ecology , water and environment

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

गुरुवार, 26 मार्च 2026

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

 गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा

पंकज चतुर्वेदी

लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अंततः गरिमापूर्ण और नैसर्गिक प्रक्रिया से 24 मार्च को इस आसार संसार से विद हो गए । यह हो पाया सुप्रीम  कोर्ट के उस आदेश के कारण जिस बात का प्रावधान संविधान में नहीं है । गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले बेबस बिस्तर पर पड़े हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ का आदेश देकर उनकी पीड़ा का निवारण करने के साथ एक नजीर पेश की है। जीवन का अधिकार प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार है, लेकिन जब यही जीवन मशीनों के शोर और अंतहीन शारीरिक पीड़ा के बीच घुटने लगे, तो गरिमापूर्ण मृत्यु की मांग एक मानवीय पुकार बन जाती है। हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने हरीश राणा के मामले में 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' (पैसिव यूथेनेसिया ) की अनुमति देकर न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा का अंत किया है, बल्कि चिकित्सा और कानून के इतिहास में एक नई नजीर भी पेश की है। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश के बाद अब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) 'निष्क्रिय इच्छा मृत्यु' के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का प्रोटोकॉल तैयार कर रहा है। यह पहल आने वाले समय में उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनेगी जो अपने प्रियजनों को 'पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट' यानी ऐसी स्थिति में देख रहे हैं जहाँ जीवन की संभावना शून्य है, लेकिन मशीनों के सहारे सांसें चल रही हैं।

भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था में इस आदेश का गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। जिस तरह वर्तमान में बड़े अस्पतालों में अंगदान के लिए विशेष समितियां गठित होती हैं, उसी तर्ज पर अब 'निष्क्रिय यूथेनेसिया कमेटी' बनाना अनिवार्य हो सकता है। यह समिति केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं होगी, बल्कि इसमें चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ कानूनी और मानवीय पक्षों के जानकार भी शामिल होंगे। यह समिति पूरी पारदर्शिता के साथ यह तय करेगी कि यदि मरीज का बच पाना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है, तो कब और किस तरह परिवार की सहमति से 'सक्रिय इलाज' को रोका जाए। अब तक ऐसी स्थितियों में डॉक्टर और परिजन कानूनी पेचीदगियों के डर से अनिर्णय की स्थिति में रहते थे, लेकिन एम्स द्वारा तैयार किया जा रहा प्रोटोकॉल इस प्रक्रिया को एक स्पष्ट दिशा देगा। इसे जल्द ही न्यायालय को भी सौंपा जाएगा ताकि पूरे देश में एक समान मानक लागू हो सकें।

चिकित्सा विज्ञान के आंकड़े भी इस दिशा में कठोर सत्य को बयां करते हैं। एम्स ट्रॉमा सेंटर द्वारा पंद्रह सौ से अधिक हादसा पीड़ितों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार, मस्तिष्क की गंभीर चोट वाले मरीजों में से केवल ग्यारह प्रतिशत ही इलाज के बाद कोमा से बाहर आ पाते हैं। शेष मरीजों के लिए वेंटिलेटर या कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरण केवल उनके शरीर के अंगों को सक्रिय रखते हैं, जबकि चेतना पूरी तरह लुप्त हो चुकी होती है। ऐसे में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का उद्देश्य जीवन को छीनना नहीं, बल्कि उस पीड़ा को समाप्त करना है जिसका कोई अंत नजर नहीं आता। प्रोटोकॉल में स्पष्ट किया जाएगा कि किन परिस्थितियों में वेंटिलेटर, कृत्रिम पोषण और आईवी फ्लूइड जैसे उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा सकता है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि 'सक्रिय' और 'निष्क्रिय' इच्छा मृत्यु के बीच एक बहुत पतली लेकिन महत्वपूर्ण रेखा है। सक्रिय इच्छा मृत्यु, जिसमें इंजेक्शन या घातक दवा देकर जान ली जाती है, भारत में पूरी तरह अवैध है। इसके विपरीत, निष्क्रिय इच्छामृत्यु में केवल उन कृत्रिम साधनों को हटाया जाता है जो प्राकृतिक मृत्यु को रोक रहे होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में ही इसे कड़ी शर्तों के साथ वैध माना था, लेकिन अब हरीश राणा मामले के बाद इसे धरातल पर उतारने की प्रक्रिया तेज हुई है। नए नियमों के तहत मरीज को अंतिम सांस तक 'सपोर्टिव इलाज' या 'पैलिएटिव केयर' मिलती रहेगी। इसका अर्थ है कि वेंटिलेटर हटाने के बाद भी मरीज को दर्द से राहत देने वाली दवाएं और बुनियादी देखभाल मिलती रहेगी ताकि उसकी विदाई कष्टकारी न हो।

इस पूरे विमर्श का एक महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक और सामाजिक भी है। कोमा या वेंटिलेटर पर लंबे समय तक रहने वाले मरीजों के कारण न केवल अस्पताल के संसाधनों पर दबाव पड़ता है, बल्कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट जाते हैं। कई मामलों में परिवार के पास इलाज के पैसे खत्म हो जाते हैं, लेकिन कानूनी डर से वे इलाज बंद भी नहीं करा पाते। कैंसर की एडवांस स्टेज वाले मरीजों के लिए भी यह प्रोटोकॉल एक वरदान साबित होगा, जहाँ इलाज से ज्यादा दर्दनाक खुद बीमारी हो जाती है। ऐसे समय में चिकित्सा विज्ञान का लक्ष्य मरीज को ठीक करना नहीं, बल्कि उसके जीवन के आखिरी पड़ाव को सम्मानजनक बनाना होना चाहिए।

आने वाले समय में जब अस्पताल इन समितियों के माध्यम से निर्णय लेंगे, तो उसमें मरीज की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक जरूरतों का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाएगा। यह समाज के लिए एक संवेदनशील मोड़ है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं हैं और मृत्यु जीवन का एक अनिवार्य सत्य है। जब विज्ञान हार जाए, तब संवेदनाओं को रास्ता देना ही मानवता है। एम्स की यह पहल और कोर्ट का यह आदेश भविष्य में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जहाँ तकनीक का उपयोग केवल जीवन को खींचने के लिए नहीं, बल्कि विदाई को गरिमापूर्ण बनाने के लिए भी किया जा सकेगा। यह कदम देश में स्वास्थ्य सेवाओं के मानवीयकरण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

In the Name of World it is local boomk Market

 

आखिर क्यों टिकट मुक्त कर दिया विश्व पुस्तक मेला
“विश्व” के नाम पर पटरी बाजार
पंकज चतुर्वेदी
 

जब दिल्ली में कड़ाके की सर्दी, कोहरे  और दमघोंटूँ  स्माग की मार चरम पर हो गई तब 10 जनवरी से नौ दिन के लिए  दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में गिने जाने वाले नई दिल्ली पुस्तक मेले का आयोजन हो रहा है  । इस बार प्रगति मैदान, जो अब भारत मंडपम हो गया है, में प्रवेश के लिए टिकट नहीं लगेगा  और इसे आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहा है । नवंबर के ट्रेड फेयर एक बाद सबसे अधिक भीड़ भाड़ वाले आयोजन में निशुल्क  आमद के पीछे का कारण  जानने के लिए मेले की चल रही तैयारी को देखना होगा , जहां  प्रगति मैदान  के चप्पे चप्पे पर नरेंद्र मोदी और धर्मेन्द्र प्रधान के बड़े  -बड़े होर्डिंग लगा दिए गए है। लगता है कि यह  पुस्तक मेला  न हो कर बीजेपी के सम्मेलन का स्थल है ।


भले ही इसे बड़े जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन असली पुस्तक प्रेमियों के लिए निशुल्क प्रवेश व्यवधान ही होता है । इससे पहले भी एक बार  निशुल्क प्रवेश किया गया तो बेशुमार भीड़ से व्यवस्थाएं चरमराई और किताबों से अधिक खाने-पीने के स्टाल पर लोगों ने खर्चे किए।  शौचालय  गंदे मिले तो सारे परिसर में कूड़ा ही कूड़ा फैल गया ।  फिर  लाल किले के पास हुए बम धमाके बाद दिल्ली पर बढ़ गई सुरक्षा कि चुनौतियाँ तो हैं ही । यह किसी से छुपा नहीं है कि  भारत मंडपम के भीतर  खाने-पीने के स्टाल भारी भरकम  ठेके पर होते हैं , सो वहाँ के दाम भी आसमान पर रहते हैं । बहुत से पुस्तक प्रेमियों का आकलन हैं कि निशुल्क होने से तफरीह करने वालों की भीड़ बढ़ती है और इससे  खाने -पीने का समान बेचने वालों की चांदी होती हैं ।  यह एक विशुद्ध  धोखा है , तीस रुपये का टिकट  हटा कर सौ रुपये एक चाय  और पानी कि बोतल पर लोगों की जेब से खींच लेना ।



यह समझना होगा कि किताबों को चाहने वालों के सामने आज  असली समस्या  किताबों के बढ़ते दाम हैं – एक तो कागज की कीमत और ऊपर से  कागज पर 12 प्रतिशत व मुद्रण पर 30 प्रतिशत जी एस टी की मार । वैसे भी दुनिया के बड़े पुस्तक मेलों से तुलना करें तो नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेल भीड़ तो खींचता है लेकिन इसे अंतर्राष्ट्रीय कहे जाने वाले न तो प्रकाशक होते हैं न ही लेखक ।

54  साल पहले 18 मार्च से 04 अप्रेल 1972 तक  नई दिल्ली के विंडसर पेलेस के मैदान में कोई 200 भागीदारों के साथ शुरू हुआ  नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला तब  ‘वसंतोत्सव’ के रूप में शुरू हुआ था ।  वसंत के सुखद मौसम में , जब न ज्यादा ठंड , न गर्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित । तब दो साल में एक बार पुस्तक मेल लगता था और देश-विदेश के प्रकाशक इसके लिए खासी तैयारी करते थे। सन 2016 में चीन अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया गया था, चूंकि चीन में फरवरी के महीने में सालाना जश्न होता है और वहाँ  प्रायः सभी जगह अवकाश होता है , सो उनके लिए वसंतोत्सव की परंपरा को तोड़ कर जनवरी में पुस्तक मेले का आयोजन शुरू हुआ। हालांकि  इस मौसम में यातायात साधनों में विलंब और व्यवधान  से  बाहरी पुस्तक प्रेमियों को आने में दिक्कत होती है लेकिन इस मौसम में आयोजकों का प्रगति मैदान को  वातानुकूलित तंत्र चलाने का खर्च काम हो जाता है , शायद इसी लिए जनवरी के कड़ाके की ठंड में पुस्तक मेल जारी रहा । सन 2013 तक यह हर दो साल में  लगता था , फिर यह सालाना जलसा हो गया ।

लेखकों, प्रकाकों, पाठकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार होता है नई दिल्ली विश्व  पुस्तक मेला का। हालांकि फेडरेन आफ इंडियन पब्लिशर्स(एफआईपी) भी हर साल अगस्त में दिल्ली के प्रगति मैदान में ही पुस्तक मेला लगा रहा है और इसमें लगभग सभी ख्यातिलब्ध प्रकाक आते हैं, बावजूद इसके नेनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक मेले की मान्यता अधिक है। हमारे  यहाँ केवल किताब खरीदने के लिए तो  दर्जनों वेबसाईट उपलब्ध हैं जिस पर घर बैठे आदेश दो और घर बैठे डिलेवरी लो, इसके बावजूद इसके बावजूद यहाँ 1200 से 1400 प्रतिभागी होते हैं और कई चाह कर भी हिस्सेदारी नहीं कर पाते क्योंकि जगह नहीं होती या फिर यहाँ भागीदारी का खर्च बहुत अधिक होता है, एक स्टाल लगाने का कम से कम एक लाख रुपये । असल में पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है जिससे जब तक बात ना करो, रूबरू ना हो, हाथ से स्पर्ष ना करो, अपनत्व का अहसास देती नहीं हे। फिर तुलना के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इनते सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर विपणन विकल्प व मनोवृति भी है।

यह बात भी तेजी से चर्चा में है कि इस पुस्तक मेले में विदेशी  भागीदारी लगभग ना के बराबर होती जा रही है। यदि श्रीलंका और नेपाल को छोड़ दें तो विश्व  बैंक, संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन,  स्वास्थ्य, यूनीसेफ आदि के स्टाल विदेशी मंडप  में अपनी प्रचार सामग्री प्रदर्शित करते दिखते हैं। फेंकफ़र्ट  और अबुधाबी पुस्तक मेला के स्टाल भागीदारों को आकर्षित करने के लिए होते हैं। दो-तीन देश के भारत दूतावास किताबें प्रदर्शित कर देते हैं । इक्का-दुक्का स्टालों पर विदेशी  पुस्तकों के नाम पर केवल ‘रिमेंडर्स’ यानी अन्य देशों की फालतू या पुरानी पुस्तकें होती हैं। ऐसी पुस्तकों को प्रत्येक रविवार को दरियागंज में लगने वाले पटरी-बाजार से आसानी से खरीदा जा सकता है। पहले पाकिस्तान से दस प्रकाशक आते थे लेकिन बीते 15 सालों से पाकिस्तान के साथ बाकी तिजारत तो जारी है लेकिन एक दूसरे के पुस्तक  मेलों में भागीदारी बंद हो गई। हर बार किसी देश को  “ विशेष अतिथि देश “  का सम्मान दिया जाता है , वहाँ से लेखक, कलाकार भी आते हैं लेकिन उनके आयोजनों में बीस लोग भी नहीं होते। एक तो उनका प्रचार कम होता है , फिर प्रगति मैदान में घूमना और किसी सेमीनार में भी बैठना किसी के लिए शायद ही संभव हो। हालांकि विदेशी तो बहुत दूर है , हमारे मेले में संविधान में अधिसूचित सभी 22 भारतीय भाषाओं के प्रकाशक भी नहीं होते। पहले राज्यों के प्रकाशक संघों को निशुल्क स्टाल और आवास की व्यवस्था की जाती थी तो ढेर सारे भाषाई प्रकाशक यहाँ आते थे, जो अब बंद कर दिया गया । यहाँ अब अधिकांश वे विक्रेता होते हैं जो हर हफ्ते दरियागंज के पटरी बाजार में  किताबें  सजाए रहते हैं । यह किसी भी स्तर पर विश्व स्तरीय आयोजन तो लगता नहीं ।

नई दिल्ली पुस्तक मेला की छवि पर एक  दाग वहाँ हर हाल में  बजने वाले प्रवचन और हल्ला-गुल है । बाबा-बैरागियों और कई तरह के धार्मिक संस्थाओं के स्टालों में हो रही अप्रत्याशित बढ़ौतरी भी गंभीर पुस्तक प्रेमियों के लिए चिंता का विषय  है। इन स्टालों पर कथित संतों के प्रवचनों की पुस्तकें, आडियों कैसेट व सीडी बिकती हैं। कुरान रीफ और बाईबिल से जुड़ी संस्थाएं भी अपने  प्रचार-प्रसार के लिए विश्व  पुस्तक मेला का सहारा लेने लगी हैं। बीते कुछ सालों से हर बार वहाँ कुछ संगठन उधम करते हैं और सारा साहित्यिक जगत सांप्रदायिक विवाद में धूमिल हो जाता है । समझना होगा कि किताबें लोकतंत्र की तरह हैं – आपको अपनी पसंद का विषय, लेखक, भाषा चुनने का हक देती हैं । यह मेला ही है तो है जहां गांधी- और सावरकर, चे-गोवएरा  और भागवत गीता  साथ- साथ रहते हैं और पाठक निर्णय लेता है कि वह किसे पसंद करे। या तो इस तरह के धार्मिक स्टालस को लगाने ही नहीं देना चाहिए या फिर उन्हे किसी एक जगह एक साथ कर देना चाहिए ।

पुस्तक मेला के दौरान बगैर किसी गंभीर योजना के सेमिनारों, पुस्तक लोकार्पण आयोजनों का भी अंबार होता है।  कई बार तो ऐसे कार्यक्रमों में वक्ता कम और श्रोता अधिक होते है। यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं है कि अब एक ही तरह की विचारधारा के लोगों को  आयोजक द्वारा निर्धारित “लेखक मंच” में समय दिया जाता है । पिछले सालों में कठुआ में नाबालिग बाछी के बलात्कार और हत्या को जायज ठहराने वाले सेमीनार तक होते रही । असल में यह स्थान भागीदार प्रकाशकों के लिए बना था कि वे अपने स्टाल पर लोकार्पण आदि न करें  और इससे वहाँ भीड़ न जमा हो । लेकिन  लेखक मंच राजनीतिक मंच बन गया और प्रकाशक यथावत अपने स्टाल पर आयोजन करते हैं । बाल मंडप में भी बच्चे स्कूल्स से बुलाए जाते हैं जबकि यह स्थान इस तरह  का होना चाहिए कि मेले में आए बच्चे स्वतः यहाँ कि गतिविधियों में शामिल हों। आबूधाबी पुस्तक मेले में ऐसी ही गतिविधियाँ सारे दिन चलती हैं ।

पुस्तक मेला के दौरान प्रकाकों, धार्मिक संतों, विभिन्न संस्थाओं द्वारा वितरित की जाने वाली निशुल्क सामग्री भी एक आफत है। पूरा प्रगति मैदान रद्दी से पटा दिखता है। कुछ सौ लोग तो हर रोज ऐसा ‘‘कचरा’’ एकत्र कर बेचने के लिए ही पुस्तक मेला को याद करते हैं। छुट्टी के दिन मध्यवर्गीय परिवारों का समय काटने का स्थान, मुहल्ले व समाज में अपनी बौद्धिक ताबेदारी सिद्ध करने का अवसर और बच्चों को छुट्टी काटने का नया डेस्टीनेन भी होता है- पुस्तक मेला। यह बात दीगर है कि इस दौरान प्रगति मैदान के खाने-पीने के स्टालों पर पुस्तक की दुकानों से अधिक बिक्री होती है।

पार्किंग , मैदान के भीतर खाने-पीने की चीजों के बेतहाशा दाम, हाल के भीतर मोबाईल का नेटवर्क कमजोर होने , भीड़ के आने और जाने के रास्ते एक ही होने जैसी कई ऐसी दुविधाएं हैं जिनसे यदि निजात पा ले तो सही मायने में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेल “विश्व” स्तर का होगा । पाठक को प्रवेश शुल्क से कोई परहेज नहीं बस किताबें उसकी सीमा में हों !

 

बुधवार, 12 नवंबर 2025

Terrorist Doctors: Concerns of Society and Education ...Pankaj Chaturvedi

 आतंकवादी डॉक्टर्स : समाज और  शिक्षा के सरोकार

...पंकज चतुर्वेदी

 


एक-दो नहीं कोई आधे दर्जन  डॉक्टर्स एक ऐसे गिरोह में शामिल थे जो देश को अस्थिर करने और निर्दोष लोगों की हत्या के लिए धर्म की आड़ ले रहे थे। दिल्ली में बेकसूर अनजान की लोगों की जान उन लोगों ने ले ली जिन्होंने  इस बात की शिक्षा ली थी कि हर हाल में लोगों की जान  बचनी हैं। वह भी उस राज्य के लोग जहां साक्षरता स्तर  देश एक औसत से अधिक 82 फीसदी से अधिक है ।

इस नफ़रत के दरिया में डूबते- तैरते सहभागी भले ही  कुछ कुतर्क गढ़ें और किसी धर्म विशेष को निशाने पर लेने में उससे जुड़े लोग खुद को उससे अलग दिखाएं लेकिन सवाल तो उठता है कि क्या समाज का बड़ा वर्ग और साथ ही हमारी शिक्षा हिंसा , घृणा, भावनाओं पर नियन्त्रण ना होना जैसे मसलों पर व्यवहारिक ज्ञान या नैतिकता का पाठ पढ़ाने में असफल रहा है । चूंकि इतनी बड़ी संख्या में डॉक्टर्स  एक ही संप्रदाय से जुड़े हैं , इस लिए इस बात पर तो विचार करना होगा कि समाज का शिक्षित और पढ़-लिखा वर्ग क्या अपने घर में, धार्मिक स्थल और  सामाजिक  विमर्श में इस तरह की अलगाववादी और हिंसक हरकतों के खिलाफ सशक्त दखल रखता है ? असल में सवाल के दायरे में वे सभी आते हैं जो समुदाय के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक रहनुमाई का दावा करते हैं। बात केवल नींद करने और उनसे खुद को अलग करने की नहीं है ।



सवाल के दायरे में वे भी हैं जो बंदूक के दवाब में हुए कतिपय राजनीतिक बदलाव के बाद यह मान बैठे हैं कि अब सब कुछ सामान्य हो गया है । जिस राज्य का साक्षरता प्रतिशत इतना अच्छा हो, खासकर किशोर और युवाओं में, जहां से आब्दि संख्या में डॉक्टर निकल रहे हैं  – वहां के युवा यदि बंदूकें ले कर खुद ही मसले को निबटाने या अपने विद्वेष में आतंकवाद को औजार बनाने के लिए आतुर हैं  तो ज़ाहिर है कि वे अभी तक स्कूल –कालेज में जो पढ़ते रहे , उसका उनके व्यवहारिक जीवन में कोई महत्व या मायने है ही नहीं . यदि सीखना एक सामाजिक प्रक्रिया है तो हमारी वर्तमान विद्यालय प्रणाली इसमें शून्य है . यह कडवा सच है कि पाठ्यक्रम और उसकी सीख महज विद्यालय के परिसर के एकालाप और परीक्षा में उत्तीर्ण होने का माध्य है . इसमें समाज  या बच्चे के पालक की कोई भागीदारी नहीं है . किसी असहमति को , विग्रह को किस तरह संयम के साथ साहचर्य से सुलझाया जाए ,  ऐसी कोई सीख  विद्यालय समाज  तक दे नहीं पाया । फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे लड़के हाथों में अस्लाहा लिए महज किसी जाती या समाज को  जड़ से समाप्त कर देने के लिए आतुर दिखे. उनके अनुसार विवाद का हल दूसरे समुदाय को जड़ से मिटा देने के अलावा कुछ नहीं . लगा किताबों के पहाड़, डिग्रियों के बंडल  और दुनिया की समझ एक कारतूस के सामने बौने ही हैं ।     

यह शक  के दायरे में है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व  देश की शिक्षा का असली मर्म समझ पा रहा है। महंगाई की मार के बीच उच्च शिक्षा  प्राप्त युवाओं का रोजगार, घाटे का सौदा होती खेती और विकास के नाम पर हस्तांतरित होते खेत, पेट भरने व सुविधाओं के लिए शहरों की ओर पलायन, प्राकृतिक  संसाधनों पर आश्रित समाज को उनके पुश्तैनी घर-गाँव से निष्कासित करना। दूरस्थ  राज्यों के शिक्षित ग्रामीण युवाओं की ये दिक्कतें क्या हमारे नीति निर्धारकों की समझ में है? क्या भारत के युवा को केवल रोजगार चाहिए ? उसके सपने का भारत कैसा है ? वह सरकार और समाज में कैसी भागीदारी चाहता है? ऐसे ही कई सवाल तरूणाई के ईर्दगिर्द टहल रहे हैं, लगभग अनुत्तरित से।

अभी उत्तर-पूर्व की राज्य मणिपुर में शांति लौट कर नहीं आई है । याद करें वहाँ भएए पढे लिखे युवा आज भी हाथ में बंदूक ले कर एक दूसरे समुदाय पर आक्रामक हैं ।  इधर कश्मीर के दूरस्थ अंचलों से निकाल कर डॉक्टर बनने वाले  युवा देश की मूल भावना  से उदासीन और किसी  असंभव लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धार्मिक रूप से  ब्राइन वक्ष हो रहे हैं । वस्तुतया कुशल जन-बल के निर्माण के लिए ग्रामीण किशोर  वास्तव में ‘कच्चे माल’ की तरह है , जिसका मूल्यांकन कभी ठीक से किया ही नहीं जाता और लाजिमी है कि उनके विद्रोह को कोई सा भी रंग दे दिया जाता है।

आज जरूरत है कि स्कूल स्तर पर  पाठ्यक्रम और शिक्षाशास्त्र इस तरह हों ताकि मौलिक कर्तव्यों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की गहरी भावना, अपने देश के साथ अटूट संबंध, और एक बदलती दुनिया में अपनी  भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूकता विकसित की जा सके । न केवल विचार में, बल्कि आत्मा, बुद्धि और कर्मों में, बल्कि भारतीय होने में एक गहन-गर्वित गर्व पैदा करने के लिए, साथ ही साथ ज्ञान, कौशल, मूल्यों और प्रस्तावों को विकसित करने के लिए, जो मानव अधिकारों के लिए जिम्मेदार प्रतिबद्धता का समर्थन करते हैं, सतत विकास और जीवन ,और वैश्विक कल्याण, जिससे वास्तव में एक वैश्विक नागरिक प्रतिबिंबित हो ।

हम अपने मसले भावनाओं में बह कर गलत तरीके से नहीं, बल्कि सामंजस्य के साथ साथ बैठ कर , बगैर किसी बाहरी दखल के सुलझा सकें इसके लिए अनिवार्य है कि स्कूल  से ही बच्चों को समुदायिक  और सामूहिक निर्णय लेने की लोकतन्त्रात्मक प्रणाली के लिए मानसिक रूप से दक्ष किया जाए . इसके लिए स्कूली स्तर पर शारीरिक शिक्षा, फिटनेस, स्वास्थ्य और खेल; विज्ञान मंडलियाँ, गणितँ, संगीत और नृत्यँ, शतरंज ,कविता , भाषा, नाटक , वाद-विवाद मंडलियां ,इको-क्लब, स्वास्थ्य और कल्याण क्लब , योग क्लब आदि की गतिविधियाँ , प्राथमिक स्तर पर बगैर बस्ते के अधिक दिनों तक आयोजित करना होगा ।

कश्मीर घाटी जैसे छोटे से और पर्याप्त साक्षर राज्य ने जता दिया कि हमारी शिक्षा  में कुछ बात तो ऐसी है कि वह ऐसे युवाओं, सरकारी कर्मचारियों , खासकर पुलिस को-  देश , राष्ट्रवाद, महिलाओं के लिए सम्मान और अहिंसा जैसी भावनाओं से परिपूर्ण नहीं कर पाई । यह हमारी धार्मिक और पाठ्य पुस्तकों व  उससे उपज रही शिक्षा का खोखला दर्शन  नहीं तो और क्या है ? हम धार्मिक आयोजनों या घर में साथ बैठ कर  सियासी मसलों के समाधान में हिंसा और अलगाव की संभावना को सिरे से नकारने पर सशक्त राय देने से क्यों परहेज करते हैं ?

 

 

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

Hindi can not be promote without folk dialects

 बोलियों को बचाए बगैर नहीं संवरेगी हिंदी

पंकज चतुर्वेदी



सितम्बर का महीना विदा होते बादलों के साथ-साथ  विदा होने के भी से ग्रस्त हिंदी की चिंता का होता हैं . हिंदी लोक भाषा है और उसे राज भाषा कैसे बनाया जाए , इस  अंधी दौड़ में देश की बोलियाँ लुप्त हो रही हैं और हिंदी में  उनका समृद्ध  शब्द – संस्कार  संहित होने के बनिस्पत यूरोपीय भाषाओँ के शब्द हिंदी में जगह बनाते जा रहे हैं . सन 1857 के आसपास हमारी जनगणना में महज एक प्रतिशत लोग साक्षर पाए गए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उससे पहले भाषा, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद ज्योतिष अंतरिक्ष का ज्ञान हमारे पास नहीं था। वह था- देश की बोलियों में, संस्कृत , उससे पहले प्राकृत या पालि में जिसे सीमित लोग समझते थे, सीमित उसका इस्तेमाल करते थे । फिर अमीर खुसरो के समय आई हिंदी, हिंद यानि भारत के गोबर पट्टी के संस्कृति, साहित्य व ज्ञान की भाषा, उनकी बोलियों का एक समुच्चय। इधर भक्ति काल का दौर था । । हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है। समस्त हिंदी उसकी लोक बोलियों में साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इस युग में प्राप्त होती हैं। वास्तव में यह हिंदी साहित्य नहीं, बल्कि हिंदी या देश की अन्य लोक बोलियों की रचना का काल था . अब सरकारी हिंदी सप्ताह या पखवाड़ा की चिंता है  कि दफ्तरों में हिंदी कैसी हो ?

 

आज जिस हिंदी की स्थापना के लिए पूरे देश में हिंदी पखवाड़ा  मनाया जाता है उसकी सबसे बडी दुविधा है मानक हिंदी यानि संस्कृतनिष्ठ हिंदी। सनद रहे संस्कृत की स्वभाव शास्त्रीय है और दरबारी, जबकि हिंदी का स्वभाव लोक है और विद्रोही । ऐसा नहीं कि आम लोगों की हिंदी में संस्कृत से कोई परहेज है। उसमें संस्कृत से यथावत लिए गए तत्सम शब्द भी हैं तो संस्कृत से परिशोधित हो कर आए तत्दव शब्द जैसे अग्नि से आग, उष्ट से ऊंट आदि । इसमें देशज शब्द भी थे, यानि बोलियों से आए स्थानीय शब्द और विदेशज भी जो अंग्रेजी, फारसी व अन्य भाषाओं से आए। आज भी और कल भी जब-जब प्रतिरोध, असहमति की बात होगी लोक बोली और उससे जुडी हिंदी ही काम आएगी . कई बार लगता है कि सरकारी हिंदी का प्रयास भी वही हैं जो  अंग्रेजी का था , आम लोग उसे समझ-बूझ ही न सकें .

संचार माध्यमों की हिंदी आज कई भाषाओं से प्रभावित है। विशुद्ध हिंदी बहुत ही कम माध्यमों में है। दृश्य और श्रव्य माध्यमों में हिंदी की विकास-यात्रा बड़ी लंबी है। हिंदी के इस देश में जहां की जनता गांव में बसती है, हिंदी ही अधिकांश लोग बोलते-समझते हैं, इन माध्यमों में हिंदी विकसित एवं प्रचारित हुई है। इसके लिए मानक हिंदी कुछ बनी हैं। ध्वनि-संरचना, शब्द संरचना में उपसर्ग-प्रत्यय, संधि, समास, पद संरचना, वाक्य संरचना आदि में कुछ मानक प्रयोग, कुछ पारंपरिक प्रयोग इन दृश्य-श्रव्य माध्यमों में हुए है, किंतु कुछ हिंदीतर शब्दों के मिलने से यहाँ विशुद्ध खड़ी बोली हिंदी नहीं है, मिश्रित शब्द, वाक्य प्रसारित, प्रचारित हो रहे हैं।

यह चिंता का विषय है कि समाचार पत्रों ने अपने स्थानीय संस्करण निकालने तो शुरू किए लेकिन उनसे स्थानीय भाषा  गायब हो गई। जैसे कुछ दशक पहले कानपुर के अखबारों में गुम्मा व चुटैल जैसे शब्द होते थे, बिहार में ट्रेन-बस से ले कर जहाज तक के प्रारंभ होने के समय को ‘‘खुलने’ का सम कहा जाता था। महाराष्ट्र के अखबारों में जाहिरा, माहेती जैसे शब्द होते थे। पंजाब -हरियाणा- हिमाचल के हिंदी मीडिया में स्थानीयता का पुट पर्याप्त होता था. अब सभी जगह एक जैसे शब्द आ रहे हैं। लगता है कि हिंदी के भाषा-समृद्धि के आगम में व्यवधान सा हो गया है।  तिस पर सरकारी महकमे हिंदी के मानक रूप को तैयार करने में संस्कृतनिष्ठ हिंदी ला रहे हैं। असल में वे जो मानक हिंदी कहते हैं असल में वह सीसे के लेटर प्रेस की हिंदी थी जिसमें कई मात्राओं, आधे शब्दों के फाँट नहीं होते थे। आज कंप्यूटर की प्रकाशन-दुनिया में लेड-प्रेस के फाँट की बात करने वाले असल में हिंदी को थाम रहे हैं।

हिंदी में बोली और भाषा का द्वन्द  शिक्षा के प्रसार  और स्कूल जाने वाले बच्चो की बढती संख्या और रोजगार के लिए पलायन ने बढाया ही है . संप्रेषणीयता की दुनिया में बच्चे के साथ दिक्कतों का दौर स्कूल में घुसते से ही से शुरू हुआ- घर पर वह सुनता है मालवी, निमाडी, आओ, मिजो, मिसिंग, खासी, गढवाली,राजस्थानी , बुंदेली, या भीली, गोंडी, धुरबी या ऐसी ही ‘अपनी’ बोली-भाषा। स्कूल में गया तो किताबें खड़ी हिंदी या अंग्रेजी या राज्य की भाषा में और उसे तभी से बता दिया गया कि यदि असल में पढ़ाई कर नौकरी पाना है तो उसके लिए अंग्रेजी ही एकमात्र जरिया है - ‘आधी छोड़ पूरी को जाए, आधी मिले ना पूरी पाए’’। बच्चा इसी दुरूह स्थिति में बचपना बिता देता है कि उसके ‘पहले अध्यापक’ मां-पिता को सही कहूं या स्कूल की पुस्तकों की भाषा को जो उसे ‘सभ्य‘ बनाने का वायदा करती है या फिर  जिंदगी काटने के लिए जरूरी अंग्रेजी को अपनाऊं। स्कूल में भाषा-शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण व पढ़ाई का आधार होती है। प्रतिदिन के कार्य बगैर भाषा के सुचारू रूप से कर पाना संभव ही नहीं होता। व्यक्तित्व के विकास में भाषा एक कुंजी है , अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना हो या फिर दूसरों की बात ग्रहण करना, भाषा के ज्ञान के बगैर संभव नहीं है।  भाषा का सीधा संबंध जीवन से है और मात्रभाषा ही बच्चे को परिवार, समाज से जोड़ती है। भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्यभ बालक को सोचने-विचारने की क्षमता प्रदान करना, उस सोच को निरंतर आगे बढ़ाए रखना, सोच को सरल रूप में अभिव्यक्त करने का मार्ग तलाशना होता है।  सभी जनजातिया बोलियों में हिंदी के स्वर-व्यंजन में से एक चौथाई होते ही नहीं है। असल में आदिवासी कम में काम चलाना तथा संचयय ना करने के नैसर्गिक गुणों के साथ जीवनयापन करते हैं और यही उनकी बोली में भी होता है। लेकिन बच्चा जब स्कूल आता है तो उसके पास बेइंतिहां शब्दों का अंबार होता है जो उसे दो नाव पर एकसाथ सवारी करने की मानिंद अहसास करवाता है। इस टकराव के बीच हिंदी को ना अजाने कब अंग्रेजी श्रेष्ठता के ग्रहण से  ढँक लेती है .  जाहिर है कि इस शिक्षा से पढ़े लोग जिस दफ्तर में जायेंगे , वे भी राज भाषा और लोकभाषा की हिंदी में उलझे रहेंगे .

 

असल में कोई भी भाषा ‘बहता पानी निर्मला’ होती है, उसमें समय के साथ शब्दों का आना-जाना, लेन-देन, नए प्रयोग आदि लगे रहते है।  यदि हिंदी को वास्तव में एक जीवंत भाषा बना कर रखना है तो शब्दों का यह लेन-देन पहले अपनी बोलियों व फिर भाषाओं से हो, वरना हिंदी एक नारे, सम्मेलन, बैनर, उत्सव की भाषा बनी रहेगी। जान लें कि हिंदी का आज का मानक रूप से बुंदेली, ब्रज, राजस्थानी आदि बोलियों से ही उभरा है और इसकी श्री-वृद्धि के लिए इन बोलियों को ही हिंदी की पालकी संभालनी होगी।

 

 

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

After all, why do death houses become sewers?

  

 

आखिर मौतघर क्यों बन जाते हैं   सीवर?

पंकज चतुर्वेदी



केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय  मंत्रालय  द्वारा कराए गए एक सोशल ऑडिट की एक ताजा रिपोर्ट से बेहद दर्दनाक सच्चाई सामने आई है कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफ़ाई के दौरान जान गंवाने वाले 90% से ज़्यादा मज़दूरों के पास किसी भी तरह के सुरक्षा उपकरण  नहीं थे. जांचकर्ताओं ने  2022 और 2023  के बीच 8 राज्यों के 17 ज़िलों में हुई में हुईं 54 मौतों की गहराई से पड़ताल की . पाया गया कि 54 मौतों में से 49 मामलों में मज़दूरों ने कोई भी सुरक्षा उपकरण नहीं पहना था. सिर्फ़ पांच मामलों में उनके पास दस्ताने थे और सिर्फ़ एक मामले में दस्ताने और गमबूट दोनों थे. इससे भी ज़्यादा गंभीर बात यह है कि 47 मामलों में मज़दूरों को सफ़ाई के लिए कोई भी मशीनी उपकरण नहीं दिया गया था. यही नहीं, 27 मामलों में तो मज़दूरों से काम के लिए सहमति तक नहीं ली गई थी. और जिन 18 मामलों में लिखित सहमति ली भी गई, वहां उन्हें काम में शामिल जान के ख़तरों के बारे में कुछ नहीं बताया गया.


सरकार ने संसद में  स्वीकार किया कि 'नमस्ते' (NAMASTE) योजना के तहत 'खतरनाक तरीक़े से सीवर की सफ़ाई' की समस्या के निराकरण पर काम करना बचा है . नमस्ते योजना के तहत, अब तक देश भर में 84,902 सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों की पहचान की गई है, जिनमें से आधे से कुछ ज़्यादा को ही पीपीई किट और सुरक्षा उपकरण दिए गए हैं.  विदित हो कोई पांच साल पहले सुप्रीम कौर्ट ने आदेश दिया है कि यदि  सीवर की सफाई के दौरान कोई श्रमिक मारे जाते हैं उनके परिवार को सरकारी अधिकारियों को 30 लाख रुपये मुआवजा देना होगा. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने साथ ही कहा था कि सीवर की सफाई के दौरान स्थायी विकलांगता का शिकार होने वालों को न्यूनतम मुआवजे के रूप में 20 लाख रुपये और अन्य किसी विकलांगता से ग्रस्त होता है तो उसे 10 लाख रुपये का मुआवजा देना होगा . यह आदेश भी  क्रियान्वयन के धरातल पर उतर नहीं पाया क्योंकि अधिकाँश   सीवर सफाई करने वालों  को कार्य सौपने का कोई दस्तावेज ही नहीं होता. एक तरफ कम खर्च में श्रम का लोभ है तो दूसरी तरफ पेट भरने की मजबूरी  और तीसरी है  आम मजदूरों को सरकारी कानूनों की जानकारी न होना .



सीवर के मौतघर बनने का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है । हर बार कहा जाता है कि यह लापरवाही का मामला है। पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। यही नहीं अब नागरिक भी अपने घर के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र से मजदूरों को बुला लेते हैं और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है तो ना तो उनके आश्रितों को कोई मुआवजा मिलता है और ना ही कोताही करने वालों को कोई समझाईश । शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि इस तरह सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।

यह विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढ़ोन की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देता है। राश्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने 12  साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा –निर्देश  जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। सरकार ने भी सन 2008 में एक अध्यादेश  ला कर गहरे में सफाई का काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लोगों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश  भी । लेकिन इनके पालन की जिम्मेदारी किसी की नहीं। कोर्ट के निर्देशों  के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक़्शे , उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकार्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवश्यक  सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित ट्रेनिंग , सीवर में गिरने वाले कचरे की हर दिन जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं; जैसी आदर्श स्थिति कागजों से ऊपर कभी आ नहीं पाई . सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश है तो ताकतवर लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश मामलों में मजदूरों को काम अपर लगाने का कोई रिकार्ड ही नहीं होता . यह सिद्ध करना मुश्किल होता है कि अमुक व्यक्ति को अमुक ने इस काम के लिए बुलाया था या काम सौंपा था ।

भूमिगत सीवरों ने भले ही शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इस अंधेरे नाले में और भी अंधेरा कर दिया है । अनुमान है कि हर साल देश भर के सीवरों में औसतन एक हजार लोग दम घुटने से मरते हैं । जो दम घुटने से बच जाते हैं उनका जीवन सीवर की विषैली गंदगी के कारण नरक से भी बदतर हो जाता है । देश  में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने , मेनहोल में घुस कर वहां जमा हो गई गाद, पत्थर को हटाने के काम में लगे हैं । कई-कई महीनों से बंद पड़े इन गहरे नरक कुंडों में कार्बन मोनो आक्साईड, हाईड्रोजन सल्फाईड, मीथेन जैसी दमघोटू गैसें होती हैं

यह एक शर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में  महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता है, उसमें ढ़ेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है । और आज घर भी विभिन्न रसायनों के प्रयोग का स्थल बन चुके हैं । इस पानी में ग्रीस-चिकनाई, कई किस्म के क्लोराईड व सल्फेट, पारा, सीसा के यौगिक, अमोनिया गैस और ना जाने क्या-क्या होता है । सीवरेज के पानी के संपर्क में आने पर सफाईकर्मी  के षरीर पर छाले या घाव पड़ना आम बात है । नाईट्रेट और नाईट्राईड के कारण दमा और फैंफड़े के संक्रमण होने की प्रबल संभावना होती है । सीवर में मिलने वाले क्रोमियम से षरीर पर घाव होने, नाक की झिल्ली फटने और फैंफड़े का कैंसर होने के आसार होते हैं । भीतर का अधिक तापमान इन घातक प्रभावों को कई गुना बढ़ा देता है । यह वे स्वयं जानते हैं कि सीवर की सफाई करने वाला 10-12 साल से अधिक काम नहीं कर पाता है, क्योंकि उनका शरीर काम करने लायक ही नहीं रह जाता है । ऐसी बदबू ,गंदगी और रोजगार की अनिश्चितता में जीने वाले इन लोगों का शराब व अन्य नशों की गिरफ्त में आना लाजिमी ही है और नषे की यह लत उन्हें कई ग्रभीर बीमारियों का षिकर बना देती है । 

वैसे यह कानून है कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर(जहरीली गैस की जांच का उपकरण), गंदी हवा को बाहर फैंकने के लिए ब्लोअर, टार्च, दस्ताने, चष्मा और कान को ढंकने का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवष्यक है । मुंबई हाईकोर्ट का निर्देष था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। सफाई का काम करने के बाद उन्हें पीने का स्वच्छ पानी, नहाने के लिए साबुन व पानी तथा स्थान उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है । काश कानून इतनी कड़ी से लागु हो कि मुआवजा दने की नौबत आये नहीं और सफाई कार्य से पहले ही जिम्मेदार एजेंसियां  सुरक्षा उपकरण और कानून के प्रति संवेदनशील हों .

 

 

शुक्रवार, 27 जून 2025

Puri rath yatar and muslim devotee of jagannath

                                 मुस्लिम सालबेगा के बगैर पूरी नहीं होतीपुरी  की रथ यात्रा

पंकज  चतुर्वेदी



श्री जगन्नाथ पुरी में  मंदिर से रथ चला गुंडेचा मंदिर के तरफ लेकिन रास्ते में एक ही जगह वह रुकता है - वह है भक्त सालबेगा की मजार जगन्नाथ का मुस्लिम अनन्य भक्त ।  ओडिसी  नृत्य हो या  शास्त्रीय गायन या दूरस्थ अंचल की कोई धार्मिक सभा, सलबेगा द्वारा रचित  भजन  के बगैर उसे अधूरा ही माना जाता है । भगवान जगन्नाथ के  भक्त सलबेगा को ओडिया  भक्ति संप्रदाय में  विशिष्ट स्थान मिला हुआ है । कह सकते हैं की वे अपने दौर के क्रांतिकारी रचनाकार थे जो इस्लाम को भी मानते थे और प्रभु जगन्नाथ को भी शीश नवाते थे । भक्त सालबेगा की सबसे प्रसिद्ध  रचना  आज भी सभी धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों में सस्वर गाया जाना लगभग अनिवार्य माना जाता  है –

आहे नीला शैला; प्रबल मत्त वरण

मो आराता नलिनी बन कु कर दलना!

सालबेगा के प्रारम्भिक जीवन के बारे में तथ्यों से अधिक किवदंतियाँ चर्चित  हैं । भक्त सालबेगा (1607/1608 - अज्ञात; उड़िया) 17 वीं शताब्दी की शुरुआत के एक ओडिया भाषा के धार्मिक कवि थे। उनका जन्म मुगल सेना के मुस्लिम योद्धा लालबेगा के यहाँ हुआ । उन दिनों मुगल हमेशा श्री मंदिर को गिराने के लिए कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे। एक बार जब मुगल योद्धा लाल बेग, पुरी के डंडा मुकुंदपुर इलाके के पास पुरी से लौट रहे थे, तो उन्होंने एक सुंदर युवा ब्राह्मण विधवा को स्नान घाट से लौटते हुए पाया। उसने महिला का अपहरण कर लिया और अंत में मजबूरी में उससे शादी कर ली, जो बाद में फातिमा बीवी के नाम से जानी जाने लगी। सालबेगा फातिमा बीवी और लालबेगा के पुत्र थे। बचपन से ही उन्होंने अपनी माँ से भगवान जगन्नाथ, भगवान कृष्ण और भगवान राम के बारे में सुना। वह उनकी ओर आकर्षित हो गया। वह उनकी भक्ति करता , उन पर गीत लिखता ।

फातिमा बीवी की मृत्यु के समय  भक्त सालबेगा एक बच्चा था.  एक बार वह एक गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गया और सभी वेद्ध – हकीमों  ने यह उम्मीद छोड़ दी कि भक्त सालबेगा जीवित नहीं रह सकता। एक दिन जब वह बिस्तर पर था तो उसने भजन सुना और सोचा कि महान भगवान जगन्नाथ जो कि दुनिया के भगवान हैं, मुझे ठीक करने में सक्षम होंगे। सालबेगा भगवान जगन्नाथजी की भक्ति में इतना खो गया था कि वो दिन-रात पूजा-अर्चना और भक्ति करने लगा। इसी भक्ति और पूजा-अर्चना के चलते सालबेगा को मानसिक शांति और जीवन जीने की शक्ति मिलने लगी। मुस्लिम होने के कारण सालबेगा को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। वह मंदिर के बाहर ही बैठकर भगवान की भक्ति करने लगता। ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ जी उसे सपने में आकर दर्शन दिया करते। भगवान उसे सपने में आकर घाव पर लगाने के लिए भभूत देते और सालबेगा सपने में ही उस भभूत को अपने माथे पर लगा लेता। उसके लिए हैरान करने वाली बात यह थी कि उसके माथे का घाव सचमुच में ठीक हो गया था। मुस्लिम होने के कारण सालबेगा कभी भी भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन नहीं कर पाया और उसकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पहले सालबेगा ने कहा था, ‘यदि मेरी भक्ति में सच्चाई है तो मेरे प्रभु मेरी मजार पर जरूर आएंगे।

 मृत्यु के बाद सालबेगा की मजार जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर के रास्ते में बनाई गई थी। इसके कुछ महीने बाद जब जगन्नाथजी की रथयात्रा निकली तो सालबेगा की मजार के पास आकर भगवान का रथ रुक गया और लाख कोशिशों के बाद भी रथ इंच भर भी आगे नहीं बढ़ा। तभी पुरोहितों और राजा ने सालबेगा की सारी सच्चाई जानी और भक्त सालबेगा के नाम के जयकारे लगाए। जयकारे लगाने के बाद रथ चलने लगा। बस तभी से हर साल मौसी के घर जाते समय जगन्नाथजी का रथ सालबेगा की मजार पर कुछ समय के लिए रोका जाता है। भक्त सालबेगा के बनाए भजन, आज भी लोगों को याद हैं।

किवदंती यह  भी है कि उड़ीसा के बालासोर में भी भगवान  जगन्नाथ ने  सालबेगा के लिए चमत्कार दिखाया था.  कहते हैं कि सालबेगा बालासोर होते हुए दिल्ली से पुरी आ रहा था और श्यामसुंदर के मंदिर के पास ठहरा हुआ था। शाम की प्रार्थना के दौरान सालबेगा भगवान को अंदर देखना चाहता था, चूंकि वह मुस्लिम था  सो मंदिर के भीतर जा नहीं पाया । एक शाम पुजारी ने पाया कि प्रभु अपने सिंहासन से गायब हैं। उसी रात बालासोर के राजा को स्वप्न आया कि भगवान का एक बड़ा भक्त भगवान के दर्शन के लिए बाहर प्रतीक्षा कर रहा है। फिर उसने दीवार में छेद करने की व्यवस्था की ताकि सालबेगा भगवान को देख सके। जैसे ही उसने देवताओं के सिंहासन को देखा, देवता फिर से प्रकट हो गए।

भक्त सालबेगा सारा जीवन मंदिर के बाहर बैठकर ही भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन की आस लगाए रहा। प्रभु का नाम जपता और उनके भजन लिखता । धीरे-धीरे उसके भजन अन्य भक्तों की जुबान पर भी चढ़ने लगे। यह है भारतीय अध्यात्म व भारतीय संस्कृति की ताकत,जिसके सामने धर्म,संप्रदाय की दीवारें भी कभी बाधक नहीं बन सकीं , न तो प्राचीन काल में, न ही आज भी। सलबेला द्वारा रचित गीतों के साथ कहानियाँ भी हैं , एक बार सालबेगा  बृंदावन में थे और रथ यात्रा के दिन आ गए । उन्हे लगा की बहुदा जात्रा के समय  उनका पहुँचना मुश्किल हैं । उन्होने गीत लिखा

जगबंधु है गौसाईं

तुमभा श्रीचरन बिणु

अन्य गति नाहीं

और  भगवान का रथ थम गया , जब तक सालबेगा पहुँच नहीं गया ।

सालबेगा की  रचनाएं में  भगवान जगन्नाथ के स्तुति के साथ साथ – कृष्ण – कविता , चौपड़ी और भजन की विधा में हैं और उनमें और राम , ब्राह्मणजन और शक्ति व शिव की आराधना  का भी  आख्यान है ।
उनकी कम से कम 120 रचनाएँ पुरानी ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों के साथ-साथ ओडिशा की सड़कों पर भिखारियों द्वारा गाए जाने वाले गीतों से भी मिली बांग्ला आलोचक  सुकुमार सेन की पुस्तक “हिस्ट्री  ऑफ ब्रिज बोली लिट्रेचर “ ने सालबेगा को उडिया के साथ –साथ हिन्दी और बांगाल में गीत लिखने वाले के रूप में उल्लेखित किया गया है ।

 

The right to a dignified farewell and a new standard in medical world

  गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार और चिकित्सा की नई मर्यादा पंकज चतुर्वेदी लगभग  12 साल असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ  जीवन जी रहे हरीश राणा अं...