक देती हैं । कुछ देर में यह तरल सूख कर कड़ा हो जाता है और इस तरह यह अंडों के रक्षा कवच का काम करता हैं। सात से दस दिन में अंडे पक जाते हैं । बच्चा टिड्डा पांच बार रंग बदलता हैं । पहले इनका रंग काला होता है, इसके बाद हल्का पीला और लाल हो जाता हैं । पांचवी कैंचुली छूटने पर इनके रंग निकल आते हैं और रंग गुलाबी हो जाता हैं । पूर्ण वयस्क हाने पर इनका रंग पीला हो जाता हैं । इस तरह हर दो तीन हफ्ते में टिड्डी दल हजारों गुणा की गति से बढ़ता जाता हैं ।
यह टिड्डी दल दिन में तेज धूप की रोश नी होने के कारण बहुधा आकाश  में उड़ते रहते हैं और शाम ढलते ही पेड़-पौधों पर बैठ कर उन्हें चट कर जाते हैं । अगली सुबह सूरज उगने से पहले ही ये आगे उड़ जाते हैं । जब आकाश  में बादल हों तो ये कम उड़ते हैं, पर यह उनके प्रजनन का माकूल मौसम होता हैं । ताजा शोध  से पता चला है कि जब अकेली टिड्डी एक विषेश अवस्था में पहुंच जाती है तो उससे एक गंधयुक्त रसायन निकलता हैं । इसी रासायनिक संदेश  से टिड्डियां एकत्र होने लगती हैं और उनका घना झुंड बन जाता हैं । इस विशेष  रसायन को नष्ट  करने या उसके प्रभाव को रोकने की कोई युक्ति अभी तक नहीं खोजी जा सकी हैं ।
Add caption
वैसे तो भारत-पाकिस्तान के बीच टिड्डों को रोकने  के समझौते हैं और इसकी मीटिंग भी होती हैं, लेकिन इस बार साफ लगता है कि पाकिस्तान ने भारत में टिड्डी हमले को साजिश न अंजाम दिया है। संयुक्त राष्ट्र  के खाद्य और कृषि  संगठन(एफएओ ) ने पहले से ही चेता दिया थ कि इस बार टिड्डी हमला हो सकता है।  जनवरी-2020 में पाकिस्तान के रेगिस्तानी इलाकों में इनके गुलाबी पंख फड़फडा़ने लगे थे । समझौते के मुताबिक तो पाकिस्तान को उसी समय रासायनिक छिड्काव कर उन्हें मार डालना था लेकिन वह नियमित मीटिंग में झूठे वायदे करता रहा। यही नहीं अब पाकिस्तान चीन से 10 एयर ब्लास्ट स्प्रेयर ले रहा है। ये मशीन  ट्रक पर फिट की जा सकती हैं और ये बहुत ही तेज वेग से कीटनाशकों का छिड़काव करती हैं। यदि पाकिस्तान ने इन मशीनों  का इस्तेमाल अंधड़ के समय भारत की तरफ किया तो तेज गति के कारण टिड्डे कम मरेंगे और वे और ज्यादा तेज वेग से हमारे यहां घुसेंगे। वैसे टिड्डों के व्यवहार से अंदाज लगाया जा सकता है कि उनका प्रकोप आने वाले साल में जुलाई-अगस्त तक चरम पर होगा । यदि राजस्थान और उससे सटे पाकिस्तान सीमा पर टिड्डी दलों के भीतर घुसते ही सघन हवाई छिड़काव किया जाए, साथ ही रेत के धौरों में अंडफली नष्ट  करने का काम जनता के सहयोग से शरू  किया जाए तो अच्छे मानसून का पूरा मजा लिया जा सकता हैं ।
खबर है कि अफ्रीकी देषों से एक किलोमीटर तक लंबाई के टिड्डी दल आगे बढ़ रहे हैं । सोमालिया जैसे देषो ंमें आंतरिक संघर्श और गरीबी के कारण सरकार इनसे बेखबर हैं । इसके बारे में भी एफएओ चेता चुका है कि मानसून के साथ इस दल का हमला गुजरात में भुज के आसपास होगा। यमन या अरब में कोई खेती होती नहीं हैं । जाहिर है कि इनसे निबटने के लिए भारत और पाकिस्तान को ही मिलजुल का सोचना पड़ेगा ।
पंकज चतुर्वेदी


Human have to keep distance from forest



घने जंगल से इंसान की दूरी बढ़ाना होगा

पंकज चतुर्वेदी



पिछले एक दशक के दौरान देखा गया कि मानवीय जीवन पर संक्रामक रोगों की मार बहुत जल्दी- जल्दी पड रही है और ऐसी बीमारियों का 60% हिस्सा जन्तुजन्य है . यही नहीं इस तरह की बीमारियों का 72 फ़ीसदी जानवरों से सीधा इंसान में आ रहा है . हाल ही वर्षों में दुनिया में कोहराम मचा है कोविड-19 का मूल भी जंगली जानवरों से ही है. एच आई वी , सार्स, जीका ,हेन्द्रा, ईबोला, बर्ड फ्लू आदि सभी रोग भी जंतुओं से ही इंसानों को लगे हैं . दुखद है कि अपनी भौतिक सुखों की चाह में इंसान ने पर्यावरण के साथ जमकर छेड़छाड़ की और इसी का परिणाम है की जंगल, उसके जीव् और इंसानों के बीच दूरियां कम होती जा रही है . जंगल का अपने एक चक्र हुआ करता था , सबसे भीतर घने – ऊँचे पेड़ों वाले जंगला, गहरी घास जो कि किसी बाहरी दखल से मुक्त रहती थी , वहां मनुष्य के लिए खतरनाक जानवर शेर आदि रहते थे . वहीं ऐसे सूक्ष्म जीवाणुओं का बसेरा होता था जो यदि लगातार इंसान के सम्पर्क में आये तो अपने गुन्सुत्रिय संस्कारों को इन्सान के शरीर के अनुरूप बदल सकता था . इसके बाहर कम घने जंगलों का घेरा- जहां हिरन जैसे जानवर रहते थे, माँसाहारी जानवर को अपने भोजन के लिए महज इस चक्र तक आना होता था . उसके बाद जंगल का ऐसा हिस्सा जहां नसान अपने पालतू मवेशी चराता, अपनी इस्तेमाल की वनोपज को तलाशता और इस घेरे में ऐसे जानवर रहते जो जंगल और इंसान दोनों के लिए निरापद थे , तभी इस पिरामिड में शेर कम, हिरन उससे ज्यादा, उभय- गुनी जानवर उससे ज्यादा और उसके बाहर इंसान , ठीक यही प्रतिलोम जंगल के घ्नेप्न में लागु होता जंगलों की अंधाधुंध कतई और उसमें बसने वाले जानवरों के प्राकृतिक पर्यावास के नष्ट होने से इंसानी दखल से दूर रहने वाले जानवर सीधे मानव के संपर्क में आ गए और इससे जानवरों के वायरसों के इंसान में संक्रमण और इंसान के शारीर के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता भी विकसित हुयी . खासकर खेती के कारण , भूमि के बदलते इस्तेमाल ने जन्तुजन्य रोगों की राह इंसान तक आसान कर दी है. जहां वन्यजीवों की विस्तृत जैव विविधता पर इंसान की घनी आबादी का साया पड़ा , वहां ऐसे रोग संक्रमण की अधिक संभावना होती है . तीन तरीकों से जैव विविधता के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम भयानक बीमारियों के रूप में सामने आते हैं . पहला, पारिस्थिकी तंत्र में छेड़छाड़ के कारण इंसान और उसके पालतू मवेशियों का वन्य जीवों से सीधा संपर्क होना , दूसरा , चमगादड़ जैसे जानवर जो कि इंसानी बस्तियों में रहने की आदि हैं का इंसान या उनके मवेशियों से ज्यादा संपर्क होना . तीसरा, सरलीकृत पारिस्थितिक तंत्र में इन जीवित वन्यजीव प्रजातियों द्वारा अधिक रोगजनकों का संक्रमण होता है। जनसंख्या और उनके मवेशियों की तेजी से बढती आबादी का सीधा अर्थ है कि वन्यजीवों की प्रजातियां और उनके द्वारा वाहक रोगजनकों से अधिक से अधिक संपर्क.
आज, 7.8 अरब इंसान धरती के प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र का मनमाना दोहन करने पर उतारू हैं । उनका पशुधन भी इस कार्य में अपने मालिक इंसानों का साथ देता है . एक मोटा अनुमान है कि धरती पर कोई 4.7 अरब मवेशी, सुअर, भेड़ और बकरियां के साथ 23.7 अरब मुर्गियां हैं . इस तरह यह धरती किसी सूक्ष्म जीवाणु और रोगजनकों के लिए एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति में जाने के नए अवसरों के साथ एक तेजी से संक्रमित हो रही है । जान लें जब वायरस अपना नया होस्ट अर्थान मेजबान तलाशता है तो यह बात खासतौर पर महत्व रखती हैं कि मेजबान शारीर की कोशिका अर्थात सेल के ऊपर बने अभिग्राहक अर्थात रिसेप्टर के साथ इस वायरस की सतह पर लगे प्रोटीन का सम्मिलन कितनी अच्छी तरह होता है . यह सम्मिलन क्षमता विकसित करने के लिए वायरस को मेजबान शारीर की संरचना को भांपने में समय लगता है , जाहिर है कि यदि किसी जंगल के जानवर का जितना अधिक सम्पर्क इंसानी परिवेश से होगा, जानवर का वायरस , इंसान के शरीर के अनुरुप खुद तो ढालने में सफल होगा . चूँकि कोरोना वायरस सिंगल स्ट्रैडेड वायरस है अतः इसके जीनोम में बदलाव अर्थात म्यूटेशन बहुत अधिक होता है . तभी हम सुन रहे हैं कि कोरोना बहुत तेजी से अपना स्वरूप बदल रहा है और वुहान वाला वायरस न इटली में मिला और न ही भारत में . हर जगह उसने अपना स्वरुप थोड़ा बदला .
संयुक्त राष्ट्र में जैव विविधता प्रकोष्ठ पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि दुनिया को भविष्य में इस तरह के जन्तुजन्य वायरस हमलों से बचाना है तो हर तरह के जंगली जानवरों के खुले बाज़ार पर रोक लगाना होगा . संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन की कार्यकारी सचिव एलिजाबेथ मारूमा मेम्रा ने इंसान के भोजन के लिए ज़िंदा या मृत जंगली जानवरों की तिजारत के गंभीर परिणाम की चेतावनी दी है . विदित हो कोरोना का बीज कहे जाने वाले चीन ने गंध-बिलाव, भेदिये के बच्चे, पेंगोलिन जैसे जानवरों को छोटे पिंजड़ों में बंद कर भोजन के रूप में बेचने पर पाबंदी लगा दी है, चीन ने पाया कि इस तरह गंदे परिवेश में जानवरों को बंद कर रखने से वे कई जटिल बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और यहं से संक्रमण इंसान में जाता है . कई वैज्ञानिक तो समूचे चीन में इस तरह के जानवर मंडी पर स्थायी पाबंदी की मांग कर चुके हैं. पश्चिमी- मध्य अफ्रीका में ईबोला हो या पूर्वी अफ्रीका का निपाह का हमला, बानगी है कि प्रकृति के नुक्सान और इंसानों में नए तरीके के रोगों के संचरण के बीच गहरा नाता है . विश्व स्वास्थ्य संगठन भी जानवरों के कच्चे या कम पके मांस, कच्चे दूध और जानवरों के अंगों को कच्चा खाने से परहेज की चेतावनी जारी कर चुका है . यह कडवा सच है कि दुनिया के बड़े हिस्से में प्रतिकूल भूगोलिक परिस्थिति और गरीबी के कारण जंगली जानवरों का मांस खाना वहां के बाशिंदों की मज़बूरी है , यदि हमें भविष्य में कोरोना जैसे संक्रामक रोगों से दुनिया को बचाना है तो ऐसे लोगों के लिए वैकल्पिक भोजन की व्यवस्था भी करनी होगी .
यह बहुत दुविधा के हालात हैं कि इंसान और घने जंगलों के बीच दूरी बढ़ाना है, अर्थात जंगल की जमीन को खेत बनाने से रोकना भी है , जंगली जानवरों के शिकार पर पाबंदी भी लगाना है और भोजन के लायक जीवों व् अन्न का उत्पादन भी बढ़ाना है, जैव विविधता के संरक्षण के लिए कीटनाशकों के प्रयोग से भी बचना है और इंसान को भूख से भी बचाना है . अब दुनिया को विकास का चेहरा बदलना होगा , लम्बे लॉक डाउन ने इंसान को सीखा दिया है कि उसकी जरूरतें सीमित है लेकिन लोभ असीमित .




रविवार, 10 मई 2020

preserve biodiversity to prevent virus like corona



वायरस हमले से बचना हो तो जैव विविधता को सहेजना होगा 

पंकज चतुर्वेदी 



इंसान और प्रकृति एक ही तंत्र के सिक्के के दो पहलु हैं , एक दुसरे पर आश्रित , जहां प्रकृति इंसान की भोजन, जल, औषधि, स्वच्छ हवा सहित कई मूलभूत जरूरतों को मौन रह कर पूरा करती है तो वह भी अपेक्षा करती है कि इंसान उसके नैसर्गिक स्वरुप में कम ही दखल दे .पिछले एक दशक के दौरान देखा गया कि मानवीय जीवन पर संक्रामक रोगों की मार बहुत जल्दी- जल्दी पड रही है और ऐसी बीमारियों का 60% हिस्सा जन्तुजन्य है . यही नहीं इस तरह की बीमारियों का 72 फ़ीसदी जानवरों से सीधा इंसान में आ रहा है . हाल ही वर्षों में दुनिया में कोहराम मचा है कोविड-19 का मूल भी जंगली जानवरों से ही है. एच आई वी , सार्स, जीका ,हेन्द्रा, ईबोला, बर्ड फ्लू आदि सभी रोग भी जंतुओं से ही इंसानों को लगे हैं . दुखद है कि अपनी भौतिक सुखों की चाह में इंसान ने पर्यावरण के साथ जमकर छेड़छाड़ की और इसी का परिणाम है की जंगल, उसके जीव् और इंसानों के बीच दूरियां कम होती जा रही है . जंगलों की अंधाधुंध कतई और उसमें बसने वाले जानवरों के प्राकर्तिक पर्यावास के नष्ट होने से इंसानी दखल से दूर रहने वाले जानवर सीधे मानव के संपर्क में आ गए और इससे जानवरों के वायरसों के इंसान में संक्रमण और इंसान के शारीर के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता भी विकसित हुयी . खासकर खेती के कारण , भूमि के बदलते इस्तेमाल ने जन्तुजन्य रोगों की राह इंसान तक आसान कर दी है. जहां वन्यजीवों की विस्तृत जैव विविधता पर इंसान की घनी आबादी का साया पड़ा , वहां ऐसे रोग संक्रमण की अधिक संभावना होती है . तीन तरीकों से जैव विविधता के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम भयानक बीमारियों के रूप में सामने आते हैं . पहला, पारिस्थिकी तंत्र में छेड़छाड़ के कारण इंसान और उसके पालतू मवेशियों का वन्य जीवों से सीधा संपर्क होना , दूसरा , चमगादड़ जैसे जानवर जो कि इंसानी बस्तियों में रहने की आदि हैं का इंसान या उनके मवेशियों से ज्यादा संपर्क होना . तीसरा, सरलीकृत पारिस्थितिक तंत्र में इन जीवित वन्यजीव प्रजातियों द्वारा अधिक रोगजनकों का संक्रमण होता है। जनसंख्या और उनके मवेशियों की तेजी से बढती आबादी का सीधा अर्थ है कि वन्यजीवों की प्रजातियां और उनके द्वारा वाहक रोगजनकों से अधिक से अधिक संपर्क.
आज, 7.8 अरब इंसान धरती के प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र का मनमाना दोहन करने पर उतारू हैं । उनका पशुधन भी इस कार्य में अपने मालिक इंसानों का साथ देता है . एक मोटा अनुमान है कि धरती पर कोई 4.7 अरब मवेशी, सुअर, भेड़ और बकरियां के साथ 23.7 अरब मुर्गियां हैं . इस तरह यह धरती किसी सूक्ष्म जीवाणु और रोगजनकों के लिए एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति में जाने के नए अवसरों के साथ एक तेजी से संक्रमित हो रही है । जान लें जब वायरस अपना नया होस्ट अर्थान मेजबान तलाशता है तो यह बात खासतौर पर महत्व रखती हैं कि मेजबान शारीर की कोशिका अर्थात सेल के ऊपर बने अभिग्राहक अर्थात रिसेप्टर के साथ इस वायरस की सतह पर लगे प्रोटीन का सम्मिलन कितनी अच्छी तरह होता है . यह सम्मिलन क्षमता विकसित करने के लिए वायरस को मेजबान शारीर की संरचना को भांपने में समय लगता है , जाहिर है कि यदि किसी जंगल के जानवर का जितना अधिक सम्पर्क इंसानी परिवेश से होगा, जानवर का वायरस , इंसान के शरीर के अनुरुप खुद तो ढालने में सफल होगा . चूँकि कोरोना वायरस सिंगल स्ट्रैडेड वायरस है अतः इसके जीनोम में बदलाव अर्थात म्यूटेशन बहुत अधिक होता है . तभी हम सुन रहे हैं कि कोरोना बहुत तेजी से अपना स्वरूप बदल रहा है और वुहान वाला वायरस न इटली में मिला और न ही भारत में . हर जगह उसने अपना स्वरुप थोड़ा बदला .
खेती के बदलते तरीके ने कृषि जैव विविधता को बहुत सीमित कर दिया, जैसे हमारी थाली से मोटे अनाज का गायब होना , नए किस्म की फल-सब्जियों का दूर देशों से ला कर क्रितिरिम तरीके से उत्पादन . जान लें दुनिया के किसी भी ईलाके में पारम्परिक रूप से उगने वाली फसल वहां के मौसम, पारिस्थिकी , वहां के बाशिंदों की जरूरत के मुताबिक़ कई हज़ार साल में विकसित हुयी है लेकिन पिछले कुछ सालों में हमने इस पारंपरिक भोजन प्रणाली को छिन्न-भिन्न कर दिया . परिणाम सामने है कि कहीं भोजन में अतिरिक्त प्रोटीन है तो कहनी अपेक्षित चूने की मात्रा में कमी . इस तरह की फसल की पैदावार जमीन के पारिस्थितिकी तन्त्र के साथ भी खिलवाड़ होता है . हर खेत-मिटटी में अनगिनत अति सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो इंसान की प्रतिरोधक क्षमता के सयाय्क होते हैं, गैर पारम्परिक फसल उगाने के लिए डी जाने वाले कृत्रिम खाद-दवा- रसायन असल में ऐसे ही सूक्ष्म, ना दिखने वाले लेकिन इंसान और उसके परिवेश के मित्र जीवाणुओं का खात्मा कर देते हैं , किसी घने जंगल से बस्ती तक किसी खतरनाक जीवाणु के आने के रास्ते में ये न दिखने वाले सिपाही लगातार मुकाबला करते रहते हैं, जिनकी शक्ति को खेत में इस्तेमाल रसायन निष्क्रिय कर देते हैं.
संयुक्त राष्ट्र में जैव विविधता प्रकोष्ठ पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि दुनिया को भविष्य में इस तरह के जन्तुजन्य वायरस हमलों से बचाना है तो हर तरह के जंगली जानवरों के खुले बाज़ार पर रोक लगाना होगा . संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन की कार्यकारी सचिव एलिजाबेथ मारूमा मेम्रा ने इंसान के भोजन के लिए ज़िंदा या मृत जंगली जानवरों की तिजारत के गंभीर परिणाम की चेतावनी दी है . विदित हो कोरोना का जंक कहे जान वाले चीन ने गंध-बिलाव, भेदिये के बच्चे, पेंगोलिन जैसे जानवरों को छोटे पिंजड़ों में बंद कर भोजन के रूप में बेचने पर पाबंदी लगा दी है, चीन ने पाया कि इस तरह गंदे परिवेश में जानवरों को बंद क्र रखने से वे कई जटिल बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और यहं से संक्रमण इंसान में जाता है . कई वैज्ञानिक तो समूचे चीन में इस तरह के जानवर मंदी पर स्थायी पाबंदी की मांग कर चुके हैं. पश्चिमी- मध्य अफ्रीका में ईबोला हो या पूर्वी अफ्रीका का निपाह का हमला, बानगी है कि प्रकृति के नुक्सान और इंसानों में नए तरीके के रोगों के संचरण के बीच गहरा नाता है . विश्व स्वास्थ्य संगठन भी जानवरों के कच्चे या कम पके मांस, कच्चे दूध और जानवरों के अंगों को कच्चा खाने से परहेज की चेतावनी जारी कर चुका है . यह कडवा सच है कि दुनिया के बड़े हिस्से में प्रतिकूल भूगोलिक परिस्थिति और गरीबी के कारण जंगली जानवरों का मांस खाना वहां के बाशिंदों की मज़बूरी है , यदि हमें भविष्य में कोरोना जैसे संक्रामक रोगों से दुनिया को बचाना है तो ऐसे लोगों के लिए वैकल्पिक भोजन की व्यवस्था भी करनी होगी .
यह बहुत दुविधा के हालात हैं कि इंसान और घने जंगलों के बीच दूरी बढ़ाना है, अर्थात जंगल की जमीन को खेत बनाने से रोकना भी है , जंगली जानवरों के शिकार पर पाबंदी भी लगाना है और भोजन के लायक जीवों व् अन्न का उत्पादन भी बढ़ाना है, जैव विविधता के संरक्षण के लिए कीटनाशकों के प्रयोग से भी बचना है और इंसान को भूख से भी बचाना है . अब दुनिया को विकास का चेहरा बदलना होगा , लम्बे लॉक डाउन ने इंसान को सीखा दिया है कि उसकी जरूरतें सीमित है लेकिन लोभ असीमित .


गुरुवार, 7 मई 2020

SOP on quarantine center is necessary to fight with covid 19

क्वारंटाइन सेंटरों की भी लें सुध


कोरोना संक्रमण और उसके कुप्रभावों को देश व दुनिया को लंबे समय तक झेलना है। ऐसे में समाज को उसकी इच्छा-शक्ति के साथ ही इससे उबारा जा सकता है। आज जरूरी है कि केंद्र सरकार क्वारंटीन सेंटर के हर पहलू पर एक एसओपी जारी करे।


बीते  दो महीने के दौरान कोरोना से बचाव के लिए क्वारंटीन सेंटर या एकांतवास में रखे गए कम से कम 20 लोग आत्महत्या कर चुके हैं। इसमें उत्तर प्रदेश के शामली के निर्माणाधीन अस्पताल में क्वारंटाइन या एकांतवास के लिए लाया गया युवक भी है और सिडनी (आस्ट्रेलिया) से लौट कर सफदरजंग अस्पताल के सातवें तल्ले से कूद कर आत्महत्या करने वाला भी। पूरी दुनिया के लिए चुनौती बने लाइलाज नावेल कोरोना वायरस संक्रमण का अभी तक खोजा गया बसे माकूल उपाय सामाजिक दूरी बनाए रखनाा और संदिग्ध मरीज को समाज से दूर रख देना ही है। समाज में मामूली खांसी या बुखार वाला भी कोरोना से संक्रमित हो सकता है और इस बीमारी के लक्ष्ण उभरने या खुद ब खुद ठीक हो जाने में कोई 14 दिन का समय लगता है। यह समय इंसान व उसके परिवार, उसके संपर्क में आए लोगों के जीवन-मरण का प्रश्न होता है। तभी संभावित मरीज को समाज से दूर रखना ही सबसे माकूल इलाज माना गया। जिस बीमारी के कारण पूरी दुनिया थम गई हो, उसकी भयावहता से बचने के लिए कुछ दिन अलग रहने से समाज एक वर्ग का बचना या लापरवाही करना व्यापक स्तर पर नुकसानदेह हो सकता है। दुर्भाग्य है कि भारत में इस बीमारी के सवा सौ दिन हो रहे हैं, लेकिन अभी तक इससे जूझने के सबसे सशक्त पक्ष ‘क्वारंटीन सेंटर’ कैसा हो? उसमें कितने लोग हों? कितने दिन के लिए हों? उनका खानपान कैसा हो?

गाजियाबाद में 32 दिन से क्वारंटीन सेंटर में ‘बंद’ लोगों की जब कोई सुध लेने नहीं आया तो लोगों ने अनशन शुरू कर दिया। चूंकि वहां निरुद्ध लोगों का अभी तक पुलिस सत्यापन नहीं हुआ, इस लिए उन्हें छोड़ा नहीं जा रहा। अमरोहा में भी लोगों को एकांतवास में 30 से ज्यादा दिन हो गए, लेकिन उन्हें मुक्त नहीं किया गया। देश की राजधानी दिल्ली में भी यही हाल हैं और तब्लीगी जमात वाले लोग एक महीने से अधिक समय से क्वारंटीन में ही हैं। बृंदावन के एकांतवास केंद में तो तीन दिन धरना चला। वहां केवल लोगों को बंद कर दिया गया। न भोजन, न सफाई, न मेडिकल। यहां एक साथ रखे गए लोगों में वे परिवार भी हैं, जिन्हें कोरोना पॉजीटिव पाया गया। पंद्रह दिन में न तो ऐसे परिवारजनों के कोरोना का परीक्षण किया गया और ना ही अन्य लोगों का। जाहिर है कि यदि उनमें से कोई एक भी संक्रमित होगा तो यह क्वारंटीन सेंटर ही ‘हॉट स्पाट’ बन जाएगा। विडंबना यह है कि क्वारंटीन सेंटर एक चिकित्सा केंद्र है लेकिन वहां स्वास्थ्यकर्मी के स्थान पर पुलिस वाले होते हैं जो प्रत्येक बीमारी का इलाज डंडा, गली या धमकी समझते हैं।





मध्य प्रदेश के ‘वुहान’ बन गए इंदौर से दस किलामीटर दूर मांगलिया के छात्रावास में रखे ऐसे कोई 200 मजदूरों को रखा गया है, जो पेट की आग भड़कने से जब निढाल हो गए तो पैदल ही अपने घरों की ओर चल दिए। रास्ते में पकड़े गए और उन्हें एक जेलनुमा परिवेश में ताला डाल कर रख दिया गया है। भीतर भयंकर गंदगी और गरमी है, खाना लगभग न के बराबर मिलता है, नहाने और हाथ धोने को साबुन-पानी नदारद है। इनमें कई गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग हैं। ये 15 दिन से वहां बाड़ाबंदी में हैं, लेकिन न तो उन्हें मुक्त किया जा रहा है और न ही उनके सवालों का किसी के पास जवाब है।

 मध्य प्रदेश के गुना जिले के प्राथमिकशाला देवीपुर में स्थापति क्वारंटीन सेंटर को देख कर तो साफ झलकता है कि प्रशासन इन मजदूरों को इंसान ही नहीं समझता है। यहां स्कूल के शौचालय में एक परिवार को रहने, भोजन करने पर मजबूर किया गया है। यह तो महज बानगी है, देश के हर राज्य से, हर जिले में क्वारंटीन सेंटर की व्यवस्था, प्रणाली को ले कर इससे भयावह तस्वीरें आ रही हैं। कुछ लोग सक्षम हैं, तो वे अपने पैसे से होटलों में अपना एकांतवास काट रहे हैं, लेकिन उनकी भी चिकित्सा जांच या सावधानी पर कोई स्पष्ट दिशा निर्देश हैं नहीं। इंदौर, बिहार के मधुबनी, उत्तर प्रदेश के कई स्थानों से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं, जब पुलिस या प्रशासन बाहर से आए लोगों को एकांतवास के लिए ले जाने को गया तो वहां बड़े स्तर पर हिंसा हुई व सरकारी कर्मचारियों व पुलिस की जान पर बन आई।


 एकांतवास जैसी बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण निषेध उपाय के प्रति कोताही का आलम यह है कि हर राज्य और जिले के अपने कायदे-कानून व बजट हैं। झारखंड के 24 जिलों में कुल 3813 क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं, जिनमें इस समय कोई ग्यारह हजार लोग हैं। इनके नाश्ता व दो समय के भाजन का सरकारी बजट महज 60 रुपये प्रतिदिन-प्रति व्यक्ति है। मथुरा में प्रति व्यक्ति 500 रुपये का प्रावधान हैं। बिहार के सीवान का जिला प्राशासन हर दिन एक व्यक्ति पर भोजन, साबुन व स्वच्छता पर  1700 रुपये खर्च का दावा कर रहा है तो उत्तर प्रदेश के महाराजगंज में यह खर्च 80 रुपये ही है। राजस्थान में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 2440 रुपये का प्रावधान हैं। हर जगह अलग-अलग नीति व क्रियान्वयन। जबकि यह जानना जरूरी है कि कोरोना से जूझने के लिए इंसान के शरीर की प्रतिरोध क्षमता सशक्त होना अनिवार्य है और इसके लिए उसके नियमित पौष्टिक आहार, व्यक्तिगत स्वच्छता  और साफ हवापानी अनिवार्य हैं। देश के अधिकांश क्वारंटीन सेंटर इस मूलभूत जरूरत के ठीक उलट बंहद गंदे, घटिया भोजन और स्वस्थ्य व चिकित्सा के मामले में बेहद लापरवाह हैं। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि जेल जैसे भीड़भरे ऐसे एकांत केंद्रों में रह कर इंसान भले ही कोरोना से बच जाए, लेकिन उसके कई अन्य बीमारी अपना शिकार बना सकती हैं। कई जगह तपेदिक , त्वचा रोग जैसे संक्रामक रोगों के मरीजों को अन्य लोगों के साथ रख दिया गया। इसके बाद क्वारंटीन सेंटर में रखे गए लोगों को अछूत के नजरिये से देखने की सामाजिक बुराई का हल अभी खोजा नहीं जा सका है।
जान लें, कोरोना संक्रमण और उसके कुप्रभावों को देश व दुनिया को लंबे समय तक झेलना है। ऐसे में समाज को उसकी इच्छा-शक्ति के साथ ही इससे उबारा जा सकता है। आज जरूरी है कि केंद्र सरकार क्वारंटीन सेंटर के हर पहलू पर एक एसओपी जारी करे। उसके बजट, वहां नियुक्त स्टाफ, भोजन, शौचालय, जांच व रिपोर्ट आने की समय सीमा, वहां निरुद्ध किए लोगों को वापिस भेजन का समय जैसे मसलों पर एकीकृत नीति जारी करे। वहां रखे गए लोगों को मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, उन्हें व्यस्त रखने के लिए मनोरंजन, शारीरिक श्रम, उनके रचनात्मक योगदान  आदि पर कड़े निर्देश समय की अनिवार्य मांग है।

renewal energy can be solution of coal base electric crisis

  वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत में है दम मुद्दा पंकज चतुर्वेदी  दिनों  देश में कोयले की कमी के चलते दमकती रोशनी और सतत विकास पर अंधियारा दिख रहा है।...