तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 10 दिसंबर 2017

After rain now rivers are unhappy with Meghalay

वहां मेघ से बरसने वाली हर अमृत बूंद सहेजकर समाज तक पहुंचाने के लिए प्रकृति ने नदियों का जाल भी दिया है।
प्रदूषण बढ़ने के साथ ही मेघालय की तमाम छोटी-बड़ी नदियां अब लुप्त होती जा रही हैं।

मेघ के बाद नदियां भी रूठीं तो क्या बचेगा मेघालय में


बीते दिनों की बात हो गई, जब कहा जाता था कि चेरापूंजी में दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश होती है। बारिश बुलाने वाले पहाड़, नदियां, हरियाली सब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कभी समाज की जीवन रेखा कही जाने वाली मेघालय की नदियां अब विदा हो रही हैं। ये एक-एक कर लुप्त होती जा रही हैं। इनकी मछलियां नदारद हैं और इलाके की बड़ी आबादी पेट के कैंसर का शिकार हो रही है। लेकिन सरकारी महकमे नहीं मानते कि नदियों का प्रदूषण जीवन के लिए खतरनाक हो चुका है। प्रदूषण के असल कारण औद्योगिक इकाइयों पर न राजनेता बोलते हैं, और न ही सरकारी महकमे।जहां मेघों का डेरा है, वहां मेघ से बरसने वाली हर अमृत बूंद सहेजकर समाज तक पहुंचाने के लिए प्रकृति ने नदियों का जाल भी दिया है। आए दिन मेघालय से बाहर बांग्लादेश की ओर जाने वाली दो बड़ी नदियों- लुका और मिंतदु का पानी पूरी तरह नीला हो जाता है। बिल्कुल नील घुले पानी की तरह। सनद रहे कि इधर की नदियों का पानी साफ या फिर गंदला-सा होता है, लेकिन साल में कम से कम तीन बार ये नदियां नीली पड़ जाती हैं। यह 2007 से ही जारी है, जब हर साल ठंड शुरू होते ही पहले मछलियों की मौत शुरू होती है, फिर पानी का रंग गहरा नीला हो जाता है। इलाके के कोई दो दर्जन गांवों के लिए ये एकमात्र जलस्नेत हैं। सरकारी रिकॉर्ड भी बताते हैं कि क्षेत्र की 30 फीसदी आबादी पेट की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है और इसमें कैंसर के मरीज सर्वाधिक हैं।मेघालय जमीन के भीतर छिपी प्राकृतिक संपदा के मामले में बहुत संपन्न है। यहां चूना है, कोयला है और यूरेनियम भी है। शायद यही नैसर्गिक वरदान अब इसकी मुश्किलों का कारण बन रहा है। सन 2007 में पहली बार लुका व मिंतदु नदियों का रंग नीला पड़ने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जांच की थी और 2012 की अपनी रिपोर्ट में इलाके के जल प्रदूषण के लिए कोयला खदानों से निकलने वाले अम्लीय अपशिष्ट और अन्य रासायनों को जिम्मेदार ठहराया था। क्षेत्र के प्रख्यात पर्यावरणविद् एचएच मोर्हमन मानते हैं कि नदियों के अधिकांश भागों में तल में कई प्रकार के कण देखे जा सकते हैं, जो संभवत: नदियों के पास चल रहे सीमेंट कारखानों से उड़ती राख है। बीच में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कोयला खनन और परिवहन पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन वह ज्यादा दिन चला नहीं। नदियों की धीमी मौत का यह उदाहरण केवल लुका या मिंतदु तक सीमित नहीं हैं, आयखेरवी, कुपली नदियों का पानी भी अब इंसान के प्रयोग लायक नहीं बचा है। लुका नदी पहाड़ियों से निकलने वाली कई छोटी सरिताओं से मिलकर बनी है। इसमें लुनार नदी मिलने के बाद इसका प्रवाह तेज होता है। इसके पानी में गंधक, सल्फेट, लोहा व कई अन्य जहरीली धातुओं की उच्च मात्र और पानी में ऑक्सीजन की कमी पाई गई है। ठीक यही हालत अन्य नदियों की भी है, जिनमें सीमेंट कारखाने या कोयला खदानों का अवशेष आकर मिलता है। लुनार नदी के उद्गम स्थल सुतुंगा पर ही कोयले की सबसे ज्यादा खदानें हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जयंतिया पहाड़ियों पर कानूनी से कई गुना ज्यादा गैरकानूनी खनन होता है। यही नहीं, नदियों में से पत्थर निकालकर बेचने पर तो यहां कोई ध्यान ही नहीं देता, जबकि इससे नदियों का इको सिस्टम खराब हो रहा है। कटाव और दलदल बढ़ रहा है और इसी के चलते मछलियां कम आ रही हैं। ऊपर से जब खनन का मलवा इसमें मिलता है, तो जहर और गहरा हो जाता है। मेघालय ने गत दो दशकों में कई नदियों को नीला होते, फिर उसके जलचर को मरते और आखिर में जलहीन होते देखा है। विडंबना है कि यहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर एनजीटी तक सभी विफल हैं। समाज चिल्लाता है, गुहार लगता है और स्थानीय निवासी आने वाले संकट की ओर इशारा भी करते हैं, लेकिन स्थानीय निर्वाचित स्वायत्त परिषद खदानों से लेकर नदियों तक को निजी हाथों में सौंपने के फैसले पर चिंतन नहीं करती हैं। अभी तो मेघालय पर बादलों की कृपा भी कम हो गई है। चेरापूंजी अब सर्वाधिक बारिश वाला गांव नहीं रहा। नदियां भी चली गईं, तो दुनिया के इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य वाली धरती पर मानव जीवन संकट में आ जाएगा।(ये लेखक के अपने विचार हैं)

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

Kannur can be a model for waste management

केरल से सीखें कचरा कम करना
पंकज चतुर्वेदी 

‘कन्नन’ का अर्थ है श्रीकृष्ण  और ‘उर’ यानि स्थान। केरल के दक्षिणी-पूर्व में स्थित तटीय श हर कन्नूर, देश का ऐसा पहला श हर बन गया है जहां ना ता कोई प्लास्टिक कचरा बचा है और ना ही वहां किसी तरह के प्लास्टिक सामग्री को कचरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। केरल राज्य की स्थापना के दिवस एक नवंबर 2016 को जिले ने ‘ नलनाडु-नल्ला मन्नू’  अर्थात ‘सुंदर गांव-सुंदर भूमि’ का संकल्प लिया और पांच महीने में यह मूर्तरूप में आ भी गया।  यह तो बानगी है, राज्यभर में ‘हरित केरलम’ परियेाजना के तहत कचरा कम करने के कई ऐसे उपाय प्रारंभ किए गए हैं जोकि देश के लिए अनुकरणीय मिसाल हैं।
समृद्ध अतीत और सर्वधर्म समभाव के प्रतीक कन्नूर ने जब तय किया कि जिले को देश का पहला प्लास्टिक-मुक्त जिला बनाना है तो इसके लिए जिला प्रशासन से ज्यादा समाज के अन्य वर्ग को साथ लिया गया। बाजार, रेस्तरां, स्कूल, एनजीओ, राजनीतिक दल आदि एक जुट हुए। पूरे जिले को छोटे-छोटे क्लस्टर में बांटा गया, फिर समाज के हर वर्ग, खासकर बच्चों ने इंच-इंच भ्ूामि से प्लास्टिक का एक-एक कतरा बीना गया उसे ठीक से पैक किया गया और नगर निकायों ने उसे ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी निभाई। इसके साथ ही जिले में हर तरह की पॉलीथिन थैली, डिस्पोजेबल बर्तन, व अन्य प्लासिटक पैकिंग पर पूर्ण पांबदी लगा दी गई। कन्नूर के नेशनल इंस्टीट्यूट और फेशन टेक्नलाजी के छात्रों ने इवीनाबु बुनकर सहकारी समिति और कल्लेतेरे ओद्योगिक बुनकर सहकारी समिति के साथ मिल कर बहुत कम दाम पर बेहद आकर्शक व टिकाऊ थैले बाजार में डाल दिए। सभी व्यापारिक संगठनों, मॉल आदि ने इन थैलों को रखना षुरू  किया और आज पूरे जिले में कोई भी पन्नी नहीं मांगता है। खाने-पनीने वाले होटलों ने खाना पैक करवा कर ले जाने वालों को घर से टिफिन लाने पर छूट देना षुरू कर दिया और घर पर सप्लाई भी अब स्टील के बर्तनों में की जा रही है जो कि ग्राहक के घर जा कर खाली कर लिए जाते हैं।

नेशनल इनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है।  हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकलात है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा,  घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढो कर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है।  यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है। 
असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। हमरा बाथ्रूम और किचन तो कूड़े का बड़ा उत्पादनकर्ता बन गया है।

अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामन लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई  और खुशबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है।
केरल राज्य ने इस विकराल समस्या के समझा और पूरे राज्य में कचरा कम करने के कुछ कदम उठाए। इस दिशा में जारी दिशा-निर्देशों में सबसे ज्यादा सफल रहा है डिस्पोजेबल बॉल पेन के स्थान पर इंक पेन इस्तेमाल का अभियान। सरकार ने पाया कि हर दिन लाखेां रिफिल और एक समय इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पेन राज्य के कचरे में इजाफा कर रहे हैं। सो, कार्यालयीन आदेश निकाल कर सभी सरकारी दफ्तरों में बॉल पाईंट वाले पेनों पर पांबदी लगा दी गई। अब सरकारी खरीद में केवल इंक पेन खरीदे व इस्तेमाल किए जा रहे हैं। राज्य के स्कूल, कालेजों और चौराहों पर कचरा बन गए बॉल पेनों के एकत्रीकरण के लिए डिब्बे लगाए गए हैं। कई जिलों में एक दिन में पांच लाख तक बेकार प्लास्टिक पेन एकत्र हुए। इस बीच इंक पेन और ष्याही पर भी छूट दी जा रही है। अनुमान है कि यदि पूरे राज्य में यह येाजना सफल हुई तो प्रति दिन पचास लाख प्लास्टिक पेन का कचरा र्प्यावरण में मिलने से रह जाएगा। इन एकत्र पेनों को वैज्ञानिक तरीके से निबटाया भी जा रहा है।
राज्य सरकार ने इसके अलावा कार्यालयों में पैक्ड पानी की बोतलों के स्थान पर स्टील के बर्तन में पानी, सरकारी आयोजनों में फ्लेक्स बैनर और गुलदस्ते के फूलों को पनी में लपेटने पर रेक लगा दी है। प्रत्येक कार्यालय में कचरे को अलग-अलग करना, कंपोस्ट बनाना, कागज के कचरे को रिसाईकिल के लिए देना और बिजली व इलेक्ट्रानिक कचरे को एक. कर प्रत्येक तीन महीने में वैज्ञानिक तरीके से उसको ठिकाने लगाने की योजनाएं जमीनी स्तर पर बेहद कारगर रही है।
कचरा कम करने के ये प्रयास देश के लिए अनुकरणीय है।। इनके साथ ही विभिन्न् आयोजनों में फ्लेक्स की जगह कपड़े या कागज के बैनर लगवाना, उपहार लेते-देते समय उस पर पैकिंग कागज का इस्तेमाल ना करना, प्लास्टिक कवर के स्थान पर पुनर्चक्रित कागज के फाईल कवर ही प्रयोग में लाना, कुछ ऐसे उपाय है जो कि किसी भी श हर या कस्बे को कम कचरा उपजाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

Industry Must take responsibility of garbage from there products

उत्पादक का उत्तरदायित्व तय किए बगैर नहीं बचेगा पर्यावरण
पंकज चतुर्वेदी

भारत  में हर साल कोई 4.4 खरब लीटर पानी को प्लास्टिक की बोतलों में पैक कर बेचा जाता है। यह बाजार 7040 करोड़ रूपए सालाना का हे। जमीन के गर्भ से या फिर बहती धारा से प्रकृति के आर्शीवाद स्वरूप निशुल्क मिले पान को कुछ मशीनों से गुजार कर बाजार में लागत के 160 गुणा ज्यादा भाव से बेच कर मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने वाली ये कंपनियां हर साल देश में पांच लाख टन प्लास्टिक बोतलों का अंबार भी जोड़ती हैं। षीतल पेय का व्यापार तो इससे भी आगे है और उससे उपजा प्लास्टिक कूड़ा भी यूंह ी इधर-उधर पड़ा रहता है। चूंकि ये बोतलें इस किस्म की प्लास्टिक से बनती हैं जिनका पुनर्चकण हो नहीं सकता, सो कबाड़ी इन्हें लेते नहीं हैं। या तो यह प्लास्टिक टूट-फूट कर धरती को बंजर बनाता है या फिर इसे एकत्र कर ईंट भट्टे या ऐसी ही बड़ी भट्टियों में झोंक दिया जाता है, जिससे निकलने वाला धुआं दूर-दूर तक लेागां का दम घोंटता है। ठीक यही हाल हर दिन लाखें की संख्या में हबिकने वाली कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों , दूध की थैलियों, चिप्स आदि के पैकेट का है।  हमारे देश के नीति निर्धारक बढ़ते प्रदूषण के कारक, कारण निदान पर बड़े-बड़े आयोजन, परियोजनाएं और भाषण देते हैं, लेकिन पानी की बोतलों का छोटा सा तथ्य बानगी हैं कि देश के जल-जंगल-जमीन को संकट में डालने वाले उत्पादों को मुनाफा कमाने की तो छूट है लेकिन उनके उत्पाद से उपजे जहरीले कचरे के प्रति उनकी केाई जिम्मेदारी नहीं हैं।

असल में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के चलते नैसर्गिकता में आए बदलाव का मूल कारण हमारा प्रकृति पर निर्भरता से दूर होना है। विउंबना है कि कुछ संगठन व व्यापारी यह कहते नहीं अघाते कि प्लास्टिक के आने से पेड़ बच गए। हकीकत यह है कि पेड़ से मिलने वाले उत्पाद, चाहे वे रस्सी हों या जूट या कपड़ा, या कागज, इस्तेमाल के बाद प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाते थे। पेड़ का देाहन करें तो उसे फिर से उगा कर उसकी पूर्ति की जा सकती है, लेकिन एक बार प्लास्टिक धरती पर किसी भी स्वरूप में आ गई तो उसका नष्ट होना असंभव है और वह समूचे पर्यावरणीय-तंत्र को ही हानि पहुंचाती है। यह मसला अकेले पानी की बेातलों का ही नहीं है, खने-पीने की वस्तुओं से ले कर हर तरह के सामान की पैकिंग में प्लासिटक या थर्मोकाले का इस्तेमाल बेधडक है, लेकिन कोई भी निर्माता यह जिम्मेदारी नहीं लेता कि इस्तेमाल होने वाली वस्तु के बाद उससे निकलने वाले इस जानलेवा कचरे का उचित निबटान करने कौन करेगा।
मोबाईल, कंप्यूटर व अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणें की कंपनियों का मुनाफा असल उत्पादन लागत का कई सौ गुणा होता है लेकिन करोड़ो-करोड़ विज्ञापनों में ख्सर्च करने वाली ये कंपनियां इसे उपजने वाले ई-कचरे की जिम्मेदारी लेने को राजी नहीं होतीं। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है। षेश हिस्सा प्लास्टिक होता है। इसमें से अधिकांश सामग्री गलती-’सड़ती नहीं है और जमीन में जज्ब हो कर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने  और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने  का काम करती है। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलो ंसे भी उपज रहा है। इनसे निकलनेवाले जहरीले तत्व और गैसें मिट्टी व पानी में मिलकर उन्हें बंजर और जहरीला बना देते हैं। फसलों और पानी के जरिए ये तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर बीमारियों को जन्म देते हैं।
रंगीन टीवी, माईक्रोवेव ओवन, मेडिकल उपकरण, फैक्स मशीन , टेबलेट, सीडी, एयर कंडीशनर, आदि को भी जोड़ लें तो हर दिन ऐसे उपकरणो में से कई हजार खराब होते हैं या पुराने होने के कारण कबाड़े में डाल दिए जाते हैं। ऐसे सभी इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। इस कबाड़ को भगवान भरोसे प्रकृति को नष्ट करने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही नहीं ऐसे नए उपकरण खरीदने के दौरान पैकिंग व सामान की सुरक्षा के नाम पर कई किलों थर्मोंकोल व पॉलीथीन का इस्तेमाल होता है जोकि उपभोक्ता कूड़े में ही फैंकता है। क्या यह अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए  िकइस तरह का पैकेजिंग मटेरियल कंपनी  खुद तत्काल उपभौकता से वापिस ले ?
इन दिनों बड़े जोर-शोर से ई-रिक्शे को पर्यावरण-मित्र बता कर प्रचरित किया जा रहा हे। इसने साईकिल रिक्शों को निगलना भी शुरू कर दिया है। यह बात दीगर है कि ई-रिक्श को विदेश से मंगवाने व उसे बेचने में चूंकि कई ताकतवर राजनेतओं के व्यावसायिक हित है सो यह नहीं बताया जा रहा कि ई-रिक्शेे के महत्वपूर्ण तत्व बैटरी के कारण देश का जल और जमीन तेजी से बंजर हो रही हे। औसतन हर साल एक रिक्शे की बैटरी के चलते दो लीटर तेजाब वाला पानी या तो जमीन पर या फिर नालियों के जरिये नदियों तक जा रहा है। हर साल खराब बैटरियों के कारण बड़ी मात्रा में सीसा धरती को बेकार कर रहा है। ई7रिक्श बे कर खासी कमाई करने वले उस रिक्शे की चार्जिंग, उसकी बैटरी की पर्यावरण-मित्र देखभाल की कहीं जिम्मेदारी नहीं लेते। ठीक यही हाल देश के सबसे बड़े व्यवसायों में से एक ‘आटोमोबाईल क्षेत्र’ का है। कंपनियों जमे कर वाहन बेच रही हैं, लेकिन ईंधन से उपजने वाले प्रदूषण, खराब वाहनों  या पुराने वाहनों को चलने से प्रतिबंधित करने जैसे कार्यों के लिए कोई कदम नहीं उठातीं । हर साल करोड़ों टायर बेकार हो कर जलाए जा रहे हैं और उनका जहरीला धुआं परिवेश को दूषित कर रहा है, लेकिन केाई भी टायर कंपनी पुराने टायरों के सही तरीके से निबटान को आगे नहीं आती।
यह तो किसी छिपा नहीं है कि विभिन्न सरकारों द्वारा पर्यावरण बचाने के लिए लिए करों से उनका खजाना जरूर भरा हो, कभी पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदम तो उठे नहीं। भारत जैसे विशाल और दिन-दुगनी, रात चैागुनी प्रगति कर रहे उपभोक्तावादी देश में अब अनिवार्य हो गया है कि प्रत्येक सामान के उत्पादक या निर्यातक को यह जिम्मेदारी लेने को बाध्य किया जाय कि उसके उत्पाद से उपजे कबाड़ या प्रदूषण के निबटारे की तकनीकी और जिम्मेदारी वह स्वयं लेगा। यह कहां तक नैतिक व न्यायाचित है कि कंपनियां मोबाईल, कार, पानी बेच कर मुनाफा कमाएं और उससे निकले प्रदूषण से समाज व सरकार जूझे ।

रविवार, 3 दिसंबर 2017

Bundelkhand again tends to drought



फिर सूखे की ओर बुंदेलखंड

बुंदेलखंड की असली समस्या अल्पवर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों से, पीढ़ियों से रही है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीना जानते थे। पर आधुनिकता के अंधड़ में पारंपरिक जल-प्रबंधन नष्ट हो गया और उसकी जगह सूखा व सरकारी राहत ने ले ली। इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं बल्कि यहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है।

बुंदेलखंड के गांवों के लोग पलायन कर रहे हैं- पानी की कमी के चलते। अगली बरसात दस महीने दूर है और बुंदेलखंड से जल संकट, पलायन और बेबसी की खबरें आने लगी हैं। वैसे मध्यप्रदेश के तेईस जिलों की एक सौ दस तहसीलों को राज्य सरकार ने सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है, जिनमें बुंदेलखंड में आने वाले सभी जिले शामिल हैं। हालांकि इस घोषणा से सूखा प्रभावितों की दिक्कतों में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। असल में यहां सूखा पानी का नहीं है, पर्यावरणीय तंत्र ही सूख गया है। इस चक्र में जल संसाधन, जमीन, जंगल, पेड़, जानवर व मवेशी, पहाड़ और वहां के बाशिंदे, सभी शामिल हैं। इन सभी के क्षरण को रोकने के एकीकृत प्रयास के बगैर यहां के हालात सुधरेंगे नहीं।  टीकमगढ़ जिले के गांवों की चालीस फीसद आबादी अभी से महानगरों की ओर रोजगार के लिए पलायन कर चुकी है। छतरपुर, दमोह, पन्ना के हालात भी लगभग ऐसे ही हैं। असल में इस इलाके में जीविका का मूल जरिया खेती है, और खेती बरसात पर निर्भर है। बीते दस सालों में यह आठवां साल है जब औसत से बहुत कम बरसात से यहां की धरती रीती रह गई है। अनुमान है कि मप्र के हिस्से के बुंदेलखंड में कुल 30 लाख हैक्टर जमीन है जिसमें से 24 लाख हैक्टर खेती के लायक है। लेकिन इसमें से सिंचाई की सुविधा महज चार लाख हैक्टर को ही उपलब्ध है। केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि बुंदेलखंड में बरसात का महज दस फीसद पानी जमा हो पाता है। शेष पानी बड़ी नदियों में बह कर चला जाता है।
असल में यहां की पारंपरिक जल-संचय व्यवस्था का दुश्मन यहीं का समाज बना है। बुंदेलखंड के सभी गांवों, कस्बों, शहरों की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है- चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैयां और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूंद संरक्षित हो जाती थी। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को, सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे-बचे तालाब शहरों की गंदगी को ढोने वाले नाबदान बन गए। बुंदेलखंड का कोई गांव-कस्बा ले लें, हर जगह चार दशक पहले की सीमा तय करने वाले पहाड़ों पर जमकर अतिक्रमण हुआ। छतरपुर में तो पहाड़ों पर दो लाख से ज्यादा आबादी बस गई। पहाड़ उजड़े तो उसकी हरियाली भी गई। और इसके साथ ही पहाड़ पर गिरने वाले पानी की बूंदों को संरक्षित करने का गणित भी गड़बड़ा गया। जो बड़े पहाड़ जंगलों में थे, उनको खनन माफिया चाट गया। आज जहां पहाड़ होना था, वहां गहरी खाइयां हैं। पहाड़ उजड़े तो उनकी तली में सजे तालाबों में पानी कहां से आता? इस तरह गांवों की अर्थव्यवस्था का आधार कहलाने वाले चंदेलकालीन तालाब सामंती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे बुंदेलखंड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहां न तो कल-कारखाने हैं और न ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहां का जीवनयापन टिका हुआ है।
यहां मवेशी न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार होते हैं, बल्कि उनके खुरों से जमीन का बंजरपन भी समाप्त होता है। सूखे के कारण सख्त हो गई भूमि पर जब गाय के पग पड़ते हैं तो वह जल सोखने लायक भुरभुरी होती है। विडंबना है कि समूचे बुंदेलखंड में सार्वजनिक गोचर भूमियों पर जमकर कब्जे हुए और आज गोपालकों के सामने पेट भरने का संकट है, तभी इन दिनों लाखों-लाख गायें सड़कों पर आवारा घूम रही हैं। जब तक गोचर, गाय और पशुपालक को संरक्षण नहीं मिलेगा, बुंदेलखंड की तकदीर बदलने से रही। कभी बुंदेलखंड के पैंतालीस फीसद हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर छह प्रतिशत रह गई है। छतरपुर सहित कई जिलों में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी भी दो सौ किलोमीटर दूर से मंगवानी पड़ रही है। यहां के जंगलों में रहने वाले सौर, कौंदर, कौल और गोंड आदिवासियों की यह जिम्मेदारी होती थी कि वे जंगल की हरियाली बरकरार रखें। ये आदिवासी वनोपज से जीविकोपार्जन चलाते थे, सूखे-गिरे पेड़ों को र्इंधन के लिए बेचते थे। लेकिन आजादी के बाद जंगलों के स्वामी आदिवासी वनपुत्रों की हालत बंधुआ मजदूर से बदतर हो गई। ठेकेदारों ने जमकर जंगल उजाड़े और सरकारी महकमों ने कागजों पर पेड़ लगाए। बुंदेलखंड में हर पांच साल में दो बार अल्प वर्षा होना कोई आज की विपदा नहीं है। फिर भी जल, जंगल, जमीन पर समाज की साझी भागीदारी के चलते बुंदेलखंडी इस त्रासदी को सदियों से सहजता से झेलते आ रहे थे।
बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों से, पीढ़ियों से रही है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीना जानते थे। पर आधुनिकता के अंधड़ में पारंपरिक जल-प्रबंधन नष्ट हो गया और उसकी जगह सूखा व सरकारी राहत ने ले ली। अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इंतजार अफसरों, नेताओं सभी को होता है! लेकिन प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होते आ रहे इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं बल्कि यहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है। इलाके में पहाड़ कटने से रोकना, पारंपरिक बिरादरी के पेड़ों वाले जंगलों को सहेजना, पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिए मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये पांच उपचार बुंदेलखंड की तकदीर बदल सकते हैं।
यदि बुंदेलखंड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहां के तालाबों, जंगलों और गोचर का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाबों को सरकार की बनिस्बत समाज की संपत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। इसके लिए ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थायी संगठन बनाने होंगे। दूसरा, इलाके के पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहुंचाने के लिए उसके रास्ते में आए अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुंदेलखंड में बेतवा, केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियां उथली हो गई हैं। दूसरे, उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। इन नदियों पर छोटे-छोटे बांध बांधकर या नदियों को पारंपरिक तालाबों से जोड़ कर पानी रोका जा सकता है। हां, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रुपए की योजना पर फिर से विचार करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बुंदेलखंड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी। यह क्षेत्र जल संकट से निबटने में स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के मद््देनजर परियोजनाएं तैयार की जाएं। विशेषकर यहां के पारंपरिक जल-स्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाए। यदि बुंदेलखंड के विकास का मॉडल नए सिरे से नहीं बनाया गया तो न सूरत बदलेगी और न ही सीरत।

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

Migration for employments turning cities in slum

गांवो से बढ़ते पलायन के कारण बढ़ते ‘‘अरबन स्लम’’
पंकज चतुर्वेदी

‘आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी किसको कहा जा सकता है ?’ यदि इस सवाल का जवाब ईमानदारी से खोजा जाए तो वह होगा -कोई पचास करोड़ लोगों का अपने पुश्तैनी घर, गांव, रोजगार से पलायन। और ‘आने वाले दिनों की सबसे भीशण त्रासदी क्या होगी ?’ आर्थिक-सामाजिक ढ़ांचे में बदलाव का अध्ययन करें तो जवाब होगा- पलायन से उपजे षहरों का --अरबन-स्लम’ में बदलना। देश की लगभग एक तिहाई आबादी  31.16 प्रतिशत अब षहरों में रह रही हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर षहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब 37 करोड 70 लाख लोग षहरों के बाशिंदे हैं । सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में षहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ जबकि गांवंों की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी। और अब 16वीं लोकसभा के चुनाव में दोनों बड़े दलों ने अपने घोशणा पत्रों में कहीं ना कहीं नए षहर बसाने की बात कही है।
देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहंुच गया है जबकि खेती की भूमिका दिनो-दिन घटते हुए 15 प्रतिशत रह गई है। जबकि गांवोे की आबादी अभी भी कोई 68.84 करोड़ है यानी देश की कुल आबादी का दो-तिहाई। यदि आंकड़ों को गौर से देखें तो पाएंगे कि देश की अधिकांश आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी षहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है। यही कारण है कि गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट,  शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी  है और लोगों बेहतर जीवन की तलाश में षहरों की ओर आ रहे हैं। षहर बनने की त्रासदी की बानगी है सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश । बीती जनगणना में यहां की कुल आबादी का 80 फीसदी गांवों में रहता था और इस बार यह आंकड़ा 77.7 प्रतिशत हो गया। बढ़ते पलायान के चलते  2011 में राज्य की जनसंख्या की वृद्धि 20.02 रही , इसमें गांवों की बढौतरी 18 प्रतिशत है तो षहरों की 28.8। सनद रहे पूरे देश में षहरों में रहने वाले कुल 7.89 करोड परिवारों में से 1.37 करोड झोपड़-झुग्गी में रहते हैं और देश के 10 सबसे बड़े षहरी स्लमों में मेरठ व आगरा का षुमार है। मेरठ की कुल आबादी का 40 फीसदी स्लम में रहता है, जबकि आगरा की 29.8 फीसदी आबादी झोपड-झुग्गी में रहती है।
राजधानी दिल्ली में जन सुविधाएं, सार्वजनिक परिवहन और सामाजिक ढांचा - सब कुछ बुरी तरह चरमरा गया है। कुल 1483 वर्ग किमी में फैले इस महानगर की आबादी कोई सवा करोड़ से अधिक हो चुकी है। हर रोज तकरीबन पांच हजार नए लोग यहां बसने आ रहे हैं। अब यहां का माहौल और अधिक भीड को झेलने में कतई समर्थ नहीं हैं। ठीक यही हाल देश के अन्य सात महानगरों, विभिन्न प्रदेश की राजधानियों और औद्योगिक वस्तियों का है। इसके विपरीत गांवों में ताले लगे घरों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था का कभी मूल आधार कही जाने वाली खेती और पशु-पालन के व्यवसाय पर अब मशीनधारी बाहरी लोगों का कब्जा हो रहा है। उधर रोजगार की तलाश में गए लोगों के रंगीन सपने तो चूर हो चुके हैं, पर उनकी वापसी के रास्ते जैसे बंद हो चुके हैं। गांवों के टूटने और शहरों के बिगडने से भारत के पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संस्कारों का चेहरा विद्रूप हो गया है। परिणामतः भ्रष्टाचार, अनाचार, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है।

षहर भी  दिवास्वप्न से ज्यादा नही ंहै, देश के दीगर 9735 षहर भले ही आबादी से लबालब हों, लेकिन उनमें से मात्र 4041 को ही सरकारी दस्तावेज में षहर की मान्यता मिली हे। षेश 3894 षहरों में षहर नियोजन या नगर पालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़ कर बेढब अधपक्के मकान खड़े कर दिए गए हैं जहां पानी, सड़क, बिजली आदि गांवों से भी बदतर हे। सरकार कारपोरेट को बीते पांच साल में कोई 21 लाख करोड़ की छूट बांट चुकी है। वहीं हर साल पचास हजार करोड़ कीमत की खाद्य सामग्री हर साल माकूल रखरखाव के अभाव में नश्ट हो जाती है और सरकार को इसकी फिकर तक नहीं होती। बीते साल तो सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका कि यदि गोदामों में रखो अनाज को सहजे नहीं सकते हो तो उसे गरीबों को बांट दो, लेकिन इसके लिए हुक्मरान तैयार नहीं है। विकास और सबसिडी का बड़ा हिस्सा षहरी आबादी के बीच बंटने से विशमता की खाई बड़ी होती जा रही है।
शहरीकरण की त्रासदी केवल वहां के बाशिंदें ही नहीं झेलते हैं, बल्कि उन गांवों को अधिक वेदना सहनी होती है, जिन्हें उदरस्थ कर शहर के सुरसा-मुख का विस्तार होता है। शहर, गांवों की संस्कृति, सभ्यता और पारंपरिक सामाजिक ढांचे के क्षरण के तो जिम्मेदार होते ही हैं, गांव की अर्थनीति के मूल आधार खेती को चौपट भी करते हैं। किसी शहर को बसाने के लिए आस-पास के गांवों के खेतों की बेशकीमती मिट्टी को होम किया जाता है। खेत उजड़ने पर किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर मिट्टी की तात्कालिक अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक ऐश करता है। फिर आने वाली पीढियों के लिए दुर्भाग्य के दिन शुरु हो जाते हैं।
कोई एक दशक पहले दिल्ली नगर निगम द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट महान चिंतक कार्ल मार्क्स की उस चर्चित उक्ति की पुष्टि करती है, जिसमें उन्होने कहा था कि अपराथ, वेश्यावृति तथा अनैतिकता का मूल कारण भूख व गरीबी होता है। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं अन्य महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों के कारणों का खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं।

गांवों में ही उच्च या तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज खाद और  दवाओं को प्रोत्साहित करना, ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके चलते गांवों से युवाओं के पलायन को रोका जा सकता है । इस राष्ट्रीय समस्या के निदान में पंचायत समितियां अहमं भूमिका निभा सकती हैं । पंचायत संस्थाओं में आरक्षित वर्गो की सक्रिय भागीदारी कुछ हद तक सामंती शोषण पर अंकुश लगा सकती , जबकि पानी ,स्वास्थ्य, सड़क, बिजली सरीखी मूलभूत जरूरतेंा की पूर्ति का जिम्मा स्थानीय प्रशासन को संभालना होगा ।
विकास के नाम पर मानवीय संवेदनाओं में अवांछित दखल से उपजती आर्थिक विषमता, विकास और औद्योगिकीकरण की अनियोजित अवधारणाएं और पारंपरिक जीवकोपार्जन के तौर-तरीकेां में बाहरी दखल- शहरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित करने वाले तीन प्रमुख कारण हैं । इसके लिए सरकार और समाज दोनो को साझा तौर पर आज और अभी चेतना होगा ।, अन्यथा कुछ ही वर्षों में ये हालात देश की सबसे बड़ी समस्या का कारक बनेंगें - जब प्रगति की कहानी कहने वाले महानगर बेगार,लाचार और कुंठित लोगों से ठसा-ठस भरे होंगे, जबकि देश का गौरव कहे जाने वाले गांव मानव संसाधन विहीन पंगु होंगे ।
पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060






शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

हत्यारा बनाता परीक्षा का खौफ
पंकज चतुर्वेदी


इसी साल सितंबर महीने में गुरूग्राम के रेयान स्कूल में एक सात साल के बच्चे की हत्या को जो खुलासा सीबीआई ने किया है, यदि यह सच है तो एक महज अपराध नहीं है; यह हमारे पूरी शिक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान है। कक्षा 11 में पढ़ने वाला एक बच्चा महज अपनी परीक्षा को कुछ दिन आगे खिसकाने के लिए एक मासूम का गला काट देता है। परीक्षा के परिणाम मनोनकूल ना आने पर आत्महत्या कर लेना तो भारतीय शिक्षा प्रणाली का पुराना रोग रहा है, लेकिन अब यह सोच कर आत्मा कांप जाती है कि शिखा में नंबर की अंधी दौड़ बच्चों को हत्यारा व अपराधी भी बना रही है। याद करें कि हाल ही के वर्षों में दिली व अन्य राज्यों से परीक्षा के परिणाम से रूष्ट बच्चों द्वारा अपने शिक्षक पर हमला और यहां तक कि हत्या करने के कुछ मामले सामने आए हैं। गुरूग्राम की घटना इस लिए ज्यादा भयावह है कि बगैर किसी प्रतिशोध-भाव या नफरत के केवल इस लिए हत्या कर दी जाए कि स्कूल का इम्तेहान कुछ दिन आगे खिसक जाएगा।

जरा गौर करंे कक्षा 11  के बच्चे यानि बामुश्किल 16 से 18 साल के। बीते दस-बारह साल से स्कूल में जा रहे होंगे , इस दौरान उसने कम से कम 70 पाठ्य पुस्तकें भी पढ़ी होंगी, लेकिन वहां बिताया समय, शिक्षक के उदबोधन और बांची गई पुस्तकें उसकों इतनी सी असफलता को स्वीकार करने और उसका सामना करने का साहस नहीं सिखा पाईं। उसमें अपने परिवार ,शिक्षक व समाज के प्रति भरोसा नहीं पैदा कर र्पाइं कि महज एक इम्तेहान के नतीजे के अच्छे नहंी होने से वे लेाग उसे स्वीकार करेंगे, अपनों की तरह, उसे ढांढस बंधाएंगे व आगे की तैयारी के लिए साथ देंगे। साफ जाहिर है कि बच्चे ना तो कुछ सीख रहे हैं और ना ही जो पढ रहे हैं उसका आनंद ले पा रहे हैं, बस एक ही धुन है या दवाब है कि परीक्षा में जैसे-तैसे अव्वल या बढ़िया नंबर आ जाएं।

यह विचारणीय है कि जो शिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना ना सिखा सके, जो विशम परिस्थिति में अपना संतुलन बनाना ना सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक है ? कक्षा दस के बच्चे का अव्वल आना इस लिए जरूरी है कि वह अपने मां-बाप की पसंद के विशय से अगली कक्षा में दाखिला ले पाए। ज्यादा नंबर तो साईंस , उससे कम तो कार्मस और सबसे कम तो आर्टस या ह्यूमेनेटेरियन। बचपन, शिक्षा, सीखना सब कुछ इम्तेहान के सामने कहीं गौण हो गया है । रह गई हैं तो केवल नंबरों की दौड़, जिसमें धन, धर्म , षरीर, समाज सब कुछ दांव पर लग गया है ।
क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमता का तकाजा महज अंकों का प्रतिशत ही है ? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में , जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है । सीबीएसई की कक्षा 10 में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत से बच्चों के कम अंक रहे । जबकि हिंदी के मूुल्यांकन की प्रणाली को गंभीरता से देखंे तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है । कोई बच्चा ‘‘हैं’’ जैसे षब्दो ंमें बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी केा छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है । कोई बच्चा ‘स’ , ‘ष’ और ‘श’ में भेद नहीं कर पाता है । स्पश्ट है कि यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए । यानी मूल्यांकन का आधार बच्चों की योग्यता ना हो कर उसकी कमजोरी है ।
वास्तव में परीक्षाओं का मौजूदा स्वरूप आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है । इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए । एम.ए. पास बच्चे जब बैक में पैसा जमा करने की स्लीप नहीं भर पाते या बारहवीं पास बच्च होल्डर में बल्ब लगानाया साईकिल की चैन चढ़ाने में असमर्थ रहतास है तो पता चलता है कि हम जो कुछ पढ़ा रहे हैं वह कितना चलताउ है। यह बात सभी शिक्षाशास्त्री स्वीकारते हैं ,इसके बावजूद बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गला काट में ना जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं । हायर सैकेंडरी के रिजल्ट के बाद ऐसे हादसे सारे देश में होते रहते हैं । अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो में ही पालक युद्ध सा लड़ने लगते हैं ।
कुल मिला कर परीक्षा व उसके परिणामों ने एक भयावह सपने, अनिश्चितता की जननी व बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप  ले लिया है । कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर षर्तों की बाधाएं खड़ी कर दी हैं । सवाल यह है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है - परीक्षा में स्वयं को श्रेश्ठ सिद्ध करना, विशयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायद ? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं । सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ‘‘ड्राप आउट’’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है । लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपने पसंद के विशय या संस्था में प्रवेश ना मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं । एम.ए और बीए की डिगरी पाने वालों में कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने अपनी पसंद के विशय पढ़े हैं । विशय चुनने का हक बच्चों को नहीं बल्कि उस परीक्षक को है जो कि बच्चों की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी गलतियों की गणना के अनुसार कर रहा है । बच्चा जो कुछ करना, पढना या प्रयास करना चाहता है, वह सबकुछ उसे स्कूल में मिलता नहीं और उसे वह भवन एक घुटनभरी चाहदीवारी लगता है। इसी का परिणाम है कि बचचें वहां से भागने, वहां की प्रक्रिया से बचने का प्रयास करते हें और उसकी परम परिणिति एक हत्या के रूप में सामने आई है।

वर्ष 1988 में लागू शिक्षा नीति (जिसकी चर्चा नई शिक्षा नीति के नाम से होती रही है) के 119 पृष्ठों के प्रचलित दस्तावेज से यह ध्वनि निकलती थी कि अवसरों की समानता दिलानेे तथा खाईयों को कम करके बुनियादी परिवर्तन से शिक्षा में परिवर्तन से आ जाएगा । दस्तावेज में भी शिक्षा के उद्देश्यों पर विचार करते हुए स्त्रोतों की बात आ गई है । उसमें बार-बार आय व्यय तथा बजट की ओर इशारे किए गए थे। इसे पढ़ कर मन में सहज ही प्रश्न उठता था कि देश की समूची आर्थिक व्यवस्था को निर्धारित करते समय ही शिक्षा के परिवर्तनशील ढ़ांचे पर विचार हो जाएगा । सारांश यह है कि आर्थिक ढांचा पहले तय होगा तब शिक्षा का ।  कई बजट आए और औंधे मुंह गिरे । लेकिन देश की आर्थिक दशा और दिशा का निर्धारण नहीं हो पाया । ऐसा हुआ नहीं सो शिक्षा में बदलाव का यह दस्तावेज भी किसी  सरकारी दफ्तर की धूल से अटी फाईल की तरह कहीं गुमनामी के दिन काट रहा है।

और अब तो परीक्षा या उसके परिणाम का भय बच्चे को इस हद तक कंुठित बना रहा है कि वह किसी की गर्दन काटने जैसे निर्मम अपराध से नहीं हिचक रहा। यह तो अदालत तय करेगी कि क्या वास्तव में ग्यारहवीं के बच्चे ने उस सात साल के बच्चे का गला काटा कि नहीं, लेकिन यह समय की मांग है कि परीक्षा व उससे उगाहे नंबरों की गला-काट दौड़ पर मानवीय और व्याहवारिक रूप से विचार किया जाए।

पंकज चतुर्वेदी



शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

Hills are integral part of eco system

खोदते-खोदते खो रहे हैं पहाड़
पंकज चतुर्वेदी


उप्र के महोबा जिले के जुझार गांव के लोग अपने तीन सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल का विशाल पहाड़ को बचाने के लिए एकजुट हैं। पहाड़ से ग्रेनाईट खोदने का ठेका गांव वालों के लिए आफत बन गया था। खनन के निर्धारित मानकों का अनुपालन न करते हुये नियमानुसार दो इंच ब्लास्टिंग के स्थान पर चार और छह इंच का छिद्रण कर विस्फोट कराने शुरु किये गये। इस ब्लास्टिंग से उछलकर गिरने वाले पत्थरों ने ग्रामीणों का जीना हराम कर दिया। लोगों के मकानों के खपरैल टूटने लगे और छतें दरकने लगी। पत्थरों के टूटने से उठने वाले धुन्ध के गुबार से पनपी सिल्फोसिस की बीमारी ने अब तक तीन लोगों की जान ले ली वहीं दर्जनों ग्रामीणों को अपनी चपेट में ले लिया। गांव के बच्चे अपंगता का शिकार हो रहे हैं। सरकार की निगाह केवल इससे होने वाली आय पर है जबकि समाज बता रहा है कि पहाड़ के साथ ही वहां की हरियाली, जल संसाधन, जीव-जंतु सभी कुछ खतम हो रहे है। वह दिन दूर नहीं जब वहां केवल रेगिस्तान होगा।


प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो कि बामुश्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं हाते, वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दशा और दिशा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकार पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजी भी समय-समय पर सामने आ रही है, कभी हिमाचल में तो कभी कश्मीर में तो कभी महाराश्ट्र या मध्यप्रदेश में अब धीरे धीरेे यह बात सामने आ रही है कि पहाड़ खिसकने के पीछे असल कारण उस बेजान खडी संरचना के प्रति बेपरवाही ही था। पहाड़ के नाराज होने पर होने वाली त्रासदी का सबसे खौफनाक मंजर अभी एक साल पहले ही उत्तराख्ंाड में केदारनाथ यात्रा के मार्ग पर देखा गया था। देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्श है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।

हजारों-हजार साल में गांव-शहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होता था। पहले नदियों के किनारे सभ्यता आई, फिर ताला-तलैयों  के तट पर बस्तियां बसने लगीं। जरा गौर से किसी भी आंचलिक गांव को देखंे, जहां नदी का तट नहीं है- कुछ पहाड़, पहाड़े के निचले हिस्से में झील व उसके घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा। बीते कुछ सालों से अपनी प्यास के लिए बदनामी झेल रहे बुंदेलखंड में सदियों से अल्प वर्शा का रिकार्ड रहा है, लेकिन वहां कभी पलायन नहीं हुआ, क्योंकि वहां के समाज ने पहाड़ के किनारे बारिश की हर बूंद को सहेजने तथा पहाड़ पर नमी को बचा कर रखने की तकनीक सीख लीथी। छतरपुर षहर बानगी है- अभी सौ साल पहले तक षहर के चारों सिरों पर पहाड़ थे, हरे-भरे पहाड़, खूब घने जंगल वाले पहाड़ जिन पर जड़ी बुटियां थी, पंक्षी थे, जानवर थे।

जब कभी पानी बरसता तो पानी को अपने में समेटने का काम वहां की हरिाली करती, फिर बचा पानी नीचे तालाबों में जुट जाता। भरी गरमी में भी वहां की षाम ठंडी होती और कम बारिश होने पर भी तालाब लबालब। बीते चार दशकों में तालाबों की जो दुर्गति हुई सो हुई, पहाड़ों पर हरियाली उजाड़ कर झोपड़-झुग्गी उगा दी गईं। नंगे पहाड़ पर पानी गिरता है तो सारी पहाडी काट देता है, अब वहां पक्की सडक डाली जा रही हैं। इधर हनुमान टौरिया जैसे पहाड़ को नीचे से काट-काट कर  दफ्तर, कालोनी सब कुछ बना दिए गए हैं। वहां जो जितना रूतबेदार है, उसने उतना ही हाड़ काट लिया।  वह दिन कभी भी आ सकता है कि वहां का कोई पहाड़ नीचे धंस गया और एक और मालिण बन गया।
खनिज के लिए, सड़क व पुल की जमीन के लिए या फिर निर्माण सामग्री के लिए, बस्ती के लिए, विस्तार के लिए , जब जमीन बची नहीं तो लोगों ने पहाड़ों को सबसे सस्ता, सुलभ व सहज जरिया मान लिया। उस पर किसी की दावेदारी भी नहीं थी।  अब गुजरात से देश की राजधानी को जोड़ने वाली 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला को ही लें, अदालतें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि पहाड़ों से छेड़छाड़ मत करो, लेकिन बिल्डर लॉबी सब पर भारी है। कभी सदानीरा कहलाने वो इस इलाके में पानी का संकट जानलेवा स्तर पर खड़ा हो गया है। सतपुडा, मेकल, पश्चिमी घाट, हिमालय, कोई भी पर्वतमालाएं लें, खनन ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। रेल मार्ग या हाई वे बनाने के लिए पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियर इस तथ्य को षातिरता से नजरअंदाज कर देते हैं कि पहाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थ व्यवस्था, आस्था, विश्वास का प्रतीक होते हैं।

पारंपरिक समाज भले ही इतनी तकनीक ना जानता हो, लेकिन इंजीनियर तो जानते हैं कि धरती के दो भाग जब एक-दूसरे की तरफ बढ़ते हैं या सिकुडते हैं तो उनके बीच का हिस्सा संकुचित हो कर ऊपर की ओर उठ कर पहाड़ की षक्ल लेता है। जाहिर है कि इस तरह की संरचना से छोड़छाड़ के भूगर्भीय दुश्परिणाम  उस इलाके के कई-कई किलोमीटर दूर तक हो सकते हैं। पुणे जिले के मालिण गांव से कुछ ही दूरी पर एक बांध है, उसको बनाने में वहां की पहाड़ियों पर खूब बारूद उड़ाया गया था। मालिध्ण वहीं गांव है जो कि दो साल पहले बरसात में पहाड़ ढहने के कारण पूरी तरह नश्ट हो गया था। यह जांच का विशय है कि इलाके के पहाड़ों पर हुई तोड़-फोड़ का इस भूस्खलन से कहीं कुछ लेना-देना है या नहीं। किसी पहाड़ी की तोड़फोड़ से इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों का पानी पाताल में चले जाने की घटनाएं तो होती ही रहती हैं।
यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना।  विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बउ़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों के निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। यही नहीं जिन पहाड़ों पर  इमारती पत्थर या कीमती खनिज थे, उन्हें जम कर उजाड़ा गया और गहरी खाई, खुदाई से उपजी धूल को कोताही से छोड़ दिया गया। राजस्थान इस तरह से पहाड़ों के लापरवाह खनन की बड़ी कीमत चुका रहा है। यहां जमीन बंजर हुई, भूजल के स्त्रोत दूषित हुए व सूख गए, लोगों को बीमारियां लगीं व बारिश होने पर खईयों में भरे पानी में मवेशी व इंसान डूब कर मरे भी।


आज हिमालय के पर्यावरण, ग्लेशियर्स के गलने आदि पर तो सरकार सक्रिय हो गई है, लेकिन देश में हर साल बढ़ते बाढ़ व सुखाड़ के क्षेत्रफल वाले इलाकों में पहाड़ों से छेड़छाड़ पर कहीं गंभीरता नहीं दिखती। पहाड़ नदियों के उदगम स्थल हैं। पहाड़ नदियों का मार्ग हैं, पहाड़ पर हरियाली ना होने से वहां की मिट्टी तेजी से कटती है और नीचे आ कर नदी-तालाब में गाद के तौर पर जमा हो कर उसे उथला बना देती है। पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्यौता होती है, पहाड़ अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इलाके के मवेशियेां का चरागाह होते हैं। ये पहाड़ गांव-कस्बे की पहचान हुआ करते थे। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है इन मौन खड़े छोटे-बड़े पहाड़ों के लिए, लेकिन अब आपको भी कुछ कहना होगा इनके प्राकृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए।

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