pankajbooks(pankaj chaturvedi)पंकज चतुर्वेदी

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

रविवार, 15 सितंबर 2019

Hindi has to supported by her dialects

बोली को इज्जत दिए बगैर नहीं संवरेगी हिंदी
पंकज चतुर्वेदी

एक ग्रामीण बच्चा, जो स्कूल जाने या अक्षर ज्ञान लेने वाली अपने कुनबे की पहली पीढ़ी है, अक्सर भाषा  को ले कर भटका सा रहता है - एक घर की भाषा जिसमें उसकी वह मां बोलती व समझती है, जिसने उसे पहली बार बोलना-सुनना-समझना सिखाया। दूसरे उस समाज की भाषाजो कि उसके घर से स्कूल के रास्ते में पर है। तीसरी वह भाषा जिसमें उसकी स्कूल की पाठ्य पुस्तकें हैं और जिसमें से निकले प्रश्न उसकी बुद्धिमत्ता का प्रमाण पत्र हैं। अब मालवी या कई अन्य भाषा-बोली में ष  को स या ष को ह तक कहा जाता है। अब बच्चा तो अपने स्कूल के चार घंटे के अलावा यही देख-सुन और बोल रहा है, लेकिन जैसे ही उसकी लोक या व्यवहार की भाशा स्कूल के सवाल-जवाब में आई, उसे असफल, फैल , मूर्ख तक करार दिया जाता है। मामला केवल स्कूल तक ही नहीं है। देशभर के हिंदी समाचार पत्रों ने अपने स्थानीय संस्करण निकालने तो शुरू  किए, लेकिन उनसे स्थानीय भाषा गायब हो गई। जैसे कुछ दशक पहले कानपुर के अखबारों में गुम्मा व चुटैल जैसे शब्द  होते थे, बिहार में ट्रेन-बस से ले कर जहाज तक के प्रारंभ होने के समय को ‘‘खुलने’ का समय कहा जाता था।  अब सभी जगह एक जैसे शब्द  आ रहे हैं।
बारूद, बंदूक से बेहाल बस्तर में आंध््रा प्रदेश से सटे सुकमा जिले में देारला जनजाति की बड़ी संख्या है। उनकी बोली हैं दोरली। बोली के मामले में बड़ा विचित्र है बस्तर, वहां द्रविड परिवार की बोलिसां भी है, आर्य कुल की भी और मुंडारी भी। उनके बीच इतना विभेद है कि एक इलाके का गोंडी बोलने वाला दूसरे इलाके की गोंडी को भी समझने में दिक्क्त महसूस करता है। दोरली बोलने वाले बहुत कम हुआ करते थे, पिछली जनगणना में शायद  बीस हजार । फिर खून खराबे का दौर चला, पुलिस व नक्सली दोनेा तरफ से पिसने वाले आदिवासी पलायन कर आंध्रप्रदेश के वारंगल जिले में चले गए। जब वे लौटे तो उनके बच्चों की दोरली में तेलुगू का घालमेल हो चुका था। एक तो बड़ी मुश्किल से दोरली बोलने वाला शिक्षक मिला था और जब उसने देखा कि उसके बच्चों की दोरली भी अपभ्रंष हो गई है तो उसकी चिंता असीम हो गई कि अब पढाई कैसे आगे बढ़ाई जाए। यह चिंता है कोटां गांव के शिक्षक कट्टम सीताराम की।
ठेठ गंाव के बच्चों को पढाया जाता है कि ‘अ’ ‘अनार’ का, ना तो उनके इलाके में अनार होता है और ना ही उन्होंने उसे देखा होता है, और ना ही उनके परिवार की हैसियत अनार को खरीदने की होती है। सारा गांव जिसे गन्ना कहता है, उसे ईख के तौर पर पढ़ाया जाता है। यह स्कूल में घुसते ही बच्चे को दिए जाने वाले अव्यावहारिक ज्ञान की बानगी है। असल में रंग-आकृति- अंक-शब्द की दुनिया में बच्चे का प्रवेश ही बेहद नीरस और अनमना सा होता है। और मन और सीखने के बीच की खाई साल दर साल बढती जाती है।
संप्रेषणीयता की दुनिया में बच्चे के साथ दिक्कतों का दौर स्कूल में घुसते से ही से शुरू हुआ- घर पर वह सुनता है मालवी, निमाडी, आओ, मिजो, मिसिंग, खासी, गढवाली,राजस्थानी , बुंदेली, या भीली, गोंडी, धुरबी या ऐसी ही ‘अपनी’ बोली-भाषा। स्कूल में गया तो किताबें खड़ी हिंदी या अंग्रेजी यया राज्य की भाषा में और उसे तभी से बता दिया गया कि यदि असल में पढ़ाई कर नौकरी पाना है तो उसके लिए अंग्रेजी ही एकमात्र जरिया है - ‘आधी छोड़ पूरी को जाए, आधी मिले ना पूरी पाए’’। बच्चा इसी दुरूह स्थिति में बचपना बिता देता है कि उसके ‘पहले अध्यापक’ मां-पिता को सही कहूं या स्कूल की पुस्तकों की भाषा को जो उसे ‘सभ्य‘ बनाने का वायदा करती है या फिर  जिंदगी काटने के लिए जरूरी अंग्रेजी को अपनाऊं।
स्कूल में भाषा-शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण व पढ़ाई का आधार होती है। प्रतिदिन के कार्य बगैर भाषा के सुचारू रूप से कर पाना संभव ही नहीं होता। व्यक्तित्व के विकास में भाषा एक कुंजी है , अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना हो या फिर दूसरों की बात ग्रहण करना, भाषा के ज्ञान के बगैर संभव नहीं है।  भाषा का सीधा संबंध जीवन से है और मात्रभाषा ही बच्चे को परिवार, समाज से जोड़ती है। भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्यभ बालक को सोचने-विचारने की क्षमता प्रदान करना, उस सोच को निरंतर आगे बढ़ाए रखना, सोच को सरल रूप में अभिव्यक्त करने का मार्ग तलाशना होता है।  अब जरा देखें कि मालवी व राजस्थानी की कई बोलियो में ‘स‘ का उच्चारण ‘ह‘ होता है और बच्चा अपने घर में वही सुनता है, लेकिन जब वह स्कूल में शिक्षक या अपनी पाठ्य पुस्तक पढ़ता है तो उससे संदेश मिलता है कि उसके माता-पिता ‘गलत‘ उच्चारण करते हैं।  बस्तर की ही नहीं, सभी जनजातिया बोलियों में हिंदी के स्वर-व्यंजन में से एक चौाथाई होते ही नहीं है। असल में आदिवासी कम में काम चलाना तथा संचयय ना करने के नैसर्गिक गुणों के साथ जीवनयापन करते हैं और यही उनकी बोली में भी होता है। लेकिन बच्चा जब स्कूल आता है तो उसके पास बेइंतिहां शब्दों का अंबार होता है जो उसे दो नाव पर एकसाथ सवारी करने की मानिंद अहसास करवाता है।
स्थानीय बोलियों में प्राथमिक शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि बच्चा अपने कुल-परिवार की बोली में जो ज्ञान सीखता है, उसमें उसे अपने मां-बाप की भावनाओं का आस्वाद महसूस होता है। वह भले ही स्कूल जाने वाले या अक्षर ज्ञान वाली पहली पीढ़ी हो, लेकिन उसे पाठ से उसके मां-बाप बिल्कुल अनभिज्ञ नहीं होते। जब बच्चा खुद को अभिव्यक्त करना, भाषा का संप्रेषण सीख ले तो उसे खड़ी बोली या राज्य की बोली में पारंगत किया जाए, फिर साथ में करीबी इलाके की एक भाषा और। अंग्रेेजी को पढ़ाना कक्षा छह से पहले करना ही नहीं चाहिए। इस तरह बच्चे अपनी शिक्षा में कुछ अपनापन महसूस करेंगे। हां, पूरी प्रक्रिया में दिक्कत भी हैं, हो सकता है कि दंडामी गोंडी वाले इलाके में दंडामी गोंडी बोलने वाला शिक्षक तलाशना मुश्किल हो, परंतु जब एकबार यह बोली भी रोजगार पाने का जरिया बनती दिखेगी तो लोग जरूर इसमें पढ़ाई करना पसंद करेंगे। इसी तरह स्थानीय आशा कार्यकर्ता, पंचायत सचिव  जैसे पद भी स्थानीय बोली के जानकारों को ही देने की रीति से सरकार के साथ लोगों में संवाद बढ़ेगा व उन बोलियों में पढ़ाई करने वाले भी हिचकिचांएगे नहीं।
कुछ ‘विकासवादी’ यह कहते नहीं अघाते हैं कि भाषाओं का नश्ट होना या ‘‘ज्ञान’’ की भाषा में शिक्षा देना स्वाभाविक प्रक्रिया है और इस पर विलाप करने वाले या तो ‘‘नास्तेल्जिया’’ ग्रस्त होते हैं या फिर वे ‘‘शुद्ध नस्ल’’ के फासीवादी। जरा विकास के चरम पर पहुंच गए मुल्कों की सामामजिक व सांस्कृतिक दरिद्रता पर गौर करें कि वहां इंसान महज मशीन  बन कर रह गया है मानवीय संवेदनाएं शून्य  हैं और अब वे शांति , आध्यात्म के लिए ‘‘पूर्व’’ की ओर देख रहे हैं। यदि कोई समाज अपने अनुभवों से सीखता नहीं है और वही रास्ता अपनाता है जो संवेदना-शून्य समाज का निर्माण करे तो जाहिर है कि यह एक आत्मघाती कदम ही होगा। इंसान को इंसान बना रहने के लिए स्थानीयता पर गर्व का भाव, भाषा-संस्कार का वैवेध्यि महति है। और इस लिए भी प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय बोली-भाषा को शामिल करना व उसे जीवंत रखना जरूरी है।
आए रोज अखबारों में छपता रहता है कि यूनेस्को बार-बार चेता रही हे कि भारत में बोली-भाषाएं गुम हो रही है और इनमें भी सबसे बड़ा संकट आदिवासी बोलियों पर है। अंग्रेजीदां-शहरी युवा या तो इस से बेपरवाह रहते हैं या यह सवाल करने से भी नहीं चूकते कि हम क्या करेंगे इन ‘गंवार-बोलियों’ को बचा कर। यह जान लेना जरूरी है कि ‘‘गूगल बाबा‘‘ या पुस्तकों में इतना ज्ञान, सूचना, संस्कृति, साहित्ये उपलब्ध नहीं है जितना कि हमारे पारंपरिक  मूल निवासियों के पास है। उनका ज्ञान निहायत मौखिक है और वह भीली, गोंडी, धुरबी, दोरली, आओ, मिससिंग, खासी, जैसी छोटी-छोटी बोलियों में ही है। उस ज्ञान को जिंदा रखने के लिए उन बोलियों को भी जीवंत रखना जरूरी है और देश की विविधता, लोक जीवन, ज्ञान, गीत, संगीत, हस्त कला, समाज को आने वाली पीढ़ियों तक अपने मूल स्वरूप में पहुंचाने के लिए बोलियों को जिंदा रखना भी जरूरी है। यदि हम चाहते हैं कि स्थानीय समाज स्कूल में हंसते-खेलते आए, उसे वहां अन्यमनस्कता ना लगे तो उसकी अपनी बोली में भाषा का प्रारंभिक पाठ अनिवार्य होगा।
लगता है कि हिंदी के भाषा-समृद्धि के आगम में व्यवधान सा हो गया है। तिस पर सरकारी महकमे हिंदी के मानक रूप को तैयार करने में संस्कृतिनिश्ठ हिंदी ला रहे हैं। इसमें देशज शब्द गायब हो रहे हैं उन्हें लिखने के सलीके को ले कर भी टकराव है। असल में वे जो मानक हिंदी कहते हैं असल में वह सीसे के लेटर पेस की हिंदी थी जिसमें कई मात्राओं, आधे षब्दों के फाँट नहीं होते थे। आज कंप्यूटर की प्रकाशन-दुनिया में लेड-प्रेस के फाँट की बात करने वाले असल में हिंदी को थाम रहे हैं।
यदि हिंदी को वास्तव में एक जीवंत भाषा बना कर रखना है तो शब्दों का यह लेन-देन पहले अपनी बोलियों व फिर भाषाओं से हो, वरना हिंदी एक नारे, सम्मेलन, बैनर, उत्सव की भाषा बनी रहेगी। इसके लिए जरूरी है कि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा उसकी अपनी बोली में हो। बच्चा देवनागरी लिपि में लिखना तो सीखे लेकिन उसके पास शब्द भंडार में उसकी अपनी जुबान या बोली के शब्द भी हों। जान लें कि हिंदी का आज का मानक रूप से बुंदेली, ब्रज, राजस्थानी आदि बोलियों से ही उभरा है और इसकी श्री-वृद्धि के लिए इन बोलियों को ही हिंदी की पालकी संभालनी होगी।

Change in food habit can change water too

भोजन बदलने से बच सकते हैं बेपानी होने से
पंकज चतुर्वेदी


जून-2019 में  हरियाणा सरकार ने घोषणा  की है कि जो किसान धान की जगह अन्य कोई फसल बोएगा उसे पांच हजार रूपए हैक्टर का अनुदान दिया जाएगा। बीते कुछ दशकों में खेत से ज्यादा मुनाफा कमाने की फिराक में किसानों को ऐसी फसलें बोने को प्रेरित कर दिया गया जो ना तो उनके जलवायु के अनुकूल हैं और ना ही स्थानीय भोजन। बात पंजाब की हो या फिर हरियाणा या गंगा-यमुना के दोआब के बीच बसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सदियों से यहां के समाज के भोजन में कभी चावल था ही नहीं, सो उसकी पैदावार भी यहां नहीं होती थी। ठीक इसी तरह ज्वालामुखी के लावे से निर्मित बेहद उपजाउ जमीन के स्वामी मप्र के मालवा सोयाबीन की ना तो खपत थी और ना ही खेती। हरित क्रांति के नाम पर कतिपय रायायनिक खाद-दवा और बीज की तिजारत करने वाली कंपनियों ने बस जल की उपलब्धता देखी और वहां ऐसी फसलों को प्रोत्साहित करना षुरू कर दिया जिसने वहां की जमीन बंजर की, भूजल सहित पानी के स्त्रोत खाली कर दिए, खेती में इस्तेमाल रासायनों से आसपस की नदी-तालाब व भूजल दूषित  कर दिया। हालात ऐसे हो गए कि पेयजल का संकट भयंकर हो गया। यह सभी जानते हैं कि हमारे पास उपलब्ध कुल जल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल खेती में होता है।


यह सच है कि खेती-किसानी भारत की अर्थ वयवस्था का सुद्ढ आधार है और इस पर ज्यादा पानी खर्च हो तो चिंता नहीं करना चाहिए। लेकिन हमें यदि खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना है तो जल सुरक्षा की बात भी करनी होगी। दक्षिणी भारत में अच्छी बरसात होती है। वहां खेत में बरसात का पानी भरा जा सकता है सो पारंपरिक रूप से वहीं धान की खेती होती थी और वहीं के लोगों का मूल भोजन चावल था। पंजाब-हरियाणा अािद इलाकों में नदियों का जाल रहा है, वहां की जमीन में नमी रहती थी, सो चना, गेहूं, राजमा, जैसी फसल यहां होती थीं। यूंकि यहां दो और तीन फसल हो जाती थीं सो किसान को कड़ी मेहनत की जरूरत होती थी और उसी की आपूर्ति के लिए उसके भोजन में उच्च प्रोटीन के चना, छोले, राजमा आदि होते थे।  मालवा में गेंहू, चना के साथ मोटी फसल व तेल के लिए सरसो और अलसी का प्रचलन था और वहीं उनकी भोजन-अभिरूचि का हिस्सा था। यदि समूचे भारत को बारिकी से देखें तो प्रकृति ने स्थानीय परिवेश, आवश्यकता  और मौसम को देखते हुए वहां के भोजन को विकसित किया और वही उस इलाके के खेतों का उत्पादन हुआ करता था।

यह सभी जानते हैं कि चावल पर प्रति टन उत्पादन जल की खपत सबसे ज्यादा है लेकिन उसकी पौष्टिकता  सबसे कम। वहीं मोटे अनाज अर्थात बाजरा, मक्का ज्वार आदि के पौश्टिक  कीमत ज्यादा है व इन्हें उगाने की पानी की मांग सबसे कम।  अमेरिका के मशहूर विज्ञान जर्नल ‘साईंस एडवांसेस’ में प्रकाशित एक लेख - अल्टरनेटिव सेरिल्स केन इंप्रूव वाटर यूजेस एंड न्यूट्रिन’ में बताया गया है कि किस तरह भारत के लोगों की बदली भोजन-अभिरूचियों के कारण उनके षरीर में पौश्टिक तत्व कम हो रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव का उनके स्वास्थ्य पर तत्काल विपरीत असर हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि भारत में गत चार दशकों के दौरान अन्न का उत्पादन 230 प्रतिशत तक बढ़ा लेकिन उसमें पौश्टिक तत्वों की मात्रा घटती गई। चावल की तुलना में मक्का ज्यादा पौश्टिक है लेकिन उसकी खेती व मांग लगातार घट रही है। सन 1960 में भारत में गेहूं की मांग 27 किलो प्रति व्यक्ति थी जो आज बढ़ कर 55 किलो के पार हो गई है। वहीं मोटा अनाज ज्वार-बाजरा की मांग इसी अवधि में 32.9 किलो से घट कर 4.2 किलेा रह गई। जयहिर है कि इन फसलों की बुवाई भी कम हो रही है। यह भी जान लें कि जहां मोटी फसल के लिए बरसात या साधारण सिंचाई पर्याप्त थी तो धान के लिए भूजल को पूरा निचोड़ लिया गया। आज देश में भूजल के कुल इस्तेमाल
यह जानना जरूरी है कि भारत में दुनिया के कुल पानी का चार फीसदी है जबकि  आबादी 16 प्रतिशत है।  हमारे यहां एक जिन्स की पैंट के लिए कपास उगाने से ले कर रंगने, धोने आदि में 10 हजार लीटर पानी उड़ा दिया जाता है जबकि समझदार देशो ंमे यह मात्रा बामुश्किल पांच सौ लीटर होती है।  तभी हमारे देश का जल पद चिन्ह सूचकांक 980 क्यूबिक मीटर है जबकि इसका वैश्विक औसत 1243 क्यूबिक मीटर है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में भी पानी के लिए बुरे हालात का मूल कारण खराब जल प्रबंधन बताया है। यह सामने दिख रहा है कि बढ़ती आबादी, उसके  पेट भरने के लिए विस्तार पा रही खेती व पशु पालन,औद्योगिकीकरण आदि के चलते साल दर साल पानी की उपलब्धता घटती जा रही है।
आज जरूरत इस बात के आकलन की है कि हम किस खेती में कितना जल इस्तेमाल कर रहे हैं और असल में उसकी मिल रही कीमत में क्या उस पानी का दाम भी जुड़ा है ?यदि सभी उत्पादों का आकलन इन पद चिन्हों के आधार पर होने लगे तो जाहिर है कि सेवा या उत्पादन में लगी संस्थाओं के जल स्त्रोत , उनके संरक्षण  व किफायती इस्तेमाल, पानी के प्रदूषण जैसे मसलों पर विस्तार से विमर्श शुरू हो सकता है।  हमारी आयात और निर्यात नीति कैसी हो,  हम अपने खेतों में क्या उगाएं, पुनर्चक्रित जल के प्रति अनिवार्यता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे स्वतः ही लोगो के बीच जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि इस साल हरियाणा सरकार ने पानी बचाने के इरादे से धान की जगह मक्का की खेती करने वालों को निशुल्क बीज व पांच हजार रूपए के अनुदान की जो घोशणा की है , वह प्रकृति को बचाने का बहुत बड़ा कदम है। इसके साथ ही जरूरत है कि अब लोगों के भेाजन में स्थानीय व मोटे अनाज को फिर से लौटा कर लाने के लिए जागरूकता अभियान, इनके पकवानेां के प्रशिक्षण, जलवायु परिवर्तन के खतरे जैसे मसलों पर व्यापक रूप से काम किया जाए। काश इसी कार्य को अन्य राज्य भी लागू कर पाएं। इसके लिए स्थानीय मौसमय उत्पाद, आदि का सर्वेक्षण कर नीति बनाई जा सकती है। ऐसे ही कई प्रयोग देश को पानीदार बनाने की दिशा में कारगर हो सकते हैं , बस हम खुद यह आंकना शुरू कर दें कि किन जगहों पर पानी का गैर जरूरी  या बेजा इस्तेमाल हो रहा है।

बुधवार, 11 सितंबर 2019

eco friendly ganesha

  • जब प्रशासन ऐसी प्रतिमाओं को जब्त कर रहा है, तो मूर्ति निर्माताओं के गरीब होने व नुकसान की बात हो रही है
  • भारत में पर्व केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के संरक्षण का संकल्प और कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होते हैं

पंकज चतुर्वेदी
मध्य प्रदेश सरकार ने पाबंदी लगा रखी थी, फिर भी अकेले भोपाल शहर में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से अस्सी हजार गणेश प्रतिमाएं बन गईं. 
अब जब प्रशासन ऐसी प्रतिमाओं को जब्त कर रहा है, तो मूर्ति निर्माताओं के गरीब होने व नुकसान की बात हो रही है. साथ ही प्रतिमा बनाने वाले सरकार द्वारा मिट्टी न उपलब्ध होने का बहाना बना रहे हैं. 
बंगलुरु में गणेश उत्सव महाराष्ट्र से ज्यादा लोकप्रिय है. दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा में सड़क पर विशालकाय पीओपी प्रतिमाएं बिकते देखी जा सकती हैं. यह जानना जरूरी है कि पीओपी की प्रतिमाएं पानी ही नहीं, कई अन्य तरीकों से पर्यावरण को जहरीला बनाता है. 
समाज का बड़ा वर्ग यह कड़वा सच जानता है, लेकिन आस्था की आड़ में प्रकृति पर अन्याय को अनदेखा किया जाता है. 
भारत में पर्व केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति के संरक्षण का संकल्प और कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होते हैं. भारत के सभी त्योहार सूर्य-चंद्रमा, धरती, जल संसाधनों, पशु-पक्षी आदि की आराधना पर केंद्रित हैं. 
बीते कुछ सालों ने भारतीय अध्यात्म को बाजारवाद की ऐसी नजर लगी कि अब पर्व पर्यावरण को दूषित करने का माध्यम बनते जा रहे हैं. 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में अगस्त- 2016 में अपील कर चुके रहे हैं कि देव प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी की नहीं बनाएं, मिट्टी की ही बनाए, लेकिन देश के दूरस्थ अंचलों की छोड़ दें, राजधानी दिल्ली में भी इस पर अमल नहीं दिखता है. 
बीते एक दशक के दौरान विभिन्न गैरसरकारी संस्थाओं, राज्यों के प्रदूषण बोर्ड आदि ने गंगा, यमुना, सुवर्णरेखा, गोमती, चंबल जैसी नदियों की जल गुणवत्ता का गणपति या देवी प्रतिमा विसर्जन से पूर्व व पश्चात अध्ययन किया.
अध्ययन में पाया कि आस्था का यह ज्वार नदियों के जीवन के लिए खतरा बना हुआ है. ऐसी सैंकड़ों रिपोर्ट लाल बस्तों में बंधी पड़ी हैं और आस्था के मामले में दखल से अपना वोट-बैंक खिसकने के डर से शासन धरती के अस्तित्व को ही खतरे में डाल रहा है. 
महाराष्ट्र, उससे सटे गोवा, आंध्र प्रदेश व तेलगांना, छत्तीसगढ़, गुजरात व मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव अब देश में हर गांव-कस्बे तक फैल गया है. 
दिल्ली में ही हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां स्थापित हो रही हैं. पारंपरिक तौर पर मूर्ति मिट्टी की बनती थी, जिसे प्राकृतिक रंगों, कपड़ों आदि से सजाया जाता था. 
आज प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस से बन रही है, जिन्हें रासायनिक रंगों से पोता जाता है. गणेशात्सव का समापन होता ही है कि नवरात्रि में दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है. 
यह पर्व भी लगभग पूरे भारत में मनाया जाने लगा है. हर गांव-कस्बे में एक से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक पूजा पंडाल बनने लगे हैं. बीच में विश्वकर्मा पूजा भी आ जाती है और अब इसी की प्रतिमाएं बनाने की रिवाज शुरू हो गई है. 
एक अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान कई लाख प्रतिमाएं बनती हैं. इनमें से 90 फीसदी प्लास्टर ऑफ पेरिस की होती है. इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिला दी जाती है. 
पीओपी ऐसा पदार्थ है जो कभी समाप्त नहीं होता है. प्लास्टर ऑफ पेरिस, कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है जो जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट डीहाइड्रेट) से बनता है. 
चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती है, उन्हें विषैले एवं पानी में न घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है. 
इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है, जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है. 
चंद साल पहले मुम्बई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं.
पहले शहरों में कुछ ही स्थान पर सार्वजनिक पंडाल में विशाल प्रतिमाएं रखी जाती थीं, लेकिन अब यह चंदा, दिखावा और राजनीति का माध्यम बन गया है सो, जितने खलीफा, उतनी प्रतिमाएं. 
अंदाजा है कि अकेले मुंबई में कोई डेढ लाख गणपति प्रतिमाएं हर साल समुद्र में विसर्जित की जाती हैं. इसी तरह से कोलकाता की हुबली नदी में ही 15,000 से अधिक बड़ी दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होता है. 
अनुमान है कि विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं में से अधिकांश 15 से 50 फुट ऊंची होती है. बंगाल में तो वसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा के लिए कोई एक करोड़ प्रतिमाएं स्थापित करने और उनको विसर्जित करने का भी रिवाज है. 
ये पर्व बरसात समाप्त होते ही आ जाते हैं, जुलाई महीने में मछलियों के भी अंडे व बच्चों का मौसम होता है. ऐसे में दुर्गा प्रतिमाओं का सिंदूर, सिंथेटिक रंग, थर्माकोल आदि पानी में घुल कर उसमें निवास करने वाले जलचरों को भी जहरीला करते हैं. 
बाद में ऐसी ही जहरीली मछलियां खाने पर कई गंभीर रोग इंसान के शरीर में घर कर जाते हैं. यह सभी जानते हैं कि रासायनिक रंग में जस्ता, कैडमियम जैसी धातुएं होती हैं. तभी ये धीरे-धीरे भोजन श्रृखंला का हिस्सा बन अनेक बीमारियों यथा मस्तिष्क किडनी और कैंसर का कारण बनती हैं. 
तीन साल पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गंगा और यमुना नदी में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाई थी. उसके बाद जिला प्रशासन प्रयास करता है कि नदी-सरिताओं के करीब ही गहरे कुंड बना कर उसमें प्रतिमाओं का विसर्जन हो. 
भारत सरकार के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने मूर्तियों के विसर्जन के कारण नदियों तथा जलाशयों में भारी धातुओं तथा प्लास्टर ऑफ पेरिस इत्यादि के कारण होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए मार्गदर्शिका जारी की है. 
मार्गदर्शिका के प्रावधानों के अनुसार नगरीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे मूर्ति विसर्जन के लिए पृथक स्थान तय करें. लेकिन यह जान लें कि यह तरीका भी धरती की मिट्टी और भूगर्भ जल को इतना दूषित करने वाला है कि इससे बर्बाद जमीन व जल का कोई निदान नहीं है. 
सवाल खड़ा होता है कि तो क्या पर्व-त्योहारों का विस्तार गलत है? इन्हें मनाना बंद कर देना चाहिए? एक तो हमें प्रत्येक त्योहार की मूल आत्मा को समझना होगा, जरूरी तो नहीं कि बड़ी प्रतिमा बनाने से ही भगवान ज्यादा खुश होंगे? 
क्या छोटी प्रतिमा बना कर उसका विसर्जन जल-निधियों की जगह अन्य किसी तरीके से करके अपनी आस्था और परंपरा को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता? प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने जैसे प्रयोग तो किए जा सकते हैं. 
पूजा सामग्री में प्लास्टिक या पोलीथीन का प्रयोग वर्जित करना, फूल-ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबाकर उसका कंपोस्ट बनाना, चढ़ावे के फल, अन्य सामग्री को जरूरतमंदों को बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साघारण से प्रयोग हैं, जो पर्वो से उत्पन्न प्रदूषण व उससे उपजने वाली बीमारियां पर काफी हद तक रोका जा सकता है. 
पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह व उमंग का संचार करने और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं. आज इन्हें अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की चुनौती है.

सोमवार, 9 सितंबर 2019

medical bills making mass below poverty line


गरीबी बढ़ा रही हैं बीमारियां
पंकज चतुर्वेदी

हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करते हैं। इनमें से शेड्यूल ट्राइब (एसटी) के 45.3 प्रतिशत और शेड्यूल कास्ट (एससी) 31.5 फीसदी के लोग इस रेखा के नीचे आते हैं। इसकी जानकारी केंद्र सरकार ने कुछ महीनों पहले लोकसभा में दी थी। सरकार ने लोगों की जिंदगी में सुधार और गरीबी खत्म करने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन फिर भी भूख से मौत और गरीबों की संख्या थमना बंद नहीं हो रहा है। असलियत यह है कि जितने प्रयास लोगों को रोजगार या भेजन उपलब्ध करवाने के हो रहे हैं उससे अधिक उनका व्यय दवा-अस्पताल और पैथालाजिकल जांच में हो रहा है। हर दिन सैंकड़ों लोग अपनी जमीन, गहने या जरूरी सामान बेच कर अपने प्रियजनों का इलाज करवाते हैं और अच्छा खाता-पीता परिवार देखते ही देखते गरीब हो जाता है।
अभी बरसात विदा होने वाली है और यह ये मच्छरों के प्रकोप का काल है- दूरदराज के गांव-कस्बों से ले कर महानगरों तक अस्पतालों में डेंगू-मलेरिया के मरीज पटे पड़े हैं। प्लेटलेट्स कम होने ,तेज बुखार या जोड़ों के दर्द का ऐसा खौफ है कि लेराग अपने घर के बर्तन बेच कर भी पचास हजार रूप्ए तक खर्च कर रहे हैं। कुछ सौ रूपए व्यय कर मच्छर नियंत्रण से जिन बीमारियों को रोका जा सकता था , औसतन सालाना बीस लाख लोग इसकी चपेट में आ कर इसके इलाज पर अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई के अरबों रूपए लुटा रहे हैं । स्वास्थ्य के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में षर्मनाक है। यहां तक कि चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान व बांग्लादेष से भी बदतर हैं। अंतरराश्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘ लांसेट’ की ताजातरीन रिपोर्ट ‘ ग्लोबल बर्डन आफ डिसीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हमारा देष दुनिया के कुल 195 देषों की सूची में  145वें स्थान पर है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने सन 1990 के बाद अस्पतालों की सेहत में सुधार तो किया है। उस साल भारत को 24.7 अंक मिले थे, जबकि 2016 में ये बढ़ कर 41.2 हो गए हैं।
देष के आंचलिक कस्बों की बात तो दूर राजधानी दिल्ली के एम्स या सफदरजंग जैसे अस्पतालों की भीड़ और आम मरीजों की दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। एक तो हम जरूरत के मुताबिक डाक्टर तैयार नहीं कर पा रहे, दूसरा देष की बड़ी आबादी ना तो स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त जागरूक है और ना ही उनके पास आकस्मिक चिकित्सा के हालात में  केाई बीमा या अर्थ की व्यवस्था है।  हालांकि सरकार गरीबों के लिए मुफ्त इलाज की कई योजनाएं चलाती है लेकिन व्यापक अषिक्षा और गैरजागरूकता के कारण ऐसी योजनाएं माकूल नहीं हैं। पिछले सत्र में ही  सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि देष में कोई 8.18 लाख डॉक्टर मौजूद हैं , यदि आबादी को 1.33 अरब मान लिया जाए तो औसतन प्रति हजार व्यक्ति पर एक डाक्टर का आंकडा भी बहुत दूर लगता है। तिस पर मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी है कि जो भी बच्चा डाक्टर बनेगा, उसकी मजबूरी होगी कि वह दोनों हाथों से केवल नोट कमाए।
पब्लिक हैल्थ फाउंडेषन आफ इंडिया(पीएचएफआई) की एक रिपोर्ट बताती है कि सन 2017 में देष के साढ़े पांच करोड़ लोग के लिए स्वास्थ्य पर किया गया व्यय ओओपी यानी आउट आफ पाकेट या औकात से अधिक व्यय की सीमा से पार रहा। यह संख्या दक्षिण कोरिया या स्पेन या कैन्य की आबादी से अधिक है। इनमें से 60 फीसदी यानि तीन करोड़ अस्सी लाख लोग अस्पताल के खर्चों के चलते बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे आ गए। बानगी के तौर पर ‘इंडिया स्पेंड’ संस्था द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के 15 जिलों के 100 सरकारी अस्पतालों से केवल एक दिन में लिए गए 1290 पर्चों को लें तो उनमें से 58 प्रतिषत दवांए सरकारी अस्पताल में उपलब्ध नहीं थी। जाहिर है कि ये मरीजों को बाजार से अपनी जेब से खरीदनी पड़ी।
भारत में  लेागों की जान और जेब पर सबसे भारी पड़ने वाली बीमारियों में ‘दिल और दिमागी दौरे’ सबसे आगे हैं। भारत के पंजीयक और जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि सन 2015 में दर्ज 53 लाख 74 हजार आठ सौ चौबीस मौतों में से 32.8 प्रतिषत इस तरह के दौरों के कारण हुई।। एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन का अनुमान है कि भारत में उच्च रक्तचाप से ग्रस्त लोगों की संख्या सन 2025 तक 21.3 करोड़ हो जाएगी, जो कि सन 2002 में 11.82 करोड़ थी। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद्  (भा आ अ प) के सर्वेक्षण के अनुसार पूरी संभावना है कि यह वृद्धि असल में ग्रामीण इलाकों में होगी।  भारत में हर साल करीब 17,000 लोग उच्च रक्तचाप की वजह से मर रहे हैं। यह बीमारी मुख्यतया बिगड़ती जीवन शैली, शारीरिक गतिविधियों का कम होते जाना और खानपान में नमक की मात्रा की वजह से होती है। इसका असर अधेड़़ अवस्था में जाकर दिखता रहा है, पर हाल के कुछ सर्वेक्षण बता रहें है कि 19-20 साल के युवा भी इसका शिकार हो रहे हैं। इलाज में सबसे अधिक खर्चा दवा पर होता है। भारत में इस बीमारी के इलाज में एक व्यक्ति को दवा पर अच्छा खासा खर्च करना पड़ता है और यह एक आम आदमी के लिए तनाव का विषय है। इस तरह के रोग पर करीब डेढ हजार रुपये हर महीना दवा पर खर्च होता ही हैं। उच्च रक्तचाप और उससे व्यव की चिंता इसांन को मधुमेह यानि डायबीटिज और हाइपर  थायरायड का भी षिकार बना देती है। पहले ही गरीबी, विशमता और आर्थिक बोझ से दबा हुआ ग्रामीण समाज, उच्च रक्तचाप जैसी नई बीमारी की चपेट में और लुट-पिट रहा है।  पैसा तो ठीक इससे उनका षारीरिक श्रम भी प्रभावित हो रहा है।
डायबीटिज देष में महामारी की तरह फैल रही है। इस समय कोई 7.4 करोड़ लेाग मधुमेह के विभिन्न स्तर पर षिकार हैं और इनमें बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी हैं। सरकार का अनुमान है कि इस पर हर साल मरीज  सवा दो लाख करोड़ की दवाएं खा रहे हैं जो देष के कुल स्वास्थ्य बजट का दस फीसदी से ज्यादा है। बीते 25 सालों में भारत में डायबीटिज के मरीजों की संख्या में 65 प्रतिषत की वृद्धि हुई। एक तो अमेरिकी मानक संस्थाओं ने भारत में रक्त में चीनी की मात्रा को कुछ अधिक दर्ज करवाया है जिससे प्री-डायबीटिज वाले भी इसकी दवाओं के फेर में आ जाते हैं और औसतन प्रति व्यक्ति साढ़े सात हजार रूपए साल इसकी दवा पर व्यय होता हे। अब डायबीटिज खुद में तो कोई रोग है नहीं, यह अपने साथ किडनी, त्वचा, उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियां साथ ले कर आता है। और फिर एक बार दवा षुरू कर दे ंतो इसकी मात्रा बढ़ती ही जाती है।
स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जरता की बानगी सरकार की सबसे प्रीमियम स्वास्थ्य योजना सीजीएचएस यानि केंद्रीय कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा है जिसके तहत पत्रकार, पूर्व सांसद आदि आते हैं। इस योजना के तहत पंजीकृत लोगों में चालीस फीसदी डायबीटिज के मरीज हैं और वे हर महीने केवल नियमित दवा लेने जाते हैं। एक मरीज की औसतन हर दिन की पचास रूपए की दवा। वहीं स्टेम सेल से डायबीटिज के स्थाई इलाज का व्यय महज सवा से दो लाख है लेकिन सीजीएचएस में यह इलाज षामिल नहीं है। ऐसे ही कई अन्य रोग है जिनकी आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध है लेकिन सीजीएचएस में उसे षामिल ही नहीं किया गया।विभिन्न राज्यों मे गरीबों को कार्ड दे कर निजी अस्पताल में मुफ्त इलाज की अधिकांश योजनाएं निजी अस्पतालों का खजाना भरने का जरिया बनी हैं, इसके विपरीत गरीब  कंगाल हो रहा है। महज पान मसाला-गुटखे या शराब के कारण देश में हजारेंा परिवार फटेहाल होते है। लेकिन सरकार राजस्व के लालच में इस पर पाबंदी लगाने से डरती है। गंभीरता से देखें तो इन व्यसनों से उपजी बीमारियों के इलाज में लगा धन व संसाधन राजस्व से हुई कमाई से ज्यादा ही होते हैं।





How ChandraYan-2 get partial sucsess



यह असफलता नहीं  बड़ी सफलता हैं 

चंद्रमा के दक्षिणी हिस्से तक पहुंचना हमारे वैज्ञानिकों की अद्भुद सफलता है . एक तो विज्ञानं प्रयोग सतत चलते रहते हैं और इनका किसी सरकार के आने और जाने से कोई सम्बन्ध नहीं होता- फिर दुनिया के अधिकांश देशों में इस तरह के स्पेस साइंस के प्रयोग बेहद गोपनीय होते हैं --- जब कार्य पूर्ण हो जाता है तब उसकी घोषणा होती हैं , विकसित देश अपनी तकनीक और प्रयोगों को यथासंभव गोपनीय रखते हैं . हालांकि चन्द्र यान जैसे प्रयोग पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गोपनीय रखना संभव नहीं होता लेकिन फिर भी इसे जनता के बीच बेवजह सस्ती लोकप्रियता से बचना चाहिए था .
यह भी जान लें कि भले ही हमारे उपकरण चाँद की सतह पर पहुँचने में अभी सफल होते प्रतीत नहीं हो रहे, लेकिन इस अभियान के नब्बे प्रतिशत परिणाम तो हमें मिलेंगे ही . भारत के चंद्रमा कि सतह को छूने वाले "विक्रम" के भविष्य और उसकी स्थिति के बारे में भले ही कोई जानकारी नहीं है कि यह दुर्घटनाग्रस्त हो गया या उसका संपर्क टूट गया, लेकिन 978 करोड़ रुपये लागत वाला चंद्रयान-2 मिशन का सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने के अनुरोध के साथ बताया, 'मिशन का सिर्फ पांच प्रतिशत -लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर- नुकसान हुआ है, जबकि बाकी 95 प्रतिशत -चंद्रयान-2 ऑर्बिटर- अभी भी चंद्रमा का सफलतापूर्वक चक्कर काट रहा है।'
अभी पूरी सम्भावना है कि ऑर्बिटर एक साल तक चंद्रमा की कई तस्वीरें लेकर इसरो को भेज सकता है। ये तस्वीरें भी हमारे अन्तरिक्ष विज्ञान के लिए बहुत बड़ी सीख व उपलब्धि होंगी .
यह तो आप जानते हीन हैं कि चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान में तीन खंड हैं -ऑर्बिटर (2,379 किलोग्राम, आठ पेलोड), विक्रम (1,471 किलोग्राम, चार पेलोट) और प्रज्ञान (27 किलोग्राम, दो पेलोड)। विक्रम दो सितंबर को आर्बिटर से अलग हो गया था। चंद्रयान-2 को इसके पहले 22 जुलाई को भारत के हेवी रॉकेट जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल-मार्क 3 (जीएसएलवी एमके 3) के जरिए अंतरिक्ष में लांच किया गया था।
इसरो के टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क केंद्र के स्क्रीन पर देखा गया कि विक्रम अपने निर्धारित पथ से थोड़ा हट गया और उसके बाद संपर्क टूट गया। लैंडर बड़े ही आराम से नीचे उतर रहा था, और इसरो के अधिकारी नियमित अंतराल पर खुशी जाहिर कर रहे थे। लैंडर ने सफलतापूर्वक अपना रफ ब्रेकिंग चरण को पूरा किया और यह अच्छी गति से सतह की ओर बढ़ रहा था। आखिर अंतिम क्षण में ऐसा क्या हो गया? इसरो के एक वैज्ञानिक के अनुसार, लैंडर का नियंत्रण उस समय समाप्त हो गया होगा, जब नीचे उतरते समय उसके थ्रस्टर्स को बंद किया गया होगा और वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया होगा, जिसके कारण संपर्क टूट गया।
यह एक छोटी सी निराशा है लेकिन विज्ञान का सिद्धांत है कि हर असफलता भी अपने-आप में एक प्रयोग होती हैं बिजली बल्ब बनाने वाले थॉमस अल्वा एडिशन ने तीन सौ से ज्यादा बार असफल हो कर बल्ब बनाया, तब एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि मेरे शोध का परिणाम है कि इन तीन सौ तरीकों से बल्ब नहीं बनता .
यह भी जानना जरुरी है कि जान लें कि भारत के अंतरिक्ष विज्ञान विभाग की यह उपलब्धि कोई एक-दो साल का काम नहीं है . इसका महत्वपूर्ण पहला पायदान कोई ग्यारह साल पहले सफलता से सम्पूर्ण हुआ था . भारत ने 22 अक्तूबर, 2008 को पहले चंद्र मिशन के तहत चंद्रयान-1 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था। इस मिशन से पृथ्वी के एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा के रहस्यों को जानने में न सिर्फ भारत को मदद मिली बल्कि दुनिया के वैज्ञानिकों के ज्ञान में भी विस्तार हुआ। प्रक्षेपण के सिर्फ आठ महीनों में ही चंद्रयान-1 ने मिशन के सभी लक्ष्यों और उद्देश्यों को हासिल कर लिया। आज भी इस मिशन से जुटाए आँकड़ों का अध्ययन दुनिया के वैज्ञानिक कर रहे हैं। इस मिशन से दुनिया भर में भारत की साख बढ़ीथी .
भारत सरकार ने नवंबर 2003 में पहली बार भारतीय मून मिशन के लिये इसरो के प्रस्ताव चंद्रयान -1 को मंज़ूरी दी।चन्द्र्रयान-1 को पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, यानी PSLV-C 11 रॉकेट के ज़रिये सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्री हरिकोटा से लॉन्च किया गया था .पाँच दिन बाद 27 अक्तूबर, 2008 को चंद्रमा के पास पहुँचा था। वहाँ पहले तो उसने चंद्रमा से 1000 किलोमीटर दूर रहकर एक वृत्ताकार कक्षा में उसकी परिक्रमा की। उसके बाद वह चंद्रमा के और नज़दीक गया और 12 नवंबर, 2008 से सिर्फ 100 किलोमीटर की दूरी पर से हर 2 घंटे में चंद्रमा की परिक्रमा पूरी करने लगा।
हमारे वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं . काश इसे चुनाव किस्म की गतिविधि बनाने से बचा जाता . सफलता के बाद सारा देश जश्न मनाता ही . हमारा विज्ञानं और वैज्ञानिक विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं, हमें जल्द ही सफलता मिलेगी .
चित्र में जो संयत्र संभावित सफलता का दिखाया गया है उससे हम महज सवा दो किलोमीटर दूर रह गये
मीडिया और उससे प्रभावित-प्रेरित आम लोग चंद्रयान-२ को ले कर आमतौर पर विमर्श ऐसा करते हैं जैसे कि किसी महाबली ने चाँद को धरती पर लाने के लिए कुछ ऐसा किया हो जो-- न भूतो न भाविश्य्तो ." भक्त उन्मादी हैं और विरोधी छिद्रान्वेषण कर रहे हैं . सोचा क्यों न थोड़ा सा इस अभियान की जानकारी सरल शब्दों में दे दूँ -- विज्ञानं का विद्यार्थी होने और सात साल से ज्यादा एक डिग्री कालेज में गणित पढ़ने के दौरान मैंने कोशिश की कि विज्ञानं को सहज कर सकूँ .
यह तो पहले भी बताया था कि सन २००९ में चंद्रयान का सफल प्रयोग हुआ था , हालांकि वह अभियान भी कोई एक साल बाद समाप्त घोषित कर दिया गया था .
इस पोस्ट में मैंने चंद्रयान -२ में उपयुक्त संयंत्र और उनके बारे में केवल आम लोगों के काम की बातों को शामिल करने का प्रयास किया हैं . यह तो हम सभी जानते हैं कि चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक ऐसी लौकिक संरचना है जो समूचे सौर मंडल और अन्तरिक्ष के बारे में जानकारी के द्वार खोलती हैं .चन्द्रमा की दूरी धरती से तीन लाख चौरासी हज़ार चार सौ किलोमीटर है . इसका व्यास १७३७.१ वर्ग किलोमीटर है यानी धरती से कोई तीस गुना छोटा -- अर्थात30 चन्द्रमा समूची पृथ्वी में समा सकते है .
चन्द्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए बेहद अछूता है यहाँ बहुत गहरे गड्ढे और पहाड़ हैं एवरेस्ट के आकार के , सं २००९ के चंद्रयान-१ ने चंद्रमा पर जल कि मौजूदगी की संभावना के कुछ प्रमाण तलाशे थे , यहाँ सौर मंडल के प्रारंभ के जीवाश्म यानी फॉसिल भी हैं .
अभी तक भारत ने चंद्रमा की साथ के स्थान पर उससे मिले चित्र व् एनी प्रयोगों से चंद्रमा को जाना था . चंद्रयान-२ का मकसद चंद्रमा के सतह पर उतर कर सीधे वहां के चित्र आदि भेजना था .
यह अभियान हमारे लिए इस लिए महत्वपूर्ण और अनूठा था क्योंकि यह पहले पूरी तरह स्वदेशी अभियान था . इसे अलावा दुनिया का ऐसा चौथा देश भारत बना जिसने दक्षिणी ध्रुव पर उतरने या सॉफ्ट लेंडिंग का प्रयोग किया . और भारत का ऐसा पहला प्रयोग तो था ही .
इसरो चंद्रयान-2 को पहले अक्टूबर 2018 में लॉन्च करने वाला था। बाद में इसकी तारीख बढ़ाकर 3 जनवरी और फिर 31 जनवरी कर दी गई। बाद में अन्य कारणों से इसे 15 जुलाई तक टाल दिया गया। इस दौरान बदलावों की वजह से चंद्रयान-2 का भार भी पहले से बढ़ गया। ऐसे में जीएसएलवी मार्क-3 में भी कुछ बदलाव किए गए थे।15 जुलाई की रात मिशन की शुरुआत से करीब 56 मिनट पहले इसरो ने ट्वीट कर लॉन्चिंग आगे बढ़ाने का ऐलान कर दिया गया था।चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे हुई .
इस लांचिंग का माध्यम था जिओसिन्क्रोनस सेटेलाईट लांच व्हीकल -तीन Geosynchronous Satellite Launch Vehicle Mark-III (GSLV Mk-III). इसके तीन हिस्से थे . यह तीन टन तक वजन के उपग्रह या सेटेलाईट को अपनी कक्षा में स्थापित करने कि ताकत रखता था . इसके मुख्य तीन भाग थे - S-200सॉलिड रोकेट बूस्टर , L-110 लिक्विड स्टेज और C-25 उपरी हिस्सा .
उपरी हिस्से में सबसे महत्वपूर्ण है आर्बिटर - इसका वजन २३७९ किलो और इसकी खुद बिजली या उर्जा उत्पादन कि क्षमता १००० वाट है . इस यंत्र का मुख्य कम IDSN अर्थात इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क से सम्पर्क रख कर अपने घूमने के मार्ग के चित्र व् सूचना धरती पर भेजना है, यह अभी बिलकुल ठीक काम कर अहा है और इसी ने चंद्रमा की सतह पर गिरे विक्रम के चित्र भी भेजे हैं , यह यंत्र चंद्रमा के ध्रुव की कक्षा में सौ गुना सौ किलोमीटर क्षेत्र में चक्कर लगा रहा हैं .
अब बात अक्र्ते हैं विक्रम लेंडर की- जिसके कारण हमारा चन्द्र अभियान अनूठा था और इसी के कारण हमें असफलता मिली- इस यंत्र का नाम भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान के जंक कहे जाने वाले विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया था इसका वजन १४७१ किली था और यह ६५० वाट उर्जा का स्वयम उत्पादन की क्षमता रखता था इसे एक चंद्रमा -दिवस अर्थात धरती के १४ दिन के बराबर काम करने के लिए बनाया गया था . इसका असल मकसद चंद्रमा की सतह पर धीरे से उतरना और वहां अपने भीतर रखे चलायमान घुमंतू रोबोट यंत्र को सतह पर उतार देना था
अब अगला हिस्सा है - रोवर प्रज्ञान - यानी घुमंतू प्रज्ञान .
चूँकि विक्रम का सहज उतराव या सॉफ्ट लेंडिंग हो नहीं पायी सो यह घुमंतू काम काम कर नहीं रहा हैं . इसका वजन २७ किलो मात्र है और यह छह पहियों वाली रोबोटिक गाडी है यह ५० वात उर्जा उत्पादन खुद करने में सक्षम है और यह महज आधा किलोमीटर ही चल एकता हैं . इससे मिली सूचनाएं लेंडर अर्थात विक्रम को आनी थी और विक्रम के जरिये आर्बिटर के माध्यम से धरती तक
ऐसा माना जा रहा है कि विक्रम के चंद्रमा की सतह पर उतरते समय उसकी या तो गति नियंत्रित नहीं हो पायी या फिर उतरने के स्थान पर किसी ऊँचे पहाड़ के कारण उसकी दिशा भ्रमित हुई और वह सीधा नहीं उतर पाया .
सनद रहे विक्रम को ७० डिग्री अक्षांश अर्थात latitude पर दो क्रेटर अर्थात गहरे खड्ड - मेनेजेनस -सी और सिंथेलीयस -एन के बीच उतरना था . ये क्रेटर एवरेस्ट जैसे गहरे हैं . यदि विक्रम सही तरीके से उतर जाता ओ हमारा घुमंतू प्रज्ञान भी काम करने लगता
अब आपको लांचर , आर्बिटर , विक्रम और घुमन्तु के वास्तविक चित्र भी दे रहा हूँ जो इसरो ने ही उपलब्ध करवाए हैं
यह पोस्ट हर उस इन्सान के लिए है जो अपने बच्चों को वैज्ञानिक उपक्रमों को सियासती नहीं वैज्ञानिक के रूप में बता कर वैज्ञानिक वृति के विकास की सोच रखता है वर्ना लोग केवल अन्तरिक्ष विज्ञानं के मुखिया को रोता देख महज भावनातम टिप्पणिया करेंगे .
कोई तकनीकी गलती हो तो सुझाव भी देना ,

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

Why Every one have doubt on Assam NRC

 घुसपैठियों का देश -निकाला: राह में कानून के कांटे


सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर के बाद असम में तैयार हुए नागरिकता रजिस्टर अर्थात एनआरसी का अंतिम प्रारूप 31 अगस्त को सामने आया तो कई बातें  बहुत चौंकाने वाली सामने आईं - एक तो हर राजनीतिक दल अभी तक कोहराम काटे था कि असम में करोड़, दो करोड़ विदेशी  हैं, वह झूठी साबित हुई। महज 19 लाख 6 हजार 657 लोग बाहर हुए हैं। इनमें से भी कोई तीन लाख लोगों ने कोई दावा ही नहीं किया और वैसे भी इन लोगों को अभी अपील की गुन्जायिश  है।  इस बार  बाहर हुए नामों में हिंदू भी बड़ी संख्या में हैं, लगभग 25 फीसद, अर्थात बांग्लादेशी  घुसपैठियों के सांप्रदायिकरण के बयानात फर्जी रहे। गौरतलब है कि सन 1947 में पूर्वी बंगाल में हिंदू आबादी, 25.4 फीसदी थी जो आज घट कर बमुश्किल  10 प्रतिशत  रह गई है। जाहिर है कि इनकी बड़ी संख्या ने भारत का रूख किया होगा। तीसरा इस अंतिम सूची से कोई भी पक्ष संतुष्ट  नहीं है- मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वाली संस्था को कंप्यूटर साफ्ज्वेयर पर संदेह है तो  सारे मामले को जन आंदोलन बनाने वाले अखिल असम छात्र संगठन  व अन्य संगठनों को इतने कम संख्या होने पर । स्वयं राज्य व केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के नेाता भी इस आंकड़े से संतुश्ट नहीं हैं।  हालांकि अलग-अलग जिलों में जब व्यक्तिगत उदाहरण देखना षुरू करेंगे तो साफ हो जाएगा कि पूरी प्रक्रया में कहीं ना कहीं खामी तो है। पूरे परिवार को भारतीय माना लेकिन परिवार के मुख्यिा को नहीं, एक बहन भारतीय दूसरी का नाम गायब। ना जाने कितने राजनेता, सशत्र  बलों के अफसर, वकील, पत्रकार इसके शिकार हुए हैं। बहरहाल सालों से तनाव में जी रहे कई लोग चिंता मुक्त हुए।
मेघालय के राज्यपाल रहे रंजीत सिंह मुसाहारी  के बेटे भारतीय सेना में कर्नल स्तर के अधिकारी रहे। उनका बेटा यानी पूर्व राज्यपाल का पोता इस समय रिजर्व बैंक में वरिश्ठ अधिकारी है, उनके पास भारतीय पासपोर्ट भी है, उनके पास नागरिकता साबित करने का नेाटिस आया तो सारे कागज जमा करवा दिए गए, लेकिन अंतिम सूची में वे विदेषी घोशित हो गए। जबकि दादा व उनका परिवार भारतीय है। एआईयूडीएफ के मौजूदा विधायक अनंत कुमार मालो के साथ भी कुछ ऐसा हुआ, वे भी इस सूची में स्थाना न पा सके।  फौज से जेसीओ के रूप में रिटायर हुए मुहम्मद सनाउल्ला  या तारापुर, सिल्चर के वकील प्रदीप कुमार सिन्हा या फिर असम आंदोलन में षहीद हुए मदन मल्लिक के परिवार , काटीुगड़ा के पूर्व विधायक अताउर रहमान के परिवार में केवल बड़ी बेटी का नाम न होना दरंग घाटी के खारूपेटिया नगर समिति के अध्यक्ष आषीश नंदी के परिवार के सभी 20 लोगों का नाम सूची में होना लेकिन उन्ही का न होना जैसी कई अनियमितताएं धीरे-धीरे सामने आ रही हैं। ऐसे में सूची जारी होने के दो घंटे बाद ही जब डोलाबारी, सोनितपुर की सलिहा खातून को पता चला कि वह अब विदेषी बन गई है तो उसने कुंए में कूद कर जान दे दी।
असम आंदोलन और घुसपैठिये
असम समझौते के पूरे 38 साल बाद असम से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की जो कवायद शुरू हुई, उसमें आशंकाएं, भय और अविश्वास का माहौल विकसित हो रहा है। असम के मूल निवासियों की बीते कई दषकों से मांग है कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से घुसपैठ कर आए लोगों की पहचान कर उन्हें वहां से वापिस भेजा जाए। इस मांग को ले कर आल असम स्टुडंेट यूनियन(आसू) की अगुवाई में सन 1979 में एक अहिंसक आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें सत्याग्रह, बहिष्कार, धरना और गिरफ्तारियां दी गई थीं। आंदोलनकारियों पर पुलिसिया कार्यवाही के बाद हालात और बिगड़े। 1983 में हुए चुनावों का इस आंदोलन के नेताओं ने विरोध किया।  चुनाव के बाद जम कर हिंसा शुरू हो गई।  इस हिंसा का अंत केंद्र सरकार के साथ 15 अगस्त 1985 को हुए एक समझौते (जिसे असम समझौता कहा जाता है) के साथ हुआ। इस समझौते के अनुसार जनवरी-1966 से मार्च- 1971 के बीच प्रदेश में आए लोगों को यहां रहने की इजाजत तो थी, लेकिन उन्हें आगामी दस साल तक वोट देने का अधिकार नहीं था। समझौते में केंद्र सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि सन 1971 के बाद राज्य में घुसे बांग्लादेशियों को वापिस अपने देश जाना होगा। इसके बाद आसू की सरकार भी बनीं। लेकिन इस समझौते को पूरे 38 साल बीत गए हैं और विदेषियों- बांग्लादेषी व म्यांमार से अवैध घुसपैठ जारी है। यही नहीं ये विदेषी बाकायदा अपनी भारतीय नागरिकता के दस्तावेज भी बनवा रहे हैं।
सन 2009 में मामला सुप्रीम केार्ट पहुचा। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी बनाने का काम शुरू हुआ तो जाहिर है कि अवैध घुसपैठियों में भय तो होगा ही। लेकिन असल तनाव शुरू होने जब राज्य शासन ने नागरिकता कानून संशोधन विधेयक को विधान सभा में पेश किया। इस कानून के तहत बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए हिंदू शरर्णाथियों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। यही नहीं घुसपैठियों की पहचान का आधार वर्ष 1971 की जगह 2014 किया जा रहा है। जाहिर है कि इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान करने का असल मकसद तो भटक ही जाएगा। हालांकि राज्य सरकार के सहयोगी दल असम गण परिषद ने इसे असम समर्झाते की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सरकार से अलग होने की धमकी भी दे दी।
यह एक विडंबना है कि बांग्लादेष को छूती हमारी 170 किलोमीटर की जमीनी और 92 किमी की जल-सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसी का फायदा उठा कर बांग्लादेष के लोग बेखौफ यहां आ रहे हैं, बस रहे हैं और अपराध भी कर रहे हैं। हमारा कानून इतना लचर है कि अदालत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी बांग्लादेषी घोशित कर देती है, लेकिन बांग्लादेष की सरकार यह कह कर उसे वापिस लेने से इंकार कर देती है कि भारत के साथ उसका इस तरह का कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं हैं। असम में बाहरी घुसपैठ एक सदी से पुरानी समस्या है।  सन 1901 से 1941 के बीच भारत(संयुक्त) की आबादी में बृद्धि की दर जहां 33.67 प्रतिषत थी, वहीं असम में यह दर 103.51 फीसदी दर्ज की गई थी। सन 1921 में विदेषी सेना द्वारा गोलपाड़ा पर कब्जा करने के बाद ही असम के कामरूप, दरांग, सिबसागर जिलो में म्यांमार व अन्य देषों से लोगों की भीड़ आना षुरू हो गया था। सन 1931 की जनगणना में साफ लिखा था कि आगामी 30 सालों में असम में केवल सिवसागर ऐसा जिला होगा, जहां असम मूल के लोगों की बहुसंख्यक आबादी होगी।
असम में विदेषियों के षरणार्थी बन कर आने को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है - 1971 की लड़ाई या बांग्लादेष बनने से पहले और उसके बाद। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन 1951 से 1971 के बीच 37 लाख सत्तावन हजार बांग्लादेषी , जिनमें अधिकांष मुसलमान हैं, अवैध रूप से अंसम में घुसे व यहीं बस गए। सन 70 के आसपास अवैध षरणार्थियों को भगाने के कुछ कदम उठाए गए तो राज्य के 33 मुस्लिम विधायाकें ने देवकांत बरूआ की अगवाई में मुख्यमंत्री विमल प्रसाद चालिहा के खिलाफ ही आवाज उठा दी। उसके बाद कभी किसी भी सरकार ने इतने बड़े वोट-बैंक पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटाई। षुरू में कहा गया कि असम में ऐसी जमीन बहुत सी है, जिस पर ख्ेाती नहीं होती है और ये घुसपैठिये इस पर हल चला कर हमारे ही देष का भला कर रहे हैं। लेकिन आज हालात इतने बदतर है कि कांजीरंगा नेषनल पार्क को छूती कई सौ किलोमीटर के नेषनल हाईवे पर दोनों ओर केवल झुग्गियां दिखती हैं, जनमें ये बिन बुलाए मेहमान डेरा डाले हुए हैं। इनके कारण राज्य में संसाधनों का टोटा तो पड़ ही रहा है, वहां की पारंपरिक संस्कृति, संगीत, लोकचार, सभी कुछ प्रभावित हो रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि कोई आठ साल पहले राज्य के राज्यपाल व पूर्व सैन्य अधिकारी रहे ले.ज. एस.के. सिन्हा ने राश्ट्रपति को भेजी एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि राज्य में बांग्लादेषियों की इतनी बड़ी संख्या बसी है कि उसे तलाषना व फिर वापिस भेजने के लायक हमारे पास मषीनरी नहीं है।
एनआरसी के अंतिम मसौदे में 19 लाख 6 हजार 657 लोग बाहर हुए हैं। जबकि इसमें 3 करोड़ 11 लाख 21 हजार 4 लोगों को वैध बताया गया है। अब इस लिस्ट से बाहर हुए लोग फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते है। इससे पहले पिछले साल जुलाई में जारी हुई एनआरसी सूची में 3.29 करोड़ लोगों में से 40.37 लाख लोगों का नाम नहीं शामिल थे। अंतिम सूची में उन लोगों के नाम शामिल किए गए हैं, जो 25 मार्च 1971 से पहले असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं।
भले ही राज्य सरकार संयम रखने व अपील  में नाम होने का वास्ता दे रही हो, लेकिन राज्य में बेहद तनाव, अनिश्तिता का माहौल है। ऐसे में कुछ लेाग अफवाहे फैला कर भी माहौल खराब कर रहे हैं।

चार साल , 62 हजार कर्मचारी और 1,243.53  करोड़ रूपए
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख के बाद आईएएस अधिकारी प्रतीक हजैला  के नेतृत्व में विदेषी लोगों को छांटने के लिए बने नागरिकता रजिस्टर को अंतिम रूप देने में चार साल लगे। इस काम में 62 हजार कर्मचारी  दिन-रात लगे रहे। असम में एनआरसी कार्यालय 2013 में बनाया गया था जिसके बाद पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में 2015 से यह कार्य शुरू हुआ। इसका पहला रजिस्ट्रेशन 1915 में किया गया था। इसके बाद 2018 तक तीन साल में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 6.5 करोड़ दस्तावेज सरकार के पास जमा करवाए थे। इन दस्तावेजों का वजन करीब 500 ट्रकों के वजन के बराबर था। इस पूरी प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए केन्द्र ने कुल 1,288.13 करोड़ रुपए रिलीज किए हैं इसमें से 1,243.53 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। इसकी पहली सूची  2017 और दूसरी सूची 2018 में प्रकाशित की गई थी। सनद रहे इस सूची में उन षरणार्थियो को भारत की नागरिकता नहीं दी गई है जो सन 1971 के पहले भारत में आए और उनके पास षरर्णाथी प्रमाण पत्र भी है।


नागरिकता रजिस्टर वाला एकमात्र राज्य असम
असम देश का अकेला राज्य है जहां  नागरिकता रजिस्टर बना है, वह भी दूसरी बार । याद होगा कि सन 1905 में तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने बंगाल का विभाजन किया थाा। तब दो नए प्रांत बने थे ऋ पूर्वी बंगाल(आज का बांग्लादेष)  और असम। विभाजन के समय डर था कि कही असम को पूर्वी बंगाल के साथ उस तरफ ना कर दिया जाए। उस पर लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलाई ने लंबा आंदोलन व संघर्श किया व सन 1950 में असम भारत का राज्य बना। उस समय भी बड़ी संख्या में षरणार्थी उधर से इधर आए जिनमें हिंदू बहुत थे। तब खड़े हुए विवाद के बाद सन 1951 में भी एक नागरिकता रजिस्टर अर्थात एनआरसी तैयार किया गया था।


अब आगे क्या ?
जिन लेागों के नाम अभी भी सूची में नहीं हैं, उनके पास अभी भी विकल्प मौजूद हैं:-
- 120 दिन के अंदर विदेशी प्राधिकरण में अपील कर सकते हैं ।
-ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए 1000 प्राधिकरण बनाए जाएंगे ।
- 100 प्राधिकरण तैयार, अन्य 200 सितंबर के पहले हफ्ते में तैयार होंगे।
- प्राधिकरण में असफल होने के बावजूद भी उच्च व उच्चतम न्यायालय में अपील का रास्ता खुला है।
- सुनवाई के दौरान किसी को कैंप में बंदी नहीं बनाया जाएगा।
- राज्य सरकार लोगों को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाएगी।

याचिकाकर्ता ही असंतुश्ट
सुप्रीम केार्ट में यह मामला ले जाने वाली संस्था असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) खुद इस जारी सूची को ‘दोषपूर्ण दस्तावेज’ कह रही है। संस्था की मांग थी कि इस सूची को फिर से सत्यापित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से लेागों को देखा जाए, जिसे कोर्ट ठुकरा चुकी है।
एपीडब्ल्यू के अध्यक्ष अभिजीत शर्मा ने एनआरसी अद्यतन करने की प्रक्रिया में इस्तेमाल सॉफ्टवेयर की दस्तावेजों के प्रबंधन की क्षमता पर भी सवाल उठाए और पूछा कि क्या इसका तीसरे पक्ष के प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ से निरीक्षण कराया गया था? श्री शर्मा ने कहा कि अंतिम एनआरसी से तय हो गया है कि असम में अवैध प्रवासियों के मुद्दे का कभी हल नहीं होगा। एनआरसी के राज्य समन्वयक प्रतीक हजेला की ओर से 27 प्रतिशत नामों का पुनरूसत्यापन रहस्य है। कोई नहीं जानता कि क्या यह शत प्रतिशत दोषरहित है या नहीं।
श्री शर्मा ने प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल सॉफ्टवेयर पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘क्या यह खामी वाले सॉफ्टवेयर की वजह से हुआ  है ? मोरीगांव जिले में 39 संदिग्ध परिवारों के नाम भी एनआरसी में शामिल हो गए जिनका जिक्र जिला आयुक्त ने किया है? गौरतलब है कि 2009 में एपीडब्ल्यू ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर 41 लाख विदेशियों के नाम मतदाता सूची से हटाने और एनआरसी को अद्यतन करने की मांग की थी।

क्या हैं विदेषी अधिकरण
असम समझौते के मुताबिक राज्य में स्थापित विदेषी अधिकरण या फॉरेन ट्राइब्यूनल्स अर्ध न्यायिक संस्थाएं है, जिसे सिर्फ नागरिकता से जुड़े मसलों की सुनवाई का अधिकार दिया गया है। यह संस्था अंतिम सूची में नाम ना पाए लोगों के दावों पर ही सुनवाई कर सकती है। शेड्यूल ऑफ सिटिजनशिप के सेक्शन 8 के मुताबिक लोग एनआरसी में नाम न होने पर अपील के लिए समय सीमा को अब 60 से बढ़ाकर 120 दिन कर दिया गया है यानी 31 दिसंबर, 2019 अपील के लिए अंतिम तिथि होगी। गृह मंत्रालय के आदेश के तहत 1,000 ट्राइब्यूनल्स का गठन एनआरसी के विवादों के निपटारे के लिए किया गया है। यदि कोई व्यक्ति ट्राइब्यूनल में केस हार जाता है तो फिर उसके पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प होगा। सभी कानूनी विकल्प आजमाने से पहले किसी को भी हिरासत में नहीं लिया जाएगा।  यही नहीं उसके बाद भी विदेाी घोशित लोगों को हिंरासत में ले कर गांग्लादेष के सामने हमें यह सिद्ध करना होगा कि ये अवैध प्रवासी बांग्लादेष से ही हमारे यहां आए हैं। वरना उन लोगों की हालत रोहिंगिया समान - ‘‘ बगैर नागरिकता वाले इंसान’ की तरह हो जाएगी।
असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल का कहना है कि गलत ढंग के लिस्ट में शामिल हुए विदेशी लोगों और बाहर हुए भारतीयों को लेकर केंद्र सरकार कोई विधेयक भी ला सकती है। हालांकि सरकार की ओर से यह कदम एनआरसी के प्रकाशन के बाद ही उठाया जाएगा।




सोमवार, 2 सितंबर 2019

No one is accepting NRC in Assam

असम में एनआरसी की कवायद बेनतीजा साबित हुई, AGP ने दी भाजपा सरकार से अलग होने की धमकी


[ पंकज चतुर्वेदी ]: असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस यानी एनआरसी के अंतिम प्रारूप में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। इसमें महज 19 लाख 6 हजार 657 लोग बाहर हुए हैं, जबकि इसकी हिमायत करने वाले बड़े-बड़े आंकड़ों का दावा कर रहे थे। बाहर हुए नामों में हिंदू भी बड़ी संख्या में हैं। वर्ष 1947 में पूर्वी बंगाल में हिंदू आबादी 25.4 फीसद थी जो अब घटकर बमुश्किल 10 प्रतिशत रह गई है। जाहिर है कि इनकी बड़ी संख्या ने भारत का रुख किया होगा। इस अंतिम सूची से फिलहाल कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं है। मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वाली संस्था को कंप्यूटर सॉफ्टवेयर पर संदेह है तो इसे जन आंदोलन बनाने वाले अखिल असम छात्र संगठन और अन्य संगठन इतने कम आंकड़े पर सशंकित हैं। यहां तक कि राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार भी इससे संतुष्ट नहीं है।
एनआरसी की पूरी प्रक्रिया में खामियां
इससे जुड़े कई उदाहरणों से स्पष्ट है कि एनआरसी की पूरी प्रक्रिया में कहीं न कहीं खामी तो है। न जाने कितने नेता, सशस्त्र बलों के अफसर, वकील, पत्रकार और आम आदमी इसके शिकार हुए हैं। मेघालय के राज्यपाल रहे रंजीत सिंह मुसाहारी के बेटे भारतीय सेना में कर्नल स्तर के अधिकारी रहे। उनका बेटा इस समय रिजर्व बैंक में वरिष्ठ अधिकारी है। उसके पास भारतीय पासपोर्ट भी है। उसके पास नागरिकता साबित करने का नोटिस आया तो सारे कागज जमा करा दिए, लेकिन अंतिम सूची में उसका नाम नदारद है। एआइयूडीएफ के मौजूदा विधायक अनंत कुमार मालो के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। ऐसे अंतहीन उदाहरण हैं।
असम गण परिषद ने दी सरकार से अलग होने की धमकी
असम की बिगड़ती जनसांख्यिकी के बीच यह मामला 2009 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी का काम शुरू हुआ तो जाहिर है कि घुसपैठियों को डर सताया होगा। असल तनाव तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने नागरिकता कानून संशोधन विधेयक विधानसभा में पेश किया। इस कानून के तहत बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। यही नहीं घुसपैठियों की पहचान का आधार 1971 की जगह 2014 किया जा रहा है। जाहिर है कि इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान का असल मकसद भटक जाएगा। राज्य सरकार के सहयोगी दल असम गण परिषद ने इसे असम समझौते की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सरकार से अलग होने की धमकी भी दे दी।
बांग्लादेश से सटी जल सीमा सुरक्षित नहीं
यह एक विडंबना ही है कि बांग्लादेश से सटी हमारी 170 किमी की जमीनी और 92 किमी की जल सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसी का फायदा उठाकर बांग्लादेशी बेखौफ यहां आते रहे और बसते रहे। हमारा कानून इतना लचर है कि अगर अदालत किसी व्यक्ति को अवैध प्रवासी घोषित कर देती है तो बांग्लादेश सरकार यह कहकर उसे लेने से इन्कार कर देती है कि भारत के साथ उसका ऐसा कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं हैं। असम में बाहरी घुसपैठ कोई नई नहीं, बल्कि एक सदी पुरानी समस्या है।
असम में बांग्लादेशियों की बड़ी तादाद
शुरुआत में कहा गया कि असम की तमाम बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने में मदद कर ये घुसपैठिये देश का भला कर रहे हैं, लेकिन आज हालात बहुत बिगड़ चुके हैं। इनके कारण राज्य में संसाधनों का टोटा तो पड़ ही रहा है, वहां की पारंपरिक संस्कृति, संगीत, लोकाचार आदि सभी प्रभावित हो रहा है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लगभग आठ साल पहले असम के राज्यपाल रहे पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा ने राष्ट्रपति को भेजी एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि राज्य में बांग्लादेशियों की इतनी बड़ी तादाद बसी है कि उसे तलाशना और फिर वापस भेजने के लायक हमारे पास मशीनरी नहीं है। वह सही साबित हो रहे हैैं।
फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करने का रास्ता खुला
यह राहत की बात है कि एनआरसी के अंतिम मसौदे से बाहर हुए लोग फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैैं। इससे पहले पिछले साल जुलाई में जारी हुई एनआरसी सूची में 3.29 करोड़ लोगों में से 40.37 लाख लोगों के नाम नहीं शामिल थे। अंतिम सूची में उन लोगों के नाम शामिल किए गए हैं जो 25 मार्च 1971 से पहले असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं। भले ही अब राज्य सरकार संयम रखने की दुहाई दे रही हो, लेकिन राज्य में अनिश्चितता का माहौल है। इसे दूर करना होगा।
एनआरसी को अंतिम रूप देने में लगे थे 62 हजार कर्मचारी
एनआरसी को अंतिम रूप देने में 62 हजार कर्मचारी दिन-रात लगे रहे। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में 2015 से यह कार्य शुरू हुआ। पहला रजिस्ट्रेशन 2015 में किया गया था। इसके बाद 2018 तक तीन साल में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 6.5 करोड़ दस्तावेज सरकार के पास जमा कराए थे। इन दस्तावेजों का वजन करीब 500 ट्रकों के वजन के बराबर था। इस काम को संपन्न कराने के लिए केंद्र ने कुल 1,288.13 करोड़ रुपये जारी किए जिसमें 1,243.53 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
असम देश का इकलौता राज्य है जहां नागरिकता रजिस्टर बना है
असम देश का इकलौता राज्य है जहां नागरिकता रजिस्टर बना है। देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसी कवायद की दलीलें दी जा रही हैं, लेकिन असम में तो इसकी सफलता संदिग्ध दिख रही है। इस मामले में पक्षकार संस्था एपीडब्ल्यू की मांग थी कि इस सूची को फिर से सत्यापित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से लोगों को देखा जाए, जिसे कोर्ट ठुकरा चुका है। अब सूची से बाहर हुए लोगों के सामने अपनी नागरिकता बहाल करने के लिए सभी विकल्पों को तलाशना होगा। एनआरसी में नाम न होने पर अपील के लिए समय सीमा को अब 60 से बढ़ाकर 120 दिन कर दिया गया है। यानी 31 दिसंबर, 2019 अपील के लिए अंतिम तिथि होगी।
एनआरसी के विवादों के निपटारे के लिए 1,000 ट्रिब्यूनल्स
गृह मंत्रालय के आदेश के तहत 1,000 ट्रिब्यूनल्स का गठन एनआरसी के विवादों के निपटारे के लिए किया गया है। यदि कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल में केस हार जाता है तो फिर उसके पास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प होगा। इसके बाद भी विदेशी घोषित लोगों को हिरासत में लेकर बांग्लादेश के सामने हमें यह सिद्ध करना होगा कि ये अवैध प्रवासी बांग्लादेश से ही हमारे यहां आए हैं। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल का कहना है कि गलत ढंग से सूची में शामिल हुए विदेशी लोगों और बाहर हुए भारतीयों को लेकर केंद्र सरकार कोई विधेयक भी ला सकती है। हालांकि सरकार की ओर से यह कदम एनआरसी के प्रकाशन के बाद ही उठाया जाएगा।

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