तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

Overloaded courts and long lasting legal procedures

देर से मिला न्याय क्या बरखा जब कृषि सुखानी

दे श की सर्वोच्च अदालत में मुकदमों की संख्या कोई 55 हजार है, विभिन्न हाईकोर्ट में 45 लाख मुकदमे न्याय की बाट जोह रहे हैं। निचली अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या 2 करोड़ 45 लाख को पार कर गई है। यदि इसी गति से मुकदमों का निपटान होता रहा तो 320 साल चाहिए। इस बीच अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले भी खूब उछल रहे हैं। ऐसे में अदालतों के सामाजिक सरोकार पर विचार होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए आरएस लोढ़ा ने विचार जताया था कि मुकदमों के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए अदालतों को 365 दिन काम करना चाहिए। इससे पहले अदालतों को दो सत्रों में लगाने की बात भी हो चुकी है। हालांकि वकीलों का मानना है कि 365 दिन काम करने से भी मुकदमों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। असल में मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया, एक फैसला आने पर अपील का विकल्प और कानूनी प्रक्रिया का दिनोंदिन जटिल, महंगा व आम आदमी की पहुंच से बाहर जाना, न केवल आम लोगों के दिल में न्याय-मंदिर के प्रति आस्था कम कर रहा है, साथ ही निराशा में और अपराध करने या खुद ही न्याय कर देने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दे रहा है। हाल ही में फिल्म अभिनेता सलमान खान के मामले में अदालत को केवल यह जानने में 13 साल लग गए कि वह हत्यारी गाड़ी सलमान नहीं चला रहे थे, जिसने एक जान ली व आठ को अधमरा किया। हालांकि इस अधूरे न्याय में यह सामने नहीं आया कि उस रात सड़क हादसे का गुनाहगार कौन है, बस यह बताया गया कि कौन निर्दोष है। इंदिराजी के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री रहे ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में फैसला आने में 40 साल लगे। मुंबई धमाकों में पूरे 20 साल लग गए सुप्रीम कोर्ट तक फैसला आने में। इसी तरह एक मामला था सन् 2000 का, केरल में नकली शराब पीने से 31 लोगों से हुई मौत का। पुलिस ने
गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया और निचली अदालत ने इसके तहत दो साल की सजा सुना दी। मामला उच्च न्यायालय में गया और अदालत ने सजा बढ़ा कर पांच साल कर दी। आरोपी सुप्रीम कोर्ट आ गया, वहां न्यायमूर्ति आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने उच्च न्यायालय की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि दंड तो मानव जीवन की पवित्रता को स्वीकार करने वाला होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को दुख था कि 31 लोगों की मौत का कारण बने व्यक्ति को इतनी कम सजा हो रही है। यह बानगी है कि किस तरह निचली अदालतें मनमाने तरीके से अपराधियों की सजाओं का निर्धारण करती हैं। यह बात अब किसी से दबी-छिपी नहीं है कि जिला स्तर पर अदालतों में जम कर लेनदेन हो रहा है। कई बार तो चर्चित अपराधों में सजा के फैसले इस तरह लिखने के मोलभाव हो जाते हैं कि जब उसकी अपील ऊंची अदालत में जाए तो आरोपी को बरी होने में मदद मिल जाए। एक अन्य मामले का जिक्र करना जरूरी है जिसमें जयपुर यूनिवर्सिटी के जेसी बोस हॉस्टल में कोई 15 साल पहले एक राह चलती लड़की को अगवा कर ले जाया गया था और डेढ़ दर्जन लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया था। 5 सितंबर, 1997 को अपराध हुआ और मामले की जिला अदालत में सुनवाई पूरी हुई 25 अक्टूबर 2012 को। 15 साल बाद नौ लोग इस मामले में बरी कर दिए गए, जबकि आठ को 10 साल की सजा सुनाई गई। जरा सोचिए कि न्याय पाने के लिए उस 21 साल की लड़की को अपने प्रौढ़ होने का इंतजार करना पड़ा। हो सकता है, इस बीच उसकी नौकरी लग गई हो, उसका परिवार हो, बच्चे हों। वहीं आधे आरोपी छूट गए और सजा पाए आरोपियों के पास भी अभी उच्च न्यायालय जाने का विकल्प खुला है। क्या कोई आम आदमी इतनी लंबी कानूनी लड़ाई के लिए आर्थिक, मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक तौर पर सक्षम होता है?देश की सड़कों पर आए रोज दिखने वाला आम आदमी का गुस्सा भले ही उस समय महज पुलिस या व्यवस्था का विरोध नजर आता हो, हकीकत में यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। लोग अब महसूस कर रहे हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर ही है। यह बात भी लोग अब महसूस कर रहे हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में जहां अपराधी को बचने के बहुत से रास्ते खुले रहते हैं, वहीं पीड़ित की पीड़ा का अनंत सफर रहता है। हाल ही में देश की सुप्रीम कोर्ट ने हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा है कि निचली अदालतों के दोषी को दी जाने वाली सजा के निर्धारण के लिए कोई विधायी या न्यायिक दिशा-निर्देश न होना हमारी न्याय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी है। 
कई मामले पहले दस साल या उससे अधिक निचली अदालत में चलते हैं, फिर उनकी अपील होती रहती है। कुछ मिलाकर एक उम्र बीत जाती है, न्याय की आस में वहीं लंपट और पेशेवर अपराधी न्याय व्यवस्था की इस कमजोरी का फायदा उठा कर कानून से बेखौफ बने रहते हैं।देशभर में हो रहे मौजूदा प्रदर्शनों में फास्ट-ट्रैक अदालतों या जल्दी फैसले का जिक्र हो रहा है। अभी पिछले साल ही मध्य प्रदेश के धार जिले में हत्या के एक मामले में एक महीने के भीतर आरोपियों को सजा सुना दी गई। राजस्थान में भी 21 दिन में फैसले हुए हैं। जाहिर है कि अदालतों में जल्दी फैसले आ सकते हैं। साफ नजर आता है कि आखिर मामलों को लंबा खींचने में किसके स्वार्थ निहित होते हैं। आजादी के बाद चुने हुए प्रतिनिधियों, नौकरशाही ने किस तरह आम लोगों को निराश किया, इसकी चर्चा अब मन दुखाने के अलावा कुछ नहीं करती है। यह समाज ने मान लिया है कि ढर्रा उस हद तक बिगड़ गया है कि सुधरना नामुमकिन है। भले ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की सांस से भी दूर हो जाती है। इसके बावजूद देश को विधि सम्मत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं। बीते कुछ सालों से देश में जिस तरह अदालत के निर्देशों पर सियासती दलों का रुख देखने को मिला हैै, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढांचा ही पंगु न हो जाए। यह विडंबना है कि देश का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं, उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निश्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है, उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। अगर इस दौरान मुवक्किल जेल से बाहर हुआ तो मुकदमे के दौरान अपने को बचाने की कवायद की परेशानी और सजा से ज्यादा खर्चे और जुर्माना ही कष्टदायी हो जाता है। पुलिस और प्रभावशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दुरूह बना रहे हैं, क्योंकि प्रभावशाली लोग पुलिस को अपने इशारों पर नचाते हैं और उन लोगों को डराने-धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं, जो अत्याचारी और शोषणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दबाव नहीं है। देशभर की अदालतों में वकील साल में कई दिन तो हड़ताल पर ही रहते हैं, यह जाने बगैर कि एक पेशी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। यह भी कहना गलत न होगा कि बहुत से मामलों में वकील खुद पेशी की ज्यादा फीस के लालच में केस को खींचते रहते हैं। देश की बड़ी और घनी आबादी, भाषाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। ऐसे में कुछ फिल्में याद आती हैं- 70 के दशक में एक फिल्म में हत्या के लिए दोषी पाए गए राजेश खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। अभिषेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्धाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करना पड़ती है। वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्राइवर को सड़क पर खड़े होकर 15 दिनों तक ट्रैफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी शृंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानूनसम्मत न मानते हुए रोक लगा दी थी। मोटर साइकिलों पर उपद्रव काटने वाले सिख युवकों को कुछ दिनों के लिए गुरुद्वारे में झाड़ू-पोछा करने की सजा की भी समाज में बेहद तारीफ हुई थी। क्या अब वह वक्त नहीं आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए? आज की न्यायिक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामलों में सयब नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, हड़ताल जैसी हालत में तारीख आगे बढ़ाने की जगह वकील को दंडित करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विश्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिशों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्शी या असंवदेनशील करार दे सकता है, लेकिन देशभर में सड़कों पर उतरे लोगों की भावना ऐसी ही है और लोकतंत्र में जनभावना ही सर्वोपरि होती है।

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