तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

बुधवार, 5 अगस्त 2015

Karnataka on atomic warning

कर्णाटक पर मंडराता परमाणु खतरा 


पिछले दिनों कर्नाटक पुलिस ने आतंकवादियों के ऐसे गिरोह को पकड़ा है, जो राज्य के कैगा स्थित परमाणु सयंत्र में धमाके करना चाहते थे। वैसे तो यह बात आम लोगों को समझ आने लगी है कि परमाणु ऊर्जा से बिजली पाना एक महंगा सौदा है, लेकिन कर्नाटक राज्य में परमाणु परियोजनाओं के लिए इस साजिश का खुलासा एक खतरे की घंटी है। यह खतरा अब आम लोग समझने लगे हैं कि यदि परमाणु बिजली घर से हो रहा रिसाव समुद्र में मिल गया तो कई-कई हजार किलोमीटर दूर तक के देशों में रेडिएशन की त्रासदी होना तय है। विडंबना है कि हमारा देश इस खतरे के प्रति आंखें मूंदे हुए है और अकेले कर्नाटक में 16 परमाणु रिएक्टर लगा दिए गए हैं। ऐसा भी नहीं कि राज्य के बिजली घरों पर पहले खतरे नहीं आए हों। कुछ साल पहले कैगा के परमाणु रिएक्टर के कोई 50 कर्मचारी बीमार हुए थे और तब पता चला था कि रिएक्टर कर्मचारियों के पानी में रेडियोएक्टिव जहर मिलाया गया था। पहले तो आम नागरिक ही नहीं राजनेता भी गदगद थे कि केंद्र सरकार उनके राज्य के विकास के लिए कितना क्या कर रही है। बड़े-बड़े सयंत्र लग रहे हैं, जिनसे बिजली के साथ-साथ रोजगार भी मिलेगा। जापान त्रासदी के बाद जब नींद खुली तो बहुत देर हो चुकी थी। आज अपने दुखद भविष्य की संभावनाओं से सिहर उठते कर्नाटकवासियों का यह सवाल अनुत्तरित ही है कि परमाणु परियोजनाओं का जखीरा उनके यहां जमा करने के लिए आखिर सरकार इतनी मेहरबान क्यों है। कुछ साल पहले समुद्र के भीतर कई किलोमीटर गहराई में आए भूचाल ने दक्षिणी राज्यों में प्रलय ला दिया था। हालांकि कर्नाटक इस तबाही से बचा रहा, लेकिन सुनामी के कारण तमिलनाडु के कलपक्कम परमाणु बिजलीघर की सुरक्षा को लेकर जो सवाल खड़े हुए हैं, उनसे कर्नाटक भी अछूता नहीं है। यही नहीं कर्नाटक जिस तरह से आतंकवादियों के लगातार निशाने पर है, उससे यहां के परमाणु रिएक्टर यहां के बाशिंदों के लिए खतरे का आगाज ही हैं। हमारे देश के परमाणु ऊर्जा विभाग की मौजूदा कुल 55 परियोजनाओं में से 16 कर्नाटक में हैं। आने वाले दिनों में देश की परमाणु ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह इस राज्य पर होगी। हालात इतने दूभर होंगे कि दुर्भाग्यवश किसी एक परियोजना में कोई दुर्घटना हो गई या फिर बाहरी हमला हो गया तो समूचे दक्षिणी भारत का नामोनिशान मिट जाएगा। परमाणु उर्जा केंद्रों की स्थापना भले ही शांतिपूर्ण कायोंर् के लिए की गई हो पर वे हमारी सुरक्षा व्यवस्था के लिए तो खतरा होते ही हैं। इससे अधिक भयावह यह है कि समूचे राज्य में हवाई हमलों से बचने के लिए न तो सुरक्षित बंकर हैं और न ही परमाणु विस्फोट से आहतों की देखभाल के लिए विशेष अस्पताल। और फिर सुनामी ने खतरों की नई चुनौती खड़ी कर दी है।कैगा में परमाणु रिएक्टरों की संख्या छह हो गई है। प्रदेश के उत्तरी कन्नड़ा क्षेत्र में यूरेनियम का खनन होता है। इसकी पीले रंग की टिकिया बना कर परिष्करण के लिए हैदराबाद भेजा जाता है। वहां से प्राप्त धातु का इस्तेमाल कैगा में बिजली बनाने के लिए होता है। हालांकि सरकारी तौर पर कभी नहीं स्वीकारा जाता है कि हैदराबाद से आए परिष्कृत यूरेनियम को रतनहल्ली स्थित ‘अतिगोपनीय’ रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट में भी भेजा जाता है। बंगलुरु में एटोमिक रिसर्च लेबोरेट्री है और गौरीबिडनूर में भूकंप अनुसंधान केंद्र। कोलार स्वर्ण खान यानी केपीएफ की बेकार हो गई जमीन में परमाणु सयंत्रों से निकले कचरे को दफनाने के निर्णय ने तो इलाके में दहशत फैला दी है। परमाणु कचरे को कांचन तकनीक यानी विट्रीफीकेशन के जरिए कांच में मिलाया जाएगा फिर इसे तहखानों में गाड़ेंगे। बहरहाल वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को पूरी तरह निरापद बताते हैं, लेकिन सदियों तक सक्रिय रहने वाले रेडियो एक्टिव संक्रमण का खौफ तो बरकरार रहेगा ही। यह एक कड़वा सच है कि हमारे वैज्ञानिकों ने इस तरह परमाणु कचरे के निबटान के दूरगामी परिणामों पर ढंग से सोचा ही नहीं है।गोगी-गुलबर्गा, अराबाइलु-बिस्कोडउत्तरी कन्नड़ा और भरमसागर-चिकमंगलूर में यूरेनियम की खोज के लिए खुदाई चल रही है। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी यूसिल ने बलकुंज-दक्षिण कन्नड़ा, अदवी-धारवाड़ और देवगंधनहल्ली-चिकमंगलूर में कुछ स्थानों को यूरेनियम खनन के लिए चुना है। सनद रहे यूरेनियम खनन के गंभीर खतरों के मद्देनजर कनाडा, स्वीडन जैसे देशों ने अपनी जमीन पर ऐसे खनन पर पूर्णतया पाबंदी लगा रखी है। ये देश परमाणु ऊर्जा के इस ईंधन को पाने के लिए कांगों सरीखे तीसरी दुनिया के विपन्न देशों को आसरा बनाए हुए हैं। याद हो यूरेनियम की खुदाई का महज एक फीसदी ही इस्तेमाल होता है। शेष रह गए जानलेवा रेडियोधर्मी खनिज को हवा, पानी और प्रकृति के भरोसे लावारिस छोड़ दिया जाता है। भारत में अभी तक यूरेनियम खनन के दौरान सुरक्षा के उपायों पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है। कैगा के बिजलीघर के विकास के अगले चरण में तीन और रिएक्टर लगाए जा रहे हैं। समाज के हर तबके से इसके विरोध में आवाजें उठ रही हैं। प्रसिद्ध लेखक व पर्यावरणविद् डॉ. शिवराम कारंत ने कैगा में परमाणु सयंत्र लगाने के औचित्य पर याचिका अदालत में लगाई थी। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार कैगा भूकंप संभावित क्षेत्र में आता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक वैविध्य से भरपूर, सदाबहार समसीतोष्ण वर्षा जंगल के ठीक बीच में स्थित है। इन जंगलों में सुपारी और इलायची का खेती होती है, जो हजारों किसानों के जीवनयापन का जरिया है। यहां मध्यम और बड़ी कुल आठ पन बिजली परियोजनाएं हैं, जिनमें से कुछ तो ठीक जल उदगम स्थल पर हैं। करीब ही स्थित कालिंदी नदी पेय जल का स्रोत है। दुर्भाग्य यह है कि इतना सबकुछ महाराष्ट्र के लिए हो रहा है। यहां तक कि इसके निर्माण कार्य में कर्नाटक सरकार की कोई भूमिका नहीं है। हां, इन परियोजनाओं के लिए सड़क, पानी सरीखी आधारभूत सुविधाएं जुटाने की जिम्मेदारी जरूर प्रदेश शासन पर है। उदाहरण के लिए काली नदी पर बनाए गए कद्रा बांध को ही लें। इसका निर्माण महज इसलिए किया गया है कि कैगा परमाणु सयंत्रों के टावरों को ठंडा रखने के लिए आवश्यक पानी लगातार मिलता रहे। भगवान न करे यदि रिसाव या लीकेज हो गया तो मंगलौर से ले कर गोवा तक के अरब सागर तट पर रहने वाले लाखों लोगों का जीवन नरक हो जाएगा। गोपनीय और रहस्यमयी रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट, रतनहल्ली को ही लें। यह बात प्रशासन सदैव छिपाता रहा है कि कावेरी नदी पर बने केआरएस बांध की झील के जलग्रहण क्षेत्र पर स्थित इस कारखाने में बनता क्या है। लेकिन दबी जुबान चर्चा यही है कि यहां परमाणु बम का मूल मसाला बनता है। हो सकता है कि सामरिक महत्व के कारण इस सयंत्र का खुलासा करना संभव न हो। पर इस गोपनीयता की आड़ में लाखों लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करना कहां तक उचित है। यहां का रेडियो एक्टिव प्रदूषण हवा, पानी और मिट्टी के जरिए लोगों के शरीर को खोखला बना रहा है। संयंत्र में उपजे भारी ताप को शांत करने के लिए केआरएस बांध से ही पानी लिया जाता है और फिर उसे यहीं बहा भी दिया जाता है। जबकि यह बात सर्वविदित है कि संयंत्र की निकासी में यूरेनियम-235, 238 और 239 के लेथल आईसोटोप्स की बड़ी मात्रा होती है। इस बांध से मांडया और मैसूर में लाखों एकड़ खेत सींचे जाते हैं, बंगलुरु शहर को पेय जल का आपूर्ति भी होती है।कर्नाटक में यूरेनियम की उपलब्धता के अलावा और क्या कारण हैं कि इसे परमाणु सरीखे संवेदनशील मामले के लिए निरापद माना गया? सरकारी जवाब है कि यह प्रदेश भारत के पारंपरिक दुश्मन राष्ट्रों चीन और पाकिस्तान से पर्याप्त दूरी पर है। लेकिन कभी यह नहीं विचारा गया कि अंतरराष्ट्रीय समग्र परिदृश्य में पड़ोसी देशों के बनिस्पत अमेरिका भारत के लिए बड़ा खतरा है। भौगोलिक रूप से अमेरिका समुद्री तटों से लाखों किमी दूरी पर बेहद सुरक्षित है। लेकिन उसके दियागो-गार्सिया स्थित फौजी छावनी की कन्याकुमारी से दूरी मात्र 1500 किमी है। इस छावनी में कम से कम 35 एटमी मिसाइलें भारत के प्रमुख शहरों को निशाना बना कर तैनात हैं। जाहिर है कि इनमें से कई एक का निशाना कर्नाटक के परमाणु सयंत्र होंगे ही। गौरतलब है कि कोई भी पड़ोसी देश परमाणु हथियार का इस्तेमाल कर खुद भी उसके प्रकोप से बच नहीं सकता है। इस तरह के खतरे दूरस्थ दुश्मनों से ही अधिक हैं।कर्नाटकवासी मानते हैं कि उनका सीधा-साधा स्वभाव इस आफत का बड़ा कारण है। याद हो केरल की समुद्री रेत में मौजूद मोनाजाइट से ‘थोरियम’ के प्रसंस्करण की अच्छी संभावनाएं हैं। लेकिन वहां के जागरूक लोगों के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा है। आंध्र प्रदेश में नार्गाजुन बांध के समीप परमाणु संयंत्र लगाने की योजना 1980 में भारी विरोध के कारण निरस्त करनी पड़ी थी। भारत में परमाणु ऊर्जा के प्रारंभिक योजनाकार और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ. राजा रामन्ना मूल रूप से कर्नाटक के ही थे। इस राज्य में परमाणु ऊर्जा की इतनी अधिक योजनाओं का एक कारण यह भी माना जाता है।1986 में इंग्लैंड के एक सांसद टोनी बेन ने कहा था कि परमाणु ऊर्जा वह तकनीक है, जिस पर पूर्ण नियंत्रण रख पाना मानव समाज के बस की बात नहीं है। प्राकृतिक संपदाओं और नैसर्गिक खूबसूरती के बीच पारंपरिक जीवन जीने के आदी कर्नाटकवासियों को विकास के नाम पर मौत की सौगात देने वाले योजनाकारों को पिछले दिनों आए समुद्री कहर को दृष्टिगत रख कर्नाटक में इतनी सारी परमाणु परियोजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए।

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