तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

negligence towards live stock have negative effect on rural development

आफत बनते आवारा मवेशी

पंकज चतुर्वेदी


भारत जैसा खेती प्रधान देश जहां, पशु को लाईव-स्टॉक कहा जाता है और जो कि देश की अर्थ व्यवस्था का बड़ा आधार है, वहां दूध देने वाले मवेशियों का करोड़ों की तादात में आवारा हो जाना असल में देश की बड़ी हानि है। गाय सियासत के फरे में गलियों में घुम रही है और उसके गोबर, दूध या अन्य लाभ के आकांक्षी उन भक्तों से भयभीत हैं जो कि ना तो खुद गाय पालते हें और ना ही गौ पालकों की व्याहवारिक दिक्कतों को समझते हैं। इलाहबाद, प्रतापगढ़ से ले कर जौनपुर तक के गांवों में देर रात लेागों के टार्च  चमकते दिखते हैं। इनकी असल चिंता वे लावरिस गोवंश होता है जो झुंड में खेतों में आते हैं व कुछ घंटे में किसान की महीनों की मेहनत उजाड़ देते हैं। जब से बूढे पशुओं को बेचने को ले कर उग्र राजनीति हो रही है, किसान अपने बेकार हो गए मवेश्यिों को नदी के किनारे ले जाता है, वहां उसकी पूजा की जाती है फिर उसके पीछे कुछ तीखा पदार्थ लगाया जाता है , जिसे मवेशी बेकाबू हो कर बेतहाश भागता है। यहां तक कि वह अपने घर का रासता भी भूल जाता हे। ऐसे सैंकड़ों मवेशी जब बड़े झंुड में आ जाते हें तो तबाही मचा देते हैं। भूखे, बेसहारा गौ वंश  के बेकाबू होने के चलते बुंदेलखंड में तो आए रोज झगड़े हो रहे हैं। ऐसी गायों का आतंक राजसथान, हरियाणा,मप्र, उप्र में इन दिनों चरम पर हे। कुछ गौशालाएं तो हैं लेकिन उनकी संख्या आवारा पशुओं की तुलना में नगण्य हैं और जो हें भी तो भयानक अव्यवस्था की शिकार , जिसे गायों का कब्रगाह कहा जा सकता हे।

देश के जिन इलाकांे मे सूखे ने दस्तक दे दी है और खेत सूखने के बाद किसानों व खेत-मजदूरों के परिवार पलायन कर गए हैं , वहां छुट्टा मवेशियों की तादात सबसे ज्यादा है। इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है। आए रोज गांव-गांव में कई-कई दिन से चारा ना मिलने या पानी ना मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होनें वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेषी मर रहे हैं। आने वाले गर्मी के दिन और भी बदतर होंगे क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा।
बुंदेलखंड की मषहूर ‘‘अन्ना प्रथा’’ यानी लोगों ने अपने मवेषियों को खुला छोड़ दिया हैं क्योंकि चारे व पानी की व्यवस्था वह नहीं कर सकते । सैकड़ों गायों ने अपना बसेरा सड़कों पर बना लिया। पिछले दिनों कोई पांचह जार अन्ना गायों का रेला हमीरपुर से महोबा जिले की सीमा में घुसा तो किसानों ने रास्ता जाम कर दिया। इन जानवरों को हमीरपुर जिले के राठ के बीएनबी कालेज के परिसर में घेरा गया था और योजना अनुसार पुलिस की अभिरक्षा में इन्हें रात में चुपके से महोबा जिले में खदेड़ना था। एक तरफ पुलिस, दूसरी तरफ सशस्त्र गांव वाले और बीच में हजारों गायें।  कई घंटे तनाव के बाद जब जिला प्रशसन ने इन गायों को जंगल में भेजने की बात मानी , तब तनाव कम हुआ। उधर बांदा जिले के कई गांवों में अन्ना पशुओं को ले कर हो रहे तनाव से निबटने के लिए प्रशासन ने  बेआसरा पशुओं को स्कूलों के परिसर में घेरना शुरू कर दिया हे। इससे वहां पढ़ाई चौपट हो गई ।  वहीं प्रशासन के पास इतना बजट नहीं है कि हजारों गायों के लिए हर दिन चारे-पानी की व्यवस्था की जाए। एक मोटा अनुमान है कि हर दिन प्रत्येक गांव में लगभग 10 से 100 तक मवेषी खाना-पानी के अभाव में दम तोड़ रहे
भूखेे -प्यासे जानवर हाईवे पर बैठ जाते हैं और इनमें से कई सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं और कई चारे और पानी के अभाव में कमजोर होकर मर रहे हैं। किसानों के लिए यह परेषानी का सबब बनी हुई हैं क्योंकि उनकी फसलों को मवेषियों का झुंड चट कर जाता है।


पिछले दो दशकों से मध्य भारत का अधिकांश हिस्सा तीन साल में एक बार अल्प वर्शा का षिकार रहा है। यहां से रोजगार के लिए पलायन की परंपरा भी एक सदी से ज्यादा पुरानी है, लेकिन दुधारू मवेषियों को मजबूरी में छुट्टा छोड़े देने का रोग अभी कुछ दषक से ही है। ‘‘ अन्ना प्रथा’’ यानि दूध ना देने वाले मवेषी को आवारा छोड़ देने के चलते यहां खेत व इंसान दोनेां पर संकट है। उरई, झांसी आदि जिलों में कई ऐसे किसान है। जिनके पास अपने जल ससांधन हैं लेकिन वे अन्ना पषुओं के कारण बुवाई नहीं कर पाए। जब फसल कुछ हरी होती है तो अचानक ही हजारों अन्ना गायों का रेवड़ आता है व फसल चट कर जाता है। यदि गाय को मारो तो धर्म-रक्षक खड़े हो जाते हैं और खदेड़ों तो बगल के खेत वाला बंदूक निकाल लेता है। गाय को बेच दो तो उसके व्यापारी को रास्ते मंे कहीं भी बजरंगियों द्वारा पिटाई का डर। दोनों ही हालात में खून बहता है और कुछ पैसे के लिए खेत बोने वाले किसान को पुलिस-कोतवाली के चक्क्र लगाने पड़ते हैं। यह बानगी है कि हिंदी पट्टी में तीन करोड़ से ज्यादा चौपाये किस तरह मुसीबत बन रहे हैं और साथ ही उनका पेट भरना भी मुसीबत बन गया है।

यहां जानना जरूरी है कि अभी चार दषक पहले तक हर गांव में चारागाह की जमीन होती थी। षायद ही कोई ऐसा गांव या मजरा होगा जहां कम से कम एक तालाब और कई कुंए नहीं हों। जंगल का फैलाव पचास फीीसदी तक था। आधुनिकता की आंधी में बह कर लोगों ने चारागाह को अपना ‘चारागाह’ बना लिया व हड़प गए। तालाबों की जमीन समतल कर या फिर घर की नाली व गंदगी उसमें गिरा कर उनका अस्तित्व ख्षतम कर दिया। हैंड पंप या ट्यूबवेल की मृगमरिचिका में कुओं को बिसरा दिया।  जंगलों की ऐसी कटाई हुई कि अब बुंदेलखंड में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी नहीं बची है व वन विभाग के डिपो ती सौ किलोमीटर दूर से लकड़ी मंगवा रहे हैं। जो कुछ जंगल बचे हैं वहां मवेषी के चरने पर रोक है। एक बात जान लें जब चरने की जहग कम होती है और मवेशी ज्यादा तो बंतरतीब चराई, जमीन को बंजर भी बनाती है। ठीक इसी तरह मवेािशयों के बउ़े झुंड द्वारा खेतों को बुरी तरह कुचलने से भी जमीन की उत्पादक मिट्टी का नुकसान होता है।

अभी बरसात बहुत दूर है।  जब सूखे का संकट चरम पर होगा तो लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राषि बांटी जाएगी, लेकिन देष व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पषु-धन को सहेजने के प्रति षायद ही किसी का ध्यान जाए। अभी तो औसत या  अल्प बारिष के चलते जमीन पर थोड़ी हरियाली है और कहीं-कहीं पानी भी, लेकिन अगली बारिष होने में अभी कम से कम तीन महीना हैं और इतने लंबे समय तक आधे पेट व प्यासे रह कर मवेषियों का जी पाना संभव नहीं होगा। बुंदेलखंड में जीवकोपार्जन का एकमात्र जरिया खेती ही है और मवेषी पालन इसका सहायक व्यवसाय। यह जान लें कि एक करोड़ से ज्यादा संख्या का पषु धन तैयार करने में कई साल व कई अरब की रकम लगेगी, लेकिन उनके चारा-पानी की व्यवस्था के लिए कुछ करोड़ ही काफी होंगें। हो सकता है कि इस पर भी कुछ कागजी घोड़े दौड़े लेकिन जब तक ऐसी योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी में संवेदनषील लोग नहीं होंगे, मवेषी का चारा इंसान के उदरस्थ ही होगा।

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

Assam is on boiling point for NRC

राजनीतिः असम क्यों सुलग रहा है

बांग्लादेश को छूती हमारी जमीनी और जल-सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसका फायदा उठाकर बांग्लादेश के लोग बेखौफ यहां आते रहे हैं। विडंबना यह है कि हमारी अदालत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी बांग्लादेशी घोषित कर देती है, लेकिन बांग्लादेश की सरकार यह कहकर उसे वापस लेने से इनकार कर देती है कि भारत के साथ उसका इस तरह का कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं है।


बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी का पहला प्रारूप आते ही सीमावर्ती राज्य असम में तनाव बढ़ गया है। सूची में घोषित आतंकी व लंबे समय से विदेश में रहे परेश बरुआ, अरुणोदय दहोटिया के नाम तो हैं लेकिन दो सांसदों व कई विधायकों के नाम इसमें नहीं हैं। अपना नाम देखने के लिए केंद्रों पर भीड़ है, तो वेबसाइट ठप हो गई। इस बीच सिलचर में एक व्यक्ति ने अपना नाम न होने के कारण आत्महत्या कर ली। हजारों मामले ऐसे हैं जहां परिवार के आधे लोगों को तो नागरिक माना गया और आधों को नहीं।
हालांकि प्रशासन कह रहा है कि यह पहला प्रारूप है और उसके बाद भी सूचियां आएंगी। फिर भी कोई दिक्कत हो तो प्राधिकरण में अपील की जा सकती है। यह सच है कि यह दुनिया का अपने आप में ऐसा पहला प्रयोग है जब साढ़े तीन करोड़ से अधिक लोगों की नागरिकता की जांच की जा रही है। लेकिन इसको लेकर कई दिनों से राज्य के सभी कामकाज ठप हैं। पूरे राज्य में सेना लगा दी गई है।
असम समझौते के पूरे अड़तीस साल बाद वहां से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की जो कवायद शुरू हुई, उसमें राज्य सरकार ने सांप्रदायिक तड़का दे दिया, जिससे भय, आशंकाओं और अविश्वास का माहौल है। असम के मूल निवासियों की कई दशकों से मांग है कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से घुसपैठ कर आए लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाए। इस मांग को लेकर आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की अगुआई में 1979 में एक अहिंसक आंदोलन शुरू हुआ था। आंदोलनकारियों पर पुलिसिया कार्रवाई के बाद हालात और बिगड़े। 1983 में हुए चुनावों का इस आंदोलन के नेताओं ने विरोध किया था।
चुनाव के बाद जमकर हिंसा शुरू हो गई। इस हिंसा का अंत तत्कालीन केंद्र सरकार के साथ 15 अगस्त 1985 को हुए एक समझौते (जिसे असम समझौता कहा जाता है) के साथ हुआ। इस समझौते के अनुसार, जनवरी 1966 से मार्च 1971 के बीच प्रदेश में आए लोगों को यहां रहने की इजाजत तो थी, लेकिन उन्हें आगामी दस साल तक वोट देने का अधिकार नहीं था। समझौते में केंद्र सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि 1971 के बाद राज्य में घुसे बांग्लादेशियों को वापस अपने देश जाना होगा। इसके बाद असम गण परिषद (जिसका गठन आसू के नेताओं ने किया था) की सरकार भी बनी। लेकिन इस समझौते को पूरे अड़तीस साल बीत गए हैं और बांग्लादेश व म्यांमा से अवैध घुसपैठ जारी है। यही नहीं, घुसपैठ करने वाले लोग बाकायदा भारतीय नागरिकता के दस्तावेज भी बनवा रहे हैं।
सन 2009 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी बनाने का काम शुरू हुआ तो जाहिर है कि अवैध घुसपैठियों में भय तो होगा ही। लेकिन असल तनाव तब शुरू हुआ जब राज्य-शासन ने नागरिकता कानून संशोधन विधेयक विधानसभा में पेश किया। इस कानून के तहत बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। यही नहीं, घुसपैठियों की पहचान का आधार वर्ष 1971 की जगह 2014 किया जा रहा है। जाहिर है, इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान करने का असल मकसद तो भटक ही जाएगा। हालांकि राज्य सरकार के सहयोगी दल असम गण परिषद ने इसे असम समझौते की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सरकार से अलग होने की धमकी भी दे दी है। हिरेन गोहार्इं, हरेकृष्ण डेका, इंदीबर देउरी, अखिल गोगोई जैसे हजारों सामाजिक कार्यकर्ता भी इसके विरोध में सड़कों पर हैं, लेकिन राज्य सरकार अपने कदम पीछे खींचने को राजी नहीं है।
बांग्लादेश को छूती हमारी 170 किलोमीटर की जमीनी और 92 किमी की जल-सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसका फायदा उठाकर बांग्लादेश के लोग बेखौफ यहां आते रहे हैं, बस जाते रहे हैं। विडंबना यह है कि हमारी अदालत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी बांग्लादेशी घोषित कर देती है, लेकिन बांग्लादेश की सरकार यह कहकर उसे वापस लेने से इनकार कर देती है कि भारत के साथ उसका इस तरह का कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं है। असम में बाहरी घुसपैठ एक सदी से अधिक पुरानी समस्या है। सन 1901 से 1941 के बीच भारत (अविभाजित) की आबादी में वृद्धि की दर जहां 33.67 प्रतिशत थी, वहीं असम में यह दर 103.51 फीसद दर्ज की गई थी। सन 1921 में विदेशी सेना द्वारा गोलपाड़ा पर कब्जा करने के बाद ही असम के कामरूप, दरांग, शिवसागर जिलों में म्यांमा व अन्य देशों से लोगों का आना शुरू हो गया था। सन 1931 की जनगणना में साफ लिखा था कि आगामी तीस सालों में असम में केवल शिवसागर ऐसा जिला होगा, जहां बहुसंख्यक आबादी असम मूल की होगी।
असम में विदेशियों के शरणार्थी बन कर आने को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है- 1971 की लड़ाई या बांग्लादेश बनने से पहले और उसके बाद। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 से 1971 के बीच 37 लाख 57 हजार बांग्लादेशी, जिनमें अधिकतर मुसलमान थे, अवैध रूप से असम में घुसे व यहीं बस गए। सन 1970 के आसपास अवैध शरणार्थियों को भगाने के कुछ कदम उठाए गए तो राज्य के तैंतीत मुसलिम विधायकों ने देवकांत बरुआ की अगुआई में तत्कालीन मुख्यमंत्री विमल प्रसाद चालिहा के खिलाफ ही आवाज उठा दी। उसके बाद कभी किसी भी सरकार ने इतने बड़े वोट-बैंक पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटाई। शुरू में कहा गया कि असम में ऐसी जमीन बहुत-सी है जिस पर खेती नहीं होती है, और ये घुसपैठिये इस पर हल चला कर हमारे ही देश का भला कर रहे हैं।
लेकिन आज हालात इतने बदतर हैं कि काजीरंगा नेशनल पार्क को छूते कई सौ किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर केवल झुग्गियां दिखती हैं, जिनमें ये बिन बुलाए मेहमान डेरा डाले हुए हैं। इनके कारण राज्य में संसाधनों का टोटा तो पड़ ही रहा है, वहां की पारंपरिक संस्कृति, संगीत, लोकाचार, सभी कुछ प्रभावित हो रहा है। हालात इतने खराब हैं कि कोई आठ साल पहले राज्य के राज्यपाल व पूर्व सैन्य अधिकारी रहे ले.ज. एसके सिन्हा ने राष्ट्रपति को भेजी एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि राज्य में बांग्लादेशियों की इतनी बड़ी संख्या बसी है कि उसकी छानबीन करने व फिर वापस भेजने के लायक हमारे पास मशीनरी नहीं है।
एनआरसी के पहले मसौदे के कारण लोगों में बैचेनी की बानगी केवल एक जिले नवगांव के आंकड़ों से भांपी जा सकती है। यहां कुल 20,64,124 लोगों ने खुद को भारत का नागरिक बताने वाले दस्तावेज जमा किए थे। लेकिन पहली सूची में केवल 9,11,604 लोगों के नाम शामिल हैं। यानी कुल आवेदन के 55.84 प्रतिशत लोगों की नागरिकता फिलहाल संदिग्ध है। राज्य में 1.9 करोड़ लोग ही पहली सूची में हैं जबकि नागरिकता का दावा करने वाले 1.39 करोड़ लोगों के नाम नदारद हैं। ऐसी हालत कई जिलों की है। इनमें सैकड़ों लोग तो ऐसे भी हैं जो सेना या पुलिस में तीस साल नौकरी कर सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उन्हें इस सूची में नागरिकता के काबिल नहीं माना गया। भले ही राज्य सरकार संयम रखने व अगली सूची में नाम होने का वास्ता दे रही हो, लेकिन राज्य में बेहद तनाव और अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे में कुछ लोग अफवाहें फैला कर भी माहौल खराब कर रहे हैं।

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

sea line can prevent fishermen from jail

समुद्री  सीमा निर्धारित हो तो मछुआरों की जिंदगी बचे
पंकज चतुर्वेदी


हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के 145 मछुआरे रिहा किए, 08 जनवरी को 146 और को रिहा करेगा। उधर बीते एक महीने के दौरान पाकिस्तान ने हमारे 55 मछुआरों को समु्रद से सीमा पार करने के आरोप में पकड़ लिया। पूर्व सेना अधिकारी कुलभूषण  जाधव और उससे पहले सरबजीत की रिहाई, बेगुनाही पर तो सारी संसद, नेता, देश बोल रहा है, लेकिन सालों से दोनों तरफ के मुछआरों के गलती से सीमा पार करने पर पकड़े जाने और उन्नहे लंबे समय तक जेल में रहने पर कोई आवाज नहीं उठती। कुछ महीने पहले ही गुजरात का एक मछुआरा दरिया में तो गया था मछली पकड़ने, लेकिन लौटा तो उसके श्रीर पर गोलियां छिदी हुई थीं। उसे पाकिस्तान की समुद्री पुलिस ने गोलियां मारी थीं। ‘‘इब्राहीम हैदरी(कराची)का हनीफ जब पकड़ा गया था तो महज 16 साल का था, आज जब वह 23 साल बाद घर लौटा तो पीढ़ियां बदल गईं, उसकी भी उमर ढल गई। इसी गांव का हैदर अपने घर तो लौट आया, लेकिन वह अपने पिंड की जुबान ‘‘सिंधी’’ लगभग भूल चुका है, उसकी जगह वह हिंदी या गुजराती बोलता है। उसके अपने साथ के कई लोगों का इंतकाल हो गया और उसके आसपास अब नाती-पोते घूम रहे हैं जो पूछते हैं कि यह इंसान कौन है।’’
दोनों तरफ लगभग एक से किस्से हैं, दर्द हैं- गलती से नाव उस तरफ चली गई, उन्हें घुसपैठिया या जासूस बता दिया गया, सजा पूरी होने के बाद भी रिहाई नहीं, जेल का नारकीय जीवन, साथ के कैदियों द्वारा श्क से देखना, अधूरा पेट भोजन, मछली पकड़ने से तौबा....। पानी पर लकीरें खींचना नामुमकिन है, लेकिन कुछ लोग चाहते हैं कि हवा, पानी, भावनाएं सबकुछ बांट दिया जाए। एक दूसरे देश के मछुआरों को पकड़ कर वाहवाही लूटने का यह सिलसिला ना जाने कैसे सन 1987 में शुरू  हुआ और तब से तुमने मेरे इतने पकड़े तो मैं भी तुम्हारे उससे ज्यादा पकडूंगा की तर्ज पर समुद्र में इंसानों का शिकार होने लगा।
भारत और पाकिस्तान में साझा अरब सागर के किनारे रहने वाले कोई 70 लाख परिवार सदियों से समुद्र  से निकलने वाली मछलियों से अपना पेट पालते आए हैं। जैसे कि मछली को पता नहीं कि वह किस मुल्क की सीमा में घुस रही है, वैसे ही भारत और पाकिस्तान की सरकारें भी तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर समुद्र  के असीम जल पर कैसे सीमा खींची जाए।  कच्छ के रन के पास सर क्रीक विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है। असल में वहां पानी से हुए कटाव की जमीन को नापना लगभग असंभव है क्योंकि पानी से आए रोज जमीन कट रही है और वहां का भूगोल बदल रहा है।  देानेां मुल्कों के बीच की कथित सीमा कोई 60 मील यानि लगभग 100 किलोमीटर में विस्तारित है। कई बार तूफान आ जाते हैं तो कई बार मछुआरों को अंदाज नहीं रहता कि वे किस दिशा में जा रहे हैं, परिणामस्वरूप वे एक दूसरे के सीमाई बलों द्वारा पकड़े जाते हैं। कई बार तो इनकी मौत भी हो जाती है व घर तक उसकी खबर नहीं पहुंचती।
जब से षहरी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही बढ़ी है तब से गोदी के कई-कई किलोमीटर तक तेल रिसने ,षहरी सीवर डालने व अन्य प्रदूशणों के कारण समु्रदी जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए बस्तियों, आबादियों और बंदरगाहों से काफी दूर निकलना पड़ता है। जो खुले समु्रद में आए तो वहां सीमाओं को तलाशना लगभग असंभव होता है और वहीं देानेां देशों के बीच के कटु संबंध, षक और साजिशों की संभावनाओं के शिकार मछुआरे हो जाते है।। जब उन्हें पकड़ा जाता है तो सबसे पहले सीमा की पहरेदारी करने वाला तटरक्षक बल अपने तरीके से पूछताछ व जामा तलाशी करता है। चूंकि इस तरह पकड़ लिए  गए लोगों को वापिस भेजना सरल नहीं है, सो इन्हें स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है। इन गरीब मछुआरों के पास पैसा-कौडी तो होता नहीं, सो ये ‘‘गुड वर्क’’ के निवाले बन जाते हैं। घुसपैठिये, जासूस, खबरी जैसे मुकदमें उन पर होते हैं। वे दूसरे तरफ की बोली-भाशा भी नहीं जानते, सो अदालत में क्या हो रहा है, उससे बेखबर होते हैं। कई बार इसी का फायदा उठा कर प्रोसिक्यूशन उनसे जज के सामने हां कहलवा देता है और वे अनजाने में ही देशद्रोह जैसे अरोप में पदोश बन जाते हैं। कई-कई सालों बाद उनके खत  अपनों के पास पहुंचते हैं। फिर लिखा-पढ़ी का दौर चलता है।
सालों-दशकों बीत जाते हैं और जब दोनों देशेां की सरकारें एक-दूसरे के प्रति कुछ सदेच्छा दिखाना चाहती हैं तो कुछ मछुआरों को रिहा कर दिया जाता है। पदो महीने पहले रिहा हुए पाकिस्तान के मछुआरों के एक समूह में एक आठ साल का बच्चा अपने बाप के साथ रिहा नहीं हो पाया क्योंकि उसके कागज पूरे नहीं थे। वह बच्चा आज भी जामनगर की बच्चा जेल में है। ऐसे ही हाल ही में पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए 163 भारतीय मछुआरों के दल में एक दस साल का बच्चा भी है जिसने सौंगध खा ली कि वह भूखा मर जाएगा, लेकिन मछली पकड़ने को अपना व्यवसाय नहीं बनाएगा।
एक बात और यह विवाद केवल पाकिस्तान सीमा पर ही नहीं है, तमिलनाडु के मछुआरे अक्सर श्रीलंका के जल और फिर  जेल में फंसते हैं, बांग्लादेश के साथ भी ऐसा ही होता है । तमिलनाउु में मछुआरों के लिए सभी राजनीतिक दल सक्रिय रहते हैं, बांग्लादेश सीमा पर ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन पाकिस्तान-भारत के आपसी कटु रिश्तों का सबसे ज्यादा खामियाजा इन निरीह मछुआरों को ही झेलना पड़ता है।
यहां जानना जरूरी है कि दोनेां देशों के बीच सर क्रीक वाला सीमा विवाद भले ही ना सुलझे, लेकिन मछुआरों को इस जिल्ल्त से छुटकारा दिलाना कठिन नहीं है। एमआरडीसी यानि मेरीटाईम रिस्क रिडक्शन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देश का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तुओं जैसे- हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना 24 घंटे में ही दूसरे देश को देना, दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायत मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। वैसे संयुक्त राश्ट्र के समु्रदी सीमाई विवाद के कानूनों यूएनसीएलओ में वे सभी प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उनके दिल से पालन करने की है। कसाब वाले मुंबई हमले व अन्य कुछ घटनाओं के बाद समुद्र के रास्तों पर संदेह होना लाजिमी है, लेकिन मछुआरों व घुसपैठियों में अंतर करना इतना भी कठिन नहीं है जितना जटिल एक दूसरे देश के जेल में समय काटना है।



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

Who is afraid of powerful TALAB VIKAS PRADHIKARAN

कहां गुम हो गया तालाब विकास प्राधिकरण का सपना 

पंकज चतुर्वेदी 
उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन और भाजपा को विशाल बहुमत मिलने के अलग-अलग लोगों अपने-अपने सरोकार बहुत हैं, लेकिन जल-जंगल जमीन से प्रेम करने वालों को एक उम्मीद बंधी थी कि अब राज्य के उपेक्षित, पारंपरिक और समृद्ध तालाबों के दिन बहुरेंगें। कब्जों, गंदगी और जल-हीनता के शिकार हजारों तालाबों का स्वामी प्रदेश पेय-जल व सिंचाई संकट का सबसे अधिक प्रभावित रहा है। यदि षासन संभालने वाले दल ने अपने चुनाव के संकल्प पत्र पर ईमानदारी से काम किया तो यहां सशक्त ‘तालाब विकास प्राधिकरण’ का गठन होगा, जोकि राज्यभर के तालाबों को एक छतरी के नीचे ला कर उनको संपन्न व समृद्ध करेगा।  योगी सरकार के पहले सौ दिनों के प्राथमिकता वाली सूची में प्राधिकरण गठन की बात भी थी। शपथ समारोह के कोई बीस दिन बाद ही मेंरे पास राज्य के सिंचाई महकमे के एक आला अफसर ने प्राधिकरण की संभावित रूपरेखा व यासेच के बारे में जानने को फोन भी किया। उन्हें ईमेल पर इसका खाका भेजा गया। उसके बाद कुछ कुछ फाईलें भी दौड़ीं जाहिर है कि ऐसे लोग भी सक्रिय होंगे जिन्होने तालाब सुखा कर कालेानी काट लीं या खेत बना लिए । सो, अब एक सशक्त प्राधिकरण की मांग एक सपना ही प्रतीत होती है।
यह सच्चाई है कि साल-दर-साल बढ़ती आबादी का कंठ तर करने और उसका पेट भरने के लिए अन्न उगाने के लिए पानी की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं जलवायु परिवर्तन के चलते बरसात कर  हो रही है, साथ ही जल स्त्रोतों को ढंक कर उसकी जमीन पर मॉल-सड़क बनाने की प्रवृति में भी इजाफा हुआ हे। तीन दशक पहले सरकार ने पानी की कमी को पूरा करने के लिए भूजल पर जोर दिया, लेकिन वहां भी इतना उत्खनन हो गया कि पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में बंजर जमीन का खतरा पैदा हो गया। गंगा-यमुना जैसी नदियों के स्वामी उप्र को जगह’जगह बंध रहंे बांध और प्रदूशण के चलते सर्वाधिक जल-हानि झेलना पड़ा हे। संकट अकेले पानी की कमी का नहीं, असल विकराल समस्या, धरती के लगातार गरम होने और उसे षीतल रखने में कारगर तालाबों, जलाशयों के नश्ट होने का है। उप्र की राजधानी लख्नउ में अभी एक दशक पहले तक 12,653 ताालाब-पोखर-बावड़ी-कुएं हुआ करते थे।

सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि इनमें से चार हजार को भूमाफिया ने पाट कर बहमंजिला इमारतें खड़ी कर दी हैं, जबकि 2023 पर अभी भी अवैध कब्जे हैं। ऐसे ही इलाहबाद में तेरह हजार, आजमगढ में 10,535, गोरखपुर में 3971 कानुपर में 377, सहारनपुर में 6858, मेरठ 1853 आगरा में 591, बनारस में 1611 जल निधियों को मटियामेट करने के आंकड़े सरकारी फाईलो ंमें दर्ज हैं। बंुदेलखंड तो अपने पारंपरिक तालबों के लिए मशहूर था। सबसे अधिक प्यास, पलायन व मुफलिसिी के लिए बदनाम हो गए, बुंदेलखंड के हर गांव में कई-कई तालाब होते थे। आज यहां का कोई भी षहर, कस्बा ऐसा नहीं है जो पानी की कमी से बेहाल ना हो और उसका विस्तार तालाबों के कब्रिस्तान पर ना हुआ हो। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर और बरेली जिलों में आजादी के समय लगभग 182 तालाब हुआ करते थे। उनमें से अब महज 20 से 30 तालाब ही बचे हैं। जो बचे हैं, उनमें पानी की मात्रा न के बराबर है।


पिछले साल ही उत्तर प्रदेश के इटावा की नगर पालिका ने वहां के एक पुराने तालाब को सुंदर बनाने के नाम पर उसके संकरा कर रंगीन नीली टाईल्स लगाने की योजना पर काम षुरू किया है। हो सकता है कि उससे कुछ दिनों शहर में रौनक आ जाए, लेकिन ना तो उसमें पानी एकत्र होगा और ना ही वहां एकत्र पानी से जमीन की प्यास बुझेगी। यह भी तय है कि ऐसे तालाब में बाहर से पानी भरना होगा। ऐसा ही पूरे देश के सरोवरों के साथ लगातार हो रहा है - तालाब के जलग्रहण व निकासी क्षेत्र में पक्के निर्माण कर उसका आमाप समेट दिया जाता है, सौंदर्यीकरण के नाम पर पानी के बीच में कोई मंदिर किस्म की स्थाई आकृति बना दी गई व इसकी आड़ में आसपास की जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर दिया गया। बलिया का सुरहा ताल तो बहुत मशहूर है, लेकिन इसी जिले का एक कस्बे का नाम रत्सड़ इसमें मौजूद सैंकड़ों निजी तालाबों के कारण पड़ा था, सर यानि सरोवर से ‘सड़’ हुआ।  कहते हैं कि कुछ दशक पहले तक वहां हर घर का एक तालाब था, लेकिन जैसे ही कस्बे को आधुनिकता की हवा लगी व घरों में नल लगे, फिर गुसलखाने आए, नालियां आई, इन तालाबों को गंदगी डालने का नाबदान बना दिया गया। फिर तालाबों से बदबू आई तो उन्हें ढंक कर नई कालेानियां या दुकानंे बनाने का बहाना तलाश लिया गया।
यह दुखद है कि आधुकिनता की आंधी में तालाब को सरकार भाशा में ‘‘जल संसाधन‘‘ माना नहींे जाता है , वहीं समाज और सरकार ने उसे जमीन का संसाधन मान लिया। देशभर के  तालाब अलग-अलग महकमोे में बंटे हुए हैं। मछली विभाग, सिंचाई, वन, स्थानीय प्रशासन आदि। जब जिसे सड़क, कालोनी, मॉल, जिसके लिए भी जमीन की जरूरत हुई, तालाब को पुरा व समतल बना लिया। आज षहरों में आ रही बाढ़ हो या फिर पानी का संकट सभी के पीछे तालाबों की बेपरवाही ही मूल कारण है। इसके बावजूद पारंपरिक तालाबों को सहेजने की कोई साझी योजना नहीं है।
यह देश के किसी राज्य में पहली बार होना था जब किसी सरकार ने लगभग 74 साल पुरानी एक ऐसी रपट को गंभीरता से अमल करने की सोचेगी जो कि सन 1943 के भयंकर बंगाल दुर्भिक्ष में तीन लाख से ज्यादा मौत होने के बाद ब्रितानी सरकार द्वारा गठित एक आयोग की सिफारिशों में थी। सन 1944 में आई अकाल जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत जैसे देश में नहरों से सिंचाई के बनिस्पत तालाब खोदने व उनके रखरखाव की ज्यादा जरूरत है। सन 1943 में ‘ग्रो मोर कैंपेन’ चलाया गया था जोकि बाद में देश की पहली पंचवर्शीय योजना का हिस्सा बना, उसमें भी लघु सिंचाई परियोजनाओं यानि तालाबों की बात कही गई थी।  उसके बाद भी कई-कई योजनाएं बनीं, मप्र जैसे राज्य में ‘‘सरोवर हमारी धरोहर’’ जैसे अभियान चले, लेकिन जब आंकड़ों पर गौर करें तो दिल्ली हो या बंगलूरू या फिफर छतरपुर या लखनउ, सभी जगह विकास के लिए रोपी गई कालेानियां, सड़कांे,, कारखानों, फ्लाई ओवरों को तालाब को समाप्त कर ही बनाया गया। तालाब विकास प्राधिकरण इसी लिए आवश्यक है कि वह पहले राज्य के सभी तालाब, पोखरों का सर्वेक्षण कर उनके आंकड़े तो ईमानदारी से एकत्र करे, जिसमें बच गए जल संसाधन, कब्जा किए गए इलाकों , उपलब्ध तालाबों की मरम्मत, उससे जुड़े अदालती पचड़ों के निबटारे जैसे मसलों पर अधिकार संपन्न संस्था के रूप में निर्णायक हो।
 पहले बताया गया था कि राज्य सरकार की प्राथमिकता सिंचाई संसाधन विकसित करने की है और इसके तहत तालाब प्राधिकरण का गठन महत्वपूर्ण कदम होगा। परंतु अब कहीं सुगबुगाहट है जिसमें मौजूदा तालबों के सौंदर्यीकरण या क्षमता विकसित करने के लिए किसी संस्था को बनाने की बात है। लेकिन इसमें तालाब अलग-अलग महकमों के मालिकाना हक और उद्देश्यों में अटके रहेंगे। तालाबों पर कब्जे के मुकदमें वैसे ही दीवानी अदालतों में दशकांें तक चलते रहेंगें।
काश उप्र सरकार अपने मूल इरादे पर गंभीर होती तो देश के अन्य राज्यों में भी जल संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओ के लिए यह एक नजीर होगा। यदि जल संकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर्र इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है । एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए । इस पूर कार्य का संचालन तालाब प्राधिकरण के अंतर्गत हो। जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में ‘‘अपनी जड़ों को लौटने’’ की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी ।




मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

Beware of drought

सावधान ! देश भयंकर सूखे की ओर बढ रहा है 

.पंकज चतुर्वेदी


देश के बड़े राज्यों मेें से एक मध्यप्रदेश के कुल 51 में से 29 जिलों में अभी से जल-संकट के हालात हैं। राजधानी भोपाल की प्यास बुझाने वाले बड़े तालाब व कोलार में बामुश्किल चार महीने का जल षेश है। ग्वालियर के तिघरा डेम का जल जनवरी तक ही चल पाएगा। विदिशा में नल रीते हैं और सुबह-शाम मुहल्लों के हैंडपंपों पर लंबी-लंबी कतारें दिखती हैं। फिलहाल नौ जिलों को सूखा-ग्रस्त घोशित करने की तैयारी है क्योंकि अल्प वर्शा और उसके बाद असामयिक बरसात ने किसानों की कंगाली  में आटा गिला कर दिया है - या तो बुवाई ही नहीं हुई और हुई तो बैमौसम बरसने से बीज मर गए।
नवरात्रि के विदा होते ही बादल व बारिश भी विदा हो जाते है। यदि बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में आई बीते एक दशक की सबसे भयावह बाढ़ को अलग रख दे ंतो भारतीय मौसम विभाग का यह दावा देश के लिए चेतावनी देने वाला है कि पिछले साल की तुलना में इस साल देश के 59 फीसदी हिस्से में कम बारिश हुई है। आंकड़ों के अनुसार, देश के 630 जिलों में से 233 में औसत से कम बारिश हुई है। इससे देश में सूखे का संकट खड़ा हो गया है। जून से सितंबर के मानसून सीजन में करीब 6 फीसदी कम बारिश हुई। अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा । देश में कृषि ज्यादातर हिस्सों में मानसून पर निर्भर करती है। ऐसे में कम बारिश होने से खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होगा और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में जीडीपी 5.7 फीसदी रही जबकि पिछले साल इसी दौरान जीडीपी 7.9 फीसदी थी। 2014 में एनडीए के केंद्र की सत्ता में आने के बाद इस वित्त वर्ष में जीडीपी अपने सबसे निचले स्तर है। फसल वर्ष 2017-18 में (जुलाई-जून) में 273 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा।
अगली बरसात के लिए कम से कमपांच महीने का इंतजार करना होगा। अभी से ही भारत का बड़ा हिस्सा सूखे, पानी की कमी और पलायन से जूझ जा रहा है। उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, उत्त्राचंल, पश्चिमी उप्र, मप्र, उड़िसा, समूचा पूर्वोत्तर, केरल से ले कर अंडमान तक देश के बड़े हिस्से में सामान्य से आठ से ले कर 36 प्रतिशत कम बरसात हुई है। बुंदेलखंड में तो सैंकड़ों गांव वीरान होने षुरू भी हो गए हैं। यहां या तो बुवाई हुई नहीं, हुई तो बीज बगैर बरसात के ही जमीन में मर गया। एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जल संचयन स्थलों(जलाशयों) में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। सवाल उठता है कि हमारा विज्ञान मंगल पर तो पानी खोज रहा है लेकिन जब कायनात छप्पर फाड़ कर पानी देती है उसे सारे साल सहेज कर रखने की तकनीक नहीं। आम लेाग जल-संकट से बेखबर हैं और उन्होंने पहले गणपति और उसके बाद दुर्गा की लाखें-लाख प्रतिमांए जल भंडारों में विसर्जन कर ना क ेवल जल को दूशित किया, वरन उसकी बड़ी मात्रा का भी क्षय कर दिया।  ना कोई धार्मिक और ना ही सामाजिक और ना ही सरकार ने यह जगरूकता फैलाई  िकइस बार जल संकट है, प्रतिमाओं को जल में ना डालें।
हालांकि हम अभागे हैं कि हमने अपने पुरखों से मिली ऐसे सभी ज्ञान को खुद ही बिसरा दिया। जरा गौर करें कि यदि पानी की कमी से लोग पलायन करते तो हमारे राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके तो कभी के वीरान हो जाने चाहिए थे, लेकिन वहां रंग, लेाक, स्वाद, मस्ती, पर्व सभी कुछ है। क्योंकि वहां के पुश्तैनी बाशिंदे कम पानी से बेहतर जीवन जीना जानते थे। यह आम अदमी भी देख सकता है कि जब एक महीने की बारिश में हमारे भंडार पूरे भर कर झलकने लगे तो यदि इससे ज्यादा पानी बरसा तो वह बर्बाद ही होगा। फिर भी वर्शा के दिनों में पानी ना बरसे तो लोक व सरकार दोनों ही चिंतित हो जाते है।
यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘‘औसत से कम’’ पानी बरसा या बरसेगा, अब क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की कोई दो करोड़ हेक्टर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्राहि-त्राहि  करती है। हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 क्षेत्रफल है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। हां, एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल सालों-साल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी मांगने वाले सोयाबीन व अन्य केश क्राप ने खेतों में अपना स्थान बढ़ाया है। इसके चलते बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थेाड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है। अब गंगा-यमुना के दोआब के पश्चिमी उ.प्र को ही लें, ना तो यहां के लेागों का भेाजन धान था और ना ही यहां की फसल। लेकिन ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में सबने धान बो कर जमीन बर्बाद की और आदत बिगड़ी सो अलग।
देश के उत्तरी हिस्से में नदियो में पानी  का अस्सी फीसदी जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में  यह आंकडा 90 प्रतिशत का है। जाहिर है कि षेश आठ महीनों में पानी की जुगाड़ ना तो बारिश से होती है और ना ही नदियों से।
असल में हमने पानी को ले कर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुंए से रस्सी डाल कर पानी खंीचना ोता था या चापाकल चला कर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल उलींचा जाता था। घर में टोंटी वाले नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूब वेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलवा डालने, कूडा मिलाने जैसी गतिविधियों से बच कर, पारंपरिक जल स्त्रोतों- तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है । अब कस्बाई लोग बीस रूपए में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव मं कई बार षौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है।
सूखे के कारण जमीन के कड़े होने, या बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभरते है। यहां जानना जरूरी है कि भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो कि दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम हमारे यहां बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जा कर मिल जाता है और बेकार हो जाता है। गुजरात के जूनागढ, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुरू खुद ही सीखा। विछियावाडा गांव के लेागों ने डेढ लाख व कुछ दिन की मेहनत के साथ 12 रोक बांध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नल कूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्यप्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें तो कर्नाटक से ले कर असम तक और बिहार से ले कर बस्तर तक ऐसे हजारों हजार सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लेागो ने सुखाड़ को मात दी है। तो ऐसे छोटे प्रयास पूरे देश में करने में कहीं कोई दिक्क्त तो होना नहीं चाहिए।
कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक तो हर साल, हर महीने इस बात के लिए तैयारी करना होगा कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्शा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जिलाना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास है जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

paramilitary forces require tension free duty hours

तनावमुक्त रहना होगा इन्हें


पंकज चतुर्वेदी 
09 दिसम्बर 2017 को बस्तर के बीजापुर जिले के बासागुड़ा के सीआरपीएफ कैंप में संतलाल नामक सिपाही ने अपनी सरकारी इंसास राइफल से अपने ही चार साथियों को गोलियां से भून दिया। इस साल केवल बस्तर में केंद्रीय बलों के 40 जवान या तो आत्महत्या या फिर अपने ही साथियों द्वारा चलाई गई गोलियों से मारे जा चुके हैं। गत एक दशक में बस्तर में 115 जवान ऐसी घटनाओं में मारे गए। कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोई भी जवान ऐसे कदम बेहद तनाव या असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो कर उठाता है। आखिर वे दवाब में क्यों न हों?जानकर दुख होगा कि नक्सली इलाके में सेवा दे रहे जवनों की मलेरिया जैसी बीमारी का आंकड़ा उनके लड़ते हुए शहीद होने से कहीं ज्यादा होता है। हालांकि अभी सरकार ने बस्तर जैसे स्थानों पर बेहद विषम हालात में सेवाएं दे रहे अर्धसैनिकों को तनावमुक्त रखने के लिए ‘‘म्यूजिक थेरेपी’ यानी संगीत के इस्तेमाल का प्रयेग करना शुरू किया है, लेकिन अभी इसका लाभ आम जवान तक पहुंचता नहीं दिख रहा है। ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने कोई दस साल पहले एक जांच दल बनाया था, जिसकी रिपोर्ट जून-2004 में आई थी। इसमें घटिया सामाजिक परिवेश, प्रमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, तनावग्रस्त कार्य, पर्यावरणीय बदलाव, वेतन-सुविधाएं जैसे मसलों पर कई सिफारिशें की गई थीं। इनमें संगठन स्तर पर 37 सिफारिशें, निजी स्तर पर आठ और सरकारी स्तर पर तीन सिफारिशें थीं। इनमें छुट्टी देने की नीति में सुधार, जवानों से नियमित वार्तालाप, शिकायत निवारण को मजबूत बनाना, मनोरंजन व खेल के अवसर उपलब्ध करवाने जैसे सुझाव थे। इन पर कागजी अमल भी हुआ, लेकिन जैसे-जैसे देश में उपद्रवग्रस्त इलाका बढ़ता जा रहा है, अर्धसैनिक बलों व फौज के काम का दायरे में विस्तार हो रहा है। ड्यूटी की अधिकता में उस समिति की सिफारिशें जमीनी हकीकत बन नहीं पाई। यह एक कड़वा सच है कि हर साल दंगा, नक्सलवाद, अलगाववादियों, बाढ़ और ऐसी ही विकट परिस्थितियों में संघर्ष करने वाले इस बल के लोग मैदान में लड़ते हुए मरने से कहीं ज्यादा गंभीर बीमारियों से मर जाते हैं। यह बानगी है कि जिन लोगों पर हम मरने के बाद नारे लुटाने का काम करते हैं, उनकी नौकरी की शत्रे किस तरह असहनीय, नाकाफी और जोखिम भरी हैं। संसद के पिछले सत्र में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने बताया था कि पिछले साल सीआरपीएफ के 92 जवान नौकरी करते हुए हार्ट अटैक से मर गए, वहीं डेंगू या मलेरिया से मरने वालों की संख्या पांच थी। 26 जवान अवसाद या आत्महत्या के चलते मारे गए तो 353 अन्य बीमारियों की चपेट में असामयिक कालगति को प्राप्त हुए। वर्ष 2015 में दिल के दौरे से 82, मलेरिया से 13 और अवसाद से 26 जवान मारे गए। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी-2009 से दिसम्बर-2014 के बीच नक्सलियों से जूझते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस यानी सीआरपीएफ के कुल 323 जवान देश के काम आए। वहीं इस अवधि में 642 सीआरपीएफ कर्मी दिल का दौरा पड़ने से मर गए। आत्महत्या करने वालों की संख्या 228 है। वहीं मलेरिया से मरने वालों का आंकड़ा भी 100 से पार है। अपने ही साथी या अफसर को गोली मार देने के मामले भी आए रोज सामने आ रहे हैं। कुल मिला कर सीआरपीएफ दुश्मन से नहीं खुद से ही जूझ रही है। हाल ही में बुरकापाल के पास हुए संहार को ही लें, यहां गत चार साल से सड़क बन रही है और महज सड़क बनाने के लिए सीआरपीएफ की दैनिक ड्यूटी लगाई जा रही थी। सीआरपीएफ की रपट में यह माना गया है कि लंबे समय तक तनाव, असरुक्षा व एकांत के माहौल ने जवानों में दिल के रोग बढ़ाए हैं। वहीं घरवालों का सुख-दुख न जान पाने का दर्द भी उनको भीतर-ही-भीतर तोड़ता रहता है। तिस पर वहां मनोरंजन के कोई साधन हैं नहीं और न ही जवान के पास उसके लिए समय है। यह भी चिंता का विषय है कि सीआरपीएफ व अन्य सुरक्षा बलों में नौकरी छोड़ने वालों की संख्या में 450 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। साफ दिख रहा है कि जवानों के काम करने के हालात सुधारे बगैर बस्तर के सामने आने वाली चुनौतियों से निबटना कठिन होता जा रहा है। नियमित अवकाश, अफसर से बेहतर संवाद, सुदूर नियुक्त जवान के परिवार की स्थानीय परेशानियों के निराकरण के लिए स्थानीय प्रशासन की तत्परता, मनोरजंन के अवसर, पानी, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं को पूरा करना ऐसे कदम हैं, जो जवानों में अनुशासन व कार्य प्रतिबद्धता, दोनों को बनाए रख सकते हैं। 



सोमवार, 25 दिसंबर 2017

Only slogans can not clean the rivers


नदियां साफ करने के नाम पर नारेबाजी

जीवनदायी नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां अभी तक महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं

पंकज चतुर्वेदी



हाल में नियंत्रक-महालेखा परीक्षक यानी कैग की रिपोर्ट से पता चला कि गंगा सफाई की परियोजना ‘नमामि गंगे’ के तहत बजट राशि खर्च ही नहीं हो पाई है। अब तक गंगा की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन न तो गंगा में पानी की मात्र बढ़ी और न ही उसका प्रदूषण घटा। यह हाल केवल गंगा का ही नहीं है। अन्य नदियों को स्वच्छ करने के अभियान भी कागजी साबित हो रहे हैं। वे नारेबाजी और बजट को ठिकाने लगाने तक अधिक सीमित हैं। लखनऊ में गोमती पर छह सौ करोड़ खर्च किए गए, लेकिन हालत जस की तस है। कई सौ करोड़ खर्च हो जाने के बाद यमुना भी दिल्ली से आगे मथुरा-आगरा तक नाले की तरह है। सभी जानते हैं कि इंसान के पीने और साथ ही खेती-मवेशी के लिए अनिवार्य मीठे जल का सबसे बड़ा जरिया नदियां ही हैं। जहां-जहां से नदियां निकलीं, वहां-वहां बस्तियां बसती गईं और इस तरह विविध संस्कृतियों का भारत बसता चला गया। समय के साथ नदियां पवित्र मानी जाने लगीं-केवल इसलिए नहीं कि उनसे जीवनदायी जल मिल रहा था, इसलिए भी कि उनकी छत्र-छाया में मानव सभ्यता पुष्पित पल्लवित होती रहीं। गंगा और यमुना को भारत की अस्मिता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन विडंबना है कि विकास की बुलंदियों की ओर बढ़ते देश में अमृत बांटने वाली नदियां आज खुद जहर पीने को अभिशप्त हैं। नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। सरकार में बैठे लेाग खुद ही नदियों में गिरने वाले औद्योगिक प्रदूषण की सीमा में जब विस्तार करेंगे तो यह उम्मीद रखना बेमानी है कि वे जल्द ही निर्मल होंगी। 1हमारी नदियां कई तरह के हमले ङोल रही हैं। उनमें पानी कम हो रहा है, वे उथली हो रही हैं और उनसे रेत निकाल कर उनका मार्ग भी बदला जा रहा है। नदियों के किनारे पर हो रही खेती से बह कर आ रहे रासायनिक पदार्थ और कल-कारखानों के साथ घरेलू गंदगी भी नदियों में जा रही है। नदी केवल एक जल मार्ग नहीं होती। जल के साथ उसमें रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति, उसके किनारे की नमी, उसमें पलने वाले सूक्ष्म जीव, उसका जल इस्तेमाल करने वाले इंसान और पशु-इन सभी की महत्ता होती है। यदि इनमें से एक भी कड़ी कमजोर या नैसर्गिक नियम के विरूद्ध जाती है तो नदी की दशा बिगड़ जाती है। हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है जहां से पानी बहकर नदियों में आता है। इसमें हिमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रrापुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, माही, महानदी, साबरमती आदि बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां-गंगा, सिंधु और ब्रrापुत्र को सदानीरा ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष पठारी नदी कहलाती हैं, क्योंकि वे मूलत: वर्षा पर निर्भर होती हैं। देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किमी है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलित जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किमी है। हमारी नदियों से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसद बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।12009 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या 121 पाई थी जो अब 275 हो चुकी हैं। आठ साल पहले नदियों के कुल 150 हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था, जो अब 302 हो गया है। बोर्ड ने 29 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 445 नदियों पर अध्ययन किया, जिनमें से 225 का जल बेहद खराब हालत में मिला। इन नदियों के किनारे बसे शहरों में 2009 में 38 हजार एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो अब बढ़ कर 62 हजार एमएलडी हो गया है। चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। सरकारी अध्ययन में 34 नदियों में बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्र 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई और यह नदियों के अस्तित्व के लिए बड़े संकट की ओर इशारा करता है। भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका 12,363 किमी मापा गया है। इनमें से 1,145 किमी का क्षेत्र बेहद दूषित श्रेणी का है। दिल्ली में यमुना इस शीर्ष पर है। इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां 43 नदियां मरने के कगार पर हैं। असम में 28, मध्यप्रदेश में 21, गुजरात में 17, कर्नाटक में 15, केरल में 13, बंगाल में 17, उप्र में 13, मणिपुर और ओडिशा में 12-12, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। ऐसी नदियों के कोई 50 किमी इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग समाप्त हो गई है। इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है। भूजल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि वह न तो पीने के लायक है,न ही खेती के। 1आज के दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि के निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ एक अन्य अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू। यह एक ऐसा उत्पाद है जिसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता। प्रकृति का नियम यही है कि किनारे पर स्वत: आई इस रेत को समाज अपने काम में लाए, लेकिन गत एक दशक के दौरान हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है। इसके लिए नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है। उसे बेतरतीब खोदा या गहरा किया जाता है। नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत न केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि वह उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भूगर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है। नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में लगातार जेसीबी जैसी भारी मशीनें और ट्रक आने से उसका पर्यावरण खराब होता है। भले ही हम कारखानों को दोषी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल है। इस मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे के बेतरतीब अतिक्रमण भी उनके बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैं।1(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)

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