तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

cow is not a political animal

महज नारों से नहीं बचेगा गौवंश 


गाय हमारी माता है, गाय को बचाना है, गाय देश की पहचान है आदि नारे समय-समय पर हवा में तिरते हैं, कुछ गोष्ठी, सेमिनार-जुलूस और उसके बाद फिर वही ढाक के तीन पात। सड़क पर ट्रकों में लदी गायों को पुलिस को पकड़वा कर, उन गाड़ियों में आग लगा कर व कुछ लोगों को पीट कर लोग मान लेते हैं कि उन्होंने बड़ा धर्म-रक्षा का काम कर दिया। ऐसी हरकतों में लिप्त कुछ चेहरे चुनावों में चमकते हैं और फिर सत्ता-सुख में भारत माता के साथ ही गौ माता को भी भूल जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि हमारे गांवों में खेती के रकबे कम हो रहे हैं, बैल पर आधारित खेती की जोत तेजी से घट रही है। यही नहीं, हमारी गाय का दूध दुनिया में सबसे कम है, इसके साथ ही गांवों के शहर की और दौड़ने या फिर शहरों के गांवों की ओर संकुचित होने के चलते ग्रामीण अंचलों में घर के आकार छोटे हो रहे हैं और ऐसे में गाय-बैल रखने की जगह निकालना कठिन होता जा रहा है। जब तक ऐसी व्यावहारिक बातों को सामने रख कर गौ-धन संरक्षण की बात नहीं होगी, तबतक बात नहीं बन सकती। गौवंश से पे्रम की हकीकत पूरे बुंदेलखंड में देखी जा सकती है, जहां साल के आठ महीने गाय सड़कों पर बैठी रहती हैं, जब उसके बच्चा देने व दूध के दिन आते हैं तो मालिक घर ले जाता है, वरना सभी हाईवे रात में गायों से पटे होते हैं व गाय वहां सड़क दुर्घटना का सबसे बड़ा कारक होती है। मानव सभ्यता के आरंभ से ही गौवंश इंसान के विकास पथ का सहयात्री रहा है। मोहन जोदड़ों व हड़प्पा से मिले अवशेष साक्षी हैं कि पांच हजार साल पहले भी हमारे यहां गाय-बैल
PRABHAT, MEERUT, 11-10-15
पूजनीय थे। आज भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल आधार गौवंश है। हालांकि भैंस के बढ़ते प्रचलन तथा कतिपय कारखाना मालिकों व पेट्रो उद्योग के दवाब में गांवों में अब टै्रक्टर व अन्य मशीनों का प्रयोग बढ़ा है, लेकिन यह बात अब धीरे-धीरेे समझ आने लगी है कि हल खींचने, पटेला फेरने, अनाज से दानों व भूसे को अलग करने फसल काटने, पानी खींचने और अनाज के परिवहन में छोटे किसानों के लिए बैल न केवल किफायती है, बल्कि धरती व पर्यावरण का संरक्षक भी है। आज भी अनुमान है कि बैल हर साल एक अरब 20 करोड़ घंटे हल चलाते हैं। गौ रक्षा के क्षेत्र में सक्रिय लोगों को यह बात जान लेनी चाहिए कि अब केवल धर्म, आस्था या देवी-देवता के नाम पर गाय को बचाने की बात करना न तो व्याहवारिक है और न तार्किक। जरूरी है कि लोगों को यह संदेश दिया कि गाय केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, पर्यावरण की भी संरक्षक है और इसीलिए इसे बचाना जरूरी है। बस्तर अंचल का एक जिला मुख्यालय है कोंडागांव। कहने को यह जिला मुख्यालय है, लेकिन आज भी निपट गांव ही है। कहने की जरूरत नहीं कि वहां नक्सलियों की अच्छी पकड़ है। यहां पर डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने जड़ी बूटियों के जंगल लगा रखे हैं। कोई 140 किस्म की जड़ी बूटियां यहां से दुनियाभर के कई देशों में जाती हैं। डॉ. त्रिपाठी के उत्पादों की खासियत है कि उसमें किसी भी किस्म का कोई भी रसायन नहीं होता है। उनके जंगलों में 300 से ज्यादा गायें हैं। आसपास के इलाकों में जब कोई कहता है कि उनकी गाय बीमार है, बेकार है या लावारिस छोड़ देता है तो डॉ. त्रिपाठी उसे अपने यहां ले आते हैं, उसका इलाज करते हैं व अन्य गाय-समूह के साथ जंगलों में छोड़ देते हैं। इन गायों के गोबर व मूत्र से ही वे जड़ी-बूटियों के झाड़ों की रक्षा करते हैं और इसीलिए वे गायों की रक्षा करते हैं। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि गायों के चलने से उनके खुरों से जमीन की एक किस्म की मालिश होती है, जो उसकी उर्वरा व प्रतिरोधी शक्ति को बढ़ावा देती है। कहने की जरूरत नहीं है कि डॉ. त्रिपाठी की गाय में श्रद्धा है, लेकिन उन्होंने इस श्रद्धा को अपने व्यवसाय से जोड़ा तथा दुनिया में देश का नाम भी रोशन किया।हरियाणा के रोहतक जिले के डीघल या पश्चिमी दिल्ली में कई स्थानों पर ऐसी कई गौशालाएं हैं, जहां बीमार-अशक्त गायों को आसरा दिया जाता है। वहां गायों के लिए पंखे लगे हैं, उन्हें अच्छी खुराक दी जाती है, लेकिन इन स्थानों पर गाय का दूध बेचना या उसे किसी उत्पाद का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होता है। एक बारगी भावनात्मक स्तर पर यह पावन लगता है, लेकिन एक तरह से यह संसाधनों का दुरुपयोग है। यदि गौशाला में रहने वाली तीन-चार सौ गायों के गोबर से केवल बायो गैस के माध्यम से ईंधन बचाया जाए या कुछ बिजली बचाई जाए तो यह अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय उदाहरण होगा और लोग इस कार्य के लिए प्रेरित होंगे। अब गौशाला चलाने के लिए पशु आहार के लिए भी भावनाओं से काम नहीं चलना चाहिए। गाय को क्या खिलाया जाए व कितना खिलाया जाए, इसके लिए उसको समझना भी जरूरी है। जहां तक संभव हो गाय को हरा व गूदेदार चारा देना चाहिए। हरे चारे के कारण उम्रदराज व अशक्त जानवर भी मजबूत हो जाते हैं। बारीक कटा हुआ चारा खिलाना कम खर्चीला होता है। इससे न केवल चारे को बचाया जा सकता है, वरन इससे पशु में काम करने की ताकत ज्यादा आती है, क्योंकि यह पचता सहजता से जाता है। गाय को बचाने की बात करने में जरा भी ईमानदारी हो तो सबसे पहले देश के लगभग सभी हाईवे पर बारिश के मौसम की रातों में जा कर देखना होगा कि आखिर हजारों-हजार गायें सड़क पर क्यों बैठी होती हैं। जरा ध्यान से देखें इस झुंड में एक भी भैंस नहीं मिलती। जाहिर है कि गाय को पालने का खर्च इतना है कि उसके दूध को बेच कर पशु-पालक की भरपाई होती नहीं है। भारत की गाय का दुग्ध उत्पादन दुनिया में सबसे कम है। डेनमार्क में दूध देने वाली प्रत्येक गाय का वार्षिक उत्पादन औसत 4101 लीटर है, स्विट्जरलैंड में 4156 लीटर, अमेरिका में 5386 और इंग्लैंड में 4773 लीटर है। वहीं भारत की गाय सालाना 500 लीटर से भी कम दूध देती है। उधर यदि बरेली के आईवीआरआई यानी इंडियन वेटेनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में जा कर देखें तो वहां केवल चार किस्म की भारतीय गौ नस्लों पर काम हो रहा है और वृंदावनी व थारपार जैसी किस्म की गायें एक दिन में 22 लीटर तक दूध देती हैं। हां, ये गायें कुछ महंगी जरूर हैं, सो इनका प्रचलन बहुत कम है। जाहिर है कि भारत में गाय पालना बेहद घाटे का सौदा है। तभी जब गाय दूध देती है तब तो पालक उसे घर रखता है और जब वह सूख जाती है तो सड़क पर छोड़ देता है। बारिश के दिनों में गाय को कहीं सूखी जगह बैठने को नहीं मिलती, वह मक्खियों व अन्य कीटों से तंग रहती है, सो हाईवे पर कुनबे सहित बैठी होती हैं। विडंबना है कि हर दिन इस तरह मुख्य सड़क पर बैठी या टहलती गायों की असामयिक मौत होती है और उनके चपेट में आ कर इंसान भी चोटिल होते हैं और इस तरह आवारा गाय आम लोगों की संवेदना भी खो देती है। कुछ गांवों में गौ पालन के सामुदायिक प्रयोग किए जा सकते हैं। इसमें पूरे गांव की गायों का एक साथ पालन, उससे मिलने वाले उत्पाद का एकसाथ विपणन और उससे होने वाली आय का सभी गौ पालकों में समान वितरण जैसे प्रयोग करने जरूरी हैं। विडंबना है कि देशभर के अधिकांश गावों में सार्वजनिक गौचर की भूमि अवैध कब्जों में है। सामुदायिक पशु पालन से ऐसी चरती की जमीनों की मुक्ति का रास्ता निकलेगा। ग्रामीण सड़क परिवहन में बैल का इस्तेमाल करने के कुछ कानून बनें, गाय की खुराक, उसको रखने के स्थान की साफ-सफाई आदि का मानकीकरण जरूरी हो। पशु चिकित्सक के पाठ्यक्रम में भारतीय नस्ल के गाय-बैल के रोगों पर विशेष सामग्री हो। भारवाहक या खेत में काम करने वाले बैल के भोजन, स्वास्थ्य और काम करने के घंटों पर स्पष्ट व कठोर मार्गदर्शन हों। ये कुछ छोटे-छोटे प्रयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामजिक ताने-बाने को मजबूत करेंगे ही, गाय का भी संरक्षण करेंगे।यदि वास्तव में गाय को बचाना है तो उसके धार्मिक पक्ष के बनिस्पत उसके व्यावसायिक पक्ष को ज्यादा उजागर करना होगा, साथ ही बूढ़ी या अशक्त हो गए ढोरों के लिए समाज व सरकार की मदद से अच्छे आश्रय स्थल बनाने की दीर्घकालीन योजना भी बनानी जरूरी हैं, ताकि गौपालक उनके बेकार होने के हालात में उसे कसाई के हाथों देने की जगह ऐसी गौशालाओं में उन्हें पहुंचाने पर विचार कर सकें। गाय को बचाने के लिए नारों या जुमलों की नहीं, सशक्त कदमों की जरूरत है।

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