तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

Ganpati should be welcome with eco friendly mode

गणपति का स्वागत करें पर्यावरण-प्रेम से !

                                                                     पंकज चतुर्वेदी

कुछ ही दिनों में बारिश के बादल अपने घरों को लौटने वाले हैं। सुबह सूरज कुछ देर से दिखेगा और जल्दी अंधेरा छाने लगेगा। असल में मौसम का यह बदलता मिजाज उमंगों. खुश हाली के स्वागत की तैयारी है । सनातन मान्यताओं की तरह प्रत्येक शुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसी लिए उत्सवों का प्रारंभ गणेश  चतुर्थी से ही होता है। प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में अपील कर रहे हैं कि देव प्रतिमाएं प्लास्टर आफ पेरिस यानि पीओपी की नहीं बनाएं, मिट्टी की ही बनाए, लेकिन राजधानी दिल्ली में ही अक्षरधाम के करीब मुख्य एनएच-24 हो या साहिबाबाद में जीटी रेड पर थाने के सामने ;धड़ल्ले से पीओपी की प्रतिमाएं बिक रही हैं। ऐसा ही दृष्य देश के हर बड़े-छोटे कस्बों में देखा जा सकता है। यह तो प्रारंभ है, इसके बाद दुर्गा पूजा या नवरात्रि, दीपावली से ले कर होली तक एक के बाद एक के आने वाले त्योहार असल में किसी जाति- पंथ के नहीं, बल्कि भारत की सम्द्ध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। विडंबना है कि जिन त्येहरों के रीति रिवाज, खानपान कभी समाज और प्रकृति के अनुरूप हुआ करते थे, आज पर्व के मायने हैं पर्यावरण, समाज और संस्कृति सभी का क्षरण।

खूब हल्ला हुआ, निर्देश , आदेश  का हवाला दिया गया, अदालतों के फरमान बताए गए, लेकिन गणपति के पर्व का मिजाजा बदलता नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र, उससे सटे गोवा, आंध््राप्रदेश  व तेलगांना, छत्तीसगढ़, गुजरात व मप्र के मालवा-निमाड़ अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव अब देश में हर गांव-कस्बे तक फैल गया है। दिल्ली में ही हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां स्थापित हो रही हैं। यही नहीं मुंबई के प्रसिद्ध लाल बाग के राजा की ही तरह विशाल प्रतिमा, उसी नाम से यहां देखी जा सकती है। पारंपरिक तौर पर मूर्ति मिट्टी की बनती थी, जिसे प्राकृतिक रंगों, कपड़ों आदि से सजाया जाता था। आज प्रतिमाएं प्लास्टर आफ पेरिस से बन रही हैॅ, जिन्हें रासायनिक रंगों से पोता जाता है। कुछ राज्य सरकारों ने प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों को जब्त करने की चेतावनी भी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और पूरा बाजार घटिया रासायनिक रंगों से पुती प्लास्टर आफ पेरिस की प्रतिमाओं से पटा हुआ है। इंदौर के पत्रकार सुबोध खंडेलवाल ने गोबर व कुछ अन्य जड़ी बूटियों को मिला कर ऐसी गणेष प्रतिमाएं बनवाई जो पानी में एक घंटे में घर में ही घुल जाती है, लेकिन बड़े गणेष मंडलों ने ऐसे पर्यावरण-मित्र प्रयोगों को स्वीकार नहीं किया। बंबई मे भी गमले में बीज के साथ गणपति प्रतिमा के प्रयोग हुए लेकिन लेगों को तो चटक रंग वाली विषाल, पीओपी की जहरीली प्रतिमा में ही भगवान का तेज दिख रहा है। पंडालों को सजाने में बिजली, प्लास्टिक आदि का इस्तमेल होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कला के नाम पर भौंडे प्रदर्शन प्रदर्शन व अश्लीलता का बोलबाला है।

अभी गणेशात्सव का समापन होगा ही कि नवरात्रि में दुर्गा पूजा शुरू हो जाएगी। यह भी लगभग पूरे भारत में मनाया जाने लगा है। हर गांव-कस्बे में एक से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक पूजा पंडाल बन रहे हैं। बीच में विश्वकर्मा पूजा भी आ आ गई और अब इसी की प्रतिमाएं बनाने की रिवाज शुरू हो गई है। कहना ना होगा कि प्रतिमा स्थापना कई हजार करोड़ की चंदा वसूली का जरिया है। एक अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान 10 लाख से ज्यादा प्रतिमाएं बनती हैं और इनमें से 90 फीसदी प्लास्टर आफ पेरिस की होती है। इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर आफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिल जाती है। पीओपी ऐसा पदार्थ है जो कभी समाप्त नहीं होता है। इससे वातावरण में प्रदूषण का मात्रा के बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है। प्लास्टर आफ पेरिस, कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है जो कि जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट डीहाइड्रेट) से बनता है चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर आफ पेरिस से बनी होती है, उन्हें विषैले एवं पानी में न घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुम्बई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़रहा है।
इन आयोजनों में व्यय की गई बिजली से 500 से अधिक गांवों को सालभर निर्बाध बिजली दी जा सकती हे। नवरात्रि के दौरान प्रसाद के नाम पर व्यर्थ हुए फल, चने-पूड़ी से कई लाख लोगों का पेट भरा जा सकता है। इस अवधि में होने वाले ध्वनि प्रदूषण, चल समारोहों के कारण हुए जाम से फुंके ईंधन व उससे उपजे धुंऐ से होने वाले पर्यावरण के नुकसान का तो हिसाब लगाना ही मुश्किल है। दुर्गा पूजा से उत्पन्न प्रदूषण से प्रकृति संभल पाती नहीं है और दीपावली आ जाती है। आतिशबाजी का जहरीला धुआं, तेल के दीयों के बनिस्पत बिजली का बढ़ता इस्तेमाल, दीपावली में स्नेह भेट की जगह लेन-देन या घूस उपहार का बढ़ता प्रकोप, कुछ ऐसे कारक हैं जो सर्दी के मौसम की सेहत को ही खराब कर देते हैं। यह भी जानना जरूरी है कि अब मौसम धीरे -धीरे बदल रहा है और ऐसे में हवा में प्रदूषण के कण नीचे रह जाते हैं जो सांस लेने में भी दिक्कत पैदा करते हैं।
सबसे बड़ी बात धीरे-धीरे सभी पर्व व त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्षन का प्रचलन बढ़ रहा है और इस प्रक्रिया में ये पावन-वैज्ञानिक पर्व लंपटों व लुच्चों का साध्य बन गए हैं प्रतिमा लाना हो या विसर्जन, लफंगे किस्म के लडके मोटर साईकिल पर तीन-चार लदे-फदे, गाली गलौच , नषा, जबरिया चंदा वूसली, सडक पर जाम कर नाचना, लडकियों पर फब्तियों कसना, कानून तोड़ना अब जैसे त्योहारों का मूल अंग बनता जा रहा है। इस तरह का सामाजिक  व सांस्कृतिक प्रदूशण नैसर्गिक प्रदूशध से कहीं कम नहीं है।
सवाल खड़ा होता  है कि तो क्या पर्व-त्योहारों का विस्तार गलत है? इन्हें मनाना बंद कर देना चाहिए? एक तो हमें प्रत्येक त्योहर की मूल आत्मा को समझना होगा, जरूरी तो नहीं कि बड़ी प्रतिमा बनाने से ही भगवान ज्यादा खुश होंगे ! क्या छोठी प्रतिमा बना कर उसका विसर्जन जल-निधियों की जगह अन्य किसी तरीके से करके, प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने  जैसे प्रयोग तो किए जा सकते हैं पूजा सामग्री में प्लास्टिक या पोलीथीन का प्रयोग वर्जित करना, फूल- ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबा कर उसका कंपोस्ट बनाना, चढ़ावे के फल , अन्य सामग्री को जरूरतमंदों को बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साघारण से प्रयोग हैंं ; जो पर्वो से उत्पन्न प्रदूषण व उससे उपजने वाली बीमारियां पर काफी हद तक रोक लगा सकते हैं। पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह व उमंग का संचार करने के और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं। इन्हें अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी भी  समाज की है।
भारतीय पर्व असल में प्रकृति को उसकी देन, के लिए धन्यवाद देने के लिए होते हैं, लेकिन इस पर बाजारवाद जो रंग चढ़ा है, उससे वे प्रकृति-हंता बन कर उभरे है। प्रषासन के लिए भी प्रधानमंत्री की अपील काफी है कि वह बलात पीओपी की प्रतिमाओं के निर्माण पर पाबंदी लगाए। समाज को भी गणपति या देवी प्रतिमाओं को पानी में विसर्जित करने के बजाए जमींदोज करने के विकल्प पर विचार करना चाहिए।

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

Agriculture is more important than industries in India


महंगी पड़ सकती है खेती-किसानी से बेपरवाही

                                                                                                                                           पंकज चतुर्वेदी

इन दिनों देश में बाहर की कंपनियों को कारखाने लगाने के लिए न्योतने का दौर चल रहा है। जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवकोपार्जन के जरिए पर सभी मौन हैं। तेजी से विस्तार पर रहे षहरी मध्य वर्ग, कारपोरेट और आम लोगों के जनमानस को प्रभावित करने वाले मीडिया खेती-किसानी के मसले में लगभग अनभिज्ञ है । यही कारण है कि खेती के बढते खर्चे, फसल का माकूल दाम ना मिलने, किसान-उपभोक्ता के बीच कई-कई बिचौलियों की मौजूदगी, फसल को सुरक्षित रखने के लिए गोडाउन व कोल्ड स्टोरेज और प्रस्तावित कारखाने लगाने और उसमें काम करने वालों के आवास के लिए जमीन की जरूरत पूरा करने के वास्ते अन्न उगाने वाले खेतों को उजाड़ने जैसे विशय अभी तक गौण हैं। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि खेती पर निर्भर जीवकोपार्जन करने वालों की संख्या भले ही घटे, लेकिन उनकी आय का दायरा सिमटता जा रहा है। इस साल देश के 11 राज्यों में अल्प वर्शा के कारण भयंकर सूखा पड़ा है जो लगभग देश की खेती जोत का आधे से अधिक हिस्सा है। सनद रहे एक बार सूखे का मार खाया किसान दशको तक उधार में दबा रहता है और तभी वह खेती छोड़ देता है।
भारत में कारें बढ़ रही हैं, मोटर साईकिल की बिक्री किसी भी विकासशील देश में  सबसे अधिक है, मोबाईल क्रांति हो गई है, षापिंग मॉल कस्बों-गांवों की ओर जा रहे हैं । कुल मिला कर लगता है कि देश प्रगति कर रहा है।  सरकार मकान, सड़के बना कर आधारभूत सुविधाएं विकसित करने का दावा कर रही है। देश प्रगति कर रहा है तो जाहिर है कि आम आदमी की न्यूनतम जरूरतों का पूर्ति सहजता से हो रही है । तस्वीर का दूसरा पहलू भारत के बारे में चला आ रहा पारंपरिक वक्तव्य है - भारत एक कृशि-प्रधान देश है । देश की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार कृशि है । आंकड़े भी यही कुछ कहते हैं। आजादी के तत्काल बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद में खेती की भूमिका 51.7 प्रतिशत थी  जबकि आज यह घट कर 13.7 प्रतिशत हो गई हे। यहां गौर करने लायक बात है कि तब भी और आज भी खेती पर आश्रित लोगों की आबादी 60 फीसदी के आसपास ही थी। जाहिर है कि खेती-किसानी करने वालों का मुनाफा, आर्थिक स्थिति सभी कुछ दिनों-दिन जर्जर होती जा रही है।
पहले और दूसरे पहलू के बीच कहीं संवादहीनता है । इसका प्रमाण है कि गत् सात सालों के दौरान देश के विभिन्न इलाकों के लगभग 45 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं । अपनी जान देने का दुःसाहसी व दुभाग्यपूर्ण निर्णय लेने वाले की कुंठा का कारण कार या मोटर साईकिल न खरीद पाना या मॉल में पिज्जा न खा पाना कतई नहीं था । अधिकांश मरने वालों पर खेती के खर्चों की पूर्ति के लिए उठाए गए कर्जे का बोझ था । किसान का खेत केवल अपना पेट भरने के लिए नहीं होता है, वह आधुानिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से पूरे देश तकदीर लिखता है । हमारे भाग्यविधाता अपने अनुभवों से सीख नहीं ले रहे हैं कि किसान को कर्ज नहीं बेहतर बाजार चाहिए। उसे अच्छे बीज, खाद और दवाएं चाहिए। कृशि में सुधार के लिए पूंजी से कहीं ज्यादा जरूरत गांव-खेत तक संवेदनशल नीति की है।
कृशि प्रधान कहे जाने वाले देश में किसान ही कम हो रहे हैं। सन 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में किसानों की संख्या 85 लाख कम हो गई। वर्ष-2001 की जनगणना के अनुसार देश में किसानों की कुल संख्या 12 करोड 73 लाख थी जो 2011 में घटकर 11 करोड़ 88 लाख हो गई। आज भले ही हम बढिया उपज या आयात के चलते खाद्यान्न संकट से चिंतित नहीं हैं, लेकिन आनेवाले सालों में यही स्थिति जारी रही तो हम सुजलाम-सुफलाम नहीं कह पाएंगे। कुछेक राज्यों को छोड़ दें तो देशभर में जुताई का क्षेत्र घट रहा है। सबसे बुरी हालत उत्तर प्रदेश की है, जहां किसानों की संख्या में 31 लाख की कमी आई है। बिहार में भी करीब 10 लाख लोग किसानी छोड. चुके हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि किसानों ने खेती छोड़कर कोई दूसरा काम-धंधा नहीं किया है बल्कि उनमें से ज्यादातर खाली बैठे हैं। इन्होंने जमीन बेच कर कोई नया काम-धंधा शुरू नहीं किया है बल्कि आज वे किसान से खेतिहर मजदूर बन गए हैं। वे अब मनरेगा जैसी योजनाओं में मजदूरी कर रहे हैं। सन 2001 में देश की कुल आबादी का 31.7 फीसदी किसान थे, जो सन 2011 में महज 24.6 प्रतिशत रह गए। आखिर ऐसा होना लाजिमी भी है। बीते साल ही संसद में सरकार ने कहा था कि महज किसानी कर घर का गुजारा चलाना संभव नहीं है।  भारत सरकार के दस्तावेज कहते हैं कि 1.16 हैक्टेयर जमीन पर गेंहू उगाने पर एक फसल, एक मौसम में किसान को केवल रू.2527 और धान उगाने पर रू. 2223 ही बचते हैं। यह आंकड़े उस हालात में है जब मान लिया जाए कि राश्ट्रीय कृशि लागत औसतन रू. 716 प्रति हैक्टेयर है। हालांकि किसान कहते हैं कि लागत इससे कम से कम बीस फीसदी ज्यादा आ रही है। तिस पर प्राकृतिक विपदा, बाढ़-सुखाड़, आले, जंगली जानवर का खतरा अलग। सनद रहे मुल्क में किसान के पास औसत जमीन 1.16 हैक्टेयर ही है।
उधर, इन्हीं 10 वर्षों के दौरान देश में कॉरपोरेट घरानों ने 22.7 करोड़ हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण करके उस पर खेती शुरू की है। कॉरपोरेट घरानों का तर्क है कि छोटे-छोटे रकबों की अपेक्षा बड़े स्तर पर मशीनों और दूसरे साधनों से खेती करना ज्यादा फायदेमंद है। हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में कॉरपोरेट घरानों ने बड़े-बड़े कृषि फार्म खोल कर खेती शुरू कर दी है।
देश के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हैक्टर खेती की जमीन को उजाड़ा जा रहा है। मकान, कारखानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नजरअंदाज किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इजाफा करते हैं। पूरे देश में एक हेक्टेयर से भी कम जोत वाले किसानों की तादाद 61.1 फीसदी है। देश में 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 53.1 फीसदी हुआ करता था। ‘नेशनल सैम्पल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 40 फीसदी किसानों का कहना है कि वे केवल इसलिए खेती कर रहे हैं क्योंकि उनके पास जीवनयापन का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। सरकार चाहती है कि किसान पारंपरिक खेती के तरीके को छोड़ नए तकनीक अपनाए । इससे खेती की लागत बढ़ रही है और इसकी तुलना में लाभ घट रहा है ।
गंभीरता से देखें तो इस साजिश के पीछे कतिपय वित्त संस्थाएं हैं जोकि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाश रही हैं । खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है । हकीकत में किसान कर्ज से बेहाल है । नेशनल सैंपल सर्वें के आंकड़े बताते हैं कि आंध्रप्रदेश के 82 फीसदी किसान कर्ज से दबे हैं । पंजाब और महाराश्ट्र जैसे कृशि प्रधान राज्यों में यह आंकड़ा औसतन 65 प्रतिशत है । यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुशी की सबसे अधिक घटनाएं प्रकाश में आई हैं । यह आंकड़े जाहिर करते हैं कि कर्ज किसान की चिंता का निराकरण नहीं हैं । किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देश के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।
किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका षोशण किस स्तर पर है, इसकी बानगी यही है कि देश के किसान को आलू उगाने पर माकूल दाम ना मिलने पर सड़कों पर फैंकना पड़ता है तो दूसरी ओर उसके दाम बढ़ने से रोकने के लिए विदेश से भी मंगवाना पड़ता है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो व इस व्यवसाय में पूंजीपतियों के प्रवेश पर प्रतिबंध -जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं ।

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005
9891928376



मंगलवार, 15 अगस्त 2017

Oraon in tea estate forgatting there traditions

चाय बागानों में गुम हो रही उरांव परंपराए

                                पंकज चतुर्वेदी

भारतीय समाज की रंगबिरंगी विविधतापूर्ण जातीय संरचना का सर्वाधिक आकर्षक हिस्सा है यहां की जनजातियां । सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक उथल-पुथल से बेखबर ये वनवासी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हो कर जीते हैं । इस बात पर देश में आम सहमति रही है कि सामाजिक पर्यावरण बनाए रखने के लिए यह महति जरूरी है कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक परिवेश में ही जीवनयापन के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं । लेकिन मध्य भारत की एक प्रमुख जनजाति ‘उरांव’ इन दिनों अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझ रही है । साम्यवादी सामाजिक संरचना के लिए चिर परिचित रहे उरांव लोगों का यह संकट चाय बागानों से उपजा है । पीढ़ियों पहले वे पेट भरने के इरादे से चाय बागान गए थे, लेकिन आज उनके सामने पेट के साथ-साथ पहचान का संकट भी खड़ा हो गया है। उनकी भाशा, संस्कार, त्योहार सभी लुप्त होने की कगार पर हैं। आजादी के 70 साल में कैसी विडंबना है कि जंगल-मानुस अपने घर से बेदखल है और अब उसकी सांस्कृतिक, पारंपरिक, सामाजिक पहचान के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।
,छत्तीसगढ़, झारखंड,बिहार और उड़ीसा के लगभग दो दर्जन जिलों में उरांवों का मूल वास है । यह एक दुर्भाग्य ही था कि उनके पुश्तैनी गांवों के आसपास दुर्लभ खनिजों का अकूत भंडार थे, जहां देश के विकास के नाम पर उनका खनन शुरू हुआ और इस अंधी दौड़ ने आदिवासियों की पीढ़ियों पुरानी जमीन निगल ली । मजबूर वन पुत्र पेट भरने के लिए या तो खदानों में काम करने लगे या फिर कहीं दूर चले गए । इस तरह धीरे-धीरे उनका अपनी जमीन से नाता टूटता गया । आज हालात यह हैं कि उरांवों की जनजातिय अस्मिता पूरी तरह बाहरी प्रभाव के चपेट में आ कर खंडित हो रही है । पश्चिम बंगाल और असम के कोई दो हजार चाय बागानों में लगभग दस लाख आदिवासी पत्ती तोड़ने में लगे हुए हैं । इनमें अधिकांश महिलाएं हैं जो उरांव जनजाति से हैं । इनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पूरी तरह धूमिल हो चुकी है । आर्थिक और शारीरिक शोषण को उन्होंने अपनी नियति मान लिया है ।
छोटा नागपुर क्षेत्र के आदिवासियों के भोजन व जीवकोपार्जन का मुख्य जरिया वहां के जंगलों में पैदा होने वाले पत्तीदार साग हुआ करते थे । तभी वहां की महिलाएं पत्ते चुनने में माहिर हुआ करती थीं । कोई डेढ़ सौ साल पहले जब अंग्रेजों ने आदिवासी अंचल में खनन शुरू किया तो उनकी निगाह मुंडा, खड़िया, संथाल, उरांव आदि आदिवासी औरतों की पत्ती चुनने की विशिष्ट शैली पर पड़ी । सन 1881 से 1891 के दौरान हर साल लगातार कोई 19 हजार अरण्य श्रमिक दक्षिण बिहार से असम के चाय बागानों में गए । बीते कुछ सालों के दौरान 27000 आदिवासी दार्जलिंग और जलपाईगुड़ी के चाय बागानों में गए । आज इन लोगों की तीसरी या चौथी पीढ़ी वहां काम कर रही है । अब वे लोग यह भूलते जा रहें हैं कि उनकी जनजाति की कोई अनूठी सांस्कृतिक या सामाजिक पहचान भी हुआ करती थी ।
उरांवों की मातृ भाषा ‘कुरक’ है । पर बागानों में काम कर रहे उरंाव अब ‘सादरी’ बोलते हैं । चूंकि बागानों में अलग-अलग इलाकों से आए विभिन्न जाति-जुबान के लोग हैं । सो उरांव बच्चों पर इन सभी का थोड़-थोड़ा असर हो रहा है । आज वहां रह रहे 18 साल उम्र के किसी भी उरांव को शायद ही ‘कुरक’ बोलना या समझना आता है । उरांवों के पारंपरिक नामों चेदों, मंकारी आदि की जगह बंगाली मिश्रित नामेां का बोलबाला है ।
बागान की आधुनिकता में उरांवों की सांस्कृतिक गतिविधियां भी गुम हो गई हैं । इनका मुख्य नृत्य ‘करमा’ है । चूंकि पहाड़ी इलाकों में करमा गाछ (पेड़) मिलता ही नहीं है, जाहिर है कि वहां करमा का आयोजन संभव नहीं है । ‘जनी शिकार’ को वहां की युवा उरांव महिलाएं जानती ही नहीं हैं । याद हो उरांवों ने रोहतास गढ़ में तीन बार मुगलों को हराया था । इसी जीत के यादगार स्वरूप हर 12 सालों में एक बार उरांव महिलाएं पुरुष का वेष रख कर झुंड में जंगल जाती हैं और शिकार करती हैं । पर चाय बागानों में पली-बढ़ी लड़कियों को ये समृद्ध परंपराएं कहां नसीब होंगी । जाति पंचायतों को भी ये भूल चुके हैं । पीढ़ियों से चली आ रहीं लोक कथाओं को अपनी अगली पीढ़ी तक पहुचाने का तारतम्य टूट गया है । क्योंकि बागानों में काम करने वाली औरतों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे अपने बच्चों को कहानियां सुना सकें । ठेठ उरांव महिला की पहचान ‘तीन गोदना’ (त्रिशूल) से होती है, जो यहां देखने को नहीं मिलता है ।
चाय बागानों में आदमियों को नौकरी बहुत कम दी जाती है । इसके चलते यहां के आदमी निकम्मे होते जा रहे है । ये जम कर शराब पीते है । सीमा पार से चोरी का सामान लाना, नशीली दवाएं बेचना इनका धंधा हो गया है । उधर औरतें भी भारी शोषण की शिकार हैं । उन्हें दिन भर में 25 पाउंड पत्ती तोड़ना जरूरी होता है । अतिरिक्त पत्ती पर मात्र 25 पैसे प्रति किलो ग्राम ही दिया जाता है । इस प्रकार सारे दिन खटने के बाद एक महिला को महीने भर में बामुश्किल चार-पांच सौ रुपए मिल पाते हैं । बागानों में जौंक काफी होते हैं ,जो इन औरतों को चिपक जाया करते हैं । इससे बचने के लिए उरांव महिलाएं अब तंबाकू खाने लगी हैं, जो कई बीमारियां उपजा रही है ।
उरांवों के हरेक पारंपरिक गांव में अलग से रात्रि घर हुआ करता है जिसे ‘धुमकुरिया’ कहते हैं । शाम होने पर उरांव युवक-युवतियां यहां जमा होते है और नाचते-गाते हैं । बागानों में रहने वाले युवाओं को अलबत्ता तो शाम को नाचने-गाने की सुध ही नहीं रहती है, फिर उन्हें ऐसे किसी सामाजिक क्लब के बारे में जानकारी ही नहीं है । इस जनजाति में लड़की की शादी की उम्र 21से 25 साल हुआ करती है, लेकिन यहां शादी 14 साल में ही की जा रही है । जवान बेटियों को शारीरिक शोषण से बचाने के लिए जल्दी शादियां की जा रहीं हैं । यही कारण है कि बागानों की आदिवासी बालाओं में पारंपरिक चमक और फुरती देखने को नहीं मिलती है ।
जनजातियों में हाथ से बनी मदिरा(हंडिया) पीने का चलन है । पर बागानों में इसकी जगह चिलैया या दारू ने ले ली है । बागान के दरवाजों पर ही दारू का ठेका मिल जाएगा । एक बगीचे में एक दिन दस हजार रुपए का बोनस बंटा । उस दिन वहां की चिलैया की दुकान की बिक्री सात हजार  की थी । यहां के दूषित माहौल से बच्चे भी अछूते नहीं है । जब पत्ती तोड़ने का चरम सीजन होता है तब ठेकेदार(स्थानीय बोली में सरदार) स्कूल से बच्चों  को भी खदेड़ लाता है । चंूकि वहां चप्पे-चप्पे पर वीडियो हाल और ड्रग्स के अड्डे खुले हैं, सो बच्चों को इनकी लत लग गई है । इसके लिए पैसे की पूर्ति के लिए वे बागानों में काम करना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं ।
भारतीय संविधान की यह कैसी विडंबना है कि बागान में काम करने वाले लोगों को आदिवासी नहीं माना जाता है । यानि जनजातियों को मिली आरक्षण व अन्य सुविधाओं से ये महरूम हैं । चाय बागानों में होम हो रही देश की बेशकीमती मौलिक संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण हेतु सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को जल्दी ही गंभीरता से सोचना होगा । क्योंकि पृथकतावादी ताकतों को फलने-फूलने का मौका ऐसे ही स्थानों पर होता है जहां सामाजिक और आर्थिक शोषण को नज़रअंदाज किया जाता है ।
पारंपरिक उरांवों के जीवन की सादगी और एकरसता यहां चुकती जा रही है । ऐसा कहा जाता है कि आदिवासी लोग धर्म और कलात्मक अनुभूतियों की गहराई में अपनी आत्मा को तलाशते हुए ही दैनिक जीवन के दुखों पर विजय पाते हैं । चाय बागानों की मशीनी जिंदगी में यह सब कहां मिल सकता है । शायद तभी अब वे उन्मुक्त प्रफुल्लित जीवन चाह कर भी नहीं जी पा रहे हैं ।

पंकज चतुर्वेदी
संपर्क- 9891928376

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

why they want to change only history in text book ?


किसने हक दिया भविष्य तय करने का ?

                                                               पंकज चतुर्वेदी
खबर है कि महाराष्ट्र की पाठ्य पुस्तकों से मुगलकाल का इतिहास हटाया जा रहा है। राजस्थान में हल्दीघाटी युद्ध में महराणा प्रताप की जीत को जोड़ा जा रहा है। त्रिपुरा की पाठ्य पुस्तकों से आजादी की लड़ाई के नायकों को हटा कर मार्क्स व हिटलर के पाठ जोड़े जा रहे हैं। राजस्थान की पुस्तकों से नेहरूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व को हटाने पर विवाद हो रहा है। खबर यह भी थी कि राजस्थान सरकार अपनी स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में मोदीजी पर अध्याय देने वाली थी, जिसे स्वयं मोदीजी ने ही रोक दिया। राज्यों में सरकारें बदलें और ऐसे विवाद ना हों ? ऐसा होता नहीं है। राजनेता अपने वोट बैंक के खातिर स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रमों में बदलाव की बात कर विवाद उपजाते ही रहते हैं । स्कूली शिक्षा यानी, देश की आगामी पीढ़ी की नींव रखने का कार्य ! पाठ्यक्रम का निर्धारण यानी देश के भविश्य का ढ़ंाचा तैयार करना !! पाठ्य पुस्तकें यानी बाल मन को उसके प्रौढ़ जीवन की चुनौतियों से सामना करने का संबल प्रदान करने लायक बौद्धिक खुराक देना । जाहिर है कि स्कूली शिक्षा की दिशा व दशा निर्धारित करते समय यदि छोटी सी भूल हो जाए तो देश के भविश्य पर बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है ।

यह इतना संवेदनशील, महत्वपूर्ण और दूरगामी विशय का निर्धारण करने का हक राजनेताओं को किसने दे दिया ? कहा जा सकता है कि यह निर्धारण तो शिक्षाविदों की कमेटी कर रही है । तो भी देश के करोड़ों-करोड़ लोगों के भाग्य विधात बनने का हक इन दर्जनभर विशेशज्ञों को कैसे प्राप्त हो गया ? कुछ लोगों के निजी मानदंड और निर्णयों के द्वारा लाखों-लाख लोगों के जीवन को आकार देने की योजना बनाना कहां तक उचित होगा ? यह विडंबना ही है कि हमारे नेता व बुद्धिजीवी पाठ्यक्रम व उसकी पुस्तकों के मामले में आमतौर पर सुप्तावस्था में ही रहते हैं, हां जब कहीं उनकी निजी आस्था या स्वार्थ पर चोट दिखती है तो वे सक्रिय हो जाते हैं।
इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि हमारे देश में इन दिनों जो कुछ पढ़ाया जा रहा है, उसका इस्तेमाल सालाना परीक्षा में अधिक से अधिक नंबर लाने तक ही सीमित रहता है । छात्र के व्यावहारिक जीवन में उस शिक्षा की कोई अनिवार्यता नहीं दिखती है । कहने को तो पाठ्यक्रम के बड़े-बड़े उद्देश्य कागजों पर दर्ज हैं ‘ जिसमें कुछ विशयों ( भाशा, गणित, विज्ञान , इतिहास आदि)में बच्चों को एक स्तर तक निपुणता प्रदान करना, उनमें नैतिक व सामजिक गुणों का विकास करना आदि प्रमुख हैं । लेकिन यह स्पश्ट नहीं है कि ये उद्देश्य किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तय किए गए है । आम बच्चों से पूछें या फिर शिक्षकों से भी, वे क्यों पढ़ें ? तो उत्तर जिस तरह के आएंगे , वे व्यक्तिगत संपन्नता के उद्देश्य की ओर अधिक झुके दिखते हैं । लेकिन हमारे नीति निर्धारक इस बारे में चुप ही रहते हैं ।


नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा, देश की सांस्कृतिक  धरोहरों के प्रति सम्मान जैसे जुमले भी शिक्षा नीति के दस्तावेज में मिल जाते हैं । लेकिन इसका क्रियान्वयन कैसे हो, ? इस पर कोई पुस्तक या नीति कुछ कहती-सुनती नहीं दिखती है । प्रत्येक श्रमकार्य और व्यक्ति के प्रति सम्मान, आत्म-सम्मान समेत, आत्म-दिशानिर्देशन; सहिष्णुता; सहृदयता एवं हानिरहितप्रवृत्ति; कार्यस्थल एवं अन्यत्र समान लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सहयोग; नैतिक बल आदि अपने-आप में लक्ष्य हैं। आत्म-दिशा निर्देशन से कई अन्य वैयक्तिक गुणों या विशिष्टताओं का भी विकास होता है, जैसे, अपनी बड़ी परियोजनाओं के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता; न्याय की स्वतंत्रता; आत्म-विश्वास; अपनी समझ। वैयक्तिक समृद्धि, जिसका एक आधुनिक स्वरूप है वैयक्तिक स्वायत्तता, का व्यापक मूल्य कई अन्य बातों पर भी निर्भर करता है, जैसे, विभिन्न प्रकार के शारीरिक भय की स्थिति में साहस प्रदर्शन का पारंपरिक गुण; भोजन, मद्यपान एवं शारीरिक सुख की पिपासा पर सही नियंत्रण; क्रुद्ध होने की दशा में आत्म नियंत्रण; धैर्य आदि, आदि। इसके बनिस्पत इतिहास किस तरह प्रस्तुत किया जाए, इस पर तलवारें खिंचीं रहती हैं । कोई षक नहीं कि एक ही घटना को दो तरह से प्रस्तुत किया जा सकता है- गुजरात या मुजफ्फर नगर के दंगे हमारी वास्तविकता हैं और इससे हम निगाह नहीं चुरा सकते हैं, ये इतिहास का हिस्सा होंगे । लेकिन यदि इसकी जानकारी बच्चों को देना हो तो इसके दो तरीके होंगे - एक नृशंसता, मारकाट व किसने किस पर किया के लोमहर्शक किस्से । दूसरा तरीका होगा कि दंगों के दौरान सामने आई आपसी सहयोग, मानवीय रिश्तों व सहयोग की घटनाओं का विवरण । ठीक इसी तरह इतिहास को भी लिखा जा सकता है । लेकिन मूल प्रश्न यह है कि इतिहास या भाशा या नैतिक शिक्षा को पढ़ाने का उद्देश्य क्या हो और इसे तय करने का कार्य कुछ लोगों को ही क्यों सौंपा जाए । इसी तरह की नौटंकी भाशा को ले कर होती रहती है। सरकार बदलती है, किताब लिखवाने की जिम्मेदारी वाले अफसर बदलते हैं तो धीरे से भाशा की पाठ्य पुस्तकों के रचनाकार बदल जाते हैं। कोई यह बताने को तैयार नहीं होता कि  अमुक रचना से भाशा किस तरह समृद्ध होगी। हां! यह जरूर दिख जाता है कि ‘अपना वालाा लेखक’’ किस तरह से समृद्ध होगा।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लोकतंत्र यानी आम सहमति का षासन । फिर शिक्षा की दिशा व दशा तय करने में इस लोकतांत्रिक प्रवृति को क्यों नहीं अपनाया जा रहा है । कुछ नेता कह सकते हैं कि वे लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए हैं और उन्हें इसका हक मिला है । लेकिन वे नेता जानते हैं कि उन्हें व उनकी पार्टी देश की कुल आबादी के बामुश्किल 20 फीसदी लोगों ने चुना है । कुछ शिक्षक या शिक्षाविद कहते हैं कि वे विशेशज्ञ हैं , उन्होंने अपने जीवन के कई साल इस क्षेत्र में लगा दिए अतः उन्हें पाठ्यक्रम तय करने का हक है । लेकिन यह लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है - लोकतंत्र में तो प्रत्येक आदमी के वोट की कीमत समान होती है, वोट अर्थात उसकी राय की । यह राय शिक्षा को ले कर भी हो सकती है । देश की भविश्य क्या हो ? इस पर राय देने का हक एक रिक्शा चलाने वाले या एक दुकानदार को उतना ही है जितना कि नामचीन शिक्षाविदों व नेताओं को । लोकतंत्र की इस प्राथमिक भावना से देश की जनता को वंचित रख कर कुछ लोगों का अपने निजी अनुभव व ज्ञान को थोपना किसी भी तरह से नैतिक तो नहीं है ।

पिछली एनडीए सरकार के लोगों ने अपने गोपनीय लेखकों से किताबें लिखवाई थीं। सरकार बदली तो एनसीईआरटी  का निजाम बदल गया और नई सरकार उन्हीें पुराने लेखकों से(जिन को वामपंथी कहा जाता है) नए सिरे से लिखवाने लगी । अब निजाम बदलते ही दीनानाथ बतरा, जगमोहन सिंह राजपूत जैसे लोग अपने तरीके की किताबों के लिए सक्रिय हो गए है।  इतिहास हो या भूगोल, गणित हो विज्ञान या भाशा ; कोई भी विशय अंतिम सत्य की सीमा तक नहीं पहुचा है, प्रत्येक में षोध, खोज व संशोधन, की गुंजाईश बनी रहती है । विज्ञान की पुस्तकों में जैवविविधता, जल संरक्षण, नैनो टैक्नालाजी, मोबाईल और इंटरनेट जैसे नए विषयों की दरकार है, जबकि हमारी सरकारी पाठ्य पुस्तकें उसी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। गणित में बुलियन एल्जेबरा, सांख्यिीकी में नई खोजंे, स्फेरिकल एस्ट्रानामी जैसे विषयों पर कोई बात करने को राजी नहीं हैं। ये विषय देश की आने वाली पीढ़ी को दिशा देने में सहायक हैं। विवाद और टकराव होते हैं इतिहास और हिंदी या अन्य भाषा की किताबों पर।
 किताब या लेखक भले ही कोई हो, पाठ्यक्रम का उद्देश्य व उससे वांछित लक्ष्य तो स्पश्ट होने चाहिए । इसके लिए समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक बहस, विकल्पों की खोज और सर्वसम्मति को प्राप्त किए बगैर शिक्षा के बारे में कोई भी नया ढ़ांचा बनाना , देश के साथ धोखेबाजी ही है । ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में स्कूलों के लिए राश्ट्रीय पाठ्यक्रम के उद्देश्य तय करने के लिए पिछले कुछ सालों में आम सहमति के लिए व्यापक बहस, सर्वेक्षण आदि का सहारा लिया गया था । भारत जैेसे मानव संसाधन से संपन्न देश में उन अनुभवों को दुहराने से कौन बचना चाहता है ? वे लेाग जो कि अपनी विशेशज्ञता से ऊपर किसी को नहीं समझ रहे हैं या वे नेता जिनके स्वार्थ इस तरह के विवादों में निहित हैं ।
पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376,

शनिवार, 5 अगस्त 2017

why packed water become essantial for mass


बोतलबंद पानी की मजबूरी

                                                             पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले के शालीमार गार्डन में पिछले दिनों जिला प्रशासन की टीम जब भूजल को षोधित कर मई-2016 में केंद्र सरकार ने आदेश दिया है कि अब सरकारी आयोजनों में टेबल पर बोतलंबद पानी की बोतलें नहीं सजाई जाएंगी, इसके स्थान पर साफ पानी को पारंपरिक तरीके से गिलास में परोसा जाएगा। सरकार का यह षानदार कदम असल में केवल प्लास्टिक बोतलों के बढ़ते कचरे पर नियंत्रण मात्र नहीं है, बल्कि साफ पीने का पानी को आम लोगों तक पहुंचाने की एक पहल भी है। कुछ दिनों पहले ही सिक्किम राज्य के लाचेन गांव ने किसी भी तरह की बोतलबंद पानी को अपने क्षेत्र में बिकने पर सख्ती से पाबंदी लगा दी। पिछले साल अमेरिका के सेनफ्रांसिस्को नगर ऐसी पाबंदी के बाद यह दुनिया का दूसरा ऐसी निकाय है जहां बोतलबंद पानी पर पाबंदी लगी हो। लाचेन की स्थानीय सरकार ‘डीजुमा’  व नागरिकों ने मिलकर तय किया कि अब उनके यहां किसी भी किस्म का बोतलबंद पानी  नहीं बिकेगा। एक तो जो पानी बाजार में बिक रहा था उसकी शुद्धता संदिग्ध थी,फिर बोतलबंद पानी के चलते खाली बोतलों का अंबार व कचरा आफत बनता जा रहा था। यह सर्वविविदत है कि प्लास्टिक नष्ट नहीं होती है व उससे जमीन, पानी, हवा सबकुछ बुरी तरह प्रभावित होते हैं। ऐसे ही संकट को सेनफ्रांसिस्को शहर ने समझा। वहां कई महीनों सार्वजनिक बहस चलीं। इसके बाद निर्णय लिया गया कि शहर में कोई भी बोतलबंद पानी नहीं बिकेगा। प्रशासन ही थोड़ी-थेाड़ी दूरी पर स्वच्छ  परिशोधित  पानी के नलके लगवाएगा तथा हर जरूरतमंद वहां से पानी भर सकता है।  लोगों का विचार था कि जो जल प्रकृति ने उन्हें दिया है उस पर मुनाफााखोरी नहीं होना चाहिए।  भारत की परंपरा तो प्याऊ, कुएं, बावड़ी और तालाब खुदवाने की रही है। हम पानी को स्त्रोत से शुद्ध करने के उपाय करने की जगह उससे कई लाख गुणा महंगा बोतलबंद पानी को बढ़ावा दे रहे है।ं पानी की तिजारत करने वालों की आंख का पानी मर गया है तो प्यासे लेागों से पानी की दूरी बढ़ती जा रही हे। पानी के व्यापार को एक सामाजिक समस्या और अधार्मिक कृत्य के तौर पर उठाना जरूरी है वरना हालात हमारे संविधान में निहित मूल भावना के विपरीत बनते जा रहे हैं जिसमें प्रत्येक को स्वस्थय तरीके से रहने का अधिकार है व पानी के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।
दिल्ली में घर पर नलों से आने वाले एक हजार लीटर पानी के दाम बामुश्किल चार रूपए होता है। जो पानी बोतल में पैक कर बेचा जाता है वह कम सेकम पंद्रह रूपए लीटर होता है यानि सरकारी सप्लाई के पानी से शायद चार हजार गुणा ज्यादा। इसबे बावजूद स्वच्छ, नियमित पानी की मांग करने के बनिस्पत दाम कम या मुफ्त करने के लिए हल्ला-गुल्ला करने वाले असल में बोतल बंद पानी की उस विपणन व्यवस्था के सहयात्री हैं जो जल जैसे प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी, परिवेश में प्लास्टिक घेालने जैसे अपराध और जल के नाम पर जहर बांटने का काम धड़ल्ले से वैध तरीके से कर रहे हैं। क्या कभी सोचा है कि जिस बोतलबंद पानी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसका एक लीटर तैयार करने के लिए कम से कम चार लीटर पानी बर्बाद किया जाता है।  आरओ से निकले बेकार पानी का इस्तेमाल कई अन्य काम में हो सकता है लेकिन जमीन की छाती छेद कर उलीचे गए पानी से पेयजल बना कर बाकी हजारों हजार लीटर पानी नाली में बहा दिया जाता है। प्लास्टिक बोतलों का जो अंबार जमा हो रहा है उसका महज बीस फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है, कीमतें तो ज्यादा हैं ही; इसके बावजूद जो जल परोसा जा रहा है, वह उतना सुरक्षित नहीं है, जिसकी अपेक्षा उपभोक्ता करता है। कहने को पानी कायनात की सबसे निर्मल देन है और इसके संपर्क में आ कर सबकुछ पवित्र हो जाता हे। विडंबना है कि आधुनिक विकास की कीमत चुका रहे नैसर्गिक परिवेश में पानी पर सबसे ज्यादा विपरीत असर पड़ा है। जलजनित बीमारियों से भयभीत समाज पानी को निर्मल रखने के प्रयासों की जगह बाजार के फेर में फंस कर खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।
चीन की राजधानी पेईचिंग भी एक बानगी  हैं हमारे लिए, उसकी आबादी दिल्ली से डेढ गुणा है। वहां हर घर में तीन तरह का पानी आता है व सभी के दाम अलग-अलग हैं। पीने का पानी सबसे महंगा, फिर रसोई के काम का पानी उससे कुछ कम महंगा और फिर टायलेट व अन्य निस्तार का पानी सबसे कम दाम का। सस्ता पानी असल में स्थानीय स्तर पर फ्लश व सीवर के पानी का षेधन कर सप्लाई होता है। जबकि पीने का पानी बोतलबंद पानी से बेहतरीन क्वालिटी का होता है। बीच का पानी आरओ से निकलने वाले पानी का षोधित रूप होता है। यह बात दीगर है कि वहां मीटरों में ‘‘जुगाड़’’ या वर्ग विशेश के लिए सबसिडी जैसी कोई गुंजाईश होती नहीं है। अनाधिकृत आवासीय बस्तियां हैं ही नहीं। प्रत्येक आवासीय इलाके में पानी , सफाई पूरी तरह स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है।
देश की राजधानी दिल्ली से बिल्कुल सटा हुआ इलाका है शालीमार गार्डन, यह गाजियाबाद जिले में आता है, बीते एक दशक के दौरान यहां जम कर बहुमंजिला  मकान बने, देखते ही देखते आबादी दो लाख के करीब पहुंच गई। यहां नगर निगम के पानी की सप्लाई लगभग ना के बराबर है। हर अपार्टमेंट के अपने नलकूप हैं और पूरे इलाके का पानी बेहद खारा है। यदि पानी को कुछ घंटे बाल्टी में छोड़ दें तो उसके ऊपर सफेद परत और तली पर काला-लाल पदार्थ जम जाएगा। यह पूरी आबादी पीने के पानी के लिए या तो अपने घरों में आर ओ का इस्तेमालक रती है या फिर बीस लीटर की केन की सप्लाई लेती है। यह हाल महज शालीमार गार्डन का ही नहीं हैं, वसुंधरा, वैशाली, इंदिरापुरम, राजेन्द्र नगर तक की दस लाख से अधिक आबादी के यही हाल है।। फिर नोएडा, गुड़गावं व अन्य एनसीआर के शहरों की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। यह भी ना भूलें कि दिल्ली की एक चौथाई आबादी पीने के पानी के लिए पूरी तरह बोतलबंद  कैन पर निर्भर है।  यह  बात सरकारी रिकार्ड का हिस्सा है कि राष्ट्रीय राजधानी और उससे सटे शहरों में 10 हजार से अधिक बोतलबंद पानी की इकाइयां सक्रिय हैं और इनमें से अधिकांश 64 लाइसेंसयुक्त निर्माताओं के नाम का अवैध उपयोग कर रही हैं। यह चिंता की बात है कि सक्रिय इकाइयां ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) की अनुमति के बगैर यह काम कर रही हैं। इस तरह की अवैध इकाइयां झुग्गियों और दिल्ली, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के शहरों की तंग गलियों से चलाई जा रही हैं । वहां पानी की गुणवत्ता के मानकों का पालन शायद ही होता है। यही नहीं पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने वाले सरकारी अधिकारी भी वहां तक नहीं पहुंच पाते है। कुछ दिनों पहले ईस्ट दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन के दफ्तर में जो बोतलबंद पानी सप्लाई किया जाता है, उसमें से एक बोतल में काक्रोच मिले थे। जांच के बाद पता चला कि पानी की सप्लाई करने वाला अवैध धंधा कर रहा हैै। उस इकाई का तो पता भी नहीं चल सका क्योंकि किसी के पास उसका कोई रिकार्ड ही नहीं है।
इस समय देश में बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कम्पनियां और 1200 बॉटलिंग प्लांट वैध हैं । इस आंकड़े में पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कम्पनियां शामिल नहीं है। इस समय भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार 14 अरब 85 करोड़ रुपये का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का 15 प्रतिशत है। बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10वें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबंद पानी की खपत एक अरब 50 करोड़ लीटर थी, 2004 में यह आंकड़ा 500 करोड़ लीटर का पहुंच गया। आज यह दो अरब लीटर के पार है।
पर्यावरण को  नुकसान कर, अपनी जेब में बड़ा सा छेद कर हम जो पानी खरीद कर पीते हैं, यदि उसे पूरी तरह निरापद माना जाए तो यह गलतफहमी होगी।  कुछ महीनों पहले  भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर के एनवायर्नमेंटल मानिटरिंग एंड एसेसमेंट अनुभाग की ओर से किए गए शोध में बोतलबंद पानी में नुकसानदेह मिले थे।  हैरानी की बात यह है कि यह केमिकल्स कंपनियों के लीनिंग प्रोसेस के दौरान पानी में पहुंचे हैं।  यह बात सही है कि बोतलबंद पानी में बीमारियां फैलाने वाला पैथोजेनस नामक बैक्टीरिया नहीं होता है, लेकिन पानी से अशुद्धियां निकालने की प्रक्रिया के दौरान पानी में ब्रोमेट क्लोराइट और क्लोरेट नामक रसायन खुद ब खुद मिल जाते हैं। ये रसायन प्रकृतिक पानी में हाते ही नहीं है । भारत में ऐसा कोई नियमक नहीं है जो बोतलबंद पानी में ऐसे केमिकल्स की अधिकतम सीमा को तय करे। उल्ल्ेखनीय है कि  वैज्ञाानिकों ने 18 अलग-अलग ब्रांड के बोतलबंद पानी की जांच की थी। । एक नए अध्ययन में कहा गया कि पानी भले ही बहुत ही स्वच्छ हो लेकिन उसकी बोतल के प्रदूषित  होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती है और इस कारण उसमें रखा पानी भी प्रदूषित हो सकता है। बोतलबंद पानी की कीमत भी सादे पानी की तुलना में अधिक होती है, इसके बावजूद इसके संक्रमण का एक स्त्रोत बनने का खतरा बरकरार रहता है । बोतलबंद पानी की जांच बहुत चलताऊ तरीके से होती है । महीने में महज एक बार इसके स्त्रोत का निरीक्षण किया जाता है, रोज नहीं होता है । एक बार पानी बोतल में जाने और सील होने के बाद यह बिकने से पहले महीनों स्टोर रूम में पड़ा रह सकता है । फिर जिस प्लास्टिक की बोतल में पानी है, वह धूप व गरमी के दौरान कई जहरीले पदार्थ उगलती है और जाहिर है कि उसका असर पानी पर ही होता है। घर में बोतलबंद पानी पीने वाले एक चौथाई मानते हैं कि वे बोतलबंद पानी इसलिए पीते हैं क्योंकि यह सादे पानी से यादा अच्छा होता है लेकिन वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते हैं कि नगर निगम द्वारा सप्लाई पानी को भी कठोर निरीक्षण प्रणाली के तहत रोज ही चेक किया जाता है । सादे पानी में क्लोरीन की मात्रा भी होती है जो बैक्टीरिया के खतरे से बचाव में कारगर है। जबकि बोतल में क्लोरीन की तरह कोई पदार्थ होता नहीं है। उल्टे रिवर ऑस्मोसिस के दौरान प्राकृतिक जल के कई महत्वपूर्ण लवण व तत्व नष्ट हो जाते हैं।
अब पानी की छोटी बोतलों पर सरकारी पाबंदी तो कल्याणकारी है ही साथ ही प्लास्टिक के डिस्पोजेबल गिलास व प्लेट्स के इस्तेमाल पर पांबदी की भी पहल जरूरी है क्योंकि कांच के गिलास टूटें ना या फिर उन्हें कौन साफ करेगा, इन कारणों से बोतल की जगह कहीं प्लास्टिक के गिलास ना ले लें।

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

Flooded city due to unplanned urbanisation


    क्यों  आ रही है शहरों में बाढ़
 पंकज चतुर्वेदी

सावन में कुछ घंटे पानी क्या बरसा राजधानी दिल्ली व उससे सटे षहर ठिठक गए। सड़क पर दरिया था और नाले उफान पर। दिल्ली से सटे गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव जैसे षहरों के बडे नाम घुटने-घुटने पानी में डूबते दिखे। भोपाल में 10 से 12 फुट पानी था तो इंदौर में सभी मुख्य मार्ग जल मग्न थे। ऐसी ही खबरें लखनउ, गोंडा हो या औरेया, गुवाहाटी हो या फिर मुंबई से आ रही हैं। पूरे देश में गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं। षहर के नाम भले ही बदल जाएं, लेकिन कारण वहीं रहते हैं - नालों, सीवर में पॉलीथीन फंसना व उनकी ठीक सफाई नहीं होना, सड़क की त्रुटिपूर्ण डिजाईन और पारंपरिक जल निधियों पर अवैध कब्जे या पानी का रास्ता रोक कर स्थाई निर्माण करना। जलभराव एक राश्ट्रीय त्रासदी है जो षहरों की रफ्तार को थाम देता है, बीमारियों का कारक बनता है, जाम में फसे वाहनों से निकले धुंए से पर्यावरणीय संकट खड़ा करता है, विदेशी मुद्रा से खरीदे गए पेट्रो-ईंधन की बर्बादी करता है और सबसे बड़ी बात जल-भराव ना होने की आड़ में होने वाले सफाई व अन्य कार्यों में भ्रश्टाचार का जनक भी है। यहां जानना जरूरी है कि देश में हर साल होने वाला, हर षहर-कस्बे में होने वाला और बगैर किसी भेदभाव के होने वाला भ्रश्टाचार इस त्रासदी के मूल में हैं और यदि ईमानदारी से आकलन किया जाएतो षायद यह देश का सबसे बड़ा सरकारी पैसे का गोलमाल होगा। यह है सालाना नालों की सफाई, गाद निकालना व उसकी ढुलाई, जो कि अधिकांश कागजी गधों के बल पर दौड़ती है।

विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप देते हैं । वैसे इस बात की जवाब कोई नहीं दे पाता है कि नालों की सफाई सालभर क्यों नहीं होती और इसके लिए मई-जून का इंतजार क्यों होता है । इसके हल के सपने, नेताओं के वादे और पीड़ित जनता की जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की हड़बड़ाहट सब कुछ भुला देती है । यह सभी जानते हैं कि दिल्ली, मुंबई आदि महानगरों में बने ढेर सारे पुलों के निचले सिरे, अंडरपास और सबवे हलकी सी बरसात में जलभराव के स्थाई स्थल हैं,लेकिन कभी कोई यह जानने का प्रयास नहीं कर रहा है कि आखिर निर्माण की डिजाईन में कोई कमी है या फिर उसके रखरखाव में ।

देश भर के षहरों में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद हर षहर में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है। बरसात में तो यही संरचनांए जाम का कारक बनती हैं।


बारिश के दिनों में अंडर पास और बीआरटी कॉरीडोरों में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने दिल्ली के दिल में स्थित आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकोंू से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाईन में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी। इंदौर, भोपाल के बीआरटी कॅरीडोर थोडी बरसात में नाव चलने लायक हो जाते हैं।


ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है।
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे।

दिल्ली, कोलकाता, पटना , भोपाल, जबलपुर , सतना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । नागपुर का सीवर सिस्टम बरसात के जल का बोझ उठाने लायक नहीं है, साथ ही उसकी सफाई महज कागजों पर होती है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।
महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा । महानगरों में बाढ़ का मतलब है परिवहन और लोगों का आवागमन ठप होना। इस जाम के ईंधन की बर्बादी, प्रदूशण स्तर में वृद्धि और मानवीय स्वभाव में उग्रता जैसे कई दीर्घगामी दुश्परिणाम होते हैं। इसका स्थाई निदान तलाशने के विपरीत जब कहीं शहरों में बाढ़ आती है तो सरकार का पहला और अंतिम कदम राहत कार्य लगाना होता है, जोकि तात्कालिक सहानुभूतिदायक तो होता है, लेकिन बाढ़ के कारणों पर स्थाई रूप से रोक लगाने में अक्षम होता है । जल भराव और बाढ़ मानवजन्य समस्याएं हैं और इसका निदान दूरगामी योजनाओं से संभव है ; यह बात शहरी नियोजनकर्ताओं को भलींभांति जान लेना चाहिए और इसी सिद्धांत पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहिए ।

पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),


रविवार, 30 जुलाई 2017

knowledge of languages make comfortable to mix with mass




भाषाओं के परिचय से मिलता आनंद 


 कुछ साल पहले की बात है- नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) ने असम के नलबारी में पुस्तक मेला आयोचित किया। तय किया गया कि मेला परिसर में एक बाल-मंडप बनाया जाएगा, जहां हर रोज कुछ न कुछ गतिविधियों का आयोजन होगा। जिम्मेदारी मुझ पर थी। नलबाड़ी यानि नल का गांव! असम के अधिकांश हिंसक आंदोलनों की नाल में यह इलाका अग्रणी रहा है। यूं भी कहा जा सकता है कि जब कभी सामाजिक, सांस्कृतिक अस्मिता पर खतरा उठता दिखता है तो उसके निराकरण के लिए यहां के लोग बंदूक की नाल को अधिक सहज राह मानते हैं । मन में विचार आया कि कहीं इसीलिए तो इसे नलबाड़ी नहीं कहते हैं, बंदूक की नाल वाली नलबाड़ी! नहीं, ऐसा नहीं है ; भारत के पिता 'नल' यानि नल-दमयंती वाले नल के नाम पर इस शहर का नाम पड़ा है। यहां के लोगों का विश्वास है कि हमारे देश की प्रारंभ भूमि यही है और इस देश में सूरज की सबसे पहले किरणें यहीं पड़ती है। या यूं कहें कि ज्ञान की किरणें यहीं दमकती है। भूटान की सीमा पर लगे इस हरे-भरे कस्बे में स्कूली बच्च्यिां पारम्परिक मेखला यानी साड़ी से मिलता-जुलता परिवेश पहनकर ही स्कूल जाती हैं। बाल मंडप में पहले ही दिन दो सौ से ज्यादा बच्चे थे। हालांकि एक स्थानीय व्यक्ति सहयोग के लिए था, लेकिन मेरी हिंदी और संपर्क व्यक्ति की असमिया के जरिये बात जब तक बच्चों तक पुहंचती तो कुछ न कुछ ट्रांसमिशन-लाॅस हो जाता। आमतौर पर पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के लिए दिल्ली और दिल्ली वाले दूर के ही महसूस होते हैं। साफ झलक रहा था कि बच्चों में स्कूल के क्लास रूम की तरह उबासी है। तभी कुछ शब्द बोर्ड पर लिखने की बात आई। मैंने अपनी टूटी-फूटी बांग्ला में वे शब्द लिख दिए। मुझे पता था कि र और व के अलावा बांग्ला और असमिया लिपि लगभग एक ही है। जैसे ही मैंने बोर्ड पर उनकी लिपि में कुछ लिखा, बच्चों के चेहरे पर चमक लौट आई। 'सर आप असमिया जानते हैं?' मैंने हंसकर बात टाल दी। लेकिन वह एक पहला सूत्र था जब बच्चों ने मेरे साथ खुद का जुड़ाव महसूस किया।
फिर अगले आठ दिन खूब-खूब बच्चे आते, वे असमिया में बोलते, कुछ हिंदी के शब्द होते, वे मेरी हिंदी खूब समझते और जब-तब मैं कुछ वाक्य उनकी लिपि में बोर्ड पर लिखकर उन्हें अपने ही बीच का बना लेता। यह मेरे लिए एक अनूठा अवसर और अनुभव था कि किस तरह एक भाषा पूरे समाज से आपको जोड़ती है। अभी कुछ दिनों पहले की बता है, मेरे कार्यालय में एक परिचित पुस्तक वितरक आए, उन्हें किसी स्कूल से गुजराती पुस्तकों का आर्डर मिला था। वे खुद गुजराती जानते नहीं थे, न ही मेरी बुक शॉप में किसी को गुजराती आती है। हमारे गुजराती संपादक टूर पर थे। निराश सज्जन मेरे पास आए और मैंने उनकी पुस्तकों के नाम अंग्रेजी या हिंदी में लिख दिए। कुछ ही देर में उन्हें भी पुस्तकें मिल गईं। इस बात से वे सज्जन, बुक शॉप वाले और मैं स्वयं बहुत आनंदित था कि मेरे थोड़े से भाषा-परिचय के चलते दिल्ली का कोई स्कूल गुजराती पुस्तकों से वंचित होने से रह गया।
मैं कक्षा आठ से 11 वीं तक मध्यप्रदेश के जावरा जिला रतलाम के जिए स्कूल में पढ़ा था। वहां के प्राचार्य ज्ञान सिंह का ही सपना था कि बच्चे एक से अधिक भारतीय भाषा सीखें, सो उन्होंने कक्षा नौ से आगे अनिवार्य कर दिया कि हर बच्चा एक भाषा जरूर पढ़ेगा- गुजराती, मराठी, बांग्ला या उर्दू। उर्दू जाफरी साहब पढ़ाते थे और उनकी छड़ी उर्दू की कोमलता के बिल्कुल विपरीत थी। हिंेदी वाले जोशी सर एक पीरियड गुजराती का लेते थे, जबकि अंग्रेजी के एसआर मिश्र सर बांग्ला पढ़ाते थे । एक भाषा पढ़ना ही होगा, उसका इम्तेहान भी देना होगा , हां सालाना नतीजे में उसके परिणाम का कोई असर नहीं होता था। मैंने वहां एक साल गुजराती और दूसरे साल बांग्ला पढ़ी। कई-कई बार हम लोग इतिहास जैसे विषयों के नोट उन लिपियों में लिखते थे और शाम को उसे फिर से हिंदी या अंग्रेजी में उतारने की मगजमारी होती थी। आज पीछे पलटकर देखता हूं और कई भाषाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ लेता हूं और इसका लाभ मुझे पूरे देश में भ्रमण, खासतौर पर बच्चों के साथ काम करन के दौरान िलता है तो याद आता है कि सरकारी स्कूल भी उतने ही बेहतर इंसान बनाते हैं जितना कि 'मशहूर वाले' स्कूल। एक प्राचार्य ने अपनी इच्छा-शक्ति के चलते देश का स्वप्न बन गया 'त्रिभाषा फॉर्मूला' सार्थक किया था। यह आज भी मेरे काम आ रहा है। मुझे आनंद दे रहा है और दूसरों को आनंद दे रहा है कि मध्यप्रदेश या दिल्ली का कोई व्यक्ति उनकी भाषा के कुछ शब्द जानता-समझता है।


मेरे बारे में