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शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

Report on climate change


जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट की चेतावनी : भारत के वनों और शहरी हरियाली का संरक्षण जरुरी

पंकज चतुर्वेदी

 

हाल ही में जारी भारत में जलवायु परिवर्तन आकलन में चेतावनी दी  गयी है कि देश का औसत तापमान वर्ष 2100 के अंत तक 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है । तापमान में तेजी से बढौतरी के मायने हैं भारत के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र, कृषि उत्पादन और मीठे पानी के संसाधनों पर संकट में इजाफा होगा, जिसका गहरा विपरीत  प्रभाव जैव विविधता, भोजन, जल और ऊर्जा सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पडेगा ही । रिपोर्ट में भारतीय शहरों में पर्यावरण के प्रति लापरवाही से बचने और देश के जंगलों और शहरी हरियाली की रक्षा करने की दिशा में सशक्त नीति और अनुसन्धान की अनिवार्यता पर बल दिया है यह एक बेहद खतरनाक संकेत है कि हमारे देश में सन 1901-2018 की अवधि में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण औसत तापमान पहले ही लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और अनुमान है कि यदि हमने माकूल कदम नहीं उठाये तो 2100 के अंत तक यह बढौतरी लगभग 4.4 डिग्री सेल्सियस हो जायेगी | भारत सरकार के केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट के इशारे बेहद भयानक हैं

यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में कई ऐसे इलाके हैं जो कि पेड़-पौधे व् प्राणियों की जैव विविधता की स्थानीय प्रजाति ही नहीं बल्कि वैश्विक प्रजातियों के लिए  भी संवेदनशील माने गए हैं | यदि जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार तेज होती है तो इन प्रजातियों पर अस्तित्व का खतरा हो सकता है | औद्योगिक क्रांति के पहले वैश्विक औसत तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। 

2015
के  पेरिस समझौते में यह संकल्प किया गया कि औद्योगिक क्रांति के पहले के मानकों कि तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए और तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोका जाए लेकिन आज ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के जो हालात हैं उसके मुताबिक़ तो दुनिया के  औसत तापमान में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस की बढौतरी को नियंत्रित करना असम्भव है भारत की रिपोर्ट में भी आगाह किया गया है कि 2100 के अंत तक, भारत में गर्मियों (अप्रैल-जून) में चलने वाली लू या गर्म हवाएं 3 से 4 गुना अधिक हो सकती हैं | इनकी औसत अवधि भी दुगनी होने का अनुमान है वैसे तो लू का असर सारे देश में ही बढेगा लेकिन घनी आबादी वाले भारत-गंगा नदी बेसिन के इलाकों में इसकी मार ज्यादा तीखी होगी । रिपोर्ट के अनुसार, उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के समुद्र की सतह का तापमान (एसएसटी) भी 1951–2015 के दौरान औसतन एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो कि इसी अवधी के वैश्विक औसत वार्मिंग 0.7 डिग्री सेल्सियस से अधिक है

तापमान में वृद्धि का असर भारत के मानसून पर भी कहर ढा रहा है| सनद रहे हमारी खेती और अर्थ व्यवस्था का बड़ा दारोमदार अच्छे मानसून पर निर्भर करता है । रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के ऊपर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा (जून से सितंबर) में 1951 से 2015 तक लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है, जो भारत-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटों पर चिंताजनक हालात तक  घट रही है।


रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मियों में मानसून के मौसम के दौरान सन 1951-1980 की अवधि की तुलना में वर्ष 1981–2011 के दौरान 27 प्रतिशत अधिक दिन सूखे दर्ज किये गए | इसमें चेताया गया है कि  बीते छः दशक के दौरान बढती गर्मी और मानसून में कम बरसात के चलते देश में सुखा-ग्रस्त इलाकों में इजाफा हो रहा है | खासकर मध्य भारत, दक्षिण-पश्चिमी तट, दक्षिणी प्रायद्वीप और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्रों में औसतन प्रति दशक दो से अधिक अल्प वर्षा और सूखे दर्ज किये  गए | यह चिंताजनक है कि  सूखे से प्रभावित क्षेत्र में प्रति दशक 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है रिपोर्ट ने संभावना जताई है कि जलवायु परिवर्तन की मार के चलते ना केवल सूखे की मार का इलाका बढेगा, बल्कि अल्प वर्षा की आवर्ती में भी औसतन वृद्धि हो सकती है








हिमालय पर गंभीर प्रभाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में 1951-2014 के दौरान लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि दर्ज की गयी है । एचकेएच के कई क्षेत्रों में हाल के दशकों में बर्फबारी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की घटनाओं  में गिरावट आई है। इसके विपरीतबहुत उंचाईवाले काराकोरम हिमालय में अधिक  हिमपात हो रहा  है, इसी के चलते वहां ग्लेशियर सिकुड़ नहीं पाए हैं । इक्कीसवीं सदी के अंत तक, एचकेएच पर वार्षिक औसत सतह के तापमान में लगभग 5.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने का अनुमान है| मानवजन्य गलतियों के कारण बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के चलते  19512014 के दौरान प्रति दशक हिमालय और तिब्बती पठार के ताप में 0.2 डिग्री की दर से वृद्धि हुई है। 
रिपोर्ट में कहा गया है कि एचकेएच क्षेत्र में भविष्य में ,2100 के अंत तक तापमान में  2.6-4.6 डिग्री सेल्सियस  वृद्धि का अनुमान है | यदि ऐसा हुआ तो हिमपात कम होगा और इससे ग्लेशियर के आकार घटेंगे और इसका असर जलविद्युत परियोजना और खेती किसानी पर बहुत बुरा होगा ।
 
भारत की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर संकट 
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि मीठे पानी की उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भारत के लिए चिंता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरुप बदल रहा है | इसके चलते बाढ़ और सुखाड दोनों की मार और तगड़ी होगी , साथ ही सतही और भूजल के रिचार्ज का गणित गडबड़ायेगा और यह देश की जल सुरक्षा के लिए खतरा है। 
इसी तरह बढ़ते तापमान, गर्मी और बरसात के चरम से , देश की खाद्य सुरक्षा पर भी दवाब रहेगा , क्योंकि इसके चलते वर्षा-आधारित खेती चौपट हो सकती है । जब गर्मी असहनीय होगी तो उससे बचने के लिए परिवेश को ठंडा करने के लिए ऊर्जा की मांग में वृद्धि होने की संभावना है, और यदि इसकी आपूर्ति के लिए अगर तापीय उर्जा (थर्मल पावर) पर निर्भर रहे तो जाहिर है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में और वृद्धि होगी। यही नहीं बिजली पैदा करने के लिए तापीय उर्जा बिजलीघरों के शीतलन के लिए पानी की जरूरत में भी इजाफा होगा। इस तरह के पानी की मांग की आपूर्ति के लिए बांध के जलाशयों, नदियों और नहरों के मीठे पानी की खपत होगी और इसके चलते खेती , पेय जल आदि के लिए पानी कि खपत में कटौती करना होगा। पहले से ही जल संकट झेल रहे इलाकों में ये हालात तबाही ला देंगे । वहीँ समुद्री  तट के आसपास स्थापित बिजली संयंत्र, जो शीतलन के लिए समुद्री जल का उपयोग करते हैं, समुद्र जलस्तर में वृद्धि, चक्रवात और तूफान से नुकसान की चपेट में आयेगें |  रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश की  देश की ऊर्जा संरचना और आपूर्ति की आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है। । 

वनों और शहरी हरियाली  को सहेजें

पृथ्वी विज्ञानं मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में  जलवायु परिवर्तन की निरंतर निगरानी, क्षेत्रीय इलाकों में हो रहे बदलावों का बारीकी से आकलन , जलवायु परिवर्तन के नुक्सान , इससे बचने के उपायों को शैक्षिक सामग्री में शामिल करने, आम लोगों को इसके बारे में जागरूक करने  के लिए अधिक निवेश करने की जरुरत है । जैसे कि देश के समुद्री तटों पर जीपीएस के साथ ज्वार-भाटे का अवलोकन करना , स्थानीय स्तर पर समुद्र के जल स्तर में आ रहे बदलावों के आंकड़ों को एकत्र करना आदि | इससे समुद्र तट के संभावित बदलावों का अंदाजा लगाया जा सकता है और इससे तटीय शहरों में रह रही आबादी पर सम्बह्वित संकट से निबटने की तैयारी की जा सकती है | इसी प्रकार इस तरह के आंकड़ों का आकलन जिला और गांव-स्तर पर पानी के संचय , संभावित मानसून और गर्मी के अनुरूप फसल बोने, बीज के चयन आदि में भी मार्गदर्शक होगा ।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया है कि शहर और महानगरों में पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचाने वाली विकास योजनायें और “ग्रीन बिल्डिंग” बनायी जाएँ तो बढती गर्मी के प्रकोप और वायु प्रदुषण को कुछ कम किया जा सकता ।
समुद्र के उबलने पर चिंता करना जरुरी
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र बहुत अधिक प्रभावित हो रहे हैं, सनद रहे ग्लोबल वार्मिंग से उपजी गर्मी का 93 फीसदी हिस्सा समुद्र पहले तो उदरस्थ कर लेते हैं फिर जब उन्हें उगलते हैं तो ढेर सारी व्याधिया पैदा होती हैं, हम जानते ही हैं कि बहुत सी चरम प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि बरसात, लू , चक्रवात, जल स्तर में वृद्धि आदि, का उद्गम स्थल महासागर या समुद्र  ही होते हैं | जबा बाहर की गर्मी के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है तो अधिक बादल पैदा होने से भयंकर बरसात, गर्मी के केन्द्रित होने से चक्रवात , समुद्र की गर्म भाप के कारण तटीय इलाकों में बेहद गर्मी पढ़ना जैसी घटनाएँ होती हैं .  रिपोर्ट कहती है कि समुद्र में हो रहे परिवर्तनों की बारीकी से निगरानी, उन आंकड़ों का आकलन और अनुमान , उसके अनुरूप उनिलकों की योजनायें तैयार करना समय की मांग हैं |

 

रिपोर्ट कहती है कि यदि हम वायु प्रदुषण पर काबू पा सके तो इन्सान और परिवेश, दोनों के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे कार्य दक्षता में सुधर होगा | रिपोर्ट कहती है कि तापमान बढ़ने से बरसात बढ़ सकती है और यदि हम चाहें तो इसे अवसर में बदल सकते हैं- जरूरत इस बात की होगी कि हम आसमान से गिरने वाली हर बूंद को सहेजने के लायक संरचनाएं तैयार कर सकें , इससे हमारी विद्युत उत्पादन क्षमता पर भी सकारात्मक असर होगा ।

Indian Festival with Indian products can change economy

चीन को चोट कर रहा है महिलाओं ‘देश राखी’ संकल्प

                                                                      पंकज चतुर्वेदी  

गलवान घाटी में चीन ने हमारे सैनिकों के साथ जो किया, उसका जवाब हमारी फौज और सरकार तो सलीके से दे ही रहे है, देश की आधी आबादी ने भी चीन की  आर्थिक कमर तोड़ने का जो संकल्प लिया है, उसकी पहली किश्त में ही चीन को चार हजार करोड़ का घाटा महज रक्षाबंधन पर उठाना पड़ रहा है। गांव-कस्बों में महिलओं ने यह पक्का इरादा कर लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए चीन में निर्मित सामान का बहिश्कार करेंगे और रक्षा बंधन पर भाईयों की कलाई पर भारत में बनी निखालिस देशी राखी ही बंाध कर देश के लिए चीन के सामान के बहिश्कार की प्रतीज्ञा करवाएंगे। 
भारत मे इस साल केवल भारत में निर्मित राखियां ही बेची जाएंगी। इससे न सिर्फ चीन को आर्थिक नुकसान पहुंचेगा बल्कि लॉकडाउन में नौकरी खो चुके लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। यह सब तब संभव हो पाया जब औरतों ने ऐसा करने का ठान लिया। इसके लिए खास तौर पर देश के अलग-अलग शहरों में उन लोगों को राखियां बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है जिन महिलाओं का  रोजगार लॉकडाउन में छूट गया था वे अपनी लोक परंपरा को जीवंत कर राखियों बनाने में जुअी हैं।  सबसे बड़ी बात इन राख्यिों को तैयार करने में भी चीन से आए कच्चे माल से परहेज किया जा रहा है। विदित हो भारत में हर साल रक्षा बंधन के त्यौहार पर चीन को करीब चार हजार करोड़ रुपये का व्यापार मिलता है जो कि इस बार पूरी तरह से भारत के लोगों को ही मिलेगा।
चीनी आयात के खिलाफ भारत में बड़े पैमाने पर राखियां तैयार की जा रही हैं जिसमें दिल्ली के अलावा नागपुर, भोपाल, ग्वालियर, सूरत, कानपुर, तिनसुकिया, गुवाहाटी, रायपुर, भुवनेश्वर, कोल्हापुर, जम्मू , बंगलौर, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, वाराणसी, झांसी, इलाहबाद आदि शहरों में राखियां बनवा कर व्यापारियों तक पहुंचाने का काम शुरू कर दिया गया है।
छत्तीसगढ़ के धमतरी में बनी अनोखी बांस और गोबर से तैयार राखियां दूर-दूर के व्यापारियों को बहुत भा रही हैं। सुदर, स्वदेशी और प्रकृति मित्र राखियों की मांग इतनी है कि उसकी पूर्ति करने में महिला कारीगर जी-जान से जुटी हैं।  जिले के 20 स्वसहायता समूह की करीब 165 बहनें सनातन परंपरा में पवित्र माने जाने वाले बांस, गोबर से सुंदर-सुंदर राखियां गढ़ रहीं हैं। इनके भीतर  बीज भी रख रहीं हैं ताकि जब राखी हाथ से  उतरे तो उससे हरियाली पैदा हो। राखी को तैयार करने के लिए महिलाएं बांस के पतले छिलके को काटकर राखी का स्वरूप दे रही हैं। इसे चटख रंगों से रंगा गया है। इन पर करेला, लौकी, कुम्हड़ा, टमाटर, राजमा के बीजों से सजावट की गई है। यह बीज लगभग एक वर्ष तक खराब नहीं होंगे। राखी में उपयोग हो रहे बीज किसानों के खेत से लिए जा रहे हैं। समूह की महिलाएं रेशम धागा, मौली धागा से राखी बनाई हैं। इसके अतिरिक्त गेहूं, धान, चावल, मूंग मोर पंख, कौड़ी, शंख तथा पैरा से भी देशी राखी बनाने का काम कर रही हैं।
विदित हो चीन की राखियों में अधिकांश प्लास्टिक का ज्यादा इस्तेमाल होता था जो कि पर्यावरण में कचरे का इजाफा करता था। गोर या बांस के नश्ट हाने पर धरती की उर्वरा ही संपन्न होगी। जिले में पहली बार बिहान योजना के तहत ग्रामीण महिलाओं को रोजगार दिलाने व चाइना की राखियों को बाजार से बाहर करने के उद्देश्य से तैयार की जा रहीं हैं। करीब 25 हजार राखियां बनाने का लक्ष्य है। अब तक करीब 10 हजार राखियां तैयार हो गईं हैं। 1200 राखियों का ऑर्डर भी आ चुका है। राखियों को बेचने की व्यवस्था भी की जा रही है। इनकी कीमत 20 से 200 रुपए तक है। ऐसा नहीं कि पारंपरिक  कला से राखी बन रही हैं तो इसमें बच्चों की आधुनिक पसंद को अछूता रखा गया है। बच्चों के लिए छोटा भीम, डोरेमोन, बाल गणेशा व बड़ों के लिए बांस, कुमकुम, सब्जियों के बीज, गोबर की राखियां बनी है। बच्चों की राखी को क्रोशिया के एम्ब्रायडरी धागों से बनाया जा रहा है। इसे ‘ओज’ राखी नाम दिया है। बांस के बीज से बनी राखियां बनाई जा रही हैं। इसी तरह ‘‘भाभी-ननद’’ के लिए कुमकुम अक्षत राखी और बांस की जोड़ीदार राखी बनाई जा रही है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो एक साल में ही दूरस्थ अंचलों तक चीन से आने वाली राखियों का कोई पूछनहार नहीं मिलेगा।
मातृ मंडल, सेवा भारती, आगरा के तहत आने वाले वैभवश्री समूह की सदस्य नारी षक्ति राखी बनाने का काम कर रही हैं। इसके लिए पांच सौ महिलाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण दिया गया। यह महिलाएं अब अपने घरों में राखी तैयार कर रही हैं। पहले सिर्फ धागे बनाने की योजना थी, लेकिन अब राखियां भी तैयार की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश के ही चंदौली में स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने आपदा को भी अवसर बना लिया है। समसामयिक पर्वों को भी अपनी आजीविका का सहारा बना ले रही हैं। मास्क व यूनिफार्म सिलाई के बाद उनका रक्षाबंधन पर जोर है। तरह-तरह की 50 हजार लुभावनी राखी तैयार कर बाजार में अपने हुनर का प्रदर्शन करेंगी। पांच से 25 रुपये तक कीमत वाली उनके हाथों से बनाई गई राखी भाइयों की कलाई की शोभा बनेंगी। भारतीय अर्थ व्यवस्था को सशक्त करने का यह प्रयोग भले ही छोटा लग रहा हो लेकिन इससे उपजी जागरूकता के चलते बनारस, कानपुर, बरेली, झांसी कई एक जगह औरतें रक्षाबंधन को पूर्ण भारतीय उत्पाद का र्व बनाने में जुट गई हैं।
मध्यप्रदेश के सतना में ‘आओ बहना एक राखी बनाएं’ बहुत सफल रहा और वहां छोटी उम्र की बच्चियों भी इसके लिए आगे आईं। इंदौर के सांसद शंकर लालवानी भी शहर के 22 गैर सरकारी संगठनों से जुड़ी महिलाओं की मदद से एक लाख स्वदेशी राखियां बनवा रहे हैं ताकि स्थानीय बाजार में चीन से आने वाली राखियों को चुनौती दी जा सके।
रक्षाबंधन के बाद गणपति, फिर नवरात्रि, दशहरा, दीपावली तक अब आने वाले कई महीनों तक पर्व-त्योहार की श्रंखला है और चीनी उत्पादकों ने मिट्टी की मटकी या कलश के स्थान पर प्लास्टिक के बर्तन से ले कर संदर दिखने वाली कम कीमत की देव प्रतिमाओं, घरेलू सजावट के सामान से ले कर पूजा सामग्री तक कब्जा कर रखा है। यदि स्थानीय उत्पाद की मुहिम में महिलओं की भूमिका, भागीदारी व सक्रियता ऐसी ही रही तो हमारे पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और मूल्यों को फिर से स्थान तो मिलेगा ही, कोरोना के कारण सुस्त पड़े बाजार को भी नई प्राण वायु मिलेगी। चीन को तो इसकी गहरी चोट होगी ही। 

Negligence on mental health is effecting countries wealth


मन के विकार के निदान में बेमन


पंकज चतुर्वेदी


एक उभरते हुए, सफल और लोकप्रिय अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्म हत्या और कोविड-19 त्रासदी से उपजी बेरोजगारी- तन्हाई और भय ने देश के सामने मानसिक रोग को ले कर नया सवाल खड़ा कर दिया है। विडंबना है कि जिस गति से यह संकट हमारे समाज के सामने खड़ा हो रहा है, इससे निबटने की हमारी तैयारी बहुत ही मंथर है। अंतरराश्ट्रीय पत्रिका ‘लैंसेट’ की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारत में आबादी का कोई 15 फीसदी हिस्सा या 19.73 करोड़ लोग किसी ना किसी तरह की मानसिक व्याधियों से जूझ रहे हैं। इनमें 4.57 करोड़ लोग डिप्रेशन या अवसाद तथा 4.49 करोड़ लोग एंजाइटी या घबराहट के शिकार हैं। अभी तीन साल पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) के एक शोध  से पता चला था कि देश में चौथी सबसे बड़ी बीमारी अवसाद या डिप्रेशन है। इनमें से आधे से ज्यादा लोगों को यह ही पता नहीं है कि उन्हें किसी इलाज की जरूरत है। यही नहीं आज देश की सबसे बड़ी दूसरी बीमारी हार्ट अटैक के बाद अवसाद को कहा जा रहा है। बढ़ती जरूरतें, जिंदगी में बढ़ती भागदौड़, रिश्तों के बंधन ढ़ीले होना; इस दौर की कुछ ऐसी त्रासदियां हैं जो इंसान को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। ये सब ऐसे विकारों को आमंत्रित कर रहा है, जिनके प्रारंभिक लक्षण नजर आते नहीं हैं, जब मर्ज बढ़ जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। विडंबना है कि सरकार में बैठे नीति-निर्धारक मानसिक बीमारियों को अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।  

इसे हास्यास्पद कहें या शर्म कि ‘जय विझान’ के युग में मनोविकारों को एक रोग के बनिस्पत ऊपरी व्याधा या नियति समझने वालों की संख्या बहुत अधिक है । तभी ऐसे रोगों के इलाज के लिए डाक्टरों के बजाए पीर-फकीरों, मजार-मंदिरों पर अधिक भीड़ होती है । सामान्य डाक्टर मानसिक रोगों को पहचानने और रोगियों को मनोचिकित्सक के पास भेजने में असमर्थ रहते हैं । इसके चलते ओझा,पुरोहित,मौलवी,तथाकथित यौन विशेषझ अवैध रूप से मनोचिकित्सक का दुष्कार्य कर रहे हैं ।

अवसाद केवल रोगी के परिवार के लिए ही चिंता का विषय  नहीं है, यह देश के विकास की गति में भी बाधक है। अनुमान है कि अवसाद के कारण यदि किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता प्रभवित होती है तो वह अर्थ व्यवस्था को औसतन दस हाजर डालर प्रतिवर्ष  का नुकसान करता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में 15 साल से कम उम्र के बच्चे भी अवसाद के शिकार हो रहे हैं। 

विश्व स्वास्थ संगठन ने ‘स्वास्थ’ की परिभाषा में स्पष्ट किया है कि ‘‘शारीरिक,मानसिक और सामाजिक रूप से स्वास्थ की अनुकूल चेतना । ना कि केवल बीमारी की गैर मौजूदगी ।’’  इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य, एक स्वस्थ शरीर का जरूरी हिस्सा है । यह हमारे देश की कागजी राष्ट्रीय स्वास्थ नीति में भी दर्ज है । वैसे 1982 में मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू हुआ था । आम डाक्टर के पास आने वाले आधे मरीज मरीज उदासी,भूख,नींद, और सेक्स इच्छा में कमी आना,हस्त मैथुन,स्वप्न दोष जैसी शिकायतें ले कर आते हैं । वास्तव में वे किसी ना किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं ।
इतने लोगों के इलाज के लिए कोई 32 हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देशभर में इनकी संख्या बामुश्किल नौ हजार है यानी एक लाख पर एक से भी कम औसतन 0.75 डाक्टर। इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं।  यह रोग भयावह है और इसका इलाज भी लंबे समय तक चलता है जोकि खर्चीला भी है। इसक बावजूद कोई भी स्वास्थ्य बीमा योजना में इसे शामिल नहीं किया गया। 15 जून 2020 को सुप्रीम कोर्ट से बीमा नियामक संस्था से यह पूछा भी है कि मानसिक रोग को बीमा सुविधा क्यों नही है। उधर सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं बिल्कुल उपेक्षित हैं। सन 2018-19 में केद्र सरकार का इस मद में सालाना बजट 50 करोड़ था जो कि सन 19-20 में घटा कर चालीस करोड़ कर दिया गया - सालान प्रति व्यक्ति महज चार रूपए। 
दिनों दिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है । विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं ।  दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है ।इसकी शुरुआत होती है चिडचिडेपन से । बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना ऐसे ‘रोगियों’ की आदत बन जाती हैं । काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना इनके प्रारंभिक लक्षण हैं । भय की कल्पनाएं इन लोगों को इतना जकड़ लेती हैं कि उनका व्यवहार बदल जाता है  जल्दी ही दिमाग प्रभावित होता है और पनप उठते है मानसिक रोग । 
जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने  के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं । ये जर्जर,डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैए और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं । तभी सन 2017 में 10,246 और सन 2018 में 10,134 मानसिक रोगियों ने आत्महत्या कर ली थी। 
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देश भर के पागलखानों की हालत बदतर है । इसे सुधारने के लिए कुछ साल पहले बंगलौर के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विझान संस्थान (निमहान्स) मे एक परियोजना शुरू की गई थी । लेकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है । यह परियोजना भी नाकाफी संसाधनों का रोना रोते हुए फाईलों में ठंडी हो गई । हमारे देश की सवा अरब को पार कर गई आबादी के लिए केवल 43 सरकारी मानसिक  रोग अस्पताल हैं, इनमें से मनोवैज्ञानिक इलाज की व्यवस्था महज तीन जगह ही है। इन अस्पतालों में 21,000 बिस्तर हैं जो जरूरत का एक फीसदी भी नहीं है । यहां तक कि जरूरत की पचास फीसदी नर्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की एक रिपोर्ट भी इस बात का प्रमाण है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है । सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है । आज भी अधिकांश मानसिक रोगी बगैर इलाज के अपने हाल में अमानवीय हालात में जीने को मजबूर हैं।

 पंकज चतुर्वेदी
 
9891928376



New education policy based on Indian values

भारतीय मूल्यों पर आधारित है नई शिक्षा नीति

                                                                     पंकज चतुर्वेदी 


33 साल बाद देश के लिए बनी नई शिक्षा. नीति का दर्शन भारतीय लोकाचार में निहित एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास करना है जो कि  जो “इंडिया” को “भारत” में बदलने की षक्ति बन सके। कोई तीन साल तक देश के हजारों लोगों से विमर्श के बाद तैयार इस दस्तावेज में शिक्षा को डिगरी से कहीं ज्यादा व्यावसायिक कौशल से जोड़ने और समतामूलक और जीवंत ज्ञान समाज के निर्माण की बात कही गई है।  सभी को उच्च-गुणवत्ता की शिक्षा मिले, ताकि भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन सके , इसके लिए ढेर सारे प्रायोगिक, ई-लर्निंग और आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस जैसी तकनीक के इस्तेमाल के साथ शिक्षण संस्थाओं को साधन संपन्न बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। 
हमारे संस्थानों के पाठ्यक्रम और शिक्षाशास्त्र इस तरह हों ताकि मौलिक कर्तव्यों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की गहरी भावना, अपने देश के साथ अटूट संबंध, और एक बदलती दुनिया में अपनी  भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता विकसित की जा सके । न केवल विचार में, बल्कि आत्मा, बुद्धि और कर्मों में, बल्कि भारतीय होने में एक गहन-गर्वित गर्व पैदा करने के लिए, साथ ही साथ ज्ञान, कौशल, मूल्यों और प्रस्तावों को विकसित करने के लिए, जो मानव अधिकारों के लिए जिम्मेदार प्रतिबद्धता का समर्थन करते हैं, सतत विकास और जीवन ,और वैश्विक कल्याण, जिससे वास्तव में एक वैश्विक नागरिक प्रतिबिंबित हो ।
नई शिक्षा नीति में प्रौद्योगिकी के उपयोग और एकीकरण पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। विद्यालयीन और उच्च शिक्षा दोनों के लिए , एक स्वायत्त निकाय, राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम (एनईटीएफ) का गठन होगा जो , सीखने, मूल्यांकन, नियोजन, प्रशासन, आदि के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग पर विचारों के मुक्त आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान करेगा । एनईटीएफ ,शैक्षिक प्रौद्योगिकी में बौद्धिक और संस्थागत क्षमता का निर्माण, अनुसंधान और नवाचार के लिए नई दिशाओं को विकसित करना जैसे कार्य करेगी। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में तकनीकी हस्तक्षेप  के साथ मूल्यांकन, टीचर-ट्रैनिंग और वंचित और अभी तक शिक्षा से दूर समुदाय तक अक्षर ज्योति पहुंचाने का कार्य किया जाएगा। 
इस नई नीति में शिक्षकों के अत्याधुनिक तकनीक के साथ प्रशिक्षण, उन्हें  विभिन्न दूरस्थ शिक्षा उपकरणों पर काम करने, ई लर्निंग के नए पाठ्यक्रम खुद तैयार  करने, स्थानीय भाशा बोली में शिक्षा और एक से अधिक भाशा के ज्ञान के लिए सॉफ्टवेयर के प्रयोग के सतत प्रशिक्षण की बात की गई है। 
उच्च शिक्षा संस्थान न केवल ऐसी समर्थ  प्रौद्योगिकियों पर अनुसंधान करने में, बल्कि अनुदेशात्मक सामग्री के प्रारम्भिक संस्करण तैयार करने ओर आत के स्पर्धा के अनुरूप ऑनलाइन सहित पाठ्यक्रम तैयार करने का काम करेंगे , साथ ही वे पेशेवर शिक्षा जैसे विशिष्ट क्षेत्रों पर उनके प्रभाव का आकलन करने में एक सक्रिय भूमिका निभाएंगे । विश्वविद्यालयों का उद्देश्य मशीन लर्निंग के साथ-साथ बहु-विषयक क्षेत्रों ओर स्वास्थ्य देखभाल, कृषि और कानून जैसे पेशेवर क्षेत्र में  पीएचडी ओर स्नातकोत्तर कार्यक्रमों का संचालन करना होगा । ये संस्थान कम विशेषज्ञता वाले कार्यों जैसे डेटा एनोटेशन, छवि वर्गीकरण और भाषण प्रतिलेखन का प्रशिक्षण भी दे सकेंगे।
इस नीति के मूल में शिक्षक को बदलती दुनिया के मुताबिक प्रशिक्षित करने पर बहुत अधिक और समयबद्व जोर दिया गया है। कहा गया है कि स्कूलों में शिक्षकों के लिए ऐसे उपयुक्त उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि वे सीखने-सीखाने के तरीकों का ई-सामग्री के साथ सामंजस्य बैठा सकें  और ऑन लाइन ओर डिजिटल शिक्षा-तकनीक का उचित इस्तेमाल सुनिश्चित कर सर्कें  । ऑनलाइन शिक्षण मंच और उपकरण ,मौजूदा ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म जैसे स्वयं, दीक्षा आदि को इस तरह विस्तारित किया जाएगा ताकि शिक्षकों को शिक्षार्थियों की प्रगति की निगरानी के लिए एक संरचित, उपयोगकर्ता के अनुकूल, समृद्ध माध्यम मिल सके।
स्कूली स्तर पर शारीरिक शिक्षा, फिटनेस, स्वास्थ्य और खेल; विज्ञान मंडलियाँ, गणितँ, संगीत और नृत्यँ, शतरंज ,कविता , भाषा, नाटक , वाद-विवाद मंडलियां ,इको-क्लब, स्वास्थ्य और कल्याण क्लब , योग क्लब आदि की गतिविध्यिां, प्राथमिक स्तर पर बगैर बस्ते के ज्यादा दिन की येाजना भी है। 
मौजूदा जन संचार , जैसे टेलीविजन, रेडियो, और सामुदायिक रेडियो का विभिन्न भाषाओं में प्रसारण के लिए चौबीसों घंटे हर समय प्रसारण और बड़े पैमाने पर उपयोग ,वर्चुअल लैब बनाने के लिए मौजूदा ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म का सहयोग लिया जाएगा। जब आनलाईन व ईलर्निंग पर इतना जोर है तो देश के डिजिटल बुनियादी ढाँचे के दूरस्थ अंचल तक निर्माण में निवेश की योजना भी इस नीति का हिस्सा 
चूंकि देश की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में हर समय मूलभूत सुविधा का अभाव व पर्याप्त धन की कमी आड़े आती रही है, इसी लिए इस नई नीति में बुनियादी ढांचे और संसाधनों से संबंधित एकमुश्त व्यय के अलावा, एक शिक्षा प्रणाली को उन्नत बनाने के लिए वित्तपोषण के लिए दीर्घकालिक क्षेत्रों की पहचान की गई है ताकि विभिन्न मंत्रालय इस दिाा में में काम कर सके। चूंकि शिक्षा संमवर्ति सूची का विशय है और इसी लिए इसमें राज्यों के साथ बेहतर समन्वय के लिए खास व्यवस्था रखी गई है और यह विश्वास जताया गया है कि सन 2030-40 तक यह नीति पूरी तरह काम करने लगेगी और फिर उसकी समीक्षा की जाएगी। 
उच्च शिक्षा संस्थानों में जरुरी पुस्तकालयों, कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, प्रौद्योगिकी, खेल ,मनोरंजन क्षेत्र, छात्र चर्चा स्थान, और भोजन क्षेत्र जैसे उपयुक्त संसाधन और बुनियादी ढाँचे प्रदान करने के साथ, यह सुनिश्चित करने के लिए कई पहल की आवश्यकता होगी सीखने का माहौल सकारात्मक ओर आकर्षक हो, और सभी छात्रों की सफलता सुनिश्चित करे।

बुधवार, 29 जुलाई 2020

To save the traditions , preserve tribal languages


गुम होती बोली-भाषाएँ 

पंकज चतुर्वेदी 

यूनेस्को द्वारा जारी दुनिया की भाषाओँ  के मानचित्र में जब यह आरोप लगा कि भारत अपनी बोली-भाषाओँ  को भूलने के मामले में दुनिया में अव्वल है तो लगा था कि शायद  सरकार व समाज कुछ चेतेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कैसी विडंबना है कि देश की आजादी के बाद हमारी पारंपरिक बोली-भाशाओं पर सबसे बड़ा संकट आया और उनमें भी आदिवासी समाज की बोलियां लुप्त होने में अव्वल रहीं।  श्री गणेश देवी के सर्वे के अनुसार हम कोई 300 बोलियों को बिसरा चुके हैं और कोई 190 अंतिम सांसे ले रही हैं। दुखद बात यह है कि बोलियों के गुम जाने का संकट सबसे अधिक आदिवासी क्षेत्रों में है। चूंकि देश के अधिकशं जनजातिया बाहुल्य इलाके प्राकृतिक संसाधन से संपन्न हैं सो बहारी समाज के लोभ की गिरफ्त में यही क्षेत्र सबसे ज्यादा होते हैं हिंसा-प्रतिहिंसा , विकास और रोजगार की छटपटाहट के चलते आदिवासियों के पलायन और उनके नए जगह पर बस जाने की रफ्तार बढ़ी तो उनकी कई पारंपरिक बोलियां पहले कम हुई और फिर गुम गईं। एक बोली के लुप्त होने का अर्थ उसके सदियों पुराने संस्कार, भोजन, कहानियां, खानपान सभी का गुम हो जाना ।
झारखंड में आदिम जनजातियों की संख्या कम होने के आंकड़ै बेहद चौंकाते हैं जोकि सन 2001 में तीन लाख 87 से हजार से सन 2011 में घट कर दो लाख 92 हजार रह गई। ये जनजातियां हैं - कंवर, बंजारा, बथुडी, बिझिया, कोल, गौरेत, कॉड, किसान, गोंड और कोरा। इसके अलावा माल्तो-पहाड़िया, बिरहोर, असुर, बैगा भी ऐसी जनजातियां हैं जिनकी आबादी लगातार सिकुड़ रही है। इन्हें राज्य सरकार ने पीवीजीटी श्रेणी में रखा है। एक बात आश्चर्यजनक है कि मुंडा, उरांव, संताल जैसे आदिवासी समुदाय जो कि सामाजिक, राजनीतिक , अािर्थक और शैक्षणिक स्तर पर आगे आ गए, जिनका अपना मध्य वर्ग उभर कर आया, उनकी जनगणना में आंकड़े देश के जनगणना विस्तार के अनुरूप ही हैं। बस्तर में गौंड , देारले, धुरबे आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा पिछड़ रहे हैं। कोरिया, सरगूजा, कांकेर जगदलपुर,नारायणपुर, दंतेवाड़ा, सभी जिलों में आदिवासी आबादी तेजी से घटी है। यह भी गौर करने वाली बात है कि नक्सलग्रस्त क्षेत्रों में पहले से ही कम संख्या  वाले आदिवासी समुदायों की संख्या और कम हुई है। ये केवल किसी आदि समाज के इंसान के लुप्त होने के आंकड़े ही नहीं है, बलिक उसके साथ उनकी बोली-भाशा के भी समाप्त होने की दास्तान है। 
प्रसिद्ध नृशास्त्री ग्रियर्सन की सन 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर ’ की भूमिका में एक ऐस व्यक्ति का उल्लेख है जो कि बस्तर की 36 बोलियों को समझता-बूझता था। जाहिर है कि  जानकार था जाहिर है कि आज से अस्सी साल पहले वहां कम से कम 36 बोलियां तो थी हीं। सभी जनजातियों की अपनी बोली, प्रत्येक हस्तशिल्प या कार्य करने वाले की अपनी बोली। राजकाज की भाशा हल्बी थी जबकि जंगल में गोंडी का बोलबाला था। गोंडी का अर्थ कोई एक बोली समझने का भ्रम ना पालें - घेाटुल मुरिया की अलग गोंडी तो दंडामी और अबूझमाड़िया की गोंडी में अलग किस्म के षब्द। उत्तरी गोंडी में अलग भेद। राज गोंडी में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव ज्यादा है। इसका इस्तेमाल गोंड राजाओं द्वारा किया जाता था। सन 1961 की जनगणना में इसको बोलने वालों की संख्या 12,713 थी और आज यह घट कर 500 के लगभग रह गई है।  चूंकि बस्तर  भाषा  के आधर पर गठित ती राज्यों महाराष्ट्र , उड़िसा, तेलंगाना(आंध््रा प्रदेश) से घिरा हुआ है , सो इसकी बोलिया छूते राज्य की भाषा  से अछूती नहीं है।। दक्षिण बस्तर में भोपालपट्टनम,कोंटा आदि क्षेत्रों में दोरली बोली जाती है जिसमें तेलंगांना/आंध्रप्रदेश से लगे होने के कारण तेलुगु का प्रभाव दिखता है तो दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा दण्डामी बोली का क्षेत्र है। जगदलपुर, दरभा, छिन्द्गढ़ धुरवी बोली का बोलबाला है वहीं कोंडागांव क्षेत्र के मुरिया अधिकतर हल्बी बोलते हैं । नारायणपुर घोटुल मुरिया और माड़िया क्षेत्र है। बस्तर और ओडिशा राज्य के बीच सबरी नदी के किनारे धुरवा जनजाति की बहुलता है। जगदलपुर का नेतानार का इलाका, दरभा और सुकमा जिले के छिंदगढ़ व तोंगपाल क्षेत्र में धुरवा आदिवासी निवास करते हैं। इस जनजाति की बोली धुरवी है। इसी तरह नारायणपुर ब्लॉक में निवासरत अबूझमाड़िया माड़ी बोली बोलते हैं। इन दोनों जनजातियों की आबादी मिलाकर भी 50 हजार से अधिक नहीं है। इन जनजातियों की पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच आज भी धुरवी और माड़ी ही संवाद का जरिया है पर नई पीढ़ी में इन बोलियों का प्रचलन धीरे-धीरे घट रहा है।
राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैं। राजस्थान के पश्चिम में मारवाड़ी के साथ मेवाड़ी, बांगडी, ढारकी, बीकानेरी, शेखावटी, खेराड़ी, मोहवाडी और देवडावाटी; उत्तरद- पूर्व में अहीरवाटी और मेवाती; मध्यद-पूर्व में ढूंढाड़ी और उसकी उप बोलियां - तोरावटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किसनगढ़ी, नागर चौल और हाडौती; दक्षिणद-पूर्व में रांगडी व सौंधवाड़ी (मालवी); और दक्षिण में निमाड़ी बोली जाती हैं।. घुमंतू जातियों की अपनी बोलियां हैं. जैसे गरोडिया लुहारों की बोली-गाडी। अब ये या तो दूसरी ाबेलियों के साथ मिल कर अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं या नई पीढ़ी इनमें बात ही नहीं करती। मध्यप्रदेश की 12 आदिवासी बोलियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। इनमें ज्यादातर आदिवासी बोलियां हैं- भीली, भिलाली, बारेली, पटेलिया, कोरकू, मवासी निहाली, बैगानी, भटियारी, सहरिया, कोलिहारी, गौंडी और ओझियानी जैसी जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैं, लेकिन अब ये बीते दिनों की कहानी बनने की कगार पर हैं।
उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र 12 हजार लोग बोलते हैं. पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसी, उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं. दारमा को 1761, ब्यांसी को 1734, जाड को 2000 और जौनसारी को 1,14,733 लोग ही बोलते-समझते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि चूंकि ये बोलियां ना तो रोजगार की भाषा  बन पाईं और ना ही अगली पीढ़ी में इनमें बात करने वले बच रहे हैं, सो इनका मूल स्वरूप षनेः-शनेः समाप्त हो रहा है। याद करना होगा कि अंडमान निकोबार और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में बीते चार दशक में कई जनजातियां लुप्त हो गईं और उनके साथ उनकी आदिम बोलियां भी अतीत के गर्त में समा गईं। 
प्रत्येक बोली-भाषा समुदास की अपनी ज्ञान-श्रंखला है। एक बोली के विलुप्त होने के साथ ही उनका कृषि , आयुर्वेद, पशु-स्वास्थ्य, मौसम, खेती आदि का सदियों नहीं हजारों साल पुराना ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। यह दुखद है कि हमारी सरकारी योजनाएं इन बोली-भाशआों की परंपराओं और उन्हें आदि-रूप में संरक्षित करने के बनिस्पत उनका आधुनिकीकरण करने पर ज्यादा जोर देती है। हम अपना ज्ञान तो उन्हें देना चाहते हैं लेकिन उनके ज्ञान को संरक्षित नहीं करना चाहते। यह हमें जानना होगा कि जब किसी आदिवासी से मिलें तो पहले उससे उसकी बोली-भाषा  का ज्ञान को सुनें फिर उसे अपना नया ज्ञान देने का प्रयास करें।  आज जरूरत बोलियों को उनके मूल स्वरूप में सहेजने की है। 


शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

End of ground water

पाताल को जाता भूजल

पंकज चतुर्वेदी

यह सर्वविविदत तथ्य कि भूजल किसी भी देश के पेय जल की दिक्कतों का निदान नहीं है, फिर भी भारत में हर घर पानी पहुंचाने की अधिकांश योजनाएं जमीन को गहराई तक खोद कर जल उलेछने पर ही आधारित हैं। गौरतलब है कि ग्रामीण भारत की 85 फीसदी आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है।  जान लें कि पीने के पानी के लिए घर-आंगन के कुंएं या तालाब की परंपरा रही है, जबकि सिंचाई के लिए बड़े तालाब या जोहड़ की। इन सभी में जल स्तर बढ़िया रहे, इसके लिए इलाके की छोटी-बड़ी नदी को अविरल और भरा पूरा रखा जाता था। लेकिन अब त्वरित जल आपूर्ति के लिए भूजल के मनमाने दोहन की जो आदत पड़ी तो उसके दुपरिणाम सामने आने में चार दशक भी नहीं लगे। 
जमीन की गहराईयों में पानी का अकूत भंडार है । यह पानी का सर्वसुलभ और  स्वच्छ जरिया है, लेकिन यदि एक बार दूषित  हो जाए तो इसका परिष्करण  लगभग असंभव होता है । भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूगर्भ जल पर निर्भरता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है  । पाताल से  पानी निचोड़ने की प्रक्रिया में सामाजिक व सरकारी कोताही के चलते भूजल खतरनाक स्तर तक जहरीला होता जा रहा है ।ं भारत में दुनिया की सर्वाधिक खेती होती है । यहां 50 मिलियन हेक्टर से अधिक जमीन पर जुताई होती है, इस पर 460 बी.सी.एम(बिलियन क्यूबिक मीटर). पानी खर्च होता है । खेतों की कुल जरूरत का 41 फीसदी पानी सतही स्त्रोतों से व 51 प्रतिशत भूगर्भ से मिलता है । गत् 50 सालों के दौरान भूजल के इस्तेमाल में 115 गुणा का इजाफा हुआ है । भूजल के बेतहाशा इस्तेमाल से एक तो जल स्तर बेहद नीचे पहंुच गया है, वहीं लापरवाहियों के चलते प्रकृति की इस अनूठी सौगात जहरीली भी होती जा रही है । 
यह संसद में बताया गया है कि करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं, इन्हें दांत खराब होने , हाथ पैरे टेड़े होने जैसे रोग झेलने पड़ रहे हैं।  जबकि करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में लोहे (आयरन) की ज्यादा मात्रा भी बड़ी परेशानी का सबब है।
देश के 360 जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिन्हित किया गया है । भारत में खेती, पेयजल व अन्य कार्यों के लिए अत्यधिक जल दोहन से धरती का भूजल भंडार अब दम तोड़ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर 5723 ब्लॉकों में से 1820 ब्लॉक में जल स्तर खतरनाक हदें पार कर चुका है. जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते 200 से अधिक ब्लॉक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने के सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है । 
उत्तरी राज्यों में हरियाणा के 65 फीसदी और उत्तर प्रदेश के 30 फीसदी ब्लॉकों में भूजल का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है । इन राज्यों को जल संसाधन मंत्रालय ने अंधाधुंध दोहन रोकने के उपाय भी सुझाए हैं. इनमें सामुदायिक भूजल प्रबन्धन पर ज्यादा जोर दिया गया है। राजस्थान जैसे राज्य में 94 प्रतिशत पेयजल योजनाएं भूजल पर निर्भर हैं। अब राज्य के तीस जिलों में जल स्तर का सब्र समाप्त हो गया है। भूजल विशेशज्ञों के मुताबिक आने वाले दो सालों में राज्य के 140 ब्लाकों में षायद ही जमीन से पानी उलेचा जा सके। 
भूजल के बेतहाशा दोहन की ही त्रासदी है कि उत्तर प्रदेश के कई जिले- कानपुर, लखनउ, आगरा आदि भूकंप संवेदनशील हो गए हैं व चेतावनी है कि यहां कभी भी बड़ा भूकंप  व्यापक जन हानि कर सकता है। पश्चिमी उप्र में तो भूजल में जहर इस कदर घुल गया है कि गांव के गांव कैंसर जैसी बीमारियों के गढ़ बन गए हैं। देश की राजधानी दिल्ली का भूजल खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल और कारखानों की गंदी निकासी के जमीन में रिसने से दूशित हुआ है । दिल्ली में नजफगढ् के आसपास के इलाके के भूजल को तो इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं करार दिया गया है । समूची दिल्ली में भूजल अब रेड जोन अर्थात लगभग समाप्त होने की कगार पर चिन्हित है।
मध्यप्रदेश में तो पूरा जल-तंत्र ही भूजल पर निर्भर हो गया है, जबकि बुंदेलखंड जैसे इलाके, जहां ग्रेनाईट संरचना है, भूजल के लिए माकूल ही नहीं हैं। वहां बारिश के सीपेज वाटर पर हैंडपंप रोप कर झूठी वाह वाही लूटी जाती है और गर्मी आने पर उससे पानी निकलना बंद हो जता है। देश में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन ये कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं । 

Mayanagari Mumbai drowns by submerging rivers

नदियों को डुबाने से डूबती है मायानगरी

पंकज चतुर्वेदी 
इस साल की बरसात का यह छठा दिन है जब बादल बरसे और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ्तार थम गई। जो सड़कें सरपट यातायात के लिए बनाई गई थीं, वहां नाव चलाने की नौबत आ गई। किसी राज्य या दुनिया के कई देशों के सालाना बजट से ज्यादा जिस नगरपालिका का आमद-रफ्त हो, वहां बीते एक दशक में 16 हजार करोड़ का नुकसान केवल जलभराव के कारण होना ; करीबी सालों में ही इस रूपहले महानगर के अस्तित्व पर चिंता की लकीरें खींचता है। जब कभी मुंबई के डूबने की घटना होती है तो उसका सबसे ज्यादा दोष  पुरानी सीवर लाईन पर मढ़ दिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि मुंबई की डूब का असली खलनायक महानगर की चार नदियों को सीवर में बदल देना है। ये नदियां महज बरसात के पानी को समेट कर सहजता से समुद्र तक पहुंचाने का काम ही नहीं करती थीं, इन नदियों के तट पर बसे मेनग्राव वनों के चलते बाढ़ बस्ती में जाने से ठहर जाती थी। सन अस्सी से 2020 तक के चार दशकों में इस महागर की आबादी चार गुना हो गई, और समुद्र से घिरे इस आबादी के समुंदर में जमीन को बढ़ाना तो संभव था नहीं , सो चार नदियों के किनारे उजाड़े गए, महानगर की सुरक्षा दीवार कहलने वाले मेनग्रोव जंगलों को ही रास्ते से हटा दिया गया।
मुंबई कभी समुद्र के बीच में सात द्वीपों का समूह था। पहले पुर्तगाली और उसके बाद ब्रितानी शासकों ने और उसके बाद हमारे राजनेताओं ने खाड़ियों में मलवा भर कर जमीनों से सोना बनाया और महानगर को तीन तरफ समंदर से घिरा एक बेतरतीब अरबन स्लम बना दिया। बांद्रा से ले कर नरीमन पाइंट तक कई मशहूर जगहों पर अभी कुछ दशकों पहले तक अथाह सागर लहराता था। संकऱे से शहर के चप्पे-चप्पे पर सीमेंट पोत दी गई, जाहिर है कि बरसात होने पर ऐसी जगह कम ही बची जहां कुदरत की  नियामत वर्षा  बूंदे धरती में जज्ब हो पातीं। अब जो भी पानी गिरता है वह नालियों की लपक कर समुद्र के रास्ते हो जाता है। जहां व्यवधान मिला, वह वहीं ठिठक जाता है । हर बार हिंदमाता, दादर, परेल, लालबाग, कुर्ला, सायन,माटुंगा, अंधेरी, मलाड़ के अलावा वे सभी इलाके जहां नदियों का मिलान समुद्र से होता है, घुटनों से कमर तक पानी में होते हैं। 
मुंबई को डुबाने का पाप तो यहां के वाशिंदों ने तब अपने ही हाथों से लिख दिया था जब यहां की चार नदियों - मीठी,  दहिसर, ओशिवारा और पोइसर को उपेक्षित किया गया था। मुंबई में पानी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे आबिद सुरती के साथ जब इन नदियों को देखा तो पाया कि यह अब घरेलू व औद्योगिक कचरा ढोने का मार्ग मात्र बन गई हैं। किनारों पर बस्तियां बसा ली गईं। वहां लगे मेनग्रोव जंगलों को कचरादान बना दिया गया। एनजीटी में कहा गया कि अभी बचे 6600 हैक्टर मेनग्रोव में 8000 टन प्लास्टिक कचरा भरा हुआ है। मीठी नदी और माहिम की खाड़ी के इलाकों में मैंग्रूव के जंगलों का बिल्डरों ने विकास के नाम विनाश किया। श्री सुरती की संस्था ‘ड्राप डेड’ का आकलन है कि ज़मीन और समुद्र के बीच रक्षा कवच बनाने वाले मैंग्रूव के जंगलों का 40 फीसदी हिस्सा 1995 से 2005 के बीच तहस नहस हुआ।
सन 2005 की भयावह बाढ़ के कारणो की जांच में पता चला था कि तबाही की असली वजह मीठी नदी का उफान था। मुंबई षहर की सबसे लंबी मीठी नदी संजय गांधी नेशनल पार्क के करीब से निकल कर सकीनाका, कुर्ला, धारावी होते हुए 25 किलोमीटर का सफर तय करते हुए माहिम की खाड़ी में समुंदर में मिल जाती है। मुंबई एयरपोर्ट बनाने के लिए मीठी नदी के दोनो तरफ दीवार बना कर चार बार समकोण में मोड़ा गया। यहां अब खूब जलभराव होता है क्योंकि वहां नदी का कोई तट बचा ही नहीं जहां पानी धरती पर रिस कर भूगर्भ में जा सके। 12 किलोमीटर लंबी दहिसर नदी श्रीकृश्ण नगर, कांदरपाड़ा, के रास्ते मनोरी क्रीक में अरब सागर में समाती है। सात किलोमीटर लंबी ओशिवरा नदी भवन निर्माण के मलवे से भरी है तो लगभग उतनी ही लंबी पोइसर नदी को प्लास्टिक कचरे ने ढंक दिया है। इसका मार्वे की खाड़ी तक का रास्ता अब गुम सा गया है। 
चूंकि इन नदियांें  में अब लगभग प्रवाह बंद है, सो बरसात होते ही इसकी तरफ आता पानी उफन कर बाहर आ जाता है। यदि उसी समय हाई टाईड अर्थत समु्रद में ज्वार का काल हो तो उन नदियों के समु्रद में मिलने के स्थान पर समुद्र जल उल्टी मार मारता है। परिणामस्वरूप नदियांे को सोख कर बने घर, कालोनी, सड़क बाजार जलमग्न हो जाते हैं।
नदियों को साफ करने के लिए करोड़ो की योजनाएं और दावे चलते रहते है, लेकिन इसके लिए बेहद अनिवार्य नदियों के प्राकृतिक मार्ग से अतिक्रमण हटाने की इच्छाशक्ति कोई नहीं जुटा पाता है। मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम 20वीं सदी की शुरूआत का है और सघन आबादी के चलते इसमें कोई आमूल चूल बदलाव हुए नहीं। इसकी क्षमता करीब 25 मिलीमीटर पानी प्रति घंटे निकालने की है, जबकि भारी बारिश के समय ज़रूरत 993 मिलीमीटर प्रतिघंटे तक हो जाती है। तभी जगह जगह पानी भर जाता है। ऐसे में यदि चारों नदियां गहरी और निर्बाध प्रवाह की हों तो जलभराव काफी कुछ रूक सकता है।
मौसम के वैश्विक  बदलाव और बढ़ते तापमान के मद्देनजर मुंबई की नदियों का महत्व और अधिक हो गया है। कई अंतरराश्ट्रीय षोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिग से समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा व सन 2050 तक मुंबई के अधिकांश दक्षिणी हिस्से हर सालं कम से कम एक बार प्रोजेक्टेड हाई टाइड लाइन से नीचे जा सकते हैं। जान लें कि प्रोजेक्टेड हाइ टाइड लाइन तटीय भूमि पर वह निशान होता है जहां सबसे उच्च ज्वार साल में एक बार पहुंचता है। ऐसे में समुद्र को जोड़ने वाली नदियां ही ऊंची लहरों से उपजे डूब के खतरे को कम कर सकती है। यह भी कड़वी सच्चाई है कि क्लाइमेट चेंज के कारण अरब सागर से नमी भरी हवाओं का चलन बदला है, जिनके कारण मध्य भारत में अचानक भारी बारिश होने लगी है और यह खतरा मुंबई पर हर समय मंडराता रहेगा।
मुंबई को बसाने के लिए उसकी पारंपरिक जल निधियों से बड़े स्तर पर छेड़छाड़ की गई। नब्बे के दशक में ही भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स को मंज़ूरी दिए जाने से भविष्य में संभावति त्रासदियां बाबत दी गई सूचना को अनसुना किया गया और आज वहां भयंकर जलभराव होता है। 

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

cutting-down-trees-and-ignoring-the-deforested-forests-is-affecting-biodiversity-and-environment-increasing-negligence

विकास के नाम पर उजड़ रही हरियाली

पंकज चतुर्वेदी 
असम में तिनसुकिया, डिब्रुगढ़ और सिवसागर जिले के बीच स्थित देहिंग पतकली हाथी संरक्षित वन क्षेत्र के घने जंगलों को ‘पूरब का अमेजन’ कहा जाता है।  कोई 575 वर्ग किलोमीटर का यह वन 30 किस्म की विलक्षण तितलियों, 100 किस्म के आर्किड सहित सैंकड़ों प्रजाित के वन्य जीवों व वृक्षों का अनूठा जैवविधिता संरक्षण स्थल है। कई सै साल पुरानें पेड़ों की घटाघोप को अब कोयले की कालिख  प्रतिस्थापित कर देगी  क्योंकि  सरकार ने इस जंगल के 98.59 हैक्टर में कोल इंडिया लिमिटेड को कोयला उत्खनन की मंजूरी दे दी है। यहां करीबी सलेकी इलाके में कोई 120 साल से कोयला निकाला जा रहा है। हालांकि कंपनी की लीज सन 2003 में समाप्त हो गई और उसी साल से वन संरक्षण अधिनियम भी लागू हो गया, लेकिन कानून के विपरत वहां खनन चलता रहा और अब जंगल के बीच बारूद लगाने, खनन करने, परिवहन की अनुमति मिलने से तय हो गया है कि पूर्वोत्तर का यह  जंगल अब अपना जैव विविधता भंडार खो देगा। यह दुखद है कि भारत में अब जैव विविधता नश्ट होने, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दुश्परिणाम तेजी से सामने आ रहे हैं फिर भी पिछले एक दषक के दौरान विभिन्न विकास परियोजना, खनन या उद्योगों के लिए लगभग 38.22 करोड़ पेड़ काट डाले गए। विष्व के पर्यावरण निश्पालन सूचकांक(एनवायरमेंट परफार्मेंस इंडेक्स) में 180 देषों की सूची में 177वें स्थान पर हैं। 
गत मार्च महीने के तीसरे सप्ताह से भारत में कोरोना संकट के चलते लागू की गई बंदी में भले ही दफ्तर-बाजार आदि पूरी तरह बंद हों लेकिन 31 विकास परियोजनाओं के लिए 185 एकड़ घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति देने का काम जरूर होता रहा। सात अप्रैल 2020 को राश्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्लूएल ) की स्थाई समिति की बैठक वीडियो कांफ्रेस पर आयोजित की गई ढेर सारी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए घने जंगलों को उजाड़ने की अनुमति दे दी गई। समिति ने पर्यावरणय दृश्टि से संवेदनषील ं 2933 एकड़ के भू-उपयोग परिवर्तन के साथ-साथ 10 किलोमीटर संरक्षित क्षेत्र की जमीन को भी कथित विकास के लिए सौंपने पर समिति सहमत दिखती है। इस श्रेणी में प्रमुख प्रस्ताव उत्तराखंड के देहरादून और टिहरीगढवाल जिलों में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना (300 मेगावाट) का निर्माण और चालू है। यह परियोजना बिनोग वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से 3.10 किमी दूर स्थित है और अभयारण्य के डिफ़ॉल्ट ईएसजेड में गिरती है। परियोजना के लिए 768.155 हेक्टेयर वन भूमि और 105.422 हेक्टेयर निजी भूमि की आवश्यकता होगी। परियोजनाओं को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने निलंबित कर दिया था। इसके बावजूद इस परियोजना पर राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा विचार किया जा रहा हे। 


समिति द्वारा जंगल उजाड़ने के लिए दी गई अनुमति में  पष्चिम घाट भी है और पूवौत्तर भारत भी। गुजरात के गिर षेर अभ्यरण में बिजली के केबल विछाने की येाजना भी है तो तेलंगाना के कवाल टाइगर रिजर्व, में रेलवे लाईन बिछाने का काम भी। यहां मखौड़ी और रेचन रोड रेलवे स्टेशनों के बीच तीसरी रेलवे लाइन बिछाने के लिए 168.43 हेक्टेयर वन भूमि का हस्तांतरित किया जा रहा है़। प्रस्तावित रेलवे लाइन कवाल टाइगर रिजर्व के बाघ गलियारे के बीच से गुजरेगी जो इसे महाराष्ट्र में ताडोबा-अंधेरी टाइगर रिजर्व और छत्तीसगढ़ में इंद्रावती टाइगर रिजर्व से जोड़ती है। तेलंगाना में ही ईटानगरम वन्य अभ्यारण के भीतर गोदावरी नदी पर बैराज बनाने के लिए कोई 9.96 हैक्टर जंगल को काटने की अनुमति दे दी गई। डम्पा टाइगर रिज़र्व, मिज़ोरम के भीतर खडेचेरा - डेमचेर्रा - ज़मंगु - कांजमुन - तुइलुइकवा (केडीकेटी) सड़क के चौड़ीकरण और सुधार के लिए 1.94 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित कर दिया गया। 
यह किसी से छुपा नहीं है कि दक्षिण भारत में स्थित पष्चिमी घाट देष की कुल जैव विविधता के तीस फीसदी का भंडार है और पर्यावरणीय संतुलन के मामले में वह सघन वन क्षे़ बहुत संवेदनषील है। इसे यूनेस्को ने ‘विष्व विरासत’ घोशित कर रखा है। इसके बावजूद हुबली-अंकोला रेलवे लाईन के लिए इस  क्षेत्र के 596 हैक्टर जंगल काटने की अनुमति दे दी गई। इस रेल लाईन का 80 फीसदी हिस्सा घने जंगल के बीच से गुजरेगा। जाहिर है कि रेल में लगे डीजल इंजन के धुएं, ट्रेन का षोर, उससे गिरने वाला कचरा आदि सदियों पुराने जंगल और जल-संरचनाओं के नैसर्गिक स्वरूप को नश्ट करेंगे। इस रेल केलिए पटरियां डालने के लिए 595.64 हैक्टर के घने जंगल और 104.64 हैक्टर वेट लैंड को उजाड़ा जाएगा। इसके लिए कोई 2.2 लाख पेड़ काटे जाने का अनुमान प्रोजेक्ट रिपोर्ट में किया गया है। कर्नाटक में ही कैगा परमाणु घर परियोजना 5 और 6 के विस्तार के  लिए 54 हैक्टर जंगल से 8700 पेड़ कोटे जाने को अनुमति दे दी गई।  गोवा-कनार्टक सीमा पर राश्ट्रीय राजमार्ग 4 ए की चार लेन विस्तार के लिए अनमोद-मोल्लम सेक्षन में भगवान महावीर वन्य जीव अभ्यारण के एक हिस्से को उजाड़ा जा रहा है। यह भी पष्चिमी घाट पर एक बड़ा हमला है। इस परियोजना के लिए 32.085 हेक्टेयर वन भूमि की आवश्यकता है, जिसमें से 31.015 हेक्टेयर महावीर वन्यजीव अभयारण्य में स्थित है। बिजली लाईन डालने की नरेंद्र (मौजूदा) और प्रस्तावित नरेन्द्र (नई) परियोजना के लिए गोवा के क्यूपेम तहसील में स्लेडेम के पास जंगल उजाड़ने की अनुमति दे दी गई। 
दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय  के पर्यावरणीय छेड़छाड़ से उपजी सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी को भुला कर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं उत्तराखंड राज्य के भविश्य  के लिए खतरा बनी हुई हैं। गत नवरंब -2019 में राज्य की कैबिनेट से स्वीकृत नियमों के मुताबिक कम से कम दस हेक्टेयर में फैली हरियाली को ही  जंगल कहा जाएगा। यही नहीं वहां न्यूनतम पेड़ों की सघनता घनत्व 60 प्रतिशत से कम ना हो और जिसमें 75 प्रतिशत स्थानीय वृक्ष प्रजातियां उगी हों। जाहिर है कि जंगल की परिभाशा में बदलाव का असल उद्देष्य ऐसे कई इलाकांे को जंगल की श्रेणी से हटाना है जो कि कथित विकास के राह में रोड़े बने हुए हैं। उत्त्राखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए। मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे। यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है ।.उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने का प्रावधान है। कोई 12 हजार करोड़ रुपए के अलावा ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है, जिसमें ना सिर्फ बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, वन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाएंगें। सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं। यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। 

राजस्थान के मुकंदरा हिल्स टाईगर परियोजना में इको सेंसेटिव जोन दस किलोमीटर के घटा कर महज एक किलोमीटर कर दिया गया ताकि  घने जंगल और बाघ के इलाके के भीतर भी चूना पत्थर व अन्य खनिज की खुदाई की अनुमति मिल सके। इस बदलाव से जंगल के भीतर बसे 75 गांव भी अब वन-ग्राम ना हो कर राजस्व गांव हो गए हैं और यहां पेड़ काटने की कई छूट लागू हो गई हैं। 
एक मोटा अनुमान है कि सन 1951 के बाद भारत में कोई पांच हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को उजाड़ा गया। जंगल का अपना एक चक्र हुआ करता था , सबसे भीतर घने ,ऊँचे पेड़ों वाले जंगल, गहरी घास जो कि किसी बाहरी दखल से मुक्त रहती थी , वहां मनुष्य के लिए खतरनाक जानवर शेर आदि रहते थे . वहीं ऐसे सूक्ष्म जीवाणुओं का बसेरा होता था जो यदि लगातार इंसान के सम्पर्क में आये तो अपने गुणसूत्रीय संस्कारों को इन्सान के शरीर के अनुरूप बदल सकता था । इसके बाहर कम घने जंगलों का घेरा- जहां हिरन जैसे जानवर रहते थे। माँसाहारी जानवर को अपने भोजन के लिए महज इस चक्र तक आना होता था  और इंसान का भी यही दायरा था। उसके बाद जंगल का ऐसा हिस्सा जहां इंसान अपने पालतू मवेशी चराता, अपनी इस्तेमाल की वनोपज को तलाशता और इस घेरे में ऐसे जानवर रहते जो जंगल और इंसान दोनों के लिए निरापद थे । तभी इस जंगल-पिरामिड में शेर कम, हिरन उससे ज्यादा, उभय- गुनी जानवर उससे ज्यादा और उसके बाहर इंसान , ठीक यही प्रतिलोम जंगल के घनेपन में लागू होता । जंगलों की अंधाधुंध कटाई और उसमें बसने वाले जानवरों के प्राकृतिक  पर्यावास के नष्ट होने से इंसानी दखल से दूर रहने वाले जानवर सीधे मानव के संपर्क में आ गए और इससे जानवरों के वायरसों के इंसान में संक्रमण और इंसान के शारीर के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता भी विकसित हुई। . 

खासकर खेती के कारण , भूमि के बदलते इस्तेमाल ने जन्तुजन्य रोगों की राह इंसान तक आसान कर दी है. जहां वन्यजीवों की विस्तृत जैव विविधता पर इंसान की घनी आबादी का साया पड़ा , वहां ऐसे रोग संक्रमण की अधिक संभावना होती है .  तीन तरीकों से जैव विविधता के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम भयानक बीमारियों के रूप में सामने आते हैं । पहला, पारिस्थिकी तंत्र में छेड़छाड़ के कारण इंसान और उसके पालतू मवेशियों का वन्य जीवों से सीधा संपर्क होना , दूसरा , चमगादड़ जैसे जानवर जो कि इंसानी बस्तियों में रहने की आदि हैं, का इंसान या उनके मवेशियों से ज्यादा संपर्क होना . तीसरा, सरलीकृत पारिस्थितिक तंत्र में इन जीवित वन्यजीव प्रजातियों द्वारा अधिक रोगजनकों का संक्रमण होता है। जनसंख्या और उनके मवेशियों की तेजी से बढती आबादी का सीधा अर्थ है कि वन्यजीवों की प्रजातियां और उनके द्वारा वाहक  रोगजनकों से अधिक से अधिक संपर्क। जाहिर है कि आज घने जंगल को उजाड़ना महज एक हरियाली को नश्ट करना मात्र ही नहीं है, बल्कि इंसान के लिए कई अंजान जंतु-जनित बीमारियों का न्यौता देना भी है। 

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असम की नियति बन चुकी है बाढ़



यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है- हर साल ऐसा होता है, लेकिन हर साल राज्य के विकास में जो धन व्यय होता है, उससे ज्यादा नुकसान दो महीने में ब्रह्मपुत्र का कोप कर जाता है। इस समय असम के कुल 33 में से 30 जिले बुरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं। 54 लाख लोग घर-बार छोड़ कर राहत शिविरों में हैं।

सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। दुनिया भर में एक सींग के गैंडे का आश्रय स्थल काजीरंगा पार्क 90 फीसदी जलमग्न है और वहां सौ से ज्यादा जानवर डूबकर मर चुके हैं, जिनमें पांच गैंडे भी हैं। हजारों हेक्टेयर में खड़ी फसल, सड़क, मकान नष्ट हो गए हैं। यह भी जान लें कि राज्य के अधिकांश जिलों में ऐसे ही हालात सितंबर तक चलेंगे।
यह विडंबना है कि असम राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। अनुमान है कि इसमें सालाना कोई 200 करोड़ रुपये का नुकसान होता है जिसमें- मकान, सड़क, मवेशी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि शामिल हैं। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो ही जाता है।
असम हर साल विकास की राह पर पिछड़ता जाता है। असम में प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बेहतरीन भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद यहां का समुचित विकास न हो पाने का कारण हर साल पांच महीने ब्रह्मपुत्र का रौद्र रूप है।

पिछले कुछ सालों से जिस तरह से बह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों में बाढ़ आ रही है, वह हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम है। यह दुखद है कि आजादी के 72 साल बाद भी हम वहां बाढ़ नियंत्रण की कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें, तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था।

पिछले कुछ सालों से ब्रह्मपुत्र का प्रवाह दिनोंदिन रौद्र होने का मुख्य कारण इसके पहाड़ी मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई को माना जा रहा है। ब्रह्मपुत्र का प्रवाह क्षेत्र उत्तुंग पहाड़ियों वाला है, वहां कभी घने जंगल हुआ करते थे। उस क्षेत्र में बारिश भी जमकर होती है।

असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां, उनकी कोई 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है।

असम की अर्थव्यवस्था का मूल आधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में वहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें धान, जूट, सरसों, दालें व गन्ना हैं।

धान व जूट की खेती का समय ठीक बाढ़ के दिनों का ही होता है। खेती के तरीकों में बदलाव और जंगलों का बेतरतीब दोहन जैसी मानव-निर्मित दुर्घटनाओं ने जमीन के नुकसान के खतरे को दोगुना कर दिया है। दुनिया में नदियों पर बने सबसे बड़े द्वीप माजुली पर नदी के बहाव के कारण जमीन कटान का सबसे अधिक असर पड़ा है।

ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसंबर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी। बोर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी।

केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंत्रण महकमा कई सालों से काम कर रहा है और उसके रिकॉर्ड में ब्रह्मपुत्र घाटी देश के सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में से है। इन महकमों ने इस दिशा में अभी तक क्या कुछ किया?

उससे कागज व आंकड़ों को जरूर संतुष्टि हो सकती है, असम के आम लोगों तक तो उनका काम पहुंचा नहीं है। असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई और नए बांधों का निर्माण जरूरी है।

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To Save agriculture get rid of Paddy farming

 खेत बचाना हो तो धान का मोह छोड़ें पंकज चतुर्वेदी इस बार मानसून आने में देर हो गई, लेकिन जिन इलाकों की रोजी रोटी ही खेती से चलती हो, वह बुवाई...