pankajbooks(pankaj chaturvedi)पंकज चतुर्वेदी

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 13 जून 2021

Aravali saves existence due to court

 अदालत के बदौलत अस्तित्व बचाता अरावली

पंकज चतुर्वेदी 

सात जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट के ओदष के बाद फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में सूरजकुड से सटे खोरी गांव की


कोई साठ हजार आबादी का सोना-खाना सबकुछ छूट गया है। वहां बस डर है, अनष्चितता है और भविश्य का अंदेषा है। मानवीय नजरिये से भले ही यह बहुत मार्मिक लगे कि एक झटके में 80 एकड़ में फैले षहरी गांव के कोई दस हजार मकान तोडे जाने हैं व उसमें रहने वालों को कोई वैकल्पिक आवास व्यवस्था के अनुरोध को भी कोर्ट ने ठुकरा दिया। लेकिन यह भी कड़वा सच है कि राजस्थान के बड़े हिस्से, हरयाणा, दिल्ली और पंजाब को सदियों से रेगिस्तान बनने से रोकने वाले अरावली पर्वत को बचाने को यदि अदालत सख्त नाहो तो नेता-अफसर और जमीन माफिया अभी तक समूचे पहाड़ को ही चट कर गया होता। कैसी विडंबना है कि जिस पहाड़ के कारण हजारों किलोमीटर में भारत का अस्तित्व बचा हुआ है उसको बचाने के लिए अदालत को बार-बार आदेष देने होते हैं। जान लें सन 2016 में ही पंजाब -हरियाणा हाई कोर्ट अरावली पर अवैध कब्जा कर बनाई कालोनियों को ध्वस्त करने के आदेष दे चुका था, उसके बाद फरवरी-2020 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस ओदष को मोहर लगाई थी। प्रषासनिक अमला कुछ औपचारिकता करता लेकिन इस बार अदालत ने छह सप्ताह में वन भूमि पर से पूरी तरह कब्जा हटा कर उसकी अनुपालन रिपोर्ट अदालत में पेष करने का सख्त आदेष देते हुए इसके लिए ुपलिस अधीक्षक को जिम्मेदार अफसर निरूपित किया है। 

यह भी समझना होगा कि अरावली के जंगल में अवैध कब्जा केवल खेरी गांव ही नहीं है, फरीदाबाद में ही हजारों फार्म हाउस भी हैं। पिछले साल लाॅक डाउन के दौरान गुरूग्राम के घाटा गांव में किला नंबर 92 पर कई डंपर मलवा डाल कर कुछ झुग्गियां डाल दी गई थीं। अरावली के किनारे समूचे मेवात में - नगीना, नूह, तावड़ू से तिजारा तक अरावली के तलहटी पर लोगों के अवैध कब्ज हैं और जहां कभी वन्य जीव देखे जाते थे अब वहा खेत-भवन हैं। 

अरावली पर कब्जे हटाने के लिए राज्य सरकारों की कभी ईमानदार मंषा नहीं रही तभी हरियाणा सरकार ने  तीन मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दे कर पर्यावरणीय मंजूरी सहित सभी वैधानिक अनुमति के अनुपालन के साथ अरावली पर्वतमाला में खनन फिर से शुरू करने की मांग की थी। सनद रहे सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई 2002 को अरावली में अवैज्ञानिक तरीके से हो रहे खनन कार्य पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब से हरियाणा से लगते अरावली क्षेत्र में खनन कार्य पूरी तरह बंद है। उसके बाद सन 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इको सेंसिटिव क्षेत्र में सभी प्रमुख और मामूली खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। जान लें कि दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान का अस्तित्व ही अरावली पर टिका है और यदि इससे जुड़ै सरंक्षण के कानूनों में थोड़ी भी ढील दी गई तो भले ही सरकारी खजाने में कुछ धन आ जाए लेकिन तय मानें कि हजारों हैक्टर के कृशि व हरियाली क्षेत्र रेगिस्तान मं बदेल जाएगा। यह भी याद करना जरूरी है कि  सन 2019 के 27 फरवरी को हरियाणा विधानसभा में जो हुआ था उसने अरावली के प्रति सरकारों की संवेदनहीनता जाहिर कर दी थी। बहाना था कि महानगरों का विकास करना है, इस लिए करोड़ों वर्श पुरानी ऐसी संरचना जो कि रेगिस्तान के विस्तार को रोकने से ले कर जैवविधिता संरक्षण तक के लिए अनिवार्य है, को कंक्रीट का जंगल रोपने के लिए खुला छोड़ दिया गया। सनद रहे सन 1900 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने पंजाब लैंड प्रीजर्वेशन एक्ट (पीएलपीए) के जरिए अरावली के एक बड़े हिस्से में खनन व निर्माण जैसी गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। 27 फरवरी को इसी एक्ट में हरियाणा विधानसभा ने ऐसा बदलाव किया कि अरावली पर्वतमाला की लगभग 60 हजार एकड़ जमीन षहरीकरण के लिए मुक्त कर दी गई। इसमें 16 हजार 930 एकड़ गुड़गांव में और 10 हजार 445 एकड़ जमीन फरीदाबाद में आती है। अरावली की जमीन पर बिल्डरों की शुरू से ही गिद्ध दृष्टि रही है। हालांकि एक मार्च को पंजाब भूमि संरक्षण (हरियाणा संशोधन) अधिनियम-2019 पर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए हरियाणा विधान सभा के प्रस्ताव के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेता दिया था कि यदि अरावली से छेड़छाड़ हुई तो खैर नहीं। हालांकि लगता है कि अरावली का अस्तित्व केवल अदालत के बदौलत ही बचा है। इससे पहले राजस्थान सरकार भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन रोकने को ले कर अदालत में बचती दिखी है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानि यूनेप की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाउ या हरियाली वाली जमीन  रेत के ढेर से ढक रही है औा इसका असर एक अरब लेागों पर पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले इलाकों से इतर है। बेहद हौले से और ना तत्काल दिखने वाली गति से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। इस बात पर बहुत कम लोग ध्यान देतें हैं कि भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीशण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है और यह हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसकी सुरक्षा का काम अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। विडंबना है कि बीते चार दषकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है। 

गुजरात के खेड ब्रह्म से षुरू हो कर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देष के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राश्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दषक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग षिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असर में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही। अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेष 07 मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में एमसी मेहता की जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई-कई ओदष आते रहे लेकिन दिल्ली में ही अरावली पहाड़ को उजाड़ कर एक सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रालय की बड़ी आवासीय कालोनी बना दी गई। अब जब दिल्ली में गरमी के दिनों में पाकिस्तान से आ रही रेत की मार व तपन ने तंग करना षुरू किया तब यहां के सत्ताधारियों को पहाड़ी की चिंता हुई। देष में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्ष है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराष-हताष से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।

सितंबर-2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया था कि वह 48 घंटे में अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए। दरअसल राजस्थान के करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था. इसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन को निषिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक, जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया. इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है, जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को मानता है तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चैंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है।

यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिषत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बामुष्किल सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए। सनद रहे अरावली  रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है। अरावली  की प्राकृतिक संरचना नश्ट होने की ही त्रासदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृश्णावति, दोहन जैसी नदियां अब लुप्त हो रही है। वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट की एक सर्वें रिपोर्ट बताती है कि जहां 1980 में अरावली क्षेत्र के महज 247 वर्ग किलोमीटर पर आबादी थी, आज यह 638 वर्ग किलोमीटर हो गई है। साथ ही इसके 47 वर्गकिमी में कारखाने भी हैं। 

सोहना से लेकर महेंद्रगढ़ की कई पहाड़ियां गायब

पिछले कुछ सालों के दौरान वैध एवं अवैध खनन की वजह से सोहना से आगे तीन पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं। होडल के नजदीक, नारनौल में नांगल दरगु के नजदीक, महेंद्रगढ़ में ख्वासपुर के नजदीक की पहाड़ी गायब हो चुकी है। इनके अलावा भी कई इलाकों की पहाड़ी गायब हो चुकी है। रात के अंधेरे में खनन कार्य किए जाते हैं। सबसे अधिक अवैध रूप से खनन की शिकायत नूंह जिले से सामने आती है। पत्थरों की चोरी की शिकायत सभी जिलों में है।

वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला पर है लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षों पहले ही खरीद चुके हैं। वन संरक्षण कानून के कमजोर होते ही सभी अपनी जमीन पर गैर वानिकी कार्य शुरू कर देंगे। फिलहाल वे गैर वानिकी कार्य नहीं कर सकते। जहां पर वन संरक्षण कानून लागू होता है वहां पर सरकार से संबंधित विकास कार्य ही केवल किए जा सकते हैं। सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के रहने के लिए इमारत तक नहीं बना सकते।


शुक्रवार, 4 जून 2021

Corona virus RNA in urban water body " A big threat to human kind


 

कोरोना वायरस का घर बन रहे हैं हमारे नदी-तालाब

 


गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.रमेश चंद्र दुबे अपने शोध से दावा कर चुके हैं कि कुंभ से गंगा में कोरोना वायरस की संभावना बढ़ गई है। उनका कहना है कि जल में कोरोना वायरस लंबे समय तक सक्रिय रहता है और जब मनुष्य उस जल में स्नान करता है तो वह उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। शोध कहता है कि कुंभ में कोरोना फैलाने का सबसे बड़ा कारण संक्रमित साधु-श्रद्धालु का गंगा में स्नान करना रहा। यह संक्रमण क्लेमसियाल निमोनी संक्रमण के साथ मिलकर और घातक साबित हुआ।
 


जब यह खबर सुर्खी बनी कि लखनऊ के सीवरेज में कोरोना वायरस  मिला है, तो हंगामा हो गया। वैसे, शहरों में मल-जल का लापरवाह निस्तारण व बढ़ते मेडिकल कचरे से परिवेश में इस वायरस के होने की संभावना पर दुनियाभर में काम हो रहा है। हैदराबाद की हुसैन सागर व अन्य शहरी झीलों में भी वायरस की जेनेटिक सामग्री मिली है। वैसा ही अध्ययन हैदराबाद के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाके की झीलों में भी हुआ लेकिन वहां यह नहीं मिला। जाहिर है शहर की गैर-शोधित गंदगी के सीधे झीलों में जाने का यह कुप्रभाव है। शोध में कहा गया है कि जो जेनेटिक मैटेरियल मिला हैवो वास्तविक वायरस नहीं। ऐसे में, पानी से चेहरे या मुंह से इंफेक्शन फैलने की गुंजाइश कम है।


काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्चइंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजीसेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी और एकेडमी ऑफ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च ने यह अध्ययन किया जिसमें सात महीने के दौरान भारत में कोविड की दोनों लहरों को कवर किया गया। इसके लिए हैदराबाद की हुसैन सागर और कुछ अन्य झीलों को चुना गया। हुसैन सागर के अलावा नाचारम की पेद्दा चेरुवु और निजाम तालाब में भी वायरस के मैटेरियल मिले। पता चला कि पानी में ये जेनेटिक मैटेरियल इसी साल फरवरी में बढ़ना शुरू हुए जब दूसरी लहर की शुरुआत हुई। ठीक इसी समय घाटकेसर के पास इदुलाबाद के अर्धशहरी इलाके व ग्रामीण अंचल की पोतुराजू झील में भी अध्ययन हुआ और वहां संक्रमण नहीं मिला।



मेडरक्सिव’ शोध पत्रिका में 12 मई को ‘‘ काम्प्रहेन्सिव एंड टेंपोरल सरलिेंस ऑफ सार्स एंड कोविड इन अरबन वाटर बॉडीज: अर्ली सिग्नल ऑफ सेकंड वेव ऑनसेट’’ शीर्षक रिपोर्ट में मनुपति हेमलताअथमकुरी तारकउदय किरण आदि वैज्ञानिकों के दल ने लिखा कि शोध के दौरान जब हैदराबाद की झीलों का अध्ययन किया गया तो पता चला कि कोविडग्रस्त लोगों के घरों व अस्पतालों के मल-जल के बगैर शोधित झीलों में जाने से यह संकट खड़ा हुआ।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.रमेश चंद्र दुबे अपने शोध से दावा कर चुके हैं कि कुंभ से गंगा में कोरोना वायरस की संभावना बढ़ गई है। उनका कहना है कि जल में कोरोना वायरस लंबे समय तक सक्रिय रहता है और जब मनुष्य उस जल में स्नान करता है तो वह उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। संक्रमित व्यक्ति यह संक्रमण तेजी अन्य लोगों में फैला सकता है। प्रो. दुबे का शोध कहता है कि कुंभ में कोरोना फैलाने का सबसे बड़ा कारण संक्रमित साधु-श्रद्धालु का गंगा में स्नान करना  रहा। यह संक्रमण क्लेमसियाल निमोनी संक्रमण के साथ मिलकर और घातक साबित हुआ। दुबे के मुताबिक गंगाजल के इन तीन संक्रमणों को जीवाणु विमोजी यानी बैक्टीरिया फाज नष्ट करता है। परंतु कुंभ में कोरोना संक्रमण को नष्ट करने का काम गंगाजल में मौजूद फाज क्यों नहीं कर पायाइस पर शोध चल रहा है।

इससे पहले अप्रैल महीने में ही रुड़की विश्वविद्यालय के वाटर रिसोर्स डिपार्टमेंट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप शुक्ला और उनके विभागाध्यक्ष डॉ. संजय जैन ने 12 सदस्यों के साथ ठहरे एवं बहते पानी में कोरोना वायरस की सक्रियता अवधि पर शोध किया था। दल का निष्कर्श था कि वायरस सूखे धरातल और धातु की तुलना में नमी और पानी में अधिक सक्रिय रहता है।

संजय गांधी मेडिकल कालेजलखनऊ का माइक्रोबायोलॉजी विभाग पानी में कोरोना वायरस का पता लगाने के लिए सीवेज सैंपल जुटा रहा है। लखनऊ के तीन जगहों से सैंपल लिए गए। लखनऊ में ऐसे तीन जगहें चुनी गईं जहां पूरे मोहल्ले का सीवेज एकसाथ गिरता है। पहला- खदरा का रूकपुरदूसरा- घंटाघर और तीसरा- मछली मोहाल का है। लैब में जांच में रूकपुर खदरा के सीवेज के पानी में वायरस पाया गया। मुंबई में भी ऐसा वायरस मिला है।

फरवरी-2021 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध बताता है कि यह तो कोविड की पहली लहर में भी झलकने लगा था कि जल निधियां कोरोना वायरस के खतरे से अछूती नहीं हैं। सार्स-कोविड-2: कोरोना वायरस इन वाटर एंड वेस्टवाटर: ए क्रिटिकल रिव्यू अबाउट प्रेजेंस एंड कन्सर्न’ में बताया गया है कि चीनजहां से यह शुरू हुआ वहां फौज के अस्पताल- 309 पीएलए और शायो देंग शान अस्पताल के सीवर में पिछले साल ही कोविड के जेनेटिक मटेरियल मिल चके थे और तब से सारी दुनिया में इसपर काम हो रहा था। चीन का दावा था कि 20 डिग्री तापमान पर यह सीवर में दो दिन और चार डिग्री पर 14 दिन सक्रिय रहता है। नीदरलैंड में भी एम्सट्रेडमडेन हैगयूत्रेयय सहित छह शहरों में ऐसा ही परीक्षण हुआ और वहां हवाईअड्डे के पास के सीवरेज में कोरोना के अंश मिले। इटली की लाम्ब्रो नदी में भी यह देखा गया। शोध कहता है कि दुनिया में सबसे पहले इक्वाडोर के क्योटो शहर की नदी में इसके अंष दिखे। यहां गंदा पानी सीधे नदी में डाला जाता है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि खासकर महानगरों के अस्पतालों और घर पर ही एकांतवास कर रहे लोगों के नहानेशौच आदि का पानी उसी नाली से बहा जहां से आम पानी जाता है। यह विषैला जल कैसे जल निधियों में मिल रहा हैउसके लिए दिल्ली के इस आंकड़े पर गौर करें। दिल्ली में औसतन हर दिन 3273 मिलियन लीटर (एममलडी) सीवर का निस्तार होता हैजबकि यहां कुल 2715 एममलडी क्षमता के परिशोधन सयंत्र हैं और इनकी काम करने की  ताकत 2432 एममलडी है। जाहिर है, करीब 800 एममलडी अशोधित जल नदी-तालाबों में मिल रहा है और इनमें संक्रमितों का मल-मूत्र भी है। फिर कोविड के कारण अस्पतालों से निकलने वाले संक्रमित कूड़े की मात्रा बहुत बढ़ गई है। कई अस्पतालों में इनके निबटान की व्यवस्था नहीं है। कई जगह ऐसा कचरा आम घर के कचरे के साथ ढोया जाता है और यह कड़वा सच है कि अधिकांश महानगरों में कूड़े की खंतियां भर गई है व सफाई वाले चोरी-छुपे कूड़े जलातें है या वीरान जल निधियों में ढकेल देते हैं। शोध के दौरान संक्रमित वयस्कों व बगैर लक्षण के कोविडग्रस्त बच्चों के मल के नमूने जांचे गए तो पता चला कि कोरोना वायरस इंसान के गेस्ट्रोइंटाइटिस ट्रैक अर्थात जठरांत्र मार्ग में जगह बना चुका है।

यदि लखनऊ खतरनाक हालत में समाहित हो गया तो मानवता का अस्तित्व ही खतरे में आ जाएगा। इंसान को नुकसान पहुंचाने की ताकत रखने वाला कोरोना वायरस-229 ई 23 डिग्री तापमान पर सात दिन तक पानी में सक्रिय रहता है। जरूरी है कि कोविड अस्पतालों के जल-मल का परिशोधन अस्पताल में ही हो।

 

पंकज चतुर्वेदी


रविवार, 30 मई 2021

negligence in dispose of medical waste enhancing covid infection

 नियमों की अनेदखी से होता है मेडिकल उपकरणों का दुरूपयोग

पंकज चतुर्वेदी




 

कोविड की दूसरी लहर में एक तरफ इलाज के तरीकों को ले कर अनिष्चितता का माहौल है तो यह खतरा भी मंडरा रहा है कि कोरोना वायरस से बचाव  के लिए जो सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल किए जा रहे हैं कहीं वे ही तो संक्रमण बढ़ाने का काम नहीं कर रहे हैं ? पिछले दिनों मध्यप्रदेष के सतना में पीपीई किट गर्म पानी से धोकर दोबारा सप्लाई करने का मामला सामने आया। सबसे दुखद यह है कि यह कुकर्म वह कारखाना कर रहा था जिसके जिम्मे इस्तेमालषुदा पीपीई किट को विधि सम्मत तरीके से निबटान करने की जिम्मेदारी थी। हालांकि इससे पहले गाजियाबाद के लोनी और प्रयागराज से  इस्तेमाल किए गए हैंड ग्लब्स को साफ कर नए की तरह पैक कर बेचने के ाममले भी सामने आए थे, लेकिन यह काम कबाड़ी कर रहे थे। 

कोरोना गाइडलाइन के अनुसार पीपीई किट ग्लब्स और मास्क को वैज्ञानिक तरीके से नष्ट करने के लिए सतना जिले के बड़खेरा में इंडो वाटर बायोवेस्ट डिस्पोजल प्लांट में भेजा जाता था। एक स्थानीय युवक ने जब देखा कि वहां तो नश्ट करने के लिए लाए गए पीपीई किट व ग्लब्स को गरम पानी से धो कर अलग-अलग बंडल बनाए जा रहे हैं व यह सामग्री कई जिलों में कबाड़ी के जरिये औने-पौने दाम पर बेची जा रही है तो उसने इसका वीडियो बना कर वायरह कर दिया। उसके बाद वहां पुलिस पहुंची।  दिल्ली व उप्र के कई ठिकानों पर जब्त किए गए ग्लब्स का वजन 848 किलो था जिनका सौदा कोई 15 लाख रूपए में किया गया था। 

यह देष के लिए बड़ा खतरा है कि कोरोना इलाज के दौरान इस्तेमाल सामग्री के निबटान की  बाकायदा  प्रक्रिया निर्धारित है, इसका कानून भी है इसके बावजद ना तो अस्पतालों में और ना ही मरीजों के घर वालों द्वारा इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार पीपीई किट ग्लब्स और मास्क को एक बार ही इस्तेमाल करना है। इनको सार्वजनिक जगह पर ना फैंक कर बल्कि वैज्ञानिक तरीके से बायोवेस्ट डिस्पोजल प्लांट में नष्ट करना अनिवार्य है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने कोविड-19 कचरे की गंभीरता को समझते हुए कड़े निर्देष दिए थे कि इस्तेमालषुदा मास्क और दस्तानों को काट कर कम से कम 72 घंटे तक कागज के थैलों में रखा जाए । जरूरी नहीं है कि ये मास्क और दस्ताने संक्रमित व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल में लाये गये हों। सीपीसीबी ने शॉपिंग मॉल जैसे वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों और कार्यालयों को भी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) के निपटारे के लिये इसी कार्यप्रणाली का पालन करने का निर्देश दिया है। आम आदमी द्वारा प्रयोग की गई बेकार पीपीई को अलग कूड़े दान में तीन दिन तक रखना चाहिए, उनका निपटारा उन्हें काट कर ठोस कचरा की तरह करना चाहिए। ’’  लेकिन देषभर के ष्मसान घाट हों या अस्पताल के मुर्दाघर , इस तरह की सामग्री का अंबार साफ दिखाता है कि ना तो अस्पताल और ना ही आम लोग सरकारी दिषा निर्देंषों के प्रति गंभीर हैं या  हो सकता है कि उन्हें इसकी जानकारी ही ना हो। यदि सभी संस्थान व व्यक्ति निर्देंषों का पालन करते होते तो ना ही सतान में और ना ही प्रयागराज या और कहीं इतनी बड़ी संख्या में मेडिकल कूडज्ञत्र कबाडियों या इसका दुरूपयोग करने वालों तक पहुंचता । 

सीपीसीबी के निर्देष में कहा गया है कि संक्रमित रोगियों द्वारा छोड़े गये भोजन या पानी की खाली बोतलों आदि को बायो-मेडिकल कचरा के साथ एकत्र नहीं किया चाहिए। पीले रंग के थैले का इस्तेमाल सामान्य ठोस कचरा एकत्र करने के लिये नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह कोविड-19 से जुड़े बायो-मेडिकल कचरा के लिये हैं। सीपीसीबी ने कहा कि कोविड-19 पृथक वार्ड से एकत्र किये गये इस्तेमाल हो चुके चश्मा, चेहरा का कवच, एप्रन, प्लास्टिक कवर, हजमत सूट, दस्ताने आदि पीपीई को अवश्य ही लाल थैले में एकत्र करना चाहिए। दिशानिर्देश में कहा गया है कि इस्तेमाल किये जा चुके मास्क (तीन परत वाले मास्क, एन 95 मास्क आदि) , हेड कवर/कैप आदि को पीले रंग के थैले में एकत्र करना चाहिए। 

बायोमेडिकल वेस्ट अधिनियम-2016 के अनुसार तो इस तरह का सामान अस्पताल से बगैर दिषा निर्देष का पालन किए बाहर ही नहीं आना चाहिए। वैसे तो सभी बड़े अस्पतालों में इस तरह के मेडिकल कचरे को जला कर नश्ट करने की व्यवस्था के भी निर्देष है लेकिन ऐसी व्यवस्था देष के बहुत ही गिनेचुने अस्पतालों में है।

जरा सोचें कि कोई डाक्टर इस्तेमालषुदा ग्लब्स को नया मान कर आपरेषन करने लगे और इसका संक्रमण मरीज के षरीर में पहुंच जाए।  डाक्टर को लगेगा कि मरीज को दी जा रही दवा-इंजेक्षन या एंटी बायोटिक बेअसर है, जबकि असलिसत है कि चिकित्सक को खुद नहीं पता कि किसी अंजान संक्रमण का माध्यम उनके हाथ ही रहे हैं। लगातार दो साल से संक्रामक रोग झेल रहे भारत को अब मेडिकल कचरे का निबटान  नियमानुसार कड़ाई से करना सुष्निचित करना ही होगा  वरना सकंमएा के कारण उनके हाथ में होंगे व उसका  सूत्र और कहीं तलाषा जाता रहेगा। 

 


शुक्रवार, 28 मई 2021

Differentiate between faith and superstition

 आस्था और अंधविश्वास में फर्क करें

पंकज चतुर्वेदी 

 


आंध््रा प्रदेश में नैल्लोर जिले का समुद्र से सटा गुमनाम से एक गांव कृष्णा  पट्नम एक महीने से पूरे इलाके में मशहूर है। यहां दिन हो या रात कई किलोमीटर लंबी लाईनें लगी रहती हैं। कहा गया कि यहां के एक पारंपरिक वैद्य बोनिगी आदंदैया ने कोई दवाई बनाई है जिससे कोरोना ठीक हो जाता है।  शहद, काली मिर्च, काला जीरा, दाल चीनी आदि आदि से निर्मित चार दवाओं में एक आंख में डालने की दवा है जिसको ले कर दावा है कि उससे दिमाग सक्रिय हो जाता है व उससे आक्सीजन की जरूरत कम हो जाती है। यहां अफसर, नेता सभी लाईन में लगे हैं। ना कोई मास्क ना ही सामाजिक दूरी। तमिलनाडु के कोयंबटूर के इरुगुर में कामत्चिपुरी अधीनम नामक मठ ने में तो बाकायदा कोरोना देवी का मंदिर बन गया है। कहानियां बहुत सी हैं लेकिन प्रशासन व स्थानीय चिकित्सा विभाग के पास इसकी सफलता की कोई जानकारी नहीं, ना ही भीड़ जुड़ने से फैल रही बीमारी की परवाह या आंकड़े। 

एक सांसद ने सार्वजनिक कह दिया कि वे गौ मूत्र पीती हैं अतः उन्हें  वैक्सीन की जरूरत नहीं। वे जब बोल रही थीं तो हाथ में दस्ताने व मुंह पर मास्क था। एक मई को ही उन्होंने ट्वीट कर बताया था कि उनका पूरा स्टाफ कोरोना पॉजीटिव है। एक जिम्मेदार मंत्री पापड़ खा कर प्रतिरोध क्षमता विकसित करने का दावा कर देते हैं। कोई ‘गो करोना’ के श्लोक  बोलता हैं। राजस्थान के बड़ी सादड़ी के ग्राम सरथला में भोपों(स्थानीय तांत्रिक) के कहने पर सारा गांव खाली किया गया और फिर गाय के पेशाब में नीम की पत्ती डाल कर शुद्ध  करने के बाद घोशित कर दिया कि अब यहां कोरोना नहीं आएगा।  राजस्थान के ही पानी के गांव-गांव में अफवाह फैला दी गई कि वैक्सिन से विकलांग हो जाते हैं। 

उप्र के गोरखपुर जिले के हर गांव में कोविड के मामले हैं । यहां सहजनवा, कौडीराम, चौरीचोरा, गोला आदि इलाकें के हर गांव में काली माता व डीह बाबा की पूजा हो रही है। औरतें घर से बाहर निकल कर चूल्हा जला कर कढाई चढ़ा रही हैं जिसमें हलुआ-पूड़ी बनता है व प्रसाद के रूप में बंटता हैं। नीम की पत्ती देवी को चढ़ाई जाती है। यहीं प्रतापगढ़ में 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए भीड़ जोड़ी जा रही है। अमेठी के पिंडोरिया गांव में सारा गांव मंदिर में जमा हुआ और घंटे बजाना व नाच-गाना हुआ। काशी के जैन घाट के किनारे और कुशीनगर में हर दिन सैंकड़ों औरतें कोरोना माई कीपूजा के लिए एकत्र हो रही हैं। यही हाल बगल के बिहार के गांवांे में हैं। मप्र का राजगढ़ हो या उप्र का मेरठ, हर जगह एक हाथ ठैली में गोबर के उपलो पर  लोभान कपूर, हवन सामग्री जला कर शहर के शुद्धिकरण के जुलूस निकल रहे हैं। ऐसे ही घटनांए सारे देश में हर जिले में हो रही हैं और समाज और प्रशासन जाने-अनजाने  ना केवल अंधविश्वास की जड़े मजबूत कर रहा है, बल्कि कोविड के विस्तार को हवा दे रहा है। 


हकीकत यही है कि कोविड से जूझने के कोई माकूल तरीके दुनिया के पास हैं नहीं, हमारे डॉक्टर, वैज्ञानिक संभावना और उपलब्ध दवाओं के जरिये इस वायरस के कारण षरीर में उपजे विकारों को ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं। विपदा बड़ी है और साधन सीमित, ऐसे में हर चिकित्सक अपने सारे प्रयासों के बावजूद भगवान या किसी अदृश्य शक्ति  पर भरोसा रखने की ताकीद देता है। जाहिर है कि वह यह सब अपने सभी प्रयासों के बाद मरीज या उनके तीमारदारों की तसल्ली के लिए कहता है लेकिन  आस्था को अंधविश्वास बना देना  और ऐसा अवसर बना देना जो कि कोविड के मूलभूत दिशा-निर्देशों का ही उल्लंधन हो, एक आपराधिक कृत्य माना जाना चाहिए। डाक्टर जानते हैं कि बगैर सकारात्मक कर्म के आस्था का प्रभाव होने से रहा।


गौमूत्र का पान करना निश्चित ही किसी की आस्था का विशय हो सकता है लेकिन इससे कोविड में रेाकथाम करने की बात किसी भी स्तर पर प्रामाणिक नहीं हैं। हवन सामग्री से वायु कितनी शुध्ध  होती है, यह एक अलग मसल है लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि जब कोविडग्रस्त लोगों के फैंफडे हांफ रहे हैं, हवा में अधिक आक्सीजन अनिवार्य है तब किसी भी तरह का धुआं, कोविड या सांस के रोगियों के लिए जानलेवा है। नैल्लोर कीदवा हो या बाबाजी की जब तक सरकार ऐसे गैरवैज्ञानिक प्रयोगों पर कड़ाई से प्रतिवाद नहीं करेगी, अकेले कोविड ही नहीं भविश्य में ऐसी किसी भी परिस्थितिमें आम लोगों को सरकार की वैज्ञानिक कोशिशें पर विश्वास बनेगा नहीं। 

जान लें उप्र के गांवों में जिस तरह संक्रमण फैल रहा है उसमें सामूहिक पूजा के लिए जुट रही भीड़ व उसकी कोताही की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। एक बात और लोगों के आस्थ को अंधविश्वास में बदलने से रोकने के लिए विज्ञान व प्रशासन को भी सतर्क रहना होगा । कभी रेमडेसिवर इंजेक्शन , फिर प्लाज्मा थैरेपी का हल्ला होता है और फिर उसके नकार दिया जाता है। वैक्सिीन से बचाव का जम कर प्रचार होता है और फिर वैक्सीन उपलब्ध ना होने पर लोग परेशान होते हैं। आम लोगो की  आर्थिक स्थिति और अन्य कारणों से इलाज पहुंच में नहीं होता। तब ऐसे लोग हताश हो कर स्थानीय मंदिर, पंडत, गुनिया, ओझा के फेर में फंसते है।ं  जाहिर है कि वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए सरकार को भी ग्रामीण अंचल तक अपनी उपस्थिति को मजबूत करना होगा। 


शुक्रवार, 21 मई 2021

How cyclones are named

 कहीं ‘छिपकली’ ना मचा दे तटीय क्षेत्रों में तबाही 

पंकज चतुर्वेदी 


सोमवार को मुंबई में 11 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जो हवांए चलीं तो सारा शहर  कांप गया, तिस पर भयंकर बरसात हुई। यह तबाही जब गुजरात की तरफ बढ़ी तो 14 लोगों के मारे जाने, कई के घायल होने, सड़कों पर जलभराव, भवनों के गिरने की अनगिनत शिकायतों ने पूरे महानगर को तहस-नहस कर दिया। इससे एक दिन पहले इस समुद्री तूफान ने गोवा में भी दो लोगों की जान ली थी। कर्नाटक में भी पांच लोग मोर गए। केरल में भी खूब नुकसान हुआ। इतना नुकसान करने वाले समुद्री तूफान का नाम हरे रंग की छिपकली पर है। भारत में यह इस साल का पहला समुद्री तूफान है - ‘ताऊकते’ । यह बर्मी भाशा का षब्द है जिसका अर्थ होता है ‘गेको’ प्रजाति की दुर्लभ छिपकली जो बहुत तीखी आवाज में बोलती है। ध्यान रहे समुद्री चक्रवात महज  एक  प्राकृतिक आपदा नहीं है , असल में तेजी से बदल रहे दुनिया के प्राकृतिक मिजाज ने इस तरह के तूफानों की संख्या में इजाफ किया है और इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को नियंत्रित नहीं किया तो साईक्लोंन या बवंडर के चलते भारत के सागर किनारे वालें शहरों में आम लोगों का जीना दूभर हो जाएगा ।

इस तरह के बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालीक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता हेै। भीषण बरसात के कारण बन गए दलदली क्षेत्र, तेज आंधी से उजड़ गए प्राकृतिक वन और हरियाली, जानवरों का नैसर्गिक पर्यावास समूची प्रकृति के संतुलन को उजाड़ देता है। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे वे पलक झपकते नेस्तनाबूद हो जाते हैं। तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी मे खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुए क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है।  


दरअसल तूफानों के नाम एक समझौते के तहत रखे जाते हैं। इस पहल की शुरुआत अटलांटिक क्षेत्र में 1953 में एक संधि के माध्यम से हुई थी। अटलांटिक क्षेत्र में हेरिकेन और चक्रवात का नाम देने की परंपरा 1953 से ही जारी है जो मियामी स्थित नेशनल हरिकेन सेंटर की पहल पर शुरू हुई थी। 1953 से अमेरिका केवल महिलाओं के नाम पर तो ऑस्ट्रेलिया केवल भ्रष्ट नेताओं के नाम पर तूफानों का नाम रखते थे। लेकिन 1979 के बाद से एक नर व फिर एक नारी नाम रखा जाता है। अटलांटिक क्षेत्र में हेरिकेन और चक्रवात का नाम देने की परंपरा 1953 से ही जारी है जिसकी पहल मियामी स्थित नैशनल हरिकेन सेंटर ने की थी। 1953 से अमेरिका केवल महिलाओं के नाम पर तो ऑस्ट्रेलिया केवल भ्रष्ट नेताओं के नाम पर तूफानों का नाम रखते थे। 


कोई सौ साल पहले समुद्री बवडंरों के नाम आमतौर पर रोमन कैथोलिक संतों के नाम पर होते थे। जैसे कि सन 1834 के पड्रे-रुइज़ तूफान का नाम डोमिनिकन गणराज्य में एक कैथोलिक संत के नाम पर रखा गया था, जबकि 1876 में सैन फेलिप तूफान का नाम कैथोलिक पादरी के नाम पर रखा गया था।


भारतीय मौसम विभाग के तहत गठित देशों का क्रम अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षर से तय होते हैं। भारतीय मौसम विभाग द्वारा पिछले साल जारी सूची में ‘ताऊकते’ नाम चौथे स्थान पर था। पिछले साल नवंबर में आए  तूफान को ‘निवार’ नाम ईरान ने दिया हैं। ईरान में निवार नाम से दो ऐसे गांव हैं जिनकी आबादी 50 से भी कम है। उससे पहले आए तूफान का नाम था -फणी, यह सांप के फन का बांग्ला अनुवाद है। इस तूफान का यह नाम भी बांग्लादेश ने ही दिया था। जान लें कि प्राकृतिक आपदा केवल एक तबाही मात्र नहीं होती, उसमें भविष्य के कई राज छुपे होते हैं। तूफान की गति, चाल, बरसात की मात्रा जैसे कई आकलन मौसम वैज्ञानिकों के लिए एक पाठशाला होते हैं। तभी हर तूफान को नाम देने की प्िरक्रया प्रारंभ हुई। विकसित देशो में नाम रखने की प्रणाली 50 के दशक से विकसित है । दुनियाभर में छह क्षेत्रीय मौसम  केंद्र है। जिन्हे आरएसएमसी कहा जाता है, इनमें से एक भारत है।  जबकि पांच ट्रापीकल सायक्लोन वार्निंग सेंटर अर्थात टीसीडब्लूसी हैं। 


भारतीय मौसम विभाग की जिम्मेदारी उत्तर भारतीय सागर, जिसमें बंगाल की खाड़ी व अरब सागर षामिल है, से उठने वाले तूफानों का पूर्वानुमान व सूचना देना है। भारतीय जिम्म्ेदारी में आए 13 देशों के संगठन को डब्लूएमओ/ईएससीए कहते हैं। सन 2004 में भारत की पहल पर आठ देशों द्वारा बनाए संगठन में अब 13 देश हो गए हैं जो चक्रवातों की सूचना एकदूसरे से साझा करते हैं। ये देश हैं - ं भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका, ओमान और थाईलैंड ं,ईरान, कतर, सऊदी अरब, यूएई और यमन । ये देश अपनी तरफ से नाम सुझाते है। जिनकी एक सूची तैयार की जाती है। नाम रखते समय ध्यान रखा जाता है कि वह छोटा सा हो और प्रसारित करने में सहूलियत हो। इस सूची में अगले कुछ नाम है। - यास, गुलाब, षाहीन, जवाद आदि। 

भारतीय मौसम विभाग के तहत गठित देशों का क्रम अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षर से तय होते हैं। जैसे ही चक्रवात इन 13 देशों के किसी हिस्से में पहुंचता है, सूची में मौजूद अलग सुलभ नाम इस चक्रवात का रख दिया जाता है। इससे तूफान की न केवल आसानी से पहचान हो जाती है बल्कि बचाव अभियानों में भी इससे मदद मिलती है। भारत सरकार इस शर्त पर लोगों की सलाह मांगती है कि नाम छोटे, समझ आने लायक, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और भड़काऊ न हों । किसी भी नाम को दोहराया नहीं जाता है। अब तक चक्रवात के करीब 163 नामों को सूचीबद्ध किया जा चुका है। कुछ समय पहले जब क्रम के अनुसार भारत की बारी थी तब ऐसे ही एक चक्रवात का नाम भारत की ओर से सुझाये गए नामों में से एक ‘लहर’ रखा गया था। .इस सूची में शामिल भारतीय नाम काफ़ी आम नाम हैं, जैसे मेघ, सागर, और वायु। चक्रवात विशेषज्ञों का पैनल हर साल मिलता है और ज़रूरत पड़ने पर सूची फिर से नए नामों से संपन्न करते  हैं।

 


गुरुवार, 20 मई 2021

Urban water bodies can be infected by corona virus

हैदराबाद: सिकुड़ती श् हरी झीलों पर वायरस के खतरे

पंकज चतुर्वेदी 

 


दुनियाभर में हुए कोरोना वायरस के श् हरी जलनिधियों पर असर से एक बेहद डरावना तथ्य सामने आया है कि हैदराबाद की झीलें ना केवल अपना आमाप खो रही हैं, बल्कि उनके जल में लगातार महानगरीय गंदगी जाने से कोरोना के लिए जिम्म्ेदार वायरस की जेनेटिक सामग्री भी मिली है। चूंकि ठीक वैसा ही अध्ययन ग्रामीण और अर्धशहरी इलाके के झीलों में भी किया गया और वाहं इस तरह का खतरा मिला नहीं, जाहिर है कि हैदराबाद श्हर की बगैर शोधित  की गई गंदगी के सीधे झीलों  में जाने का यह कुप्रभाव है। पानी में वायरस की मौजूदगी का पता लगाने के लिए किए जा रहे षोध में फिलहाल तो यही कहा गया है कि पानी में अभी तक जो जेनेटिक मैटेरियल मिला है, वो वास्तविक वायरस नहीं है। ऐसे में पानी के जरिए चेहरे या मुंह से इंफेक्शन फैलने की गुंजाइश कम है।

हैदराबाद वैसे तो हुसैन सागर झील के लिए मशहूर है लेकिन इस महानगर सीमा के भीतर 10 हैक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल की 169 झीलों के अलावा कई सौ तालाब यहां हुआ करते थे, जो देखते ही देखते कालोनी, सडक, या बाजार के रूप में गुम हो गए। सनद रहे इन 169 झीलों का कुल क्षेत्राफल ही 90.56 वर्ग किलोमीटर होता है। जाहिर है कि यदि इनमें साफ पानी होता तो हैदराबाद में कई तरह के रोग फैलने से बच जाते। 

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी और एकेडमी ऑफ साइंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च ने मिलकर यह अध्ययन किया जिसमें सात महीने के दौरान भारत में कोविड की पहली और दूसरी लहर को कवर किया गया है। इसके लिए हैदराबाद की हुसैन सागर और कुछ अन्य झीलों को चुना गया। हुसैन सागर के अलावा नाचारम की पेद्दा चेरुवु और निजाम तालाब में भी वायरस के मैटेरियल मिले हैं। स्टडी में पता चला कि पानी में ये जेनेटिक मैटेरियल इसी साल फरवरी में बढ़ना शुरू हुए, जब देश में महामारी की दूसरी लहर की शुरुआत हुई। ठीक इसी समय घाटकेसर के पास इदुलाबाद के अर्धशहरी इलाके व ग्रामीणअंचल की पोतुराजू झील में भी अध्ययन किया गया और इन दोनो स्थान पर कोई संक्रमण की संभावना नहीं मिली।

‘मेडरक्सिव’ विज्ञान शोध  पत्रिका में 12 मई को ‘‘ काम्प्रहेन्सिव एंड टेंपोरल सरलिेंस आफ सार्स एंड कोविड इन अरबन वाटर बोॅडीज: अर्ली सिग्नल ऑफ सेकंड वेव आनसेट’’ शीर्षक  से प्रकाशित रिपोर्ट में  मनुपति हेमलता, अथमकुरी तारक, उदय किरण आदि वैज्ञानिकों के दल ने लिखा है कि कोरोना वायरस के मुंह से फैलने की संभावना पर दुनियाभर में हो रहे शोध  के दौरान जब हैदराबाद के महानगर की झीलों का अध्ययन किया गया तो पता चला कि कोविडग्रस्त लोगों के घरां व अस्पतालों के संभावित मल-जल के बगैर शोधित ही झीलों में डालने से यह  संकट खड़े होने की संभावना है।

यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि लगभग 778 वर्ग किलोमीटर क्षेत्राफल में फैले हैदराबाद महानगर का अनियोजित विस्तार, पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी, और घरेलू व औघेगिक कचरे की मूसी नदी व तालाबों में सतत गिरने से यहां भीषण जल-संकट खड़ा होता है। अब यह नया संकट है कि जीवनदायी जल की निधियों में  खतरनाक वायरस की संभावना भी खड़ी हो गई है। गया है और इसके निदान का कोई तात्कालिक उपाय सरकार व समाज के पास है नहीं। 

हैदराबाद का महत्वपूर्ण हिस्सा वहाँ की झीलें हैं। बेतहाशा शहरीकरण  के कारण यहां के पारंपरिक जल निकाय पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। कुछ जल निकायों का आकार सिमट गया है तो कुछ औद्योगिक रसायनों और घरेलू कचरे से प्रदूषित हो गए हैं। झीलों और नहरों के उथला होने के चलते ही अगस्त 2000 में यहां बाढ़ आई थी। मुख्यधारा विकास के मॉडल पर पर्यावरण संबंधी संकट अब व्यापक स्तर पर वाद-विवाद को जन्म दे रहा है। औद्योगिकरण, शहरी विस्तार, सिंचाई, बड़े बांध, हरित क्रांति आज विकास के क्षेत्र में बातचीत और आलोचना के विषय बन गए हैं। कहना गलत न होगा कि हैदराबाद की प्राकृतिक विरासत का ध्वंस पिछले 50 वर्षों के विकास के कारण हुआ है। पिछले कुछ दशकों से सरकार और निजी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण कर झीलों को पक्के इलाकों में रूपांतरित कर दिया। इस क्षति को हम पर्यावरण संबंध या व्यापक राजनीतिक आर्थिक संबंध या व्यापक राजनीतिक आर्थिक संबंध में समझ सकते हैं। हैदराबाद मेें कई तालाब कुतुबशाही (1534-1724 ईसवी) और बाद में आसफ जाही (1724-1948) ने बनवाए थे। उस समय के कुछ बड़े तालाबोंमें हुसैनसागर, मीरआलम, अफजल सागर, जलपल्ली, मा-सेहाबा तालाब, तालाब तालाब, ओसमानसागर और हिमायतसागर इत्यादि शामिल हैं। बड़े तालाब पूर्व शासकों या मंत्रियों द्वारा बनवाए गए थे जबकि छोटे तालाब जमींदारों द्वारा बनवाए गए थे। संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन(यूएनटीओ) ने इस दिल के आकार की झील को विश्व की सबसे बड़ी  मानव निर्मित झील घोषित किया है। हैदराबाद के विकास और संस्कृति की सहयात्राी ‘‘हुसैन सागर’’ यहां की बढ़ती आबादी व आधुनिकीकरण का बोझ व दवाब नहीं सह पाई। इसका पानी जहरीला हो गया और सदियों की कोताही के चलते झील गाद से पट गई। सन 1966 में इसकी गहराई 12.2 मीटर थी जो आज घट कर बामुश्किल पांच मीटर रह गई है। 

जान लें हैदराबाद की झीलें तो प्रयोग के तौर पर ली गई, यदि बंगलुरु , या लोकटक या भोपाल या दरभंगा या फिर उदयपुर की झीलों में ही यदि अध्ययन होगा तो परिणाम इससे भिन्न न होंगे । कोविड का मूल कारण  जैव विविधता से छेड़छाड़ है। ऐसे में  झीलों के संरक्षण की प्राथमिकता को नए सिरे से विचार करने का वक्त आ गया है। अब स्पश्ट दिख रहा है कि उत्तर-करोना विश्व अलग तरीे का होगा और उसमें अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियो या पर्यावरणीय कोताही के परिणाम मानव जाति के लिए आत्महंता सिद्ध होंगे। 


रविवार, 16 मई 2021

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फिर एक समुद्री तूफान, कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच अब 'ताउते' का कहर




कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच अब ताउते चक्रवाती तूफान ने कहर मचा रखा है। केरल के तटीय इलाके तिरुअनंतपुरम के कई गांवों में कई मकान नष्ट हो गए। कर्नाटक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, ‘ताउते’ चक्रवात के कारण पिछले 24 घंटों में राज्य के छह जिलों में भारी वर्षा हुई और कुछ लोगों की जान भी जा चुकी है। इस चक्रवात से राज्य के 73 गांव बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।



देश के मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि अगले 12 घंटों के दौरान इसके और तेज होने की आशंका है। चक्रवाती तूफान के उत्तर-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने और 17 मई की शाम को गुजरात तट पर पहुंचने और 18 मई की सुबह के आसपास पोरबंदर और महुवा (भावनगर जिला) के बीच गुजरात तट को पार करने की संभावना है। एनडीआरएफ ने राहत एवं बचाव कार्य के लिए अपनी टीमों की संख्या 53 से बढ़ाकर 100 कर दी है। इस चक्रवाती तूफान से केरल, कर्नाटक, गोवा, दमन एवं दीव, गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय इलाकों के प्रभावित होने की आशंका है।



संबंधित राज्य सरकारों ने अलर्ट जारी किया है। प्रधानमंत्री ने भी तूफान के मद्देनजर उच्चस्तरीय बैठक की है। ‘ताउते’ बर्मी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘गेको’ प्रजाति की दुर्लभ छिपकली। ध्यान रहे कि यह महज प्राकृतिक आपदा नहीं है, असल में दुनिया के बदलते प्राकृतिक मिजाज ने ऐसे तूफानों की संख्या में इजाफ किया है। इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को नियंत्रित नहीं किया, तो चक्रवात के चलते भारत के सागर किनारे वाले शहरों में लोगों का जीना दूभर हो जाएगा। ऐसे बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालिक प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ता है। ऐसे तूफान समूची प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ देते हैं। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे, वे पलक झपकते ही नेस्तनाबूद हो जाते हैं।


तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी में खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुई क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। जलवायु परिवर्तन पर 2019 में जारी इंटर गवर्मेंट समूह की विशेष रिपोर्ट ‘ओशन ऐंड क्रायोस्फीयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट’ के अनुसार, सारी दुनिया के महासागर 1970 से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से उत्पन्न 90 फीसदी अतिरिक्त गर्मी को अवशोषित कर चुके हैं। इसके कारण महासागर गर्म हो रहे हैं और इसी से चक्रवात का खतरनाक चेहरा बार-बार सामने आ रहा है। जान लें कि समुद्र का 0.1 डिग्री तापमान बढ़ने का अर्थ है चक्रवात को अतिरिक्त ऊर्जा मिलना। धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवाती तूफानों का उठना। भूमध्य

रेखा के नजदीकी जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां ऐसे चक्रवातों की आशंका होती है।


भारतीय उपमहाद्वीप में बार-बार और हर बार पहले से घातक तूफान आने का असली कारण इंसान द्वारा किए जा रहे प्रकृति के अंधाधुंध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल शुरू में ही अमेरिकी अंतरिक्ष शोध संस्था नासा ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और भयानक होते जाएंगे। अमेरिका में नासा के ‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’ के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर उपकरणों द्वारा 15 वर्षों तक एकत्र आकंड़ों के आकलन से यह बात सामने आई।


‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ (फरवरी 2019) में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं। ‘जेपीएल’ के हार्टमुट औमन के मुताबिक, गर्म वातावरण में गंभीर तूफान बढ़ जाते हैं। भारी बारिश के साथ तूफान आमतौर पर साल के सबसे गर्म मौसम में ही आते हैं। लेकिन जिस तरह पिछले साल ठंड के दिनों में भारत में ऐसे तूफान के मामले बढ़े और कुल 124 चक्रवात में से अधिकांश ठंड में ही आए, यह हमारे लिए गंभीर चेतावनी है।


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Aravali saves existence due to court

 अदालत के बदौलत अस्तित्व बचाता अरावली पंकज चतुर्वेदी  सात जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट के ओदष के बाद फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में सूरजकुड से स...