My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

Metro cities on boiling point : Global warming

 उबलती भट्टी से तपते महानगर

पंकज चतुर्वेदी



इस बार तो मनमोहक कहे जाने वाले वसंत के मौसम में हे गर्मी ने जेठ की तपन का अहसास करवा दिया . दिल्ली में 21 अप्रैल 2017 को अधिकतम तापमान 43.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। करीबी शहर फरीदाबाद और गुरुग्राम का तापमान 44.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जो कि औसत से 10 डिग्री ज्यादा था।  गाज़ियाबाद भी तपने में पीछे नहीं था . ठीक यही हाल भोपाल या भुवनेश्वर का भी रहा . यह सर्वविदित है कि भारत में भीषण गर्मी पड़ती है, ,  हालांकि, बहुत कम लोगों को पता होगा कि इस प्रचंड गर्मी ने देश में पिछले 50 साल में 17,000 से ज्‍यादा लोगों की जान ली है। 1971 से 2019 के बीच लू चलने की 706 घटनाएं हुई हैं।लेकिन गत पांच सालों में चरम ताप्मानौर लू की घटनाएँ न केवल समय के पहले हो रही हैं , बल्कि  लम्बे समय तक इनकी मार रहती है, खासकर शहरीकरण ने इस मौसमी आग में ईंधन का काम किया है, शहर अब जितने दिन में तपते हैं, रात उससे भी अधिक गरम हवा वाली होती है .

पिछली जनगणना के मुताबिक़ भारत की की कोई 31.1 प्रतिशत आबादी , जो कि 37.7 करोड़ होती है, शहरों में बसती है और अनुमान अहि की सन 2050 तक और 40 करोड़ लोग शहर का रुख करेंगे , ऐसे में शहरों का बढ़ता तापमान न केवल पर्यावरणीय संकट है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक त्रासदी-असमानता और संकट का कारक भी बनेगा , गर्मी अकेले शरीर को नहीं प्रभावित करती, इससे इंसान की कार्यक्षमता प्रभावित होती है , पानी और बिजली की मांग बढती है , उत्पादन लागत भी बढती है . शिकागो विश्वविद्यालय के एक शोध से पता चला है कि वर्ष 2100 तक दुनिया में गर्मी का प्रकोप इतना ज्यादा होगा कि महामारी, बीमारी, संक्रमण से भी ज्यादा लोग भीषण गर्मी, लू और प्रदूषण से मरने लगेंगे। अगर ग्रीनहाउस गैसों  के उत्सर्जन पर जल्द ही लगाम नहीं लगाई गई जो आज से 70-80 साल बाद की दुनिया हमारे रहने लायक भी नहीं रह जाएगी। वर्ष 2100 आते-आते दुनिया में होने वाली प्रति एक लाख व्यक्ति में से 73 लोगों की मौत गर्मी और लू की वजह से होगी। इस तरह की प्राक्रतिक आपदा का सर शहरों में ही ज्यादा होगा . यह इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यह संख्या एचआईवी, मलेरिया और येलो फीवर से होने वाली संयुक्त मौतों के बराबर है।

शहरों में बढ़ते ताप्मांके कई कारण है – सबसे बड़ा तो शहरों के विस्तार में हरियाली का होम होना . भले ही दिल्ली जैसे शहर दावा करें कि उनके यहाँ हरियाली की छतरी का विस्तार हुआ है लेकिन हकीकत यह है की इस महानगर में लगने वाले अधिकाँश पेड़ पारम्परिक ऊँचे वृक्ष की जगह जल्दी उगने वाले झाड हैं , जो कि धरती के बढ़ते तापमान की विभीषिका से निबटने में अक्षम हैं . शहरी ऊष्मा द्वीप शहरों की कई विशेषताओं के कारण बनते हैं। बड़े वृक्षों के कारण वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन होता है जो कि धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करता है . वाष्पीकरण अर्थात मिट्टी, जल संसाधनों आदि से हवा में पानी का प्रवाह.  वाष्पोत्सर्जन  अर्थात पौधों की जड़ों के रास्ते  रंध्र कहलाने वाले पत्तियों में छोटे छिद्रों के माध्यम से हवा में पानी की आवाजाही। शहर के डीवायडर पर लेगे बोगेनवेलिया या ऐसी ही हरियाली  धरती के शीतलीकरण की नैसर्गिक प्रक्रिया में कोई भूमिका निभाते नहीं हैं .

महानगरों की गगनचुम्बी इमारतें भी इसे गरमा रही हैं , ये भवन सूर्य की तपन  से गर्मी को प्रतिबिंबित और अवशोषित करते हैं। इसके अलावा, एक-दूसरे के करीब कई ऊंची इमारतें भी हवा के प्रवाह में बाधा बनती हैं, इससे शीतलन अवरुद्ध होता हैं. शहरों की सड़कें उसका तापमान बढ़ने में बड़ी कारक हैं . सडक डामर की हो या कंक्रीट की, यह गर्मी को अवशोषित करते हैं और फिर वायुमंडल का तापमान जैसे ही कम हुआ तो उसे उत्सर्जित कर देते हैं . शहर को सुंदर और समर्थ बनाने वाली कंक्रीट की ऊष्मा क्षमता बहुत अधिक होती है और यह ऊष्मा के भंडार के रूप में कार्य करती है। इसके अलावा, शहरों के ऊपर वायुमंडलीय स्थितियों के कारण अक्सर शहरी हवा जमीन की सतह के पास फंस जाती है, जहां इसे गर्म शहरी सतहों से गर्म किया जाता है।  हालाँकि शहरों को भट्टी बनाने में इंसान भी पीछे नहीं हैं .वाहनों के चलने और इमारतों में लगे पंखे, कंप्यूटर, रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर जैसे बिजली के उपकरण भले ही इंसान को सुख देते हों लेकिन  ये शहरी अप्रिवेश का तापमान बढ़ने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं . फिर कारखाने , निर्माण कार्य और बहुत कुछ है जो शहर को उबाल रहा है .

यदि इन शहरों से कोई 50 किलोमीटर दूर किसी कसबे या या गाँव में जाएँ तो गर्मी का तीखापन इतना नहीं लगता , गर्मी अपने साथ बहुत सी बीमारियाँ ले कर आ रही है , गर्मी के कारण शहर के नालों के पानी का तापमान बढ़ता है और यह जल जब नदी में मिलता है तो उसका तापमान भी बढ़ जाता है, जिससे नदी का जैविक जीवन, जिसमें वनस्पति और जीव दोनों हैं , को खतरा है , जान लें किसी भी नदी  की पावनता में उसमें उपस्थित जैविक तत्वों की अहम् भूमिका होती है.

शहरों की घनी आबादी संक्रामक रोगों के प्रसार का  आसान जरिया होते हैं, यहां दूषित  पानी या हवा भीतर ही भीतर इंसान को खाती रहती है और यहां बीमारों की संख्या ज्यादा होती है।  देश  के सभी बड़े शहर इन दिनों कूड़े को निबटाने की समस्या से जूझ रहे हैं। कूड़े को एकत्र करना और फिर उसका शमन करना, एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यह सब चुनौतियां बढे तापमान में और भी दूभर हो जाती हैं .

यदि शहर में गर्मी की मार से बचना है तो अधिक से अधिक  पारम्परिक पेड़ों का रोपना  जरुरी है, साथ ही शहर के बीच बहने वाली नदियाँ, तालाब, जोहड़ आदि यदि निर्मल और अविरल  रहेंगे  तो बढ़ी गर्मी को सोखने में ये सक्षम होंगे , कार्यालयों के समय में बदलाव , सार्वजनिक  परिवहन को बढ़ावा, बहु मंजिला भवनों का ईको फ्रेंडली होना , उर्जा संचयन  सहित कुछ ऐसे उपाय हैं जो बहुत कम व्यय में शहर को भट्टी बनने  से बचा सकते हैं . हां – अंतिम उपाय तो शहरों की तरफ पलायन रोकना ही होगा .

 

 

 

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

Easter : The festival of spring

 17 अप्रेल 2022

ईस्टर पर विशेष
वसंत का पर्व है ईस्टर
पंकज चतुर्वेदी



ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है ईस्टर। यह हमेशा 22 मार्च से 25 अपै्रल के बीच किसी रविवार के दिन मनाया जाता है। वसंत ऋतु की पहली पूर्णमासी के बाद आने वाला पहला रविवार। शुरुआत में इस बात पर बड़ा विवाद था, क्योंकि ईस्टर का आरंभ यहूदी फसह पर्व से जुड़ा हुआ था, जो महीने के चौदहवें दिन मनाया जाता था। 325वें रोमन केथोलिक सम्राट कांस्टेंटाइन ने नीकिया में अपने साम्राज्य के सारे धर्मगुरुओं का महा-अधिवेशन बुलाया और यह प्रस्ताव रखा कि मध्य वसंत की पहली पूर्णमासी के बाद आने वाले रविवार को ईस्टर घोषित करें। 1752 में ब्रिटिश संसद ने इस तिथि को धर्मनियम की संसद के जरिए कानूनी जामा पहनाया।


ईस्टर, ईसामसीह के दुखों, सलीब पर मृत्यु और तीसरे दिन उनके पुनर्जीवन की याद में मनाया जाता है। ‘ईस्टर’ का मतलब पुरानी ‘ऐंग्लो-सेक्शन जाति की वसंत की देवी ‘ओस्टर’ है, जिसके नाम पर ‘ईस्टर का महीना’ यानी अपै्रल का महीना था। नार्वे की भाषा में वसंत ऋतु में फसह का पर्व मनाते थे। यहूदियों के मिस्र की गुलामी से मुक्ति तथा फसल कटाई दोनों का प्रतीक था। फसह के दिन करीब तीन बजे  ईसामसीह को सलीब पर लटकाया गया था। लेकिन वे तीसरे दिन पुनर्जीवित हो गए थे। यह इस्राइली नबियों की प्राचीन नबूवतों के अनुसार हुआ। इस तरह यहूदी फसह पर्व में ईसा के पुनर्जीवन का नया तत्व जुड़ गया। शुरूआत में यहूदी ही ईसा के मानने वाले बने थे।



फसह की तरह ही ईसामसीह के पुनर्जीवन की याद में ईस्टर मनाया जाने लगा। प्राचीन यूनानी और पूर्वी यूरोप के ईसाई ईस्टर को पवित्र और महान मानते हैं, और इस दिन एक-दूसरे का ‘ईसा जी उठे हैं’ कहकर अभिवादन करते हैं। ‘निस्संदेह वह जी उठे हैं।’ कहकर उत्तर दिया जाता है।


शुरू में ईस्टर शनिवार के उपवास के बाद शनिवार शाम से रविवार सूर्योदय तक मनाया जताा था। रात के अंधकार के बाद सूर्योदय का प्रकाश नवजीवन का प्रतीक है। इसलिए चर्चों में रविवार की सुबह बपतिस्मा संस्कार किया जाता है। ईस्टर रात में मनाया जाता था इसलिए ‘ज्योति पर्व’ के रूप में मनाया जाने लगा। ईस्टर पर गिरजाघर, गांव और शहर, मोमबत्तियों, बिजली के लट्टुओं से प्रकाशित किए जाते हैं। ‘यरूशलम के गिरजाघरों में आठ दिन तक मोमबत्तियां जलायी जाती हैं।


ईस्टर हमेशा वसंत विषुव (स्प्रींग इक्वेनाक्स) के बाद की पहली पूर्णिमा के बाद पहले रविवार को होता है । वसंत विषुव  अर्थात वह दिन जब दिन और रात बराबर थे और सूर्य ठीक पूर्व में निकललता है। लेकिन यह पूर्णिमा आधुनिक खगोलविदों की गणना के मुताबिक नहीं है, यह एक कलीसियाई पूर्णिमा (चर्च की गणना ) है। ईस्टर की गणना के उद्देश्य से, वसंत विषुव हमेशा 21 मार्च को होता है। 2022 में 21 मार्च के बाद पहली पूर्णिमा शनिवार 16 अप्रैल है, इसलिए ईस्टर रविवार 17 अप्रैल को होगा। जाहिर है कि ईस्टर संडे  सर्वाधिक जल्दी 22 मार्च को ही हो सकता है  और ऐसा आखिरी बार 1818 में हुआ था।


लोक कथाओं में खरगोश का निवास चंद्रमा बताया जाता । चीन में इन राजवंश के युग कौंसे का एक आईना खुदाई में मिला, जिस पर यह चित्र अंकित है; खरगोश चंद्रमा में ऊखल से मूसल से अमृत की औषधि कूट रहा है।’ दक्षिण अफ्रीका की खोइ और सन् जनजातियों की संस्कृति में भी खरगोश का निवास चंद्रमा माना गया है। यूनानी-रोमन संस्कृति में खरगोश की कई उपयोगिताएं हैं। वह कामुकता का प्रतीक माना जाता है। वह उभयलिंगी होता है और उसका मांस खाने से कामोत्तेजना बढ़ती है। कामदेवता इरोस को, जो पशुओं का शिकार करता है, उसका मांस प्रिय है। सबसे महत्वपूर्ण संबंध है डायोनिस देवता के साथ। यह प्रेम उर्वरता, जीवन, मृत्यु तथा अमरत्व का देवता है। यूनानी रोमन खरगोश का शिकार करते, उसके टुकड़े-टुकड़े करते, उसको खाते और एक-दूसरे के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए मांस का उपहार देते थे।


अंडा नवजीवन का प्रतीक है। नवजीवन बड़े (अर्थात मृत्यु को) अंडकवच को तोड़कर बाहर निकलता है। यह ईसाई धर्म के शुरू होने से बहुत पहले शायद सारी दुनिया की संस्कृतियों में प्रचलित था। शुरूआत से ही अंडा को मनुष्य को आश्चर्यचकित करता रहा है कि इस कठोर जीवनरहित चिकनी वस्तु में से कैसे जीवित चूजा निकल पड़ता है। वह यह रचनात्मक-प्रक्रिया जानना चाहता था। सृष्टि की रचना कैसे हुई?


ईसा पूर्व 1569-1085 में लिखित और मिस्र में प्राप्त पपीरस (पटेरा, तालपत्रा) पांडुलिपि में बताया गया है कि धरती एक अंडा थी, जो आदिम जलाशय में से ऊपर निकलता है। भारतीय ग्रंथों में-उपनिषद में सृष्टि रचना का प्रथम कार्य अंडे का दो भागों में विभाजन है। ऋग्वेद में सृष्टिकर्ता, प्रजापति, सृष्टि-जल को उर्वर बनाते हैं और वह स्वर्ण अंडे में परिवर्तित हो जाता है। उसके भीतर ब्रह्मा शयन करते हैं और उनके साथ भूमि, सागर, पर्वत,  नक्षत्रा देवता तथा समस्त मानवजाति है। ऐसी कथाएं चीन तथा बौद्ध जातकों में भी पाई जाती हैं।


यहूदी परंपरा में अंडे का महत्व उल्लेखनीय है, फसह पर्व तथा पेंतिकुस्त पर्वों के मध्य तैंतीसवें दिन रब्बी शिमौन बार मौखई की स्मृति में ‘लग-बा-उमेर’ नामक आनंद उल्लास का एक पर्व मनाया जाता है। माता-पिता अपने बच्चों के साथ खुले मैदान में पिकनिक मनाते हैं और रंगीन अंडे खाते हैं। फसह के भोजन में उबला अंडा खाया जाता है, जो पुनर्जन्म का प्रतीक माना गया है।


ईसाइयों के लिए ईस्टर अंडा ईसा के मृतकोत्थान का प्रतीक है। जैसे चूजा अंडा फोड़कर बाहर निकलता है, वैसे ही ईसामसीह कब्र के बाहर पुनर्जीवित होकर निकल आते हैं। किसी-किसी गिरजाघर में कब्र की अनुकृति बनाकर उस पर अंडा रखा जाता है और पुरोहित, आराधकों का अभ्विादन करता है, ‘ईसा फिर जीवित हो गये हैं’ आराधक उत्तर देते हैं, ‘निश्चय ही ईसा जीवित हो गये हैं।’


सच तो यह है कि सारी दुनिया की संस्कृतियों में अंडा जीवन, सृष्टि, उर्वरता और पुनरुत्थान का प्रतीक है। जीवन चक्र की संपूर्ण घटनाओं से यह जुड़ा है: जन्म, प्रेम, विवाह, बीमारी तथा मृत्यु। अंडे से शक्ति प्राप्त होती है, क्योंकि अंडे में जीवन का बीज है। चर्च के शुरूआती वर्षों में मृतक के साथ कब्र में अंडे रख दिए जाते थे। बाद में अंडे को ईस्टर से जोड़ दिया गया। चर्च ने इस गैर ईसाई प्रथा का विरोध नहीं किया, क्योंकि अंडा पुनरुत्थान का एक सशक्त प्रतीक था। वह मृत्यु को जीवन में परिवर्तित करता था।


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

Gotta get used to holding water

 पानी को पकडने की आदत डालना होगी


पंकज चतुर्वेदी


इस बार भी अनुमान है कि मानसून की कृपा देश पर बनी रहेगी, ऐसा बीते दो साल भी हुआ उसके बावजूद बरसात के विदा होते ही देश के बड़ै हिस्से में बूंद-बूंद के लिए मारामारी षुरू हो जाती है। जानना जरूरी है कि नदी-तालाब- बावड़ी-जोहड़ आदि जल स्त्रोत नहीं है, ये केवल जल को सहेज रखने के खजाने हैं, जल स्त्रोत तो बारिश  ही है और जलवायु परिर्तन के कारण साल दर साल बारिश  का अनयिमित होना, बेसमय होना और अचानक तेज  गति से होना घटित होगा ही। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विशय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश  के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।


यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘‘औसत से कम’’ पानी बरसा या बरसेगा, अब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि  करती है। असल में इस बात को लेग नजरअंदाज कर रहे हैं कि यदि सामान्य से कुछ कम बारिश भी हो और प्रबंधन ठीक हो तो समाज पर इसके असर को गौण किया जा सकता है।

जरा देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45  क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत  है। हमें हर साल औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हमारे यहां बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित हो पाता है। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जा कर मिल जाता है और बेकार हो जाता है। 


जाहिर है कि बारिश  का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। हां, एक बात सही है कि कम बारिश  में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य केष क्राप ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश  पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थेड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है।

यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के माग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत  है।  देश के उत्तरी हिस्से में नदियो में पानी  का अस्सी फीसदी जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में  यह आंकडा 90 प्रतिशत  का है। जाहिर है कि शेष  आठ महीनों में पानी की जुगाड़ ना तो बारिश  से होती है और ना ही नदियों से।



जल को ले कर हमारी मूल सोच में थोड़ा बदलाव करना होगा- एक तो जान लें कि जल का स्त्रोत  केल बरसात है या फिर ग्लेषियह। हमें अभी तक जो पढ़ाया जाता है कि नदी, समुद्र, तालाब, कुआं-बावड़ी जल के स्त्रोत हैं, तकनीकी रूप से  गलत है - ये सभी जल को सहेजने के तंत्र हैं। दुखद है कि  बरसात की हर बूंद को सारे साल जमा करने वाली गांव-कस्बे की छोटी नदियां बढ़ती गरमी, घटती बरसात और जल संसाधनों की नैसर्गिकता से लगातार छेड़छाड़ के चलते या तो लुप्त हो गई या गंदे पानी के निस्तार का नाला बना दी गईं। देश के चप्पे-चप्पे पर छितरे तालाब तो हमारा समाज पहले ही चट कर चुका है। 


बाढ़-सुखाड़ के लिए बदनाम बिहार जैसे सूबे की 90 प्रतिशत  नदियों में पानी नहीं बचा। गत तीन दषक के दौरान राज्य की 250 नदियों के लुप्त हो जाने की बात सरकारी महकमे स्वीकार करते हैं। अभी कुछ दषक पहले तक राज्य की बड़ी नदियां- कमला, बलान, फल्गू, घाघरा आदि कई-कई धाराओं में बहती थीं जो आज नदारद हैं। झारखंड के हालात कुछ अलग नहीं हैं, यहां भी 141 नदियों के गुम हो जाने की बात फाईलों में तो दर्ज हैं लेकिन  उनकी चिंता किसी को नहीं । राज्य की राजधानी  रांची में करमा नदी देखते ही देखते अतिक्रमण के घेर में मर गई। हरमू और जुमार नदियों को नाला तो बना ही दिया है। यहां चतरा, देवघर, पाकुड़, पूर्वी सिंहभूम जैसे घने जंगल वाले जिलों में कुछ ही सालों में सात से 12 तक नदियों की जल धारा मर गई। नदियों की जीवनस्थल कहा जाने वाला उत्तराखंड हो या फिर दुनिया की सबसे ज्यादा बरसात के लिए मषहूर मेघालय छोटी नदियों के साल-दर-साल लुप्त होने का सिलसिला जारी है।

 प्रकृति तो हर साल कम या ज्यादा , पानी से धरती को सींचती ही है लेकिन असल में हमने पानी को ले कर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुंए से रस्सी डाल कर पानी खींचना होता था या चापाकल चला कर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल उलींचा जाता था। घर में टोंटी वाले नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूब वेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलवा डालने, कूडा मिलाने जैसी गतिविधियों से बच कर, पारंपरिक जल स्त्रोतों- तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश  के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है । अब कस्बाई लोग बीस रूपए में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव में कई बार षौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है।

हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति जीवनदायी संपदा यानी पानी हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है और इस चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है हमारी जिंदगी का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं उसे वापस भी हमें ही लौटाना होता है। इसके लिए जरूरी है कि विरासत में हमें जल को सहेजने के जो साधन मिले हैं उनको मूल रूप में जीवंत रखें। केवल बरसात ही जल संकट का निदान है।  तो इस तीखी गरमी को एक अवसर जानें- अपने गांव-मुहल्लों के पुराने तालाब, कुएं, नदी, सरिता, जो  सूखे दिख रहे हैं, उनमें कुछ घंटे अपने श्रम के दीप जलाएं, उनकी गाद, गंदगी, कीचड़ को निकालें और खेतों में खाद की जगह बिछा दें।  यदि हर नदी-तालब की महज एक फुट गहराई बढ़ा दी तो अगली बरसात तक हमारे समाज को पानीदार बने रहने से कोई नहीं रोक पाएगा। हां, इस जल निधि की रखवाली  खजाने की तरह करना होगा, ताकि कोई गंदगी, बेजा इस्तेमाल इसे दूषित  ना कर दे।

 

 

 

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

Yamuna in Delhi : Not promises, but intentions are needed

  

यमुना : वादों की नहीं, इरादों की दरकार है

पंकज चतुर्वेदी



एक बार फिर दिल्ली विधान सभा में प्रस्तुत नए साल के बजट ने उम्मीद जगाई कि दिल्ली में यमुना उस कलंक से मुक्त होगी कि यमुना नदी दिल्ली में 48 किलोमीटर बहती है, जो  नदी की कुल लंबाई का महज दो फीसदी है, जबकि इसे प्रदूषित करने वाले कुल गंदे पानी का 71 प्रतिशत और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का 55 प्रतिशत यहीं से इसमें घुलता है। सन 2021  के छठ पर्व का चित्र तो सारी दुनिया में चर्चित हुआ था जिसमें सफ़ेद झाग से लबालब यमुना में आस्थावान महिलायें अर्ध्य दे रही थी . दिल्ली सरकार का सन 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए केजरीवाल सरकार ने  दावा किया है  कि अगले तीन वर्षों में यमुना नदी पूरी तरह से साफ हो जाएगी। इस संबंध में 2,074 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही साहबी नदी को  ज़िंदा करने और  नजफगढ़  वेट लैंड को स्वच्छ जल का अज्रिया बनाने के भी वायदे हैं – हालाँकि हकीकत यह है कि राष्ट्रिय  हरित प्राधिकरण(एनजीटी) सन  2017 से हरियाणा और दिल्ली सरकार को ताकीद कर रहा है की नजफगढ़ झील को अतिक्रमण, प्रदूषण से मुक्त किया जाए . दिल्ली सरकार ने तो इसकी योजना भी पेश की लेकिन हरियाणा ने तो कोई कार्य योजना भी नहीं बनाई,

सन् 2012 में एक बार फिर यमुना को अपने जीवन के लिए सरकार से उम्मीद बँधी थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निर्देश पर यमुना नदी विकास प्राधिकरण (वाईआरडीए) का गठन किया गया था। दिल्ली के उपराज्यपाल की अध्यक्षता में दिल्ली जल बोर्ड, प्रदूषण बोर्ड सहित कई सरकारी व गैर-सरकारी संगठनों को साथ लेकर एक तकनीकी सलाहकार समूह का गठन हुआ था। उस समय सरकार की मंशा थी कि एक कानून बनाकर यमुना में प्रदूषण को अपराध घोषित कर राज्यों व स्थानीय निकायों को इसका जिम्मेदार बना दिया जाए, लेकिन वह सबकुछ कागजों से आगे बढ़ा ही नहीं।

 

यदि बारीकी से देखें तो यमुना का शुद्धिकरण, साहिबी नदी का पुनर्जीवन और नजफगढ़ झील का पुनरोद्धार एक दुसरे से जुड़े हैं . इस सारी काम में सबसे बड़ी दिक्कत यही है की दिल्ली में जब यमुना  हरियाणा से आती है तो  वहां से ढेर सारा कूड़ा - कचरा ले कर आती है . दिल्ली मह्नाग्र के लिए यह आम बात है , हर साल कम से कम छह बार अचानक घोषणा  होती है कि  एक दो दिन नालों में पानी नहीं आएगा – कारण यमुना में अमोनिया की मात्रा बढ़ गई . हर साल गर्मी होते ही हरियाणा और दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट में खड़े मिलते हैं ताकि यमुना से अधिक पानी पा सकें . इन दोनोअ का साल कारण यही है कि हरियाणा से दिल्ली में प्रवेश कर रही यमुना इतनी ज़हरीली हो जाती है कि  वजीराबाद व चंद्रावल के जल परिशोधन संयंत्र की ताकत उन्हें साफ कर पीने लायक बनाने काबिल नहीं रह जाती . हरियाणा के पानीपत के पास ड्रेन नंबर-2 के माध्यम से यमुना में औद्योगिक कचरा गिराया जाता है। इस वजह से यमुना में अमोनिया की मात्रा बढ़ी आती  है। पानी में अमोनिया की मात्रा इतनी अधिक होने पर जल शोधन संयंत्रों में उसे शोधित करने की क्षमता नहीं है, इसलिए जल बोर्ड यमुना से पानी लेना बंद कर देता है और इस तरह ज़हरीली यमुना का जल घरों तक पहुँचने लायक नहीं  रह जाता । किसी को याद भी नहीं होगा कि फरवरी-2014 के अंतिम हफ्ते में ही शरद यादव की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने भी कहा था कि यमुना सफाई के नाम पर व्यय 6500 करोड़ रुपये बेकार ही गए हैं, क्योंकि नदी पहले से भी ज्यादा गंदी हो चुकी है। समिति ने यह भी कहा कि दिल्ली के तीन नालों पर इंटरसेप्टर सीवर लगाने का काम अधूरा है। गंदा पानी नदी में सीधे गिरकर उसे ज़हर बना रहा है। विडंबना तो यह है कि इस तरह की संसदीय और अदालती चेतावनियाँ, रपटें ना तो सरकार के और ना ही समाज को जागरूक कर पा रही हैं।

यमुना की पावन धारा दिल्ली में आकर एक नाला बन जाती है। आँकड़ों और कागजों पर तो इस नदी की हालत सुधारने को इतना पैसा खर्च हो चुका है कि यदि उसका ईमानदारी से इस्तेमाल किया जाता तो उससे एक समानांतर धारा की खुदाई हो सकती थी। ओखला में तो यमुना नदी में बीओडी स्तर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय स्तर से 40-48 गुना ज्यादा है। पेस्टीसाइड्स और लोहा, जिंक आदि धातुएँ भी नदी में पाई गई हैं। एम्स के फारेंसिक विभाग के अनुसार, 2004 में 0.08 मिग्रा. आर्सेनिक की मात्रा पाई गई जो वास्तव में 0.01 मि.ग्रा. होनी चाहिए।

एक सपना था कि कामनवेल्थ खेलों यानी अक्तूबर-2010 तक लंदन की टेम्स नदी की ही तरह देश की राजधानी दिल्ली में वजीराबाद से लेकर ओखला तक शानदार लैंडस्केप, बगीचे होंगे, नीला जल कल-कल कर बहता होगा, पक्षियों और मछलियों की रिहाइश होगी। लेकिन अब सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं, दावा है कि यमुना साफ तो होगी, लेकिन समय लगेगा। कॉमनवेल्थ खेल तो बदबू मारती, कचरे व सीवर के पानी से लवरेज यमुना के तट पर ही संपन्न हो गए। याद करें 10 अप्रैल, 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 31 मार्च, 2003 तक यमुना को दिल्ली में न्यूनतम जल गुणवत्ता प्राप्त कर ली जानी चाहिए, ताकि यमुना को 'मैलीÓ न कहा जा सके, पर उस समय-सीमा के 16 साल के बाद भी दिल्ली क्षेत्र में बहने वाली नदी में ऑॅक्सीजन का नामोनिशान ही नहीं रह गया है, यानी पूरा पानी ज़हरीला हो चुका है और यमुना मर चुकी है।

 

देश की सबसे बड़ी अदालत ने जो समय-सीमा तय की थी, उसके सामने सरकारी दावे थक-हार गए। लेकिन अब भी नदी में ऑॅक्सीजन नहीं है। नदी को साफ करने के लिए बुनियादी ढाँचे पर भी दिल्ली सरकार ने कितनी ही राशि लगा डाली, 'यमुना एक्शन प्लानÓ के माध्यम से भी योजना बनाई गई, पैसा लगाया गया। 2006 तक कुल 1188-1491 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जबकि प्रदूषण का स्तर और ज्यादा बढ़ गया है। इतना धन खर्च होने के बावजूद केवल मानसून में ही यमुना में ऑॅक्सीजन का बुनियादी स्तर देखा जा सकता है।

अधिकांश राशि सीवेज और औद्योगिक कचरे को पानी से साफ करने पर ही लगाई गई। दिल्ली जलबोर्ड का 2004-05 का बजट प्रस्ताव देखें तो इसमें 1998-2004 के दौरान 1220.75 करोड़ रुपये पूँजी का निवेश सीवरेज संबंधी कार्यों के लिए किया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली में जो उच्चस्तरीय तकनीकी यंत्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उनकी लागत भी 25-65 लाख प्रति एमआईडी आँकी गई है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सीवेज साफ करने के लिए व्यय की गई राशि पानी के बचाव और संरक्षण पर व्यय की गई राशि से 0.62 गुना ज्यादा है।

अनुमान है कि दिल्ली में हर रोज 3297 एमएलडी गंदा पानी और 132 टन बीओडी यमुना में घुलता है। दिल्ली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर कही जाने वाली यमुना का राजधानी में प्रवेश उत्तर में बसे पल्ला गाँव से होता है। पल्ला में नदी का प्रदूषण का स्तर 'ए’ होता है, लेकिन यही उच्च गुणवत्ता का पानी जब दूसरे छोर जैतपुर पहुँचता है तो 'ई’ श्रेणी का हो जाता है। सनद रहे कि इस स्तर का पानी मवेशियों के लिए भी अनुपयुक्त कहलाता है। हिमालय के यमनोत्री ग्लेशियर से निर्मल जल के साथ आने वाली यमुना की असली दुर्गति दिल्ली में वजीराबाद बाँध को पार करते ही होने लगती है। इसका पहला सामना होता है नजफगढ़ नाले से, जो कि 38 शहरी व चार देहाती नालों की गंदगी अपने में समेटे वजीराबाद पुल के पास यमुना में मिलता है। इसके अलावा दिल्ली महानगर की कोई डेढ़ करोड़ आबादी का मल-मूत्र व अन्य गंदगी लिए 21 नाले यमुना में मिलते हैं, उनमें प्रमुख हैं- मैगजीन रोड, स्वीयर कॉलोनी, खैबर पास, मेंटकाफ हाउस, कुदेसिया बाग, यमुनापार नगर निगम नाला, मोरीगेट, सिविल मिल, पावर हाउस, सैनी नर्सिंग होम, नाला नं. 14, बारापुल नाला, महारानी बाग, कालकाजी और तुगलकाबाद नाला। दिल्ली में यमुना की गंदगी के सामने हर योजना के निराश होने का असली कारण योजनाकारों की वह नीति है की – नल खुला छोड़ कर पोंछा लगा कर फर्श सुखाया जाए , जितना धन  यमुना में गंदगी को साफ़ करने या उसमें मिलने वाले मल-जल के शुद्धिकरण में व्यय होता है उस धन से काश कोई  कम कचरा या गंदगी उपजाने के स्थाई निदान अपर व्यय किया जाता .

 

 

राजधानी को जहर बाँट रहा है यमुना जल

जो जल जीवन का आधार है वह दिल्ली की जनता कि कैंसर, सांस  की बीमारी,  त्वचा रोग जैसे  मौत के कारक का वितरण केंद्र बना हुआ है . इस पर जमी जलकुम्भी की परत क्युलेक्स मच्च्र्र का आसरा है और तभी दिल्ली में मछ्ह्र्जनित रोग- मलेरिया, चिकन गुनिया  डेंगू का स्थाई डेरा रहता है . आई टी ओ  पुल, कुदेसिया घात , महारानी बाग़, जोगाबाई , आली गाँव  शाहीन बाग़ आदि यमुना से उपजे मच्छरों से बीमार् होते रहते हैं .

किसी जमाने में यहाँ नदी में रोहू, कतला . छेतल, सिंघाड़ा समेत 50 प्रजाति की मछलियाँ मिलती थीं . लेकिन अब यहाँ केवल कमनकार  प्रजाति ही यदा कदा दिखती है  और यह भी खाने के काबिल नहीं हैं  कभी यमुना के किनारे मछुआरों की बड़ी बस्ती हुआ करती थी जो मछली पकड कर वहीं किनारे पर बेचते थे , आज ओखला बैराज सहित कई स्थान पर मछली पकड़ने पर ही रोक है, क्योंकि यहाँ की मछली प्रदूषित जल में  खुद जहर बन गई है. यही नहीं इस पानी से उगी सब्जिया भले ही बड़ी ताज़ी और हरी भरी दिखती हों लेकिन उसको खाने के बाद दवा का व्यय स्थाई रूप से लग जाता है यहाँ का पानी और धरती दोनों ही जहरीले हैं . भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण ( ऍफ़ एस एस ए आई )  के अनुसार सब्जी में सीसे की मात्रा ०.1 पीपीएम से अधिक नहीं होना चाहिए , जबकि  यमुना खादर में उगाई गई सब्जियों में यह मात्रा  28.06 पी पी एम पाई गई . ऐसे ही केडमियम की मात्रा  3.42 है जबकि असलियत में यह ०.1 से ०.2 पी पी एम ही होना चाहिए . पारे की मात्रा तो 105 से 139 तक है जो कि बामुश्किल  एक पी पी एम होना चाहिए .विदित हो यमुना किनारे हज़ारो लोग  तोरई , भिन्डी, घिया . मिर्च फूल गोभी, बेंगन, टमाटर,  धनिया- पालक जैसी पत्तेदार सब्जी उगाते और बेचते हैं .

दिल्ली में केवल  तीन साल 2018   से 2021 तक नदी की हालत सुधारने के लिए दो सौ करोड़ का खर्चा हुआ लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा .  यवैसे  यमुना खादर  के भूजल की जांच बीते पच्चीस सालों में हुई ही नहीं  और जान लें कि यहाँ का भू जल भी बिमारी बांटने में पीछे नहीं हैं यमुना के किनारे खादर का लगभग 9700 हेक्टर इलाका हुआ करता था , उसमें से आज  3600 हेक्टर पर अवैध बस्तियां बस गई हैं , कई जगह सरकार ने भी यमुना जल ग्रहण क्षेत्र में निर्माण किये हैं

साहबी- नजफगढ़ सहेजा को खिलखिलाएगी यमुना

दिल्ली-गुड़गांव अरावली पर्वतमाला के तले है और अभी सौ साल पहले तक इस पर्वतमाला पर गिरने वाली हर एक बूंद डाबरमें जमा होती थी। डाबर यानि उत्तरी-पश्चिम दिल्ली का वह निचला इलाका जो कि पहाड़ों से घिरा था। इसमें कई अन्य झीलों व नदियों का पानी आकर भी जुड़ता था। इस झील का विस्तार एक हजार वर्ग किलोमीटर हुआ करता था जो आज गुडगांव के सेक्टर 107, 108 से ले कर दिल्ली के नए हवाई अड्डे के पास पप्पनकलां तक था। इसमें कई प्राकृतिक नहरें व सरिता थीं, जो दिल्ली की जमीन, आवोहवा और गले को तर रखती थीं। आज दिल्ली के भूजल के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक बना नजफगढ़ नाला कभी जयपुर के जीतगढ़ से निकल कर अलवर, कोटपुतली, रेवाड़ी व रोहतक होते हुए नजफगढ़ झील व वहां से दिल्ली में यमुना से मिलने वाली साहिबी या रोहिणी नदी हुआ करती थी । इस नदी के जरिये नजफगढ़ झील का अतिरिक्त पानी यमुना में मिल जाया करता था। सन 1912 के आसपास दिल्ली  के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ आई व अंग्रेजी हुकुमत ने नजफगढ़ नाले को गहरा कर उससे पानी निकासी की जुगाड़ की। उस दौर में इसे नाला नहीं बल्कि ‘‘नजफगढ लेक एस्केपकहा करते थे। इसके साथ ही नजफगढ झील के नाबदान और प्राकृतिक नहर के नाले में बदलने की दुखद कथा शुरू हो गई। सन 2005 में ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नजफगढ नाले को देश के सबसे ज्यादा दूषित 12 वेट लैंड में से एक निरूपित किया था।

पहले तो नहर के जरिए तेजी से झील खाली होने के बाद निकली जमीन पर लोगों ने खेती करना शुरू की फिर जैसे-जैसे नई दिल्ली का विकास होता गया, खेत की जमीन मकानों के दरिया में बदल गई। इधर आबाद होने वाली कालेानियों व कारखानों का गंदा पानी नजफगढ नाले में मिलने लगा और यह जा कर यमुना में जहर घोलने लगा।

आज भी समान्य बारिश की हालत में नजफगढ़ झील में 52 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में पानी भरता है।  कभी नजफगढ़ झील से अरावली की सरिताओं से आए पानी का संकलन और यमुना में जल स्तर बढ़ने-घटने पर पानी का आदान-प्रदान होता था। जब दिल्ली में यमुना ज्यादा भरी तो नजफगढ़ में उसका पानी जमा हो जाता था। जब यमुना में पानी कम हुआ तो इस वेट लैंड का पानी उसे तर रखता था। हाल ही में एनजीटी ने फिर दिल्ली व हरियाणा सरकार को नजफगढ़ के पर्यावरणीय संरक्षण की योजना पेष करने की याद दिलाई। दिल्ली ने योजना तो बनाई लेकिन अमल नहीं किया, वहीं हरियाणा  ने योजना तक नहीं बनाई। एक तो नजफगढ़ झील के जल ग्रहण क्षेत्र से अवैध कब्जे हटाने होंगे दूसरा इस झील को यमुना से जोड़ने वाली नहर में गंदा पानी जाने से रोकने के संयत्र लगाने होंगे। इतने में ही ना केवल यह झील खिलखिला उठेगी, बल्कि लाखों लोगों के कंठ भी तर हो जाएंगे।

 

fire is a good friend but a very bad master

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