ecology , water and environment

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

Accounting of waterfalls will be very important

 

बहुत महत्वपूर्ण होगा झरनों का लेखा जोखा

पंकज चतुर्वेदी



भारत सरकार के केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने प्राकृतिक और मानव निर्मित सभी तरह के जल स्रोतों की दूसरी गणना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पिछले साल पहली गणना की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है, जिसके आधार पर यह पता चला था कि देश में नदियों, नहरों के साथ ही कितने तालाब, पोखर, झील आदि हैं और उनकी स्थिति क्या है । इस अबार की गणना की खासियत है कि इसमें झरनों को भी शामिल किया गया है ।  झरने एक ऐसा जल स्रोत हैं  जिस पर बड़ी आबादी निर्भर है लेकिन उनके सिकुड़ने पर  समाज और सरकार का अभी तक कोई खास ध्यान गया नहीं । देश की सैंकड़ों  गैर हिमालयी नदियाँ, खासकर दक्षिण राज्यों का तो उद्गम ही झरनों से हैं । नर्मदा, सोन,जैसी विशाल नदियाँ मध्य प्रदेश में अमरकंटक से झरने से ही फूटती हैं।  जब दो साल बाद इस गणना के नतीजे सामने आएंगे तो देश के पास एक व्यापक परिदृश्य होगा कि नदियों की धार का भविष्य क्या है ? जल विद्धुत परियोजनाओं कि संभावना क्या है ?

झरने का अस्तित्व पहाड़ से है , उसे ताकत मिलती हैं परिवेश के घने  जंगलों से  और संरक्ष्ण मिलता है  अविरल प्रवाह से ।  2020 में, अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका “ वाटर पालिसी” ने भारतीय हिमालय  क्षेत्र (आईएचआर) में स्थित 13 शहरों में 10 अध्ययनों की एक श्रृंखला आयोजित की थी।  इस अध्ययन से खुलासा हुआ कि इन शहरों में से कई, जिनमें मसूरी, दार्जिलिंग और काठमांडू जैसे प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल शामिल हैं, पानी की मांग-आपूर्ति के गहरे अंतर का सामना कर रहे हैं जो कई जगह 70% तक है और इसका मूल कारण  इन इलाकों में जल सरिताओं-झरनों का तेजी से सूखना है ।  ठीक यही बात अगस्त -18 में नीति आयोग द्वारा रिपोर्ट में कही गई थी ।  इसमें स्वीकार किया गया था कि आईएचआर में करीब 50 फीसदी झरने सूख रहे हैं।  जिससे हजारों गांव प्रभावित हुए हैं ।

एक झरना एक ऐसी प्राकृतिक संरचना है, जहां से जल एक्वीफ़र्स (चट्टान की परत जिसमें भूजल होता है) से पृथ्वी की सतह तक बहता है।  पर्वतों से निकलने वाली नदियां जब बारिश के पानी से उनका बहाव और भी तेज हो जाता है। इससे वह बहती हुई मिट्टी का अपरदन करती हुई कभी कभी चट्टानों से टकरा जाती है। चट्टाने इतनी मजबूत होती है कि नदियां उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती है। जब चट्टानों पर नदियों का पानी गिरकर अपने गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा पर्वत के दोनों तरफ बहने लग जाता है और वह नीचे की तरफ जाता हैं, उससे ही झरने बन जाते हैं और उसी को झरना कहा जाता है। कई झरने तो बड़े-बड़े बर्फ के पर्वतों के जल से भी बनते हैं।पूरे भारत में लगभग पचास लाख झरने हैं, जिनमें से लगभग तीस लाख अकेले आईएचआर में हैं। हमारे देश की  बीस करोड़ से अधिक आबादी पानी के लिए  झरनों पर निर्भर हैं।  याद रखना होगा कि भारतीय हिमालय क्षेत्र 2,500 किलोमीटर लंबे और 250 से 300 किमी़ चौड़े क्षेत्र में फैला है और इसमें 12 राज्यों के 60,000 गांव हैं, जिसकी आबादी पांच करोड़ है ।  जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा इसके दायरे में हैं। असम और पश्चिम बंगाल भी आंशिक रूप से इसके तहत आते हैं। यहां की करीब 60 प्रतिशत आबादी जल संबंधी जरूरतों के लिए धाराओं पर निर्भर है।  उधर दक्षिणी भारत में पश्चिमी घाटों में, कभी बारहमासी रहने वाले झरने मौसमी होते जा रहे हैं और इसका सीधा असर कावेरी, गोदावरी जैसी नदियों पर पड रहा है । यहाँ झरनों के जल गृहण क्षेत्र में  बेपरवाही से रोप जा रहे नलकूपों ने  भी झरनों का रास्ता रोका है ।

बानगी है कि अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के लिए मशहूर उत्तराखंड के उत्तराखंड के अल्मोड़ा क्षेत्र में झरनों की संख्या पिछले 150 वर्षों में 360 से घटकर 60 रह गई।  उत्तराखंड में नब्बे प्रतिशत पेयजल आपूर्ति झरनों पर निर्भर है, जबकि मेघालय में राज्य के सभी गांव पीने और सिंचाई के लिए झरनों का उपयोग करते हैं। ये झरने जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण घटक भी हैं ।  झरने से जल का बहाव मौसम के मिजाज पर निर्भर करता है ।  गर्मियों के दौरान बहुत कम तो बरसात में बहुत तेज ।  गर्मी में इनसे लगभग आधा लीटर प्रति मिनट की दर से पानी बहता है तो कई बड़े झरने अपने यौवन के काल में  डेढ़ लाख लीटर प्रति मिनट की दर से पानी छोड़ सकते हैं।

झरनों के लगातार लुप्त होने या उनमें जल की मात्रा कम होने का सारा दोष जलवायु परिवर्तन पर नहीं मढ़ा जा सकता । अंधाधुंध पेड़ कटाई और निर्माण के कारण पहाड़ों को हो रहे नुकसान ने झरनों के नैसर्गिक  मार्गों में व्यवधान  पैदा किया है ।  भले ही बांध बना कर पहाड़ों पर पानी एकत्र करने को  आधुनिक विज्ञान अपनी सफलता मान  रहा हो लेकिन  इस तरह की संरचनाओं के निर्माण  के लिए  निर्ममता से होने वाले बारूदी धमाके और  पारम्परिक जंगलों के उजाड़ने से  सदा नीरा कहलाने वाली नदियों के प्रवाह में जो कमी हो रही है , उस पर कोई विचार कर नहीं रहा है ।

हालाँकि नीति आयोग  ने सन 2018  झरना संरक्षण कार्यक्रम की कार्य योजना तैयार की और यह उसकी चार साल पुरानी  एक रिपोर्ट पर आधारित था लेकिन बीते छह  सालों  में झरनों को बचाने के लिए कोई योजना बनी नहीं । उम्मीद है  इस नए सर्वेक्षण की रिपोर्ट से झरनों को सहेजने की योजनाएं बनेंगी ।

हालांकि  यह जान कर सुखद लगेगा कि सिक्किम ने इस संकट को सन 2009 में ही भांप लिया था ।  इससे पहले सिक्किम में प्रति परिवार पानी का खर्च 3200 रुपये महीना था।  इसके बाद सरकार ने स्प्रिंग शेड प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया।  2013-14 में झरनों के आसपास 120 हेक्टेयर पहाड़ी क्षेत्र में गड्ढे बनाकर बारिश के पानी को संरक्षित करने पर काम शुरू किया और इसके 100 फीसद परिणाम आने शुरू हो गए।  अब पूरे राज्य में “धारा विकास योजना” चल रही है और परिवारों का पानी पर होने वाला खर्च भी खत्म हो गया है।

झरनों को ले कर सबसे अधिक बेपरवाही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हैं जो बीते पांच सालों में भूस्खलन  के कारण तेजी से बिखर भी रहे हैं ।  इन राज्यों में झरनों के आसपास भुमिक्ष्र्ण कम करने, हरियाली बढाने और मिटटी के नैसर्गिक गुणों को बनाए रखने की कोई नीति बनाई नहीं गई ।  मिट्टी में पानी का प्राकृतिक प्रवाह बढ़ाने और एक्वीफ़र्स या जलभृत में अधिक बरसाती जल पहुँचने के मार्ग खोलने पर विचार ही नहीं हुआ ।  जलग्रहण क्षेत्र में स्वच्छता बनाए रखते हुए पारिस्थितिक तंत्र को अक्षुण रखने और भूजल और धरती पर जल-प्रवाह के प्रदूषण को रोकने की किसी को परवाह ही नहीं । समझना होगा कि झरने महज पानी का जरिया मात्र नहीं होते , ये धरती का तापमान नियंत्रित करने में महत्वूर्ण भूमिका निभाते हैं, मिटटी में नमी के कारक होते हाँ, साथ ही कई जल विद्धुत परियोजनाएं इन पर निर्भर हैं ।

यह अब किसी से छिपा नहीं है कि मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है , कहीं बरसात कम हो रही है तो कहीं  अचानक  जरूरत से ज्यादा बरसात , फिर धरती का तापमान तो बढ़ ही रहा है , ऐसे में झरने हमारे सुरक्षित और  शुद्ध जल का भण्डार तो हैं ही ,नदियों के प्राण भी इसी में बसे है ।   जरूरत इस बात की है कि नैसर्गिक जल सरिताओं और झरनों के कुछ दायरे में निर्माण कार्य  पर पूरी तरह रोक हो , ऐसे स्थानों पर कोई बड़ी परियोजनाएं ना लाई जाएँ जहां का पर्यवार्नीय संतुलन झरनों से हों।

 

मंगलवार, 9 जुलाई 2024

The railway track has become a dustbin.

 
कूड़ादान बना है रेल पथ

पंकज चतुर्वेदी



 

अभी छह जुलाई 2024 को केरल हाईकोर्ट ने एक सतह संज्ञान मामले में कड़ी शब्दों में कहा कि रेलवे , थोक में कचरा उपजा रहा है क्योंकि पटरियों पर पाया जाने वाला अधिकांश कचरा ट्रेनों से आता है। न्यायालय ने कहा कि रेलवे का कर्तव्य है कि वह पटरियों के करीब कचरा फैंकना बंद करे । अदालत ने कहा कि पटरियों पर फेंका गया कचरा जल निकायों में बह जाता है जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। हालांकि स्टेशनों के पास कचरे का उचित प्रबंधन किया जाता है, लेकिन पटरियों के किनारे से कचरे को हटाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाते हैं। न्यायालय ने कहा कि डंपिंग का एक कारण यह है कि डिब्बों में पर्याप्त कचरा डिब्बे नहीं हैं।



कहते हैं कि भारतीय रेल हमारे समाज का असल आईना है। इसमें इंसान नहीं, बल्कि देश के सुख-दुख, समृद्धि- गरीबी, मानसिकता- मूल व्यवहार जैसी कई मनोवृत्तियां सफर करती हैं। भारतीय रेल 66 हजार किलोमीटर से अधिक के रास्तों के साथ दुनिया का तीसरा सबसे वृहत्त नेटवर्क है, जिसमें हर रोज बारह हजार से अधिक यात्री रेल और कोई सात हजार मालगाड़ियां 24 घंटे दौड़ती हैं। अनुमान है कि इस नेटवर्क में हर रोज कोई दो करोड़ तीस लाख यात्री तथा एक अरब मीट्रिक टन सामान की ढुलाई होती है। दुखद है कि पूरे देश की रेल की पटरियों के किनारे गंदगी, कूड़े और सिस्टम की उपेक्षा की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कई जगह तो प्लेटफार्म भी अतिक्रमण, अवांछित गतिविधियों और कूड़े का ढेर बने हुए हैं।


देश की राजधानी दिल्ली से आगरा के रास्ते दक्षिणी राज्यों, सोनीपत-पानीपत के रास्ते पंजाब, गाजियाबाद की ओर से पूर्वी भारत, गुडगांव के रास्ते जयपुर की ओर जाने वाले किसी भी रेलवे ट्रैक को दिल्ली षहर के भीतर ही देख लें तो जाहिर हो जाएगा कि देश का असली कचरा घर तो रेल पटरियों के किनारे ही संचालित हैं। सनद रहे ये सभी रास्ते विदेशी पर्यटकों के लोकप्रिय रूट हैं और जब दिल्ली आने से 50 किलोमीटर पहले से ही पटरियों के दोनों तरफ कूड़े, गंदे पानी, बदबू का अंबार दिखता है तो उनकी निगाह में देश की कैसी छबि बनती होगी। सराय रोहिल्ला स्टेशन से जयपुर जाने वाली ट्रैन लें या अमृतसर या चंडीगढ़ जाने वाली वंदे भारत , जिनमें बड़ी संख्या में एनआरआई भी होते हैं, गाड़ी की खिड़की से बाहर देखना पसंद नहीं करते। इन रास्तों पर रेलवे ट्रैक से सटी हुई झुग्गियां, दूर-दूर तक खुले में शौच जाते लोग उन विज्ञापनों को मुंह  चिढ़ाते दिखते हैं जिसमें सरकार के स्वच्छता अभियान की उपलब्धियों के आंकड़े चिंघाड़ते दिखते हैं।


असल में रेल पटरियों के किनारे की कई-कई हजार एकड़ भूमि  अवैध अतिक्रमणों की चपेट में हैं। इन पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भूमाफिओं का कब्जा है जो कि वहां रहने वाले गरीब मेहनतकश लोगों से वसूली करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लेगां के जीवकोपार्जन का जरिया कूड़ा बीनना या कबाड़ी का काम करना ही हैं। ये लोग पूरे शहर का कूड़ा जमा करते हैं, अपने काम का सामान निकाल कर बेच देते हैं और बकाया को  रेल पटरियों के किनारे ही फैंक देते हैं , जहां धीरे-धीरे  गंदगी के पहाड़  बन जाते हैं। यह भी आगे चल कर नई झुग्गी का मैदान होता है।

दिल्ली से फरीदाबाद रास्ते को ही लें, यह पूरा औद्योगिक क्षेत्र है। हर कारखने वाले  के लिए रेलवे की पटरी की तरफ का इलाका अपना कूड़ां, गंदा पानी आदि फैंकने का निशुल्क स्थान होता हे। वहीं इन कारखानों में काम करने वालों के आवास, नित्यकर्म का भी बेरोकटोक गलियारा रेल पटरियों की ओर ही खुलता है।

कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है।  राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है या फिर रेल पटरियों के किनारे फैंक दिया जाता है। समूचे देश में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है।

पटरियों के किनारे जमा कचरे में खुद रेलवे का भी बड़ा योगदान है। खासकर शताब्दी, वंदे भारत ,  राजधानी जैसी प्रीमियम  गाड़ियों में, जिसमें ग्राहक को अनिवार्य रूप से तीन से आठ बार तक भोजन परोसने होते हैं। इन दिनों पूरा भोजन पेक्ड और एक बार इस्तेमाल  होने वाले बर्तनों में ही होता है। यह हर रोज होता है कि अपना मुकाम आने से पहले खानपान व्यवस्था वाले कर्मचारी बचा भोजन, बोतल, पैकिंग सामग्री के बड़े-बड़े थप्पे चलती ट्रैन से पटरियों के किनारे ही फैंक देते हैं। यदि हर दिन एक रास्ते पर दस डिब्बों से ऐसा कचरा फैंका जाए तो जाहिर है कि एक साल में उस वीराने में प्लास्टिक जैसी नश्ट ना होने वाली चीजों का अंबार हागा। कागज, प्लास्टिक, धातु  जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाईकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है । उल्लेखनीय है कि यही हाल इंदौर या पटना या बंगलूरू या गुवाहाटी या फिर इलाहबाद रेलवे ट्रैक के भी हैं। शहर आने से पहले गंदगी का अंबार पूरे देश में एकसमान ही है। 

राजधानी दिल्ली हो या फिर दूरस्थ कस्बे का रेलवे प्लेटफार्म, निहायत गंदे, भीड़भरे, अव्यवस्थित और अवांछित लोगों से भरे होते हैं, जिनमें भिखारी से ले कर अवैध वैंडर और यात्री को छोड़ने आए रिश्तेदारों से ले कर भांति-भांति के लोग होते हैं। ऐसे लेग रेलवे की सफाई के सीमित संसाधनों को तहर-नहस कर देते हैं। कुछ साल पहले बजट में ‘रेलवे स्टेशन विकास निगम’ के गठन की घोषणा की गई थी, जिसने रेलवे स्टेशन को हवाई अड्डे की तरह चमकाने के सपने दिखाए थे। कुछ स्टेशनों पर काम भी हुआ, लेकिन जिन पटरियों पर रेल दौड़ती है और जिन रास्तों से यात्री रेलवे व देश की सुंदर छबि देखने की कल्पना करता है, उसके उद्धार के लिए रेलवे के पास ना ता कोई रोड़-मेप हैं और ना ही परिकल्पना।

 

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

Cities drown due to damming of small rivers

 

छोटी नदियों को हडपने से डूबते हैं शहर

पंकज चतुर्वेदी



शायद कभी उसका नाम “सुखी” नदी होगा लेकिन बहुत दिन उसमें पानी आया नहीं तो नाम हो गया  “सूखी नदी”। इंसान भी भूल गया कि कभी यहाँ नदी थी और खाली जगह पर अपनी गाड़ियां खड़ी करने लगा । नदियों की याददाश्त बहुत  मजबूत होती है , वह दो सौ साल अपना रास्ता नहीं भूलती, भले ही लुप्त हो जाए । इस बार आषाढ़ की पहली बारिश में ही नदी अचानक जिंदा  हो गई और भाव में दर्जनों कारें  बह गई । यह हुआ हरिद्वार में खड़खड़ी स्मशान के पास । हर साल की तरह गुरुग्राम फिर जल ग्राम बन गया , कारण वही है कि असल में जहां पानी भरता है, वह  अरावली से चल कर नजफगढ़ में मिलने वाली साहबी नदी का हजारों साल पुराना मार्ग है, नदी सुखा आकर सडक बनाई ।  अब समाज कहता है कि उसके घर-मोहल्ले में  जल भर गया, जबकि नदी कहती है कि मेरे घर में इन्सान बलात कब्जा किये हुए हैं . देश के छोटे-बड़े  शहर- कस्बों में कंक्रीट के जंगल बोने के बाद  जल भराव एक स्थाई समस्या हिया उर इसका मूल कारण है कि वहां बहने वाली कोई छोटी सी नदी को समाज ने अस्तित्वहीन समझ  कर मिटा दिया

 यह तो अब समझ आ रहा है कि समाज, देश और धरती के लिए नदियाँ  बहुत जरुरी है , लेकिन अभी यह समझ में आना शेष है कि छोटी  नदियों  पर ध्यान देना अधिक  जरुरी है . गंगा, यमुना जैसी बड़ी नदियों को स्वच्छ रखने पर तो बहुत काम हो रहा है , पर ये नदियाँ बड़ी इसी लिए  बनती है  क्योंकि इनमें बहुत सी छोटी नदियाँ आ कर मिलती हैं, यदि छोटी नदियों में पानी कम होगा तो बड़ी नदी भी सूखी रहेंगी , यदि छोटी नदी में गंदगी या प्रदूषण होगा तो वह बड़ी नदी को प्रभावित करेगा .

छोटी नदियां   अक्सर गाँव, कस्बों में बहुत कम दूरी में बहती हैं.  कई बार एक ही नदी के अलग अलग गाँव में अलग-अलग नाम होते हैं . बहुत नदियों का तो रिकार्ड भी नहीं है . हमारे लोक समाज  और प्राचीन मान्यता नदियों   और जल को ले कर बहुत अलग थी , बड़ी नदियों से दूर घर-बस्ती हो . बड़ी नदी को अविरल बहने दिया जाए . कोई बड़ा पर्व या त्यौहार हो तो बड़ी नदी के किनारे एकत्र हों, स्नान करें और पूजा करें . छोटी नदी , या तालाब या झील के आसपास बस्ती . यह जल संरचना दैनिक कार्य के लिए जैसे स्नान, कपडे धोने, मवेशी आदि के लिए . पीने की पानी के लिए घर- आँगन, मोहल्ले में कुआँ , जितना जल चाहिए, श्रम  करिए , उतना ही रस्सी से खींच  कर निकालिए . अब यदि बड़ी नदी बहती रहेगी तो छोटी नदी या तालाब में जल बना रहेगा , यदि तालाब और छोटी नदी में  पर्याप्त जल है तो घर के कुएं में कभी जल की कमी नहीं होगी .

एक मोटा अनुमान है कि आज भी देश में कोई 12 हज़ार छोटी ऐसी नदियाँ हैं , जो उपेक्षित है , उनके अस्तित्व पर खतरा है . उन्नीसवीं सदी तक बिहार(आज के झारखंड को मिला कर ) कोई छः हज़ार  नदियाँ हिमालय से उतर कर आती थी, आज  इनमें से महज 400  से 600 का ही अस्तित्व बचा है . मधुबनी, सुपौल  में बहने वाली  तिलयुगा नदी कभी  कौसी से भी विशाल हुआ करती  थी, आज उसकी जल धरा सिमट कर  कोसी की सहायक नदी के रूप में रह गई है . सीतामढ़ी की लखनदेई  नदी को तो सरकारी इमारतें ही चाट गई. नदियों के इस तरह रूठने और उससे बाढ़ और सुखाड के दर्द साथ –साथ चलने की कहानी  देश के हर जिले और कसबे की है . लोग पानी के लिए पाताल का सीना चीर रहे हैं और निराशा हाथ लगती है , उन्हें यह समझने में दिक्कत हो रही हैं कि धरती की कोख में जल भण्डार  तभी लबा-लब रहता है, जब पास बहने वाली नदिया हंसती खेलती हो .

अंधाधुंध रेत खनन , जमीन  पर कब्जा, नदी के बाढ़ क्षेत्र में स्थाई निर्माण , ही  छोटी नदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं – दुर्भाग्य से जिला स्तर पर कई छोटी नदियों का राजस्व रिकार्ड नहीं हैं, उनको  शातिर तरीके से  नाला बता दिया जाता है , जिस साहबी  नदी पर  शहर बसाने से हर साल गुरुग्राम डूबता है, उसका बहुत सा रिकार्ड ही नहीं हैं , झारखण्ड- बिहार में बीते चालीस साल के दौरान हज़ार से ज्यादा छोटी नदी गुम हो गई , हम यमुना में पैसा लगाते हैं लेकिन उसमें जहर ला रही हिंडन, काली को और गंदा करते हैं – कुल  मिला कर यह  नल खुला छोड़ कर पोंछा लगाने का श्रम करना जैसा है .

छोटी नदी केवल पानी के आवागमन का साधन नहीं होती . उसके चारो  तरफ समाज भी होता है और पर्यावरण भी . नदी किनारे  किसान भी है और कुम्हार भी, मछुआरा भी और  धीमर भी – नदी की सेहत बिगड़ी तो तालाब से ले कर कुएं तक में जल का संकट हुआ – सो परोक्ष और अपरोक्ष समाज का कोई ऐसा वर्ग नहीं है  जो  इससे प्रभावित नहीं हुआ हो . नदी- तालाब से जुड़ कर पेट पालने वालों का जब जल-निधियों से आसरा ख़त्म हुआ तो  मजबूरन उन्हें पलायन करना पड़ा. इससे एक तरफ  जल निधियां दूषित हुईं तो  दूसरी तरफ बेलगाम शहरीकरण के चलते महा नगर अरबन स्लम में बदल रहे हैं . स्वास्थ्य , परिवहन और शिक्षा के संसाधन महानगरों में केन्द्रित होने के कारण ग्रामीण सामाजिक- आर्थिक संतुलन भी इससे गड़बड़ा  रहा है . जाहिर है कि नदी- जीवी लोगों की निराशा ने समूचे समाज को समस्याओं की नई सौगात दी है .

सबसे पहले छोटी नदियों का एक सर्वे और उसके जल तन्त्र  का दस्तावेजीकरण हो , फिर छोटी नदियों कि अविरलता सुनिश्चित हो, फिर उससे रेत उत्खनन और  अतिक्रमण को मानव- द्रोह अर्थात हत्या की तरह गंभीर अपराध माना जाए .  नदी के सीधे इस्तेमाल से बचें . नदी में पानी रहेगा तो  तालाब, जोहड़,  सम्रद्ध रहेंगे  और इससे कुएं या भू जल . स्थानीय इस्तेमाल के लिए वर्षा जल को पारम्परिक तरीके जीला कर एक एक बूँद एकत्र किया जाए , नदी के किनारे  कीटनाशक के इस्तेमाल, साबुन  और शौच से परहेज के लिए जन जागरूकता और वैकल्पिक  तंत्र विकसित हो . सबसे बड़ी बात नदी को सहेजने का जिम्मा  स्थानीय समाज, खासकर उससे सीधे जुड़े लोगों को दिया जाए , जैसे कि  मद्रास से पुदुचेरी तक ऐरी के रखरखाव के जल- पंचायत हैं .

जरा बारीकी से देखें जो छोटी नदियाँ बरसात में हर बून को खुद में समेत लेती थी, दो महीने उनका विस्तार होता था , फिर वे धीरी धीर स्थानीय उपयोग और माध्यम नदियों को अपनी जल निधि साझा करती थी, सो कभी बाढ़ आती नहीं थी .  अब ऐसी  छोटी नदियों मुख्य धारा के मार्ग में अतिक्रमण होता जा रहा है । नदी के कछार ही नहीं प्रवाह मार्ग में ही लोगों ने मकान बना लेते हैं । कई जगह धारा को तोड़ दिया जाता है । साल के अधिकांश महीनों में छोटी नदियाँ पगडंडी और ऊबड़–खाबड़ मैदान के रूप में तब्दील होकर रह गई है ।

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं . ऐसे में  छोटी नदियाँ बाढ़ से बचाव के साथ साथ धरती  के तापमान को नियंत्रित रखने , मिटटी की नमी बनाए रखने और हरियाली के संरक्षण के लिए अनिवार्य हैं . नदी तट  से अतिक्रमण हटाने, उसमें से  बालू-रेत उत्खनन को  नियंत्रित करने , नदी की गहराई के लिए उसकी समय समय पर सफाई से इन नदियों को बचाया जा सकता है , सबसे बड़ी बात समाज यदि इन नदियों को अपना मान कर सहेजने लगे तो इससे  समाज का ही भविष्य उज्जवल होगा .

 

 

गुरुवार, 4 जुलाई 2024

Monsoon has to be understood in the context of climate change.

 
मानसून को जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा

पंकज चतुर्वेदी



भारत में इस बार जून में सामान्य से 11 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई जबकि गर्मी ने 122 साल का रिकार्ड तोड़ दिया । वही मौसम विभाग ने बताया दिया है कि इस बार जुलाई में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है, जो लंबी अवधि के औसत (एलपीए) 28.04 सेमी से 106 प्रतिशत अधिक रह सकती है। गौर करें अभी भारतीय केलेंडर के अनुसार यह हाल आषाढ़ महीने का है और आगे सावन-भादों बचा है ।



भारत सरकार के केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा तीन  साल पहले तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट में स्पष्ट चेताया गया था कि तापमान में वृद्धि का असर भारत के मानसून पर भी कहर ढा रहा है| रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के ऊपर ग्रीष्मकालीन मानसून वर्षा (जून से सितंबर) में 1951 से 2015 तक लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है, जो भारत-गंगा के मैदानों और पश्चिमी घाटों पर चिंताजनक हालात तक  घट रही है।



रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मियों में मानसून के मौसम के दौरान सन 1951-1980 की अवधि की तुलना में वर्ष 1981–2011 के दौरान 27 प्रतिशत अधिक दिन सूखे दर्ज किये गए | इसमें चेताया गया है कि  बीते छः दशक के दौरान बढती गर्मी और मानसून में कम बरसात के चलते देश में सुखा-ग्रस्त इलाकों में इजाफा हो रहा है | खासकर मध्य भारत, दक्षिण-पश्चिमी तट, दक्षिणी प्रायद्वीप और उत्तर-पूर्वी भारत के क्षेत्रों में औसतन प्रति दशक दो से अधिक अल्प वर्षा और सूखे दर्ज किये  गए | यह चिंताजनक है कि  सूखे से प्रभावित क्षेत्र में प्रति दशक 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है ।



पर्याप्त आंकड़े , आकलन और चेतावनी के बावजूद  अभी तक हमारा देश मानसून के  बदलते मिजाज  के अनुरूप खुद ढाल नहीं पाया है ।  न हम उस तरह के जल संरक्ष्ण उपाय कर पाए , न सड़क-पूल- नहर- के निर्माण कर पाए ।  सबसे अधिक जागरूकता की जरूरत खेती के क्षेत्र में है और वहां अभी भी किसान उसी पारम्परिक केलेंडर के अनुसार बुवाई कर रहा है  .

असल में पानी को ले कर हमारी सोच प्रारंभ से ही त्रुटिपूर्ण है- हमें पढ़ा दिया गया कि नदी, नहर, तालाब झील आदि पानी के स्त्रोत हैं, हकीकत में हमारे देश में पानी का स्त्रोत केवल मानूसन ही हैं, नदी-दरिया आदि तो उसको सहेजने का स्थान मात्र हैं।  यह धरती ही  पानी के कारण जीवों से आबाद है और पानी के आगम मानसून को हम कदर नहीं करते और उसकी नियामत को सहेजने के स्थान हमने खुद उजाड़ दिए।  गंगा-यमुना के उद्गम स्थल से छोटी नदियों के गांव-कस्बे तक बस यही हल्ला है कि बरसात ने खेत-गांव सबकुछ उजाड़ दिया। यह भी  समझना होगा कि मानसून अकेले बरसात नहीं हैं – यह मिटटी की नमी, घने जंगलों के लिए अनिवार्य, तापमान नियंत्रण का अकेला उपाय सहित धरती के हजारों- लाखों जीव- जंतुओं के प्रजनन-भोजन- विस्थापन और निबंधन का भी काल है . ये सभी जीव धरती के अस्तित्व के महत्वपूर्ण घटक है, इन्सान अपने लोभ में प्रकृति को जो नुकसान पहुंचाता है . उसे दुरुस्त करने का काम मानसून और उससे उपजा जीव-जगत करता है .

सभी जानते हैं कि मानसून विदा होते ही उन सभी इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए मारा-मारी होगी और लोग पीने के एक गिलास पानी में आधा भर कर जल-संरक्षण के प्रवचन देते और जल जीवन का आधार जैसे नारे दीवारों पर पोतते दिखेंगे। और फिर बारिकी से देखना होगा कि मानसून में जल का विस्तार हमारी जमीन पर हुआ है या वास्तव में हमने ही जल विस्तार के नैसर्गिक परिघि पर अपना कब्जा जमा लिया है।

मानसून शब्द असल में अरबी शब्द ‘मौसिम’ से आया है, जिसका अर्थ होता है मौसम। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरबी मल्लाह इस षब्द का इस्तेमाल करते थे। हकीकत तो यह है कि भारत में केवल तीन ही किस्म की जलवायु है - मानसून, मानून-पूर्व और मानसून-पश्चात। तभी भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है । जान लें मानसून का पता सबसे पहले पहली सदी ईस्वी में हिप्पोलस ने लगाया था और तभी से इसके मिजाज को भांपने की वैज्ञानिक व लोक प्रयास जारी हैं।

भारत के लोक-जीवन, अर्थ व्यवस्था, पर्व -त्योहार का मूल आधार बरसात या मानसून का मिजाज ही है। कमजोर मानसून पूरे देश को सूना कर देता है। कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि मानसून भारत के अस्तित्व की धुरी है। खेती-हरियाली और साल भर के जल की जुगाड़ इसी बरसात पर निर्भर है। इसके बावजूद जब प्रकृति अपना आशीष इन बूंदों के रूप में देती है तो समाज व सरकार इसे बड़े खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं। इसका असल कारण यह है कि हमारे देश में मानसून को सम्मान करने की परंपरा समाप्त होती जा रही है - कारण भी है , तेजी से हो रहा शहरों की ओर पलायन व गांवों का शहरीकरण।

विडंबना यह है कि हम अपनी जरूरतों के कुछ लीटर पानी को घटाने को तो राजी हैं लेकिन मानसून से मिले जल को संरक्षित करने के मार्ग में खुद ही रोड़ अटकाते हैं। नदियों का अतिरिक्त पानी सहेजने वाले तालाब-बावली-कुएं नदारद हैं।  फिर पानी सहेजने व उसके बहुउद्देशीय इस्तेमाल के लिए बनाए गए बांध, अरबों की लागत ,  दशकों के समय, विस्थापन  के बाद भी थोडी सी बरसात को समेट नहीं पा रहे हैं। पहाड़, पेड, और धतरी को सांमजस्य के साथ  खुला छोड़ा जाए तो इंसान के लिए जरूरी सालभ्र का पानी को भूमि अपने गर्भ में ही सहेज ले।

असल में हम अपने मानसून के मिजाज, बदलते मौसम में बदलती बरसात, बरसात के जल को सहेज कर रखने के प्राकृतिक खजानों की रक्षा के प्रति ना तो गंभीर हैं और ना ही कुछ नया सीखना चाहते हैं।  पूरा जल तंत्र महज भूजल पर टिका है जबकि यह सर्वविविदत तथ्य है कि भूजल पेयजल का सुरक्षित साधन नहीं है।  हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजना का सफल क्रियान्वयन केवल मानूसन को सम्मान देने से ही संभव होगा।

मानसून अब केवल भूगोल या मौसम विज्ञान नहीं हैं- इससे इंजीनियरिंग, ड्रैनेज ,सेनिटेशन, कृषि , सहित बहुत कुछ जुड़ा है। बदलते हुए मौसम के तेवर के मद्देनज़र मानसून-प्रबंधन का गहन अध्ययन हमारे समाज और स्कूलों से ले कर  इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में हो , जिसके तहत केवल मानसून से पानी ही नहीं, उससे जुड़ी फसलों, सड़कों, शहरों में बरसाती पानी के निकासी के माकूल प्रबंधों व संरक्षण जैसे अध्याय हों। खासकर अचानक चरम बरसात के कारण  उपजे संकटों के प्रबंधन पर ।  

 

 

सोमवार, 1 जुलाई 2024

If Yamuna is saved then Delhi will be saved.

 

 

यमुना बचेगी  तो दिल्ली  बचेगी

पंकज चतुर्वेदी


“रिवर” से “सीवर” बन गई  दिल्ली में यमुना को नया जीवन देने के लिए आज से कोई 9 साल पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अर्थात एन  जी  टी ने एक आदेश दिया था कि दिल्ली मने नदी का जहां तक बहाव  है अर्थात उसका फ्लड प्लैन या कछार है , उसका सीमांकन किया जाए । हालांकि यमुना द्वारा गर्मी में छोड़ी गई जमीन पर कब्जा करने में न सरकारी महकमें पीछे रहे और न ही भू  माफिया ।  एक कमेटी भी बनी थी जिसे  मौके पर जा कर उस स्थान तक चिन्हनकित करना था जहां अपने सम्पूर्ण यौवन पर आने के दौरान नदी का अधिकतम विस्तार होता हैं। 


न कभी  किसी ने जाना कि  सावन-भादों में जब नदी में जम कर पानी होता है तो उसे तसल्ली से बहने के लिए कितना भूमि चाहिए और न ही कभी परवाह की गई कि नदी की गहराई कम होने से किस तरह समूचा जल-तंत्र गड़बड़ा रहा है । यह बात सरकारी बस्तों में दर्ज है कि यमुना के दिल्ली प्रवेश वजीराबाद बैराज से लेकर ओखला बैराज तक के 22 किलोमीटर में 9700 हेक्टेयर की कछार भूमि पर अब पक्के निर्माण हो चुके हैं और इसमें से 3638 हैक्टेयर को दिल्ली विकास प्राधिकरण खुद नियमित अर्थात वैध बना चुका है । कहना न होगा यहाँ पूरी तरह सरकारी  अतिक्रमण हुआ- जैसे 100 हेक्टेयर में अक्षरधाम मंदिर, खेल गांव का 63.5 हेक्टेयर, यमुना बैंक मेट्रो डिपो 40 हैक्टेयर और शास्त्री पार्क मेट्रो डिपो 70 हेक्टेयर। इसके अलावा आईटी पार्क, दिल्ली सचिवालय, मजनू का टीला और अबु फजल एनक्लेव जैसे बड़े वैध- अवैध अतिक्रमण  अभी भी हर साल बढ़ रहे हैं ।


 

समझना होगा कि अरावली से चल कर  नजफ़गढ़ झील में  मिलने वाली साहबी नदी और इस झील को यमुना से  जोड़ने वाली नैसर्गिक नहर का नाला बनना हो या फिर सारे कालेखान के पास बारा पुला  या फिर साकेत में खिड़की गाँव का सात पुला या फिर लोधी गार्डेन की नहरें, असल में ये सभी यमुना में जब कभी क्षमता से अधिक पानी या जाता तो उसे जोहड़-तालाब में सहेजने का जरिया थीं । शहर को चमकाने के नाम पर इन सभी सदियों पुरानी संरचनाओं को तबाह किया गया , सो न अब बरसात का पानी तालाब में जाता है और न ही बरसात के दिनों में सड़कों पर जल जमाव रुक पाता है ।  एनजीटी हर साल आदेश देता है लेकिन सरकारी महकमें भी कागज की नाव चला कर उन  आदेशों को पानी में डुबो देते हैं । दिल्ली में अधिकांश जगह पक्की सड़क या गलियां हैं ,अर्थात यहाँ बरसात के पानी को झील तालाबों तक कम से कम हानि के ले जाना सरल है , दुर्भाग्य है कि इस शहर में बरसने वाले पानी का अस्सी फीसदी गंदे नालों के जरिए   नदी तक पहुँचने  में ही बर्बाद हो जाता है । फिर नदी भी अपनी क्षमता से पचास फीसदी काम चौड़ी और गहरी रहा गई है  और इसमें बरसात के पानी  से अधिक गंदा मल-जल और औधयोगिक कचरा आता है । यमुना की गहराई घटने का क्या दुष्परिणाम होता है उसके लिए वजीराबाद जल संयत्र का उदाहरण काफी है ।  यह संयत्र वजीराबाद बैराज के पास बने जलाशय से यह पानी लेता है । अब जलाशय की गहराई  हुआ करती थी  4.26 मीटर , इसकी गाद को किसी ने साफ करने की सोची नहीं और अब इसमें महज एक मीटर से भी कम 0. 42 मीटर जल- भराव क्षमता रह गई । तभी 134 एम जी डी  क्षमता वाला संयत्र आधा पानी भी नहीं निकाल रहा ।


आज तो दिल्ली पानी के लिए पडोसी राज्यों पर निर्भर है लेकिन यह कोई  तकनीकी और दूरगामी हल नहीं है। दिल्ली शहर के पास यमुना जैसे सदा नीर नदी का 42 किलोमीटर लंबा हिस्सा है । इसके अलावा छह सौ से ज्यादा तालाब हैं जो कि बरसात की कम से कम मात्र होने पर भी सारे साल महानगर का गला तर रखने में सक्षम हैं । यदि दिल्ली में की सीमा में यमुना की सफाई के साथ – साथ गाद निकाल कर पूरी गहराई मिल जाए ।  इसमें सभी नाले गंदा पानी छोड़ना बंद कर दें तो महज  30 किलोमीटर नदी, जिसकी गहराई दो मीटर हो तो इसमें इतना निर्मल जल साल भर रह सकता है जिससे दिल्ली के हर घर को पर्याप्त जल मिल सकता है ।  विदित हो नदी का प्रवाह गर्मी में कम रहता है लेकिन यदि गहराई होगी तो पानी का स्थाई डेरा रहेगा । हरियाणा सरकार  इजराइल के साथ मिल कर यमुना के कायाकल्प की योजना बना रही है और इस दिशा में हरियाणा सिंचाई विभाग ने अपने सर्वे में पाया है कि यमुना में गंदगी के चलते दिल्ली में सात माह पानी की किल्लत रहती है। दिल्ली में यमुना, गंगा और भूजल से 1900 क्यूसेक पानी प्रतिदिन प्रयोग में लाया जाता है। इसका 60 फीसद यानी करीब 1100 क्यूसेक सीवरेज का पानी एकत्र होता है। यदि यह पानी शोधित कर यमुना में डाला जाए तो यमुना निर्मल रहेगी और दिल्ली में पेयजल की किल्लत भी दूर होगी।


सन  2019 में यमुना नदी के किनारों पर एक प्रयोग किया गया था -  वहाँ गहरे गड्ढे बनाए गए थे ताकि जब पानी एकत्र हो तो इनके जरिए जमीन में जज़्ब हो जाए । इसके अच्छे नतीजे भए आए  फिर उस परियजन में जमीन से अधिक कागज पर खांतियाँ  खोदी जाने लगीं।

वैसे एन जी टी सन 2015 में ही दिल्ली के यमुना तटों पर हर तरह के निर्माण पर पाबंदी लगा चुका है   इससे बेपरवाह  सरकारें मान नहीं  रही । अभी एक साल के भीतर ही लाख आपत्तियों के बावजूद सराय कालेखान के पास  “बांस घर” के नाम से  केफेटेरिया और अन्य निर्माण हो गए ।

जब दिल्ली बसी  ही  इसलिए थी कि यहाँ यमुना बहती थी , सो जान लें कि दिल्ली बचेगी भी तब ही जब यमुना अविरल बहेगी । दिल्ली की प्यास  और बाढ़ दोनों का निदान यमुना में ही है। यह बात कोई जटिल रॉकेट साइंस है नहीं लेकिन बड़े ठेके, बड़े दावे , नदी से निकली जमीन पर और अधिक कब्जे  का लोभ यमुना को जीवित रहने नहीं दे रहा । समझ लें नदी में पानी का रहना महज जल संकट का निदान ही नहीं हैं बल्कि बल्कि  जलवायु परिवर्तन की मार के चलते चरम गर्मी, सर्दी और बारिश से जूझने का एकमात्र  निदान भी नदी का साफ पाने से लबालब होना है ।

 

 

बुधवार, 26 जून 2024

Desolation of Aravalli is deepening the impact of climate change.

 

अरावली के उजड़ने से गहरा रही है जलवायु परिवर्तन की मार

पंकज चतुर्वेदी



अरावली पर्वतमाला की गोद में बसे  राजस्थान के संभवतया सबसे हरे-भरे शहर अलवर में बीते  शनिवार-रविवार, जेसलमेर-बाड़मेर की तरह रेत के धोरे आसमान में तैरते दिखे । शुक्रवार रात को भी 30 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से हवा चली और पूरा शहर धूल में नहाया हुआ नजर आया। इस दौरान हल्की बारिश भी हुई। घरों - बाजार में मिट्टी का अंबार लग गया । झुंझुनू और सीकर जिलों में अलग-अलग घटनाओं में एक मां और उसके बच्चे सहित तीन लोगों की जान चली गई। लगभग 40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं के साथ धूल भरी आंधी ने जयपुर, सीकर, दौसा और झुंझुनू में कहर बरपाया, जिससे पहले से ही चिलचिलाती गर्मी से जूझ रहे निवासियों के सामने चुनौतियां और बढ़ गईं। चिंता की बात यह है कि इस तरह के धूल भरे अंधड़ की संख्या और दायरा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है । समझना होगा कि यह सीधे-सीधे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है और प्रकृति में मानवीय छेड़छाड़ ने इसे  और गंभीर बना दिया है । वर्ष 2015  की बाद ऐसे अंधड़ों की संख्या बढती जा रही है । अंधड़ से जान-माल का नुकसान तो होता ही है , सार्वजनिक संपत्तियों को जबर्दस्त नुकसान होता है ।



अंतर्राष्ट्रीय जर्नल 'अर्थ साइंस इंफोरमैटिक्स'  में प्रकाशित एक शोध ने पहले ही चेतावनी दे चुका था कि अरावली पर्वतमाला में पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है। भरतपुर, धोलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे स्थान , जहां अरावली पर्वतमाला पर अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और हरियाली उजाड़ने की अधिक मार पड़ी है , को सामान्य से अधिक रेतीले तूफानों  का सामना करना पड़ रहा है।  केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान के पर्यावरण विज्ञानं के प्रोफेसर एल के शर्मा और पीएचडी स्कॉलर आलोक राज द्वारा किए गए इस अध्ययन का शीर्षक है “ एसेसमेंट ऑफ़ लेंड यूज़ डायनामिक्स  ऑफ़ द  अरावली यूजिंग इंटीग्रेटेड”।  

यह गांठ बांध लें कि  मसला महज राजस्थान का नहीं हैं ,  दिल्ली और  हरियाणा का अस्तित्व भी अरावली पर टिका है और अरावली को नुकसान का अर्थ है कि देश एक अन्न के कटोरे पंजाब तक  बालू के धोरों का विस्तार । इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ें जमा रहा है। सनद रहे भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीषण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है ।  खासकर गर्मी में यह धूल पूरे परिवेश में छा जाती है । मानवीय जीवन पर इसका दुष्परिणाम ठण्ड में दिखने वाले स्मोग से अधिक होता है । रेत के बवंडर  खेती और हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसके लिए  सुरक्षा-परत या शील्ड  का काम हरियाली और जल-धाराओं से सम्पन्न अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। विडंबना है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।

गुजरात के खेड ब्रह्म से शुरू  हो कर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राश्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग शिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असल  में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही।

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा  गया है कि  पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा, ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान  में कम  और मध्य  उंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गई हैं । ऊपरी स्तर पर पहाड़ियों का गायब होना नरैना, कलवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का में समुद्र तल से 200 मीटर से 600 मीटर की ऊँचाई पर दर्ज किया गया था। याद करें कोई तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भे सरकार से पूछा था कि आखिर कौन हनुमान जे ये पहाड़ियां उठा कर ले गए ? सन 1975 से 2019 के दौरान किए गए अध्ययन में, यह पता चला कि वन क्षेत्र में सघन बस्तियां बस जाना ,पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक थे।

अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3676 वर्ग किमी भूमि बंजर हो गई ।  इस अवधी  में अरावली  के वन क्षेत्र में 5772। 7 वर्ग किमी (7। 63 प्रतिशत) की कमी आई है ।  यदि यही हाल रहे तो 2059 तक कुल 16360। 8 वर्ग किमी (21। 64 प्रतिशत) वन भूमि पर कंक्रीट के जंग उगे दिखेंगे ।  ऐसे हालात में अंधड़ की मार का दायरा बढेगा ।  अरावली पहाड़ का उजड़ना अर्थात वहां के जंगल और जल निधियों का उजड़ना, दुर्लभ वनस्पतियों का लुप्त होना।  इसके दुष्परिणाम  सामने आरहे हैं ।  तेंदुए, हिरण और चिंकारा भोजन के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं और मानव- जानवर टकराव के वाकिये बढ़ रहे हैं ।  जान लें अंधड़ बढ़ने से भी जानवरों के बस्ती में घुसने की घटनाएँ बढती हैं ।  

यह रिपोर्ट  दिल्ली से लेकर गुजरात तक पूरी रेंज में मार्बल डंपिंग यार्ड की बढती संख्या को बेहद घटक निरुपित करती है ।  अवैध खनन और भूमि अतिक्रमण को कम करने के लिए उपाय किए जाने चाहिए और लगातार क्षेत्र की निगरानी, ​​वन की रोकथाम और समाशोधन भी किया जाना चाहिए। जान लें  यदि अरावली को और अधिक नुकसान हुआ तो तेज अंधड़ की मार से दिल्ली भी नहीं बचेगा ।  

यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिषत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बमुश्किल  सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए। सनद रहे अरावली  रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है। अरावली  की प्राकृतिक संरचना नश्ट होने की ही त्रासदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृष्णावती , दोहन जैसी नदियां अब लुप्त हो रही है। वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट की एक सर्वें रिपोर्ट बताती है कि जहां 1980 में अरावली क्षेत्र के महज 247 वर्ग किलोमीटर पर आबादी थी, आज यह 638 वर्ग किलोमीटर हो गई है। साथ ही इसके 47 वर्गकिमी में कारखाने भी हैं।


 

Accounting of waterfalls will be very important

  बहुत महत्वपूर्ण होगा झरनों का लेखा जोखा पंकज चतुर्वेदी भारत सरकार के केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने प्राकृतिक और मानव निर्मित सभी तरह क...