pankajbooks(pankaj chaturvedi)पंकज चतुर्वेदी

My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

children story Belgam Ghoda voice Dr Shbhrta Mishra

बेलगाम घोड़ा
पंकज चतुर्वेदी

अंधेरे, सुनसान कमरे में अचानक ही खलबली सी मच गई....... कबाड़ा होने से दुखी, अपने अंत का इंतजार कर रहे उन धूलभरे डिब्बों में अपने बचपन के दिनों का जेाष जैसे दौड़ गया। कहां तो दिन नहीं कटता था और अब ?...........दिन कम पड़ रहा है। जीवन इतना बदल जाएग ? यह उस दो सौ छियासी ने सोचा भी नहीं था। चार सौ छियासी  की रग-रग में जोष भर गया था। और कई साथी भी थे उनके- सेलरान, सायरेक्स, पेंटियम -एक, दो , तीन--- कुछ सेवफल वाले भी थे।  उफ्फ-- इस हड़बड़ी में तो हम ही भूल गए-- चलो पहले आपको इस कहानी के इन अजूबे नामों से तो मिलवा दें! यह है इस कंपनी के तहखाने में बना बड़ा सा कबाड़ा-घर। जो कुछ काम का नहीं होता, उसे यहीं फैंक दिया जाता है। यहां कुछ सदस्य तो कई सालों से हैं, लगता है कि उनको कंपनी वाले भूल ही गए हैं...... पुराने बड़े से कंप्यूटर.... सबसे बूढ़े दो सौ छियासी , फिर चार सौ छियासी......।
कंपनी का काम बढ़ता गया, जमाने में नई-नई तकनीकें आ गई, सो रफ्तार के लिए आए रोज नई मषीनें आ जातीं। ऐसे में पुराने कंप्यूटरों को इसी अंधेरे गुमनाम कमरे में जमा कर दिया जाता।  फिर कर्मचारी नए चमकते कंप्यूटरों पर काम करने लगते और पुरानों की किसी को परवाह ही नहीं रहती।  दो साल पहले जब एक सेलेरान यहां आया था, तब उसने बताया था कि किसी दिन सभी पुराने कंप्यूटरों को तोड़-फोड़ दिया जाएगा। प्लास्टिक अलग, लोहा अलग, चिप प्लेट अलग की जाएंगी। तभी से जब कभी गोदाम का दरवाजा खुलता, सभी को लगता कि आज षायद मुक्ति मिल जाए, लेकिन कभी कोई नया सदस्य इस बेकार-निकम्मों की जमात में जुड़ जाता तो कभी-कभार किसी मषीन का दिमाग ... नहीं समझे? हां....रैम निकाल कर ले जाता।  फिर नीरसता सी छा जाती।
उस दिन हर बार की तरह दरवाजा खुला, बेचारे कई साल से कुछ बदलाव का इंतजार कर रहे कंप्यूटरों ने पलट कर भी नहीं देखा....निराष हो चुके थे। इस बार कुछ लगभग नए-चमचमाते सेट इस भीड़ में जुड़ गए।  चार सौ छियासी को तो आष्चर्य हो रहा था- ‘‘चलो, हम तो कमजोर थे, काले-सफेद थे... लेकिन यह तो रंगीन है। दमक रहा है ... इन्हें क्यों फैंक दिया गया ?’’
‘‘पता नहीं इंसान कितनी तेजी से नई-नई खोज कर रहा है। लगता है कि कहीं हमारे नए साथियों का जीवन एक महीने से भी कम ना रहा जाए।’’ ऐसा लगा कि नए मेहमान ने चार सौ छियासी के मन की बात को पढ़ लिया। उसने खुद ही अपना परिचय दे दिया, ‘‘ में सीनियर पेंटियम हूं ... पेंटियम- फोर...पंेटियम सीरिज का आखिरी वारिस। जैसे ही ड्यूल कोर ई सीरिज का जमाना आया, मुझे किनारे बैठा दिया।’’
सेलरान षायद कई महीनों बाद बोला होगा, ‘‘जब आपका प्रचलन बढ़ा था तो हमें भी ऐसा ही विस्थापन झेलना पड़ा था।’’
‘‘अब देखो ना वहां जैसे ही पतले पापड़ जैसी स्क्रीन आई, मुझे चलता कर दिया। एक बार में पूरा खाली कर दिया मुझे और अब.....।’’ कुछ ही मिनट पहले आए पेंटियम ने अपने निवास की दुर्गति देख कर दुख प्रकट किया।
षांति छा गई कमरे में  किसी के पास कुछ कहने को कुछ नहीं था। सभी का अपना-अपना समृद्ध इतिहास था, जिसे भुला दिया गया । ना बदन में दौड़ती बिजली, ना ही मधुर संगीत और ना ही माऊस-की बोर्ड का साथ।
पेंटियम के भीतर एक बैटरी अभी भी चल रही थी, जो उसकी घड़ी को संचालित करती थी। वैसे तो उसकी हार्ड डिस्क से सब कुछ निचोड़ कर खाली कर दिया गया था, लेकिन इस मषीन को पूरी तरह समझ पाना उस इंसान के बस की बात भी नहीं है जिसने इसे बनाया है। कहने को तो मषीन को कबाड़ा बना कर फैंक दिया गया था, लेकिन अभी भी उसमें बहुत कुछ चल रहा था। कंप्यूटर के भीतर किसी गुमनाम कोने में बैठा एक घोड़ा  चुपचाप गुमनामी के दिन बिताने को तैयार नहीं था। 
अरे! उसे वैसा घोड़ा मत समझ लेना, जो तांगे में लगता है, षादी में दूल्हा जिस पर बैठता है। हां, ताकत में यह चार पैरों वाले घोड़े से कम नहीं है, लेकिन है बहुत छोटा.... इतना छोटा...... नहीं ... नहीं... आंखें पूरी खोल लो, बिल्लोरी कांच लगा लो.... नहीं दिखेगा। बस उसके करतब ही दिखते हैं। तो यह ‘‘ट्राजन-हॉर्स’’ कुलबुला रहा था। छोटी सी बैटरी से उसने कुछ ताकत जुटाई और आ गया अपने रंग में।
इस घोड़े की खासियत है कि एक बार चल पड़ा तो यह लगातार दुगना-तिगना-चार गुना बढ़ता जाता है। जहां जाएगी वहां इसी का प्रभाव होगा।  ट्राजन-हॉर्स के सक्रिय हेाते ही मषीन भी जागृत हो गई। सबसे पहले संगीत की फाईलें चल पड़ीं। जिस बंद, सीलन भरे कमरे में बरसों से केवल उदासी थी, गानों की मधुर लहरी से झंकृत हो गई।  विचित्र घोड़े की ताकत से अब मषीन पर चित्र भी आने लगे।  अपने अंतिम दिनों का इंतजार कर रहे दूसरे कंप्यूटरों के लिए यह आष्चर्य ही था कि जिस मषीन को ओंधे मुंह पड़ा होना था, वह धमाल पर उतारू है। कुछ पेंटियम एक-दो-तीन इस मषीन के करीब आए और पूछा, ‘‘ तुम अभी भी कैसे इतने तरोतजा हो ?’’
‘‘‘इसमें कौन सी बड़ी बात है ? जरा मुझे छू कर देखो, जरा करीब आओ। अपने नेटवर्क वाले तार को मुझसे सटा दो। फिर देखना।’’ पेंटियम चार इस समय गाना सुनने में मग्न था।
डरते-डरते पुराने पेंटियम-दो ने इस दीवाने से संपर्क कर ही लिया। पलक झपकते ही ‘घोड़ा’’ नई मषीन पर सवार हो गया।
‘‘अरे वाह ! इसमें तो पहले से ही ‘रेड टेप’ है।’’ घोड़े को जैसे बेषुमार हरा चारा मिल गया हो। अब घोडे़े के गले में लाल फीता बंध गया था।  गति पहले से कई गुना तेज हो गई थी। धीरे-धीरे घोड़े का असर उस बेचारे दो सौ छियासी तक पहुंच गया जिसके दिमाग का आकार महज कुछ मेगाबाईट ही था। वह कहां झेल पाता इस बेलगाम घोड़े को।
कई सालों से जिस कंप्यूटर पर धूल अटी हुई थी, वह ‘ट्राजन हॉर्स’ के असर में आ कर पागलों की तरह झनझना गई। उसमें बची-खुची सामग्री पलक झपकते ही पूरी हार्ड-डिस्क पर फैल गई। उसमें अब और क्षमता नहीं थी, लेकिन घोड़े का असर ही ऐसा था कि आंख झपकते ही कई-कई गुणा बढ़ जाता था। अब तो पुरानी मषीन हवा में थी, इधर-उधर टकरा रही थी।  चार सौ छिाासी भी पीछे नहीं थी, उसकी क्षमता कुछ जयादा थी, एसमें दबे-छिपे फोटो ब्लेक एंड वाईट फिल्मों की तरह उभर रहे थे। पेंटियम एक से ले कर चार तक ग्राफीक, संगीत, वीडियों का जलवा था। हंगामें में पूरा गोदाम आई पी एल के  मैच के किसी स्टेडियम की तरह जीवंत लग रहा था।
तभी गोदाम का दरवाजा फिर खुला। कंपनी का कोई कर्मचारी एक लेपटाप कबाड़े में डालने आया था। भीतर से आ रहे हल्ले से वह चौंक गया। एकबारगी तो उसकी चीख ही निकल गई- आखिर यहां यह हो क्या रहा है ? एक सुनसान, बेकार कंप्यूटर के गोदाम में हर एक मॉनीटर कुछ कह रहा था, गुन रहा था-बुन रहा था। कोई उड़ रहा था, कोई दूसरे से जुड़ रहा था।
भरोसा नहीं हो रहा था खुद की आंखों पर। पता नहीं क्या है ? उसने लेपटाप को वैसे ही पटका और चीखते-चिललाते दौड पड़ा- ‘‘ भूत....प्रेत.... बचाओ......’’
इधर वह कर्मचारी सारे दफ्तर को बता रहा था कि उसने क्या देखा। उधर लेपटाप में बैठा नॉर्टन से कंप्यूटरों की यह षैतानी देखी नहीं जा रही थी। ‘‘अच्छा मेरे ना होने का फायदा उठा रहा है यह षैतान घोड़ा।’’ अब बारी थी नॉर्टन के सक्रिय होने की। सबसे पहले उसने विन-32 को पकड़ा फिर उसने ‘लव-बग’ को चबाया। नॉर्टन का असर होते ही रेड टेप का रंग उतर गया।  फिर ट्राजन हॉर्स भी कब्जे में आ गया।
कुछ ही देर में नार्टन का पेट फूल कर गुब्बारे जैसा हो गया था और बाकी के कंप्यूटर ‘‘जैसे थे-जहां थे’’ की हालत में आ गए । उधर कंपनी के कुछ कर्मचारी हिम्मत कर नीचे गोदाम में आए तो वहां सब कुछ पहले जैसा षांत था। सभी ने उस कर्मचारी को नषेड़ी, सनकी और ना जाने क्या-क्या कह दिया। वह बेचारा बार-बार सफाई देता रहा, लेकिन उसकी सुनता कौन।
एक बार फिर कमरा बंद हो गया.... वीरान, अंधेरा, मौन । लेकिन घोड़ा कहां मानने वाला है ? वह इंतजार कर रहा है पांच दिन का। आज से पंाचवे दिन नार्टन की सक्रियता की तारीख खतम हो जाएगी। घोड़ा चुपचाप उसी लेपटाप में बैठा है, जिसके नार्टन ने उसकी लगाम थाम रखी है और अगला हंगामा भी वहीं से होगा।


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

Corona : social distancing but not emotional distancing

कोरोना वायरस: सामाजिक दूरी तो रखिए, भावनात्मक नहीं

पंकज चतुर्वेदी 
कोरोनो वायरस की वैश्विक त्रासदी के भारत की ओर बढ़ते कदम केे प्रति आम लोगों को जागरूक करने के लिए जब देश के प्रधानमंत्री लोगों से अपील कर रहे थे कि जनता सार्वजनिक स्थानों पर कम से कम भीड़ लगाएं, ठीक उसी समय पूरे देश के हर छोटे-बड़े कस्बे में  महिला-पुरूषों की भीड़ बाजारों को जाम किए हुए थी। बदवहासी और आशंका का ऐसा माहौल था कि लोग आटा-चावल तो ठीक साबुन-शैंपू, डायपर जैसी चीजें अपनी क्षमता के अनुसार अधिक से अधिक खरीद रहे थे।  यह जान लें कि ‘कोरोना वायरस’ के प्रसार में इसी तरह की अविश्वास और हाबड़तोड़ की सबसे बड़ी भूमिका है। निष्ठुर लोग कुछ दिनों के लिए शहर-बाजार बंद होने की आशंका मात्र से अपने घर में सबकुछ रखने और अपने पड़ोसी से ज्यादा जमा कर लेने की प्रवृति ही भवनात्मक शून्यता की झलक देती है।  यह कड़वा सच है कि कोरानो  के चलते चीन के बाद इटली और फिर अरब देशों और अमेरिका तक में जनजीवन ठप्प है। सारी दुनिया का आवागमन बंद है। इस जानलेवा बीमारी का अभी तक कोई सटीक इलाज नहीं मिला है और एकदूसरे से दूरी बनाए रखना सबसे बेहतर उपाय है। लेकिन इसका कतई अर्थ नहीं कि निष्ठुर होने से वायरस के प्रकोप को रोका जा सकता है।
jansandesh times lucknow 

उन्नीस मार्च की शाम से सिडनी(आस्ट्रेलिया) से लौटे पंजाब सियाना के निवासी 35 वर्षीय तनवीर सिंह को दिल्ी हवाई अड्डे पर सिरदर्द महसूस हुआ और उनके सामने एक तमाशा सा हो गया। एक मिनट में ही उनसे लोग दूर छिटकने लगे व शक से देखने लगे। सफदरजंग अस्पताल में जब उन्हें लाया गया और ाून के सैंपल लिए गए, उसके बाद उनको एकांत में रखा गया। चारों तरफ के तनावपूर्ण परिवेश को तनवीर सिंह सहन नहीं कर पाए और अस्पतल के सातवें तल्ले से कूद कर आत्महत्या कर ली। हालांकि अब पता चला कि उसे कोरोना के कोई लक्षण नहीं थे। मुंबई में कोरानेा से मारे गए 64 साल के बुर्जुग के घर के आसपास कतिपय युवा आते हैं और कोरोना की आवा लगा कर चिढ़ाते हैं। गाजियाबाद की एक सोसायटी में दो लाोगों को उनके पड़ोसियों ने बिल्डिंग में घुसने नहीं दिया, वे कहते रहे कि हम हवाई अड्डे पर जांच करवा कर आए हैं लेकिन मामला तनातनी तक चला गया। पुलिस आई व मजबूरी में वे दोनो ििफर से जिला अस्पताल के आईसोलेशन वार्ड में भरती हुए। गायिका  कनिका कपूर ने तो गजब ही कर दिया, वे जानती थी कि बीमार हैं लेकिन केवल इस भय से कि कहीं समाज उन्हें संभावित वायरस संक्रमित मान कर हिकारत की नजर से ना देखे; वे आम लोगों से मिलती जुलती रहीं। नतीजा सामने हैं कि खतरा अब संसद तक पहुंच गया।

janwani meerut 
राजस्थान के झुंझनू में जिस घर के लोगों की संदिग्ध मौत हुई उसके चारों तरफ कफर््यू लगा दिया गया। दिल्ली के दिलशाद गार्डन में एक परिवार में दो संदिग्ध को लेने एंबुलेस आई तो वहां घंटों ऐसी भीड़ जमा हुई कि किसी आतंकी को पकड़ा गया हो।  राजधानी में ही कुछ डाक्टरों व अंतरराश्ट्रीय फ्लाईट के पायलेटों से किराए के मकान खाली करवाने की शिकायतें भी आ रही हैं। कुछ ऐसे लोग जो विदेश  से लौटे, उनके दरवाजे पुलिस ने पोस्टर चिपका दिए और कुछ ही देर में सोश ल मीडिया पर सारे परिवार के फोटो साझा हो गए कि इन्हें कोरोंनाा ने अपनी चपेट में ले लिया है।  लखनउ में एक लड़की को खांसी क्या हुई, उसका मकान मालिक उसे बाहर से बंद कर भाग गया। बामुष्किल चार दिन बाद उसे मुक्त करवाया गया। झारखंड में कोरोना के कुप्रचार के कारण क दुकानदार की हत्या हो गई। उधर देश भर के हर शहर-कस्बे से पुलिस और जनता के बीच मारापीटी, हिंसा की खबरें आ रही हैं।  पिटे हुए लोगों के वीडियो जब सोश ल मीडिया पर  देखे जा रहे है। तो ऐसे  पीड़ित लोगों की कुंठाएं भी जटिल हो रही हैं।  तब्लीगी जमात के मरकज से सारे देश  में गए लोगों को पुलिस अपराधी की तरह तलाश  रही है और लोग भी भयवश  भाग रहे हैं।

मामला केवल अपनी जरूरत की चीजों की कमी का नहीं है, छोटे घरों में केवल घर में बंद लोगों के बीच  धीरे-धीरे मानसिक अवसाद भी षुरू हो रहा है। उत्सवधर्मी समाज लंबे समय तक खुद को एक स्थान पर बांध नही ंसकता।  कई लाख लोग जिन षहरों में काम काज करते हैं, वहां से उपेक्षा, तिरस्कार से इतने आहत हो गए कि अपने मूल स्थानों-बिहार,उ.प्र के लिए पैदल, साईकिल या रिक्षे पर निकल चुके हैं। वे जिस रास्ते से गुजर रहे हैं, उन्हें लताड़, उपेक्षा और भय का सामना करना पड़ रहा है। इधर विडंबना है कि हमारा समाज किसी भी तरह संक्रमित व्यक्ति को ना केवल सामाजिक तरीके से दूर कर रहा है, वरन भावनात्मक रूप से इतना दूर कर रहा है कि मरीज में एक अपराधबोध या ग्लानि की प्रवृति विकसित हो रही है। परिणाम सामने हैं कि एक युवा आत्महत्या कर लेता है या एक गायिका सबकुछ छिपाती है।
इन सभी घटनाओं का उल्लेख केवल यह बताता है कि हम लोग इस लिए तो खुश है कि हमारे घर बीमारी नहीं आई, हम इस बात पर संतोष कर रहे हैं लेकिन यह और नहीं फैले, इसकी जिम्मेदारी निभाने को राजी नहीं। विडंबना है कि जब पूरी दुनिया इतने गंभीर संकट से जूझ रही हो तब कुछ जिम्मेदार और समाज में अपना प्रभाव रखने वाले लोग  गौ मूत्र के पान से कोरोनो का निदान होने के सार्वजनिक आयोजन करते हैं या फिर एक केंद्रीय मंत्री महज धूप में बैठने से कोरोना वायरस के मर जाने की बात करते हैं या फिर एक अन्य केंद्रीय मंत्री कोरोना मुक्ति का कोई श्लोक पाठ कर जनता को आश्वस्त करते हैं कि उन तक यह वायरस पहुंचेगा नहीं। इस समय दुनिया के अन्य पीड़ित अनुभवों से सीख लेना, कड़ाई से वैज्ञानिक नजरिये का पालन करना अनिवार्य है। ऐसे मे जिम्मेदार लोगो की गैरजिम्मेदाराना बातें समाज के व्यापक भले की भावना के विपरीत है। यह हमारे सामने हैं कि हमारे देश में महज आशंका के कारण ही सैनेटाईजर या मास्क की कालाबाजारी और नकली उत्पादन होने लगा। यदि संक्रमण का प्रभाव तीव्र होने की दशा में यदि ‘लॉक डाउन’ की स्थिति एक सप्ताह की ही बन गई तो भोजन, पानी, दवाई जैसी मूलभूत वस्तुओं के लिए आम लोगों में मारामारी होगी। अभी तो देश में संक्रमित लोगों कीं सख्या अभी एक हजार भी नहीं है और दिल्ली के अस्पतालों में अफरातफरी जैसा माहौल है। भले ही आप या अपके परिवेश में इस वायरस का सीधा असर ना हो लेकिन इसकी संभावना या देश मंे कहीं भी प्रसार मंदी, बेराजगारी, गरीबी, जरूरी चीजों की कमी, अफरातफरी जैसी त्रासदियों को लंबे समय के लिए साथ ले कर आएगा। जाहिर है कि ऐसे हालात में हमें भावनात्मक रूप से एकदूसरे के साथ जुड़े रहना होगा। जरूरत इस बात की होगी कि यदि किसी में वायरस के संक्रमण की आशंका हो तो उसके साथ प्रेम का व्यवहार किया जाए और उसे अहसास करवाया जाए कि उनसे भले ही दूर से बात कर रहे हैं लेकिन दिल से करीब हैं।
यह बेहद कड़ी सच्चाई है कि  कोविड-19 का इलाज दुनिया में किसी के पास नहीं हैं। जो लोग ठीक भी हुए हैं वे वायरस के प्रभाव के प्रारंभिक असर में थे। यहां तक कि एचआईवी की दवाएं भी इस वायरस के विरूद्ध प्रभावी नहीं रही हैं। महज एक दूसरे के कम से कम करीब आना ही इसके विस्तार को रोक सकता है। अमेरिका और इटली में भी इसका भयानक रूप पहला मरीज मिलने के 21 से 25 दिन बाद सामने आया था और हम अभी उसी पायदान पर हैं। यह समय एकसाथ खड़े होने का है लेकिन दूरी के साथ। भावनात्मक लगाव इसकी बडी औषधि है क्योंकि एकांत इंसान के तन से ज्यादा मन को तोड़ता और कमजोर करता है। एक तो  कोरोना प्रभावित हो चुके या संभावना के चलते एकांतवास कर रहे लोगों के साथ सतर्कता से व्यवहार करना तो जरूरी है लेकिन आपके व्यवहार में तिरस्कार या असम्मान का भाव नहीं होना चाहिए। यह मरीज की आत्मषक्ति को कमजोर करता है जो किसी भी रोग से लड़ने की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिरोधक क्षमता होता है। दूसरा ऐसे लोगोें या पुलिस की प्रताडना के षिकार या केवल संभावना के कारण जांच यया इलाज करवाने गए लोगों की निजता परह मला न करें। ऐसे लोगों से फोन पर नियमित बात करना जरूरी है। उन्हे ं दूर से मुस्कुरा कर हाथ हिलाने भर से वे अपने दर्द को भूल सकते हैं।

बुधवार, 25 मार्च 2020

Corona crisis : Do not forget Farmers

कोरोना के कारण  कहीं किसानों को ना भूल जाएं

पंकज चतुर्वेदी 

जनवाणी मेरठ 
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नोबल कोरोनो जैसी  वैश्विक  महामारी का असर भारत की अर्थ व्यवस्था, रोजगार और आम जनजीवन पर पड़ना ही है। लंबे समय तक बाजार बंदी की मार से बड़े उद्योगपति से ले कर दिहाड़ी मजदूर तक आने वाले दिनों की आशंका  से भयभीत हैं। इन सारी चिंताओं के बीच किसान के प्रति बेपरवाही बहुत दुखद है। वैसे भी हमारे यहां किसानी घाटे का सौदा है जिससे लगातार खेती छोड़ने वालों की संख्या बढ़ रही है, फिर इस बार रबी की पकी फसल पर अचानक बरसात और ओलावश्टि ने कहर बरपा दिया। अनुमान है कि इससे लगभग पैतीस फीसदी फसल को नुकसान हुआ। और इसके बाद कोरोना के चलते किसान की रही बची उम्मीदें भी धराशाही  हो गई हैं। आज भी ग्रामीण भारत की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृषि  है । विदित हो आजादी के तत्काल बाद देश  के सकल घरेलू उत्पाद में खेती की भूमिका 51.7 प्रतिशत थी ,जबकि आज यह घट कर 13.7 प्रतिशत हो गई है। यहां गौर करने लायक बात यह है कि तब भी और आज भी खेती पर आश्रित लोगों की आबादी 60 फीसदी के आसपास ही है। यह अजब संयोग है कि कोरोना जैसी महामारी हो या मौसम का बदलता मिजाज, दोनो के मूल में जलवायु पविर्तन ही है, लेकिन कोरोना के लिए सभी जगह चिंता है, किसान को अपने हाल पर छोड़ दिया गया।
राष्ट्रीय सहारा 

इस साल रबी की फसल की बुवाई का रकबा कोई 571.84 लाख हैक्टेयर था जिसमें सबसे ज्यादा 297.02 लाख हैक्टेयर में गेहूं, 140.12 में दलहन, 13.90 लाख हैक्टैयर जमीन में धान की  फसल बोई गई थी।  चूंकि पछिली बार बरसात सामान्य हुई थी सो फसल को पर्याप्त सिंचाई भी मिली । किसान खुष था कि इस बार मार्च-अप्रैल में वह खेतों से सोना काट कर अपने सपनों को पूरा कर लेगा।  गेहूं के दाने सुनहरे हो  गए थे, चने भी गदराने लगे थे, सरसो और मटर लगभग पक गई थी और मार्च के षुरू में ही जम कर बरसात और ओले गिर गए। गैरजरूरी बेमोसम बरसात की भयावहता भारतीय मौसम विभाग द्वारा 16 मार्च को जारी आंकड़ों में देखी जा सकती है। एक मार्च से लेकर 16 मार्च तक देश के 683 जिलों में से 381 में भारी  बरसात दर्ज की गई । यूपी के 75 जिलों में से 74 में भारी बारिश हुई है तो झारखंड के 24, बिहार के 38, हरियाणा के 21, पश्चिम बंगाल के 16, मध्य प्रदेश के 21, राजस्थान के 24, गुजरात के 16, छत्तीसगढ़ के 25 , पंजाब के 20 और तेलंगाना के 14 जिलों में भारी बारिश हुई है। सनद रहे यही फसल में बीज बनने का समय का  दौर था।  अधिक से अधिक पदं्रह दिन में कटाई षुरू हो जानी थी।  तेज बरसात और ओलों केकारण पहले से ही तंदरूस्त फसल के बोझ से झूल रहे पौधे जमीन पर बिछ गए।  इससे एक तो दाना बिखर जाता है, फिर ओले की मार से अन्न मिट्टी में चला जाता है। फसल भीगने से उसमें लगने वाले कीड़े या अंतिम समय में दाना के पूर्ण आकार लेने की क्षति सो अलग।

कृषि मंत्रालय ने इस साल गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार 10.62 करोड़ टन होने की अनुमान जताया था, लेकिन अब ये उत्पादन गिर सकता है। साल 2019 में देश में 10.36 करोड़ टन गेहूं पैदा हुआ था। गेहूं के साथ दूसरी जो फसल को भारी नुकसान पहुंचा है वो सरसों है। राजस्थान, हरियाणा से लेकर यूपी तक सरसों को काफी नुकसान पहुंचा है। कृषि मंत्रालय अपने रबी फसल के पूर्वानुमान में पहले ही 1.56 फीसदी उत्पादन कम होने की आशांका जाहिर की थी। अकेले उत्त प्रदेष में 255 करोड़ की फसल का नुकसान हुआ है।
मौसम की मार ही किसान के दर्द के लिए काफी थी लेकिन कौरोना के संकट से उसकी अगली फसल के भी लाले पड़ते दिख रहे हैं।  जिसने कटाई षुरू कर दी थी या जिसका माल खलिहान में था, दोनों को बरसात ने चोट मारी है। यातायात बंद होने से चैत काटने वाले मजदूरों का टोटा भी अब हो रहा है।  यदि फसल कट जाए तो थ्रेषर व अन्य मषीनों का आवागमन बंद है।  षहरों से मषीनों के लिए डीजल लाना भी ठप पड़ गया है। वैसे तो फसल बीमा एक बेमानी है। फिर भी मौजूदा संकट में पूरा प्रषासन कोरोनो में लगा है और बारिष-ओले से हुए नुकसान के आकलन, उसकी जानकारी  कलेक्टर तक भेजने और कलेक्टर द्वारा मुआवजा निर्धारण की पूरी प्रक्रिया आने वाले एक महीने में षुरू होती दिख नहीं रही है।  फसल बीमा योजना के तो दस महीने पुराने दावों का अभी तक भुगतान हुआ नहीं है। यही नहीं कई राज्यों में बैंक किसानों से 31मार्च से पहले पुराना उधार चुकाने के नोटिस जारी कर रहे हैं। जबकि   आने वाले कई दिनों तक किसान की फसल मंडी तक जाती दिख नहीं रही है।

छोटे किसान को कौरोनो की मार दूसरे तरीके से भी पड़ रही है। नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक देश में 14 करोड़ हैक्टर खेत हैं।  विभाग की ‘‘भारत में पारिवारिक स्वामित्व एवं स्वकर्षित जोत’’ संबंधित रिपोर्ट का आकलन बेहद डरावना है। सन 1992 में ग्रामीण परिवारों के पास 11.7 करोड़ हैक्टर भूमि थी जो 2013 तक आते-आते महज 9.2 करोड़ हैक्टर रह गई।  यदि यही गति रही तो तीन साल बाद अर्थात 2023 तक खेती की जमीन आठ करोड़ हैक्टर ही रह जाएगी। इसके मूल कारण तो खेती का अलाभकारी कार्य होना, उत्पाद की माकूल दाम ना मिलना है। इसी लिए हर किसन परिवार से कोई ना कोई षहरों में चौकीदार से ले कर क्लर्क या कारखाना मजदूर की नौकरी करने जा रहा है। कौरोना के संकट ने बीते एक महरीने के दौरान षहरों में काम बंदी की समस्या को उपजाया और भय-आषंका और अफवाहों से मजबूर लोग गांव की तरफ लौट गए। इस तरह छोटे किसान पर षहर से आए लोगों का बोझ भी बढ़ रहा है।। कौरोनो के कारण ,खाद्यान में आई महंगाई से ग्रामीण अंचल भी अछूते नहीं हैं। एक बात और असमय बरसात कोरोना  ने  सब्जी, फूल जैसी ‘‘नगदी फसलों’’ की भी कमर तोड़ दी है। षहर बंद है, पूजा स्थल बंद हैं और विवाह और अन्य  आयोजन भी ठप्प  हैं और ऐसे में फूल उगाने वाले को खेतों में ही अपने फूल सड़ाने पड़ रहे हैं। ठीक इसी तरह गांव से षहर को चलने वाली बसें, ट्रैन व स्थानीय परिवहन की पूरी तरह बंदी से फल-सब्जी का किसान अपने उत्पाद सड़क पर लावारिस फैंक रहा है।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देष के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी। उसे सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देष के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।  सरकार व समाज रोज ही षेयर बाजार के उतार चढ़ाव पर आहें भर रहा है, सोनो-चांदी के दाम पर चिंतित हो रहा है लेकिन किसान के ममाले में संवेदनहीनता कही हमारे देष की खाद्य सुरक्षा के दावों पर भारी न पड़ जाए।  कोरोना की चिंता के साथ किसान की परवाह भी देा के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।


शनिवार, 21 मार्च 2020

home remedies can prevent big medical expenditure

आंगन की हरियाली बचा सकती है बीमार होने से
पारंपरिक ज्ञान बेहतर है महंगे चिकित्सा खर्च से
पंकज चतुर्वेदी

कुछ सौ रूपए व्यय कर मच्छर नियंत्रण से जिन बीमारियों को रोका जा सकता है , औसतन सालाना बीस लाख लोग इसकी चपेट में आ कर इसके इलाज पर अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई के अरबों रूपए लुटा रहे हैं । स्वास्थ्य के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में षर्मनाक है। यहां तक कि चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान व बांग्लादेष से भी बदतर हैं। अंतरराश्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘ लांसेट’ की ताजातरीन रिपोर्ट ‘ ग्लोबल बर्डन आफ डिसीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हमारा देष दुनिया के कुल 195 देषों की सूची में  145वें स्थान पर है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने सन 1990 के बाद अस्पतालों की सेहत में सुधार तो किया है। उस साल भारत को 24.7 अंक मिले थे, जबकि 2016 में ये बढ़ कर 41.2 हो गए हैं। उधर यह वैज्ञानिक भी मान चुके हैं कि यदि आपके घर पर  कहीं एक तुलसी को पौधा लगा हो तो मच्छर दूर रहेंगे, जिसकी कीमत बामुश्किल  पंद्रह-बीस रूपए होती है। ठीक इसी तरह भोजन में नियमित हल्दी का इस्तेमाल शरी के कई विकारों को दूर रखता है।
धरती कभी आग का गोला था, पर्यावरण ने इसे रहने लायक बनाया और प्रकृति ने मुनष्यों सहित सारे जीवों, पेड़-पौधों का क्रमिक विकास किया। प्रकृति और जीव एक दूसरे के पूरक हैं। यजुर्वेद में एक श्लोक वर्णित है-
ओम् द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयेः शान्तिर्विष्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वँ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।
ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
इस श्लोक में इंसान को प्राकृतिक पदार्थों में शांति अर्थात संतुलन बनाए रखने का उपदेश दिया गया है। श्लोक में पर्यावरण समस्या के प्रति मानव को सचेत आज से हजारों साल पहले से ही किया गया है। पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति आदि में शांति का अर्थ है, इनमें संतुलन बने रहना। जब इनका संतुलन बिगड़ जाएगा, तभी इनमें विकार उत्पन्न हो जाएगा। और आज का समाज इस त्रासदी को भोग रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक खेेज व मशीनी सुविधाओं ने भले ही इंसान के जीवन को कुछ सरल बना दिया हो, लेकिनइस थोड़ी सी राहत ने उनके विकित्सा व्यय में जरूर बढ़ौतरी कर दी है।  शिक्षा के प्रसार के साथ ही आम लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता तो बढ़ी लेकिन विडंबना है कि समाज अपनी पारंपरिक ज्ञान के बनिस्पत ऐसी चिकित्सा प्रणाली की ओर ज्यादा आकर्षित हो गया, जिसका आधार मूलरूप से बाजारवाद है और इसके दूरगामी परिणाम एक नई बीमारी की ओर कदम बढ़ा देते हैं।
हिंदू धर्म में परंपरा है कि देव को फूल अर्पित किए जाएं, प्रशाद में तुलसी को शामिल किया जाए। मंदिर जाएं, आरती करें और घंटे जैसे वाद्य यंत्र बजाएं। इस्लाम में भी पांच वक्त नमाज की अनिवार्यता है। एक बात जान लें तुलसी या फूल चढ़ाने से भगवान को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सारी कायनात, जिसमें फल-फूल भी हैं, को तो उसी परम पिता परमेश्वर ने बनया है। ठीक इसी तरह घंटा बजाने या या पांच वक्त नमाज से परवरदिगार या भगवान  को खुश नही ंकिया जा सकता। वे तो इंसान के अच्छे कर्म से ही खुश होते हैं। वास्तव में ये सभी परंपरएं हर उक इंसान को निरोग रखने और अपने पड़ोस-आंगन में ही प्राथमिक उपचार की परंपरा का हिस्सा रही हैं। भगवान कभी नही  अपेक्षा करता कि उनका भक्त किसी दूसरे की क्यारी से फूल या फल तोड़ कर उन्हें आस्था से चढ़ाए। वास्तव में यह परंपरा बनाई ही इसी लिए गई कि लोग प्रभु के बहाने अपने घर-आंगन-क्यारी में कुछ फूल व फल लगाएं।  हकीकत में घर में लगने वाले अधिकांश  फूल ना केवल परिवेश की वायु को शुद्ध रखने में भूमिका निभाते हैं, बल्कि वे छोटी-मोटी बीमारी की दवा भी होते हैं। तुलसी तो प्रत्येक चिकित्सा प्रणाली में कई रोगों को इलाज  ही नहीं, कई बीमारियों को अपने पास आने से भी रोकती हैं।  ठीक इसी तरह मंदिर में घंटा या ताली बजाना शरीर की पूरी एक वर्जिश होती है।  यह आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि ताली बजाने, हाथ उपर कर घंटा बजाने से समूचे शरीर की वर्जिश होती है। ठीक इसी तरह पांच वक्त नामज का अर्थ हुआ कि इंसान पांच बार अपने शरीर को साफ रखता है और नमाज की पूरी प्रक्रिया भी समूचे शरीर के हर अंग की संपूर्ण वर्जिश ही है।
तुलसी एक संपूर्ण चिकित्सालय
तुलसी का बॉटेनिकल नाम ऑसीमम सैक्टम है। यह पौधा तमाम रोगों के इलाज में कारगर है। आयुर्वेद विशेषज्ञों ने इसे धार्मिक परंपरा से जोड़ कर हर आंगन तक पहुंचा दिया। ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है।
आयुर्वेद, यूनानी व तमाम एलोपैथ के डॉक्टर तुलसी को आंगन में डॉक्टर का नाम देते हैं। आयुर्वेदाचार्य पं. आत्माराम दूबे बताते हैं कि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ चरक संहिता, सूश्रुत संहिता, अष्टांग हृदय, भाव प्रकाश, वाणभट्ट संहिता आदि सभी ग्रंथों में तुलसी का महत्व बताते हुए इसे जीर्ण ज्वर, खांसी, प्रतिश्पात (जुकाम, नजला, सर्दी), ठंड आने वाली बुखार, मियादी बुखार जिसमें नियत काल के बाद बुखार आता है, का प्रमुख इलाज बताया गया है। ऋतु परिवर्तन के साथ जितने तरह की बीमारियां आती हैं, उनमें तुलसी के प्रयोग की सलाह दी जाती है। वायु व कफ जनित रोगों में यह प्रमाणिक रूप से कारगर है। विज्ञान जगत ने इसके एंटी बायोटिक गुणों की भी खोज की है, यानि यह जीवाणुओं को नष्ट भी करता है।   इसमें महक के लिए उत्तरदायी यूजीनॉल मिलता है। जहां पर्याप्त संख्या में तुलसी के पौधे हों, वहां मच्छर आदि नहीं आते। तुलसी में ट्रैनिन, सैवोनिन, ग्लाइकोसाइड और एल्केलाइड्स, विटामिन सी आदि तत्व होते हैं। इसमें एंटी बैक्टीरियल, एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी माइक्रोबियल, एंटी वायरस, एंटी फंगल आदि गुण होते हैं।
यही कारण है कि तुलसी को अपने घर में लगाने और प्रशाद में इसी उपस्थिति की अनिवार्यता की बात धर्म में की जाती है। इसी बहाने आम लोग हर दिन अपने शरीर को बीमारियों से परे रख सकते हैं। यही नहीं अपने परिवेश में बहुत ही कम देखभाल से उग आने वाले पेड़ जैसे- अर्जुन, अशोक, गुड़हल नीम आदि अपने आपमें संपूर्ण अस्पताल होते हैं। कहा जाता था कि हर बस्ती के लिए जरूरी होता है कि वहां एक जल का साधन जैसे कुआं हो और साथ में नीम, पीपल  अथवा बड़ का पेड़ भी हो। यही नहीं घर में ही धनियां, लहसुन, पुदीना, नीबू अािद रसोई का सामान तो है ही कई बीमारियों का पुख्ता इलाज भी है।
हमारे पुरा-समाज ने यह परिकल्पना यही सोच के साथ की थी कि इन पेड़-पौधों केे कारण एक तो रोग बस्ती में फटके नहीं और आएं भी तो उनका इलाज अपने आसपास लगी हरियाली में ही मिल जाए। दुर्भाग्य है कि आज पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को अंधविश्वास करार दिया जा रहा है और साधारण सी बीमारी जैसे- बुखार, खांसी, जुकाम , पेट दर्द या खुजली अािद के लिए जांच व  दवा के एवज में अफरात कमाई की जाती है। हकीकत तो यह है कि हमारी जीवन शैली से हरियाली के दूर होने के चलते ही इसमें से कई बीमारियां हम तक आती हैं। आज नीम के काटाणुरोधी गुणों के कारण इसका इस्तेमाल कई दवाओं के साथ-साथ कीट नाशकों में भी हो रहा है। हालांकि यह बेहद संवेदनशील मसला है कि  अपने परिवेश की वनस्पति का चिकिस में इस्तेमाल क्सा हर कोई कर सकता है या फिर इसके जानकार की सलाह से ही ऐसा किया जाए।

भारत के आदिवासी: जिनका जड़ीबूटी ज्ञान है आधुनिक चिकित्सा से बेहतर
जिस आदिवासी समाज के जीवकोपार्जन , सामाजिक जीवन और अस्तित्व का आधार ही पेड़ हो, वह तो उसे हानि पहुंचाने से रहा। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग आदिवासी परम्पराओं और मान्यताओं से सराबोर है। बस्तर में नीम, महुआ, बरगद, आम, पीपल, नींबू, अमरूद, कुल्लू, मुनगा, केला, ताड़ी, सल्फी, गुलरबेल एवं कुल 16 प्रकार के पेड़ों को आराध्य माना जाता है व इनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके अलावा सौ प्रकार से ज्यादा वृक्ष, 28 प्रकार की लताएं, 47 प्रकार की झाडिय़ां, 9 प्रकार के बंास तथा फर्न को भी पूजा जाता है।
भले ही लोग भगवान की कसम खा कर खूब झूठ बोलें लेकिन जनजाति के लोग अपने आराध्य या कुल के पेड़ की कभी झूठी कसम नहीं खाते। आदिवासी समाज में गोत्रों के नाम, पेड़ पौधे व वन्य प्राणियों के आधार पर रखे गए हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि वनों के बीच रहने के चलते पेड़ों एवं वन्य प्राणियों से इनका गहरा जुडा़व रहा है। आदिवासी समाज में सबसे अधिक महत्व साज के वृक्ष का होता है, अपने आराध्य बूढ़ादेव की या साज के पत्तों की कसम खिलाई जाए तो वह झूठ बोल नहीं सकता है, भले ही सच बोचने पर उसकी जान ही चली जाए।
बीते कुछ दशकांे के दौरान प्रगति के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने ना केवल आदिवासियों के पारंपिरक झान पर डाका डाला, बल्कि उनके चिकित्सीय-संसाधन पर भी बलात कब्जा कर लिया। इसी कारण उनका चिकित्सा ज्ञान भी अब ‘‘सभ्य’’ समाज द्वारा बाजार में बिकने वाली चीज बनता जा रहा है ।
छत्तीसगढ़ अंचल के आदिवासी इलाके में बस्तर-अबुझमाड़ के बाशिंदों के जीवन के गूढ़ रहस्य आज भी अनबूझ पहेली हैं । अभी कुछ साल पहले तक बस्तर के 95 वर्षीय चमरू राम कैसी भी टूटी हड्डी को 10 दिन में जोड़ दिया करते थे । पूरी तरह अनपढ़ इस आदिवासी के पास हड्डियां जुड़वाने के लिए सुदूर महानगरों के सम्पन्न लोगों का तांता-सा लगा रहता था । चमरू राम कई अन्य  जड़ी-बूटियों के भी जानकार थे और मरीज की नब्ज का हाल जानने के लिए पपीते के पेड़ के तने से बना स्टेथिस्कोप प्रयोग में लाते थे। उनके बाद वह पारंपरिक ज्ञान अगली पीढी तक जा नहीं पाया।  डोंगरगांव के कुम्हारपारा व अर्जुनी के गड़रिया दंपत्ति बबासीर का शर्तिया इलाज करते हैं । ये लोग अपनी दवा बिही (अमरूद) की छाल से तैयार करते हैं, लेकिन उसका फार्मूला किसी को नहीं बताते हैं । इसी प्रकार बघेरा के दाऊ रामचंद्र देशमुख की प्रसिध्दि का कारण इनकी लकवा की अचूक दवाई है । यहां जानना जरूरी है कि ये सभी ‘‘डॉक्टर’’ अपने मरीजों से किसी भी तरह से कोई फीस नहीं लेते हैं । बस्तर के जंगलों में ‘‘संधानपर्णी’’ नामक एक ऐसी बूटी पाई गई है, जिससे कैसा भी ताजा घाव 24 घंटे मेें भर जाता है । ग्रामीयों का दावा है कि यही वह बूटी है, जिसके लिए हनुमान पर्वत उठा कर ले गए थे और लक्ष्मण स्वस्थ हुए थे । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के रिटयर्ड डाक्टर जगन्नाथ शर्मा ने इस जड़ी-बूटी की पुष्टि भी की ।



इन आदिवासियों द्वारा सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रयुक्त औषधि वनस्पतियों में से अधिकांश का उपयोग अब आयुर्वेदिक व अंग्रेजी दवाईयों के निर्माण में होने लगा है । ‘‘मुस्कानी भाजी’’ याणी मंडूकपर्णी का उपयोग मन की प्रसन्नता हेतु बतौर दवा के होता है । ‘‘पथरिया भाजी’’ के नाम से जंगलों में मिलने वाली पुनर्नवा झाड़ी को पथरी का इलाज माना जाता है । हठजोड (अस्थि संहारक) को हड्डी जाड़ने में, धन बेहेर (अमलतास) को पाचन, अटकपारी (पाठल) को सिर दर्द, जीयापोता को पुत्र प्राप्ति, ऐठी-मुरी (मरोंड़ फली) को पेट दर्द, बेमुची (बागची) को त्वचा रोगों के इलाज में प्रयोग करना आदिवासी भलीभांति जानते हैं । अशोक के वृक्ष से बनी दवाओं को स्त्री-रोग में ठीक माना जाता है तो सांप-चढ़ी से सर्प विष उतार दिया जाता है । आदिवासी लोग परिवार नियोजन के लिए गुड़हल का प्रयोग करते हैं तो सहजन को रक्तचाप में । आज ये सभी बूटियां आधुनिक चिकित्सा तंत्र का अहम हिस्सा बन गई हैं । तेज बुखार आने पर कपुरनि (दुध मंगरी) की जड़ गले में बांध दी जाती है तो डायरिया, मलेरिया का इलाज क्रमशः गोरख मुंडी व पारही कन्दा नामक जंगली झाड़ियों में छिपा है । मुई-कीसम का प्रयोग बच्चों के फोड़े-फुंसी में होता है ।
बस्तर अंचल में पाए जाने वाले मोहलेन की विशेषता है कि उससे निर्मित ‘‘पोटम’’ (प्याले) में दस साल तक चावल खराब नहीं होता है, ना ही उसमें कीड़े घुन लगते हैं । जनजातियों में आदमी के अस्वस्थ होने पर इलाज करने के दो तरीके होते हैं । पहला है- बईघ यानी वैद्य की जड़ी-बूटियां और दूसरा है-मती या ओझा या बैगा जो भूत-प्रेत झाड़ता है । बईघ अपनी जड़ी-बूटियां खुद जंगलों से गोपनीय ढंग से चुनता है । बागर, सरगूजा जिले के घने वन, अमरकंटक, धमतरी, गरियाबंद, आदि के अरण्यों में अदभुत जड़ी-बूटियों का अकूत भंडार है । महानदी, शिवनाथ, खारून नदियों के किनारे-किनारे घृतकुमारी, शंखपुष्पी, ब्राहपी, हरण, पर्णी, गोरख मुंडी आदि 300 से अधिक जड़ी बूटियां नैसर्गिक वातावरण में स्वतः उगती रहती हैं ।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन आदिवासियों को बाहरी दुनिया की तथाकथित आधुनिकता से अवगत कराने, जनजातियों की जीवन-शैली पर शोध करने और ना जाने किन-किन बहानों से बाहरी लोग उनके बीच में पहुंचे । इन समाज सेवकों के अति उतसाह व अतिरंजित प्रशासन या विकास ने उनके परंपरागत सामाजिक और सांस्कृतिक आवरण को छेड़ने की भी कोशिश की । गौरतलब है कि इन बाहरी पढ़े-लिखे लोगों ने आदिवासियों को भषणों के अलावा कुछ नहीं दिया । बदले में उनके निः स्वार्थ गुरों (जैसे जड़ी बूटियों के प्रयोग) का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर में ‘‘चिलाटी’’ नामक पेड़ मिलता है । इसकी छाल कतिपय बाहरी लोग आदिवासियों से मात्र दो रूपए किलों में खरीदते है । बाद में इसके ट्रक भर के आंध्रप्रदेश भेज दिये जाते हैं और इसका कई सौ गुना अधिक दाम वसूला जाता है । सनद रहे चिलाटी की छाल का उपयोग नशीली दवाओं के निर्माण में होता है । लेकिन यह त्रासदी है कि छाल निकालने के बाद चिलाटी का पेड़ सूख रहे हैं, क्योंकि उन फर ड्रग-माफिया की नजर है । ये माफिया भोले-भोले आदिवासियों को इस घृणित कार्य में मोहरा बागर हुए हैं । यही नहीं अब इन जंगलों में जड़ी-बूटियां उखाड़ने का काम चोरी छिपे युुध्द स्तर पर होने लगा है । इससे यहां के हजारों वर्ष पुराने जंगलों का प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा  रहो है । साथ ही वनवासियों के अपने दैनिक उपयोग के लिए इन जड़ी बूटियों का अभाव होता जा रहा है ।
जिस विशिष्ठ संस्कृति और जीवन शैली के चलते जनजातिय समाज के लोग हजारों वषों से सरलता व शांति से जीवन पीते आ रहे हैं, उसे समकालीन समाज की तमाम बुराईयां ग्रस रही हैं । आदिवासियों के विकास के नाम पर उन पर अपने विचार या निर्णय थोपना, देश की सामाजिक संरचना के लिए खतरे की घंटी ही है । जनजातिय जड़ी बूटियों को जानने की बाहरी समाज की मंशा निश्चित ही स्वार्थपूर्ण है, और इससे जंगल के स्वशासन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ेगा । अतीत गवाह है कि जब-जब वनपुत्रों पर बजारू संस्कृति थेापने का प्रयास किया गया, तब-तब वंश हिंसात्मक प्रतिरोध और अलगाववादी स्वर मुखर हुए है । आदिवासियों की चिकित्सा पध्दति, सभ्य (?) समाज की कसैली नजरों से बची प्राचीनतम भारतीय संस्कृति का दम तोड़ता अवशेष है । इसके संरक्षण के लिए मात्र यही काफी होगा कि समाज और सरकार उनमें अपनी रूचि दिखाना छोड़ दे ।

बुधवार, 18 मार्च 2020

COVID-19 OR CORONA VIRUS IS MAJOR THREAT TO INDIAN SOCIETY AND ECONOMY

 कोविड-19 से सतर्क रहना जरूरी है

पंकज चतुर्वेदी 
बिजली के मीटर बनाने वाली नोएडा की एक कंपनी  कोई बीस दिन पहले ही इस लिए बंद हो गई । चूंकि मीटर के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से ‘डिजीटल डिसप्ले’ की चीन से ही सप्लाई होती थी और जो पूरी तरह बंद हो गई  सा कारखाने में तालाबंदी हो गई। ‘रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाले’ इस कंपनी के मजदूर जो अधिकांश बंुदेलखंड जैसे इलाकों से हैं , अब धीरे-धीरे अपने गांव- कस्बों में लौट रहे हैं। गाजियाबाद जिले की साढे सात सो से अधिक लघु व मध्यम औद्योगिक इकाईयों के कोरोना वायरस के चलते बंद होने से हजारों लोगों के घरों पर चूल्हा जलने पर संकट खड़ा हो गया है। पूरे देश में दवाई, टीवी, मोबाईल व अन्य इलेक्ट्रानिक उत्पाद के कई हजार ऐसे कल-कारखाने बंद होने के कगार पर हैं जिनका उत्पादन-आधार ही चीन से आने वाला सामामन है। बाजार का हल तो सामने है। यह तो उस समय है जब कौरोना वायरस के कुप्रभाव का दूसरा चरण अभी प्रारंभ हुआ है।  जैसी संभावना है कि आने वाले कुछ दिनों में कौरोना वायरस का संक्रमण तीसरे चरण में भयावह रूप से आम लोगांे पर हमला कर सकता है।

कोविड-19 का पहला चरण तो उन देशों में बीमारी का हमला होता है जहां कौरोना वायरस ने अपना घर बना लिया हो, दूसरे चरण में संक्रमित देशों से विभिन्न देशों को जाने वाले पर्यटकों का वायरस की चपेट में आना और तीसरे चरण के तहत बाहर से आए लोगों के साथ आए संक्रमण का स्थानीय लोगों में प्रसार होना की खतरनाक अवस्था होती है। हमारे लिए चेतावनी है कि देश में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र है और वहां जो लोग भी इस वायरस के शिकार हैं वे छोटे कस्बों तक मिले हैं। यह सर्वविविदत है कि भारत में चिकित्सा सेवाएं बहुत कमजोर हैं, लोगों में वैज्ञानिकता के बनिस्पत आस्था या अंधविश्वास का ज्यादा जोर होता है और शिक्षा व जागरूकता की कमी है।  उधर दिल्ली जैसे शहर जो आबादी से लबालब हैं, सार्वजनिक परिवहन व अन्य स्थान भीड़ से तरबतर हैं, कौरोना जैसे  वायरस के फैलने के लिए माकूल परिवेश देते हैं।  कोविड़ के कारण समूचे चिकित्सा तंत्र पर दवाब तो होगा ही, इसको रोकने, संक्रमित व्यक्ति के इलाज पर होने वाले व्यय का भार भी सरकार व समाज पर पड़ना है। यह हमारे सामने हैं कि हमारे देश में महज आशंका के कारण ही सैनेटाईजर या मास्क की कालाबाजारी और नकली उत्पादन होने लगा। यदि संक्रमण का प्रभाव तीव्र होने की दशा में यदि ‘लॉक डाउन’ की स्थिति एक सप्ताह की ही बन गई तो भोजन, पानी, दवाई जैसी मूलभूत वस्तुओं के लिए आम लोगों में मारामारी होगी। अभी तो देश में संक्रमित लोगों कीं सख्या डेढ सौ भी नहीं है और दिल्ली के अस्पतालों में अफरातफरी जैसा माहौल है। भले ही आप या अपके परिवेश में इस वायरस का सीधा असर ना हो लेकिन इसकी संभावना या देश मंे कहीं भी प्रसार मंदी, बेराजगारी, गरीबी, जरूरी चीजों की कमी, अफरातफरी जैसी त्रासदियों को लंबे समय के लिए साथ ले कर आएगा।

हमारी तरफ कोविड- 19 का खतरा किस तरह बढ़ रहा है इसे जानने के लिए इसके प्रसार की प्रक्रिया को समझना जरूरी है । इस बीमारी का मूल कारक ‘एसएआरएस कोव-2’ नामक वायरस है। इसके अलावा भी छह अन्य किस्म के कौरोना वायरस होते हैं जिनके कारण आम सर्दी-जुकाम और एसईआरसी अर्थात सीवियर एक्यूट रेसपायरीटी सिंड्रोम और एमईआरसी अर्थात मिडिल ईस्ट रेसपायरीटी सिंड्रोम जैसी बीमारियां होती हैं। इन दिनों दुनिया में कोहराम मचाने वाला वायरस तेलीय वसे का आणविक कण हैं जिसकी सतह पर ‘‘मुकुट अर्थात क्राऊन’’ की तरह कांटे निकले होते हैं और तभी यह कौरोना कहलाता है। माना जता है कि इसका मूल चमगादड़ हैं। चूंकि यह तेलीय कण है तभी साबुन या अल्कोहल आधारित घोल के संपर्क में आते ही निष्क्रिय हो जाता है। यह वायरस किसी संक्रमित व्यक्ति से किसी स्वस्थय व्यक्ति के नाक, मुंह या आंखें के जरिये प्रवेश करता है। संक्रमित छींक या खांसी के साथ निकली बूंदों में यह एक मीटर तक मार करता है। कपड़े-त्वचा आदि चिपक जाने के बाद पर यह लंबे समय तक जीवित रहता है।  स्वस्थ्य इंसान के शरीर में घुसते ही यह एसीई-2 प्रोटिन बनाने वाली कोशिकाओं पर चिपक जाता है। इसी तेलीय संरचना कोशिकाओं की झिलली को कमजोर करती हैं। इसी प्रक्रिया में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है व संक्रमित व्यक्ति को बुखार आने लगता है। प्रत्येक संक्रमित कोशिका पलक झपकते ही सैंकड़ो-हजारों में गुणित होने लगती हैं। इससे पैदा अनुवाशिकी पदार्थ ‘‘आरएनए’’ संक्रमण को फैंफडों तक ले जाता है। इस तरह बीमार व्यक्ति की छींक या खांसी से निकली बूंदें परमाणु बम की तरह अपनी जद में आए लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं। सबसे चिंताजनक यह है कि शरीर के भीतर संक्रमण फैलने की गति इतनी  तेज होती है कि अधिकांश मामलों में जब तक डाक्टर इसे समझता है, मरीज के फैंफडों में वायरस अपना पूरा कुप्रभाव दिखा चुका होता है।
भारत में इसके कुछ मरीज ठीक भी हुए हैं, वे केवल इस लिए ठीक हुए कि उन्हें संक्रमण  फैलने से पहले ही पहचान लिया गया और उनका इलाज हो गया। यह भी बात सच है कि अभी इसके जांच की सुविधांए सीमित हैं और सरकारी अस्पताल तक ही हैं।
ऐसे में अल्प शिक्षित, कम जागरूक, मजबूरी में भीड़ भरे सार्वजनिक स्थलों पर रहने वाले जब तक आम बुखार या सर्दी-जुकाम को समझें तक तब इसके गंभीर रूप लेने की संभावना अधिक है।  फिर ऐसा व्यक् िसमाज में किन-किन लोगों के संपर्क में आया, इसका पता लगना कठिन होगा।
इस समय तो जहां तक संभव हो, सार्वजनिक स्थानों पर जाने से परहेज करना, बार-बार हाथ धोना, गैरजरूरी अपनी आंख-नाक को हाथ लगाने से बचना जरूरी है।  साथ ही इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि इसका सामाजिक-आर्थिक असर लंबे समय तक आम लोगों को प्रभावित करेगा।



शनिवार, 14 मार्च 2020

why Nehru has to be remembered today too

आज का दौर और पंडित नेहरु

पंडित नेहरु वे भारतीय नेता थे जो आज़ादी की लडाई के दौरान और उसके बाद अपनी मृत्यु तक सत्ता में भी साम्प्रदायिकता , अंध विश्वास से लड़ते रहे- पार्टी के भीतर भी और बाहर भी . एक तरफ जिन्ना की सांप्रदायिक राजनीती थी तो उसके जवाब में कांग्रेस का बड़ा वर्ग हिन्दू राजनीति का पक्षधर था, . पंडित नेहरु हर कदम पर धार्मिकता, धर्म अन्धता और साम्प्रदायिकता के भेद को परिभाषित करते रहे , जान लें आज भी नेहरु कि मृत्यु के ५५ साल बाद संघ परिवार केवल नेहरु का गाली बकता है और दूसरी तरफ जमायत जैसे सांप्रदायिक संगठन सी ए ए/ एन आर सी आन्दोलन स्थल पर अम्बेडकर व् गांधी की चित्र तो लगाते हैं लेकिन नेहरु का नहीं . नेहरु के बारे में झूठी कहानियां गढ़ना , उनके फर्जी चित्र बनाना , उनके बारे में अ श्लील किस्से इलेक्रनिक माध्यम पर भेजना -- तनिक सोचें कि अपनी मृत्यु के पचपन साल बाद भी आखिर उनसे किसे खतरा है ? जो इस तरह की अभद्र हरकतों की साजिश होती है ?? असल में उन्हें नेहरु के विचार, नीति या मूल्यों से खतरा है जो कि सांप्रदायिक उभार से सत्ता पाने की जुगत में आड़े आता हैं .

इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए कि साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित हुए देश में " सांप्रदायिक सद्भाव" की अवधारणा और सभी को साथ ले कर चलने की नीति और तरीके की खोज पंडित नेहरु ने ही की थी और उसी के सिद्धांत के चलते , उनकी सामाजिक उत्थान की अर्थ निति के कारण सांप्रदायिक लेकिन छद्म सांस्कृतिक संगठनो के गोद में पलते रहे राजनितिक दल चार सीट भी नहीं पाते थे .
मेरा नेहरु को पसंद करने का सबसे बड़ा कारण है कि वे राजनेता थे , लेकिन राजनीती में आदर्शवाद में उनकी गहन आस्था थी , उनकी दृष्टि दूरगामी थी और उनकी नीतियाँ वैश्विक . वे वेहद संयमित, संतुलित और आदर्श राष्ट्रवाद के पालनकर्ता थे , उनके लिए राष्ट्रीयता देश के लिए भावुकता से भरे सम्बन्ध थे, वे दयानंद, विवेकानन्द या अरविन्द के राष्ट्रवाद सम्बन्धी "धार्मिक राष्ट्रीयता" से परिपूर्ण दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे . तभी संघ परिवार राष्ट्रीयता के नाम पर इन नेताओं की फोटो टांगता है , हालांकि देश के लिए उनके योगदान पर वे कुछ आपदाओं के समय नेकर पहने सामन ढ़ोने के कुछ फोटो के अलावा कुछ पेश कर नहीं पाते हैं , नेहरु का राष्ट्रवाद विशुद्ध भारतीय था , जबकि उनके सामने राष्ट्रवाद को हिन्दू धर्म से जोड़ने वाले चुनौती थे .
नेहरु का स्पष्ट कहना था कि भारत धर्म निरपेक्ष राज्य है न कि धर्म-हीन . सभी धर्म को आदर करना , सभी को उनकी पूजा पद्धति के लिए समान अवसर देना राज्य का कर्तव्य है .वे धर्म के वैज्ञानिक और स्वच्छ दृष्टिकोण के समर्थक थे, जबकि उनके सामने तब भी गाय-गंगा- गोबर को महज नारों या अंध-आस्था के लिए दुरूपयोग करने वाले खड़े थे .

नेहरु मन-वचन- कर्म से लोकतान्त्रिक थे ,उनका लोकतंत्र केवल राजनितिक नहीं था, सामजिक और आर्थिक क्षेत्र को भी उन्होंने लोकतंत्र की परिधि में पिरोया था , नेहरु जानते थे कि देश का ब्रितानी राज में स्सबसे ज्यादा नुक्सान सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष के कारण उपजे संघर्षों के कारण हुआ और उसी के कारण कई बार आज़ादी हाथ में आने से चूक गयी . वे साफ़ कहते थे कि देश के लोगों के बीच एकता और सौहार्द को खोने का अर्थ-- देश को खोना है --
आज दिल्ली में संसद से पन्द्रह किलोमीटर दूर तीन दिन तक सांप्रदायिक दंगे होते हैं पचपन लोग मारे जाते हैं और सरकार में बैठे लोगों को न तो इसमें तन्त्र की असफलता दिख रही है और न ही ग्लानी है , कुछ हज़ार मुकदमे दर्ज करने या कई सौ गिरफ्तारी से अपनी जिम्मेदारियों से उऋण होने का भाव न तो लोकतंत्रात्मक है और न ही सांप्रदायिक सद्भाव.

पंडित नेहरु की खासियत थी -- नफरत विहीन व्यक्तित्व. वे न तो अपने विरोधी नेता से विद्वेष रखते थे और न ही पत्रकारों से, शंकर वारा उन पर व्यंग करने अले कार्टून बनाने का किस्सा तो सभी को पता ही है , उन्होंने श्यामा प्रसाद मुकर्जी को भी अपने पहले मंत्री मंडल में लेना पसंद किया , संसद में उनके क भी भाषण में किसी विपक्षी दल के प्रति निजी हमले का एक भी लफ्ज़ नहीं अहा , हालांकि चीन ने उनकी इसी आदत पर घाटा भी दिया उर कुछ कम्युनिस्टों ने भी.
आज नेहरु की सोच की जरूरत है -- जो ईतिहास की देश के सकारात्मक विकास में वैज्ञानिक व्याख्या कर सके, जो भाषा-, बयान और कृत्य में लोगों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव को स्थापित कर सके, राजनीति में शुचिता, विद्वेश रहित माहौल पर भरोसा बना सके , सत्ता लुटने की प्रवृति से उबार सके .
जाहिर है कुछ लोगों को लगेगा कि आज तो जयंती है न पुन्य तिथि -- फिर नेहरु को क्यों याद किया जा रहा है ? कांग्रेस तो नेहरु को कभी का तिलांजली दे चुकी है .
तो जनाब - देश के सामने जब लोकतंत्र के प्रति अविश्वास का माहौल हो, जब साम्प्रदायिकता को एक आम अपराध की तरह गिना जा रहा हो, जब तंत्र के कुछ अंग संविधान मूल्यों के विपरीत काम कर रहे हों, जब लोकतंत्र के मूल तत्व - प्रतिरोध को कुचलने के इए राजतन्त्र अनैतिक तरीके अपना रहा हो -- तब उस आत्मा को याद रखना जरुरी है इसने आधुनिक भारत की मजबूत नीव रखी थी --- जनाब नया भवन तो बनाया जा सकता है लेकिन कुछ लोग असंख्य तल्ले वाली ईमारत की नीव ही खोदना चाहते हैं , तब नीव डालने वाले को याद करना ही होगा , ताकि ईमारत बची रहे .

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शुक्रवार, 13 मार्च 2020

decreasing number of bird is negative sign for nature

पृथ्वी के अस्तित्व पर चेतावनी है पंक्षियों का कम होना

पंकज चतुर्वेदी 

‘भारत में पक्षियों की स्थिति-2020’ रिपोर्ट के नतीजे नभचरों के लिए ही नहीं धरती पर रहने वाले इंसानों के लिए भी खतरे की घंटी हैं। बीते 25 सालों के दौरान हमारी पक्षी विविधता पर बड़ा हमला हुआ है, कई प्रजाति लुप्त हो गई तो बहुत की संख्या नगण्य पर आ गईं। पक्षियों पर मंडरा रहा यह खतरा शिकार से कही ज्यादा विकास की नई अवधारणा के कारण उपजा है। अधिक फसल के लालच में खेतों में डाले गए कीटनाशक, विकास के नाम पर उजाड़े गए उनके पारंपरिक पर्यावास, नैसर्गिक परिवेष  की कमी से उनकी प्रजनन क्षमता पर असर; ऐसे ही कई कारण है जिनकेचलते हमारे गली-आंगन में पंक्षियों की चहचहाहट कम होती जा रही है।
कोई 15500 पक्षी वैज्ञानिकों व प्रकृति प्रेमियों द्वारा लगभग एक करोड़ आकलन के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में भारत में पाए जाने वाली पक्षियों की 1333 प्रजातयों में से 867 का आकलन कर ‘ईबर्ड’ डिजिटल प्लेटफार्म पर दर्ज किया गया है। इनमें 101 प्रजति के पक्षियों को संरक्षण की बेहद आवष्यकता, 319 को सामान्य चिंता की श्रेणी में पाया गया। 442 ऐसी भी प्रजाति हैं जिनके बारे में फिलहाल चिंता की जरूरत नहीं।  रिपोर्ट कहती है कि हैं 52 फीसदी पक्षियों की संख्या लंबे समय से घट रही है, जिससे उनके विलुप्त होने की आशंका पैदा हो गई है। 52प्रतिशत में ऐसे पक्षियों की संख्या 22 फीसदी है जिनकी संख्या काफी तेजी से कम हो रही है। शेष 48 प्रतिशत में पांच प्रतिशत पक्षियों की संख्या बढ़ी है, जबकि 43प्रतिशत की संख्या लगभग स्थिर है।

जंगल में रहने वाले पक्षी जैसे कि  कठफोडवा, सुग्गा या तोता, मैना, सातभाई की कई प्रजातियां, चिपका आदि की संख्या घटने के पीछे तेजी से घने जंगलों में कमी आने से जोड़ा जा रहा है। खेतों में पाए जाने वाले बटेर, लवा  का कम होना जाहिर हैकि फसल के जहरीले होने के कारण है। समुद्र तट पर पाए जाने वाले प्लोवर या चिखली,कर्ल, पानी में मिलने वाले गंगा चील बतख की संख्या बहुत गति से कम हो रही है। इसका मुख्य कारण समुद्र व तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण व अत्याधिक औद्योगिक व परिवहन गतिविधि का होना है। घने जंगलों के  मषहूर पूर्वोत्तर राज्यों में पक्षियों पर संकट बहुत चौंकाने वाला है। यहां 66 पक्षी-बिरादरी लगभग समाप्त होने के कगार पर हैं। इनमें 23 अरूणाचल प्रदेष में, 22 असम, सात मणिपुर, तीन मेघालय, चार मिजोरम , पांच नगालैंड और दो बिरादरी के पक्षी त्रिपुरा में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  या गोडावण को तो अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने इसे संकटग्रस्त पक्षियों की सूची में शामिल किया है। वर्ष 2011 में भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क क्षेत्रों में इनकी संख्या 250 थी जो 2018 तक 150 रह गयी। भारत में इंडियन बस्टर्ड की बड़ी संख्या राजस्थान में मिलती है। चूंकि यह शुष्क  क्षेत्र का पक्षी है सो जैसे-जैसे रेगिस्तानी इलाकों में सिंचाई का विस्तार हुआ, इसका इलाका सिमटता गया।फिर इनके प्राकृतिक पर्यावासों पर सड़क, कारखाने, बंजर को हरियाली में बदलने के  सरकारी प्रयोग शुरू  हुए, नतीजा हुआ कि इस पक्षी को अंडे देने को भी जगह नहीं बची। फिर इसका शिकार तो हुआ ही। यही नहीं जंगल में हाई टेंशन  बिजी लाईन में फंस कर भी ये मारे गए। कॉर्बेट फाउंडेशन ने ऐसे कई मामलों का दस्तावेजीकरण किया जहां बस्टर्ड निवास और उनके प्रवासी मार्गों में बिजली की लाइनें बनाई गई हैं। भारी वजन और घूमने के लिए सीमित क्षेत्र होने के कारण बस्टर्ड को इन विद्युत लाइनों से बचने में परेशानी होती है और अक्सर वे बिजली का शिकार हो जाते हैं। यह केवल एक बानगी है। इसी तरह अंडमान टली या कलहंस या चंबल नदी के पानी में चतुराई से षिकार करने वाला हिमालयी पक्षी इंडियन स्कीमर, या फिर नारकोंडम का धनेष; ये सभी पक्षी समाज में फैली भ्रांतियों और अंधविष्वास के चलते षिकारियों के हाथ मारे जा रहे हैं। पालघाट के घने जंगलों में हरसंभव ऊंचाई पर रहने के लिए मषहूर नीलगिरी ब्लू रोबिन या षोलाकिली  पक्षी की संख्या जिस तेजी से घट रही है, उससे स्पश्ट है कि अगले दषक में यह केवल कितबों में दर्ज रह जाएगा। इसका मुख्य कारण पर्यटन, खनन व अन्य कारणों से पहाड़ों पर इंसान की गतिविधियों में इजाफा होना है।

भारत के लिए गंभीर विचार की विशय यह भी है कि साल दर साल ठंड के दिनों में आने वाले प्रवासी पक्षी कम हो रहे हैं। यह सभी जानते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी ध्रुव में जब तापमान शून्य  से चालीस डिगरी तक नीचे जाने लगता है तो वहां के पक्षी मेहमान बन कर भारत की ओर आ जाते हैं । ऐसा हजारों साल से हो रहा है, ये पक्षी किस तरह रास्ता  पहचानते हैं, किस तरह हजारों किलोमीटर उड़ कर आते हैं, किस तरह ठीक उसी जगह आते हैं, जहां उनके दादा-परदादा आते थे, विज्ञान के लिए भी अनसुलझी पहेली की तरह है। इन पक्षियों के यहां आने का मुख्य उद्देश्य भोजन की तलाश, तथा गर्मी और सर्दी से बचना होता है। यही नहीं इनमें से कई के प्रजनन का स्थल भी भारत है। नियमित भारत आने वाले पक्षियों में साइबेरिया से पिनटेल डक, शोवलर, डक, कॉमनटील, डेल चिक, मेलर्ड, पेचर्ड, गारगेनी टेल तो उत्तर-पूर्व और मध्य एशिया से पोचर्ड, ह्विस्लिंग डक, कॉमन सैंड पाइपर के साथ-साथ फ्लेमिंगो की संख्या साल-दर साल कम होती जा रही है। काजीरंगा, भरतपुर और सांभर झील में इस बार कई प्रजातियां दिखी ही नहीं। इसका मुख्य कारण शहर-कस्बे के तालाबों  में गंदगी, मछली जैसे भोजन की कमी  है। इस साल राजस्थान की सांभर झील में पच्चीस हजार से ज्यादा पक्षियों के मारे जाने की घटना से सरकार को सबक लेना होगा कि मेहमान पक्ष्यिों केलिए किसी तरह की व्यवस्था की जाए।
सबसे बड़ी चिंता की बात है कि इंसान के साथ उसके घर-आंगन में रहने वाले पक्षियों की संख्या घट रही है। गौरेया के गायब होने की चिंता तो आमतौर पर सुनाई देती है लेकिन हकीकत यह है कि गौरैया की संख्या कम नहीं हुई है, वह स्थिर है लेकिन बड़े षहरों से उसने अपना डेरा उठा दिया है। कारण- महानगरों में बेशुमार  कीटनाशकों  के इस्तेमाल से उसका पसंदीदा भोजन छोटे कीड़े-मकोड़े कम हो गए। साथ ही उसके घोसले के लिए माकूल स्थान महानगरों के ंकंक्रीट का जंगल खा गया। ठीक ऐसा ही कौए और गिद्ध के साथ हुआ है। जब तक पंक्षी हैं तब तक यह धरती इंसानों के रहने को मुफीद है- यह धर्म भी है, दर्शन  भी और विज्ञान भी। यदि धरती  को बचाना है तो पक्षिों के लिए अनिवार्य भोजन, नमी, धरती, जंगल, पर्यावास की चिंता समाज और सरकार दोनों को करनी होगी।

children story Belgam Ghoda voice Dr Shbhrta Mishra

बेलगाम घोड़ा पंकज चतुर्वेदी अंधेरे, सुनसान कमरे में अचानक ही खलबली सी मच गई....... कबाड़ा होने से दुखी, अपने अंत का इंतजार कर रहे उन धूल...