My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

Azad Hind Village of Delhi is neglected

उपेक्षित है दिल्ली का आज़ाद हिन्द ग्राम 

 

हम अपने सैनानियों के सम्मान में सियासत और वोट तलाशते हैं और आज़ादी के संघर्ष के मूल्यों की अवहेलना करते हैं . अब दिल्ली में जहां अमर जवान ज्योति है उसकी जगह नेताजी सुभाषचंद बोस की प्रतिमा लगाईं जा रही है – अच्छी बात है – लेकिन नियत पर शक इस लिए होता है की इसी राजधानी में एक आजाद हिन्द ग्राम हैं – जो बेहद उपेक्षित, बिखरा हुआ और गंदा पडा है, अब उस परिसर को शादी विवाह के लिए दिया जाता है . हयाँ तक की मुख्दिमार्ग पर लगे बोर्ड में आजाद शब्द तक गलत लिखा हुआ है - अजाद.



दिल्ली में टिकरी बोर्डर , जो की किसान आन्दोलन के कारण चर्चा में रहा , वहां एक विशाल परिसर है या यों कहें कि अपने आप में ही एक पूरा शहर है, . यह विशाल परिसर बना है महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से प्रेरणा लेकर।
भले ही इसके कोई दस्तावेज ना मिलें लेकिन इस स्थल से जुड़े लोग बताते हैं कि उनके दादा-परदादाओं ने यहां स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस का भारत छोड़ने से पहले का आख़िरी भाषण सुना था. यहां एक धर्मशाला थी, जहां पर सुभाष चंद्र बोस ने विश्राम किया था और वहीं प्याऊ का पानी पिया था. बात 1940-41 की बताई जाती है. कहा जाता है कि नेताजी ने इसी भाषण के बाद धनबाद की यात्रा की थी और बाद में फिरंगियों को चकमा देकर ग़ायब हो गए थे.

नेताजी सुभाष ग्राम स्मारक आउटर दिल्ली के रोहतक रोड स्थित टिकरी कलां गांव में बनाया गया है। इसके निर्माण की परिकल्पना पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने वर्ष 1996 में की थी और बाद में शीला दीक्षित ने इस परिसर को पूर्ण करवाया और सन 2002 में इसका उदघाटन भी किया किया गया था। सरकार का पर्यटन विभाग इसका रखरखाव करता है।
दिल्ली पर्यटन ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की याद में टीकरी कलां स्थित आज़ाद हिंद ग्राम में टूरिस्ट कॉम्प्लैक्स को विकसित किया था .
स्मातरक को कोलकाता के कुछ कलाकारों के द्वारा डिजायन किया गया था जिसमें उन्होमने नेताजी के विभिन्नक मूड को अलग - अलग भित्ति चित्रों में दर्शाया है। संग्रहालय भी कैनवास पर चित्रित स्वमतंत्रता संग्राम को दर्शाने वाले कुछ मुख्या लैंडमार्क में से है। बड़े मोजेक गुंबद और संग्रहालय, इस पूरे परिसर के मुख्यं आकर्षण केंद्र हैं। संग्रहालय ( दिल्लीै चलो ) में स्वपतंत्रता संग्राम के दौरान के कई अखबारों की ढ़ेर सारी कटिंग और अन्य दृश्य संदर्भ वाली चीजें रखी हैं और यहां आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों को भी अच्छीत तरह दर्शाया गया है।




इतनी शानदार जगह उपेक्षित है , वहां लोग पहुँचते नहीं हालांकि इस स्थान के करीब तक मेट्रो सेवा उपलब्ध है , दिल्ली सरकार और नगर निगम दोनों न तो इस स्थान का रखरखाव में रूचि लेता है और न ही इसके प्रचार-प्रसार में . जो नेताजी की याद में आंसू भाते हैं वे भी इस स्थान की बदहाली देखनी जाते नहीं – न ही किसी को वहां अजने के लिए प्रेरित करते हैं ---
नेताजी का शौर्य, देश प्रेम और त्याग किसी प्रतिमा का मोहताज नहीं हैं लेकिन जब उनकी स्मृति में एक स्थान है तो उससे बेरुखी रखने के पीछे क्या सियासत है ?







मैं यहाँ कोई दो साल पहले गया था, यहाँ के हालत पर दिल्ली के पर्यटन विभाग से ले कर प्रधानमन्त्री कार्यालय तक मेल भी किये थे लेकिन जानता था कोई जवाब नहीं देगा क्योंकि दूरस्थ ग्रामीण अंचल में छः एकड़ में फैले परिसर पर लगी तख्ती से शायद वोट न मिलें और अब नेताजी को जान्ने वाली पीढ़ी भी खत्म हो गई और उस इलाके में – गोली मारो सालों को—छाप नेता जीतने लगे हैं

बुधवार, 19 जनवरी 2022

Election reform can enhance faith in democracy

 लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखने के लिए जरूरी हैं कड़े चुनाव सुधार

पंकज चतुर्वेदी

 

इन दिनों


देश के पांच राज्यों में सबसे बडी ताकत, लोकंतत्र ही दांव पर लगा है। राजनीतिक दलों के चुनावी वायदे मुफ्त-भेट पर केंद्रित हैं। विधायक-उम्मीदवार वायदा कर रहा है कि वह मुहल्ले में नाली बनवाएगा। लेकिन जरूरी यह है कि आम वोटर को भी शिक्षित किया जाए कि वह किस उम्मीदवार को, किस चुनाव में किस काम के लिए वोट दे रहा है । चुनाव तो राज्य की सरकार को चुनने का होता है लेकिन मसला कभी मंदिर  तो कभी आरक्षण कभी गाय और उससे आगे निजी अरोप-गालीगलौज। इस बार तो कोविड पाबंदी के कारण कुछ नए सलीके से चुनाव हो सकता है लेकिन अभी तक चुनाव के प्रचार अभियान ने यह साबित कर दिया कि लाख पाबंदी के बावजूद चुनाव ना केवल महंगे हो रहे हैं, बल्कि सियासी दल जिस तरह एक दूसरे पर शुचिता के उलाहने देते दिखेे, खुद को पाक-साफ व दूसरे को चोर साबित करते रहे हैं असल में समूचे कुंए में ही भांग घुली हुई हैं। 


लोकतंत्र के मूल आधार निर्वाचन की समूची प्रणाली ही अर्थ-प्रधान हो गई हैं और विडंबना है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव सुधार के किसी भी कदम से बचते रहे हैं।

इवीएम पर सवाल उठाना , वास्तव में लोकतंत्र के समक्ष नई चुनौतियों की बानगी मात्र है, यह चरम काल है जब चुनाव सुधार की बात आर्थिक -सुधार के बनिस्पत अधिक प्राथमिकता से करना जरूरी है। जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी दल ईमानदारी से चुनाव सुधारों की दिशा में काम नहीं करना चाहता है। दुखद तो यह है कि हमारा अधिसंख्यक मतदाता अभी अपने वोट की कीमत और विभिन्न निर्वाचित संस्थाओं के अधिकार व कर्तव्य जानता ही नहीं है। 


लोकसभा चुनाव में मुहल्ले की नाली और नगरपालिका चुनाव में पाकिस्तान के मुद्दे उठाए जाते हैं। आज सबसे बड़ी जरूरत तो यह है कि आम लोग जाने कि हम विधायक राज्य स्तर की नीति बनाने को चुनते हैं। जैसे कि उम्मीदवार वायदा कर रहा है कि  अमुक सड़क पक्की होगी, जबकि उससे उम्मीद है कि वह जीतने के बाद विधन सभा में ऐसा कानून पारित करवाए जिससे अकेले एक विशेश ही नहीं समूचे प्रदेश की सड़कें पक्की हो  हो जाएं।  तभी बहुत से नेता भी उल-जलूल वादे भी कर देते हैं जबकि वह उनके अधिकार क्षेत्र में होता नहीं है। आधी-अधूरी मतदाता सूची, कम मतदान, पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की मतदान में कम रूचि, महंगी निर्वाचन प्रक्रिया, बाहुबलियों और धन्नासेठों की पैठ, उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या, जाति-धर्म की सियासत, चुनाव करवाने के बढ़ते खर्च, आचार संहिता की अवहेलना - ये कुछ ऐसी बुराईयां हैं जो स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए जानलेवा वायरस हैं और इस बार ये सभी ताकतवर हो कर उभरी हैं।

आज चुनाव से बहुत पहले बड़े-बड़े रणनीतिकार  मतदाता सूची का विश्लेशण कर तय कर लेते हैं कि हमें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां चाहे एक वोट से जीतो या पांच लाख वोट से , दोनों के ही सदन में अधिकार बराबर होते है। यदि राश्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैंसियत, सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, ना कि केवल गूजर, मुसलमान या ब्राहण वोट के।  केबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को ले कर निर्वाचित प्रतिनिधियों का उनको मिले कुछ वोटो का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक मतदान भी जुटाने को मजबूर करेगा।


इस बार हर राज्य में थोक में हृदय परिवर्तन करने वाले नेताओं की जमात सामने आ रही है और वे दूसरे दल में जाते ही टिकअ भी पा रहे हैं। यह एक विडंबना है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता जिंदगीभर मेहनत करते हैं और चुनाव के समय उनके इलाके में कहीं दूर का या ताजा-ताजा किसी अन्य दल से आयातित उम्मीदवार आ कर चुनाव लड़ जाता है और ग्लेमर या पैसे या फिर जातीय समीकरणों के चलते जीत भी जाता है। ऐसे में सियासत को दलाली या धंधा समझने वालों की पीढ़ी बढ़ती जा रही है। संसद का चुनाव लड़ने के लिए निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम पांच साल तक सामाजिक काम करने के प्रमाण प्रस्तुत करना, उस इलाके या राज्य में संगठन में निर्वाचित पदाधिकारी की अनिवार्यता जमीन से जुड़े’’ कार्यकर्ताओं को सदन तक पहुंचाने में कारगर कदम हो सकता है। इससे थैलीशाहों और नवसामंतवर्ग की सियासत में बढ़ रही पैठ को कुछ हद तक सीमित किया जा सकेगा। इस कदम से सदन में कारपोरेट दुनिया के बनिस्पत आम आदमी के सवालों को अधिक जगह मिलेगी। लिहाजा आम आदमी निर्वाचन से अपने सरोकारों को समझेगा व ‘‘कोउ नृप हो हमें क्या हानि’’ सोच कर वोट ना देने वाले मध्य वर्ग की मानसकिता भी बदलेगी।


मतदाता सूचियों में कमियां होना हरेक चुनाव के दौरान सामने आती हैं। घर-घर जा कर मतदाता सूचियों का पुनररीक्षण एक असफल प्रयोग रहा है। दिल्ली जैसे महानगरों में कई कालोनियां ऐसी हैं जहां गत दो दशकों से कोई मतदाता सूची बनाने नहीं पहुंचा है। देश के प्रत्येक वैध बाशिंदे का मतदाता सूची में नाम हो और वह वोट डालने में सहज महसूस करे; इसके लिए एक तंत्र विकसित करना भी बहुत जरूरी है। वहीं पड़ोसी राज्यों के लाखों लोगों को इस गरज से मतदाता सूची में जुड़वाया गया, ताकि उनके वोटों के बल पर चुनाव जीता जा सके।इस बार तो चुनाव आयोग ने केवल सटे हुए जिलों से मतदाता सूची का मिलान किया, लेकिन 40 फीसदी विस्थापित मजदूरों से बनी दिल्ली में उप्र, मप्र, बंगाल या बिहार व दिल्ली दोनो जगह मतदाता सूची में नाम होने के लाखों लाख उदाहरण मिलेंगे।


चुनावी खर्च बाबत कानून की ढ़ेरों खामियों को सरकार और सभी सियासती पार्टियां स्वीकार करती हैं । किंतु उनके निदान के सवाल को सदैव खटाई में डाला जाता रहा है । राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुआई में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, ईंधन, मतदाता सूचियां, लाउड-स्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैर सरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पातरहा । 1964 में संथानम कमेटी ने कहा था कि  राजनैतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है । 1971 में वांचू कमेटी अपनी रपट में कहा था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्चा काले धन को प्रोत्साहित करता है । इस रपट में हरेक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के एकाउंट का नियमित ऑडिट करवाने के सुझाव थे । 1980 में राजाचलैया समिति ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं । ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके है ।

अगस्त-98 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए । आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासती पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित ऑडिट नहीं कराती हैं । अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे । चुनाव आयोग ने जब कड़ा रुख अपनाता है तब सभी पार्टियों ने तुरत-फुरत गोलमाल रिर्पोटें जमा करती हैं । आज भी इस पर कहीं कोई गंभीरता नहीं दिख रही है ।

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

Change the food habits to save water

 

हम खान-पान बदलकर ही बे-पानी होने से बचेंगे

अब देश में कई राज्य सरकारें किसानों को धान की जगह अन्य फसल उगाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। बीते कुछ दशकों में खेत से ज्यादा मुनाफा कमाने की फिराक में किसानों को ऐसी फसलें बोने को प्रेरित कर दिया गया, जो ना तो उनके जलवायु के अनुकूल हैं और ना ही स्थानीय भोजन के अनुकूल। बात पंजाब की हो या फिर हरियाणा या उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना के दोआब के बीच बसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश या बिहार की, सदियों से यहां के समाज के भोजन में कभी चावल था ही नहीं, सो उसकी पैदावार भी यहां नहीं होती थी। 

दक्षिण भारत में अच्छी बरसात होती है। पारंपरिक रूप से वहीं धान की खेती होती थी और वहीं के लोगों का मूल भोजन चावल था। उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों की जमीन में नमी रहती थी, अत: इधर चना, गेहूं, राजमा, जैसी फसलें हुआ करती थीं। मोटे अनाजों का ज्यादा चलन था। यदि समूचे भारत को बारिकी से देखें, तो प्रकृति ने स्थानीय परिवेश व जरूरत को देखते हुए वहां के भोजन को विकसित किया है। चावल उत्पादन में जल खपत सबसे ज्यादा है और पौष्टिकता सबसे कम। वहीं मोटे अनाज अर्थात बाजरा, मक्का, ज्वार आदि की पौष्टिकता और कीमत, दोनों ज्यादा है व इन्हें उगाने में पानी की मांग सबसे कम। 
अमेरिका के मशहूर विज्ञान जर्नल साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक लेख - अल्टरनेटिव सेरिल्स केन इंप्रूव वाटर यूजेस ऐंड न्यूट्रिन  में यह बताया गया है कि किस तरह भारत के लोगों की बदली भोजन-अभिरूचियों के कारण उनके शरीर में पौष्टिक तत्व कम हो रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव का उनके स्वास्थ्य पर तत्काल विपरीत असर हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि भारत में गत चार दशकों के दौरान अन्न का उत्पादन 230 प्रतिशत तक बढ़ा, लेकिन उसमें पौष्टिक तत्वों की मात्रा घटती गई। चावल की तुलना में मक्का ज्यादा पौष्टिक है, लेकिन उसकी खेती व मांग लगातार घट रही है। 1960 में भारत में गेहूं की मांग 27 किलोग्राम प्रति व्यक्ति थी, जो आज बढ़कर 55 किलोग्राम के पार हो गई है। वहीं मोटा अनाज ज्वार-बाजरा की मांग इसी अवधि में 32.9 किलोग्राम से घट कर 4.2 किलोग्राम रह गई। जाहिर है कि इन फसलों की बुवाई भी कम हो रही है। यह भी जान लें कि जहां मोटी फसल के लिए बरसात या साधारण सिंचाई पर्याप्त थी, वहीं धान के लिए भूजल को पूरा निचोड़ लिया गया। आज देश में भूजल के कुल इस्तेमाल का 80 फीसदी खेती में हो रहा है और वह भी धान जैसी फसल पर। 
याद होगा कि चार साल पहले चीन ने गैर-बासमती चावल भारत से मंगवाने की अनुमति दी थी। हम भले ही इसे व्यापारिक सफलता समझें, लेकिन इसके पीछे चीन का जल-प्रबंधन था। जो चीन सारी दुनिया के गली-मुहल्लों तक अपने सामान के साथ कब्जा किए है, वह आखिर भारत व अन्य देशों से चावल क्यों मंगवा रहा है? असल में कुछ देशों ने ऐसी सभी खेती-बाड़ी को नियंत्रित कर दिया है, जिसमें पानी की मांग ज्यादा होती है। भारत ने बीते सालों में कोई 37 लाख टन बासमती चावल विभिन्न देशों को बेचा है। असल में हमने केवल चावल बेचकर कुछ धन नहीं कमाया, उसके साथ एक खरब लीटर पानी भी उन देशों को दे दिया, जो इतना चावल उगाने में हमारे खेतों में खर्च हुआ था। हम एक किलो गेहूं उगाने में 1700 लीटर और एक कप कॉफी के लिए 140 लीटर पानी का व्यय करते हैं। एक किलो बीफ के उत्पादन में 17 हजार लीटर पानी खर्च होता है। 100 ग्राम चॉकलेट के लिए 1712 लीटर व 40 ग्राम चीनी के लिए 72 लीटर पानी व्यय होता है।
यह जानना बहुत जरूरी है कि भारत में दुनिया के कुल उपधब्ध पानी का सिर्फ चार फीसदी है, जबकि आबादी 16 प्रतिशत है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में भी पानी के लिए बुरे हालात का मूल कारण खराब जल प्रबंधन बताया है। जरूरत है कि अब लोगों के भोजन में स्थानीय व मोटे अनाज को फिर से लौटा कर लाने के लिए जागरूकता अभियान, इनके पकवानों के प्रशिक्षण, जलवायु परिवर्तन के खतरे जैसे मसलों पर व्यापक रूप से काम किया जाए। कृषि संबंधी पारंपरिक ज्ञान को यदि फिर से अपनाया जाए, तो खेती में पानी के अपव्यय से बचा जा सकता है। 

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

Rail track convert in dustbin

 

कूड़ादान बना है रेल पथ

पंकज चतुर्वेदी

 


सन
2014 में शुरू  हुए स्वच्छता अभियान की सफलता के दावे और आंकड़ों में जो कुछ भी फर्क हो लेकिनयह बात सच है कि इससे आम लोगों में साफ-सफाई के प्रति जागरूकता जरूर आई। अब शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित स्वच्छता अभियान का दूसरा चरण शुरू  हुआ है लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी शहरी-कस्बे में प्रवेश के लिए बिछाई गई रेल की पटरियों बानगी हैं कि यहां अभी स्वच्छता के प्रति निर्विकार भाव बरकरार है। कहते हैं कि भारतीय रेल हमारे समाज का असल आईना है। इसमें इंसान नहीं, बल्कि देश के सुख-दुख, समृद्धि- गरीबी, मानसिकता- मूल व्यवहार जैसी कई मनोवृत्तियां सफर करती हैं। भारतीय रेल 66 हजार किलोमीटर से अधिक के रास्तों के साथ दुनिया का तीसरा सबसे वृहत्त नेटवर्क है, जिसमें हर रोज बारह हजार से अधिक यात्री रेल और कोई सात हजार मालगाड़ियां षामिल हैं। अनुमान है कि इस नेटवर्क में हर रोज कोई दो करोड़ तीस लाख यात्री तथा एक अरब मीट्रिक टन सामान की ढुलाई होती है। दुखद है कि पूरे देश की रेल की पटरियों के किनारे गंदगी, कूड़े और सिस्टम की उपेक्षा की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कई जगह तो प्लेटफार्म भी अतिक्रमण, अवांछित गतिविधियों और कूड़े का ढेर बने हुए हैं।


देश की राजधानी दिल्ली से आगरा के रास्ते दक्षिणी राज्यों, सोनीपत-पानीपत के रास्ते पंजाब, गाजियाबाद की ओर से पूर्वी भारत, गुडगांव के रास्ते जयपुर की ओर जाने वाले किसी भी रेलवे ट्रैक को दिल्ली शहर के भीतर ही देख लें तो जाहिर हो जाएगा कि देश का असली कचरा घर तो रेल पटरियों के किनारे ही संचालित हैं। सनद रहे ये सभी रास्ते विदेशी पर्यटकों के लोकप्रिय रूट हैं और जब दिल्ली आने से 50 किलोमीटर पहले से ही पटरियों के दोनों तरफ कूड़े, गंदे पानी, बदबू का अंबार दिखता है तो उनकी निगाह में देश की कैसी छबि बनती होगी। सराय रोहिल्ला स्टेशन से जयपुर जाने वाली ट्रैन लें या अमृतसर या चंडीगढ़ जाने वाली शताब्दी, जिनमें बड़ी संख्या में एनआरआई भी होते हैं, गाड़ी की खिड़की से बाहर देखना पसंद नहीं करते। इन रास्तों पर रेलवे ट्रैक से सटी हुई झुग्गियां, दूर-दूर तक खुले में षौच जाते लोग उन विज्ञापनों को मुह चिढ़ाते दिखते हैं जिसमें सरकार के स्वच्छता अभियान की उपलब्धियों के आंकड़े चिंघाड़ते दिखते हैं।


असल में रेल पटरियों के किनारे की कई-कई हजार एकड़ भ्ूामि अवैध अतिक्रमणों की चपेट में हैं। इन पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भूमाफिओं का कब्जा है जो कि वहां रहने वाले गरीब मेहनतकश लोगों से वसूली करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लेागां के जीवकोपार्जन का जरिया कूड़ा बीनना या कबाड़ी का काम करना ही हैं। ये लेाग पूरे शहर का कूड़ा जमा करते हैं, अपने काम का सामान निकाल कर बेच देते हैं और षेश के रेल पटरियों के किनारे ही फैंक देते हें, जहां धीरे-धरीे गंदगी के पहाउ़ बन जाते हैं। यह भी आगे चल कर नई झुग्गी का मैदान होता है।



दिल्ली से फरीदाबाद रास्ते को ही लें, यह पूरा औद्योगिक क्षेत्र है। हर कारखाने वाले  के लिए रेलवे की पटरी की तरफ का इलाका अपना कूड़ां, गंदा पानी आदि फैंकने का निशुल्क स्थान होता हे। वहीं इन कारखानों में काम करने वालों के आवास, नित्यकर्म का भी बेरोकटोक गलियारा रेल पटरियों की ओर ही खुलता है।


कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है।  राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है या फिर रेल पटरियों के किनारे फैंक दिया जाता है। राजधानी दिल्ली में कचरे का निबटान अब हाथ से बाहर निकलती समस्या बनता जा रहा है। इस समय अकेले दिल्ली शहर 16 हजार मीट्रिक टन कचरा उपजारहा है आर उसके अपने कूड़-ढलाव पूरी तरह भर गए हैं और आसपास 100 किलोमीटर दूर तक कोई नहीं चाहता कि उनके गांव-कस्बे में कूड़े का अंबार लगे। कहने को दिल्ली में पंाच साल पहले पोलीथीन की थैलियों पर रोक लगाई जा चुकी है, लेकिन आज भी प्रतिदिन 583 मीट्रिक टन कचरा प्लास्टिक का ही है। इलेक्ट्रानिक और मेडिकल कचरा तो यहां के जमीन और जल को जहर बना रहा है। घर-घर से कूड़ा जुटाने वाले अपने मतलब  का माल निकाल कर ऐसे सभी अपशिश्ट को ठिकाने लगाने के लिए रेल पटरियों के किनारे ही जाते हैं, क्योंकि वहां कोई रोक-टोक करने वाला नहीं है।


पटरियों के किनारे जमा कचरे में खुद रेलवे का भी बड़ा योगदान है। खासकर षताब्दी, राजधानी जैसी ऐस गाड़ियों में, जिसमें ग्राहक को अनिवार्य रूप से तीन से आठ तक भोजन परोसने होते हैं। इन दिनों पूरा भोजन पेक्ड और एक बार इस्तेमाल  होने वाले बर्तनों में ही होता है। यह हर रोज होता है कि अपना मुकाम आने से पहले खानपान व्यवस्था वाले कर्मचारी बचा भोजन, बोतल, पैकिंग सामग्री के बड़े-बड़े थप्पे चलती ट्रैन से पटरियों के किनारेे ही फैंक देते हैं।यदि हर दिन एक रास्ते पर दस डिब्बों से ऐसा कचरा फैंका जाए तो जाहिर है कि एक साल में उस वीराने में प्लास्टिक जैसी नश्ट ना होने वाली चीजों का अंबार हागा। कागज, प्लास्टिक, धातु  जैसा बहुत सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा कर रिसाईकलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है। उल्लेखनीय है कि दिलली तो महज एक उदाहरण है, ठीक यही हाल इंदौर या पटना या बंगलूरू या गुवाहाटी या फिर इलाहबाद रेलवे ट्रैक के भी हैं। शहर आने से पहले गंदगी का अंबार पूरे देश में एकसमान ही है। 


राजधानी दिल्ली हो या फिर दूरस्थ कस्बे का रेलवे प्लेटफार्म, निहायत गंदे, भीड़भरे, अव्यवस्थित और अवांछित लोगों से भरे होते हैं, जिनमें भिखारी से ले कर अवैध वैंडर और यात्री को छोड़ने आए रिश्तेदारों से ले कर भांति-भांति के लोग होते हैं। ऐसे लेाग रेलवे की सफाई के सीमित संसाधनों को तहर-नहस कर देते हैं। कुछ साल पहले बजट में रेलवे स्टेशन विकास निगमके गठन की घोशणा की गई थी, जिसने रेलवे स्टेशन को हवाई अड्डे की तरह चमकाने के सपने दिखाए थे। कुछ स्टेशनों पर काम भी हुआ, लेकिन जिन पटरियों पर रेल दौड़ती है और जिन रास्तों से यात्री रेलवे व देश की संुदर छबि देखने की कल्पना करता है, उसके उद्धार के लिए रेलवे के पास ना ता कोई रोड़-मेप हैं और ना ही परिकल्पना।


 

सोमवार, 3 जनवरी 2022

leopard-roaming-in-city-village-near-humans-settlement

बस्ती में घूमते तेंदुए 

पंकज चतुर्वेदी
 


 थोडी सी ठंड क्या बढ़ी देश  के अलग-अलग इलाकों से कंक्रीट के जंगल में हरे जंगलों के मांसाहारी जानवरों के घूमने की खबर आने लगी। बुंदेलखंड का छतरपुर शहर अपने आसपास का घना जंगल कोई चार दशक पहले ही चट कर चुका है और वहां की आबादी निश्चिन्त  थी कि अब इस इलाके पर उसका ही राज है और अचानक ही बीते एक सप्ताह से वहां की घनी बस्तिायों के सीसीटीवी में एक तेंदुआ घूमता दिख रहा है। जिलाधीा के घर से सौ मीटर दूर, ष्हार की सबसे घनी बस्ती में भी । पिछले महीने कानपूर में नवाब गंज के पास गलियों में तेंदुआ घूम रहा था, फिर वह उन्नाव के पास देखा गया अब उसकी चहल-पहल लखनऊ शहर के गुडंबा थाने के पहाड़पुर चोराहे  पर देखी जा रही है। गत दो सप्ताह में भोपाल और नागपुर में भी घनी बस्ती के बीच तेंदुआ घूमता दिखा है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद के सबसे पाॅश  इलाके राजनगर में तो कई बार तेदुए को टहलते देखा गया। 

 यह तो सभी जानते हैं कि जगल का जानवर इंसान से सर्वाधिक भयभीत रहता है और वह बस्ती में तभी घुसता है जब वह पानी या भोजन की तलाष में भटकते हुए आ जाए। चूंकि तेंदुआ कुत्ते से लेकर मुर्गी तक को खा सकता है अतः जब एक बार लोगों की बस्ती की राह पकड़ लेता है तो सहजता से षिकार मिलने के लोभ में बार-बार यहां आता है । यदा-कदा जंगल महकमे के लोग इन्हे पिंजड़ा लगा कर ंपकड़ते हैं और फिर पकड़े गए स्थान के करीब ही किसी जंगल में छोड़ देते है और तेंदुए की याददाश्त  ऐसी होती है कि वह फिर से लौट कर वहीं आ जाता है। 


 तगड़ी ठंड में तेंदए के बस्ती में आने का सबसे बड़ा कारण है कि जंगलों में प्राकृतिक जल-स्त्रोत कम हो रहे हैं । ठंड में ही पानी की कमी से हरियाली भी कम हो रही है।घास कम होने का अर्थ है कि तेंदुए का षिकार कहे जाने वाले हिरण आदि की कमी या पलायन कर जाना। ऐसे में भूख-प्यास से बेहाल जानवर सड़क की ओर ही आता है। वैसे भी अधिक ठंड से अपने को बचाने के लिए जानवर अधिक भेाजन करता है ताकि तन की कगरमी बनी रहे। जान लें कि घने जंगल में बिल्ली मौसी के परिवार के बड़े सदस्य बाघ का कब्जा होता है और इसी लिए परिवार के छोटे सदस्य जैसे तेंदुए या गुलदार बस्ती की तरफ भागते हैं। विडंबना है कि जंगल के संरक्षक जानवर हों या फिर खेती-किसानी के सहयोगी मवेशी,उनके के लिए पानी या भोजन की कोई नीति नहीं है। जब कही कुछ हल्ला होता है तो तदर्थ व्यवस्थाएं तो होती हैं लेकिन इस पर कोई दीर्घकालीक नीति बनी नहीं। 


 प्रकृति ने धरती पर इंसान , वनस्पति और जीव जंतुओं को जीने का समान अधिकार दिया, लेकिन इंसान ने भौतिक सुखों की लिप्सा में खुद को श्रेष्ठ मान लिया और प्रकृति की प्रत्येक देन पर अपना अधिक अधिकार हथिया लिया। यह सही है कि जीव-जंतु या वनस्पति अपने साथ हुए अन्याय का ना तो प्रतिरोध कर सकते हैं और ना ही अपना दर्द कह पाते हैं। परंतु इस भेदभाव का बदला खुद प्रकृति ने लेना शुरू कर दिया। आज पर्यावरण संकट का जो चरम रूप सामने दिख रहा है, उसका मूल कारण इंसन द्वारा नैसर्गिकता में उपजाया गया, असमान संतुलन ही है। परिणाम सामने है कि अब धरती पर अस्तित्व का संकट है। समझना जरूरी है कि जिस दिन खाद्य श्रंखला टूट जाएगी धरती से जीवन की डोर भी टूट जाएगी। समूची खाद्य श्रंखला का उत्पादन व उपभोग बेहद नियोजित प्रक्रिया है। जंगल बहुत विशाल तो उससे मिलने वाली हरियाली पर जीवनयापन करने वाले उससे कम तो हरियाली खाने वाले जानवरों को मार कर खाने वाले उससे कम। 


हमारा आदि -समाज इस चक्र से भलीभांति परिचित था तभी वह प्रत्येक जीव को पूजता था, उसके अस्तित्व की कामना करता था। जंगलों में प्राकृतिक जल संसाधनों ंका इस्तेमाल अपने लिए कतई नहीं करता था- न खेती के लिए न ही निस्तार के लिए और न ही उसमें ंगंदगी डालने को । जान लें कि तेंदुआ एक षानादार षिकारी तो है ही किसी इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता का मानक चिह्नक भी होता है। जमीनी हकीकत यह है कि वर्तमान में इसका अस्तित्व ही सवालों के घेरे में है। जंगली बिल्लियों के कुनबे के मूलभूत गुणों से विपरीत इनका स्वभाव हालात के अनुसार खुद को ढाल लेने का होता है। जैसे कि ये चूहों और साही से लेकर बंदरों और कुत्तों तक किसी भी चीज का शिकार कर सकते हैं। वे गहरे जंगलों और मानव बस्तियों के पास पनप सकते हैं। यह अनुकूलन क्षमता, इन्हें कही भी छिपने और  इंसान के साथ जीने के काबिल बना देती है। लेकिन जब तेंदुए जंगलों के बाहर उच्च मानव घनत्व वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं, तो हमें लगता है कि वे भटक गए हैं। हम भूल जाते हैं कि यह उनका भी घर है, उतना ही हमारा भी है। तेंदुआ अपना जंगल छोड़ कर यदि लंबी यात्रा करता है तो उसका कारण भोजन के अलावा अपनी यौन क्रिया के लिए साथी तलाशना होता है। एक जंगल से दूसरे जंगल में जाने के लिए, तेंदुए प्राकृतिक गलियारों का उपयोग करते हैं जो ज्यादातर नदियों और खेतों के माध्यम से होते हैं। चूंकि ये कॉरिडोर मानव बस्तियों के अंधाधुंध विस्तार के चलते टूट गए हैं, इसलिए तेंदुए-मानव संपर्क की संभावना बन जाती हैं। हालांकि तेंदुए जितना हो सके मानव संपर्क से बचने की कोशिश करते हैं। 


भारत में संरक्षित वन क्षेत्र तो बहुत से विकसित किए गए और वहां मानव गतिविधियों पर रोक के आदेश  भी दिए,लेकिन दुर्भाग्य है कि सभी ऐसे जंगलों के करीब तेज गति वाली सड़कें बनवा दी गईं। इसके लिए पहाड़ काटे गए, जानवरों के नैसर्गिक आवागमन रास्तों पर काली सड़कें बिछा दी गईं। इस निर्माण के कारण कई झरने, सरितांए प्रभावित हुए। जंगल की हरियाली घटने और हरियाली बढ़ाने के लिए गैर-स्थानीय पेड बोने के कारण भी जानवरों को भोजन की कमी महसूस हुई। अब वानर को लें, वास्तव में यह जंगल का जीव है। जब तक जंगल में उसे बीजदार फल खाने को मिले वह कंक्रीट के जंगल में आया नहीं। वानर के पर्यावास उजड़ने व पानी की कमी के कारण वह सड़क की ओर आया। जंगल से गुजरती सड़कों पर आवागमन और उस पर ही बस गया। यहां उसे खाने को तो मिल जाता है लेकिन उसके पीछे-पीछे तेंदुआ भी आ जाता है है। प्रत्येक वन में सैंकडों छोटी नदियां, तालाब और जोहड़ होते हैं। इनमें पानी का आगम बरसात के साथ-साथ जंगल के पहाड़ों के सोते- सरिताओं से होता है। असल में पहाड़ जंगल और उसमें बसने वाले जानवरों की संरक्षण-छत होता है। चूंकि ये पहाड़ विभिन्न खनिजों के भंडार होते है। सो खनिज उत्खनन के अंधाधुघ दिए गए ठेकों ने पहाड़ा ेंको जमींदोज कर दिया। कहीं-कहीं पहाड़ की जगह गहरी खाई बन गईं और कई बार प्यासे जानवर ऐसी खाईयों में भी गिर कर मरते हैं। 

तेंदुए को यदि एक बार इंसान के खून की लत लग जाए तो यह खतरनाक होता है। घने जंगलों के खमाप्त होने व वहां के जीवों के लगातार इंसान के संपर्क में आने के कारण हम इन दिनों कोविड की त्रासदी झेल ही रहे हैं। जंगल का अपने एक चक्र हुआ करता था , सबसे भीतर घने ऊँचे पेड़ों वाले जंगल, गहरी घास जो कि किसी बाहरी दखल से मुक्त रहती थी , वहां मनुष्य के लिए खतरनाक जानवर शेर आदि रहते थे . वहीं ऐसे सूक्ष्म जीवाणुओं का बसेरा होता था जो यदि लगातार इंसान के सम्पर्क में आये तो अपने गुणसूत्रीय संस्कारों को इन्सान के शरीर के अनुरूप बदल सकता था . इसके बाहर कम घने जंगलों का घेरा- जहां हिरन जैसे जानवर रहते थे, माँसाहारी जानवर को अपने भोजन के लिए महज इस चक्र तक आना होता था . उसके बाद जंगल का ऐसा हिस्सा जहां इंसान अपने पालतू मवेशी चराता, अपनी इस्तेमाल की वनोपज को तलाशता और इस घेरे में ऐसे जानवर रहते जो जंगल और इंसान दोनों के लिए निरापद थे , तभी इस पिरामिड में शेर कम, हिरन उससे ज्यादा, उभय- गुनी जानवर उससे ज्यादा और उसके बाहर इंसान , ठीक यही प्रतिलोम जंगल के घनेपन में लागु होता जंगलों की अंधाधुंध कतई और उसमें बसने वाले जानवरों के प्राकृतिक पर्यावास के नष्ट होने से इंसानी दखल से दूर रहने वाले जानवर सीधे मानव के संपर्क में आ गए। यदि इंसान चाहता है कि वह जंगली जानवरों का निवाला ना बने तो जरूरत है कि नैसर्गिक जंगलों को छेड़ा ना जाए, जंगल में इंसानों की गतिविधियों पर सख्ती से रेाक लगे।

Azad Hind Village of Delhi is neglected

उपेक्षित है दिल्ली का आज़ाद हिन्द ग्राम    हम अपने सैनानियों के सम्मान में सियासत और वोट तलाशते हैं और आज़ादी के संघर्ष के मूल्यों की अवहेलन...