तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 12 नवंबर 2018

chhath : the festival of ecology conservation

क्यों ना छट को पर्यावरण पर्व के रूप में मनाएं


दीपावली के ठीक बाद में बिहार व पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब प्रवासी बिहारियों के साथ-साथ सारे देष में फैल गया है। गोवा से लेकर मुंबई और भोपाल से ले कर बंगलूरू तक, जहां भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, कठिन तप के पर्व छठ को हरसंभव उपलब्ध जल-निधि के तट पर मनाना नहीं भूलते है। वास्तविकता यह भी है कि छट को भले ही प्रकृति पूजा और पर्यावरण का पर्व बताया जा रहा हो, लेकिन इसकी हकीकत से दो चार होना तब पड़ता है जब उगते सूर्य को अर्ध्य दे कर पर्व का समापन होता है और श्रद्धालु घर लौट जाते हैं। पटना की गंगा हो या दिल्ली की यमुना या भोपाल का षाहपुरा तालाब या दूरस्थ अंचल की कोई भी जल-निधि, सभी जगह एक जैसा दृष्य होता है- पूरे तट पर गंदगी, बिखरी पॉलीथीन , उपेक्षित-गंदला रह जाता है वह तट जिसका एक किनारा पाने के लिए अभी कुछ देर पहले तक मारा-मार मची थी।
देष के सबसे आधुनिक नगर का दावा करने वाले दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा की तरफ सरपट दौड़ती चौड़ी सडक के किनारे बसे कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन नदी के तट पर हैं। हिंडन यमूुना की सहायक नदी है लेकिन अपने उद्गम के तत्काल बाद ही सहारनपुर जिले से इसका जल जहरीला होना जो षुरू होता है तो अपने यमुना में मिलन स्थल, ग्रेटर नोएडा तक हर कदम पर दूशित होता जाता है। ऐसी ही मटमैली हिंडन के किनारे बसे इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश वाषिंदे सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपावली के बाद छट पूजा के समय आती है। वैसे तो घाट  के आसपास का इलाका एक तरह से सार्वजनिक षौचालय बना रहता है, लेकिन दीपावली के बाद अचानक ही गांव वाले घाटों की सफाई, रंगाई-पुताई करने लगते हैं। राजनीतिक वजन लगाया जाता है तो इस नाबदान बनी नदी का गंदा बहाव रोक कर इसमें गंगा जल भर दिया जाता है। छठ के छत्तीस घंटे बड़ी रौनक होती है यहां और उसके बाद षेश 361 दिन वहीं गंदगी, बीड़ी-षराब पीने वालों का जमावड़ा । पर्व समाप्ति के अगले ही दिन उसी घाट पर लोग षौच जाते हैं जहां अभी भी प्रसाद के अंष पड़े होते हैं। जिस नदी में भक्त खड़े थे, वह देखते ही देखते काला-बदबूदार नाला बन जाती है, पूरे गांव का गंदा पानी का निस्तार भी इसी में होता है।
छट पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव। असल में यह दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में षरीर को पित्त-कफ और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर था। कार्तिक मास के प्रवेश के साथ छठ की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाता है। छठ के दौरान छह दिनों तक दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। दीवाली के सुबह से ही छठ व्रतियों के घर में खान-पान में बहुत सारी चीजें वर्जित हो जाती है, यहां तक कि सेंधा नमक का प्रयोग होने लगता है।
सनातन धर्म में छट एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानि सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है।  धरती पर जीवन के लिए, पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाषय से टकरा कर अपने षरीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वृत करने वाली महिलाओं के भेाजन में कैल्ष्यिम की प्रचुर मात्रा होती है, जोकि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवाय भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है। यह विटामिन डी कैल्ष्यिम को पचाने में भी मदद करता है। तप-वृत से रक्तचाप नियंत्रित होता है और सतत ध्यान से नकारात्मक विचार मन-मस्तिश्क से दूर रहते हैं।
वास्तव में यह बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों ंपर बह कर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सके, दीपावली पर मनमाफिक खाने के बाद पेट को नैसर्गिक उत्पादों से पोशित करने और विटामिन के स्त्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है।  पर्व में इस्तेमाल प्रत्येक वस्तु पर्यावरण को पपित्र रखने का उपक्रम होती है- बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी व सूपती तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुख व पंचमुखी दीया, हाथी और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा, चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ, खाजा इत्यादि।
इसकी जगह ले ली- आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंसकृति वाले गीतों ने , आतिषबाजी,घाटों की दिखावटी सफाई, नेातागिरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने। अस्थाई जल-कुंड या सोसायटी के स्वीमिग पुल में छट पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। लोग नैसर्गिक जल-संसाधनों तक जाएं, वहां घाट व तटों की सफाई करें और फिर पूजा करें , इसके बनिस्पत अपने घर के पास एक गड्ढे में पानी भर कर पूजा के बाद उसके गंदा, बदबूदार छोड़ देना तो इसकी आत्मा को मारना ही है। यही नहीं जिस जल में वृत करने वाली महिलाएं खड़ी रहती हैं, वह भी इतना दूशित होता है कि उनके पैरों और यहां तक कि गुप्तांगों में संक्रमण की संभावना बनी रहती है। गंदी-जहरीली पोलीथीन में खाद्य  सामग्री ले जाने से उसकी पवित्रता प्रभावित होती है। यही नहीं जो काल षांत तप-आत्ममंथन और ध्यान का होता है, उसमें भौंडे गीत और फिल्मी पैरोडी पर भजनों का सांस्कृतिक व ध्वनि प्रदूशण अलग से होता है। जबकि पारंपरिक रूप से ढोलक या मंजीरा बजा कर गीत गाने से महिलाओं के संपूर्ण षरीर का व्यायाम , अपने पारंपरिक गीतों या मौखिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम होता था। उसका स्थान बाजार ने ले लिया । पर्व समाप्त होते ही चारों तरफ फैली पूजा सामग्री में मुंह मारते मवेषी और उसमें से कुछ अपने लिए कीमती तलाषते गरीब बच्चे, आस्था की औपचारिकता को उजागर करते हैं।
काष, छठ पर्व की वैज्ञानिकता, मूल-मंत्र और आस्था के पीछे तर्क को भलीभांति समाज तक प्रचारित-प्रसारित किया जाए। जल-निधियों की पवित्रता, सव्च्छता के संदेष को आस्था के साथ व्याहवारिक पक्षों के साथ लोक-रंग में पिरोया जाए, लोक को अपनी जड़ो की ओर लौटने को प्रेरित किया जाए तो यह पर्व अपने आधुनिक रंग में धरती का जीवन कुछ और साल बढ़ाने का कारगर उपाय हो सकता है। हर साल छट पर्व पर यदि देष भर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प  हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो , नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक  और अन्य गंदगी ना ले जाने की षपथ हो तो छट के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।
यदि छट के तीन दिनों को जल-संरक्षण दिवस, स्वच्छता दिवस जैसे नए रंग के साथ प्रस्तुत किया जाए और आस्था के नाम पर एकत्र हुई विषाल भीड़ को भौंडे गीतों के बनिस्पत इन्हीं सदेषों से जुड़े सांस्कृतिक अरयोजनों से षिशित किया जाए, छट के संकल्प को साल में दो या तीन बार उन्ही जल-घाटों पर आ कर दुहराने का प्रकल्प किया जाए तो वास्तव में सूर्य का ताप, जल की पवित्रता और खेतों से आई नई फसल की पौश्टिकता समाज को निरापद कर सकेगी।
यदि परंपरा और पद्धति को बारिकी से देखें तो छठ पर्व पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का सामुदायिक पर्व है। पूरी तरह से पर्यावरण मित्र लोकपर्व है। तमाम प्रसाद- चाहे ठेकुआ हो या कसार, घर में बनाया जाता है। यह आटा और चावल के आटे का बनता है और घी का इस्तेमाल होता है। ये सामान बाजार से नहीं खरीदा जाता। इसके अलावा, तमाम तरह की सब्जी और फलों का प्रसाद होता है। नींबू, हल्दी और अदरक का पौधा, अरबी, शरीफा, आरता का पत्ता, लौंग, इलायची, छुहारा और नारियल का इस्तेमाल होता है। साठी के चावल का भी इस्तेमाल होता है। साठी का चावल तैयार करने में 60 दिन का वक्त लगता है। लोग खुद ही यह चावल उगाते हैं या फिर गांव से मंगवाते हैं। ये तमाम चीजें दउरा (बांस से तैयार बड़ी टोकरी) में रखकर लोग खुद घाट पर ले जाते हैं। घाट पर पूजा के बाद अपने दउरा का एक भी सामान वहां नहीं छोड़ा जाता, क्योंकि यह अत्यंत पवित्र होता है। हर सामान घर लाया जाता है। छठ के लिए पूजा करने वाले लोग नदियों और घाटों की सफाई करते हैं। इस तरह साल में एक बार खुद ब खुद नदी और तालाब की सफाई हो जाती है। इस तरह प्रकृति की पूजा के इस पर्व में सफाई का विशेष ध्यान होता है।
छठ पूजा के दौरान जो भी प्रसाद होता है उससे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर सबकुछ लेकर व्रत करने वाले वापस आ जाते हैं। सामान अगर नदीं में छूटता है तो वह फूल-पत्ती होती है, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती। इस तरह देखा जाए तो प्रकृति की पूजा का ये महापर्व पूरी तरह से प्रकृति-पूजा है।
छठ पूजा के अनुष्ठान के दौरान गाए जाने वाले- ‘केरवा जे फरले घवध से ओह पर सुग्गा मंडराय, सुगवा जे मरवो धनुष से सुगा जइहे मुरझाए। सुगनी जे रोवेली वियोग से आदित होख ना सहाय.., जैसे गीत इस बात को दर्शाता हैं कि लोग पशु पक्षियों के संरक्षण की याचना कर उनके अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। इसी तरह इस अनुष्ठान के क्रम में कोसी भरने के समय मिट्टी के वर्तन पर हाथी की आकृति बनाने की परंपरा भी जैव संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करता है।

रविवार, 11 नवंबर 2018

खोदते-खोदते खो रहे हैं पहाड़
पंकज चतुर्वेदी

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है। असल में जब तक कोई पर्यावरणीय खतरा दिल्ली पर नहीं मंडराता, उसे गंभीरता से लिया नहीं जाता। जान लें कि गुजरात के खेड ब्रह्म से षुरू हो कर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राश्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग शिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असर में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे ऐक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही। अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेश 07 मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में एमाी मेहता की जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई-कई ओदश आते रहे लेकिन दिल्ली में ही अरावली पहाड़ को उजाड़ कर एक सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रालय की बड़ी आवासीय कोलेनी बना दी गई। अब जब दिल्ली में गरमी के दिनों में पाकिस्तान से आ रही रेत की मार व तपन ने तंग करना षुरू किया तब यहां के सत्तधारियों को पहाड़ी की चिंता हुई। देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्श है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया है कि वह 48 घंटे में अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए। दरअसल राजस्थान के 1करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था. इसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन को निशिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक, जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया. इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है, जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए. अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को मानता है तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा।

हजारों-हजार साल में गांव-शहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होता था। पहले नदियों के किनारे सभ्यता आई, फिर ताल-तलैयों  के तट पर बस्तियां बसने लगीं। जरा गौर से किसी भी आंचलिक गांव को देखंे, जहां नदी का तट नहीं है- कुछ पहाड़, पहाड़े के निचले हिस्से में झील व उसके घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा। बीते कुछ सालों से अपनी प्यास के लिए बदनामी झेल रहे बुंदेलखंड में सदियों से अल्प वर्शा का रिकार्ड रहा है, लेकिन वहां कभी पलायन नहीं हुआ, क्योंकि वहां के समाज ने पहाड़ के किनारे बारिश की हर बूंद को सहेजने तथा पहाड़ पर नमी को बचा कर रखने की तकनीक सीख लीथी। छतरपुर षहर बानगी है- अभी सौ साल पहले तक षहर के चारों सिरों पर पहाड़ थे, हरे-भरे पहाड़, खूब घने जंगल वाले पहाड़ जिन पर जड़ी बूटियां थी, पंक्षी थे, जानवर थे। जब कभी पानी बरसता तो पानी को अपने में समेटने का काम वहां की हरियाली करती, फिर बचा पानी नीचे तालाबों में जुट जाता। भरी गरमी में भी वहां की षाम ठंडी होती और कम बारिश होने पर भी तालाब लबालब। बीते चार दशकों में तालाबों की जो दुर्गति हुई सो हुई, पहाड़ों पर हरियाली उजाड़ कर झोपड़-झुग्गी उगा दी गईं। नंगे पहाड़ पर पानी गिरता है तो सारी पहाडी काट देता है, अब वहां पक्की सडक डाली जा रही हैं। इधर हनुमान टौरिया जैसे पहाड़ को नीचे से काट-काट कर  दफ्तर, कालोनी सब कुछ बना दिए गए हैं। वहां जो जितना रूतबेदार है, उसने उतना ही हाड़ काट लिया। यह कहानी देश के हर कस्बे या उभरते शहर की है, किसी को जमीन चाहिए थी तो किसी को पत्थर तो किसी को खनिज; पहाड़ को एक बेकार, बेजान संरचना समझ कर खोद दिया गया। अब समझ में आ रहा है कि नष्ट किए गए पहाड़ के साथ उससे जुड़ा पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही नष्ट हो गया है।
खनिज के लिए, सड़क व पुल की जमीन के लिए या फिर निर्माण सामग्री के लिए, बस्ती के लिए, विस्तार के लिए , जब जमीन बची नहीं तो लोगों ने पहाड़ों को सबसे सस्ता, सुलभ व सहज जरिया मान लिया। उस पर किसी की दावेदारी भी नहीं थी।  सतपुडा, मेकल, पश्चिमी घाट, हिमालय, कोई भी पर्वतमालाएं लें, खनन ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। रेल मार्ग या हाई वे बनाने के लिए पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियर इस तथ्य को षातिरता से नजरअंदाज कर देते हैं कि पहाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थ व्यवस्था, आस्था, विश्वास का प्रतीक होते हैं। पारंपरिक समाज भले ही इतनी तकनीक ना जानता हो, लेकिन इंजीनियर तो जानते हैं कि धरती के दो भाग जब एक-दूसरे की तरफ बढ़ते हैं या सिकुडते हैं तो उनके बीच का हिस्सा संकुचित हो कर ऊपर की ओर उठ कर पहाड़ की षक्ल लेता है। जाहिर है कि इस तरह की संरचना से छोड़छाड़ के भूगर्भीय दुश्परिणाम  उस इलाके के कई-कई किलोमीटर दूर तक हो सकते हैं। पुणे जिले के मालिण गांव से कुछ ही दूरी पर एक बांध है, उसको बनाने में वहां की पहाड़ियों पर खूब बारूद उड़ाया गया था। यह जांच का विशय है कि इलाके के पहाड़ों पर हुई तोड़-फोड़ का इस भूस्खलन से कहीं कुछ लेना-देना है या नहीं। किसी पहाड़ी की तोड़फोड़ से इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों का पानी पाताल में चले जाने की घटनाएं तो होती ही रहती हैं। यदि गंभीरता से देखें तो लालची मनुष्य के निए फिलहाल पहाड़ का छिन्न-भिन्न होता पारिस्थिति तंत्र चिंता का विषय ही नहीं है। इसका विमर्श कभी पाठ्य पुस्तकों में होता ही नहीं हैं।

यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना।  विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बउ़ाया तो गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों ेक निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। यही नहीं जिन पहाड़ों पर  इमारती पत्थर या कीमती खनिज थे, उन्हें जम कर उजाड़ा गया और गहरी खाई, खुदाई से उपजी धूल को कोताही से छोड़ दिया गया। राजस्थान इस तरह से पहाड़ों के लापरवाह खनन की बड़ी कीमत चुका रहा है। यहां जमीन बंजर हुई, भूजल के स्त्रोत दूषित हुए व सूख गए, लोगों को बीमारियां लगीं व बारिश होने पर खईयों में भरे पानी में मवेशी व इंसान डूब कर मरे भी।

आज हिमालय के पर्यावरण, ग्लेशियर्स के गलने आदि पर तो सरकार सक्रिय हो गई है, लेकिन देश में हर साल बढ़ते बाढ़ व सुखाड़ के क्षेत्रफल वाले इलाकों में पहाड़ों से छेड़छाड़ पर कहीं गंभीरता नहीं दिखती। पहाड़ नदियों के उदगम स्थल हैं। पहाड़ नदियों का मार्ग हैं, पहाड़ पर हरियाली ना होने से वहां की मिट्टी तेजी से कटती है और नीचे आ कर नदी-तालाब में गाद के तौर पर जमा हो कर उसे उथला बना देती है। पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्यौता होती है, पहाड़ अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इलाके के मवेशियेां का चरागाह होते हैं। ये पहाड़ गांव-कस्बे की पहचान हुआ करते थे। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है इन मौन खड़े छोटे-बड़े पहाड़ों के लिए, लेकिन अब आपको भी कुछ कहना होगा इनके प्राकृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

Aravali on threat

अरावली पर मंडराता संकट


सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंक उठे कि इतनी सारी पांबदी के बावजूद अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है। असल में जब तक कोई पर्यावरणीय खतरा दिल्ली पर नहीं मंडराता उसे गंभीरता से लिया नहीं जाता। जान लें कि गुजरात के खेड़ ब्रह्मा से शुरू हो कर करीब 700 किमी तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राष्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में पूरी तरह न केवल नदारद हो गया, बल्कि कई जगह 150 फुट गहरी खाई हो गई। अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो रेगिस्तान का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही। अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेश सात मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई आदेश आते रहे, लेकिन अरावली पहाड़ को उजाड़ कर एक सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रलय की बड़ी आवासीय कॉलोनी बना दी गई।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया है कि वह अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए। दरअसल राजस्थान के करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था जिसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन निषिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया। इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को मानता है तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा।
हजारों-हजार साल में गांव-शहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होती थी। किसी भी आंचलिक गांव को देखंे जहां नदी का तट नहीं है वहां कुछ पहाड़, पहाड़ के निचले हिस्से में झील व उसे घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा। अब समझ में आ रहा है कि नष्ट किए गए पहाड़ के साथ उससे जुड़ा पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही नष्ट हो गया है।
खनिज के लिए, सड़क व पुल की जमीन के लिए या फिर निर्माण सामग्री के लिए, बस्ती के लिए, विस्तार के लिए जब जमीन बची नहीं तो लोगों ने पहाड़ों को सबसे सस्ता, सुलभ व सहज जरिया मान लिया। उस पर किसी की दावेदारी भी नहीं थी। सतपुड़ा, पश्चिमी घाट, हिमालय, कोई भी पर्वतमाला लें, खनन ने पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। रेल मार्ग या हाइवे बनाने के लिए पहाड़ों को मनमाने तरीके से बारूद से उड़ाने वाले इंजीनियर इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं कि पहाड़ स्थानीय पर्यावास, समाज, अर्थव्यवस्था, आस्था, विश्वास का प्रतीक होते हैं। पारंपरिक समाज भले ही इतनी तकनीक न जानता हो, लेकिन इंजीनियर तो जानते हैं कि धरती के दो भाग जब एक-दूसरे की तरफ बढ़ते हैं या सिकुड़ते हैं तो उनके बीच का हिस्सा संकुचित हो कर ऊपर की ओर उठ कर पहाड़ की शक्ल लेता है। जाहिर है कि इस तरह की संरचना से छेड़छाड़ के भूगर्भीय दुष्परिणाम उस इलाके के कई-कई किलोमीटर दूर तक हो सकते हैं। पुणो जिले के मालिण गांव से कुछ ही दूरी पर एक बांध है, जिसे बनाने में वहां की पहाड़ियों पर खूब बारूद उड़ाया गया था। यह जांच का विषय है कि इलाके के पहाड़ों पर हुई तोड़-फोड़ का इस भूस्खलन से कहीं कुछ लेना-देना है या नहीं। किसी पहाड़ी की तोड़फोड़ से इलाके के भूजल स्तर पर असर पड़ने, कुछ झीलों का पानी पाताल में चले जाने की घटनाएं तो होती ही रहती हैं।
यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न व जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘पहाड़’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना। विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बड़ाया तो गांवों-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों और उनके लिए सड़कों के निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। आज हिमालय के पर्यावरण, ग्लेशियर के गलने आदि पर तो सरकार सक्रिय हो गई है, लेकिन हर साल बढ़ते बाढ़ व सुखाड़ के क्षेत्रफल वाले इलाकों में पहाड़ों से छेड़छाड़ पर कहीं गंभीरता नहीं दिखती। पहाड़ नदियों के उद्गम स्थल हैं। पहाड़ नदियों का मार्ग हैं, पहाड़ पर हरियाली न होने से वहां की मिट्टी तेजी से कटती है और नीचे आ कर नदी-तालाब में गाद के तौर पर जमा हो कर उसे उथला बना देती है।
पहाड़ पर हरियाली बादलों को बरसने का न्यौता होती है, पहाड़ अपने करीब की बस्ती के तापमान को नियंत्रित करते हैं, इलाके के मवेशियों का चारागाह होते हैं। ये पहाड़ गांव-कस्बे की पहचान हुआ करते थे। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है इन मौन खड़े छोटे-बड़े पहाड़ों के लिए, लेकिन अब आपको भी कुछ करना होगा इनके प्राकृतिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखने के लिए।

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

Crackers ; Neither bother judiciary nor prime minister

   न कोर्ट की सुनी, न प्रधानमंत्री की


सुप्रीम कोर्ट ने आम लेागों की भावनाओं का खयाल रखकर केवल दो घंटे और कम नुकसान पहुंचाने वाली आतिशबाजी को चलाने की अनुमति प्रदान की थी, लेकिन दीपावली की रात राजधानी दिल्ली व उसके आसपास न तो समय की परवाह रही और न ही खतरनाक आतिशबाजी का खयाल। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के कार्यान्यवन के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस को जिम्मेदार बताया था। जाहिर है कि न तो कोई शिकायत करेगा और न ही गवाही देगा। साफ है कि देश के दूरस्थ अंचलों में तो कोई रोक रही ही नहीं होगी। बीते एक महीने से दिल्ली एनसीआर की आवोहवा जहरीली होने पर हर दिन अखबार लोगों को चेता रहे हैं। जिनके घर में कोई सांस का मरीज, दिल की बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति या पालतू जानवर है, वे तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन ऐसी विचारधारा के लोग जो धर्म-आस्था को देश से ऊपर मानते हैं, उन्होंने बाकायदा अभियान चला कर अधिक से अधिक लोगों को आतिशबाजी चलाने के लिए प्रेरित किया।

चार साल पहले दीवाली के कोई सप्ताह पूर्व ही प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत अभियान की पहल की थी, निहायत सामाजिक पहल, अनिवार्य पहल और देश की छवि दुनिया में सुधारने की ऐसी पहल जिसमें एक आम आदमी भी भारत-निर्माण में अपनी सहभागिता बगैर किसी जमा-पूंजी खर्च किए दे सकता था। तब पूरे देश में झाडू लेकर सड़कों पर आने की मुहिम सी छिड़ गई। नेता, अफसर, गैर-सरकारी संगठन, स्कूल, हर जगह सफाई अभियान की ऐसी धूम रही कि बाजार में झाड़ुओं के दाम आसमान पर पहुंच गए। उस अपील के कोई 14 सौ दिन बाद दीपावली आई, हर घर में साफ-सफाई का पर्व। कहते हैं कि जहां गंदगी होती है, वहां लक्ष्मी जी जाती नहीं हैं, सो घरों का कूड़ा सड़कों पर डालने का दौर चला। हद तो दीपावली की रात को हो गई, गैर-कानूनी होने के बावजूद सबसे ज्यादा आतिशबाजी इस रात चली। सुबह सारी सड़कें जिस तरह गंदगी, कूड़े से पटी थीं, उससे साफ हो गया कि हमारा सफाई अभियान अभी दिल-दिमाग से नहीं केवल मुंह जबानी खर्च पर ही चल रहा है।
'लैंसेट जर्नल' में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2015 में वायु, जल और दूसरे तरफ के प्रदूषणों की वजह से भारत में 25 लाख लोगों ने जान गंवाई। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पाबंदी वाली रात के बाद आंकड़े जारी कर बताया कि गुरुवार सुबह छह बजे अलग-अलग जगहों पर प्रदूषण का स्तर अपने सामान्य स्तर से कहीं ज्यादा ऊपर था। यहां तक कई जगहों पर यह 24 गुना से भी ज्यादा रिकॉर्ड किया गया है। पीएम 2.5 का स्तर पीएम 10 से कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ था। पीएम 2.5 वे महीन कण हैं, जो हमारे फेफड़े के आखिरी सिरे तक पहुंच जाते हैं और कैंसर की वजह बन सकते हैं। चिंता की बात यह है कि पीएम 2.5 का स्तर दिल्ली के इंडिया गेट जैसे इलाकों में जहां हर रोज सुबह कई लोग आते हैं, वहां 15 गुने से भी ज्यादा ऊपर पाया गया।
यह अब सभी जानते हैं कि आतिशबाजी से लोगों के सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, उससे निकले धुएं से हजारों लोग सांस लेने की दिक्कतों के स्थाई मरीज बन जाते हैं, पटाखों का धुआं कई महीनों का प्रदूषण बढ़ा जाता है। इसको लेकर स्कूली बच्चों की रैली, अखबारी विज्ञापन, अपील आदि का दौर चलता रहा है। दुखद बात यह है कि झाड़ू लेकर सफाई करने के फोटो अखबार में छपवाने वालों ने पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को 'धर्म-विरोधी' बताया। हकीकत तो यह है कि कई साल भी पहले सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि रात 10 बजे के बाद आतिशबाजी न हो, क्योंकि इससे बीमार लोगों को असीम दिक्कतें होती हैं। धमाकों की आवाज को लेकर भी 80 से 100 डेसीमल की सीमा है, लेकिन दस हजार पटाखों की लड़ी या 10 सुतली बम एक साथ जलाकर अपनी आस्था या खुशी का इजहार करने वालों के लिए कानून-कायदे कोई मायने नहीं रखते।

चीन से आए गैर-कानूनी पटाखों को चलाने में न तो देश-प्रेम आड़े आया और न ही वैचारिक प्रतिबद्धता। गुरुवार सुबह कुछ लोग सफाई कर्मचारियों को कोसते रहे कि सड़कों पर आतिशबाजी का मलवा साफ करने वे सुबह जल्दी नहीं आए, यह सोचे बगैर कि वे भी इंसान हैं और उन्होंने भी दीवाली मनाई होगी। यह बात लोग समझते ही नहीं कि हमारे देश में सफाई से बड़ी समस्या अनियंत्रित कूड़ा है। पहले कूड़ा कम करने के प्रयास होने चाहिए, साथ में उसके निस्तारण के। दीवाली के धुएं व कूड़े ने यह बात तो सिद्ध कर दी है कि अभी हम मानसिक तौर पर प्रधानमंत्री की अपील के क्रियान्वयन व अमल के लिए तैयार नहीं हुए हैं। जिस घर में छोटे बच्चे, पालतू जानवर या बूढ़े व दिल के रोग के मरीज हैं, जरा उनसे जाकर पूछें कि परंपरा के नाम पर वातावरण में जहर घोलना कितना पौराणिक, अनिवार्य तथा धार्मिक है। एक बात और, भारत में दिवाली पर पटाखे चलाने की परंपरा भी डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है और इस दौर में कुरीतियां भंग भी हुईं व नई बनी भीं, जिन्हें परंपरा तो नहीं कहा जा सकता।

शायद यह भारत की रीति ही है कि हम नारे तो जोर से लगाते हैं लेकिन उनके जमीनी धरातल पर लाने में 'किंतु-परंतु' करने लगते हैं। कहा गया कि भातर को आजादी अहिंसा से मिली, लेकिन जैसे ही आजादी मिली, दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक विभाजन के दौरान घटित हो गया और बाद में अहिंसा का पुजारी हिंसा के द्वारा ही गोलोक गया। यहां शराब नहीं बेची जाती या दूरदृष्टि-पक्का इरादा, अनुशासन ही देश को महान बनाता है या फिर छुआछूत, आतंकवाद, सांप्रदायिक सौहार्द या पर्यावरण या फिर बेटी बचाओ, इन सभी पर अच्छे सेमीनार होते हैं, नारे गढ़े जाते हैं, जलसे होते हैं, लेकिन उनकी असलियत दिवाली पर हुई हरकतों से उजागर होती है। हर इंसान चाहता है कि देश में बहुत से शहीद भगत सिंह पैदा हों, लेकिन उनके घर तो अंबानी या धोनी ही आएं, पड़ोस में ही भगत सिंह जन्म लें, जिसके घर हम कुछ आंसू बहाने, नारे लगाने या स्मारक बनाने जा सकें। जब तक खुद दीप बनकर जलने की क्षमता विकसित नहीं होगी, तब तक दीया-बाती के बल पर अंधेरा जाने से रहा। दिवाली की रात चले पटाखे बता रहे हैं कि अभी हमारे दिमाग में अंधेरा कायम है।

few hours crackers life time problem



एक दिन की आतिशबाजी हमेशा की परेशानियां


सुप्रीम कोर्ट ने जब आतिशबाजी चलाने के कायदे-कानून तय किए थे, तभी पता चल गया था कि इसकी धज्जियां उड़ेंगी ही। लेकिन धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी को अपने घर आमंत्रित कर जब दिल्ली और उसके आसपास के दो सौ किलोमीटर के दायरे में रहने वाले तीन करोड़ से ज्यादा लोग जब अगली सुबह उठे, तो घने दमघोंटू धुएं की गहरी चादर चारों ओर छाई थी। दीपावली की अगली सुबह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आंकड़े जारी करके दिल्ली की औसत वायु गुणवत्ता एक्यूआई(एवरेज एयर क्वालिटी इंडेक्स) को 329 मापा, जो बहुत घातक स्तर का माना जाता है। सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी ऐंड वेदर फॉरकास्टिंग ऐंड रिसर्च यानी सफर का कहना था कि दिल्ली-एनसीआर के हालात एक्यूआई के मापदंड से कहीं अधिक खराब हैं। यह बात इसलिए भी सच लगती है, क्योंकि मध्य दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के करीब, मेजर ध्यानचंद स्टेडियम के पास और दिल्ली की सीमा से सटे आनंद विहार पर हवा की गुणवत्ता थी 999, यानी आपातकाल से भी कई गुना ज्यादा। चाणक्यपुरी जैसे हरियाली वाले इलाके की हवा 459 स्तर पर जहरीली थी।
आतिशबाजी चलाने वालों ने कानून व सुप्रीम कोर्ट की परवाह नहीं की और पूरे देश में हवा इतनी जहर हो गई कि 68 करोड़ लोगों की जिंदगी तीन साल कम हो गई। अकेले दिल्ली में 300 से ज्यादा जगहों पर आग लगी। पूरे देश में आतिशबाजी के कारण लगी आग की घटनाओं की संख्या हजारों में है। इसका आंकड़ा रखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि कितने लोग आतिशबाजी के धुएं से हुई घुटन के कारण अस्पताल गए। अब राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के जिलों के हालात यह हैं कि कानूनन सरकारी सलाह जारी की जाती सकती है कि जरूरी न हो, तो घर से न निकलें। फेफड़ों को जहर से भरकर अस्थमा व कैंसर जैसी बीमारी देने वाले पीएम यानी पार्टिक्युलेट मैटर अर्थात हवा में मौजूद छोटे कणों की निर्धारित सीमा 60 से 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली से पहले ही यह सीमा 900 के पार तक हो गई थी। ठीक यही हाल न केवल देश के अन्य महानगरों के हैं, बल्कि प्रदेशों की राजधानी व मंझोले शहरों के भी हैं। चूंकि हरियाणा-पंजाब में खेतों में पराली जल ही रही है, साथ ही हर जगह विकास के नाम पर हो रहे अनियोजित निर्माण, धूल के कारण हवा को दूषित कर रहे हैं, तिस पर मौसम का मिजाज। सनद रहे कि पटाखे जलाने से निकले धुएं में सल्फर डाई-ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, शीशा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिए शरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव परिवेश में मौजूद पशु-पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं, इससे उपजा करोड़ों टन कचरे का निपटान भी बड़ी समस्या है। यदि इसे जलाया जाए, तो भयानक वायु प्रदूषण होता है। यदि इसके कागज वाले हिस्से को रिसाइकिल किया जाए, तो भी जहर घर, प्रकृति में आता है। और यदि इसे डंपिंग में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए, तो इसके विषैले कण जमीन में जज्ब होकर भूजल व जमीन को स्थाई व लाइलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं। आतिशबाजी से उपजे शोर के घातक परिणाम तो हर साल बच्चे, बूढ़े व बीमार लोग भुगतते ही हैं। दिल्ली के दिलशाद गार्डन में मानसिक रोगों को बड़ा चिकित्सालय है। यह निर्देश है कि यहां दिन में 50 और रात में 40 डेसीबल से ज्यादा का शोर न हो। लेकिन यह आंकड़ा सरकारी मॉनिटरिंग एजेंसी का है कि दीपावली के पहले से यहां शोर का स्तर 83 से 105 डेसीबल के बीच था। दिल्ली के अन्य इलाकों में तो यह 175 डेसीबल तक को पार गया है।
हालात बता रहे हैं कि यदि सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, तो दिल्ली राजधानी क्षेत्र धीरे-धीरे मौत के भंवर में बदलने लग सकता है। इससे कोई भी नहीं बच पाएगा। बड़े-बड़े अस्पताल हों या सरकारी चिकित्सालय, दीपावली की रात से जिस तरह मरीजों से भरे हुए हैं, यह चेतावनी है कि कुछ देर का पाखंड मानवता के लिए खतरा बनता जा रहा है और कानून का पालन न करके हम अपनी मौत खुद ही बुला रहे हैं।एक दिन की आतिशबाजी हमेशा की परेशानियां

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

south china conflict can cause world war key


कहीं बड़ी ज्वाला न बन जाए दक्षिण चीन समुद्र का टकराव 
पंकज चतुर्वेदी 

साउथ चाइना सी में अमेरिकी और चीनी जहाज करीब-करीब आमने-सामने आ गए हैं। चीन ने पिछले साल यहां अपने यु़पोत उतारे थे और अमेरिका ने हाल ही में अपना समुद्री बेड़ा यहां भेज दिया है। आज हालात इतने खतरनाक हैं कि  अमेरिका और चीन का युद्धपोत के बीच की दूरी महज 41 मीटर रह गई है। दोनों ही देशों ने एक दूसरे के ऊपर विवाद को भड़काने का आरोप लगाया है।

अमेरिका ने चीनी नौसैनिक पोत पर आरोप लगाए हैं कि जब एक अमेरिकी युद्धपोत ने विवादित दक्षिण चीन सागर में प्रवेश किया था तो चीनी पोत ‘असुरक्षित एवं गैर पेशेवराना’ तरीके से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहा था। चीन ने भी दक्षिण चीन सागर में उन द्वीपों और चट्टानों के पास से अमेरिकी युद्धपोत के गुजरने पर मंगलवार को कड़ा विरोध जताया है जिन पर वह अपना कब्जा बताता है। यहां जानना जरूरी है कि दक्षिणी चीन के समु्रद में सुलग रही आग काफी सालों से भड़कते-भड़कते बच रही है। यह भी जानना जरूरी है कि कोई 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले दक्षिणी चीन समुद्र क्षेत्र का नाम ही चीन पर है और उस पर चीन का कोई ना तो पारंपरिक हक है और ना ही वैधानिक। इस पर मुहर पिछले साल 2016 के जुलाई में अंतरराश्ट्रीय न्यायालय लगा चुका है कि इस समुद्र के संसाधन आदि पर चीन का कोई हक नहीं बनता है।

साउथ चाईना सी या दक्षिणी चीन समुद्र का जल क्षेत्र, कई एषियाई देषों जिनमें  वियतनाम, फिलीपींस, मलेषिया आदि षामिल हैं, के चीन के साथ तनाव का कारण बना हुआ है। चीन ने इस इलाके के कुछ द्वीप पर लड़ाकू विमानों के लिए पट्टी बना लीं तो अमेरिका के भी कान खड़े हो गए। अमेरिका ने इस पर सख्त आपत्ति जतायी और इसके बाद से दोनों देशों को बीच रिश्तों में भारी तनाव आ गया। पिछले साल अमेरिका की नौ सेना के समु्रदी सर्वेक्षण विभाग द्वारा समु्रद के खारेपन और तापमान बाबत एक सर्वेक्षण हेतु इस समुद्री क्षेत्र में एक ड्रोन को पानी की गहराई में छोड़ा था। चीन को इसकी खबर मिली तो उसने अपनी नौसेना के जरिये उस ड्रोन को पानी से निकलवा कर जब्त कर लिया। चीन का कहना था कि इस ड्रोन के कारण वहंा से गुजर रहे जहाजों के संचार व मार्गदर्षक उपकरणों में व्यवधान हो रहा था, सो उसे जब्त कर लिया गया। हालांकि यह बात किसी के गले उतर नहीं रही है। विेदष नीति के माहिर लेाग जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतते ही उनके द्वारा ताईवान के राश्ट्रपति  तसाई इंग वेनमे से फोन पर बात करना चीन को नागवार गुजरा था। चीन का कहना है कि ताईवान पर उसका कब्जा है और उसने ताईवान को केवल प्रषासिनक स्वात्तता प्रदान की है। वहीं ट्रंप ने ताईवान की चीने से मुक्ति को ले कर कई जाहिर बयान दे दिए।

दक्षिणी चीन समुद्र दक्षिणी-पूर्वी एशिया से प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे तक स्थित कई देशों से घिरा है। इनमें चीन, ताइवान, फिलीपीन्स, मलयेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम हैं। ये सभी देश इस समुद्र पर अपने-अपने दावे कर रहे हैं। 1947 में चीन ने नक्षे के जरिए इस पर अपना दावा पेश किया था। यह सीमांकन काफी व्यापक था और उसने लगभग पूरे इलाके को शामिल कर लिया। इसके बाद कई एशियाई देशों ने चीन के इस कदम से असहमति जताई। वियतनाम, फिलीपीन्स और मलयेशिया ने भी कई द्वीपों पर दावा किया। वियतनाम ने कहा कि उसके पास जो नक्षा है उसमें पार्सेल और स्प्रैटली आइलैंड्स प्राचीन काल से उसका हिस्सा है। इसी तरह ताइवान ने भी दावा किया। 17 साल से फिलीपींस कूटनीतिक प्रयासों के जरिये चीन से दक्षिण चीन सागर विवाद सुलझा लेना चाहता था. बात बनी नहीं, तो फिलिपींस ने 2013 में हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ‘पीसीए’ का दरवाजा खटखटाया. न्यायाधिकरण ने 12 जुलाई 2016 को संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के अनुच्छेद-258 को आधार बना कर फैसला दिया कि ‘नाइन डैश लाइन’ की परिधि में आनेवाले जल क्षेत्र पर चीन कोई ऐतिहासिक दावेदारी नहीं कर सकता. इस फैसले से बाकी देशों को भी राहत मिली है.
असल में यह समुद्र क्षेत्र दुनिया का महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग है। इस इलाके से हर साल कम से कम पांच सौ अरब डॉलर के सामान की आवाजाही होती है। यहां तेल और गैस का विशाल भंडार है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के अनुमान के मुताबिक यहां 11 बिलियन बैरल्स ऑइल और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस संरक्षित है। 1982 के यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी के मुताबिक कोई भी देष अपने समुद्री तटों से 200 नॉटिकल मील की दूरी तक समुद्री संसाधनों- मछली, तेल, गैस आदि पर दावा कर सकता है। इस संधि को चीन, वियतनाम, फिलीपीन्स और मलयेशिया ने तो माना लेकिन अमेरकिा ने इस पर दस्तखत नहीं किए। वैेसे तो दक्षिणी समु्रद पर अमेरिका का ना तो कोई दवा है और ना ही इसकी सीमा उससे कहीं लगती है। लेकिन वह इस महत्वपूर्ण मार्ग व उर्जा के भंडार पर निगाह तो रखता ही है और उसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा कोई है तो वह है चीन। गौरतलब है कि इस इलाके के उर्जा संसाधनों पर भारत की भी रूचि है। वियेतनाम तो भारत को बाकायदा यहां गैस व तेल की खोज के लिए आमंत्रित भी कर चुका है। सन 2011 में ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने जब वियतनाम में तेल की खोज आरंभ की, तो चीन काफी रोष में था. मई, 2014 में चीन ने पारासेल आइलैंड के पास तेल दोहन वाले रिग खड़े कर दिये, जिससे कई दुर्घटनाएं हुईं. चीन कई बार अमेरिका को धमका चुका है कि वह दक्षिण चीन सागर से दूर रहे. चीन ने इन दिनों कहना शुरू किया है कि भारत यदि वियतनाम में तेल की खोज कर सकता है, तो पाक अधिकृत कश्मीर में हमारे प्रोजेक्ट क्यों नहीं लग सकते। वहीं इसी साल जुलाई में इस इलाके में अमेरिकी जेट उड़ने को ले कर चीन व अमेरिका में गंभीर टकराव हो चुका हे। अमेरिका वहां चीन के दखल को गैरकानूनी कहता है तो चीन वहां अमेरिका की सनय गतिविधियों को नापसंद कर रहा है।
साउथ चाइना सी पर बढ़ते विवाद के बीच चीन को चुनौती देते हुए अमेरिकी वायुसेना के दो लड़ाकू विमानों ने विवादित क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरा। अमेरिकी ने चीन के दावों को खारिज करते हुए कहा है उसे अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र मानने पर जोर दिया। अमेरिकी वायुसेना के विमानों ने गुआम से दक्षिणी चीन सागर पर उड़ान भरी।
अमेरिका, साउथ चाइना सी क्षेत्र में चीन द्वारा सैन्य सुविधाओं के निर्माण की हमेशा से आलोचना करता आया है। उसका मानना है कि पेइचिंग इसका इस्तेमाल अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए कर सकता है। वहीं तेल व गैस के लिए अरब देषों पर उसकी निर्भरता  का आधार भी कमजोर होता जा रहा हे। एक तो तेल भ्ंाडार वाले अरब का बड़ा हिस्सा घरेलू हिंसा की चपेट में है, दूसरा घरेलू दवाब के चलते उस क्षेत्र में वह अब लंबे समय तक सेना रख नहीं पाएगा। ऐसे हालात में उसे तेल व गैस के नए भंडार चाहिए। जाहिर है कि इसके लिए वह अपने पुराने दुष्मन वियेतनाम  से भी हाथ मिला सकता है। वहीं ताईवान, फिलीपींस आदि चीन के हाथो ंसे अपनी मुक्ति के लिए अमेरिका की षरण में जा सकते हैं। ऐसे में दक्षिणी समु्रद का इलाका टकरव, युद्ध और नए वैष्विक धु्रवीकरण का केंद भी बन सकता है।
चूंकि चीन को किसी भी सूरत में साउथ चाइना सी पर से अपना दावा और कब्जे को छोड़ना ही पड़ेगा, सो वह अमेरिका जैसे ताकतवर देश के साथ सैन्य टकराव की बात कर रहा है। इससे एक तो अपने नागरिकों को वह अपनी ताकत पनर विष्वास दिलाना चाहता है, दूसरा परमाणु संपन्न और दुनिया की दो बड़ी सैनय ताकतों के टकराव के चलते विष्व युद्ध के भय को फैला कर वह साउथ चाईना सी क्षेत्र में अपना कुछ हिस्सा बताना चाहता है।

सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

Destroy of Aravli can cause increase of desert

अरावली के उजड़ने से बढ़ रहा है रेगिस्तान

पंकज चतुर्वेदी 
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानि यूनेप की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाउ या हरियाली वाली जमीन  रेत के ढेर से ढक रही है औा इसका असर एक अरब लेागों पर पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले इलाकों से इतर है। बेहद हौले से और ना तत्काल दिखने वाली गति से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। इस बात पर बहुत कम लोग ध्यान देतें हैं कि भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीशण रेगिस्तजान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है और यह हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसकी सुरक्षा का काम अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। विडंबना है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।
सन 1996 में थार का क्षेत्रफल एक लाख 96 हजार 150 वर्ग किलोमीटर था जो कि आज दो लाख आठ हजार 110 वर्ग किलोमीटर हो गया है। भारत की कुल 328.73 मिलियन जमीन में से 105.19 मिलियन जमीन पर बंजर ने अपना डेरा जमा लिया है, जबकि 82.18 मिलियन हैक्टर जमीन रेगिसतान में बदल रही है। यह हमारे लिए चिंता की बात है कि देश के एक-चौथाई हिस्से पर आने वाले सौ साल में मरूस्थल बनने का खतरा आसन्न है। हमारे यहां सबसे ज्यादा रेगितान राजस्थान में है, कोई 23 मिलियन हैक्टर। गुजरात, महाराष्ट्र, मप्र, और जम्मू-कश्मीर की 13 मिलियन भूमि पर रेगिस्तान है तो अब उड़ीसा व आंध््राप्रदेश में रेतीली जमीन का विस्तार देखा जा रहा है। अंधाधुंध सिंचाई व जम कर फसल लेने के दुष्परिणाम की बानगी पंजाब है, जहां दो लख हैक्टर जमीन देखते ही देखते बंजर हो गई। बंिटंडा, मानसा, मोगा, फिरोजपुर, मुक्तसर, फरीदकोट आदि में जमीन में रेडियो एक्टिव तत्व की मात्रा सीमा तोड़ चुकी है और यही रेगिस्तान की आमद का संकेत है।
यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। वृक्ष से पानी, पानी से अन्न तथा अन्न से जीवन मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल उजाड़ दिए गए पहाड़ों से ही हुआ है। यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए ‘‘पहाड़’’ पर्यटन स्थल है या फिर उसके कस्बे का पहाड़ एक डरावनी सी उपेक्षित संरचना।  विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में बेहिसाब पर्यटन ने प्रकृति का हिसाब गड़बड़ाया तो मैछानी क्षेत्रों में गांव-कस्बों में विकास के नाम पर आए वाहनों, के लिए चौड़ी सड़कों के निर्माण के लिए जमीन जुटाने या कंक्रीट उगाहने के लिए पहाड़ को ही निशाना बनाया गया। यही नहीं जिन पहाड़ों पर  इमारती पत्थर या कीमती खनिज थे, उन्हें जम कर उजाड़ा गया और गहरी खाई, खुदाई से उपजी धूल को कोताही से छोड़ दिया गया। राजस्थान इस तरह से पहाड़ों के लापरवाह खनन की बड़ी कीमत चुका रहा है। यहां जमीन बंजर हुई, भूजल के स्त्रोत दूषित हुए व सूख गए, लोगों को बीमारियां लगीं व बारिश होने पर खाईयों में भरे पानी में मवेशी व इंसान डूब कर मरे भी।
गुजरात के खेड ब्रह्म से षुरू हो कर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राश्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग शिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असर में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही। अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेश 07 मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में एमासी मेहता की जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई-कई ओदश आते रहे लेकिन दिल्ली में ही अरावली पहाड़ को उजाड़ कर एक सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रालय की बड़ी आवासीय कोलेनी बना दी गई। अब जब दिल्ली में गरमी के दिनों में पाकिस्तान से आ रही रेत की मार व तपन ने तंग करना षुरू किया तब यहां के सत्ताधारियों को पहाड़ी की चिंता हुई। देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहीम चल रही है, लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्श है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्श कर रहे हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया है कि वह 48 घंटे में अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए। दरअसल राजस्थान के 1करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था. इसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन को निशिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक, जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया. इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है, जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए. अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को मानता है तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंके कि इतनी सारी पांबदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है।
यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिशत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बामुश्किल सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए। सनद रहे अरावली  रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है। अरावली  की प्राकृतिक संरचना नश्ट होने की ही त्रासदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृश्णावति, दोहन जैसी नदियां अब लुप्त हो रही है। वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट की एक सर्वें रिपोर्ट बताती है कि जहां 1980 में अरावली क्षेत्र के महज 247 वर्ग किलोमीटर पर आबादी थी, आज यह 638 वर्ग किलोमीटर हो गई है। साथ ही इसके 47 वर्गकिमी में कारखाने भी हैं। जाहिर है कि भले ही 07 मई 1992 को भारत सरकार ने और उसके बाद एक जनहित याचिका पर 2003 में सुप्रीेम कोर्ट ने अरावली पर खनन और इंसानी गतिविधियों पर पांबदी लगाई हो, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ हुआ नहीं।
जान लें कि जि तरह सांस लेने को स्वच्छ वायु जरूरी है वैसे ही स्वच्छ सांस के लिए आपके परिवेश में हरे-भरे पहाड़ की मौजूदगी महत्वपूर्ण है। यदि अरावली का क्षरण नहीं रूका तो देश की राजधानी दिल्ली, देश को अन्न देने वाले राज्य हरियाण और पंजाब में खेती पर संकट खड़ा हो जाएगा।



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