तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

thrusty tikamgarh with Thousands Water body

jansatta ravivari 22-2-15
हजार तालाब की धरती से पानी के लिए पलायन
                              पंकज चतुर्वेदी

बुंदेलखंड की पारंपरिक संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं ‘तालाब’ । आम बुंदेली गांव की बसावट एक पहाड़, उससे सटे तालाब के इर्द-गिर्द हुआ करती थी । यहां के टीकमगढ़ जिले के तालाब नौंवी से 12वी सदी के बीच वहां के शासक रहे चंदेल राजाओं की तकनीकी सूझबूझ के अद्वितीय उदाहरण है । कालांतर में टीकमगढ़ जिले में 1100 से अधिक चंदेलकालीन तालाब हुआ करते थे । कुछ को समय की गर्त लील गई और कुछ आधुनिकीकरण की आंधी में ओझल हो गए । आज सरकारी रिकार्ड में यहां 995 ताल दर्ज थे । परंतु हकीकत में इनकी संख्या 400 के आसपास सिमट गई है । सरकारी रिकार्ड के मुताबिक 995 में से नौ वन विभाग, 88 सिंचाई, 211 पंचायतों, 36 राजस्व विभाग, 55 आम निस्तारी और 26 निजी काश्तकारों के कब्जे में है । इन 421 तालाबों के अतिरिक्त बकाया बचे 564 तालाब लावारिस हालत में तकरीबन चैरस मैदान बन गए हंै । 1907 के ओरछा स्टेट के गजट से जानकारी मिलती है कि उन दिनों जिले की कुल कृषि जोत 5.366 लाख एकड़ में से 1,48,500 एकड़ भूमि इन तालाबों से सींची जाती थी । 1947 में यह रकवा घटकर मात्र 19,299 एकड़ रह गया । ताजा आंकडे बताते हैं कि टीकमगढ़ जिले के 3,31,586 हेक्टर में खेती होती है । उसमें सिर्फ 811527 हेक्टर सिंचित है । जबकि तालाबों से महज 10.82 हजार हेक्टर ही सींचा जा रहा है । साफ जाहिर है कि साल दर साल यहां के तालाब और उनसे सिंचाई की परंपरा खत्म होती जा रही है ।
इस क्षेत्र की तीन चैथाई आबादी के जीविकोपार्जनका जरिया खेती-किसानी है । पानी और साधन होने के बावजूद उनके खेत सूखे रहते हैं । हर साल हजारों लोग रोजगार और पानी की तलाश में दिल्ली, पंजाब की तरफ पलायन करते हैं । दूसरी और तालाबों के क्षरण की बेलगाम रफ्तार बंुदेलखंड की यह बेशकीमती पारंपरिक धरोहर का अस्तित्व मिटाने पर तुली है ।
बुंदेलखंड में जलप्रबंध की कुछ कौतुहलपूर्ण बानगी टीकमगढ़ जिले के तालाबों से उजाकर होती है । एक हजार वर्ष पूर्व ना तो आज के समान मशीनें-उपकरण थे और ना ही भूगर्भ जलवायु, इंजीनियरिंग आदि के बड़े-बडे़ इंस्टीट्यूट । फिर भी एक हजार से अधिक गढे़ गए तालाबों में से हर एक को बनाने में यह ध्यान रखा गया कि पानी की एक-एक बूंद इसमें समा सके । इनमें कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) और कमांड (सिंचन क्षेत्र) का वो बेहतरीन अनुपात निर्धारित था कि आज के इंजीनियर भी उसे समझ नहीं पा रहे हैं । पठारी इलाके का गणित बूझ कर तब के तालाब शिल्पियों ने उसमें आपसी ‘फीडर चेनल’ की भी व्यवस्था कर रखी थी । यानि थोड़ा सा भी पानी तालाबों से बाहर आ कर नदियों में व्यर्थ जाने की संभावना नही रहती थी । इन तालाबों की विशेषता थी कि सामान्य बारिश का आधा भी पानी बरसे तो ये तालाब भर जाएंगे । इन तालाबों को बांधने के लिए बगैर सीमेंट या चूना लगाए, बड़े-बड़े पत्थरों को सीढ़ी की डिजाइन में एक के ऊपर एक जमाया था ।
यदि आजादी के बाद विभिन्न सिंचाई योजनाओं पर खर्च बजट व उससे हुई सिंचाई और हजार साल पुराने तालाबों को क्षमता की तुलना करें तो आधुनिक इंजीनियरिंेग पर लानत ही जाएगी । अंगे्रज शासक चकित थे, यहां के तालाबों की उत्तम व्यवस्था देख कर । उन दिनों कुंओं के अलावा सिर्फ तालाब ही पेयजल और सिंचाई के साधन हुआ करते थे । 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई । आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । आईए, टीकमगढ़ जिले के तालाबों के प्रति बरती जा रही कोताही पर सरसरी नजर डालें ।
टीकमगढ़ जिले में 49 तालाब 100 एकड़ से अधिक साइज के हैं । इनमें से 16 से लगभग ना के बराबर सिंचाई होती है । इंजीनियर बताते है कि मामूली मरम्मत के बाद इन तालाबों से 9777 हेक्टर खेतों को सींचा जा सकता है । जबकि आज मात्र 462 हेक्टर सिंचाई ही हो पाती है । जिले के नौ तालाब राजशाही काल से ही जंगल महकमे के अधीन हैं । जिनसे विकासखंड की आलपुरा पंचायत में आलपुरा ताल, मांचीगांव में माचीगढ़ तालाब, रायपुर गांव का तालाब ओर महेबा गांव का रानीताल, पलेरा विकासखंड में पलेरा कस्बे का सुरेन तालाब और झिझारिया ताल, रामनगर गांव का चरोताल बड़ागांव ब्लाक के नारायणपुर में सुकौरा ताल भी वन विभाग के कब्जे में है । इन सभी तालाबों तक अच्छा खासा पहुंज मार्ग भी है । वन विभाग के तालाबों की मरम्मत पर ढाई से तीन लाख रू. प्रति तालाब खर्च होने के बाद हजारों लोगों के लाभान्वित होने की बात, सिंचाई विभाग के अफसर स्वीकारते हैं ।
जिले के दस तालाबों पर कृषि विभाग का हक है । लेकिन इनसे भी कोई सिंचाइ्र ही नहीं होती है । पलेरा ब्लाक के गांव टपरियन में चोर रांगना ताल, निवारी गांव के दो तालाब इनमें से है । बलदेवगढ़ विकासखंड में पटौरी, बालमऊ और जुहर्रा गांव के तालाब भी बेकार पडे़ सिकुड़ते जा रहे हैं । जतारा ब्लाक में बाजीतपुरा गांव का तालाब और गौरगांव में गांव अबेरा का जटेरा ताल, निवाड़ी ब्लाक में लथेसरा का विशाल तालाब पक्की सड़कों के किनारे होने के बावजूद अनुपयोगी पड़े हुए हैं । जनपद पंचायतों के अधीन तालाबों से भी मौजूद क्षमता की एक चैथाई भी सिंचाई नहीं होती है । टीकमगढ़ जनपद के माड़वार गांव के गिरोरा ताल से 45 एकड़, महाराजपुरा तालाब से 40 एकड़, मजना ताल से 30 एकड़, बम्हेरीनकीबन ताल से 20 एकड़ और पुरनैया (रामनगर) तालाब से सिर्फ 20 एकड़ खेत ही सींचे जाते हैं । बलदेवगढ़ जनपद के अधिकार में 14 तालाब हैं । जिनमें तुहर्रा ताल से 50 एकड़ वेसा ताल से 35 एकड़, सुजानपुरा से 75 एकड़ जटेरा ताल से 70 एकड़, तालमऊ से 60 एकड,़ गुखरई से 60 एकड,़ बृषभानपुर से 70 एकड़, हटा ताल से 50 एकड़ सूरजपुर से 30 एकड़, हीरापुरा से 65 एकड़ बवर तालाब 40 एकड़ रामसगरा से 45 एकड़, गैसी ताल धरंगवां 35 एकड़ और गुना तालाब से 55 एकड़ खेतों कोे पानी मिलता है ।
जनपद पंचायत जतारा के पास 33 तालाब हैं, लेकिन इनमें से मात्र पांच से कोई डेढ़ सौ एकड़ में सिंचाई होती है । ये हैं जतारा का मीठा तालाब, गौरताल, बनगांय का टौरिया तालाब, जस्बा का रघुनाथ तालाब और भरगुवां तालाब । शेष 28 तालाब गाद भरे गड्ढों के रूप में वातावरण को दूषित कर रहे हैं । इनका कुल क्षेत्रफल 200 एकड़ से अधिक है । निवाड़ी जनपद के अधीन सभी 14 तालाबों से थोड़ी सी ही सिंचाई होती है । ये हंै लड़वारी 20 एकड़, कुलुवा 10 एकड़, नीमखेरा 20 एकड,़ अस्तारी एकड़ कुठार पुरैलिया लड़वारी 20 एकड़ सादिकपुरा 10 एकड़ सकूली के दो तालाब 20 एकड़ धुधनी 10 एकड़ लाडपुर 15 एकड़, पठारी का लेठसरा और पठारी ताल 10 एकड़ व 20 एकड़ महाराजपुरा 20 एकड़ और जनौली तालाब 10 एकड़ । इस विकासखंड के उमरी गांव के पास स्थित उमरी जलाशय के बांध का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त है । बांध में रिसन भी है । फुटैरा के विशाल तालाब का भराव क्षेत्र वन विभाग के अधीन है । गिदरानी गांव के तालाब का जलग्रहण क्षेत्र कोई पौन वर्ग मील है । इसका बांध टूटा है । इसके भराव क्षेत्र में लोग खेती करने लगे हैं । निवाड़ी-सेंदरी मार्ग पर तरीचर कला के तालाब का कैचमेंट एरिया एक वर्ग किलोमीटर अधिक हैै । पर वो पूरी तरह बेकार पड़ा है ।
जतारा ब्लाक के बरमा ताल से 10 साल पहले तक 15-20 एकड़ सिंचाई हो जाती थी । यदि इसमें मात्र 70 हजार रू. खर्च किया जाऐ तो 50 हेक्टर खेतों को आराम से पानी मिल सकता था । गा्रम पड़वार के पास जंगल में स्थित बमरा तालाब की नहर टूट चुकी है । यह गांव गौर के तहत है । अनुमान है कि मात्र 50 हजार रू. खर्च कर इससे 40 हेक्टर पर खेती की सिंचाई हो सकती है । मोहनगढ़-दिगौड़ा रोड पर बनगांय तालाब से भारी रिसन हो रही है । यहां जमीन धंसने की आंशका भी है ।
पृथवीपुर जनपद पंचायत का 18 तालाबों पर अधिकार है, जिनका मौजूदा सिंचाई रकबा शून्य है । इनमें से पाराखेरा गांव में चमरा ताल, मने बतलैया और छुरिया ताल, ककावनी का तालाब, मंडला गांव के अमछरूमाता व पुरैनिया तालाब काफी बड़े-बडे़ हैं । यहां के सकेरा गांव में दो विशाल ताल हैं जिनका जलग्रहण क्षेत्र एक वर्ग किलोमीटर है । इनके बांध और सलूस(स्थानीय भाषा में इसे ‘औना’ कहते हैं) पूरी तरह टूट गए हैं । अतः यहां पानी भर नही पाता है । बरूआ सागर रेलवे स्टेशन से पांच किलोमीटर दूर स्थित दुलावनी ग्राम का कंधारी तालाब भी लगभग बिखर गया है । इससे 50 हेक्टर में सिचंाई हुआ करती थी । विकासखंड पलेरा के तहत 18 तालाब है । इनमें से 13 तालाबों से कुल मिलाकर 50 एकड़ से भी कम सिंचाई होती है । जबकि कुडवाला तालाब से 130 बन्ने पुरवा के गजाधर ताल से 120 एकड़ और सुम्मेरा तालाब से 110 एकड़ खेतों को पानी मिलता है । जंगपाली गांव के मझगुवंा ताल से 120 एकड़ और महेन्द्र कहेबा के लिधौरा तालाब से 100 एकड़ सिंचाई के आंकड़े दर्ज हैं । पलेरा ब्लाक के हिरनी सागरताल का जलग्रहण क्षेत्र एक वर्ग किमी है । इस 450 मीटर लंबा और 4.30 मीटर ऊंचा बांध है । जो पूरी तरह से फूट चुका है । गा्रम मुर्राहा बाब के करीब गजाधर ताल का जलग्रहण क्षमता 8.7 वर्ग किमी है । इस पर 330 मीटर लंबा और छह मीटर ऊंचा बांध है । इसकी मरम्मत न होने से इसका लाभ लोागों को नहीं मिल पा रहा है । जतारा पलेरा रोड पर कुडयाला के पास गुरेरा तालाब की एक वर्ग किमी जलग्रहण की क्षमता है । इसका 120 मीटर लंबा व साढे़ छह मीटर ऊंचाई का बांध पूरी तरह नष्ट हो चुका है । लिधौरा ताल का जलग्रहण क्षेत्र 1.90 वर्ग मीटर है । इसकी भी दुर्गति है ।
पृथवीपुर तहसील का नदरवारा तालाब से इस इलाके के चुनावों का अहम मुद्दा बन गया है । इस तालाब से सटाकर गौरा पत्थर नामक कीमती खनिज का भंडार है । इसके अंधाधुंध खनन से तालाब का किसी भी दिन टूट जाना तय है । इस तालाब की जलग्रहण क्षमता 945.36 लाख वर्गफुट है । इससे 4495 एकड़ खेतों की सिंचाई होती है । इसके चारों ओर  केसरगंज (जनसंख्या 700) बदर खरबम्हेरी (500) खाखरोन (1600) ककावनी (4500) लुहरगवां (5000) हथेरी (4642) केशवगढ़ (5600) भगौरा (5800) गांव बसे हुए हैं । इस तालाब से सट कर हर रोज करीब 100 से 150 डायनामाइट विस्फोट होते हैं । जिससे पूरे ताल की संरचना जर्जर हो गई है । विदित हो यहां से खनिज खनन का ठेका ऐसे रुतबेदार के पास है जो हर राजनैतिक दल को चुनावों में चंदा देता है । पिछले सालों जनता के आंदोलन करने पर जिला प्रशासन ने जब वहां खनन पर रोक लगाई तो ठेकेदार हाईकोर्ट से स्टे ले आए और आज भी खनन जोरो पर है । जिस रोज यह तालाब फूटेगा उस दिन आस-पास बसे एक दर्जन गांव, हजारों एकड़ फसल का जडमूल से चैपट हो जाना तय है ।
जिले के 13 तालाब पंचायत और समाज कल्याण विभाग के आधीन है । इनमें से भिडोरा, शिवपुरा, जगतनग, मांची, बरया (तालाब) (वर्माताल) कोडिया तालाब से बिल्कुल सिंचाई नही होती है । शेष तालाबों की क्षमता कुल मिलाकर 40 एकड़ से भी कम है । एक मजेदार बात और कि जिले के गांवों में कोई देा दर्जने तालाब ऐसे भी हैं, जिनका रिकार्ड सरकरी बही में दर्ज ही नहीं हैं । हालांकि हर साल विभिन्न विभाग इन तालाबों की मरम्मत गहरीकरण और सफाई के नाम पर भारी धन खर्च करते रहे है । लेकिन तालाबों की दिनों-दिन होती जर्जर स्थिति और इलाके के बांशिदे बताते हैं कि यह धन सिर्फ कागजों पर ही व्यय होता रहा है । निवाड़ी तिगैला मुख्य राजकीय मार्ग के कृषकों ने बताया कि पंद्रह साल पहले सरकारी अफसर उन्हें घेर कर तालाब की सफाई के लिए ले गए थे । उन्हें इस काम का कोई पैसा ही नहीं दिया गया । कहा गया था कि यह सब उन्ही किसानों के लिए हो रहा है, लेकिन जब किसानों ने इस तालाब का पानी सिंचाई के लिए मांगा तो उनसे 50 रू. प्रति एकड़ से किराया वसूला गया । उधर विकासखंड कार्यालय के रिकार्ड में तालाब सफाई की मजदूरी भुगतान के बाकायदा बिल वाउचर लगे हैं ।
दो दषक पहले कन्नपुर तालाब के नवीनीकरण व वेस्टवियर निर्माण पर दो लाख 99 हजार रू. खर्च किए गये थे । निर्भयसागर तालाब के गहरीकरण पर तीन लाख खर्चा दिखाया गया है । पूरे ताल की फीडर केनाल निर्माण पर 4.79 लाख, फुटेरा तालाब के गहरीकरण पर 1.72 का खर्चा दिखाया गया । इस प्रकार 21 तालाबों की मरम्मत पर 21 लाख 27 हजार रू. फूंके गए । परंतु वहां गहरीकरण के नाम पर कुछ हुआ नही । जिन नहरों की मरम्मत की गई, वहां रिसन यथावत है ।
जिले के जल संसाधान विभाग में सालाना लाखों का खर्च सिर्फ सर्वे पर होना दर्शाया जाता है । जिले के हर शहर, कस्बे, पुरवा गांवों में छितरे इन चंदेलकालीन जीवनदायी तालाबों के संरक्षण की दिशा में बीते 90 वर्षो के दौरान कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया । लगभग 80 तालाब तो मिट्टी धूल और नजदीकी पेडो़े की पत्तियां गिरने से पुर चुके हैं । इनमें से कुछ पर खेती हेो रही है और कही-कही सीमेंट, कंकीट के जंगल उगा दिए गए है ।
जिला मुख्यालय टीकमगढ़ शहर की कभी खूबसूरती का कारण रहे, आधा दर्जन तालाबों में से तीन तो अब चैरस मैदान में तबदील हो गए हैं । इन पर अब कालोनियां बन गई हैं । शेष तीन में शहर की गंदी नालियां गिर रही हैं । और अब वे विभिन्न संक्रामक रोग फैलाने वाले कीटाणुओं की उत्पादन स्थली बन कर रह गए हंै । 10 साल पहले म. प. शासन ने पांच जून ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर ‘सरोवर हमारी धरोहर’ नामक योजना की घोषणा की थी । इसके तहत शहर के महेन्दª सागर तालाब का सौंदर्यीकरण किया जाना था । पर अभी तक उस योजना पर क्रियान्वयन नहीं हो पाया है । हां, इसमें पानी भराव का क्षेत्र साल हर साल सिकुड़ता जा रहा है ।
जिले के एक अन्य कस्बे बलदेवगढ़ के तालाबों की मछलियां तो कलकत्ता के मछली बाजार में आवाज दे कर विशेष रूप से बिका करती थी । बलदेवगढ़ में विक्रम संवत 1185 से 1220 के बीच राज्य करने वाले चंदेली शासक मदनवर्मन ने वहां सात तालाब बनवाए थे ग्वालासागर, जुगल सागर, धर्म सागर, सौतेला, मुचया, गगनताल की विशालता वास्तव में सागर के सामन हुआ करती थी । पिछली सदी में इन तालाबों में ‘पंडरा’ नामक काई हो गई । जिससे पानी विषैला हो गया और कस्बे में पांडू, मलेरिया और हैजा का प्रकोप होने से बस्ती वीरान हो गई । तब ओरछा के अंतिम शासक बीरसिंह जू देव (द्वितीय) ने ‘धर्मसागर’ तालाब तुड़वा दिया था । उसके बाद बढ़ती आबादी ने इन्हीं तालाबों पर अपना कब्जा बढ़ाया । आज वहां सिर्फ तीन तालाब ग्वाल सागर, जुगल सागर ओर मुचया ताल रह गए हैं ।
टीकमगढ़ जिले में इतने तालाब होने के बावजूद जलसंकट रहता हैं, जब कही से पानी की मांग होती हैं, तो सरकार वहां जमीन खोद कर ट्यूब वेल लगा रही है । जबकि वर्षो पूर्व भूवैज्ञानिक चेतावनी दे चुके थे कि इस ग्रेनाइट स्ट्रक्चर वाले क्षेत्र में भूगर्भ उत्खनन सफल नही है । इसके बावजूद रोपे जा रहे ट्यूब वेल यहां 40 फीसदी की दर से असफल हो रहे हैं । तालाब मिटने से जिलेे के 46 हजार से अधिक कुंओं का जलस्तर भी बुरी तरह नीचे गिर रहा है । इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीटयूट फार द सेडिएरीडट्रापिक्स के विशेषज्ञ बोन एप्पन ओर सुब्बाराव का कहना है कि तालाबों से सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक और अधिक उत्पादक होता है । उनका सुझाव है कि पुराने तालाबों के संरक्षण और नए तालाब बनाने के लिए ‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’ का गठन किया जाना चाहिए । पूर्व कृषि आयुक्त बी. आर. भंबूला का मानना है कि जिन इलाकों में सालाना बारिश का औसत 750 से 1150 मिमि है, वहां नहरों की अपेक्षा तालाब से सिंचाई अधिक लाभप्रद होती है । टीकमगढ़ भी इसी प्रकार का क्षेत्र है ।
तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है । यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ठ पदार्थो के कारण ही उपजी है । जो उम्दा दर्जे की खाद है । किसानों को इस खाद रूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपने पर वे सहर्ष राजी हो जाएंगे । उल्लेखनीय है कि राजस्थान के झालावाड़ जिले में ‘‘खेतों मे पालिश करने’’ के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय रहा है । इससे एक तो उनके खेतों को उर्वरक मिलेगा साथ ही साथ उनकी सिंचाई सुविधा भी बढ़ेगी । जरूरत है तो सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और अपनी पंरपरा तालाबों के संरक्षण की दिली भावना की ।
14 फरवरी 94 को बुंदेलख्ंाड के दौरे के दौरान प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने चंदेलकालीन तालाबों के सरक्षण हेतु विशेष योजना की घोषणा, आम सभाओं में की थी, पर अभी तक उस योजना का कार्यरूप कही उजाकर नही हो पाया है । इसकी जगह दिसंबर-96 से ‘राजीव गांधी जलग्रहण मिशन’ के सफेद हाथी की सौगात जरूर मिली । अब राज्य की भाजपा सरकार जगह-जगह   ‘‘जलाभिशेक’’ का नारा दे रही है।
आंकडों़ की बाजीगरी में उस्ताद रहे इसके अफसर साढे़ तीन करोड़ का खर्चा कर 15 मिनी और 38 माईक्रो वाटर रोड़ बनाने की बात करते हैं । यह बात दीगर है कि जिले में हजार साल पुराने ‘वाटर शेडो़’ की जिंदा बनाए रखे के लिए एक छदाम भी नहीं खर्च किया गया । अन्ना हजारें के ‘रालेगांव प्रयोग’ की नकल पर जन भगीदारी से पानी पैदा करने की इस परियोजना में जनता तो क्या निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की भी भागीदारी नहीं रही । टीकमगढ़ जिला पिछले पांच सालों से  बीते सौ सालों का सर्वाधिक भीषण सूखा झेल रहा हैं यहां की 32 फीसदी पानी के लिए पलायन कर चुकी हैं । राजीव गांधी मिशन की हकीकत दिवंगत राजीव गांधी के उस बयान की तर रही है कि ग्राम विकास का 85 फीसदी पैसा पाईप लाईन में ही उड़ जाता हैं । टीकमगढ़ में कथित रूप  से विकसित दिए गए वाटर शेडों़ का स्वीकृत क्षेतफल 35 हजार 397 हेक्टर निर्धारित था , जबकि उपचारित क्षेत्रफल मात्र छह हजार, 170 हेक्टर रहा है । काश, वाटर शेड़ कार्यक्रम के तहत योजना स्थानीय स्तर पर तैयार की गई होती, यहां के पारंपरिक तालाबों को सहेजने के लिए स्थानीय लोगों को एकजुट दिया जाता ।
टीकमगढ़ मध्यप्रदेश के उन जिलों में शीर्ष पर है जहां की 25 प्रतिशत आबादी गरमी आने से पहले ही पानी के संकट के चलते गांव-घर छोड़ कर दिल्ली-पंजाब मजदूरी के लिए चली जाती है । यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी थे । मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा , कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  । शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है । गांव या शहर के रूतबेदार लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए बाकायदा तालाबों को सुखाते हैं, पहले इनके बांध फोड़े जाते हैं, फिर इनमें पानी की आवक के रास्तों को रोका जाता है - न भरेगा पानी, ना रह जाएगा तालाब । गांवों में तालाब से खाली हुई उपजाऊ जमीन लालच का कारण होती है तो शहरों में कालोनियां बनाने वाले भूमाफिया इसे सस्ता सौदा मानते हैं ।
एक तरफ प्यास से बेहाल हो कर अपने घर-गांव छोड़ते लोगों की हकीकत है तो दूसरी ओर पानी का अकूत भंडार ! यदि जिले के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो यहां के हर्र इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है । जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी ।
एक तो यहां के तालाबों का पूरा सर्वेक्षण हो फिर उनको जीवित करने के लिए कौन से उपाय व कितने खर्चे की जरूरत होगी, इसका सही-सही आकलन हो । अलग-अलग महकमों के अंतर्गत आने वाले तालाबों को किसी एक महकमे(यदि इसके लिए अलग से तालाब विकास प्राधिकरण हो तो बेहतर होगा) के अंर्तगत कर दिया जाए । एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए । यहां जानना जरूरी है कि अभी एक सदी पहले तक इन तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे । वे तालाब को साफ रखते, उसकी नहर, बांध, जल आवक को सहेजते - ऐवज में तालाब की मछली, सिंघाड़े और समाज से मिलने वाली दक्षिणा पर उनका हक होता । तालाब यहां की संस्कृति  सभ्यता का अभिन्न अंग हैं और इन्हें सरकारी बाबुओं के लाल बस्ते के बदौलत नहीं छोड़ा जा सकता ।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
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