My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 26 नवंबर 2014

how to manage drought

संकट नहीं है सूखा : सूखे से मुकाबला

सोमवार, 24 नवंबर 2014

onion tears farmers


प्याज उगाने वाले के आंखों में आंसू


                                                                                      पंकज चतुर्वेदी
daily news jaipur 25-11-14
http://dailynewsnetwork.epapr.in/382059/Daily-news/25-11-2014#page/6/1
दिल्ली  और उसके आसपास प्याज बाजार में तीस रूप्ए किलो बिक रहा है, यदि मंडी चले जाएं तो शा यद पच्चीस मिल जाए। यहां से कुछ सौ किलोमीटर दूर मंदसौर, नीमच की मंडियों में आज प्याज की कीमत चार रूप्ए किलो है। वहां आए रोज झगड़े हो रहे हैं क्योंकि एक कुंटल प्याज खोदने के लिए मजदूर तीन सौ से कम नहीं ले रहा है, वहीं माल को मंडी तक लाने का खर्चा सौ रूपए से कम नहीं है । किसान हताश  है और फसल इस मजूबरी में काट कर फैंक रहा है कि उसे इसी जमीन पर अगली फसल भी उगानी है।  पिछले साल भी मध्यप्रदेश  के मालवा अंचल की शा जापुर में पचास किलो प्याज की बोरी का दाम था महज बीस रूपए, यानी 40 पैसे किलो। यह देश भर की फल-सब्जी मंडियों का हाल है कि किसान अपनी खून-पसीने से कमाई-उगाई फसल ले कर पहुंचता है तो  उसके ढेर सारे सपने और उम्मीदें अचानक की ढह जाते हैं। कहां तो सपने देखे थे समृद्धि के , यहां तो खेत से मंडी तक की ढुलाई निकालना भी मुष्किल दिख रहा था। असल में यह किसान के शो शण, सरकारी कुप्रबंधन और दूरस्थ अंचलों में गोडाउन की सुविधा या सूचना ना होने की मिली-जुली साजिश  है, जिसे जानबूझ कर नजरअंदाज किया जाता है।
अब कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश  में आलू की इतनी अधिक पैदावार हो गई है कि बामुष्किल तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिल पा रहा है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भर गए हैं। जाहिर है कि आपे वाले दिनों में आलू मिट्टी के मोल मिलेगा। कैसी विडंबना है कि जिस आलू, प्याज के लिए अभी एक महीने पहले तक मारा-मारी मची थी ,वह अब मारा-मारा घूम रहा है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसान की हताशा  आम आदमी पर भारी पड़ी है। पूरे देश  की खेती-किसानी अनियोजित ,शोषण की शिकार व किसान विरोधी है। तभी हर साल देश  के कई हिस्सों में अफरात फसल को सड़क पर फैंकने और कुछ ही महीनों बाद उसी फसल की त्राहि-त्राहि होने की घटनाएं होती रहती हैं। किसान मेहनत कर सकता है, अच्छी फसल दे सकता है, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को भी उसके परिश्रम के माकूल दाम , अधिक माल के सुरक्षित भंडारण के बारे में सोचना चाहिए। शा यद इस छोटी सी जरूरत को मुनाफाखोरों और बिचैलियों के हितों के लिए दरकिनार किया जाता है।
भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश  क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचैलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश  में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुष्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मश हूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा  का प्रदर्षन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुषी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की शा दी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
देश  के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश  करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पष्चिमी उत्तर प्रदेश  के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेषियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आष्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश  किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चैपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश , महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने अरमानों की दुनिया खुद ही फूंक लेता है। आज उसी गन्ने की कमी के कारण देश  में चीनी के दाम आम लोगों के मुंह का स्वाद कड़वा कर रहे हैं।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश  में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचैलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश -क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। यदि किसान रूठ गया तो ध्यान रहे, कारें तो विदेश  से मंगवाई जा सकती हैं, एक अरब की आबादी का पेट भरना संभव नहीं होगा।

पंकज चतुवैदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005

9891928376

शनिवार, 22 नवंबर 2014

Chhattisgarh : health services become money making machine



जब इलाज बन जाता है व्यापार

पंकज चतुर्वेदी

‘‘एक तरफ मां की लाश पोस्टमार्टम के लिए पड़ी हुई है और वहीं नवजात शिशु दूध के लिए तडप रहा है, ना तो बाप की जेब में पैसा है और ना ही होश कि अभी-अभी धरती पर आई उस नन्हीं सी जान की फिकर कर सके।’’ इतने मार्मिक, अमानवीय और अकल्पनीय क्षण मानवता में बहुत कम आते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में आम लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए चल रही कल्याणकरी योजनाओं में इससे भी अधिक बदतर हालात पहले भी बनते रहे। राजनेता केवल आरोप लगा कर चुप हो गए, लोग बीते दो तीन सालों के अस्पताल के हादसों को भूल चुके हैं। अस्पताल दुकान बनते रहे और लोग मरते रहे। ताजा मामला है नसबंदी के आपरेशन के दौरान 18 से अधिक युवतियों की मौत का, जिसमें यह अब उजागर हो चुका है कि राज्य में दवा के नाम पर जहर बांट कर मौत की तिजारत करने वालों के हाथ बहुत ही लंबे हैं और उनके खेल में हर स्तर पर अफसर, नेता शामिल रहे हैं।

The sea express agra 23-11-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=67814&boxid=30380328


बिलासपुर में जिस स्थान पर एक ही दिन में 85 नसबंदी आपरेशन कर दिए गए, वह स्थान महीनों से बंद, वीरान था। वहां धूल और गंदगी का अंबार था, इसके बावजूद भेड़-बकरियों की तरह औरतों को हां कर वहां लाया गया व नसबंदी कर दी गई। एक दिन में इतने अधिक आपरेशन करना भी संभव नहीं है, क्योंकि जिस लेप्रोस्कोपिक  उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है, उसे एके आपरेशन के बाद कीटाणुमुक्त बनाने में ही कम से कम आठ मिनट चाहिए। यानि एक आपरेशन के लिए कम से कम बीस मिनट, लेकिन वहां तो कुछ ही समय में बगैर इन सर्तकता को बरते इतने आपरेशन कर दिए गए। हालांकि यह भी बात साफ हो रही है कि औरतों की मौत का कारण जहरीली दवाएं रही है। जिस सिप्रोसिन दवा की अभी तक 33 लाख गोलिया जब्त की गई हैं, उनमें से केवल 13 लाख तो सरकारी अस्पतालों में ही मिली है और इस दवा में प्रारंभिक जांच में ही  जिंक फास्फेट मिला है जोकि चूहा मार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस दवा को बनाने वाली कंपनी को अभी कुछ ही दिन पहले गुणवत्तापूर्ण उत्पादन का प्रमाण पत्र ड्रग महकमे ने जारी किया था।  गौर करने वाली बात है कि 21 मार्च 2012 को एक विधायक शक्रजीत राय ने विधान सभा में जानकारी मांगी थी कि राज्य में कितनी दवा कंपनियों का उत्पदन अमानक या स्तरहीन पाया गया है। इसके जवाब में सरकार द्वारा दिए गए उत्तर में बताया गया था कि ऐसी 44 दवाएं पाई गई हैं जो स्तरहीन है और इनमें से 12 प्रकरण महावर फार्मा के थे। महावर फार्मा वही कंपनी है जिसका उत्पाद जानलेवा सिप्रोसिन है और यह राज्य का सबसे बड़ा सरकारी दवा सप्लायर में से एक है। यह तथ्य काफी है बताने के लिए कि हर व्यक्ति को स्वस्थ रखने की योजनाएं व दावों के पीछे असल मकसद तो दवा कंपनियों को फायदा पहुचाना ही होता है।
इससे पहले राज्य में एक और अमानवीय स्वास्थ्य घोटाला सामने आया था जिसमें 33 से अधिक औरतों के गर्भाशय केवल इस लिए निकाल दिए गए, ताकि राश्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कुछ अस्पताल दो करोड से अधिक का बीमा दावा क्लेम कर सकें। अकेले  बिलासपुर में 31 नर्सिंग होम ने छह महीने में 722 औरतों के गर्भाशय निकाल दिए। इनमें से कई तो 18 से 21 साल उम्र की ही थीं।। कोई भी औरत सामान्य से पेट दर्द की िशकयत ले कर आती और सरकारी अस्पताल वाले उसे निजी अस्पतालों में भेज देते  और वहां कह दिया जाता कि उसके गर्भाशय में कैंसर है और उसे निकालना जरूरी है। यह मामला भी विधान सभा में उठा और राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने माना कि राज्य में नौ महीनो के दौरान बिलासपुर में एसे 799, दुर्ग में 413, धमतरी में 614, कवर्ध में 183, बलौदाबाजार में 30 और मंुगेली में 369 आपरेशन हुए, जिनका सरकरी योजनाओं के तहत कई करोड़ का दावा भी वसूला गया। तब कार्यवाही के बड़े-बड़े वादे किए गए लेकिन नतीजा डाक के तीन पात ही रहा। कुछ डाक्टरों का लाईसेंस निरस्त किया गया, लेकिन एक सप्ताह बाद ही यह कह कर निलंबन वापिस ले लिया गया कि ये डाक्टर भविष्य में गर्भाशय वाले आपरेशन नहीं करेंगे, षेश चिकित्सा कार्य करेंगे।
वैसे राज्य सरकार आम लोगांे के स्वास्थ्य के लिए कितना संजीदा है, इसकी बानगी बस्तर अंचल है। यहां बीते दस सालों के दौरान यहां गरमी षुरू होते ही जल-जनित रोगों से लोग मरने लगते हैं। और जैसे ही बाषि हुई ,उससे सटे-सटे ही मलेरिया आ जाता है।  बस्तर में गत तीन सालों के दौरान मलेरिया से 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।  कह सकते हैं कि बीमार होना, मर जाना यहां की नियति हो गई है और तभी हल्बी में इस पर कई लोक गीत भी हैं।  आदिवासी अपने किसी के जाने की पीड़ा गीत गा कर कम करते हैं तो सरकार सभी के लिए स्वास्थ्य के गीत कागजों पर लिख कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाती है।  बस्तर यानी जगदलपुर के छह विकास खंडों के सरकारी अस्पतालों में ना तो कोई स्त्री रोग विषेशज्ञ है और ना ही बाल रोग विषेशज्ञ। सर्जरी या बेहोश करने वाले या फिर एमडी डाक्टरों की संख्या भी षून्य है।  जिले के बस्तर, बकावंड, लोहडीगुडा, दरभा, किलेपाल, तोकापाल व नानगुर विकासखंड में डाक्टरों के कुल 106 पदों में से 73 खाली हैं। तभी सन 2012-13 के दौरान जिले में  दर्ज औरतों व लड़कियों की मौत में 60 फीसदी कम खून यानी एनीमिया से हुई हैं। बडे किलेपाल इलाके में 25 प्रतिशत से ज्यादा  किशोरियां  व औरतें कम खून से ग्रस्त हैं।
इससे पहले राज्य का आंखफोडवा कांड के नमा से मशहूर मोतियांबिद आपरेशन की त्रासदी भी हुई थी, जिसमें 44 लोगों के आंखेां की रोशनी गई व तीन लोगों की मौत हुईं । राज्य सरकार ने तुरत फुरत पचास पचास हजार का मुआवजा बांट दिया, लेकिन जरा सोचंे कि क्या किसी के ताजिंदगी अंधा रहने की बख्षीश पचास हजार हो सकती है?  असल में  यह सारा खेल सरकारी योजनाओं के नाम पर लोगों का इलाज करने के खेल में निजी डाक्टरों की धोखाधड़ी व बेईमानी का है। चूंकि अभी राजय में स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं सो, झंडे, जुलूस, वादे, आरेाप ज्यादा हैं वरना यह मामला इतना चर्चा में भी नहीं आता। आखिर किसी गरीब की मौत से लोकतंत्र को फरक ही कितना पड़ता है। गर्भाशय काटने वाले, आंखें फोड़ने वाले ना तो जेल गए ना ही उनका व्यावसायिक लाईसंेस निरस्त हुआ। लगता है कि अब वक्त आ गया है कि समूची स्वास्थ्य सेवा को निजीकरण से मुक्त कर, चिकित्सकों की जिम्मेदारी तय करने के कड़े कानून बनाने होंगें। साथ ही घटिया या नकली दवा बनाने वाले को  सजा-ए-मौत हो।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

Why children wants to run away from school ?

बच्चों को स्कूल क्यों पसंद नहीं आता ?़

दैनिक हिंदुस्‍तान 22.11.14    
                                                               

 पंकज चतुर्वेदी
वह बामुश्‍किल तीन साल की बच्ची होगी, पापा की गोदी में जब कार से उतरी तो चहक रही थी। जैसे ही बस्ता उसके कंधे पर गया तो वह सुबकने लगी, रंग बिरंगे पुते, दरवाजे तक पहुंची तो दहाड़ें मारने लगी। वह स्कूल क्या है, खेल-घर है, वहां खिलौने हैं, ढूले हैं, खरगोश व कबूतर हैं, कठपुतलियां हैं। फिर भी बच्ची वहां जाना नहीं चाहती। अब पापा को तो आफिस की देर हो रही है , सो उन्होंने मचलती बच्ची केा चैकीदार को सौंपा और रूदन को अनदेखा कर  फुर्र हो गए।  मान लिया कि वह बच्ची बहुत छोटी है, उसे मम्मी-पापा की याद आती होगी व उसके माता-पिता नौकरी करते होंगे सो दिन में बच्ची को व्यस्त रखने के लिए उस प्ले स्कूल में दाखिला करवा दिया होगा। लेकिन यह भी सच है कि आम बच्चे के लिए स्कूल एक जबरदस्ती, अनमने मन से जाने वाली जगह और वहां होने वाली गतिविधियों उसकी मन मर्जी की होती नहीं हैं। कई बार तो स्कूल की पढ़ाई पूरा कर लेने तक बच्चे को समझ ही नहीं आता है कि वह अभी 12-14 साल करता क्या रहा है। उसका आकलन तो साल में एक बार कागज के एक टुकड़े पर कुछ अंक या ग्रेड के तौर पर होता है और वह अपनी पहचान, काबिलियत उस अंक सूची के बाहर तलाशने को छटपटाता रहता है।
11वीं पंचवर्षीय योजना में लक्ष्य रखा गया था कि  भारत में आठवीं कक्षा तक जाते -जाते स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों के 50 प्रतिशत को 20 प्रतिषत तक नीचे ले आया जाए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। आज भी  कोई 40 प्रतिशत बच्चे आठ से आगे के दर्जे का स्कूल नहीं देख पाते हैं। हां, यह तय है कि ऊपर स्कूल ना जाने के लिए मचल रही जिस बच्ची का जिक्र किया गया है , उस सामाजिक-आर्थिक हालात के बच्चे आमतौर पर कक्षा आठ के बाद के ड्राप आउट की श्रेणी में नहीं आते हैं। सरकारी दस्तावेज कहते हैं कि स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ने वालों में अधिकांष गरीब, उपेक्षित जाति व समाज के और बच्चियां होती हैं। कई नजीर हैं कि बहुत से उपेक्षित या अछूत जैसी त्रासदी भोग रही जाति के लोगों ने आज से कई दषक पहले  स्कूल भी पढ़ा और गरीबी के बावजूद कालेज भी और उससे आगे भी। असल में वे लोग छोटी उम्र में ही जान गए थे कि शिक्षा नौकरी दिलवाने की कुंजी नहीं, बल्कि बदलाव व जागरूकता का माध्यम है। लेकिन ऐसे लोग विरले ही होते हैं और औसत बच्चों के लिए आज भी स्कूल कुछ ऐसी गतिविधि है जो उनकी अपेक्षा के अनुरूप या मन के मुताबिक नहीं है। उसको वहां पढाई जा रही पुस्तकों में वह कुछ ऐसा नहीं पाता जो उसके मौजूदा जीवन में काम आए।
जब बच्चा चाहता है कि वह गाय को करीब से जा कर देखे, तब स्कूल में वह खिडकी बंद कर दी जाती है जिससे बाहर झांक कर वह गाय को साक्षात देखता है। उसे गाय काले बोर्ड पर सफेद लकीरों व शब्दों में पढ़ाई जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी गाय ना तो दूध देती है और ना ही सींग हिला कर अपनी रक्षा करने का मंत्र सिखाती है। जो रामायण की कहानी बच्चे को कई साल में समझ नहीं आती, वह उसे एक रावण दहन के कार्यक्रम में षामिल होने या रामलीला देखने पर रट जाती है।  ठेठ गाव के बच्चों को पढाया जाता है कि ‘अ’ ‘अनार’ का, ना तो उनके इलाके में अनार होता है और ना ही उनहोंने उसे देखा होता है, और ना ही उनके परिवार की हैसियत अनार को खरीदने की होती है। सारा गांव जिसे गन्ना कहता है।, उसे ईख के तौर पर पढ़ाया जाता है। यह स्कूल में घुसते ही बच्चे को दिए जाने वाले अव्यावहारिक ज्ञान की बानगी है। असल में रंग-आकृति- अंक-शब्द की दुनिया में बच्चे का प्रवेष ही बेहद नीरस और अनमना सा होता है। और मन और सीखने के बीच की खाई साल दर साल बढती जाती हे। इस बीच उसे डाक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, पायलट जैसी डिगरियां रटा दी जाती हैं और दिमाग में ठोक ठोक कर भर दिया जाता है कि यदि पढ़-लिख कर वह यह सब नहीं बना तो उसकी पढ़ाई बेकार है। विडंबना है कि यही मानसिकता, कस्बाई व षहरी बच्चों को घर से भागने, नशा, झूठ बोलने की ओर प्रेरित करती है, जबकि गांव के बच्चे स्कूल छोड़ कर कोई काम करना श्रेयस्कर समझते हैं। असल में पूरी स्कूली व्यवस्था ब्लेक बोर्ड व एक तरफ से सवाल और दूसरी तरफ से जवाब के बीच प्रष्न के तौर पर बच्चों को विचलित करती रहती है। स्कूल, शिक्षक व कक्षा उसके लिए यातना घर की तरह होते हैं। परिवार में भी उसे डराया जाता है कि बदमाशी मत करो, वरना स्कूल भेज देंगे। बात मान लो, वरना टीचर से कह देंगे।  कहीं भी बच्चे के मन में स्कूल जाने की उत्कंठा नहीं रह जाती है और वह षिक्षक को एक भयावह स्वप्न की तरह याद करता है।
बच्चे अपने परिवेश को नहीं पहचानते- अपने आसपास मिलने वाले पेड़, पौधे, पक्षी-जानवर, मिट्टी, कंकड़, सबकुछ से अनभिज्ञ यह बाल-वर्ग किस तरह देश-समाज को अपना समझ सकता है? समय आ गया है कि कक्षा व पाठ्यक्रम को पुस्तको व कमरों से बाहर निकाल कर प्रकृति व समाज की मदद से पढ़ा-समझा जाए। थामस अल्वा एडीसन या मेडम क्यूरी के साथ-साथ सफाई करने वाले, पंचर जोड़ने वाले, खेत में काम करने वाले को भी पाठ में षामिल किया जाए। जब कूल से भाग जाने को आतुर बच्चा यह देखेगा कि उसकी किताब में वह पाठ भी है जो उसके पिताजी करते हैं तो उसे यह सबकुछ अपना सा लगेगा। 
मध्यमवर्गीय परिवारों के प्री नर्सरी हो या गांव का सरकारी स्कूल,  पांच साल की आयु तक हर तरह की पुस्तक, होमवर्क, परीक्षा से मुक्त रखा जाए। कभी सोचा है कि तीन साल के बच्चे को जब बताया जाता है कि अमुक क्लास में अव्वल आया व अमुक फिसड्डी रहा तो उसके दिल व दिमाग में अजीब किस्म की डर, अहंकार या षिक्षा से पलायन की प्रवृति विकसित होती है जो ताजिंदगी उसके साथ-साथ चलती है। तभी शिक्षा व्यवस्था में सफल से ज्यादा असफल लोगों की संख्या बढती जा रही है। हालांकि परीक्षा में उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता ने भी शिक्षा के स्तर को लेकर सवाल खड़े कर दिए है। दिल्ली में ही कई सरकारी स्कूल के षिक्षक बच्चों की परीक्षा काॅपी में उलटे हाथ से खुद लिखते है। और सीधे हाथ से नंबर देते हैं। एक क्लास में 100 से ज्यादा बच्चे, बैठने-पानी-शौचालय की व्यवस्था ना होना और टीचर के पास पठन-पाठन के अलावा बहुत से काम होना, जैसे कई कारण हैं जिससे बच्चा स्कूल में कुछ अपना सा महसूस नहीं नहीं करता है, वह वहां उबासी लेता है और यही सोचता हता है कि उसे यहां भेजा क्यों गया है। जैसे ही अवसर मिलता है वह बस्ता, किताब, कक्षा से दूर भाग जाता है।

रविवार, 16 नवंबर 2014

change the recruitment process of cadet in army

ऐसे कैसे सैनिक हम भर्ती कर रहे हैं ?
पंकज चतुर्वेदी

RAJ EXPRESS http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx
बीते दिनों ग्वालियर में थल सेना में सिपाही की भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा के दौरान बारह घंटे तक षहर में जो हुआ, वह निहायत अराजकता, गुंडागिर्दी और लफंगई था। कोई बीस हजार युवा जमा हुए, कुछ नाराजगी हुई, फिर पत्थरबाजी, आगजनी, लूटपाट, औरतों से छेड़छाड़। पुलिस व फौज को फयरिंग तक करना पड़ी, तब तक कई ट्रेन तोडी जा चुकी थी, 100 से ज्यादा वाहन आग के हवाले थे, ग्वालियक में सड़कों में अफरातफरी मच चुकी थी। यह सब करने वाले वे लोग थे जिनमें से कुछ को भारतीय फौज का हिस्सा बनना था। यह पहली बार नहीं हुआ है कि पिछड़े और बेराजगारी से तंग अल्प षिक्षित हजारों युवाफौज में भर्ती होने पहुंच जाते हैं और भर्ती स्थल वाले षहर में तोड़-फोड़, हुड़दंग, तो कहीं मारापीटी, अराजकता होती है।  जिस फौज पर आज भी मुल्क को भरोसा है, जिसके अनुशासन और कर्तव्यनिश्ठता की  मिसाल दी जाती है, उसमें भर्ती के लिए आए युवकों द्वारा इस तरह का कोहराम मचाना, भर्ती स्थल पर लाठी चार्ज होना, जिस षहर में भर्ती हो रही हो वहां तक जाने वाली ट्रेन या बस में अराजक भीड़ होना या युवाओं का मर जाना जैसी घटनाओं का साक्षी पूरा मुल्क हर साल होता है। इसी का परिणाम है कि फौज व अर्ध सैनिक बलों में आए रोज अपने ही साथी को गोली मारने, ट्रैन में आम यात्रियों की पिटाई, दुव्र्यवहार, फर्जी मुठभेड़ करने जैसे अरोप बढ़ रहे हैं।
विडंबना यह है कि हालात दिनों दिन खराब हो रहे हैं ,इसके बावजूद थल सेना में सिपाही की भर्ती के तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं आ रहा है - वही अंग्रेजों की फौज का तरीका चल रहा है - मुफलिसविपन्न इलाकों में भीड़ जोड़ लेा वह भी बगैर परिवहन, ठहरने या भोजन की सुविधा के और फिर हैरान-परेशान युवा जब बेकाबूं हो तो उन पर लाठी या गोली ठोक दो। कंप्यूटर के जमाने में क्या यह मध्यकालीन बर्बरता की तरह नहीं लगता है? जिस तरह अंग्रेज देशी  अनपढो को मरने के लिए भरती करते थे, उसी तर्ज पर छंटाई जबकि आज फौज में सिपाही के तौर पर भर्ती के लिए आने वालों में हजारों ग्रेजुएट व व्यावसायिक षिक्षा वाले होते हैं।
यह हमारे आंकड़े बताते हैं कि हायर सैकेंडरी पास करने के बाद ग्रामीण युवाओं , जिनके पास आगे की पढ़ाई के लिए या तो वित्तीय संसाधन नहीं हैं या फिर गांव से कालेज दूर है ; रोजगार के साधन लगभग ना के बराबर हैं। ऐसे में अपनी जान की कीमत पर पेट पालने और  जान हथेली पर रख कर रोजगार पाने की चुनौतियों के बावजूद ग्रामीण युवा इस तरह की भर्तियों में जाते हैं। थल सेना में सिपाही की भर्ती के लिए सार्वजनिक विज्ञापन दे दिया जाता है कि अमुक स्थान पर पांच या सात दिन की ‘‘भर्ती-रैली’’ होगी। इसमें  तय कर दिया जाता है कि किस दिन किस जिले के लड़के आएंगे। इसके अलावा देश  के प्रत्येक राज्य में भर्ती के क्षेत्रीय व शाखा केंद्र हैं, जहां प्रत्येक साढ़े तीन महीने में भर्ती के लिए परीक्षाएं होती रहती हैं। हमारी थल सेना में प्रत्येक रेजीमेंट में अभी भी जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर भागीदारी का कोटा तय है,जैसे की डोगरा रेजीमेंट में कितने फीसदी केवल डोगरा होंगे या महार रेजीमेंट में महरों की संख्या कितनी होगी। हालांकि अभी 10 दिसंबर,2012 को ही सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के एवज में सरकार को कहा है कि सेना में जाति,धर्म, क्षेत्र के आधार पर सिपाही की भर्ती क्यों ना बंद की जाए। इस पूरी प्रक्रिया में पहले युवाओं का षारीरिक परीक्षण होता है, जिसमें लंबाई, वजन, छाती का नाप, दौड़ने की क्षमता आदि होता है। इसके बाद मेडीकल और फिर लिखित परीक्षा। अभी ग्वालियर में जो झगड़ा हुआ, वह दौड़ का समय छह मिनट से घटा कर अचानक साढ़े चार मिनट करने पर हुआ था।
भर्ती रैली का विज्ञापन छपते ही हजारों युवा, अपने दोस्तों के साथ भर्ती-स्थल पहुचने लगते हैं। इसमें भर्ती बोर्ड यह भी ध्यान नहीं रखता कि छतरपुर या ऐसे ही छोटे षहरों की क्षमता या वहां इतने संसाधन नही मौजूद नहीं होते हैं कि वे पांच दिन के लिए पचास-साठ हजार लोगों की अतिरिक्त क्षमता झेल पाएं। भर्ती का स्थल तय करने वाले यह विचारते ही नहीं है कि उक्त स्थान तक पहुंचने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध भी है कि नहीं।  और फिर यह तो असंभव ही है कि पचास हजार या उससे ज्यादा लोगों की भीड़ का षारीरिक परीक्षण हर दिन दस घंटे और पांच या सात दिन में ईमानदारी से किया जा सके। आमतौर पर नाप-जोख में ही सत्तर फीसदी लोगों की छंटाई हो जाती हे। फिर इनमें से पचास प्रतिशत मेडिकल में और उनमें से महज बीस प्रतिशत लिखित परीक्षा में उत्तीण हो पाते हैं। यानी पचास हजार में से पांच सौ को छांटने की प्रक्रिया महज तीस-चालीस घटों में । जाहिर है कि ऐसे में कई सवाल उठेंगे ही। कहा ता यही जात है कि इस तरह की रैलियां असल में अपने पक्षपात या गड़बडि़यों को अमली जामा पहनाने के लिए ही होती हैं। यही कारण है कि प्रत्येक भर्ती केंद्र पर पक्षपात और बेईमानी के आरोप  लगते हैं, हंगामें होते हैं और फिर स्थानीय पुलिस लाठियां चटका कर ‘‘हरी वर्दी’’ की लालसा रखने वालों को ‘‘लालकर देती है। हालांकि अभी तक इस तरह का कोई अध्ययन तो नहीं हीं हुआ है, लेकिन यह तय है कि इस भर्ती प्रक्रिया में पिटे, असंतुश्ट और परेषान हुए युवाओं के मन में फौज के प्रति वह श्रद्धा का भाव नहीं रह जाता है जो उनके मन में वहां जाने से पहले होता है।
सेना भी इस बात से इंकार नहीं कर सकती है कि बीते दो दषकों के दौरान थल सेना अफसरों की कमी तो झेल ही रही है, नए भर्ती होने वाले सिपाहियों की बड़ी संख्या अनुशासनहीन भी है। फौज में औसतन हर साल पचास से ज्यादा आत्म हत्या या सिपाही द्वारा अपने साथी या असर को गोली मार देने की घटनाएं साक्षी हैं कि अब फौज को अपना मिजाज बदलना होगा। फौजियों, विषेशरूप से  एन.सी. ओ. और उससे नीचे के कर्मचारियों पर बलात्कार, तस्करी, रेलवे स्टेषन पर यात्रियों के भिड़ने, स्थानीय पुलिस से मारापीटी होने के आरोपों में तेजी से वृद्धि हुई हे। हो ना हो यह सब बदलते समय के अनुसार सिपाही की चयन प्रक्रिया में बदलाव ना होने का दुश्परिणाम ही है। जो सिपाही अराजकता, पक्षपात, षोशण की प्रक्रिया से उभरता है उससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती है।
फौज को अपनी भर्ती प्रक्रिया में कंप्यूटर, एनसीसी, स्थानीय प्रषासन का सहयोग लोना चाहिए। भर्ती के लिए भीड़ बुलाने के बनिस्पत ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिसमें निराष लोगों की संख्या कम की जा सके। शायद  पहले लिखित परीक्षा तालुका या जिला स्तर पर आयोजित करना, फिर मेडिकल टेस्ट प्रत्येक जिला स्तर पर सालभर स्थानीय सरकारी जिला अस्पताल की मदद से आयोजित करना, स्कूल स्तर पर कक्षा दसवीं पास करने के बाद ही सिपाही के तौर पर भर्ती होने की इच्छा रखने वालों के लिए एनसीसी की अनिवार्यता या उनके लिए अलग से बारहवी तक का कोर्स रखना जैसे कुछ ऐसे सामान्य उपाय हैं जो हमारी सीमाओं के सषक्त प्रहरी थल सेना को अधिक सक्षम, अनुशासित और गौरवमयी बनाने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यह भी किया जा सकता है कि सिपाही स्तर पर भर्ती के लिए कक्षा नौ के बाद अलग से कोर्स कर दिया जाए, ताकि भर्ती के समय मेडिकल की जटिल प्रक्रिया की जरूरत ही ना पड़े।
पंकज चतुर्वेदी

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