pankajbooks(pankaj chaturvedi)पंकज चतुर्वेदी

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

बुधवार, 18 मई 2022

fire is a good friend but a very bad master

 आग से बेपरवाह क्यों हैं

पंकज चतुर्वेदी




दिल्ली  के मुंडका में एक व्यावसायिक  परिसर में एक इलेक्ट्रानिक कंपनी के कर्मचारियों के लिए मोटिवेषन लेक्चर चल रहा था । अचानक  लाईट गई, जनरेटर चलते ही पूरी इमारत आग का गोला बन गई। जब तक सरकार चेतती कि  भवन भी अवैध था और उसमें आग से बचाव के उपाय थे ही नहीं, तीस लोग मारे जा चुके थे। उनके शरीर इतने बुरे जले हैं कि मृतकों की पहचान नहीं हो पा रही।  इतना हल्ला हुआ लेकिन ना तो दिल्ली में आग रूकी और ना ही लापरवाही। उसके बाद भी हर दिन किसी कारखाने में आग लगती रही और वही गलतियों दोहराती दिखीं। है। यह समझना जरूरी है कि आग एक अच्छी दोस्त है लेकिन बहुत बुरी मालिक, यानि यदि आग आप पर बलवती हो गई तो उसे दूरगामी दुष्प्रभावों से जूझना बहुत कठिन होता है।

आग के प्रति कोताही का जब यह हाल दिल्ली का है तो समझ सकते हैं कि सुदूर अंचलों में लोग किस तरह आग से खेलते होंगे। देश के कई अन्य अग्निकांडों को भी देखें तो पाएंगे कि इन हादसों को असल में इंसान ने खुद ही बुलाया था - लापरवाही में, ज्यादा पैसे कमाने के लालच में और सतर्कता के अभाव के माध्यम से। जान लें कि आग लगने से जान-माल का नुकसान तो होता ही है, जो लोग इस हादसे में घायल हो जाते हैं उनका इलाज भी बेहद महंगा होता



हाल की घटनांओं को फौरी तार पर देखें तो हर एक अग्निकांड का कारण मानवजन्य लापरवाही ही हैं अतिक्रमण, अवांछित निर्माण और सुरक्षा के उपायों को पूरी तरह नजरअंदाज करना । ऐसी लापरवाही जिससे बगैर किसी खास प्रयुक्ति के भी बचा जा सकता है। अपने दैनिक जीवन में हम यदि कुछ मामूली सावघानियां बरतें तो ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सकता है । इससे कई लोगों का जीवन बचाया जा सकता है । दिल्ली या अन्य नगरों की बात करें या खलिहान में रखी सूखी फसल में आग लगने की, अधिकांश मामलों में बिजली के उपकरणों क्रे प्रति थोड़ी सी लापरवाही ही बड़े अग्निकांड में बदलती दिखती हैं। उसके बाद तबाही के अलावा कुछ नहीं बचता।

विश्व में जलने के मामलों में सबसे अधिक संख्या संभवतया भारत की है । यह चिंता का विषय है कि दुनिया के कुल जलने के मामलों में भारत का हिस्सा एक तिहाई है । जहां विकसित देशों में जलने के मामले लगातार कम होते जा रहे हैं, वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है । यह गहरी चिंता का विषय है । एक अनुमान है भारत में हर साल लगभग 30 लाख लोग जलने की घटनाओं के शिकार होते हैं । । इनमें से कोई पांचवा हिस्सा ही अस्पताल तक पहुंचता है और विडंबना है कि इनके एक तिहाई मौत की चपेट में आ जाते हैं । जबकि इतने ही लोग विकलांग हो जाते हैं । ऐसी घटनाओं के शिकार 80 प्रतिशत लोग अपने जीवन के सबसे सक्रिय काल यानि 15 से 35 साल आयु के होते हैं। इनमें बच्चे या महिलाओं की बड़ी संख्या होती है । जलने की आठ फीसदी दुर्घटनाएं घर पर ही घटित होती हैं ।



जले हुए लोगों का इलाज बेहद खर्चीला और लंबे समय तक चलता है । यही नहीं देश में सभी जगह इसके उचित इलाज की व्यवस्था भी नहीं हैं । अपने दैनिक जीवन में हम यदि कुछ मामूली सावघानियां बरतें तो ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सकता है । इससे कई लेगों का जीवन बचाया जा सकता है ।

चिकित्सा विज्ञान में अधिकांश बीमारियों के इलाज के लिए दवाईयां या शल्य का प्रावधान है । आग से हुई चोटों का भी इलाज होता है, लेकिन दुर्भाग्य है कि कोई भी इलाज शरीर को असली आकार या रंग लौटाने में सक्षम नहीं है ।  कई बार जब शरीर का बड़ा हिस्सा जल जाता है तो रेगी की मृत्यु हो जाती है । जले हुए रोगियों की बड़ी संख्या चेहरे या शरीर के अन्य हिस्सों में विकृति का शिकार बन जाती है ।  कई बार शरीर का कोई हिस्सा बकाया जीवन के लिए बेकार हो जाता है ।

जलने के कारण  पीड़ित मरीज पर कई मनोवैज्ञानिक व सामाजिक प्रभाव भी होते हैं । करीबी रिश्तेदार कई बार अलग तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और मरीज को बोझ मानते हैं। कई बार माता-पिता भारी आर्थिक बोझ के तले दब जाते हैं । कुछ लोग खुलेआम विकलांग बच्चों को  अस्वीकार कर देते हैं । कई बार जले हुए पीड़ित को विकृति और कुरूपता के कारण अपने भाई-बहन और हमउम्र दोस्तों से उपेक्षा झेलनी पड़ती है । जाहिर है कि जिस बात से आसानी से बचाव किया जा सकता है, कई बार उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है ।



आग से बचने का सबसे सटीक उपाय है सतर्कता और जागरूकता। कुछ बातें सभी को गांठ बांध कर रखना चाहिए, जैसे कि आग तेजी से फैलती है । एक छोटी सी चिंगारी महज 30 सेकंड में काबू से बाहर हो जाती है तथा विकराल आग का रूप ले सकती है । कुछ मिनटों में ही घर में गहरा काला धुंआ भर सकता है । आग की लपटें थोड़ी ही देर में किसी घर को निगल लेती है । दूसरा. आग गरम होती है और गरमी अकेले ही जानलेवा होती है । आग लगने की दशा में कमरे का तापमान पैरों के पास 100 डिगरी और आंखों तक आते-आते 600 डिगरी हो जाता है । इतनी गरम हवा में सांस लेने से फैंफड़े झुलस सकते हैं । मुंडका में कुछ इसी तरह लोगों की मौत हुई थी। कुछ ही मिनटों में कमरा गरम भट्टी बन जाता है।, जिसमें प्रत्येक वस्तु सुलग उठती है । आग की शुरूआत तो रोशनी से होती है, लेकिन जल्दी ही इससे निकलने वाले काले घने धुएं के कारण अंधेरा छा जाता है। आग की लपटों से कहीं अधिक उसके धुएं और जहरीली गैसों से जान-माल का नुकसान होता है । प्राणदायक आक्सीजन गैस के कारण आग का फैलाव होता है और इससे धुआं व घातक गैसे निकलती हैं । धुंए या जहरीली गैस की यदि थोड़ी सी मात्रा भी सांस के साथ भीतर चली जाए तो आप निढ़ाल, बैचेन हो सकते हैं च सांस लेने में परेशानी हो सकती है । कई बार तो आग की लपटें आप तक पहुंचे उससे पहले ही रंगहीन, गंधहीन धुआं आपको गहरी नींद में ढकेल सकता है।



ऐसे हादसे आमतौर पर भीड़ भरे संकरे स्थानों पर घटित होते हैं , जैसे कि स्कूल, कालेज, बाजार, सिनेमा हॉल , शादी के मंडप, अस्पताल, होटल, रेलवे स्टेशन, कारखाने, सामुदायिक भवन, धार्मिक समागम आदि ।

आग लगने की 60 प्रतिशत घटनाओं के मूल में बिजली के साथ बरती जाने वाली लापरवाही होती हैं , इनमें शार्ट र्सिर्कट, ओवर हीटिंग, ओवर लोडिंग, घटिया उपकरणों का इस्तेमाल, बिजली की चोरी, गलत तरीके से की गई वायरिंग, लापरवाही, आदि आम हैं। यदि दिशा-निर्देशों का सही तरीके से पालन ना किया जाए तो भयानक आग व बड़ी दुर्घटना घटित हो सकती है । थोड़ी सी सावधानी बरतने पर ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है । बिजली से लगने वाली आग ,विशेषरूप से बड़े भवनों में बहुत तेजी से फैलती है , जिसके कारण जान-माल की बड़ी हानि हो सकती है। अतः यह जरूरी है कि आग लगने पर त्वरित कार्यवाही की जाए ।

अग्निशमन विशेषज्ञ यह बात स्वीकारते हैं कि हमारे देश में होने वाली असामयिक मृत्यु के कारणों में आग सबसे बड़ा कारक है । जले हुए लोगों का उपचार करना बेहद खर्चीला व बहुत समय खपाने वाला कार्य है । आग से बचाव के उपायों का क्रियान्वयन, जले हुए लोगों के इलाज के लिए अस्पताल बनाने से कम खर्चीला व सरल होता है । थोड़ी सी सावधानी, लोगों की जागरूकता और सामान्य सा प्रशिक्षण हमारे देश को आग की घटनाओं से मुक्त देश बना सकता है । यही नहीं अग्निशमन जैसे विभाग आग लगने पर जिस तत्परता से काम करते हैं और कई बार आग से जूझने में अपने साथियों को भी गंवा देते हैं, उससे बेहतर हो कि कोई हादसा होने से पूर्व ही सार्वजनिक स्थानों पर आग की संभावनओं को शून्य करने पर अधिक ध्यान दें। एक बात और हमारी सड़कें व सार्वजनिक स्थल फायरब्रिगेड की गाडियों के आवागमन और उनके उपकरणों के ठीक तरह इस्तेमाल के अनुकूल नहीं हैं। हम लोग देरी के लिए अग्निशमन को कोसते हैं, असल में उस देरी के पीछे भी वही कारण होते हैं जो आग लगने के - अतिक्रमण , अवैध निर्माण और कोताही। आज अनिवार्य है कि आग के कारणो के प्रति  लापरवाहियां को ले कर समाज में भी नियमित विमर्श और सतर्कता हो।

 

मंगलवार, 17 मई 2022

Amrit pond can make India self-dependent on water

 अमृत  तालाब बना सकते हैं भारत को पानीदार

पंकज चतुर्वेदी



भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में भले ही खेती-किसानी का योगदान महज 17 फीसदी हो लेकिन आज भी यह रोजगार मुहैया करवाने का सबसे बड़ा माध्यम हे। ग्रामीण भारत की 70 प्रतिशत आबादी का जीवकोपार्जन खेती-किसानी पर निर्भर है।  लेकिन दुखद पहलु यह भी है कि हमारी लगभग 52 फीसदी खेती इंद्र देवता की मेहरबानी पर निर्भर है। महज 48 फीसदी खेतों को ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है और इसमें भी भूजल पर निर्भरता बढ़ने से बिजली, पंप, खाद, कीटनाशक के मद पर खेती की लागत बढ़ती जा रही है। एक तरफ देश की बढ़ती आबादी के लिए अन्न जुटाना हमारे लिए चुनौती है तो दूसरी तरफ लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही खेती-किसानी को हर साल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।  अब यह किसी से छुपा नहीं है कि सिंचाई की बड़ी परियोजनाएं  लागत व निर्माण में गने वाले समय की तुलना में कम ही करगर रही हैं। ऐसे में समाज को सरकार ने अपने सबसे सशक्त पारंपरिक जल-निधि तालाब की ओर  आने का आह्वान किया है।  आजादी के 75 साल के अवसर पर देश के हर जिले में  75 सरोवरों की येजना पर काम हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव अब सभी के सामने है, मौसम की अनिश्तिता और चरम हो जाने की मार सबसे ज्यादा किसान पर है। भूजल के हालात पूरे देश में दिनों-दिन खतरनाक होते जा रहे हैं। उधर बड़े बांधों के असफल प्रयोग  और कुप्र्रभावों के चलते पूरी दुनिया में इनका बहिष्कार हो रहा है। बड़ी सिंचाई परियोजनाएं एक तो बेहद महंगी होती हैं, दूसरा उनके विस्थापन व कई तरह की पर्यावरणीय समस्याएं खड़ी होती हैं। फिर इनके निर्माण की अवधि बहुत होती है। ऐसे में खेती को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए भारतीय समाज को डअपनी जड़ों की ओर लौटना होगा- फिर से खेतों की सिंचाई के लिए तालाबों पर निर्भरता। यह जमीन की नमी सहेजने सहित कई पर्यावरणीय संरक्षण के लिए तो सकारात्मक है ही, मछली पालन, मखाने, कमल जैसे उत्पादों के उगाने की संभावना के साथ किसान को अतिरिक्त आय का जरिया भी देता है। तालाबा को सहेजने और उससे पानी लेने का व्यय कम है ही। यही नहीं हर दो-तीन साल में तालाबों की सफाई से मिली गाद बेशकीमती खाद के रूप में किसान की लागत घटाने व उत्पादकता बढ़ाने का मुफ्त माध्यम अलग से है।

आजादी के बाद सन 1950-51 में लगभग 17 प्रतिशत खेत(कोई 36 लाख हैक्टेयर) तालाबों से सींचे जाते थे। आज के कुल सिंचित क्षेत्र में तालाब से सिंचाई का  रकवा घट कर 17 लाख हैक्टेयर अर्थात महज ढाई फीसदी रह गया है। इनमें से भी दक्षिणी राज्यों ने ही अपनी परंपरा को सहजे कर रखा। हिंदी पट्टी के इलाकों में तालाब या तो मिट्टी से भर कर उस पर निर्माण कर दिया गया या फिर तालाबों को घरेलू गंदे पानी के नाबदान मे बदल दिया गया। यह बानगी है कि किस तरह हमो किसानों ने सिंचाई की परंपरा से विमुख हो कर अपने व्यय, जमीन की बर्बादी को आमंत्रित किया।

तालाब केवल इस लिए जरूरी नहीं हैं कि वे पारंपरिक जल स्त्रोत हैं, तालाब पानी सहेजते हैं, भूजल का स्तर बनाए रखते है, धरती के बढ़ रहे तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और उससे बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है। सन 1944 में गठित फेमिन इनक्वायरी कमीशन ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई । आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देश के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे । मछली,कमल गट्टा , सिंघाड़ा ,कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी - यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  ।

जरा सोचें देश के कुल 773 जिलों मे यदि योजना  सफल हो गई तो 57,975  तालाब होंगे। यदि प्रत्येक तालबा औसतन एक हैक्टर और दस फुट गहराई का भी हुआ तो 60 हर हैक्टर के ऐसी जल निधियां होंगी जो बरसात की हर बूंद को अपनी गोदी में सहेज लेंगी। एक हैक्टर यानी 10 हजार मीटर, दस  फुट यानी 3.048 मीटर, हर तालाब  की क्षमता  30 हजार वर्ग मीटर । एक हजार लीटर जल यानी एक क्यूबिक मीटर -जाहिर है कि हर तालाब में 30 हजार क्यूबिक मीटर जल होगा और सभी 57 हजार सरोवर सफल हुए तो  हम पानी पर पूरी तरह स्थानीय स्तर पर आत्म निर्भर बन सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि हमारे देश में औसतन 1170 मिमी पानी सालाना आसमान से नियामत के रूप में बरसता है।  देश में कोई पांच लाख 87 हजार के आसपास गांव हैं।  यदि औसत से आधा भी पानी बरसे और हर गांव में महज 1.12 हैक्ेयर जमीन पर तालाब बने हों तो  देश की कोई एक अरब 30 करोड़ ़ आबादी के लिए पूरे साल पीने, व अन्य प्रयोग के लिए 3.75 अरब लीटर पानी आसानी से जमा किया जा सकता है। एक हैक्टेयर जमीन पर महज 100मिमी बरसात होने की दशा में 10 लाख लीटर पानी एकत्र किया जा सकता है। देश के अभी भी अधिकांश गांवों-मजरों में पारंपरिक तालाब-जोहड़, बावली, झील जैसी संरचनांए उपलब्ध हैं- जरूरत है तो बस उन्हें करीने से सहेजने की और उसमें जमा पानी को गंदगी से बचाने की। ठीक इसी तरह यदि इतने क्षेत्रफल के तालाबों को निर्मित किया जाए तो किसान को अपने स्थानीय स्तर पर ही सिंचाई का पानी भी मिलेगा। चूंक तालाब लबालब होंगे तो जमन की पर्याप्त नमी के कारण सिंचाई-जल कम लगेगा, साथ ही खेती के लिए अनिवार्य प्राकृतिक लवण आदि भी मिलते रहेंगे।

यदि देश में खेती-किसानी को बचाना है, अपनी आबादी का पेट भरने के लिए विदेश से अन्न मंगवा कर विदेशी मुद्रा के व्यय  से बचना है, यदि शहर की ओर पलायन रोकना है तो जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तालाबों की ओर लौटा जाए। खेतों की सिंचाई के लिए तालाबों के इस्तेमाल को बढ़ाया जाए और तालाबों को सहेजने के लिए सरकारी महकमों के बनिस्पत स्थानीय समाज को ही शामिल किया जाए।

 

 

African locusts can attack

 हमला कर सकते हैं अफ़्रीकी टिड्डे

पंकज चतुर्वेदी

 


संयुक्त राष्ट्र  के खाद्य एवं कृषि  संगठन(एफएओ) के मई-2022 के पहले हफ्ते के बुलेटिन में बताया गया है कि  फरवरी-मार्च में पाकिस्तान के बलुचिस्तान इलाके के ग्वादर जिले में टिड्डियों ने जो अंडे दिए थे,  वे अब वयस्क बन गए हैं। इसी तरह मार्च में ही ईरान में भी टिड्डी दल ने  बच्चे दिए हैं। हालांकि अभी ये लाखों ट्ड्डि-दल एकल अर्थात सॉलिटरी अवस्था में हैं, लेकिन एक प्रबल संभावना है कि जैसे ही भारत में मानूसन सक्रिय हुआ और रेगिस्तान में रेत के धारों में तरावट आई, हमारी हरियाली को अफ्रीकी टिड्डों का ग्रहण लग सकता है। इन दिनों भारत-पाकिस्तान की सीमा पर हजारों किलोमीटर में फैले रेगिस्तान में अंधड़ चलने लगे हैं और इस रेतीले बवंडर के साथ बह कर आ रहे टिड्डों के गिरोह भारत के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहे हैं। अंधड़ के साथ उड़ने से टिड्डी दल आसानी से इस तरफ आ जाते हैं। उधर सूडान से खबर है कि नार्थ  दारफूर में इन टिड्डी दलों ने नुकसान करना शुरू  कर दिया है।

ऐसा आमतौर पर होता रहता है और पाकिस्तान सरकार जानबूझ कर इसकी माकूल जानकारी हमारे देश  को देती नहीं है।। राजस्थान सरकार के दस्तावेज बताते हैं कि मई-2019 से फरवरी 2020 तक  पाकिस्तान से आए टिड्डी दल  ने सात जिलों में कोई एक हजार करोड़ का नुकसान किया था। बाडमेर में 22 हजार हैक्टर, जेसलमेर में 75 हजार , जोधपुर में 4500 हैक्टर खेतों सहित कुल 2.25 लाख हैक्टर की खड़ी फसल टिड्डी दल ने चबाई थी। टिड्डी दल का बड़ा हमला आखिरी बार 1993 में यानि 29 साल पहले हुआ था।

सोमालिया जैसे उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी देशों  से ये टिड्डे बारास्ता यमन, सऊदी अरब और पाकिस्तान भारत पहुंचते रहे हैं । विश्व  स्वास्थ संगठन ने स्पष्ट  चेतावनी दी है कि यदि ये कीट एक बार इलाके में घुस गए तो इनका प्रकोप कम से कम तीन साल जरूर रहेगा । अतीत गवाह है कि 1959 में ऐसे टिड्डों के बड़े दल ने बीकानेर की तरफ से धावा बोला था, जो 1961-62 तक टीकमगढ़(मध्यप्रदेश ) में तबाही मचाता रहा था । इसके बाद 1967-68, 1991-92 में भी इनके हमले हो चुके हैं। अफ्रीकी देशों  में महामारी के तौर पर पनपे टिड्डी दलों के बढ़ने की खबरों के मद्देनजर हमें  कड़़ी सतर्कता बरतनी होगी।

विश्व  स्वास्थ संगठन ने स्पश्ट चेतावनी दी है कि यदि ये कीट एक बार इलाके में घुस गए तो इनका प्रकोप कम से कम तीन साल जरूर रहेगा । हमारी फसल और जंगलों के दुश्मन  टिड्डे, वास्तव में मध्यम या बड़े आकार के वे साधारण टिड्डे(ग्रास होपर) हैं, जो हमें यदा कदा दिखलाई देते हैं । जब ये छुटपुट संख्या में होते हैं तो सामान्य रहते हैं, इसे इनकी एकाकी अवस्था कहते हैं । प्रकृति का अनुकूल वातावरण पा कर इनकी संख्या में अप्रत्याषित बढ़ौतरी हो जाती है और तब ये बेहद हानिकारक होते हैं। रेगिस्तानी टिड्डे इनकी सबसे खतरनाक प्रजाति हैं । इनकी पहचान पीले रंग और विषाल झुंड के कारण होती हैं। मादा टिड्डी का आकार नर से कुछ बड़ा होता हैं और यह पीछे से भारी होती हैं। तभी जहां नर टिड्डा एक सेकंड में 18 बार पंख फड्फड़ाता है,वहीं मादा की रफ्तार 16 बार होती हैं । गिगेरियस जाति के इस कीट के मानसून और रेत के घोरों में पनपने के आसार अधिक होते हैं ।

एक मादा हल्की नमी वाली रेतीली जमीन पर ं40 से 120 अंडे देती है और इसे एक तरह के तरल पदार्थ से ढंक देती हैं । कुछ देर में यह तरल सूख कर कड़ा हो जाता है और इस तरह यह अंडों के रक्षा कवच का काम करता हैं। सात से दस दिन में अंडे पक जाते हैं । बच्चा टिड्डा पांच बार रंग बदलता हैं । पहले इनका रंग काला होता है, इसके बाद हल्का पीला और लाल हो जाता हैं । पांचवी कैंचुली छूटने पर इनके रंग निकल आते हैं और रंग गुलाबी हो जाता हैं । पूर्ण वयस्क हाने पर इनका रंग पीला हो जाता हैं । इस तरह हर दो तीन हफ्ते में टिड्डी दल हजारों गुणा की गति से बढ़ता जाता हैं ।

यह टिड्डी दल दिन में तेज धूप की रोशनी होने के कारण बहुधा आकाश में उड़ते रहते हैं और शाम ढलते ही पेड़-पौधों पर बैठ कर उन्हें चट कर जाते हैं । अगली सुबह सूरज उगने से पहले ही ये आगे उड़ जाते हैं । जब आकाश में बादल हों तो ये कम उड़ते हैं, पर यह उनके प्रजनन का माकूल मौसम होता हैं । ताजा शोध  से पता चला है कि जब अकेली टिड्डी एक विषेश अवस्था में पहुंच जाती है तो उससे एक गंधयुक्त रसायन निकलता हैं । इसी रासायनिक संदेश  से टिड्डियां एकत्र होने लगती हैं और उनका घना झुंड बन जाता हैं । इस विषेश रसायन को नश्ट करने या उसके प्रभाव को रोकने की कोई युक्ति अभी तक नहीं खोजी जा सकी हैं । इस बार जो टिड्डी दल भारत में घुसा है वह पूरा वयस्क नहीं है और यह जल्दी उड़ जाता है।

वैसे तो भारत-पाकिस्तान के बीच टिड्डों को रोकने के समझौते हैं और इसकी मीटिंग भी होती हैं, लेकिन इस बार साफ लगता है कि पाकिस्तान ने भारत में टिड्डी हमले को साजिशन अंजाम दिया है। संयुक्त राष्ट्र  के खाद्य और कृशि संगठन(एफएओ ) ने पहले से ही चेता दिया था कि इस बार टिड्डी हमला हो सकता है।  जनवरी-2022 में पाकिस्तान के रेगिस्तानी इलाकों में इनके गुलाबी पंख फड़फडा़ने लगे थे । समझौते के मुताबिक तो पाकिस्तान को उसी समय रासायनिक छिड्काव कर उन्हें मार डालना था लेकिन वह नियमित मीटिंग में झूठे वायदे करता रहा। पाकिस्तान के पास चीन निर्मित 10 एयर ब्लास्ट स्प्रेयर हैं  जिन्हें ट्रक पर फिट किया जा सकता हैं और ये बहुत ही तेज वेग से कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। यदि पाकिस्तान ने इन मशीनों  का इस्तेमाल अंधड़ के समय भारत की तरफ किया तो तेज गति के कारण टिड्डे कम मरेंगे और वे और ज्यादा तेज वेग से हमारे यहां घुसेंगे। वैसे टिड्डों के व्यवहार से अंदाज लगाया जा सकता है कि उनका प्रकोप आने वाले साल में जुलाई-अगस्त तक चरम पर होगा । यदि राजस्थान और उससे सटे पाकिस्तान सीमा पर टिड्डी दलों के भीतर घुसते ही सघन हवाई छिड़काव किया जाए, साथ ही रेत के धौरों में अंडफली नश्ट करने का काम जनता के सहयोग से षुरू किया जाए तो अच्छे मानसून का पूरा मजा लिया जा सकता हैं ।

इसके बारे में भी एफएओ चेता चुका है कि मानसून के साथ इस दल का हमला गुजरात में भुज के आसपास होगा। जाहिर है कि इनसे निबटने के लिए भारत और पाकिस्तान को ही मिलजुल कर ईमानदारी से  सोचना पड़ेगा ।

पंकज चतुर्वेदी

 

मंगलवार, 10 मई 2022

Fishermen are in net of SriLankan line on water

 समुद्री सीमा जानलेवा बन रही है मछुआरों के लिए

पंकज चतुर्वेदी



अप्रेल महीने के शुरूआती दिनों में भारत के बारह  मछुआरे  गलती से श्रीलंका की सीमा में घुस गए और पकड़े गए . उन्हें किलिनोच्ची की अदालत ने एक एक करोड़ के निजी जमानत पर छोड़ने के आदेश देते हुए अगली तारीख  12 मई की लगाई है . जाहिर है की यदि उन मछुआरो की हैसियत एक करोड़ की जमानत देने लायक होती तो वे जान जोखिम में डाल कर गहरे समुद्र में मछली पकड़ने का काम नहीं करते होते . बहरहाल इस पर सियासत जारी है – तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने विदेश मंत्री जय शंकर से इस मसले में दखल दे कर  रिहाई के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया है , वहीं बीजेपी से जुड़े मछुआरों के संगठन की मांग है कि सन 1974 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा एक समझोते के तहत श्रीलंका को सौपे गए पॉक स्ट्रेट में 285 एकड़  के कच्चातीवु  टापू को यदि वापिस लेलिया जाता है तो भारतीय मछुआरों को जाल डालने के लिए अधिक स्थान मिलेगा और वे  श्रीलंका की सीमा में गलती से भी नहीं जायेंगे .

यह सच है की रामेश्वरम के बाद भारतीय मछुआरों को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (आईएमबीएल) लगभग 12 समुद्री माइल्स मिली है , जो की बहुत कम होती है . इसमें भी छोटी नावों के लिए पहले पांच समुद्री माइल्स छोड़े गए हैं। यहाँ पांच से आठ समुद्री माइल्स के बीच का क्षेत्र चट्टानी है और मछली पकड़ने के जाल नहीं बिछाए जा सकते। रामेश्वरम तट से केवल 8-12 समुद्री माइल के बीच लगभग 1,500 मशीनीकृत नौकाओं द्वारा मत्स्य पालन किया जा सकता है। गत एक दशक के दौरान  हमरे तीन हज़ार से ज्यादा मछुआरे श्रीलंका सेना द्वारा पकडे गए , कई को गोली लगी व् मारे गए – सैंकड़ों सालों तक जेल में रहे . इंसान तो वापिस आ भी गए लेकिन उनकी नावें वहीं जब्त रहीं . यह बात सरकारी आंकड़े स्वीकार करते हैं कि  "जनवरी 2015 से जनवरी 2018 के बीच 185 भारतीय नौकाएं श्रीलंका नोसेना ने जब्त कीं , 188 भारतीय मछुआरे मारे गए और 82 भारतीय मछुआरे लापता हैं"

भारत और श्रीलंका  में साझा बंगाल की खाड़ी  के किनारे रहने वाले लाखों  परिवार सदियों से समुद्र  में मिलने  वाली मछलियों से अपना पेट पालते आए हैं। जैसे कि मछली को पता नहीं कि वह किस मुल्क की सीमा में घुस रही है, वैसे ही भारत और श्रीलंका की सरकारें भी तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर समुद्र  के असीम जल पर कैसे सीमा खींची जाए।  हालाँकि दोनों देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा सीमांकन के लिए दो समझौते सन 1974 और 1976में हुए। लेकिन तमिलनाडु के मछुआरे समझौतों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। इसका बड़ा व्यवधान कच्चातीवु द्वीप  है जिसे समझौते के तहत  श्रीलंका को दे दिया गया .  समझौते के मुताबिक़  दोनों देशों के मछुआरे कच्चातीवू का उपयोग आराम करने और अपने जाल  सुखाने के के साथ-साथ वहां सेंट एंथोनी पवित्र स्थान में पूजा कर सकते थे । सन 1983 तक ऐसा होता भी रहा – एक तो उस समय तक भारतीय मछुआरों की संख्या कम थी और जाफना में अशांति भी नहीं थी .

भारत के मछुआरा समुदाय की आपत्ति है कि यह समझोता उनसे पूछे बगैर कर दिया गया . हमारे मछुआरे कहते हैं कि एक तो द्वीप छिन जाने से अब उन्हें अपने तट पर आ कर ही अपने काम करने पड़ते हैं फिर इससे उनका मछली पकड़ने का इलाका भी कम हो गया . जब तब भारतीय मच्छी मार उस तरफ टहल जाते हैं और श्रीलंका की नोसेना उनकी नाव तोड़ देती है , जाल नष्ट कर देती है और कई बार गिरफ्तारी और हमले भी होते हैं

यह भी कड़वा सच है कि जब से शहरी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही बढ़ी है तब से गोदी के कई-कई किलोमीटर तक तेल रिसने ,शहरी सीवर डालने व अन्य प्रदूषणों के कारण समुद्री  जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए बस्तियों, आबादियों और बंदरगाहों से काफी दूर निकलना पड़ता है। जो खुले सागर  में आए तो वहां सीमाओं को तलाशना लगभग असंभव होता है . जब उन्हें पकड़ा जाता है तो सबसे पहले सीमा की पहरेदारी करने वाला तटरक्षक बल अपने तरीके से पूछताछ व जामा तलाशी  करता है। चूंकि इस तरह पकड़ लिए  गए लोगों को वापिस भेजना सरल नहीं है, सो इन्हें स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है। इन गरीब मछुआरों के पास पैसा-कौडी तो होता नहीं, सो ये ‘‘गुड वर्क’’ के निवाले बन जाते हैं। घुसपैठिये, जासूस, खबरी जैसे मुकदमें उन पर होते हैं।

दोनों देशों के बीच मछुआरा विवाद की एक बड़ी वजह हमारे मछुआरों द्वारा इस्तेमाल नावें और तरीका  भी है , हमारे लोग बोटम ट्रालिंग के जरिये मछली पकड़ते हैं, इसमें नाव की तली से वजन बाँध कर जाल फेंका जाता है .अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह से मछली पकड़ने को पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदेह कहा जाता है . इस तरह जाल फैंकने से एक तो छोटी और अपरिपक्व मछलिया जाल में फंसती हैं, साथ ही बड़ी संख्या में ऐसे जल-जीव भी इसके शिकार होते हैं जो मछुआरे के लिए गैर उपयोगी होते हैं . श्रीलंका में इस तरह की नावों पर पाबंदी हैं, वहाँ गहराई में समुद्-तल से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं और इसके लिए नई तरीके की अत्याधुनिक नावों की जरूरत होती है . भारतीय मछुआरों की आर्थिक स्थिति इस तरह की है नहीं कि वे इसका खर्च उठा सकें . तभी अपनी पारम्परिक नाव के साथ भारतीय मछुआर जैसे ही श्रीलंका में घुसता है , वह अवैध तरीके से मछली पकड़ने का दोषी बन जाता है  वैसे भी भले ही तमिल इलम आंदोलन का अंत हो गया हो लेकिन श्रीलंका के सुरक्षा बल भारतीय तमिलों को संदिग्ध नज़र से देखते हैं .

भारत-श्रीलंका जैसे पडोसी के बीच अच्छे द्विपक्षीय संबंधों की सलामती के लिए मछुआरों का विवाद एक बड़ी चुनौतियों है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ सीज़ (यू एन सी एल ओ एस) के अनुसार, किसी देश की आधार रेखा से 12 समुद्री मील की दूरी पर उसका क्षेत्रीय जल माना जाता है. चूँकि हमारे मछुआरों की नावें कई दिनों तक समुद्र में रह कर काम करने लायक नहीं होतीं और वे उसी दिन लौटते हैं सो वे मन्नार की खाड़ी जैसे करीबी इलाकों मने जाते है और यहाँ  कई बार 12 समुद्री मील वाला गणित काम नहीं आता .

वैसे तो एमआरडीसी यानि मेरीटाईम रिस्क रिडक्शन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देश  का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तुओं जैसे- हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना 24 घंटे में ही दूसरे देश  को देना, दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायत मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। समुद्री सीमाई विवाद से सम्बंधित सभी कानूनों का यूएनसीएलओएस में प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उनके दिल से पालन करने की है।

 

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