My writings can be read here मेरे लेख मेरे विचार, Awarded By ABP News As best Blogger Award-2014 एबीपी न्‍यूज द्वारा हिंदी दिवस पर पर श्रेष्‍ठ ब्‍लाॅग के पुरस्‍कार से सम्‍मानित

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

Understand the reasons for the longest peasant movement in the world

 

गुस्सा अकेले पंजाब के किसान का ही नहीं है –

पंकज चतुर्वेदी

 


वैसे तो सारे देश में किसान अपनी मेहनत, लागत और उससे होने वाली आय को ले कर निराश हैं और किसान बिल ने उन्हें विरोध  करने का एक स्वर दे दिया है , लेकिन यह बात बार -बार हो रही है कि आखिर पंजाब में ही ज्यादा रोष क्यों  है ? यह जान लें कि कृषि बिल को ले कर  किसान का असल  दर्द तो यह है कि उसे अपना अस्तित्व ही खतरे में लग रहा है , शायद भारत खेती के मामले में अमेरिका का मॉडल अपनाना चाहता है जहां कुल आबादी का महज डेढ़ फीसदी लोग ही खेती करते हैं , उनके खेत अर्थात विशाल कम्पनी संचालित, मशीनों से बोने-काटने वाले, कर्मचारियों द्वारा प्रबंधित और बाज़ार को नियंत्रित करने वाले किसान, हां , उन्हें सरकार औसतन प्रति किसान सालाना 45 लाख डॉलर सब्सिडी देती है और हमारे यहा ? प्रति किसान सालाना बामुश्किल बीस हज़ार . असल में किसान बिल से अलग अलग किसानों की दिक्कते हैं और इस अवसर पर वे फूट कर बाहर आ रही हैं .



पंजाब में कोई ग्यारह लाख परिवार खेती-किसानी पर निर्भर हैं , इसके अलावा ,पंजाब की खेती के बदौलत बिहार से बुंदेलखंड तक के लाखों श्रमिकों के घर बरकत आती  है . भारत के सालाना गेहूं उत्पादन में पंजाब का योगदान 11.9 फीसद  और धान में 12.5 फीसद है.इस राज्य में किसान पर कर्ज भी बहुत अधिक है और बीते दस सालों में  लगभग साढ़े तीन सौ किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं . बीते साल अकेले पंजाब में अनाज की सरकारी खरीदी 52  सौ करोड रूपये की थी , जाहिर है कि मंडी, सरकारी खरीद और एम् एस पी पंजाब के किसान के लिए महत्वपूर्ण है . संकट अकेले अच्छी फसल के लिए पानी , बिजली का संकट और नकली बीज-खाद-दवा का खतरा ही नहीं है, बल्कि उत्पाद का सही दाम मिलना भी एक चुनौती है .



इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा जारी वैस्टलैंड एटलस-2019’  में उल्लेखित बंजर जमीन को खेती लायक बदलने की सरकारी गौरव गाथाओं के बीच यह दुखद तथ्य भी छुपा है कि हमारे देश में खेती के लिए जमीन साल-दर-साल कम हो रही है, जबकि आबादी बढ़ने से खाद्य की मांग बढ़ रही है और इस दिशा में देश की दुनिया के दीगर देशों पर निर्भरता  बढ़ती जा रही है।  जानना जरूरी है कि भारत के पास दुनिया की कुल धरती का 2.4 प्रतिशत है, जबकि विश्व की आबादी के 18 फीसदी हमारे बाशिंदे हैं।  भारत में खेती की जमीन प्रति व्यक्ति औसतन 0.12 हैक्टर रह गई है, जबकि विश्व में यह आंकड़ा 0.28 हैक्टर है।



सरकार भी मानती है कि पंजाब जैसे कृषि  प्रधान राज्य में देखते ही देखते 14 हजार हैक्टर अर्थात कुल जमीन का 0.33 प्रतिशत  पर खेती बंद हो गई। इस राज्य में जोत छोटी होती जा रही है और आज
72 फीसद जोत 5 एकड़ से कम है. पश्चिम बंगाल में 62 हजार हैक्टर खेत सूने हो गए तो केरल में 42 हजार हैक्टर से किसानों का मन उचट गया। देश  के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश  का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हैक्टर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश  अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। यह भी सच है कि मनरेगा में काम बढ़ने से खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे है और  मजदूर ना मिलने से हैरान-परेशान किसान खेत को तिलांजली दे रहे हैं।

नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक देश में 14 करोड़ हैक्टर खेत हैं।  विभाग की ‘‘भारत में पारिवारिक स्वामित्व एवं स्वकर्षित जोत’’ संबंधित रिपोर्ट का आकलन बहेद डरवना है। सन 1992 में ग्रामीण परिवारों के पास 11.7 करोड़ हैक्टर भूमि थी जो 2013 तक आते-आते महज 9.2 करोड़ हैक्टर रह गई।  यदि यही गति रही तो तीन साल बाद अर्थात 2023 तक खेती की जमीन आठ करोड़ हैक्टर ही रह जाएगी।
आखिर खेत की जमीन कौन खा जाता है इसके मूल कारण तो खेती का अलाभकारी कार्य होना, उत्पाद की माकूल दाम ना मिलना, मेहनत की सुरक्षा आदि तो हैं ही, विकास ने सबसे ज्यादा खेतों की हरियाली का दमन किया है। पूरे देश में इस समय बन रहे या प्रस्तावित छह औद्योगिक कॉरीडोर के लिए कोई 20.14 करोड़ हैक्टर जमीन की बली चढ़ेगी, जाहिर है इसमें खेत भी होंगे।

यह सब सरकारी रिकार्ड में दर्ज है कि देश में कोई 14 .5 करोड़ किसान परिवार हैं इनमें से छियासी फीसदी छोटे या सीमान्त किसान हैं अर्थात जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन  हैं . इनमें से भी 68 प्रतिशत वे हैं जिनकी जोत का रकवा एक हेक्टेयर से भी कम है . देश में सबसे ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश में हैं -2.38 करोड़ , फिर बिहार में 1.68 करोड़ , उसके बाद महाराष्ट्र में 1.52 और मध्य प्रदेश में कोई एक करोड़ . इन किसानों में आधे से अधिक 52.5 फीसदी कर्ज में दबे हैं , वह भी औसतन एक लाख या अधिक् के कर्ज में . दुर्भाग्य है कि हमारे देश में इस बात पर कोई संवेदना नहीं होती कि खेती पर निर्भर औसतन हर दिन 28 लोग आत्म ह्त्या करते हैं और इनमें सर्वाधिक महाराष्ट्र में हैं .

किसान को अपने अस्तित्व की फिकर है और यह बात इस आंकड़े से उजागर होती है कि जहां सन 2016 में 45 .14 करोड़ लोग खेती से अपना घर-बार चलाते थे , यह संख्या सन  2020 आते –आते  41.49 करोड़ रह गयी है . विडम्बना है कि यह संख्या हर साल घटती रही और भाग्य विधाता बेपरवाह रहे – सन 2017 में यह संख्या 44.05 हुई , सन 2018 में 43.33 , 2019  में खेती पर निर्भर 42.39 हो गये .

किसान भारत का स्वाभिमान है और देश  के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण अंतहीन है - नकली बीज व खाद की भी निरंकुश समस्या तो खेत सींचने के लिए बिजली का टोटा है, कृषि  मंडियां दलालों का अड्डा बनी है व गन्ना, आलू जैसी फसलों के वाजिब दाम मिलना या सही समय पर कीमत मिलना लगभग असंभव जैसा हो गया हे। जाहिर है कि ऐसी घिसी-पिटी व्यवस्था में नई पीढ़ी तो काम करने से रही, सो वह खेत छोड़ कर चाकरी करने पलायन कर रही है।
जब तक खेत उजड़गे, दिल्ली जैसे महानगरों की ओर ना तो लोगों का पलायन रूकेगा और ना ही अपराध रूकेंगे , ना ही जन सुविधाओं का मूलभूत ढ़ांचा लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप होगा। आज किसानों के प्रदर्शन  के कारण दिल्ली  व अन्य महानगर त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, कल जमीन से उखड़े ये बेरोजगार और हताष लोगों की भीड़ कदम-कदम पर महानगरों का रास्ता रोकेगी। यदि दिल से चाहते हो कि कभी किसान दिल्ली की ओर ना आए तो सरकार व समाज पर दवाब बनाएं कि दिल्ली या लखनऊ उसके खेत पर लालच से लार टपकाना बंद कर दें । किसान के श्रम का सही मुल्यांकन हो , किसान की मर्जी के बगैर कोई कानून –कायदे बनाए ना जाएँ .

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

companies-should-also-take-responsibility-for-poisonous-waste

जहरीले कचरे की जिम्मेदारी भी लें कंपनियां




भारत में हर साल कोई 4.4 खरब लीटर पानी को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। यह बाजार 7,040 करोड़ रुपये सालाना का है। जमीन के गर्भ से या फिर बहती धारा से प्रकृति के आशीर्वाद स्वरूप निःशुल्क मिले पानी को कुछ मशीनों से गुजार कर बाजार में लागत के 160 गुणा ज्यादा भाव से बेच कर मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने वाली ये कंपनियां हर साल देश में पांच लाख टन प्लास्टिक बोतलों का अंबार भी जोड़ती हैं। शीतल पेय का व्यापार तो इससे भी आगे है और उससे उपजा प्लास्टिक कूड़ा भी यूं ही इधर-उधर पड़ा रहता है। चूंकि ये बोतलें ऐसे किस्म की प्लास्टिक से बनती हैं, जिनका पुनर्चक्रण हो नहीं सकता, सो कबाड़ी इन्हें लेते नहीं हैं। या तो यह प्लास्टिक टूट-फूट कर धरती को बंजर बनाता है या फिर इसे एकत्र कर ईंट-भट्ठे या ऐसी ही बड़ी भट्ठियों में झोंक दिया जाता है, जिससे निकलने वाला धुआं दूर-दूर तक लोगों का दम घोंटता है। ठीक यही हाल हर दिन लाखों की संख्या में बिकने वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों, दूध की थैलियों, चिप्स आदि के पैकेट का है। यह बानगी है कि देश के जल-जंगल-जमीन को संकट में डालने वाले उत्पादों को मुनाफा कमाने की तो छूट है, लेकिन उनके उत्पाद से उपजे जहरीले कचरे के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।


असल में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के चलते नैसर्गिकता में आए बदलाव का मूल कारण हमारा प्रकृति पर निर्भरता से दूर होना है। विडंबना है कि कुछ संगठन व व्यापारी यह कहते नहीं अघाते कि प्लास्टिक के आने से पेड़ बच गए। हकीकत यह है कि पेड़ से मिलने वाले उत्पाद, चाहे वे रस्सी हों या जूट या कपड़ा, या कागज, इस्तेमाल के बाद प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। पेड़ का दोहन करें, तो उसे फिर से उगा कर उसकी पूर्ति की जा सकती है, लेकिन एक बार प्लास्टिक धरती पर किसी भी स्वरूप में आ गया, तो उसका नष्ट होना असंभव है और वह समूचे पर्यावरणीय-तंत्र को ही हानि पहुंचाता है। यह मसला अकेले पानी की बोतलों का ही नहीं है, खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर हर तरह के सामान की पैकिंग में प्लास्टिक या थर्मोकॉल का इस्तेमाल बेधड़क हो रहा है, लेकिन कोई भी निर्माता यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि इस्तेमाल होने वाली वस्तु के बाद उससे निकलने वाले इस जानलेवा कचरे का उचित निष्पादन कौन करेगा। 


मोबाइल फोन, कंप्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कंपनियों का मुनाफा असल उत्पादन लागत का कई सौ गुणा होता है, लेकिन करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च करने वाली ये कंपनियां इनसे उपजने वाले ई-कचरे की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं होतीं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों से भी उपज रहा है। इनसे निकलने वाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देती हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं, जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। इस कबाड़ को भगवान भरोसे प्रकृति को नष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही नहीं, ऐसे नए उपकरण खरीदने के दौरान पैकिंग व सामान की सुरक्षा के नाम पर कई किलो थर्मोकोल व पॉलिथीन का इस्तेमाल होता है, जिन्हें उपभोक्ता कूड़े में ही फेंकता है।

क्या यह अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए कि इस तरह के पैकेजिंग मटेरियल कंपनी खुद तत्काल उपभोक्ता से वापस ले लें? यह तो किसी छिपा नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए करों से उनका खजाना जरूर भरा हो, कभी पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदम तो उठे नहीं। भारत जैसे विशाल और दिन-दोगुनी, रात चौगुनी प्रगति कर रहे उपभोक्तावादी देश में अब यह अनिवार्य होना चाहिए कि प्रत्येक सामान के उत्पादक या निर्यातक उसके उत्पाद की पैकेजिंग या कंडम होने से उपजे कबाड़ या प्रदूषण के निष्पादन की तकनीक और जिम्मेदारी स्वयं ले। यह तो कतई नैतिक व न्यायोचित नहीं है कि कंपनियां चॉकलेट-बिस्कुट, मोबाइल फोन, पानी-शीतल पेय इत्यादि बेच कर जम कर मुनाफा कमाएं और उनकी वजह से होने वाले प्रदूषण से समाज व सरकार जूझें।



शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

cyclone emerging due to climate change

 जलवायु परिवर्तन के कारण उभर रहे हैं समुद्री तूफान

                                                                                                                                पंकज चतुर्वेदी 



प्राकृतिक आपदाओं से बेहाल सन 2020 के आखिरी महीने की शुरूआत में ही ‘‘निवार’ की तबाही से दक्षिणी राज्य उबरे नहीं हैं दक्षिणी तमिलनाडु व केरल पर फिर से  फिर से भारी बरसात और समुद्री तूफान की चेतावनी जारी कर दी गई थी। यह इस साल का 124वां समुद्र बवंडर था। दिसंबर के पहले सप्ताह चक्रवाती तूफान निवार के कारण चैन्ने में हवाई अड्डा हो या रेलवे स्टेशन, सभी जगह पानी भर गया था। जब पुदुचेरी के तट पर तूफान टकराया तो 140 किलोमीटर  प्रति घंटा की गति से बही हवा ने पांच लोगों की जान ली, हजार से ज्यादा पेड़ उखड़ गए, कई करोड़ की संपत्ति नष्ट हो गई थी। अभी उस बिखराव को समेटने का भी काम पूरा नहीं हुआ था श्रीलंका के त्रिंकोमाली के करीब कम दवाब से उत्पन्न तूफान ‘बुरेवी’ तटीय भारत में बरसात व आंधी का कारण बन गया। 

मालदीव द्वारा नाम  दिए गए ‘बुरेवी’ तूफान ने हालांकि हमारे देश में ज्यादा नुकसान नहीं किया लेकिन औसतन हर महीने 10 से अधिक चक्रवाती तूफान भारत की विशाल समुद्री रेखा पर बसे शहरों-गांवों के लिए चिंता का विषय है। सभी जानते हैं कि समुद्र तटीय बस्तियां आदिकाल से ही व्यापार की बड़ी केंद्र रही हैं। यहां आए रोज बंवंडर की मार आर्थिक-सामाजिक और सामरिक दृष्टि से देश के लिए चुनौती है। अब समझना होगा कि  यह एक महज प्राकृतिक आपदा नहीं है , असल में तेजी से बदल रहे दुनिया के प्राकृतिक मिजाज ने इस तरह के तूफानों की संख्या में इजाफा किया है । जैसे-जैसे समुद्र के जल का तापमान बढ़ेगा, उतने ही अधिक तूफान हमें झेलने होंगे । यह चेतावनी है कि इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को नियंत्रित नहीं किया तो साईक्लोंन या बवंडर के चलते भारत के सागर किनारे वालें शहरों में आम लोगों का जीना दूभर हो जाएगा ।



जलवायु परिवर्तन पर 2019 में जारी इंटर गवमेंट समूह (आईपीसीसी) की विशेष रिपोर्ट ओशन एंड क्रायोस्फीयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट के अनुसार,  सरी दुनिया के महासागर 1970 से ग्रीनहाउस गैस  उत्सर्जन से उत्पन्न 90 फीसदी अतिरिक्त गर्मी को अवशोषित कर चुके है। इसके कारण महासागर  गर्म हो रहे हैं और इसी से चक्रवात को जल्दी-जल्दी और खतरनाक चेहरा सामने आ रहा है।  निवार तूफान के पहले बंगाल की खाड़ी में जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र जल  सामान्य से अधिक गर्म हो गया था। उस समय समुद्र की सतह का तापमान औसत से लगभग 0.5-1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म था, कुछ क्षेत्रों में यह सामान्य से लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। 


जान लें समुद्र का 0.1 डिग्री तापमान बढ़ने का अर्थ है चक्रवात को अतिरिक्त ऊर्जा मिलना। हवा की विशाल मात्रा के तेजी से गोल-गोल घूमने पर उत्पन्न तूफान उष्णकटिबंधीय चक्रीय बवंडर कहलाता है। पृथ्वी भौगोलिक रूप से दो गोलार्धां में विभाजित है। ठंडे या बर्फ वाले उत्तरी गोलार्द्ध में उत्पन्न इस तरह के तूफानों को हरिकेन या टाइफून कहते हैं । इनमें हवा का घूर्णन घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में एक वृत्ताकार रूप में होता है। जब बहुत तेज हवाओं वाले उग्र आंधी तूफान अपने साथ मूसलाधार वर्षा लाते हैं तो उन्हें हरिकेन कहते हैं। जबकि भारत के हिस्से  दक्षिणी अर्द्धगोलार्ध में इन्हें चक्रवात या साइक्लोन कहा जाता है। इस तरफ हवा का घुमाव घड़ी की सुइयों की दिशा में वृत्ताकार होता हैं। किसी भी उष्णकटिबंधीय अंधड़ को चक्रवाती तूफान की श्रेणी में तब गिना जाने लगता है जब उसकी गति कम से कम 74 मील प्रति घंटे हो जाती है। ये बवंडर कई परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता वाले होते है।

धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवती तूफानों का उठना। भूमध्य रेखा के नजदीकी जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां इस तरह के चक्रवातों के उभरने  की संभावना होती है। तेज धूप में जब समुद्र के उपर की हवा गर्म होती है तो वह तेजी से ऊपर की ओर उठती है। बहुत तेज गति से हवा के उठने से नीचे कम दवाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है। कम दवाब के क्षेत्र के कारण वहाँ एक शून्य या खालीपन पैदा हो जाता है। इस खालीपन को भरने के लिए आसपास की ठंडी हवा तेजी से झपटती है । चूंकि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर एक लट्टू की तरह गोल घूम रही है सो हवा का रुख पहले तो अंदर की ओर ही मुड़ जाता है और फिर हवा तेजी से खुद घूर्णन करती हुई तेजी से ऊपर की ओर उठने लगती है। इस तरह हवा की गति तेज होने पर नीचे से उपर बहुत तेज गति में हवा भी घूमती हुई एक बड़ा घेरा बना लेती है। यह घेरा कई बार दो हजार किलोमीटर के दायरे तक विस्तार पा जाता है। सनद रहे भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की घूर्णन गति लगभग 1038 मील प्रति घंटा है जबकि ध्रुवों पर यह शून्य रहती है।

इस तरह के बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालीक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता हे। भीषण बरसात के कारण बन गए दलदली क्षेत्र, तेज आंधी से उजड़ गए प्राकृतिक वन और हरियाली, जानवरों का नैसर्गिक पर्यावास समूची प्रकृति के संतुलन को उजाड़ देता है। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे वे पलक झपकते नेस्तनाबूद हो जाते हैं। तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी मे खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुए क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। 

भारत उपमहाद्वीप में बार-बार और हर बार पहले से घातक तूफान आने का असल कारण इंसान द्वारा किये जा रहे प्रकृति के अंधाधुध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल के प्रारंभ में ही अमेरिका की अंतरिक्ष शोध संस्था नेशनल एयरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ‘नासा ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और खूंखार होते जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान बढ़ने से सदी के अंत में बारिश के साथ भयंकर बारिश और तूफान आने की दर बढ़ सकती है। यह बात नासा के एक अध्ययन में सामने आई है। अमेरिका में नासा के ‘‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’’ (जेपीएल) के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों की शुरुआत के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर अंतरिक्ष एजेंसी के वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर (एआईआरएस) उपकरणों द्वारा 15 सालों तक एकत्र आकंड़ों के आकलन से यह बात सामने आई। अध्ययन में पाया गया कि समुद्र की सतह का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर गंभीर तूफान आते हैं। ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’(फरवरी 2019) में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं। ‘जेपीएल’ के हार्टमुट औमन के मुताबिक गर्म वातावरण में गंभीर तूफान बढ़ जाते हैं। भारी बारिश के साथ तूफान आमतौर पर साल के सबसे गर्म मौसम में ही आते हैं। लेकिन जिस  तरह ठंड के दिनो ंमें भारत में ऐसे तूफान के हमले बढ़ रहे हैं, यह मारे लिए गंभीर चेतावनी है।



मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

Drinking water become poison

जहर होता जीवनदायी जल



 दिल्ली से सटे इंदिरापुरम में अपनी संपन्नता, आधुनिकता और सजगता के लिए इठलाती गगनचुंबी इमारत वाले एक आवासीय परिसर में 11 दिसंबर को नलों ने ऐसा पानी उगला कि सौ से ज्यादा लोगों को उल्टी-दस्त के चलते अस्पताल ले जाना पड़ा।

लेकिन दो दिसंबर को ही बिहार के रोहतास में वे लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं थे कि उन्हें माकूल चिकित्सा सुविधा मिल पाती। यहां नौहट्टा थाना इलाके के चपरी गांव में दूषित पानी पीने से तीन बच्चों की मौत हो गई, वहीं 60 लोग बीमार हैं। राजधानी के करीब पश्चिम उत्तर प्रदेश के सात जिलों में पीने के पानी से कैंसर से मौत का मसला जब गरमाया, तो एनजीटी में प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक इसका कारण हैंडपंप का पानी पाया गया। अक्तूबर, 2016 में ही एनजीटी ने नदी के किनारे के हजारों हैंडपंप बंद कर गांवों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था का आदेश दिया था। कुछ हैंडपंप तो बंद भी हुए, लेकिन विकल्प ना मिलने से मजबूर ग्रामीण वही जहर पी रहे हैं।
अतीत में झाकें, तो केंद्र सरकार की कई योजनाएं, दावे और नारे फाइलों में तैरते मिलेंगे जिनमें भारत के हर एक नागरिक को सुरक्षित पर्याप्त जल मुहैया करवाने के सपने थे। इन पर अरबों खर्च भी हुए, लेकिन आज भी करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं। अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद होते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रुपए का नुकसान होता है।

ग्रामीण भारत की 85 फीसद आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है, दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है जो यदि दूषित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। संसद में यह बताया गया है कि करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं, इन्हें दांत खराब होने, हाथ-पैर टेड़े होने जैसे रोग झेलने पड़ रहे हैं, जबकि करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में लोहे की ज्यादा मात्रा परेशानी का सबब है।
नेशनल सैंपल सव्रे आफिस (एनएसएसओ) की ताजा 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी मिल नहीं पा रहा है। देश के महज 21.4 फीसद लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है। सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिशत बुरी तरह प्रदूषित है। यह सरकार स्वीकार कर रही है कि 78 फीसद ग्रामीण और 59 प्रतिशत शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। यह भी विडंबना है कि अब तक हर एक को पानी पहुंचाने की परियोजनाओं पर 89,956 करोड़ रुपए से अधिक खर्च होने के बावजूद सरकार परियोजना के लाभों को प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45,053 गांवों को नल-जल और हैंडपंपों की सुविधा मिली है, लेकिन लगभग 19,000 गांव ऐसे भी हैं जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है।
यह भयावह आंकड़े सरकार के ही हैं कि भारत में करीब 1.4 लाख बच्चे हर साल गंदे पानी से उपजी बीमारियों के चलते मर जाते हैं। देश के 639 में से 158 जिलों के कई हिस्सों में भूजल खारा हो चुका है और उनमें प्रदूषण का स्तर सरकारी सुरक्षा मानकों को पार कर गया है। हमारे देश में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करीब 6.3 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी तक मयस्सर नहीं है। इसके कारण हैजा, मलेरिया, डेंगू, ट्रेकोमा जैसी बीमारियों के साथ-साथ कुपोषण के मामले भी बढ़ रहे हैं।
पर्यावरण मंत्रालय और आईएमआईएस द्वारा 2018 में पानी की गुणवत्ता पर करवाए गए सव्रे के मुताबिक राजस्थान में 77.70 लाख लोग दूषित जल पीने से प्रभावित हैं। आईएमआईएस के मुताबिक पूरे देश में 70,736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिशण्रवाले दूषित जल से प्रभावित हैं। भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन भूजल को दूषित करने वालों पर अंकुश के कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं। यह अंदेशा सभी को है कि आने वाले दशकों में पानी को लेकर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी।

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

Disappearing Dialects

 बोली-भाषाएँ  भूलता हिंदुस्तान

पंकज चतुर्वेदी


 

‘अका’ अरुणाचल प्रदेश के वेस्अ कामंग जिले के 21 गांवों में तीन हजार से कम लोगों  द्वारा बोली जाने वाली ऐसी भाषा है जिसका अगली पीढ़ी तक जाना मुश्किल दिख रहा है। सन 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 बोली- भाषाएं थीं, जबकि हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1365 मातृभाषाएँ ही बची हैं। भारत सरकार के जनगणना निदेशालय की  मानें तो देश में एक लाख से अधिक बोलने वालों की संख्या की 22 अनुसूचित भाषाएं और 100 गैर अधिसूचित भाषाएं हैं। 42 ऐसी भाषाएं है जिन्हें बोलने वाले दस हजार से कम बचे हैं और उन्हें लुप्तप्राय माना जा रहा हैं। सरकार भी मानती है कि इन बोली-भाषाओं के लुप्त होने का खतरा है। दो साल पहले जब यूनेस्को द्वारा जारी दुनिया की भाषाओँ  के मानचित्र में जब यह आरोप लगा कि भारत अपनी बोली-भाषाओँ  को भूलने के मामले में दुनिया में अव्वल है तो लगा था कि शायद सरकार व समाज कुछ चेतेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कैसी विडंबना है कि देश  की आजादी के बाद हमारी पारंपरिक बोली-भाषाओँ  पर सबसे बड़ा संकट आया और उनमें भी आदिवासी समाज की बोलियां लुप्त होने में अव्वल रहीं।  श्री गणेश  देवी के सर्वे के अनुसार हम कोई 300 बोलियों को बिसरा चुके हैं और कोई 190 अंतिम सांसे ले रही हैं। दुखद बात यह है कि बोलियों के गुम जाने का संकट सबसे अधिक आदिवासी क्षेत्रों में है। चूंकि देश  के अधिकांश  जनजातिया बाहुल्य इलाके प्राकृतिक संसाधन से संपन्न हैं सो बाहरी  समाज के लोभ की गिरफ्त में यही क्षेत्र सबसे ज्यादा होते हैं हिंसा-प्रतिहिंसा , विकास और रोजगार की छटपटाहट के चलते आदिवासियों के पलायन और उनके नए जगह पर बस जाने की रफ्तार बढ़ी तो उनकी कई पारंपरिक बोलियां पहले कम हुई और फिर गुम गईं। एक बोली के लुप्त होने का अर्थ उसके सदियों पुराने संस्कार, भोजन, कहानियां, खानपान सभी का गुम हो जाना ।

जिन भाषाओं या बोलियों को लुप्तप्राय माना जा रहा है उसमें अंडमान निकोबार द्वीप समूह से 11 (ग्रेट अंडमानीज, जारवा, लामोंगसे, लूरो, मोउट, ओंगे, पू, सानयेनो, सेंटिलेज, शोमपेन और तटकाहनयिलांग), पूर्वोत्तर की 12 ( रुगा ,ताई नोरा, ताई रोंग , मो ,ना, एमोल, अका, कोइरन, लमगांग, लांगरोंग, पुरूम और तराओ) और हिमाचल प्रदेश से चार (बगहाटी, हन्दूरी, पंगवाली और सिरमौदी) शामिल है। उड़ीसा व बस्तर की मंदा, परजी और पेन्गो, कोरगा और कुरुबा (कर्नाटक), तलंगाना-आंध्र व बस्तर की गदबा और नाकी, कोटा और थोटा (तमिलनाडु), (असम), बंगानी (उत्तराखंड), बिरहोरी (झारखंड), निहाली (महाराष्ट्र), और टोटो (पश्चिम बंगाल) शामिल हैं।

झारखंड में कुछ आदिम जनजातियों की बोली-भाषा को इस्तेमाल करने वालों की संख्या कम होने के आंकड़ै बेहद चौंकाते हैं जोकि सन 2001 में तीन लाख 87 से हजार से सन 2011 में घट कर दो लाख 92 हजार रह गई। ये जनजातियां हैं - कंवर, बंजारा, बथुडी, बिझिया, कोल, गौरेत, कॉड, किसान, गोंड और कोरा। इसके अलावा माल्तो-पहाड़िया, बिरहोर, असुर, बैगा भी ऐसी जनजातियां हैं जिनकी आबादी लगातार सिकुड़ रही है। जाहिर है इसके साथ उनको बोलने वाले भी घट रहे हैं। इन्हें राज्य सरकार ने पीवीजीटी श्रेणी में रखा है। एक बात आश्चर्यजनक  है कि मुंडा, उरांव, संताल जैसे आदिवासी समुदाय जो कि सामाजिक, राजनीतिक , आर्थिक और शैक्षिक  स्तर पर आगे आ गए, जिनका अपना मध्य वर्ग उभर कर आया, उनकी जनगणना में आंकड़े देश  के जनगणना विस्तार के अनुरूप ही हैं। बस्तर में गौंड ,  दोरले, धुरबे आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा पिछड़ रहे हैं। कोरिया, सरगूजा, कांकेर जगदलपुर,नारायणपुर, दंतेवाड़ा, सभी जिलों में आदिवासी आबादी तेजी से घटी है। यह भी गौर करने वाली बात है कि नक्सलग्रस्त क्षेत्रों में पहले से ही कम संख्या  वाले आदिवासी समुदायों की संख्या और कम हुई है। ये केवल किसी आदि समाज के इंसान के लुप्त होने के आंकड़े ही नहीं है, बल्कि  उसके साथ उनकी बोली-भाशा के भी समाप्त होने की दास्तान है। 

प्रसिद्ध नृशास्त्री ग्रियर्सन की सन 1938 में लिखी गई पुस्तक ‘माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर ’ की भूमिका में एक ऐसे  व्यक्ति का उल्लेख है जो कि बस्तर की 36 बोलियों को समझता-बूझता था। जाहिर है कि  जानकार था जाहिर है कि आज से अस्सी साल पहले वहां कम से कम 36 बोलियां तो थी हीं। सभी जनजातियों की अपनी बोली, प्रत्येक हस्तशिल्प या कार्य करने वाले की अपनी बोली। राजकाज की भाषा  हल्बी थी जबकि जंगल में गोंडी का बोलबाला था। गोंडी का अर्थ कोई एक बोली समझने का भ्रम ना पालें - घोटुल मुरिया की अलग गोंडी तो दंडामी और अबूझमाड़िया की गोंडी में अलग किस्म के शब्द। उत्तरी गोंडी में अलग भेद। राज गोंडी में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव ज्यादा है। इसका इस्तेमाल गोंड राजाओं द्वारा किया जाता था। सन 1961 की जनगणना में इसको बोलने वालों की संख्या 12,713 थी और आज यह घट कर 500 के लगभग रह गई है।  चूंकि बस्तर  भाशा के आधर पर गठित ती राज्यों महाराष्ट्र , उड़िसा, तेलंगाना(आंध््रा प्रदेश ) से घिरा हुआ है , सो इसकी बोलियाँ छूते राज्य की भाषा से अछूती नहीं है।। दक्षिण बस्तर में भोपालपट्टनम,कोंटा आदि क्षेत्रों में दोरली बोली जाती है जिसमें तेलंगांना/आंध्रप्रदेश से लगे होने के कारण तेलुगु का प्रभाव दिखता है तो दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा दण्डामी बोली का क्षेत्र है। जगदलपुर, दरभा, छिन्द्गढ़ धुरवी बोली का बोलबाला है वहीं कोंडागांव क्षेत्र के मुरिया अधिकतर हल्बी बोलते हैं । नारायणपुर घोटुल मुरिया और माड़िया क्षेत्र है। बस्तर और ओडिशा राज्य के बीच सबरी नदी के किनारे धुरवा जनजाति की बहुलता है। जगदलपुर का नेतानार का इलाका, दरभा और सुकमा जिले के छिंदगढ़ व तोंगपाल क्षेत्र में धुरवा आदिवासी निवास करते हैं। इस जनजाति की बोली धुरवी है। इसी तरह नारायणपुर ब्लॉक में निवासरत अबूझमाड़िया माड़ी बोली बोलते हैं। इन दोनों जनजातियों की आबादी मिलाकर भी 50 हजार से अधिक नहीं है। इन जनजातियों की पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच आज भी धुरवी और माड़ी ही संवाद का जरिया है पर नई पीढ़ी में इन बोलियों का प्रचलन धीरे-धीरे घट रहा है।

राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैं। राजस्थान के पश्चिम में मारवाड़ी के साथ मेवाड़ी, बांगडी, ढारकी, बीकानेरी, शेखावटी, खेराड़ी, मोहवाडी और देवडावाटी; उत्तर-पूर्व में अहीरवाटी और मेवाती; मध्यदृपूर्व में ढूंढाड़ी और उसकी उप बोलियां - तोरावटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किसनगढ़ी, नागर चौल और हाडौती; दक्षिणदृपूर्व में रांगडी व सौंधवाड़ी (मालवी); और दक्षिण में निमाड़ी बोली जाती हैं।. घुमंतू जातियों की अपनी बोलियां हैं. जैसे गरोडिया लुहारों की बोली-गाडी। अब ये या तो दूसरी बोलियों के साथ मिल कर अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं या नई पीढ़ी इनमें बात ही नहीं करती। मध्यप्रदेश की 12 आदिवासी बोलियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। इनमें ज्यादातर आदिवासी बोलियां हैं- भीली, भिलाली, बारेली, पटेलिया, कोरकू, मवासी निहाली, बैगानी, भटियारी, सहरिया, कोलिहारी, गौंडी और ओझियानी जैसी जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैं, लेकिन अब ये बीते दिनों की कहानी बनने की कगार पर हैं।

उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र 12 हजार लोग बोलते हैं. पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसी, उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं. दारमा को 1761, ब्यांसी को 1734, जाड को 2000 और जौनसारी को 1,14,733 लोग ही बोलते-समझते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि चूंकि ये बोलियां ना तो रोजगार की भाशा बन पाईं और ना ही अगली पीढ़ी में इनमें बात करने वले बच रहे हैं, सो इनका मूल स्वरूप शनेः - श नेः समाप्त हो रहा है। याद करना होगा कि अंडमान निकोबार और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में बीते चार दशक में कई जनजातियां लुप्त हो गईं और उनके साथ उनकी आदिम बोलियां भी अतीत के गर्त में समा गईं। 

प्रत्येक बोली-भाषा  समुदाय की अपनी ज्ञान-श्रंखला है। एक बोली के विलुप्त होने के साथ ही उनका कृषि  आयुर्वेद, पशु -स्वास्थ्य, मौसम, खेती आदि का सदियों नहीं हजारों साल पुराना ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। यह दुखद है कि हमारी सरकारी योजनाएं इन बोली-भाषाओँ  की परंपराओं और उन्हें आदि-रूप में संरक्षित करने के बनिस्पत उनका आधुनिकीकरण करने पर ज्यादा जोर देती है। हम अपना ज्ञान तो उन्हें देना चाहते हैं लेकिन उनके ज्ञान को संरक्षित नहीं करना चाहते। यह हमें जानना होगा कि जब किसी आदिवासी से मिलें तो पहले उससे उसकी बोली-भाषा  का ज्ञान को सुनें फिर उसे अपना नया ज्ञान देने का प्रयास करें।  आज जरूरत बोलियों को उनके मूल स्वरूप में सहेजने की है। 



गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

If land is mother than mountains are father of humanity

 11 दिसंबर : अंतर्राष्ट्रीय  पर्वत दिवस 

खोदते-खोदते खो रहे हैं पहाड़

पंकज चतुर्वेदी




उप्र के महोबा जिले के जुझार गांव के लोग अपने तीन सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल का विशाल पहाड़ को बचाने के लिए एकजुट हैं। पहाड़ से ग्रेनाईट खोदने का ठेका गांव वालों के लिए आफत बन गया था। खनन के निर्धारित मानकों का अनुपालन न करते हुये नियमानुसार दो इंच ब्लास्टिंग के स्थान पर चार और छह इंच का छिद्रण कर विस्फोट कराने शुरु किये गये। इस ब्लास्टिंग से उछलकर गिरने वाले पत्थरों ने ग्रामीणों का जीना हराम कर दिया। लोगों के मकानों के खपरैल टूटने लगे और छतें दरकने लगी। पत्थरों के टूटने से उठने वाले धुन्ध के गुबार से पनपी सिल्कोसिस की बीमारी ने अब तक तीन लोगों की जान ले ली वहीं दर्जनों ग्रामीणों को अपनी चपेट में ले लिया। गांव के बच्चे अपंगता का शिकार हो रहे हैं। सरकार की निगाह केवल इससे होने वाली आय पर है जबकि समाज बता रहा है कि पहाड़ के साथ ही वहां की हरियाली, जल संसाधन, जीव-जंतु सभी कुछ खतम हो रहे है। वह दिन दूर नहीं जब वहां केवल रेगिस्तान होगा।


 

प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो कि बामुष्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं हाते, वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दषा और दिषा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकार पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजी भी समय-समय पर सामने आ रही है, कभी हिमाचल में तो कभी कष्मीर में तो कभी महाराश्ट्र या मध्यप्रदेष में अब धीरे धीरे यह बात सामने आ रही है कि पहाड़ खिसकने के पीछे असल कारण उस बेजान खडी संरचना के प्रति बेपरवाही ही था। पहाड़ के नाराज होने पर होने वाली त्रासदी का सबसे खौफनाक मंजर अभी एक साल पहले ही उत्तराख्ांड में केदारनाथ यात्रा के मार्ग पर देखा गया था। देष में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्ष है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराष-हताष से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।



हजारों-हजार साल में गांव-षहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होता था। पहले नदियों के किनारे सभ्यता आई, फिर ताला-तलैयों  के तट पर बस्तियां बसने लगीं। जरा गौर से किसी भी आंचलिक गांव को देखें, जहां नदी का तट नहीं है- कुछ पहाड़, पहाड़े के निचले हिस्से में झील व उसके घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा। बीते कुछ सालों से अपनी प्यास के लिए बदनामी झेल रहे बुंदेलखंड में सदियों से अल्प वर्शा का रिकार्ड रहा है, लेकिन वहां कभी पलायन नहीं हुआ, क्योंकि वहां के समाज ने पहाड़ के किनारे बारिष की हर बूंद को सहेजने तथा पहाड़ पर नमी को बचा कर रखने की तकनीक सीख लीथी। छतरपुर षहर बानगी है- अभी सौ साल पहले तक षहर के चारों सिरों पर पहाड़ थे, हरे-भरे पहाड़, खूब घने जंगल वाले पहाड़ जिन पर जड़ी बुटियां थी, पंक्षी थे, जानवर थे। जब कभी पानी बरसता तो पानी को अपने में समेटने का काम वहां की हरिली करती, फिर बचा पानी नीचे तालाबों में जुट जाता। भरी गरमी में भी वहां की षाम ठंडी होती और कम बारिष होने पर भी तालाब लबालब। बीते चार दषकों में तालाबों की जो दुर्गति हुई सो हुई, पहाड़ों पर हरियाली उजाड़ कर झोपड़-झुग्गी उगा दी गईं। नंगे पहाड़ पर पानी गिरता है तो सारी पहाडी काट देता है, अब वहां पक्की सडक डाली जा रही हैं। इधर हनुमान टौरिया जैसे पहाड़ को नीचे से काट-काट कर  दफ्तर, कालोनी सब कुछ बना दिए गए हैं। वहां जो जितना रूतबेदार है, उसने उतना ही हाड़ काट लिया।  वह दिन कभी भी आ सकता है कि वहां का कोई पहाड़ नीचे धंस गया और एक और मालिण बन गया।



खनिज के लिए, सड़क व पुल की जमीन के लिए या फिर निर्माण सामग्री के लिए, बस्ती के लिए, विस्तार के लिए , जब जमीन बची नहीं तो लोगों ने पहाड़ों को सबसे सस्ता, सुलभ व सहज जरिया मान लिया। उस पर किसी की दावेदारी भी नहीं थी।  अब गुजरात से देष की राजधानी को जोड़ने वाली 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला को ही लें, अदालतें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि पहाड़ों से छेड़छाड़ मत करो, लेकिन बिल्डर लॉबी सब पर भारी है। कभी सदानीरा कहलाने वो इस इलाके में पानी का संकट जानलेवा स्तर पर खड़ा हो गया है। सतपुडा, मेकल, पष्चिमी घाट, हिमालय, कोई भी पर्वतमालाएं लें, खनन ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। रेल मार्ग या हाई वे बनाने के लिए पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियर इस तथ्य को षातिरता से नजरअंदाज कर देते हैं कि पहाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थ व्यवस्था, आस्था, विष्वास का प्रतीक होते हैं। पारंपरिक समाज भले ही इतनी तकनीक ना जानता हो, लेकिन इंजीनियर तो जानते हैं कि धरती के दो भाग जब एक-दूसरे की तरफ बढ़ते हैं या सिकुडते हैं तो उनके बीच का हिस्सा संकुचित हो कर ऊपर की ओर उठ कर पहाड़ की षक्ल लेता है। जाहिर है कि इस तरह की संरचना से छोड़छाड़ के भूगर्भीय दुश्परिणाम  उस इलाके के कई-कई किलोमीटर दूर तक हो सकते हैं। पुणे जिले के मालिण गांव से कुछ ही दूरी पर एक बांध है, उसको बनाने में वहां की पहाड़ियों पर खूब बारूद उड़ाया गया था। मालिध्ण वहीं गांव है जो कि दो साल पहले बरसात में पहाड़ ढहने के कारण पूरी तरह नश्ट हो गया था। यह जांच का विशय है कि इलाके के पहाड़ों पर हुई तोड़-फोड़ का इस भूस्खलन से कहीं कुछ लेना-देना है या नहीं। किसी पहाड़ी की तोड़फोड़ से इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों का पानी पाताल में चले जाने की घटनाएं तो होती ही रहती हैं।



यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना।  विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बउ़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों ेक निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। यही नहीं जिन पहाड़ों पर  इमारती पत्थर या कीमती खनिज थे, उन्हें जम कर उजाड़ा गया और गहरी खाई, खुदाई से उपजी धूल को कोताही से छोड़ दिया गया। राजस्थान इस तरह से पहाड़ों के लापरवाह खनन की बड़ी कीमत चुका रहा है। यहां जमीन बंजर हुई, भूजल के स्त्रोत दूषित हुए व सूख गए, लोगों को बीमारियां लगीं व बारिश होने पर खईयों में भरे पानी में मवेशी व इंसान डूब कर मरे भी। 

आज हिमालय के पर्यावरण, ग्लेषियर्स के गलने आदि पर तो सरकार सक्रिय हो गई है, लेकिन देष में हर साल बढ़ते बाढ़ व सुखाड़ के क्षेत्रफल वाले इलाकों में पहाड़ों से छेड़छाड़ पर कहीं गंभीरता नहीं दिखती। पहाड़ नदियों के उदगम स्थल हैं। पहाड़ नदियों का मार्ग हैं, पहाड़ पर हरियाली ना होने से वहां की मिट्टी तेजी से कटती है और नीचे आ कर नदी-तालाब में गाद के तौर पर जमा हो कर उसे उथला बना देती है। पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्यौता होती है, पहाड़ अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इलाके के मवेषियें का चरागाह होते हैं। ये पहाड़ गांव-कस्बे की पहचान हुआ करते थे। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है इन मौन खड़े छोटे-बड़े पहाड़ों के लिए, लेकिन अब आपको भी कुछ कहना होगा इनके प्राकृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए। 


मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

No Native place for Bru tries

 अपने ही देश  में शरणार्थी हैं ब्रू आदिवासी 

                                                                             पंकज चतुर्वेदी 



इतिहास के मुताबिक तो उनका मूल घर मिजोरम में ही है। लेकिन मिजोरम के वाशिंदे  इन्हें म्यामार से आया विदेषी कहते हैं। वे बीते पच्चीस सालों से जिस राज्य में रह रहे हैं वहां के लोग भी उन्हें अपने यहां बसाना नहीं चाहते। पूर्वात्तर के त्रिपुरा में इन्हें स्थाई रूप से बसाने की बात हुई तो हिंसा भड़क गई । कोई 32 हजार आबादी वाला आदिवासी समुदाय अनुसूचित जन जाति  परिपत्र में तो ये पीवीटीजी अर्थात लुप्त हो रहे समुदाय के रूप में दर्ज है। लेकिन ब्रू नामक जनजाति के इन लोगों का अपना कोई घर या गांव नहीं हैं। शरणार्थी के रूप में रहते हुए उनकी मूल परंपराओं, पर्यावास,कला, संस्कृति आदि पर संकट मंडरा रहा है लेकिन इन्हें स्थाई रूप से त्रिपुरा में बसाने की बात होते ही स्थानीय लोग सड़कों पर उतर कर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। किवदंतियों के अनुसार त्रिपुरा के एक राजकुमार को राज्य से बाहर निकाल दिया गया था और वह अपने समर्थकों के साथ मिज़ोरम में जाकर बस गया था। वहाँ उसने एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। ब्रू खुद को उसी राकुमार का वंशज  मानते हैं। अब इस कहानी की सत्यता के भले ही कोई प्रमाण ना हों लेकिन इसके चलते ये हजारों लोग घर विहीन हैं। इनके पास ना तो कोई  स्थाई निवास का प्रमाण है ना ही आधार कार्ड। मतदाता सूची के ले कर भी भ्रम हैं।  आंकड़े तो यही कहते हैं कि ब्रू या रियांग मिजोरम की सबसे कम जनसंख्या वाली जनजाति है।

मिजोरम के मामित, कोलासिब और लुंगलेई जिलों में ही इनकी आबादी थी। इन्हें रियांग भी कहा जाता है। सन 1996 में ब्रू और बहुसंख्यक मिजो समुदाय के बीच सांप्रदायिक दंगा हो गया। हिंसक झड़प के बाद 1997 में हजारों लोग भाग कर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा के कंचनपुरा ब्लाक के डोबुरी गांव में शरण ली थी। शिविरों में पहुंच गए थे। मूल रूप से मिजोरम के आदिवासी हैं। 1996 में हुई हिंसा के बाद इन्होंने त्रिपुरा के लिया था। दो दशक से ज्यादा समय से यहां रहने और अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बाद इन्हें यहीं बसाने पर समझौता हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और रियांग लोगों के बीच इसी साल जनवरी-2020 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब और मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथांगा की मौजूदगी में दिल्ली में एक समझौता हुआ था। इसके लिए केंद्र सरकार ने 600 करोड़ रुपए का पुनर्वास योजना पैकेज जारी करने का ऐलान भी  किया । हालांकि इससे पहले 2018 में भी केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव और मिजोरम के तात्कालीन मुख्यमंत्री ललथनहवला के बीच भी ऐसा समझौता हुआ था, पर अमल नहीं हुआ।

इस बार समझौते के तहत जैसे ही स्थाई बसावट पर काम शुरू  हुआ, त्रिपुरा में हिंसा फैल गई। विरोध करने वालों का कहना है कि पहले महज डेढ़ हजार रियांग परिवारों को ही बसाने की बात की गई थी लेकिन अब छह हजार परिवारों को बसाने की योजना बनाई जा रही है जिससे  माहौल और आबादी का संतुलन बिगड़ेगा। जबकि प्रशासन का कहना है शरणार्थियों के लिए 15 अलग-अलग जगह चिन्हित किए गए हैं।

चूंकि ब्रू लोग शरणार्थीं हैं अतः उनमें से कई के नाम मिजोरम की मतदाता सूची में जुड़े हैं। इसके विरोध में मिजो संगठन आंदोलन करते रहते हैं व बू्र लोगों को किसी भी चुनाव में वोट नहीं डालने देते। ब्रू लोगों को अपने यहां से भगाने के लिए अक्तूबर 2019 में त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में उनके खाने-पीने की सप्लाई रोक दी गई थी। इससे कई लोग मारे भी गए जिनमें चार बच्चे थे व मौत का कारण कुपोशण बताया गया था। कुछ लोग वापिस गए भी लेकिन ज्यादातर लोगों ने हिंसा के डर से वापस जाने से इनकार कर दिया था।

वैसे तो ब्रू लोग झूम खेती के माध्यम से जीवकोपार्जन करते रहे हैं। उनकी महिलाएं बुनाई में कुशल होती थीं। शरणार्थी शिविर  में आने के बाद उनके पारंपरिक कौशल लुप्त हो गए। वे केंद्र सरकार से प्राप्त राहत सामग्री एक वयस्क के लिए प्रतिदिन 5 रुपए व 600 ग्राम चावल तथा किसी अल्पवयस्क को 2.5 रुपए व 300 ग्राम चावल पर निर्भर है। इसके अलावा उन्हें दैनिक उपभोग का सामान भी मिलता है , जिसका बड़ा हिस्सा बेच कर वे कपड़ा, दवा आदि की जरूरतें पूरा करते हैं। घर, बिजली, स्वच्छ पानी, अस्पताल तथा बच्चों के लिये स्कूल जैसी कई बुनियादी सुविधाओं से वे वंचित है।

ब्रू लोगों ने नईसिंगपरा, आशापरा और हेजाचेरा के तीन मौजूदा राहत शिविरों को पुनर्वास गांवों में तब्दील करने की मांग की है। इसके साथ ही जाम्पुई पहाड़ियों पर बैथलिंगचिप की चोटी के पास फूल्डुंगसेई गांव सहित पांच वैकल्पिक स्थानों पर विचार करने का भी आग्रह किया है। इस पर स्थानीय आदिवासी आषंकित हैं कि इससे उनके लिए खेती व पषु चराने का स्थान कम हो जाएगा।  अभी 22 नवंबर को ब्रू लोगां के स्थाई निवासी बनाने के विरोध में हुआ प्रदर्षन हिंसक हो गया था और पुलिस की गोलीबारी में दो लोग मारे गए थे व बीस घायल हुए थे। 

यदि आंकड़ों में देखें तो पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या घनत्व इतना अधिक है नहीं, मीलों तक इक्का-दुक्का कबीले बसे हैं, लेकिन एक आदिवासी समुदाय के लिए बेहतर जीवन के लिए जमीन नहीं मिल रही है। हालांकि इस बार  सरकार के पुनर्वास प्रयासों पर षेक नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कटु सत्य है कि अपने संसाधन-धरती- अधिकांरों का बंटवारा स्थानीय समाज को कबूल नहीं है। कुछ राजनीतिक दल भी इस आग को हवा दिए हैं और अब स्थाई निवास से ज्यादा षांति और सामंजस्य की जरूरत अधिक है। 


रविवार, 6 दिसंबर 2020

Hindon- yamuna confluence : smell, dirty and no approach road

 हिंडन-यमुना : एक उपेक्षित , नीरस संगम

पंकज चतुर्वेदी

 




दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पंक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। आसमान को छूती अट्टालिकाओं को अपनी गोद में समाए नोएडा के सेक्टर-150, ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद, दूर एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर के बाद दुपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं हे, जाहिर है कि सालों से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। एक महीने पहले आई बरसात के कारण बना दल-दल और फिर बामुश्किल एक फुट की रिपटन से नीचे जाने पर सफेद पड़ चुकी , कटी-फटी धरती। सीधे हाथ से शांत यमुना का प्रवाह और बाईं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवर उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखे देख सकती हैं,गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रेकती दिखती है यमुना। यह दुखद, चिंतनीय और विकास के प्रतिफल की वीभत्स दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य , शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम, इतना नीरस, उदास करने वाला और उपेक्षित। 






कहते हैं कि शहर और उसमें भी ऊंची-ऊची इमारतों में आमतौर पर शिक्षित, जागरूक लेग रहते हैं। लेकिन गाजियाबाद और नोएडा में पाठ्य ुपस्तकों में दशकों से छपे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिसमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के ंसगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हरनंदी या हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेडा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है।  छिजारसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपावली के बाद छट पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनें बाद फिर यह नाला बन जाती है, पूरा गांव यहीं शौच जाता है, जिनके घर नाली या शौचालय है , उसका निस्तार भी इसी में है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई भी जीव , मछली नहीं है।ं इसकी आक्सीजन की मात्रा शून्य है और अब इसका प्रवाह इसके किनारों के लिए भी संकट बन गया हे। 

हिंडन सहारनपुर, बागपत, शामली मेरठ, मुजफ्फरनगर से होते हुए गाजियाबाद के रास्ते नोएडा तक जाती है। कई गांव ऐसे हैं जो हिंडन के प्रदूषित पानी का प्रकोप झेल रहे हैं। कुछ गांव की पहचान तो कैंसर गांव के तौर पर होने लगी है। कोई डेढ सौ गांवों के हर घर में कैंसर और त्वचा के रोगी मौजूद हैं। हिंडन का पुराना नाम हरनदी या हरनंदी है। इसका उद्गम सहारनपुर जिले में हिमालय क्षेत्र के ऊपरी षिवालिक पहाड़ियों में पुर का टंका गांव से है। यह बारिष पर आधारित नदी है और इसका जल विस्तार क्षेत्र सात हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। यह गंगा और यमुना के बीच के देआब क्षेत्र में मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और ग्रेटर नोएडा का 280 किलोमीटर का सफर करते हुए दिल्ली से कुछ दूर तिलवाडा में यमुना में समाहित हो जाती है। रास्ते में इसमें कृश्णा, धमोला, नागदेवी, चेचही और काली नदी मिलती हैं। ये छोटी नदिया भीं अपने साथ ढेर सारी गंदगी व रसायन ले कर आती हैं और हिंडन को और जहरीला बनाती हैं। कभी पष्चिमी उत्तर प्रदेष की जीवन रेखा कहलाने वाली हिंडन का पानी इंसान तो क्या जानवरों के लायक भी नहीं बचा है। इसमें आक्सीजन की मात्रा बेहद कम है। लगातार कारखानों का कचरा, षहरीय नाले, पूजन सामग्री और मुर्दों का अवषेश मिलने से मोहन नगर के पास इसमें आक्सीजन की मात्र महज दो तीन मिलीग्राम प्रति लीटर ही रह गई है। करहेडा व छजारसी में इस नदी में कोई जीव-जंतु षेश नहीं हैं, हैं तो केवल काईरोनास लार्वा। सनद रहे दस साल पहले तक इसमें कछुए, मेंढक, मछलियां खूब थे।  कुछ साल पहले आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने यहां तीन महीने षोध किया था और अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हिंडन का पानी इस हद तक विशैला होग या है कि अब इससे यहां का भूजल भी प्रभिवत हो रहा है।

इधर उ.प्र. प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि हिंडन में जहर घुलने का काम गाजियाबाद में कम होता है, यह तो यहा पहले से ही दूशित आती हे। बोर्ड का कहना है कि जनपद में 316 जल प्रदूशणकारी कारखाने हैं जिसमं से 216 एमएलडी गंदा पानी निकलता है, लेकिन सभी इकाईयों में ईटीपी लगा है। इन दावों की हकीकत तो करहेडा गांव में आ रहे नाले से ही मिल जाती है, असल में कारखानों में ईटीपी लगे हैं, लेकिन बिजली बचाने के लिए इन्हे यदा-कदा ही चलाया जाता है। हिंडन का दर्द अकेले इसमें गंदगी मिलना नहीं है, इसके अस्तित्व पर संकट का असल कारण तो इसके प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ रहा है। कभी पंटून पूल वाला रास्ता कहलाने वाले इलाके में करहेडा गांव के पास बड़ा पुल बनाया गया, ताकि नई बस रही कालोनी राजनगर एक्सटेंषन को ग्राहक मिल सकें।  इसके लिए कई हजार ट्रक मिट्टी-मलवा डाल कर नदी को संकरा किया गया और उसकी राह को मोड़ा गया। मामला नेषनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) में भी गया। एनजीटी ने एक पिलर बनाने के साथ-साथ कई निर्देष भी दिए। इस लडाई को लड़ने वाले धर्मेन्रद सिंह बताते हैं कि बिल्डर लॉबी इतनी ताकतवर है कि उसकी षह पर सरकारी महकमे भी दबे रहते हैं और एनजीटी के आदेषों को भी नहीं मानते हैं। 

यही नहीं बीते दस सालों में अकबरपुर-बहरामपुर, कनावनी गांव के आसपास नदी सूखी नहीं कि उसकी जमीन पर प्लाट काट कर बेचने वाले सक्रिय हो गए। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे लोग रसूखदार होते हैं। आज कोई 10 हजार अवैध निर्माण हिंडन के डूब क्षेत्र में सिर उठाए हैं और सभी अवैध हैं । स्थानीय प्रषासन ने इन अवैध निर्माणों को जल-बिजली कनेक्षन दे रखा है। एनजीटी ने इन निर्माणों को हटाने के आदेष दिए हैं तो लोग इसके विरूद्ध हाई कोट से स्टे ले आए। करहेडा में तो सरकारी बिजलीघर का निर्माण भी डूब क्षेत्र में कर दिया गया।  जिले का हज हाउस भी नदी के डूब क्षेत्र में ही खड़ा कर दिया गया। पर्यावरण के लिए काम कर रहे अधिवक्ता संजय कष्यप बताते हैं कि अभी कुछ साल पहले तक इसका जल प्रवाह देने सिरों पर चार-चार सौ मीटर था जो अब सिकुड कर कुल जमा दो सौ मीटर रह गया है। 

हिंडन को समेटने का काम कोई दो-पांच साल से नहीं हो रहा है। दिल्ली की बढ़ती आबादी को अपने यहां खपाने के लिए जैसे-जैसे गाजियाबाद का अनियोजित विकास होता गया, हिंडन तिल-दर-तिल मरती रही। पिछले दिनों हिंडन के किनारे बसे बसे मेरठ जिले के आलमगीरपुर व गाजियाबाद के सुठारी में हुई पुरातत्व खुदाई में हडप्पना काल के अवषेश मिले है। इतिहासविद संभावना व्यक्त करते हैं कि हडप्पा कालीन नगरों में जल की आपूर्ति इसी नदी से होती थी। लेकिन आज यह नदी एक बदबूदार नाला बन चुकी है। चार दरवाजों के बीच बसे पुराने गाजियाबाद को सबसे पहले कई दषक पहले जीडीए कार्यालय के सामने पुश्ता बना कर समेटा गया। फिर पटेल नगर, लोहिया नगर आदि के लिए षिब्बनपुरा पर पुल बनाया, उससे नदी का रहा-बचा स्वरूप् नश्ट हो गया। इसके बाद राश्ट्रीय राजमार्ग-58 और राजनगर एक्सटेंषन के पुल ने नदी का नामो निषान मिटा दिया। असल में आज हिंडन के नाम पर जो बह रहा है वह केवल कारखानों और नालों की दूशित पानी है। कुल मिला कर इसमें 80 गंदे नाले गिर रहे हैं। सबसे पहला नाला सहारनपुर में स्टार पेपर मिल का है। मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर औद्योगिक क्षेत्र का विषाल नाला इसकी सहायक नदी काली में गिरता है। गाजियाबाद में आठ बड़े नालों की गंदगी इसकी मौत का परवाना लिख देती है। लेनी ट्रोनिका सिटी औद्योगिक क्षेत्र का नाला गांव जावली होते हुए फर्रखनगर में गिरता है तो उससे कुछ सौ मीटर दूर ही करहेड़ा में मोहन नगर इंडस्ट्रियल एरिया की गंदगी इसमें मिल जाती है। ष्मसान घाट के पास गाजियाबाद षहर की 10 लाख से ज्यादा आबादी की पूरी गंदगी ले कर आने वाला नाला बगैर किसी परिषोधन के िंहंडन का अस्तित्व मिटाता है। इससे आगे इंदिरापुरम, विजयनगर, क्रासिंग रिपब्लिक आदि में नई बस्तियों की गंदगी सीधे इसमें मिलती है। कुल मिला कर यह अब गंदगी ढोने का मार्ग बन गई है। इसमें से इंदिरापुरम के नाले का ही पानी ऐसा है जो एक एसटीपी से हो कर आता है।, हालांकि उसकी क्षमता पर सवाल खड़े हैं। 


यह विडंबना भी है कि हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उपेक्षित रवैया रखता है। ये अधिकंश लेग बाहरी है व इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़ कर देख नहीं पा रहे हैं। मोमनाथल, जहां यह यमुना से मिलती है, और जहां इसे नदी कहा ही नहीं जा सकता, ग्रमीणों ने पंप से इसके जहर को अपने खेतों में छोड़ रखा है। अंदाज लगा लें कि इससे उपजने वाला धान और सब्जियों इसका सेवन करने वाले की सेहत के लिए कितना नुकसानदेह होगा। 

मई -2017 में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1969 करोड़ के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर एसटीपी प्लांट लगानें की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, लेकिन वहां से दो कदम दूर निकल कर ही इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, कई हजार करोड़ बर्बाद होते दिखेंगें। 

आज जरूरत इस बात की है कि हिंडन के किनारों पर आ कर बस गए लेग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात जिन दो महान नदियों का ंसगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग,संगम स्थल के दोनें ओर घने पेड़ जैसे तात्कालिक कार्य किए जाएं। हिंडन की मौत एक नदी या जल-धारा की नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का अवसान होगा। 



Ken Betwa Link can harm Bundelkhand

नदी जोड़ से बुंदेलखंड को घाटा, 



बीते तीन दशकों से कागजों पर चल रही बुंदेलखंड की केन व बेतवा नदी को जोड़ने की योजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी फिर से संदिग्धता के दायरे में आ गई है। यह बात साफ होती जा रही है कि 45,000 करोड़ रुपये खर्च कर बुंदेलखंड को पानीदार बनाने का जो सपना बेचा जा रहा है, उसमें पानी तो मिलेगा, पर इसकी कीमत बहुत कुछ देकर चुकानी होगी। 'नदियों का पानी समुद्र में न जाए, बारिश में लबालब होती नदियां गांवों-खेतों में घुसने के बजाय ऐसे स्थानों की ओर मोड़ दी जाए, जहां इसे बहाव मिले तथा जरूरत पर इसके पानी का इस्तेमाल किया जा सके', इस मूल भावना को लेकर नदियों को जोड़ने के पक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं। 



पर केन-बेतवा के मामले में तो 'नंगा नहाए निचोड़े क्या’ की लोकोक्ति सटीक बैठती है। केन और बेतवा, दोनों का उद्गम स्थल मध्य प्रदेश में है। दोनों नदियां लगभग समानांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेश में यमुना में मिल जाती हैं। जाहिर है कि जब केन के जल ग्रहण क्षेत्र में अल्प वर्षा या सूखे का प्रकोप होगा, तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी। वैसे भी केन का इलाका पानी के भयंकर संकट से जूझ रहा है। वर्ष 1990 में केंद्र की एनडीए सरकार ने नदियों के जोड़ के लिए एक अध्ययन शुरू करवाया था और इसके लिए केन-बेतवा को चुना गया। केन-बेतवा मिलन की सबसे बड़ी त्रासदी तो उत्तर प्रदेश झेलेगा, जहां राजघाट और माताटीला बांध पर खर्च अरबों रुपये व्यर्थ हो जाएंगे। यहां बन रही बिजली से भी हाथ धोना  पड़ेगा।

राजघाट परियोजना का काम जापान सरकार से प्राप्त कर्जे से अब भी चल रहा है। राजघाट से 953 लाख यूनिट बिजली भी मिल रही है। जनवरी, 2005 में केंद्र के जल संसाधन विभाग के सचिव की अध्यक्षता में संपन्न बैठक में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने कहा था कि केन में पानी की अधिकता नहीं है और इसका पानी बेतवा में मोड़ने से केन के जल क्षेत्र में भीषण जल संकट उत्पन्न हो जाएगा। ललितपुर के दक्षिण और झांसी जिले में बेहतरीन सिंचित खेतों का पानी इस परियोजना के कारण बंद होने की आशंका भी उस बैठक में जताई गई थी। 

केन-बेतवा को जोड़ना संवेदनशील मसला है। इस इलाके में सामान्य बारिश होती है और यहां की मिट्टी कमजोर है। यह परियोजना तैयार करते समय इस पर विचार ही नहीं किया गया कि बुंदेलखंड में जौ, दलहन, तिलहन, गेहू्ं जैसी फसलें होती हैं, जिन्हें सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती। जबकि इस योजना में सिंचाई की जो तस्वीर बताई गई है, वह धान जैसी अधिक सिंचाई वाली फसल के लिए कारगर है। इस परियोजना में पन्ना टाइगर रिजर्व पूरी तरह डूब जाएगा। पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय भी सवाल कर चुका है कि किस आधार पर इतने महत्वपूर्ण वन की भूमि को डूब में बदलने की अनुमति दी गई।


जलवायु परिवर्तन की वैश्विक त्रासदी में नदी जोड़ के बड़े बांध खलनायक की भूमिका निभाएंगे। इससे जंगल कटेंगे, विशाल जलाशय व नहरों के कारण नए दलदली क्षेत्र विकसित होंगे, जो मीथेन उत्सर्जन का जरिया होते हैं। यह परियोजना 1980 की है, जब जलवायु परिवर्तन या ग्रीनहाउस गैसों की चर्चा भी शुरू नहीं हुई थी। यदि इस योजना पर काम शुरू भी हुआ, तो एक दशक इसे पूरा होने में ही लगेगा तथा इस दौरान अनियमित जलवायु, नदियों के अपने रास्ता बदलने की त्रासदियां और गहरी होंगी।


ऐसे में जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना का मूल्यांकन करे। इतने बड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, पलायन और धन व्यय करने के बाद भी बुंदेलखंड के महज तीन से चार जिलों को मिलेगा क्या, इसका आकलन भी जरूरी है। इससे एक चौथाई से भी कम धन खर्च कर बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाब, बावड़ी, कुओं और जोहड़ों की मरम्मत की जा सकती है। अंग्रेजों के बनाए पांच बांध सौ साल में दम तोड़ गए हैं, आजादी के बाद बने तटबंध व स्टाप डैम पांच साल भी नहीं चले, पर बुंदेलखंड में एक हजार साल पुराने चंदेलकालीन तालाब रख-रखाव के अभाव के बावजूद लोगों के गले व खेत तर कर रहे हैं। बुंदेलखंड की किस्मत बदलने के लिए कम व्यय में छोटी परियोजनाएं ज्यादा कारगर होंगी।


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

Reducing water in yamuna :warning for summer

 



सावधान ! सूख रही है यमुना 

पंकज चतुर्वेदी





कहने को तो अभी सावन-भादौ विदा हुए दो महीने ही बीते हैं , हालांकि पुरूशोत्तम मास के कारण बरसात से ठंड की दूरी एक महीना बढ़ गई थी, लेकिन गोबर पटट्ी के गांवों की जीवन-रेखा यमुना मं अभी से जल स्तर डगमगा रहा है। जाड़े के जुम्मा-जुम्मा चार दिनों में ही दिल्ली की जनता नलों में पानी के जिलए तरस गई क्योंकि यमुना के पानी को साफ कर  घरों तक भेजने वाले संयत्रों में पानी के साथ इतनी अमोनिया आ गई कि उसकी स्फाई संभव नहीं थी। इस बार तो ना तो गणपति और ना ही देवी प्रतिमाएं नदी में विसर्जित की गई उसके बावजूद दीपावली के आसपास दिल्ली में यमुना क्षारीयता के आधिक्य से झागमय हो गई। दिल्ली प्रदूशण बोर्ड की ताजा रिर्ट में साफ जाहिर हो गया कि दिल्ली में प्रवेष करते ही पल्ला में पानी की गुणवत्ता माकूल थी लेकिन जैसे ही पानी सूरघाट आया व उससे आगे खजूरी पुल के पास नजफगढ नहर का मिलान हुआ, पानी जहर हो गया।  एकबारगी तो लगता है कि दिल्ली में घुसते ही दिल्ली का प्रकोप उसके दूशित करता है, लेकिन यदि आंकड़ों पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि संकट की असल वजह इससे भी गंभीर है- यमुना में उसके उद्गम से ही पानी कम आ रहा है और यह चेतावनी है कि आने वाले साल में मार्च से ही दिल्ली में जल संकट खड़ा हो सकता है। 



टिहरी गढ़वाल के यमुनोत्री हिमनद से चल कर इलाहबाद के संगम तक कोई 1376 किमी सफर तय करने वाली यमुना की गति पर दिल्ली की सांस टिकी होती है । पानी कम हुआ तो हड़कंप मचा और षुरू हो गया दिल्ली व हरियाणा के बीच तू-तू, मैं-मैं  । यदि सतही बयानबाजी को परे रखा जाए तो यमुना में पानी की कमी महज गरमी में पानी के टोटे तक सीमित नहीं है, हो सकता है कि भूगर्भ में ऐसे परिवर्तन हो रहे हों, जिसका खामियाजा यहां के करोड़ो बाषिंदों को जल्दी ही उठाना पड़े । यहां पर वाडिया इंस्टीट्ष्ूट आफ हिमालयन जियोलाजी के जल विज्ञानी डा. एस.के. बरतरिया का यह षोध गौरतलब है कि सन 1966 से आज तक यमुना-गंगा के उदगम पहाड़ों से जलप्रवाह में पचास फीसदी की कमी आई है। जाहिर है कि एक तरफ जहां पानी की मांग बढ़ रही है, उसके स्त्रोत सिकुड़ते जा रहे हैं। 

इस साल तो सितंबर में ही हरियाणा में यमुना का जल् स्तर बहुत कम हो गया। असल में हमारे पहाड़ जलवायु परिवर्तन की भयंकर मार झेल रहे हैं और बीती ठंड के मौसम में अक्तूबर से खूब बरफ गिरी और इस बार भी अक्तूबर से जमाव हो गया। इससे पहले मैदानी इलाकों में अगस्त से बरसात हुई नहीं। जाहिर है कि यमुना में जल प्रवाह का सारा दारोमदार यमुनोत्री के ग्लैषियर पिघलने पर रहा, जो बीते एक साल से ठीक से हुआ नहीं। 



भूवैज्ञानिक अविनाष खरे की माने तो पानी के अचानक गायब होने के पीछे अंधाघुंध भूजल दोहन का भी हाथ हो सकता है। श्री खरे  बताते हैं कि हरियाणा और दिल्ली के आसपास  गहरे ट्यबवेलों की  संख्या में खतरनाक सीमा तक वृद्धि हुई है । आमतौर पर कई ट्यूबवेल बारिष या अन्य बाहरी माध्यमों के सीपेज-वाटर पर काम करते हैं ।  जब जमीन के भीतर यह सीपेज वाटर कम होता है तो वहां निर्मित निर्वात करीब के किसी भी जल स्त्रोत के पानी को तेजी से खींच लेता है । चूंकि यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र में लाखों-लाख ट्यूबवेल रोपे गए हैं, संभव है कि इनमें से कुछ लाख के पानी का रिचार्ज अचानक यमुना से होने लगा है । यहां जानना जरूरी है कि यमुना यदि के इलाकों की भूगर्भ संरचना कठोर चट्टानों वाली नहीं है । यहां की मिट्टी सरंध्र्र है । नदी में प्रदूषण के उच्च स्तर के कारण इसमें कई फुट गहराई तक गाद भरी है , जोकि नदी के जलग्रहण क्षमता को तो कम कर ही रही है , साथ ही पानी के रिसाव के रास्ते भी बना रही है । इसका परिणाम यमुना के तटों पर दलदली भूमि के विस्तार के तौर पर देखा जा सकता है ।



यमुना के पानी के गायब होने का एक और भूगर्भीय कारण बेहद डरावना सच है । यह सभी जानते हैं कि पहाड़ों से दिल्ली तक यमुना के आने का रास्ता भूकंप प्रभावित संभावित इलाकों में अतिसंवेदनषील श्रेणी मे आता हैं । प्लेट टेक्टोनिज्म(विवर्तनीकी) के सिद्धांत के अनुसार भूगर्भ में स्थलमंडलीय प्लेटों में हलचल होने पर भूकंप आते हैं । भूकंप के झटकों के कई महीनों बाद तक धरती के भीतर 25 से 60 किलोमीटर नीचे हलचल मची रहती है । कई बार टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव के बाद कई दरारें बन जाती हैं । परिणामस्वरूप कई बार भूजल स्त्रोतों का स्तर बढ़ जाता है या कई बार पानी दरारों से हो कर तेजी से पाताल में चला जाता है । 

यमुना बेसिन में आबादी का दवाब भी गौरतलब है। आजादी के बाद से यमुना के तटों पर बसावट साढे तीन गुणा बढ़ी तो सिंचाई की मांग दुगुनी हुई, नदी के बेसिन में भूजल का देहन तिगुना हुआ तो इसकी सहायक नदिया-हिंडन, चंबल, सिंध, बेतवा , केन आदिं में रेत उत्खनन व प्रदूशण का स्तर बेईंतिहा। यही नहीं इस  काल में यमुना के तट पर जंगल सिकुड़े व छोटे जल- संकलन के माध्यम जैसे - कुएं, तालाब, झील, जोहड़ आदि लुप्त हुए नदी महज एक पानी बहने का जरिया नहीं होती, उसके आसपास की हरियाली, जीव-जंतु, नमी आदि उसके जीवन-चक्र के अभिन्न अंग होते हैं। इसके अलावा दिल्ली के 27 किलोमीटर में कई दषक के निस्तार, मलवा डालने से यमुना उथली हुई व उसकी जल ग्रहण क्षमता कम होती गई। दिल्ली की सीमा पार करते ही इसमें हिंडन जैसी दूषित नदी का जल मिल जाता है। आगरा में भी हालात अच्छे नहीं, जाहिर है कि इलाहबाद पहुंचते हुए यमुना में शुद्धजल की हर साल कमी हो रही है। 

बहरहाल , यमुना नदी के जल स्तर में अचानक गिराव आना एक गंभीर समस्या है । इसके सभी संभावित कारण - अंधाधुंध भूजल दोहन, पानी व जनसंख्या का दवाब या फिर प्रदूशित गाद ; सभी कुछ मानवजन्य ही है ।  इसके प्रति सरकार के साथ-साथ समाज का संवेदनषील होना ही दिल्ली के संभावित विस्फोटक हालात का एकमात्र बचाव है । दिल्ली में 48 किलोमीटर सफर करने के बाद यहां के पानी में इस महानगर की कितनी गंदगी जुड़ती है, इस पर तो इस षहर को ही सोचना होगा। यमुना के जल-ग्रहण क्षेत्र में हो रहे लगातार जायज-नाजायज निर्माण कार्य भी इसे उथली बना रहे हैं। ऐसे में पानी के लिए हरियाणा या अन्य किसी राज्य को दोशी बता कर दिल्ली केवल षुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपाने का काम कर रही है।




climate change is main cause of frequent cyclone

 जलवायु परिवर्तन  के कारण उभर रहे हैं समुद्री तूफान

पंकज चतुर्वेदी 



‘‘निवार’ की तबाही से अभी दक्षिणी राज्य उबरे नहीं हैं कि दक्षिणी तमिलनाडु व केरल पर फिर से  फिर से भारी बरसात और समुद्री तूफान की चेतावनी जारी कर दी गई है। यह इस साल का 124वां समुद्र बवंडर होगा। पिछले सप्ताह चक्रवाती तूफान निवार के कारण चैन्ने में हवाई अड्डा हो या रेलवे स्टेशन, सभी जगह पानी भर गया था। जब पुदुचेरी के तट पर तूफान टकराया तो 140 किलोमीटर  प्रति घंटा की गति से बही हवा ने पांच लोगों की जान ली, हजार से ज्यादा पेड़ उखड़ गए, कई करोड़ की संपत्ति नष्ट हो गई थी। अभी उस बिखराव को समेटने का भी काम पूरा नहीं हुआ कि एक और चेतावनी आई जिसमें श्रीलंका के त्रिंकोमाली के करीब कम दवाब से उत्पन्न तूफान ‘बुरेवी’ तटीय भारत में बरसात व आंधी का कारण बनेगा। यह चार दिसंबर तक भारतीय क्षेत्र से गुजरेगा। पूरे क्षेत्र में ‘ लाल’ चेतावनी जारी की गई है, आपदा प्रबंधन की पच्चीस टीम लगी हैं।  बुरेवी के कारण श्रीलंका में गत दो दिनों में 75 हजार लोग विस्थापित हुए हैं। 

 इस तूफना को ‘बुरेवी’ नाम मालदीव ने दिया है और यह अपेक्षाकृत कम ताकत वाला है। लेकिनयह एक महज प्राकृतिक आपदा नहीं है , असल में तेजी से बदल रहे दुनिया के प्राकृतिक मिजाज ने इस तरह के तूफानों की संख्या में इजाफा किया है । जैसे-जैसे समुद्र के जल का तापमान बढ़ेगा, उतने ही अधिक तूफान हमें झेलने होंगे । यह चेतावनी है कि इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को नियंत्रित नहीं किया तो साईक्लोंन या बवंडर के चलते भारत के सागर किनारे वालें शहरों में आम लोगों का जीना दूभर हो जाएगा ।

जलवायु परिवर्तन पर 2019 में जारी इंटर गवमेंट समूह (आईपीसीसी) की विशेष रिपोर्ट ओशन एंड क्रायोस्फीयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट के अनुसार,  सरी दुनिया के महासागर 1970 से ग्रीनहाउस गैस  उत्सर्जन से उत्पन्न 90 फीसदी अतिरिक्त गर्मी को अवशोषित कर चुके है। इसके कारण महासागर  गर्म हो रहे हैं और इसी से चक्रवात को जल्दी-जल्दी और खतरनाक चेहरा सामने आ रहा है।  निवार तूफान के पहले बंगाल की खाड़ी में जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र जल  सामान्य से अधिक गर्म हो गया था। उस समय समुद्र की सतह का तापमान औसत से लगभग 0.5-1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म था, कुछ क्षेत्रों में यह सामान्य से लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। जान लें समुद्र का 0.1 डिग्री तापमान बढ़ने का अर्थ है चक्रवात को अतिरिक्त ऊर्जा मिलना। हवा की विशाल मात्रा के तेजी से गोल-गोल घूमने पर उत्पन्न तूफान उष्णकटिबंधीय चक्रीय बवंडर कहलाता है। पृथ्वी भौगोलिक रूप से दो गोलार्धां में विभाजित है। ठंडे या बर्फ वाले उत्तरी गोलार्द्ध में उत्पन्न इस तरह के तूफानों को हरिकेन या टाइफून कहते हैं । इनमें हवा का घूर्णन घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में एक वृत्ताकार रूप में होता है। जब बहुत तेज हवाओं वाले उग्र आंधी तूफान अपने साथ मूसलाधार वर्षा लाते हैं तो उन्हें हरिकेन कहते हैं। जबकि भारत के हिस्से  दक्षिणी अर्द्धगोलार्ध में इन्हें चक्रवात या साइक्लोन कहा जाता है। इस तरफ हवा का घुमाव घड़ी की सुइयों की दिशा में वृत्ताकार होता हैं। किसी भी उष्णकटिबंधीय अंधड़ को चक्रवाती तूफान की श्रेणी में तब गिना जाने लगता है जब उसकी गति कम से कम 74 मील प्रति घंटे हो जाती है। ये बवंडर कई परमाणु बमों के बराबर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता वाले होते है।

धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवती तूफानों का उठना। भूमध्य रेखा के नजदीकी जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां इस तरह के चक्रवातों के उभरने  की संभावना होती है। तेज धूप में जब समुद्र के उपर की हवा गर्म होती है तो वह तेजी से ऊपर की ओर उठती है। बहुत तेज गति से हवा के उठने से नीचे कम दवाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है। कम दवाब के क्षेत्र के कारण वहाँ एक शून्य या खालीपन पैदा हो जाता है। इस खालीपन को भरने के लिए आसपास की ठंडी हवा तेजी से झपटती है । चूंकि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर एक लट्टू की तरह गोल घूम रही है सो हवा का रुख पहले तो अंदर की ओर ही मुड़ जाता है और फिर हवा तेजी से खुद घूर्णन करती हुई तेजी से ऊपर की ओर उठने लगती है। इस तरह हवा की गति तेज होने पर नीचे से उपर बहुत तेज गति में हवा भी घूमती हुई एक बड़ा घेरा बना लेती है। यह घेरा कई बार दो हजार किलोमीटर के दायरे तक विस्तार पा जाता है। सनद रहे भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की घूर्णन गति लगभग 1038 मील प्रति घंटा है जबकि ध्रुवों पर यह शून्य रहती है।

इस तरह के बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालीक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता हे। भीषण बरसात के कारण बन गए दलदली क्षेत्र, तेज आंधी से उजड़ गए प्राकृतिक वन और हरियाली, जानवरों का नैसर्गिक पर्यावास समूची प्रकृति के संतुलन को उजाड़ देता है। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे वे पलक झपकते नेस्तनाबूद हो जाते हैं। तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी मे खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुए क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। 

भारत उपमहाद्वीप में बार-बार और हर बार पहले से घातक तूफान आने का असल कारण इंसान द्वारा किये जा रहे प्रकृति के अंधाधुध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल के प्रारंभ में ही अमेरिका की अंतरिक्ष शोध संस्था नेशनल एयरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ‘नासा ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और खूंखार होते जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय महासागरों का तापमान बढ़ने से सदी के अंत में बारिश के साथ भयंकर बारिश और तूफान आने की दर बढ़ सकती है। यह बात नासा के एक अध्ययन में सामने आई है। अमेरिका में नासा के ‘‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’’ (जेपीएल) के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों की शुरुआत के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर अंतरिक्ष एजेंसी के वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर (एआईआरएस) उपकरणों द्वारा 15 सालों तक एकत्र आकंड़ों के आकलन से यह बात सामने आई। अध्ययन में पाया गया कि समुद्र की सतह का तापमान लगभग 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर गंभीर तूफान आते हैं। ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’(फरवरी 2019) में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं। ‘जेपीएल’ के हार्टमुट औमन के मुताबिक गर्म वातावरण में गंभीर तूफान बढ़ जाते हैं। भारी बारिश के साथ तूफान आमतौर पर साल के सबसे गर्म मौसम में ही आते हैं। लेकिन जसि तरह ठंड के दिनो ंमें भारत में ऐसे तूफान के हमले बढ़ रहे हैं, यह मारे लिए गंभीर चेतावनी है।


renewal energy can be solution of coal base electric crisis

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