pankajbooks(pankaj chaturvedi)पंकज चतुर्वेदी

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 29 नवंबर 2021

CNG is also unable to stop pollution, its serious side effects on human health

 

प्रदूषण को थामने में CNG भी असमर्थ, मानव स्वास्थ्य पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव

पंकज चतुर्वेदी। हर साल की तरह हांफती-घुटती दिल्ली में एक चुप खतरा नाइट्रोजन डाइआक्साइड (एनओ2) का भी भयानक रूप में होना है। दिल्ली राज्य प्रदूषण नियंत्रण केंद्र डीपीसीसी के रियल टाइम डाटा से यह तथ्य सामने आया है कि राजधानी में कई जगह एनओ2 का स्तर चार गुना तक बढ़ा हुआ है। ये हालात तब हैं जब दिल्ली में डीजल से चलने वाले वाहनों की आमद पर पाबंदी लगी हुई है। हम पीएम 10 और 2.5 पर चिंतित हैं, जबकि एनओ2 का इस तरह बढ़ना उससे भी ज्यादा खतरनाक है। एक अध्ययन बता रहा है कि एक से 25 नवंबर के बीच राजधानी में एनओ2 का स्तर औसतन 65 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज हुआ है। एनओ2 के उत्सर्जन का मुख्य कारण सीएनजी वाहनों का बढ़ता प्रयोग है और राजधानी में बढ़ते अस्थमा के मामलों का असली गुनहगार यही है।
इसी साल जुलाई में जारी की गई रिपोर्ट ‘बिहाइंड द स्मोक स्क्रीन : सेटेलाइट डाटा रिवील एयर पाल्यूशन इन्क्रीज इन इंडियाज एट मोस्ट पापुलस स्टेट कैपिटल्स’ चेतावनी दे रही थी कि पिछले साल की तुलना में दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में नाइट्रोजन आक्साइड की मात्रा में इजाफा हुआ है। सेटेलाइट डाटा विश्लेषण के आधार पर ‘ग्रीनपीस इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 की तुलना में अप्रैल 2021 में दिल्ली में नाइट्रोजन आक्साइड की मात्र 125 फीसद तक ज्यादा रही। दरअसल पिछले साल और इस साल अप्रैल में अगर मौसम एक जैसा होता तो यह बढ़ोतरी और ज्यादा यानी 146 फीसद तक हो सकती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में तो नाइट्रोजन आक्साइड के बढ़ने के कारण खेती में अंधाधुंध रासायनिक खाद का इस्तेमाल मवेशी पालन आदि के कारण होता है, लेकिन बड़े शहरों में इसका मूल कारण निरापद या ग्रीन फ्यूल कहे जाने वाले सीएनजी वाहनों का उत्सर्जन है। नाइट्रोजन की आक्सीजन के साथ गैसें जिन्हें ‘आक्साइड आफ नाइट्रोजन’ कहते हैं, मानव जीवन और पर्यावरण के लिए उतनी ही नुकसानदेह हैं जितना कार्बन डाइ आक्साइड या मोनो आक्साइड।
यूरोप में हुए शोध बताते हैं कि सीएनजी वाहनों से निकलने वाले नैनो मीटर आकार के बेहद बारीक कण कैंसर, अल्जाइमर और फेफड़ों के रोग का खुला न्योता हैं। पूरे यूरोप में इस समय सुरक्षित ईंधन के रूप में वाहनों में सीएनजी के इस्तेमाल पर शोध चल रहे हैं। विदित हो कि यूरो-6 स्तर के सीएनजी वाहनों के लिए भी कण उत्सर्जन की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है और इसीलिए इससे उपज रहे वायु प्रदूषण और उसके मनुष्य के जीवन पर कुप्रभाव और वैश्विक पर्यावरण को हो रहे नुकसान को नजरअंदाज किया जा रहा है। जान लें कि पर्यावरण मित्र कहे जाने वाले इस ईंधन से बेहद सूक्ष्म, लेकिन घातक 2.5 नैनो मीटर का उत्सर्जन पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में 100 गुना अधिक है। खासकर शहरी यातायात में जहां वाहन धीरे चलते हैं, भारत जैसे गर्मी वाले परिवेश में सीएनजी वाहन उतनी ही मौत बांट रहे हैं जितनी डीजल गाड़ियां नुकसान कर रही थीं। महज कार्बन के बड़े पार्टिकल कम हो गए हैं। ये वाहन प्रति किमी संचालन में 66 मिलीग्राम तक अमोनिया उत्सर्जन करते हैं जो ग्रीन हाउस गैस है, जिसकी भूमिका ओजोन को नष्ट करने में है।
यह सच है कि अन्य ईंधन वाले वाहनों की तुलना में सीएनजी वाहनों से पार्टिकुलेट मैटर 80 प्रतिशत और हाइड्रोकार्बन 35 प्रतिशत कम उत्सर्जित होता है, लेकिन इससे कार्बन मोनो आक्साइड को उत्सर्जन पांच गुना अधिक होता है। शहरों में स्मोग और पर्यावरण में ओजोन परत के लिए यह गैस अधिक घातक है। ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में वाहनों में सीएनजी इस्तेमाल के कारण ग्रीनहाउस गैसों- कार्बन डाइआक्साइड और मीथेन के प्रभावों पर शोध किया गया तो सामने आया कि इस तरह के उत्सर्जन में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, इन गैसों के कारण वायुमंडलीय तापन में। सीएनजी भी पेट्रोल-डीजल की तरह जीवाश्म ईंधन ही है। यह भी स्वीकार करना होगा कि ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में एरोसोल अल्पकालिक होते हैं, उनका प्रभाव अधिक क्षेत्रीय होता है और उनके शीतलन और ताप प्रभाव की सीमा अभी भी अनिश्चित है, जबकि ग्रीन हाउस गैसों से होने वाला नुकसान वैश्विक है।
अब सवाल उठता है कि जब डीजल-पेट्रोल भी खतरनाक है और उसका विकल्प बना सीएनजी भी, साथ ही दुनिया को इस समय अधिक से अधिक ऊर्जा की जरूरत है। आधुनिक विकास की अवधारणा बगैर इंजन की तेज गति के संभव नहीं और उसके लिए ईंधन फूंकना ही होगा। इन दिनों शहरी वाहनों में वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में बैटरी चालित वाहन लाए जा रहे हैं, लेकिन यह याद नहीं रखा जा रहा कि कोयला या परमाणु से बिजली पैदा करना पर्यावरण के लिए उतना ही जहरीला है जितना डीजल-पेट्रोल फूंकना। बस जीवाश्म ईंधन की उपलब्धता की सीमा है। यह याद रखना जरूरी है कि खराब हो गई बैटरी से निकला तेजाब और सीसा अकेले वायु ही नहीं, बल्कि धरती को भी बांझ बना देता है। सौर ऊर्जा को निरापद कहने वाले यह नहीं बता पा रहे हैं कि बीते एक दशक में सारी दुनिया में जो सौर ऊर्जा के लिए स्थापित परावर्तकों की उम्र बीत जाने पर उसे कैसे निबटाया जाएगा, चूंकि उसमें कैडमियम जैसी ऐसी धातु है जिसे लावारिस छोड़ना प्रकृति के लिए स्थायी नुकसानदेह होगा, लेकिन उस कचरे के निराकरण के कोई उपाय बने नहीं।



सीएनजी से निकली नाइट्रोजन आक्साइड गैस अब मानव जीवन के लिए खतरा बन कर उभर रही है। दुर्भाग्य है कि हम आधुनिकता के जंजाल में उन खतरों को पहले नजरअंदाज करते हैं जो आगे चलकर भयानक हो जाते हैं। प्रकृति प्रदत्त ऊर्जा, हवा और पानी का कोई विकल्प नहीं है। लिहाजा नैसर्गिकता से अधिक पाने का कोई भी उपाय इंसान को दुख ही देगा।

[पर्यावरण मामलों के जानकार]

रविवार, 28 नवंबर 2021

Find a solution to the compulsion of the farmer to burn the stubble

 

पराली जलाने में किसान की मजबूरी का हल खोजें

पंकज चतुर्वेदी


 कई करोड़ के विज्ञापन चले जिसमें किसी ऐसे घोल की चर्चा थी ,
 जिसके डालते ही पराली गायब हो जाती है व उसे जलाना नहीं पड़ता लेकिन जैसे ही मौसम का मिजाज ठंडा हुआ जब दिल्लीएनसीआर के पचास हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को स्मॉग ने ढंक लिया । जब रेवाड़ी जिले के धारूहेडा से ले कर गाजियाबाद के मुरादनगर तक का वायु गुणवत्ता सूचकांक साढे चार सौ से अधिक था तो मामला सुप्रीम कोर्ट में गया व फिर सारा ठीकारा पराली पर थोप दिया गया। हालांकि इस बार अदालत इससे असहमत थी कि  करोड़ों लोगों की सांस घोटने वाले प्रदूषण  का कारण महज पराली जलाना है। चुनावी साल और किसान आंदोलन के चलते पंजाब में वैसे ही सख्ती कम है और सामने दिख रहा है कि इस साल हर बार से ज्यादा पराली जल रही है। नासा का आकलन है कि 13 नवंबर तक अकेले पंजाब में पराली जलाने की 57 हजार घटनाएं हुई हैं।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि  फसल अवशेश या पराली के निस्तारण हेतु  किसान कल्याण विभाग ने  पंजाब, हरियाणा, उप्र व दिल्ली में 2018 से 2020-21 की अवधि में एक योजना लागू की है जिसका पूरा धन केंद्र दे रहा है। इसके लिए केंद्र ने कुल 1726.67 करेाड़ रूपए जारी किए जिसका सर्वाािक हिस्सा पंजाब को 793.18 करोड दिया गया। विडंबना है कि  इसी राज्य में सन 2020 के दौरान पराली जलाने की 76590 घटनाएं सामने आई, जबकि बीते साल 2019 में ऐसी 52991 घटनांए हुई थीं। जाहिर है कि पराली जलाने की घटना में इस राज्य में 44.5 फीसदी का इजाफा हुआ। हरियाण में जहां सन 2019 में पराली जलाने की 6652 घटनाएं हुई थीं, वे सन 2020 में 5000 रह गईं।

दिल्ली की आवोहवा जैसे ही जहरीली हुई पंजाब-हरियाणा के खेतों में किसान अपने अवशेश या पराली जलाने पर ठीकरा फोड़ा जाने लगा, हालांकि यह वैज्ञानिक तथ्य है कि राजधानी के स्मॉग में पराली दहन का योगदान बहुत कम है , लेकिन यह भी बात जरूरी है कि खेतों में जलने वाला अवशेष असल में किसान के लिए भी नुकसानदेह है। पराली का ध्ुाआं उनके स्वास्थ्य का दुश्मन है, खेती की जमीन की उर्वरा षक्ति कम करने वाला है और दूभर भी है। हालांकि खेतों में अवशेश जलाना गैरकानूनी घोषित  है फिर भी धान उगाने वाला ज्यादातर किसान पिछली फसल काटने के बाद खेतों के अवशेषों को उखाड़ने के बजाए खेत में ही जला देते हैं।

जान लें देश में हर साल कोई 31 करोड़ टन फसल अवशेश को फूंका जाता है जिससे हवा में जहरीले तत्वों की मात्रा 33 से 290 गुणा तक बढ़ जाती है। एक अनुमान है कि हर साल अकेले पंजाब और हरियाणा के खेतों में कुल तीन करोड़ 50 लाख टन पराली या अवशेश जलाया जाता है। एक टन पराली जलाने पर दो किलो सल्फर डाय आक्साईड, तीन किलो ठोस कण, 60 किलो कार्बन मोनो आक्साईड, 1460 किलो कार्बन डाय आक्साईड और 199 किलो राख निकलती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कई करोड़ टन अवशेश जलते है तो वायुमंडल की कितनी दुर्गति होती होगी। इन दिनों सीमांत व बड़े किसान मजदूरों की उपलब्धता की चिक-चिक से बचने के लिए खरीफ फसल, खासतौर पर धान काटने के लिए हार्वेस्टर जैसी मशीनों का सहारा लेते हैं। इस तरह की कटाई से फसल के तने का अधिकांश हिस्सा  खेत में ही रह जाता है। खेत की जैवविविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है, खासतौर पर जब पूरी खेती ऐसे रसायनों द्वारा हो रही है जो कृषि -मित्र सूक्ष्म जीवाणुओं को ही चट कर जाते हैं। फसल से बचे अंश को इस्तेमाल मिट्टी जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ाने के लिए नही किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जहां गेहूं, गन्ने की हरी पत्तियां, आलू, मूली, की पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में उपयोग की जाती हैं तो कपास, सनई, अरहर आदि के तने गन्ने की सूखी पत्तियां, धान का पुआल आदि को जला दिया जाता है।

कानून की बंदिश और सरकार द्वारा प्रोत्साहन राशि के बावजूद पराली के निबटान में बड़े खर्च और दोनो फसलों के बीच बहुत कम समय के चलते बहुत से किसान अभी भी नहीं मान रहे। उधर किसान का पक्ष है कि पराली को मशीन से निबटाने पर प्रति एकड़ कम से कम पांच हजार का खर्च आता है। फिर अगली फसल के लिए इतना समय होता नहीं कि गीली पराली को खेत में पड़े रहने दें। विदित हो हरियाणा-पंजाब में कानून है कि धान की बुवाई 10 जून से पहले नहीं की जा सकती है। इसके पीछे धारणा है कि भूजल का अपव्यय रोकने के लिए  मानसून आने से पहले धान ना बोया जाए क्योंकि धान की बुवाई के लिए खेत में पानी भरना होता है। चूंकि इसे तैयार होने में लगे 140 दिन , फिर उसे काटने के बाद गेंहू की फसल लगाने के लिए किसान के पास इतना समय होता ही नहीं है कि वह फसल अवशेश का निबटान सरकार के कानून के मुताबिक करे। जब तक हरियाणा-पंजाब में धान की फसल की रकवा कम नहीं होता, या फिर खेतों में बरसात का पानी सहेजने के कुंडं नहीं बनते और उस जल से धान की बुवाई 15 मई से करने की अनुमति नहीं मिलती ; पराली के संकट से निजात मिलेगा नहीं। हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रापिकल मेट्रोलोजी, उत्कल यूनिवर्सिटी, नेशनल एटमोस्फिियर रिसर्च लेब व सफर के वैज्ञानिकों के संयुक्त समूह द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि यदि खरीफ की बुवाई एक महीने पहले कर ली जाए जो राजधानी को पराली के धुए से बचाया जा सकता है। अध्ययन कहता है कि यदि एक महीने पहले किसान पराली जलाते भी हैं तो हवाएं तेज चलने के कारण हवा-घुटन के हालता नहीं होतेव हवा के वेग में यह धुआं बह जाता है। यदि पराली का जलना अक्तूबर-नवंबर के स्थान पर सितंबर में हो तो स्मॉग बनेगा ही नहीं।

कहने को राज्य सरकारें मशीनें खरीदने पर छूट दे रही हैं परंतु किसानों का एक बड़ा वर्ग सरकार की सबसिडी योजना से भी नाखुश हैं। उनका कहना है कि पराली को नष्ट  करने की मशीन बाजार में 75 हजार से एक लाख में उपलब्ध है, यदि सरकार से सबसिड़ी लो तो वह मशीन डेढ से दो लाख की मिलती है। जाहिर है कि सबसिडी उनके लिए बेमानी है। उसके बाद भी मजदूरों की जरूरत होती ही है। पंजाब और हरियाणा दोनों ही सरकारों ने पिछले कुछ सालों में पराली को जलाने से रोकने के लिए सीएचसी यानी कस्टम हाइरिंग केंद्र भी खोले हैं. आसान भाषा में सीएचसी मशीन बैंक है, जो किसानों को उचित दामों पर मशीनें किराए पर देती हैं।

किसान यहां से मशीन  इस लिए नहीं लेता क्योंकि उसका खर्चा इन मशीनों को किराए पर प्रति एकड़ 5,800 से 6,000 रूपए तक बढ़ जाता है। जब सरकार पराली जलाने पर 2,500 रुपए का जुर्माना लगाती है तो फिर किसान 6000 रूपए क्यों खर्च करेगा? यही नहीं इन मशीनों को चलाने के लिए कम से कम 70-75 हार्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत होती है, जिसकी कीमत लगभग 10 लाख रूपए है, उस पर भी डीजल का खर्च अलग से करना पड़ता है। जाहिर है कि किसान को पराली जला कर जुर्माना देना ज्यादा सस्ता व सरल लगता है। उधर  कुछ किसानों का कहना है कि सरकार ने पिछले साल पराली न जलाने पर मुआवजा देने का वादा किया था लेकिन हम अब तक पैसों का इंतजार कर रहे हैं।

दुर्भाग्य है कि पराली जलाना रोकने की अभी तक जो भी योजनाएं बनीं, वे मशीनी तो हैं लेकिन मानवीय नहीं, वे कागजों -विज्ञापनो पर तो लुभावनी हैं लेकिन खेत में व्याहवारिक नहीं।  जरूरत है कि माईक्रो लेबल पर किसानों के साथ मिल कर  उनकी व्याहवारिक दिक्कतों को समझतें हुए इसके निराकरण के स्थानीय उपाय तलाशें जाएं। मशीनें कभी भी र्प्यावरण का विकल्प नहीं होतीं।, इसके लिए स्वनिंयंत्रण ही एकमात्र निदान होता है।

 

 

बुधवार, 24 नवंबर 2021

need of learning proper use of water

 पानी की बर्बादी ना रोकी तो बेपानी हो जायगा देश 

पंकज चतुर्वेदी


जाम्बा, करनाल से कैथल जाने वाले मुख्य मार्ग पर एक संपन्न गांव है।  कोई 1250 की आबादी वाले पूरे गांव में  242 घर हैं और सभी पक्के हैं।, यहां  ‘हर घर जल की सरकारी योजना के तहत प्रत्येक घर तक पानी की लाईन डली है। गांव में ही जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग हरियाणा ने एक ट्यूब वेल लगा रखा है, जिस पर 25 हार्स पावर की मोटर है। एक कर्मचारी सुबह-षाम एक-एक घंटा इसे चला कर घरों तक पानी पहुंचाता है। पानी  को क्लोरिन से शुद्ध  किया जाता है। सरकार इसके लिए महज चालीस रूपए महीना लेती है और वह भी कई ग्रामीण चुकाते नहीं। जब मैने  गांव वालो से पूछा कि  क्या वे जल आपूर्ति से संतुष्ट  हैं ? बहुत से लेागों का कहना था कि पानी कम आता है। जल मिशन के सलाहकार दीपक षर्मा से जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि  दिन में दो घंटे मोटर चलने से एक आठ लोगों के परिवार के पीने, रसोई, नहाने का पानी पर्याप्त पहुंच जाता है।  जब बारिकी से देखा तो पता चला कि हर गांव में मवेशी पले है। और अब ग्रामीण चाहते हैं कि ढोर के नहलाने का पानी भी नल से ही आए। हरियाणा का कैथल जिला, पंजाब के पटियाला से सटा हुआ है, जिले की समृद्धि का दारोमदार खेती-किसानी को है और जब से धान की लत लगी, किसान ने जम कर भूजल उलीचां और आज यह जिला पाताल में पानी के मामले में काली सूची में है, अर्थात अब यहां का सारा पानी चुक गया है। आज इस जिले के हर छोटे-बड़े गांव में  हर घर तक नल का जल है, पानी की जांच का तंत्र काम कर रहा है, टोल फ्री नंबर भी है, लेकिन यह पूरी सरकारी योजना जिस भूजल  पर टिकी है, असल में वह किसी भी दिन धोखा दे सकती है। 


जाम्बा को ही क्यों कोसें , दिल्ली एनसीआर के कई  इलाकों को इस बात के लिए गर्व से प्रचारित किया जाता है कि वहां घरों में गंगा-वाटर आता है। ऐसे इलाकों में फ्लेट के दाम इस कारण अधिक होते हैं। जिस गंगा जल को घरों में एक बोतल में पवित्र निषानी की तरह रखा जाता है, वह गंगा जल लाखें घरों में शो चालय से ले कर  कपड़े धोने  तक में इस्तेमाल होता है। आज यह सरकारी दस्तावेज स्वीकार करते हैं कि देष के कोई 360 जिलों में पानी की मारामारी अब स्थाई हो गई है। कृषि  मंत्रालय के  भारतीय कृषि  अनुसंधान परिषद्  का एक ताजा शोध  बताता है कि सन 2030 तक हमारे धरती के तापमान में 0.5 से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि अवष्यंभावी है। साल-दर-साल बढ़ते तापमान का प्रभाव सन 2050 में 0.80 से 3.16 और सन 2080 तक 1.56 से 5.44 डिग्री हो सकता है। जान लेंकि तापमान में एक डिग्री बढ़ौतरी का अर्थ है कि खेत में 360 किलो फसल प्रति हैक्टेयर की कमी आ जाना। इस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते खेती के लिहाज से 310 जिलों को संवेदनशील  माना गया है।  इनमें से 109 जिले बेहद संवेदनशील  हैं जहां आने वाले एक दशक में ही उपज घटने, पषु धन से ले कर मुर्गी पालन व मछली उत्पाद तक कमी आने की संभावना है। तापमान बढ़ने से बरसात के चक्र में बदलाव, बैमौसम व असामान्य बारिष, तीखी गर्मी व लू, बाढ़ व सुखाड़ की सीधी मार किसान पर पड़ना है।  


सामने दिख रहा है कि संकट अकेले का ही नहीं है, अलग-अलग किस्म का पानी, अलग-अलग इस्तेमाल के लिए कैसे छांटा जाए, इस बारे में तंत्र विकसित करना और सबसे बड़ी बात इसके लिए जागरूकता फैलाना अनिवाय है। कैथल के जिस जाम्बी गांव के लोग जब नल से जल पर ही पूरी तरह निर्भर होना चाहते हैं, वे गांव में मौजूए कोई डेढ एकडक्ष् के उस तालाब को बिसरा बैठे हैं, जो अभी कुछ साल पहले तक ही सारे गांव की जरूरतों का केंद्र था। वहां पक्का घाट तो है लेकिन पक्के घरों  के शोचालयों के निस्तार से यह धीरे धरीे नाबदान बन रहा है। जिस ट्यूब वेल के पानी से लेागों को नल के पानी का चस्का लगा है, असल में इसका भूजल इसी तालाब के कारण अभी संपन्न है।  चीन की राजधानी पेईचिंग में बहुमंजीली भवनों में  पीने के पानी की सप्लाई बहुत कम समय को होती है और उसका दाम अधिक होता है।  कपड़े, नहोने बर्तन माजने का पानी अलग से आता है। जबकि  टायलेट के  फ्लष जैसे कार्यों के लिए  भवन वालों को ही अपने निस्तार का पुनर्चक्रीकरण करना होता है।


भारत में जिस साल अल्प वर्षा  होती है, उस साल भी इतनी कृपा बरसती है कि सारे देश  की जरूरत पूरी हो सकती है लेकिन हमारी असली समस्या बरसात की हर बूंद को रोक रखने के लिए हमारे पुरखों द्वारा बनाए तालाब-बावड़ी या नदियों की दुर्गति करना है। बारिष का कुछ हिस्सा तो भाप बनकर उड़ जाता है और कुछ समुद्र में चला जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति जीवनदायी संपदा यानी पानी हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है और इस चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है हमारी जिंदगी का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं उसे वापस भी हमें ही लौटाना होता है। पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तथ्य हैं जिसे जानकर लगेगा कि सचमुच अब हममें थोड़ा सा भी पानी नहीं बचा है। कुछ तथ्य इस प्रकार हैं-मुंबई में रोज गाड़ियां धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण 17 से 44 प्रतिशत पानी प्रतिदिन बेकार बह जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी का प्रतिदिन 2.16 घन मीटर पानी बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। भारत में हर वर्ष बाढ़ के कारण करीब हजारों मौतें व अरबों का नुकसान होता है। इजरायल में औसत बारिष 10 सेंटीमीटर है , इसके बावजूद वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात करता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटीमीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद सिंचाई के लिए जरूरी जल की कमी बनी रहती है। 


पिछले 74 वर्षो में भारत में पानी के लिए कई भीषण संघर्ष हुए हैं, कभी दो राज्य नदी के जल बंटवारे पर भिड़ गए तो कहीं सार्वजनिक नल पर पानी भरने को ले कर हत्या हो गई। खेतों में नहर से पानी देने को हुए विवादों में तो कई पुष्तैनी दुष्मिनियों की नींव रखी हुई हैं।  यह भी कडवा सच है कि हमारे देष में औरत पीने के पानी की जुगाड़ के लिए हर रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती हैं। पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है। पूरी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलोलीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है जोकि खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में धु्रव प्रदेशों में है। बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुआं, झरना और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का 60वां हिस्सा खेती और उद्योगों में खपत होता है। बाकी का 40वां हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं। यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है तो पांच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है। बॉथ टब में नहाते समय धनिक वर्ग 300 से 500 लीटर पानी गटर में बहा देते हैं। मध्यम वर्ग भी इस मामले में पीछे नहीं हैं जो नहाते समय 100 से 150 पानी लीटर बरबाद कर देता है। हमारे समाज में पानी बरबाद करने की राजसी प्रवृत्ति है जिस पर अभी तक अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं हुई है। 

यदि अभी पानी को सहेजने और किफायती इस्तेमाल पर काम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब सरकार की हर घर नल जैसी योजनाएं जल-स्त्रोत ना होने के कारण रीती दिखेंगी। जान लें, पानी की कमी, मांग में वृद्धि तो साल-दर-साल ऐसी ही रहेगी। अब मानव को ही बरसात की हर बूंद को सहेजने और उसे किफायत से खर्च करने पर विचार करना होगा। इसमें अन्न की बर्बादी सबसे बड़ा मसला है- जितना अन्न बर्बाद होता है, उतना ही पानी जाया होता है। 


सोमवार, 22 नवंबर 2021

Chennai is warning on dawn of climate change for urban area of India

चैन्नई बड़ी चेतावनी है। 

 पंकज चतुर्वेदी

नव भारत टाइम्स 


 

चैन्नई व उसके आसपास के शहरी इलाकों  की रिहाईशी बस्तियों के जलमग्न होने का जो हाहाकर आज मचा है, सन 2015 में भी इस शहर   ने ऐसे ही हालात भोगे थे और लगता है कि उन कटु अनुभवों से  स्थानीय प्रशासन  ने कुछ सीखा नहीं। यह सच है कि बमौसम ंझमाझम बारिश अप्रत्याशित है लेकिन  जलवायु परिर्तन का कुप्रभाव सबसे पहले तटीय शहरों में पड़ने की चेतावनी तो नई नहीं हैं। जान लें यह भी बड़ा सच है कि मद्रास शहर क पारंपरिक बुनावट और बसावट इस तरह की थी कि 15 मिमी तक पानी बरसने पर भी शहर की जल निधियां में ही पानी एकत्र होता और वे उफनते तो पानी समुद्र में चला जाता। वैसे गंभीरता से देखें तो देश का वह शहर जो अपनी आधुनिकता, चमक-दमक और रफ्तार के लिए जग-प्रसिद्ध हैं, थोड़ी सी बारिश में ही तरबतर हो जाता हैं।

चैन्नई ं ,कभी समुद्र के किनारे का छोटा सा गांव मद्रासपट्टनम आज भारत का बड़ा नगर है। अनियोजित विकास, षरणार्थी समस्या औ जल निधियों की उपेक्षा के चलते आज यह महानगर बड़े षहरी-झुग्गी में बदल गया है। यहां की सड़कों की कुल लंबाई 2847 किलोमीटर है और इसका गंदा पानी ढोने के लिए नालियों की लंबाई महज 855 किलोमीटर। लेकिन इस शहर  में चाहे जितनी भी बारिश  हो उसे सहेजने और सीमा से अधिक जल को समुद्र तक छोड़कर आने के लिए यहां नदियों, झीलों, तालाबों और नहरों की सुगठित व्यवस्था थी। नेषनल इंस्टीट्यूट आफ डिजास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट में बताया गया है कि 650 से अधिक जल निधियों में कूड़ा भर कर चौरस मैदान बना दिए गए । यही वे पारंपरिक स्थल थे जहां बारिश  का पानी टिकता था और जब उनकी जगह समाज ने घेर ली तो पानी समाज में घुस गया। उल्लेखनीय है कि नवंबर-15 की बारिश  में सबसे ज्यादा दुर्गति दो पुरानी बस्तियों-वेलाचेरी और तारामणि की हुई। वेलाचेरी यानि वेलाय- ऐरी। सनद रहे तमिल में ऐरी का अर्थ है तालाब व मद्रास की ऐरी व्यवस्था सामुंदायिक जल प्रबंधन का अनूठा उदाहरण हैं।  आज वेलाय ऐरी के स्थान पर गगनचुंबी इमारतें हैं। शहर  का सबसे बड़ा मॉल ‘‘ फोनिक्स भी इसी की छाती पर खड़ा है। जाहिर है कि ज्यादा बारिश  होने पर पानी को तो अपने लिए निर्धारित स्थल ऐरी’ की ही ओर जाना था।  शहर  के वर्षा  जल व निकासी को सुनियोजित बनाने के लिए अंग्रेजों ने 400 किलोमीटर लंबी बर्किंघम नहर बनवाई थी, जो आज पूरी तरह प्लास्टिक, कूड़े से पटी है  कीचड़ के कारण इसकी गहराई एक चौथाई रह गई है। जब तेज बारिश  हुई तो पलक झपकते ही इसका पानी उछल कर इसके दोनो तरफ बसी बस्तियों में घुस गया।

चैन्नई शहर  की खूबसूरती व जीवन रेखा कहलाने वाल दो नदियों- अडयार और कूवम के साथ समाज ने जो बुरा सलूक किया, प्रकृति ने इस बारिश  में इसी का मजा जनता को चखाया। अडयार नदी कांचीपुरम जिले में स्थित विषाल तालाब चेंबरवक्कम के अतिरिक्त पानी के बहाव से पैदा हुई। यह पष्चिम से पूर्व की दिषा में बहते हुए कोई 42 किलोमीटर का सफर तय कर चैन्नई में सांथम व इलियट समुद्र तट के बीच बंगाल की खाड़ी में मिलती है। यह नदी शहर  के दक्षिणी इलाके के बीचों बीच से गुजरती हैं और जहां से गुजरती है वहां की बस्तियों का कूड़ा गंदगी अपने साथ ले कर एक बदबूदार नाले में बदल जाती है। यही नहीं इस नदी के समुद्र के मिलन-स्थल बेहद संकरा हो गया है व वहां रेत का पहाड़ हे। हालात यह हैं कि नदी का समुद्र से मिलन हो ही नहीं पाता है और यह एक बंद नाला बन गया है। समुद्र में ज्वार की स्थिति में ऊंची लहरें जब आती हैं तभी इसका मिलन अडयार से होता है। तेज बारिश  में जब शहर  का पानी अडयार में आया तो उसका दूसरा सिरा रेत के ढेर से बंद था, इसी का परिणाम था कि पीछे ढकेले गए पानी ने शहर  में जम कर तबाही मचाई व दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी पानी को रास्ता नहीं मिल रहा है। अडयार मे ंशहर  के 700 से ज्यादा नालों का पानी बगैर किसी परिषोधन के तो मिलता ही है, पंपल औद्योगिक क्षेत्र का रासायनिक अपषिश्ट भी इसको और जहरीला बनाता है।

कूवम षब्द कूपम से बना है- जिसका अर्थ होता हैं कुआँ। कूवम नदी 75 से ज्यादा तालाबों के अतिरिक्त जल  को अपने में सहजे कर तिरूवल्लूर जिले में कूपम नामक स्थल से उदगमित होती है। दो सदी पहले तक इसका उद्गम धरमपुरा जिले था, भौगोलिक बदलाव के कारण इसका उदगम स्थल बदल गया।  कूवम नदी चैन्नई शहर  में अरूणाबक्कम नाम स्थान से प्रवेष करती है और फिर 18 किलोमीटर तक शहर  के ठीक बीचों बीच से निकल कर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसके तट पर चूलायमेदू, चेरपेट, एग्मोर, चिंतारीपेट जैसी पुरानी बस्तियां हैं और इसका पूरा तट मलिन व झोपड़-झुग्गी बस्तियों से पटा है। इस तरह कोई 30 लाख लोगों का जल-मल सीधे ही इसमें मिलता है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह कहीं से नदी नहीं दिखती। गंदगी, अतिक्रमण ने इसे लंबाई,चौड़ाई और गहराई में बेहद संकरा कर दिया है। अब तो थेाडी सी बारिश  में ही यह उफन जाती है।

यह बारिश  चैन्नई शहर  के लिए जलवायु परिवर्तन की तगड़ी मार के आगमन की बानगी है। यह संकट समय के साथ और क्रूर होगा और इससे बचने के लिए अनिवार्य है कि शहर  के पारंपरिक तालाबों व सरोवरों को अतिक्रमण मुक्त कर उनके जल-आगम के प्राकृतिक मार्गों को मुक्त करवाया जाए। नदियों व नहर के तटों से अवैध बस्तियों को विस्थापित कर महानगर की सीवर व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना होगा। चूंकि ये नदियां सीधे-सीधे 100 से ज्यादा तालाबों से जुड़ी हैं, जाहिर है कि जब इनकी सहन करने की सीमा समाप्त हो जाएंगी तो इससे जुड़े पावन सरोवर भी गंदगी व प्रदूशण से नहीं बचेंगे। यह तो सभी जानते ही हैं कि चैन्नई सालभर भीशण जल संकट का षिकार रहता है। आज मसला केवल चैन्नई के जल-संकट का नहीं,बल्कि देष के अधिकांष षहरों के अस्तित्व का है । और यह तभी सुरक्षित रहेंगे जब वहां की जल निधियों को उनका पुराना वैभाव व सम्मान वापिस मिलेगा। चैन्नई को मदद की दरकार तो है लेकिन यह गंभीर चेतावनी आप सभी के लिए है कि अपने गांव-कस्बे के कुओं, बावडी, तालाब, झीलों से अवैध कब्जे हटा लें।

 

 

 


शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

Invitation of gods on the Hindon like sump

 

नाबदान सी हिंडन पर देवताओं का आमंत्रण















 

कार्तिक शुक्ल की पूर्णिमा पर बनारस के घाट पर दीवाली जैसी रोशनी की जाती है , कहते हैं उस दिन सारे देवता धरती पर आते हैं और देव दीपावली मनाई जाती है. ठीक इसी सोच के साथ सन २०१३ में गाज़ियाबाद और दिल्ली के बीच बहने वाली , यमुना की सह्यात्रिनी  हिंडन के घाट  पर  इस सोच के साथ “देव दीपावली “ की शुरुआत हुई कि कोई देव आएगा और इस नाले से बदतर , लगभग मर गई  हिंडन के दिन बहुरेंगे , चूँकि इस विचार को देने वाले  नवनीत सिंह मूल रूप से बनारस के थे सो साल में कम से कम एक दिन कुछ लोग यहा एकत्र होने लगे – हालाँकि ऐसा नहीं कि लोग इसके घात पर आते नहीं हैं – आते हैं—क्योंकि इसके तट पर ही अंतिम संस्कार होते हैं—इस बार तो कोविड ने इस नदी के किनारों पर  दूर दूर तक मौत का रौद्र रूप देखा और अपनों को विदा करने आये लोगों ने नदी की लाश भी देखी .

हिंडन निकलती तो सहारनपुर से आगे  से हिम्च्छादित पर्वत से है लेकिन सहारनपुर आते आते ही इसमें पानी रह नहीं जाता—आगे चल कर इसमें कारखानों की गंदगी, आवासीय नाबदान मिलता है और गाज़ियाबाद आते आते इसमें ऑक्सीजन की मात्रा शून्य हो जाती है – यह भी समझ लें कि गाज़ियाबाद शहर बसा ही इस लिए था कि यहाँ हिंडन का पावन जल था –

जैसा संघ का प्रिय शगल है नाम बदलना – सो इसका नाम हर्नंदी कर दिया गया और इसका उल्लेख कहीं प्राच्य ग्रन्थों में बता दिया गया—हमारे दोस्त प्रशांत वत्स हरनंदी कहीन  नाम से पत्रिका निकाल कर लोगों को इसकी दुर्गति के बारे में जाग्रत करते रहे – इस बार की देव दीपावली सी लिए ग़मगीन थी कि हमारे दोनों साथी – नवनीत जी और प्रशांत जी असामयिक काल के गाल में समा गए , प्रशासन ने हिंडन के इस तट का नाम – नवनीत घाट  कर दिया, वहीँ एक सरोवर का नाम प्रशांत के नाम पर किया जा रहा है .

आज हर बार से ज्यादा भीड़ थी हिंडन घाट पर—एक तरफ नवनीत और प्रशांत के साथी थे , तो दूसरी तरफ एक और संस्था ने जमावड़ा कर लिया ,,  नदी के किनारे दोनों समूहों ने अपने अपने दीये  जलाए- यहाँ तक तो ठीक, लेकिन दोनों  ने  बिलकुल सट कर खड़े होने के बावजूद  आरती अलग अलग कर रहे थे .

इस सारे तमाशे में हिंडन की मौत से सभी बेखबर थे- जिसकी आरती हो रही थी वह नाले से बदतर थी – उसमें किनारे पर ही घर से निकाले गए देवी देवताओं की मूर्तियाँ , पूजन सामग्री और दस दिन पहले संपन्न छट की बकाया गंदगी भी – हिंडन में आज जो पानी दिख रहा था वह  भी महज छट  के कारण दिख रहा था—जनता की मांग पर इस पर्व पर सरकार गंग नहर से कुछ गंगा जल इसमें छोड़ देती है –

आखिर गाज़ियाबाद में  हिंडन के यह हालात क्यों हैं ?   असल में इसका कारण सियासत है – हिंडन को हरनंदी या ऐसे ही नामों से  पूजने या यहाँ साबरमती जैसा रिवर फ्रंट बनाने वाले अधिकाँश बीजेपी के नेता हैं और उन्होंने माँ लिया है कि नदी—पूजा- भगवन आदि उनका काम है – वहीं दुसरे राजनितिक दल हिंडन या पर्यावरण या नदी के अस्तित्व के प्रति पूरी तरह बेपरवाह है – या उनके एजेंडे में यह है ही  नहीं – अब केंद्र में सात साल, राज्य में पांच साल और नगर निगम में पच्चीस साल से बैठे नेता भी जब इस पर आंसू बहाते हैं तो साफ़ हो जाता है कि इसे ही घडियाली आंसू कहते हैं – इनके लिए हिंडन का मसला एक बहाने से लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर उन्हें अपना वोटर बनाए रखना है .

हिंडन की धारा को सिकोड़ कर, मोड़ कर मेट्रो के पिलर बने, हिंडन की किनारों को सुखा कर बस्तिया बस गईं , हिंडन में नगर निगम के ट्रकों  को कूड़ा  फैंकते कई बार विक्रांत शर्मा ने कैमरे में पकड़ा – हिंडन पर आधा दर्जन फैसले एन् जी टी के हैं और किसी पर भी अमल हुआ नहीं ---

हिंडन के मरने का अर्थ होगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पर्यावरणीय तंत्र के एक बड़े हिस्से का समूल नाश हो जाना – जान लें यह इलाका जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव में अत्यधिक वर्षा और शहरी बाढ़ से प्रभावित संभावित क्षेत्र में से है – बाबाजी ने सत्ता में आते ही सौ दिन में तालाब विकास प्राधिकरण के लिखित  वायदे किये थे – हिंडन बेसिन के नाम पर यदि संजय कश्यप जैसे विचारवान लोगों को अलग कर दिया जाए तो कुछ एक  तालाब  के नाम पर मशीने लगवा कर गड्ढे खुदवाने या ऐसे ही हरकतों में लिप्त रहे हैं ----

हिंडन नदी को मैंने सहारनपुर के बहादुरपुर गाँव से ले कर उसके यमुना में मिलन – ग्रेटर नोयडा से आगे मोम्नाथल तक खुद देखा है --- यदि इस पर  ईमानदारी से काम करना है तो  पहले शहरी निकायों को इसमें गंदा पानी मिलाने से रोकने पर काम करना होगा- फिर इसके किनारे के गाँवों  इमं जागरूकता अभियान – जैसे कम कीटनाशक  का इस्तेमाल , गंदगी पर काम करना होगा – यूपी में एक माफिया ऐसा भी है जो सरकारी महकमों और आई आई टी में बैठे पैसे ले कर फर्जी रिपोर्ट बनाने वालों से मिल कर हिंडन को नदी की जगह निस्तार का नाला सिद्ध करने में लगा है

गाज़ियाबाद में यदि केवल हिंडन किनारे आधा किलोमीटर पर कूड़ा डम्प करने, कब्जे हटाने, नालों पे एसटीपी लगाने का काम तो एक महीने में किया जा सकता है –लेकिन असल में इच्छाशक्ति है ही नहीं – यह केवल एक धार्मिक मसला है – और उसका भयादोहन आकर वोट निकालने का .

आज शाम हिंडन किनारे की हाल देख लें और सोचें कि क्या इसकी आरती करने वाले सच सच में इसकी  इज्जत, आस्था या सरोकार रखते हैं ?

#polluted Hindon 

# careless ghaziabad 

बुधवार, 17 नवंबर 2021

PAID PUBLICITY CAN NOT CURE AIR POLLUTION

 विज्ञापनों से नहीं होती हवा साफ 

पंकज चतुर्वेदी


कुल 57 करोड के विज्ञापन  विभिन्न मीडिया के माध्यम से प्रसारित कर दिए गए कि दिल्ली सरकार ने पराली को खेत में ही गलाने  की तकनीक इजाद कर ली है। सभी जानते हैं कि दिल्ली राज्य में धान होता नहीं है और यहां पराली जलाने जैसा संकट है नहीं, फिर भी विज्ञापनों में ऐसा दिखाया गया कि ब तो दिल्ली की हवा किसी समुद्री तट के गांव जैसी पवन हो गई। फिर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद आनंद विहार और कनाट प्लेस में स्मॉग टावर लगा दिए गए जिस पर व्यय  कोई 55 करोड़ अया व उसके प्रचार व खुद की पीठ ठोकने का व्यय अलग।  दीवाली की रात से कनाट प्लेस वाला टावर खुद ही संास नहीं ले पा रहा, जबकि आनंद विहार में हवा की गुणवत साढे चार सौ से कम  नहीं हो रही। दिल्ल्ी की हर रेड लाईट पर भुगतान के साथ युवाओं को खड़ किया जा रहा है जिसमें मुख्यमंत्री का चेहरा दिखाते पोस्टर होते हैं कि रेड लाईट पर गाड़ी बंद करो । जबकि यह सभी जानते है। कि वाहन से प्रदूशण का मूल कारण चालीस से कम रफ्तार से कार का चलना या जाम होता है। इस पर हर दिन लाखों रूपए खर्च किए जा रहे हैं।  नतीजा सामने है कि अकेले दिल्ली एनसीआर की चार करोड़ ही नहीं दिल्ली से दो सौ किलोमीटर दूर तक के शहर-कस्बे  बीमारियों का घर हो गए हैं। 

दिल्ली में ये मौसम बदलने के दिन हैं, दिन में गरमी और अंधेरा होते-होते तापमान गिर जाता है। देष की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिषत जिम्मेदारी धूल-मिट्टी व हवा में उड्ते मध्यम आकार के धूल कणों की है। दिल्ली में हवा की सेहत को खराब करने में गाड़ियों से निकलने वाले धुंए से 17 फीसदी, पैटकॉक जैसे पेट्रो-इंधन की 16 प्रतिषत भागीदारी है। इसके अलावा भी कई कारण हैं जैसे कूड़ा जलाना । यही नहीं सड़क पर गाड़ियों के चलने से टायर की घिसाई से जो महीन काले रबर कण निचले परिवेष में छाते हैं, वह भी कम जानलेवा नहीं होते। विडंबना है कि जब ठंड के दिनों में धुंध छाती है तो सरकार इसे गंभीर पर्यावरणीय संकट मानती है और सारा ठीकरा पराली जलाने पर थोप देती है । इस बार तो दीवाली के बाद दिल्ली व दूर-दूर तक जहर की ऐसी परत छाई है कि अस्पताल सांस की बीमारी के मरीजो ंसे भरे हैं। जो रसूख वाले हैं वे षहर छोड कर किसी सुदूर  पर्वतीय स्थल पर जा रहे हैं और वहां भी  क्षमता से अधिक भीड़ होने का खामियाजा परिवेष भुगत रहा है।


यह कड़वा सच है कि यदि सुप्रीम कोर्ट सक्रिय नहीं होती तो दिल्ली के प्रदूशण से सरकारें तो बेपरवाह ही रही हैं। एमसी मेहता बनाम केंद्र सरकार, 1988 के फैसले के बाद दिल्ली में इपीसीए गठित की गई थी जिसका काम दिल्ली राजधानी क्षेत्र में प्रदूशण के नियंत्रण के लिए काम करना था। चूंकि दिल्ली का प्रदूशण आसपास के जिलों के कारण भी प्रभावित होता है सो आदित्य दुबे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद केंद्र सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम)  का गठन किया। चूंकि इस आयोग के पास प्रदूशणकारियों को पंाच साल की जेल की सजा सुनाने का भी अधिकार था सो केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर 28 अक्टूबर 2020 को इसके गठन की औपचारिकता की। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पूर्व सचिव एमएम कुट्टी को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। इसके सदस्य विभिन्न राज्यों के आला अफसर भी थे। 


इस आयोग की एक बैठक नौ नवंबर 2020 को हुई जिसमें वर्तमान नियमों, कानूनों और दिशा निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हुए निजी वाहनों के उपयोग को कम करने , घर से काम करने को प्रोत्साहित करने, कूडा जलाने पर कड़ाई, धूलग्रस्त इलाकों में पानी छिड़काव जैसे निर्देष भी जारी किए गए। सुझावों पर कुछ क्रियान्वयन होता तब तक इसकी अकाल मृत्यू हो गई। जान लें अध्यादेश को कानून का रूप देने के लिए इसे संसद का सत्र शुरू होने के छह हफ्ते के भीतर सदन में पेश नहीं किया जा सका, जिसकी वजह से इसकी वैधता समाप्त हो गई और आयोग स्वतः भंग हो गया।

जिस संसद के सदस्य अपने भत्ते-वेतन बढ़ाने के बिल को पास करने की तैयारी सालभर पहले कर लेते हैं वहां आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे वायु प्रदूशण के निदान के लिए गठित संस्था के बारे में याद ना रहना वास्तव में आज की राजनीति के जन सरोकार से दूरी की बानगी है। एक षक्तिसंपन्न आयोग को ठिकाने से कार्यालय की जगह नहीं मिली, उसके कार्य को व्यापक रूप देने की मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मुहैया करवाई गई। जाहिर है कि इस कमीशन को भी केंद्र सरकार ने गम्भीरता से नहीं लिया।


जाहिर है कि यदि दिल्ली और उसके करीबी इलाकों की संास थमने से बचाना है तो यहां ना केवल सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, इसे आसपास के कम से कम सौ किलोमीटर के सभी षहर कस्बों में भी वही मानक लागू करने होंने जो दिल्ली षहर के लिए हों। अब करीबी षहरों की बात कौन करे जब दिल्ली में ही जगह-जगह चल रही ग्रामीण सेवा के नाम पर ओवर लोडेड  वाहन, मेट्रो स्टेषनों तक लोगों को ढो ले जाने वाले दस-दस सवारी लादे तिपहिएं ,पुराने स्कूटरों को जुगाड के जरिये रिक्षे के तौर पर दौड़ाए जा रहे पूरी तरह गैरकानूनी वाहन हवा को जहरीला करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सनद रहे कि वाहन सीएजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा। यदि दिल्ली को एक अरबन स्लम बनने से बचाना है तो इसमें कथित लोकप्रिय फैसलों से बचना होगा, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है यहां बढ़ रही आबादी को कम करना। इसे अलावा दिल्ली में कई स्थानों पर सरे राह कूड़ा जलाया जा रहा है जिसमें घरेलू ही नहीं मेडिकल व कारखानों का भयानक रासायनिक कूड़ा भी हे। ना तो इस महानगर व उसके विस्तारित शहरों के पास कूड़ा-प्रबंधन की कोई व्यवस्था है और ना ही उसके निस्तारण का। सो सबसे सरल तरीको उसे जलाना ही माना जाता हे। इससे उपजा धुओं पराली से कई गुना ज्यादा है। 




सनद रहे कि इतनी बड़ी आबादी के लिए चाहे मेट्रो चलाना हो या पानी की व्यवस्था करना, हर काम में लग रही उर्जा का उत्पादन  दिल्ली की हवा को विषैला बनाने की ओर एक कदम होता है। यही नहीं आज भी दिल्ली में जितने विकास कार्यों कारण जाम , ध्ूाल उड़ रही है वह यहां की सेहत ही खबरा कर रही है, भले ही इसे भविश्य के लिए कहा जा रहा हो। लेकिन उस अंजान भविश्य के लिए वर्तमान बड़ी भारी कीमत चुका रहा है। दिल्लीवासी इतना प्रदूषण ख्ुाद फैला रहे हें और उसका दोष किसानों पर मढ़ कर महज खुद को ही धोखा दे रहे हैं। बेहतर कूड़ा प्रबंधन, सार्वजनिक वाहनों को एनसीआर के दूरस्थ अंचल तक पहुंचाने, राजधानी से भीड़ को कम करने के लिए यहां की गैरजरूरी गतिविधियों व प्रतिष्ठानों को कम से कम दो  सौ किलोमीटर दूर शिफ्ट करने , कार्यालयों व स्कूलों के समय और उनके बंदी के दिनों में बदलाव जैसे दूरगामी कदम ही दिल्ली को मरता शहर बनाने से बचा सकते हैं। 

विडंबना है कि सरकारें  नारे तो लगाती हैं, अपना चेहरा चमकाने के लिए विज्ञापन देती हैं लेकिन  किसी भी कड़े निर्णय लेने या दूरगामी योजना से  मुंह चुराती हैं और यह केवल अस्पताल और दवा विक्रेतओं का हित सााधने वाली साजिष ही प्रतीत होता है। 




मंगलवार, 16 नवंबर 2021

Chldren books translation in tribal languages of Jharkhand

 झारखंड की भाषाओं का संरक्षण

सुदूर आंचलिक व अपनी आदिम परंपराओं के साथ जी रही कई जनजातियों पर जंगल नष्ट , जीवकोपार्जन के पारंपरिक साधन समाप्त होने, शहरीकरण, बेहतर स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधा के अभाव के चलते अस्तित्व का संकट है.




वे न तो कोई लेखक थे और न ही अनुवादक, न ही साहित्यकार या प्राध्यापक. बस वे अपने पुरखों से मिली थाती- इन भाषाओं को अपने मन-वचन-कर्म में रोज जीते हैं. ऐसे ही समाज के लोगों को सरकार ने ‘पीवीजीटी’ घोषित कर दिया है, अर्थात् ऐसी जनजातियां जिनकी आबादी तेजी से घट रही है. जाहिर है कि आबादी घटने के साथ उनकी भाषा, संस्कृति, लोक-मान्यताएं, भोजन आदि पूरी संस्कृति पर संकट मंडराने लगता है. ऐसी पांच भाषाओं के ठेठ ग्रामीण लोग रांची के डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान (टीआरआइ) में एकत्र हुए.उन्हें बुलाया शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नयी दिल्ली ने. पांच भाषाओं- बिरहोरी, माल्तो, असुरी, बिरजिया और भूमिज के दो-तीन जमीनी विशेषज्ञ एक साथ बैठे, तो तीन दिन में न केवल बच्चों की रंग-बिरंगी तीन-तीन पुस्तकों का अनुवाद कर दिया, बल्कि उनकी टाइपिंग, प्रूफ करेक्शन और डमी बनाने का काम भी कर दिया गया. इन पुस्तकों का प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया है. इनमें से कुछ भाषाओं में तो यह पहली मुद्रित पठन सामग्री है. हाल ही में झारखंड सरकार ने कोई एक करोड़ रुपये खर्च कर इन पुस्तकों को दूरस्थ अंचल तक के बच्चों को पहुंचाना सुनिश्चित किया है

आमतौर पर हिंदी में जिन भाषा-बोलियों के अनुवाद, शब्दों के आदान-प्रदान और हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए आदिवासी बोलियों से शब्द उधार लेने की परंपरा रही है वे बोली-भाषाएं भारोपीय परिवार से ही रही हैं. झारखंड में सांस्थानिक स्तर पर द्रविड़ और आस्ट्रो-एशियाई परिवार की भाषा-बोलियों को करीब लाने का कार्य गत दो वर्षों से चल रहा है और इसमें केंद्र सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट व राज्य सरकार के टीआरआइ दो कार्यशालाओं के माध्यम से 10 भाषाओं में बाल साहित्य की पचास से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन कर चुके हैं.

शुरुआत में झारखंड में व्यापक रूप से बोली जाने वाली पांच भाषाओं- संताली, कुड़ुख, हो, खड़िया और मुंडारी भाषा में किया गया. चूंकि, इन भाषाओं में कई प्राध्यापक, उच्च शिक्षित और अनुभवी लोगों के साथ नयी पीढ़ी भी शामिल थी, सो महज तीन दिवसीय कार्यशाला में 35 पुस्तकों का अनुवाद, संपादन, टाइपिंग और डमी बना दी गयी. इनमें तीन-तीन अनुवादक और दो-दो भाषा विशेषज्ञ प्रत्येक भाषा से आये, तो संपादन व भाषा को संवारने के काम में समय नहीं लगा.

अनुवाद की असली चुनौती पीवीजीटी भाषाओं को लेकर थी जहां भाषा को व्यवहार में तो लाया जा रहा था, लेकिन उसकी लिखित सामग्री प्रायः उपलब्ध नहीं थी. कुछ भाषाओं में चर्च द्वारा विकसित भाषा की छोटी-मोटी डिक्शनरी अवश्य थी. असुरी जैसी बोली के अनुवादक के लिए तो लिखना भी कठिन था. वे मौखिक अनुवाद करते, फिर उसे बड़े अक्षर में लिखा जाता और फिर वे उसमें संशोधन करते.

इस कार्यशाला से उपजे आत्मविश्वास ने इन ‘अनजान-भाषा विशेषज्ञों’ में इतना आत्मविश्वास भर दिया कि अब टीआरआइ ने इनकी मदद से इन पांच भाषाओं में व्याकरण, गद्य और पद्य की ऐसी पुस्तकें विकसित कर दी हैं, जिनका इस्तेमाल स्कूल व नौकरी की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी किया जा सकता है. विदित हो कि झारखंड सरकार ने पीवीजीटी भाषाओं को विभिन्न नौकरियों की परीक्षा के लिए भी मान्यता दे दी है.

इस तरह झारखंड की भाषाओं को बच्चों तक आकर्षक तरीके से पहुंचाने के महायज्ञ का प्रारंभ दो साल पहले टीआरइ और नेशनल बुक ट्रस्ट के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन से हुआ था. इसके तहत झारखंड के बच्चों के लिए उनकी सभी भाषाओं में साहित्य उपलब्ध करवाने, टीआरआइ के चुनिंदा शोध को पुस्तक के रूप में हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में ले कर आने और रांची में नेशनल बुक ट्रस्ट के पुस्तक बिक्री केंद्र की स्थापना का कार्य किया जा रहा है. इसी समझौते के अनुरूप इन दिनों टाना भगत या असुर जनजाति जैसे विषयों पर झारंखड की जनजातियों से जुड़े छह विषयों पर हिंदी अनुवाद का कार्य भी चल रहा है.

झारखंड में वैसे तो 32 भाषाएं हैं, लेकिन जिन जनजाति समुदायों के लोग अच्छी सरकारी नौकरियों में आ गये, आज उन्हीं भाषाओं का बोलबाला है. सुदूर आंचलिक व अपनी आदिम परंपराओं के साथ जी रही कई जनजातियों पर जंगल नष्ट होने, जीवकोपार्जन के पारंपरिक साधन समाप्त होने, शहरीकरण, बेहतर स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधा के अभाव के चलते अस्तित्व का संकट है. इस तरह से अनुवाद का कार्य एक तो बच्चों में अपनी भाषाई अस्मिता को सहेज कर रखने का भाव पैदा करता है, दूसरा यह उन भाषाओं का दस्तावेजीकरण भी है ताकि इनके मूल स्वरूप की बानगी भी रहे.

तेजी से हो रहे पलायन व त्वरित संचार के युग में किसी भी भाषा में अन्य का मिश्रण होने में समय नहीं लगता है. आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों की जो 50 पुस्तकें तैयार हो गयी हैं उन्हें दूरस्थ अंचलों तक पाठकों तक पहुंचाने के लिए समाज और सरकार दोनों त्वरितता से काम करें. साथ ही, अन्य लुप्त होती भाषाओं के दस्तावेजीकरण के लिए भाषा के मानक, शब्दावली आदि पर काम हो.

CNG is also unable to stop pollution, its serious side effects on human health

  प्रदूषण को थामने में CNG भी असमर्थ, मानव स्वास्थ्य पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव पंकज चतुर्वेदी।  हर साल की तरह हांफती-घुटती दिल्ली में एक चुप ...