तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 18 जून 2018

Health for all is dream in India


संभव नहीं है सबके लिए स्वास्थ्य

पंकज चतुर्वेदी
स्वास्थ्य के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में शर्मनाक  है। यहां तक कि चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान व बांग्लादेश से भी बदतर हैं। अंतरराश्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘ लांसेट’ की ताजातरीन रिपोर्ट ‘ ग्लोबल बर्डन आफ डिसीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में हमारा देश दुनिया के कुल 195 देशों की सूची में  145वें स्थान पर है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने सन 1990 के बाद अस्पतालों की सेहत में सुधार तो किया है। उस साल भारत को 24.7 अंक मिले थे, जबकि 2016 में ये बढ़ कर 41.2 हो गए हैं। देश के आंचलिक कस्बें की बात तो दूर राजधानी दिल्ली के एम्स या सफदरजंग जैसे अस्पतालों की भीड़ और आम मरीजों की दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। एक तो हम जरूरत के मुताबिक डाक्टर तैयार नहीं कर पा रहे, दूसरा देश की बड़ी आबादी ना तो स्वास्थ्य के बारे में पर्याप्त जागरूक है और ना ही उनके पास आकस्मिक चिकित्सा के हालात में  केाई बीमा या अर्थ की व्यवस्था है।  हालांकि सरकार गरीबों के लिए मुफ्त इलाज की कई योजनाएं चलाती है लेकिन व्यापक अशिक्षा और गैरजागरूकता के कारण ऐसी योजनाएं माकूल नहीं हैं।
पिछले सत्र में ही  सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि देश में कोई 8.18 लाख डॉक्टर मौजूद हैं , यदि आबादी को 1.33 अरब मान लिया जाए तो औसतन प्रति हजार व्यक्ति पर एक डाक्टर का आंकडा भी बहुत दूर लगता है। तिस पर मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी है कि जो भी बच्चा डाक्टर बनेगा, उसकी मजबूरी होगी कि वह दोनेा हाथों से केवल नोट कमाए। मेडिकल कालेज में प्रवेश के आकांक्षी बच्चे दसवीं कक्षा पास कर ही नामी-गिरामी कोचिंग संस्थानों  की शरण में चले जाते हैं जिसकी फीस कई-कई लाख होती है। इतनी महंगी है मेडिकल की पढ़ाई, इतना अधिक समय लगता है इसे पूरा करने में , बेहद कठिन है उसमें दाखिला होना भी---- पता नहीं क्यों इन तीन समस्याओं पर सरकार कोई माकूल कदम क्यों नही उठा पा रह है। हर राजनीतिक दल चुनाव के समय ‘सभी को स्वास्थ्य’’ के ंरंगीन सपने भी दिखाता है, लेकिन इसकी हकीकत किससी सरकारी अस्पताल में नहीं बल्कि किसी पंच सितारा किस्म के बड़े अस्पताल में जा कर उजागर हो जाती है- भीड़, डाक्टरों की कमी, बेतहाशा फीस और उसके बावजूद भी बदहवास तिमारदार। सनद रहे हमारे देश में पहले से ही राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना, ईएसआई, सीजीएचएस जैसी कई स्वास्थ्य योजनाएं समाज के विभिन्न वर्गों के लिए हैं व सभी के हितग्राही असंतुश्ट, हताश  हैं। देशभर के सरकारी अस्पताल मशीनरी, डाक्टर तकनीशियनों के स्तर पर कितने कंगाल हैं, उसके किस्से आए रोज हर अखबार में छपते रहते हैं । भले ही केाई कुछ भी दावे कर ले, लेकिन हकीकत तो यह है कि हमारे यहां इतने डाक्टर ही नहीं है कि सभी को इलाज की कोई भी योजना सफल हो। यदि डाक्टर मिल भी जाएं तो आंचलिक क्षेत्र की बात दूर है, जिला स्तर पर जांच-दवा का इस स्तर का मूलभूत ढ़ांचा विकसित करने में दशकों लगेंगे ताकि मरीज महानगर की ओर ना भागे।  आए रोज नसबंदी के दौरान मौत और मोतियांिबंद आपरेशन के दौरान कई लोगों की आखें की रोशनी जाने जैसे कई ऐसे समाचार प्रकाश में आते हैं जो बताते हैं कि अच्छी नियत से चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाएं लापरवाही या फिर समय व संसाधन की कमी या पैसे के लालच में किस तरह जनविरोधी बन जाती है।

गाजियाबाद दिल्ली से सटा एक विकसित जिला कहलाता है, उसे राजधानी दिल्ली का विस्तार कहना ही उचित होगा। कोई 43 लाख आबादी वाले इस जिले में डाक्टरों की संख्या महज 1800 है, यानी एक डाक्टर के जिम्मे औसतन तीस हजार मरीज। इनका बीस फीसदी भी आम लोगों की पहुंच में नहीं है, क्योंकि अधिकांश डाक्टर उन बड़े-बड़े अस्पतालो में काम कर रहे है, जहां तक औसत आदमी का पहुंचना संभव नहीं होता। राजधानी दिल्ली में ही चालीस फीदी आबादी झोला छाप , नीमहकीमों या छाड़-फूंक वालों के बदौलत अपने स्वास्थ्य की गाड़ी खींचती है। कहने की जरूरत नहीं है कि ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ सेवा की बानगी उ.प्र. का ‘‘एन एच आर एम’’ घेाटाला है। विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी संगठन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में 13.3 लाख फीजिशियन यानी सामान्य डाक्टरों की जरूरत है जबकि उपलब्ध हैं महज 6.13 लाख।  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति 1667 व्यक्ति पर औसतन एक डाक्टर उपलब्ध है। अब गाजियाबद जैसे षहरी जिले और सरकार के आंकड़ों को आमने-सामने रखें तो सांख्यिकीय-बाजीगरी उजागर हो जाती है। यहां जानना जरूरी है कि अमेरिका में आबादी और डाक्टर का अनुपात 1ः 375 है, जबकि जर्मनी में प्रति 283 व्यक्ति पर एक डाक्टर उपलब्ध है। भारत में षहरी क्षेत्रों में तो डाक्टर हैं भी, लेकिन गांव जहां 70 फीसदी आबादी रहती है, डाक्टरों का टोटा है। षहरों में भी उच्च आय वर्ग या आला ओहदों पर बैठे लोगों के लिए तो स्वास्थ्य सेवाएं सहज हैं, लेकिन आम लोगों की हालत गांव की ही तरह है।
स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जरता की बानगी सरकार की सबसे प्रीमियम स्वास्थ्य योजना सीजीएचएस यानि केंद्रीय कर्मचारी स्वास्थ्य सेवा है जिसके तहत पत्रकार, पूर्व सयांसद आदि आते हैं। यहां डिस्पेंसरी सेवानिव्त डाक्टरों के बदौलत है और और डिसपेंसरी को कंप्यूटराईज्ड कर दिया गया है। यहां डाक्टर केवल एक फार्मासिस्ट की तरह लिस्ट में मौजूद दवाओं में से छांट कर देता है। एक दिन  के आठ घंटे में एक डाक्टर में पास सौ या ज्यादा मरीज। बानगी है कि डाक्टर मरीतज को कितनी गंभीरता से देखता होगा। दिल्ली में सीजीएचएस डिस्पेंसरी के डाक्टर मरीजों को सरकारी अस्पताल को रिफर कर देते है। और वहां की भीड़ में ये कर्मचारी हताश हो कर योजना को कोसते हैं। इस योजना के तहत पंजीकृत लोगों में चालीस फीसदी डायबीटिज के मरीज हैं और वे हर महीने केवल नियमित दवा लेने जाते हैं। एक मरीज की औसतन हर दिन की पचास रूप्ए की दवा। वहीं स्टेम सेल से डायबीटिज के स्थाई इलाज का व्यय महज सवा से दो लाख है लेकिन सीजीएचएस में यह इलाज षामिल नहीं है। ऐसे ही कई अन्य रोग है जिनकी आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध है लेकिन सीजीएचएस में उसे षामिल ही नहीं किया गया। एक तो डाक्टरों की कम उपर से मरीजों की संख्या कम करने के प्रयास नहीं।
जब तब संसद में जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा होती है तो सरकार डाक्टरों का रोना झींकती है, लेकिन उसे दूर करने के प्रयास कभी ईमानदारी से नहीं हुए। हकीकत में तो कई सांसदों या उनके करीबियों के मेंडिकल कालेज हैं और वे चाहते नहीं हैं कि देश में मेडिकल की पढ़ाई सहज उपलब्ध हो। बकौल मेडिकल कांउसिंल भारत में 335 मेडिकल कालेजों में 40,525 सीटें एमबीबीएस की हैं। इनमें से बड़ी संख्या में प्राईवेट मेडिकल कालेज हैं। पीएमटी परीक्षा के बाहर बंट रहे पर्चों को यदि भरोसे लायक माने तो मेडिकल कालेज में प्रवेश के लिए नौ से बीस लाख रूपए तो डोनेशन या केपिटेशन देना ही होगा। फिर सालाना शिक्षण षुल्क दो लाख तीस हजार से चार लाख बासठ हजार रुपए तक है। बच्चे को हॉस्टल में रखने की खर्चा एक लाख रुपए, किताबों- कॉपी व मेडिकल यंत्रों का खर्च एक लाख रूपए सालाना। यानी एक साल का कम से कम खर्च पांच लाख रूपए। पांच साल का पच्चीस और डोनेशन मिला कर चालीस लाख। अभी हम मेडिकल में पीजी की बात करते ही नहीं हैं- इसके बाद नौकरी की तो अधिकतम एक लाख रूपए महीने यानी बारह लाख रूपए साल। इनकम टैक्स काट कर हाथ में आए आठ लाख रूपए। यदि प्राईवेट प्रेक्टिस करना हो तो क्लीनिक जमाने, उसके प्रचार-प्रसार में और पांच लाख रूपए। आवक का पता नहीं - कितनी होगी...... कब होगी। अलबत्ता तो सरकारी नौकरी करने वाले एक समूह ए के अफसर जिसकी महीने कर तन्खवाह अस्सी हजार रूपए हो, उसके लिए पढ़ाई का खर्च उठाना ही संभव नहीं है। यदि उसने कर्ज ले कर यह कर भी दिया तो आय के लिए कम से कम सात-आठ साल इंतजार करना पड़ेगा, तब तक एजुकेशन लोन पर ब्याज बढ़ने लगेगा। इसके विपरीत यदि कोई इंजीनियरिंग या एमबीए की पढ़ाई में इससे एक-चौथाई खर्च करता है तो पांच साल बाद ही उसकी सुनिश्चित आय होने लगती है।
कुछ साल पहले तब के केंद्र के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग से डाक्टर तैयार करने के चार साला कोर्स की बात कही थी, लेकिन सरकारी दम पर उसका क्रियान्वयन संभव था हीं नहीं, और प्राईवेट कालेज वाले ऐसी किसी को परवान चढ़ने नहीं देना चाहते।  हाल के वर्शेंा में इंजीनियरिंग और बिजनेस की पढ़ाई के लिए जिस तरह से कालेज खुले, उससे हमारा देश तकनीकी शिक्षा और विशेशज्ञता के क्षेत्र में दुनिया के सामने खड़ा हुआ है। हमारे यहां महंगी मेडिकल की पढ़ाई, उसके बाद समुचित कमाई ना होने के कारण ही डाक्टर लगातार विदेशों की ओर रूख कर रहे हैं। यदि मेडिकल की पढ़ाई सस्ती की जाए, अधिक मेडिकल कालेज खोलने की पहल की जाए, ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों को समुचित सुविधाएं दी जाएं तो देश के मिजाज को दुरूस्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन मेडिकल की पढ़ाई में जिस तरह सरकार ने निजी क्षेत्र को विस्तार से रोक रखा है, जिस तरह अंधाधुंध फीस ली जा रही है; उससे तो यही लगता है कि सरकार ही नहीं चाहती कि हमारे यहां डाक्टरों की संख्या बढ़े। और जब तक डाक्टर नहीं बढ़ेंगे सबके लिए स्वास्थ्य की बात महज लफ्फाजी से ज्यादा नहीं होगी।

पंकज चतुर्वेदी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

रविवार, 17 जून 2018

Nation can not survive without rivers


देखो नदियां ‘‘डूब’’ रही हैं


दिल्ली और हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट में सन 1994 के समझौते को लेकर ज्यादा पानी के लिए झगड़ रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि यमुना में ही पानी सामान्य से पांच फुट नीचे रह गया है। यमुना में पानी कम होने का सीधा असर उसके किनारे बसे गांवों की खेती ही नहीं, पशु पालन और भूजल पर भी पड़ा है। सनद रहे कि दिल्ली- हरियाणा के बीच हुए अनुबंध के अनुसार हरियाणा को हर दिन 450 क्यूसेक पानी दिल्ली के लिए छोड़ना चाहिए, लेकिन वह अभी महज 330 क्यूसेक पानी ही दे पा रहा है। अब अदालत समझौते तो लागू कर सकती है लेकिन नदी में घटते जल स्तर पर तो समाज को ही सोचना होगा। बिहार राज्य में ही उन्नीसवीं सदी तक हिमालय से चल कर कोई छह हजार नदियां यहां तक आती थीं जो संख्या आज घट कर बामुश्किल 600 रह गई है। मधुबनी-सुपौल में बहने वाली नदी तिलयुगाअ भी कुछ दशक पहले तक कोसी से भी बड़ी कहलाती थी, आज यह कोसी की सहायक नदी बन गई है। मध्यप्रदेश में नर्मदा, बेतवा, काली सिंध आदि में लगातार पानी की गहराई घट रही है। दुखद है कि जब खेती, उद्योग और पेयजल की बढ़ती मांग के कारण जल संकट भयावह हो रहा है वहीं जल को सहेज कर शुद्ध रखने वाली नदियां उथली, गंदी और जल-हीन हो रही हैं। 
हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है, जहां से पानी बह कर नदियों में आता है। इसमें हिंमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 20 हजार वर्ग किलोमीटर से बड़ा होता है, उन्हें बड़ा-नदी जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। 20 हजार से दो हजार वर्ग किलोमीटर वाले को मध्यम, दो हजार से कम वाले को लघु जल ग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। इस मापदंड के अनुसार गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, पेन्नार, माही, ब्रह्मणी, महानदी, और साबरमति बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां - गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमालय के हिमखंडों के पिघलने से अवतरित होती हैं। इन सदानीरा नदियों को ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष दस को पठारी नदी कहते हैं, जो मूलतः वर्षा पर निर्भर होती हैं।
यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है।  आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं। 
सन 2009 में  केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या  121 पाई थी जो अब 275 हो चुकी है। यही नहीं आठ साल पहले नदियों के कुल 150 हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था जो अब 302 हो गया है।  बोर्ड ने 29 राज्यों व छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 445 नदियें पर अध्ययन किया, जिनमें से 225 का जल  बेहद खराब हालत में मिला। इन नदियों के किनारे बसे शहरों 650 के 302 स्थानों पर सन 2009 में 38 हाजर एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो कि आज बढ़ कर 62 हजार एमएलडी  हो गया। चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। सरकारी अध्ययन में 34 नदियों में बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्रा 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई और यह उन नदियों के अस्तित्व के लिए बड़े संकट की ओर इशारा करता है। 
भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका 12,363 किलोमीटर मापा गया है इनमें से 1,145 किलोमीटर का क्षेत्र पहले स्तर यानि बेहद दूषित श्रेणी का है।  दिल्ली में यमुना इस पर शीर्ष पर है, इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां 43 नदियां मरने की कगार पर हैं।  असम में 28, मध्यप्रदेश में 21, गुजरात में 17, कर्नाटक में 15, केरल में 13, बंगाल में 17, उप्र में 13, मणिपुर और ओडिशा में 12-12, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए तड़प रही हैं। ऐसी नदियों के कोई 50 किलोमीटर इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है। इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है। भूजल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि यह ना तो इंसान के लायक है, ना ही खेती के। सरकार के ही पर्यावरण और प्रदूषण विभाग बीते 20 सालों से चेताते रहते हैं लेकिन आधुनिकता का लोभ पूरे सिस्टम को लापरवाह बना रहा है। 
जानकर आश्चर्य होगा कि नदियों की मुक्ति का एक कानून गत 62 सालों से किसी लाल बस्ते में बंद है। संसद ने सन 1956 में रिवर बोर्ड एक्ट पारित किया था। इस एक्ट की धारा चार में प्रावधन है कि केंद्र सरकार एक से अधिक राज्यों में बहने वाली नदियों के लिए राज्यों से परामर्श कर बोर्ड बना सकती हे। इन बोर्ड के पास बेहद ताकतवर कानून का प्रावधान इस एक्ट में है, जैसे कि जलापूर्ति, प्रदूषण आदि के स्वयं दिशा निर्देश तैयार, नदियों के किनारे हरियाली, बेसिन निर्माण और योजनओं के क्रियान्वयन की निगरानी आदि करना। 
नदियों के संरक्षण का इतना बड़ा कानून उपलब्ध है लेकिन आज तक किसी भी नदी के लिए रिवर बोर्ड बनया ही नहीं गया। संविधान के कार्यों की समीक्षा के लिए गठित वैंकटचलैया आयोग ने तो अपनी रिपोर्ट में इसे एक ‘मृत कानून’ करार दिया था। द्वितीय प्रशासनिक  सुधार आयोग ने भी कई विकसित देशों का उदाहरण देते हुए इस अधिनियम को गंभीरता से लागू करने की सिफारिश की थी। यह बानगी है कि हमारा समाज  अपनी नदिंया के लिए अस्तित्व के प्रति कितना लापरवाह है ।
असल में इन नदियों को मरने की कगार पर पहुंचाने वाला यही समाज और सरकार की नीतियां हैं। सभी जानते हैं कि इस दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि-आदि। निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ दूसरी अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू। यह एक ऐसा उत्पाद है जिसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता। यह नदियों के बहाव के साथ आती है और तट पर एकत्र होती है। प्रकृति का नियम यही है कि किनारे पर स्वतः आई इस रेत को  समाज अपने काम में लाए, लेकिन गत एक दशक के दौरान हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है। इसके लिए नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है, उसे बेतरतीब खोदा या गहरा किया जाता है। जान लें कि नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत ना केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि वह उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भूगर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है। जब नदी के बहाव पर पॉकलैंड व जेसीबी मशीनों से प्रहार होता है तो उसका पूरा पर्यावरण ही बदल जाता है। 
आज नदियों को जिस बढ़ते प्रदूषण से खतरा है उसे भी समाज की कथित आधुनिक जीवन शैली ने ही विस्तार दिया है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रायायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र 20 प्रतिषत की ही खपत होती है, षेश 80 फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। यही अपशिष्ट या मल-जल कहा जाता है, जो नदियों का दुश्मन  है। भले ही हम कारखानों को दोशी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई  हिस्सा घरेलू मल-जल ही है।  हर घर में शौचालय, घरों मे स्वच्छता के नाम पर बहुत से साबुन और केमिकल का इस्तेमाल, शहरों में मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे हुए बेतरतीब अतिक्रमण नदियो के बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैं। 
                       (पंकज चतुर्वेदी पानी और पर्यावरण के जानकार हैं।)

गुरुवार, 7 जून 2018

Traffic jam becoming killer

शहरों, कस्बों के जाम में फंसी यातायात नीतियां

Hindustan 8-6-18

पिछले दिनों एक राज्य के मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश क्या पहुंचे कि मनाली जाने वाले हाईवे पर 18 किलोमीटर लंबा जाम लग गया। इस तरह के जाम अब देश के तमाम शहरों की किस्मत बनते जा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई तो ठीक है देश के सभी छह महानगर, सभी प्रदेशों की राजधानियों के साथ-साथ तीन लाख आबादी वाले 600 से ज्यादा शहरों-कस्बों शहरों में भी सड़क क्षमता से कईं गुना वाहनों के दवाब के चलते जाम लगना आम बात है। ऐसा जाम सिर्फ उलझन और देरी ही नहीं लाता, वह वायु प्रदूषण को भी कईं गुना बढ़ाता है। ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित ताजा शोध के मुताबिक दुनियाभर में 33 लाख लोग हर साल वायु प्रदूषण के शिकार होते हैं । यही नहीं सड़कों में बेवहज घंटों फंसे लोग मानसिक रूप से भी बीमार हो रहे हैं व उसकी परिणति के रूप में आए रोज सड़कों पर ‘रोड रेज’ के हिंसक मामले दिख जाते हैं। राजधानी दिल्ली हो या जयपुर या फिर भोपाल या शिमला, सड़कों पर रास्ता ना देने या हार्न बजाने या ऐसी ही गैरजरूरी बातों के लिए आए रोज खून बह रहा है। वाहनों की बढ़ती भीड़ के चलते सड़कों पर थमी रफ्तार से लोगों की जेब में होता छेद व विदेशी मुद्रा व्यय कर मंगवाए गए ईंधन का अपव्यय होने से देश का नुकसान है सो अलग। 
यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि बीते दो दशकों के दौरान देश में आटोमोबाईल उद्योग ने बेहद तरक्की किया है और साथ ही बेहतर सड़कों के जाल ने परिवहन को काफी बढ़ावा दिया है। यह किसी विकासशील देश की प्रगति के लिए अनिवार्य भी है कि वहां संचार व परिवहन की पहुंच आम लोगों तक हो। विडंबना है कि हमारे यहां बीते इन्हीं सालों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की उपेक्षा हुई व निजी वाहनों को बढ़ावा दिया गया। या शायद भरोसेमंद और सम्मानजनक सार्वजनिक यातायात सुविधाओं के न होने से जो समर्थ हैं उनके लिए निजी वाहन खरीदना एक मजबूरी बन गया। सार्वजनिक यातायात के साध हमें सही वक्त पर सही सलामत कहीं पहुंचा पाएंगे इसकी कोई गारंटी अभी भी नहीं है।  
शहर हों या हाई वे, जो मार्ग बनते समय इतना चौड़ा दिखता है वही दो-तीन सालों में गली बन जाता है। यह विडंबना है कि हमारे महानगर से ले कर कस्बे तक और सुपर हाईवे से ले कर गांव की पक्की हो गई पगडंडी तक, सड़क पर मकान व दुकान खोलने व वहीं अपने वाहन या घर की जरूरी सामन रखना लोग अपना अधिकार समझते है। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि लुटियन दिल्ली में कहीं भी वाहनों की सड़क पर पार्किंग गैरकानूनी है, लेकिन सबसे ज्यादा सड़क घेर कर वाहन खड़ा करने का काम पटियाला हाउस अदालत, नीति आयोग या साउथ ब्लाक के बाहर ही होता है। जाहिर है कि जो सड़क वाहन चलने को बनाई गई उसके बड़े हिस्से में बाधा होगी तो यातायात प्रभावित होगा ही। 
जाम का बड़ा कारण सड़कों की दोषपूर्ण डिजाइन भी है, जिसके चलते थोड़ी सी बारिश में उन पर जल भराव या फिर मोड़ पर अचानक यातायात धीमा होने या फिर आए रोज उस पर गड्ढे बन जाते हैं। पूरे देश में स्कूलों व सरकारी कार्यालयों के खुलने व बंद होने के समय लगभग समान है। आमतौर पर स्कूलों का समय सुबह है और अब लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, इसका परिणाम हर छोटे-बड़े शहर में सुबह से सड़कों पर जाम के रूप में दिखता है। ठीक यही हाल दफ्तरों के वक्त में होता है। यह सभी जानते हैं कि नए मापदंड वाले वाहन यदि 40 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे अधिक की स्पीड में चलते हैं तो उनसे बेहद कम प्रदूषण होता है। लेिकन यदि ये पहले गेयर में रेंगते हैं तो इनसे सॉलिड पार्टिकल, सल्फर डाय आक्साईड व कार्बन मोनो आक्साईड बेहिसाब उत्सर्जित होता है। क्या स्कूलों के खुलने व बंद होने के समय में अंतर या बदलाव कर इस जाम के तानाव से मुक्ति नहीं पाई जा सकती है। इसी तरह कार्यालयों में भी समय में अंतर, उनके ंबदी दिनों में परिवर्तन किया जा सकता है। कुछ कार्यालयों की बंदी का दिन शनिवार-रविवार की जगह अन्य दिन किया जा सकता है, जिसमें अस्पताल, बिजली, पानी के बिल जमा होने वाले काउंटर आदि हैं।

सोमवार, 4 जून 2018

Development and ecology should be co passenger

विकास का सहयात्री बने पर्यावरण संरक्षण

पंकज चतुर्वेदी


विकास मूलत: प्रगति का उत्प्रेरक तत्व है, लेकिन इसका मूल महज आर्थिक तत्व नहीं है। केवल सड़क, कारखाने, तेज गति की ट्रेन आदि ही विकास शब्द को परिभाषित नहीं करते हैं। देश के हर बाशिंदे -चाहे वे इंसान हों या फिर जीव-जंतु, साफ हवा में सांस लेने के लिए नदी-तालाब, समुद्र स्वच्छ हों, लाखों-लाख किस्म के पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, जानवर-पक्षी उन्मुक्त हो कर अपने नैसर्गिक स्वरूप में जीवन यापन करें-ऐसा विकास ही जनभावनाओं की संकल्पना होता है। तमिलनाडु का एक शहर है रानीपेट। वहां हजारों चमड़े के कारखाने हैं और वहां की प्रति व्यक्ति आय राज्य में सबसे ऊंची है, लेकिन दूसरी तरफ उसे दुनिया के चुनिंदा दूषित नगरों में गिना जाता है।1गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए गंगा एक्शन प्लान के तहत अभी तक हुए कामों की समीक्षा का काम शुरू होना एक अच्छा कदम है, लेकिन यह भी समझना जरूरी होगा कि यमुना, हिंडन, सिंध जैसी नदियों की हालत सुधारे बगैर गंगा में सुधार होना असंभव है। ध्यान रहे, पूवरेत्तर में ब्रह्मपुत्र है तो दक्षिण में मैली होती कावेरी, छत्तीसगढ़ में इंद्रावती- हर जगह की कहानी एक सी ही है। देश की संस्कृति, सभ्यता, लोकाचार के अनुसार सभी छोटी-बड़ी नदियां गंगा की ही तरह पवित्र, जन-आस्थाओं की प्रतीक और पर्यावरण के लिए जरूरी हैं। जिस तरह प्रकृति का तापमान बढ़ रहा है, उसको देखते हुए हिमाचल के ग्लेशियर से लेकर गांव-कस्बे की ताल-तलैया को संरक्षित करना सरकार की योजना में होना चाहिए, वरना गंगा सफाई अभी तक उछाले गए नारों से अलग नहीं होगी। बढ़ती आबादी, जल संकट से निबटने के लिए पाताल फोड़ कर पानी निकालने के बजाय बारिश की हर बूंद को सहेजने की छोटी-छोटी योजनाएं समय की मांग हैं। पर्यावरण मंत्रलय के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदी जोड़ने की परियोजनाओं को लेकर है। अभी तक तो यही सामने आया है कि हजारों करोड़ खर्च कर नदियों को जोड़ने के बाद जिस स्तर पर जंगल व खेतों का नुकसान होना है, उसकी तुलना में फायदे बहुत कम हैं।1साल दर साल बढ़ती गरमी, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल. ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। कहीं कोई नदी, तालाब के संरक्षण की बात कर रहा है तो कहीं पेड़ लगा कर धरती को बचाने का संकल्प, जंगल व वहां के बाशिंदे जानवरों को बचाने के लिए भी सरकार व समाज प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट तेजी से विस्तारित होता शहरीकरण एक समग्र विषय के तौर लगभग उपेक्षित है।1असल में देखें तो संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का- सभी के मूल में विकास की वह अवधारणा है, जिससे शहररूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और नैसर्गिकता। अब सौ नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है। बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि नए बने शहर ऊर्जा, यातायात, गंदगी निस्तारण, पानी के मामलों में अपने संसाधनों पर ही निर्भर होंगे, अन्यथा यह प्रयोग देश के लिए नया पर्यावरणीय संकट होगा।1देश के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं कि कहीं भारत आने वाली सदी में अरबन स्लम या शहरी मलिन बस्तियों में तब्दील ना हो जाए!1भारत में तस्करों की पसंद वह नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका है। पाश्चात्य देश उसका महत्व समझ रहे हैं। नैसर्गिक संपदा की तस्करी महज नैतिक और कानून सम्मत अपराध ही नहीं, बल्कि देश की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविष्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातियों के पौधों की जानकारी है। इनमें से कई भोजन या दवाइयों के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं । दुर्लभ कछुओं, केकड़ों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सामने आ चुके हैं।1 हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य से सतत चलता है। खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी। सांप पर काबू पाने के लिए मोर और नेवले भी जरूरी हैं, लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जाने के लिए भारत के जैव संसार पर तस्करों की निगाहें गहरे तक लगी हुई हैं। भारत ही साक्षी है कि पिछले कुछ वषों के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं और इसका खामियाजा भी समाज भुगत रहा है। इस तरह जैव विविधता को लुप्त होने से बचाना और उसे समृद्ध करना भी सरकार के लिए बड़ा काम होगा।1कानून और योजनाएं सरकार भले ही बहुत सी बना ले, लेकिन जब तक आम लोगों को पर्यावरणीय संरक्षण के सरोकारों से जोड़ा नहीं जाएगा, सरकार का हर प्रयास अधूरा रहेगा। यह जरूरी है कि सरकार शिक्षा, समाज, शोध सभी स्तर पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता को अपने एजेंडे में प्राथमिकता से शामिल करे।1 ’ लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।पंकज चतुर्वेदी11विकास मूलत: प्रगति का उत्प्रेरक तत्व है, लेकिन इसका मूल महज आर्थिक तत्व नहीं है। केवल सड़क, कारखाने, तेज गति की ट्रेन आदि ही विकास शब्द को परिभाषित नहीं करते हैं। देश के हर बाशिंदे -चाहे वे इंसान हों या फिर जीव-जंतु, साफ हवा में सांस लेने के लिए नदी-तालाब, समुद्र स्वच्छ हों, लाखों-लाख किस्म के पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, जानवर-पक्षी उन्मुक्त हो कर अपने नैसर्गिक स्वरूप में जीवन यापन करें-ऐसा विकास ही जनभावनाओं की संकल्पना होता है। तमिलनाडु का एक शहर है रानीपेट। वहां हजारों चमड़े के कारखाने हैं और वहां की प्रति व्यक्ति आय राज्य में सबसे ऊंची है, लेकिन दूसरी तरफ उसे दुनिया के चुनिंदा दूषित नगरों में गिना जाता है।1गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए गंगा एक्शन प्लान के तहत अभी तक हुए कामों की समीक्षा का काम शुरू होना एक अच्छा कदम है, लेकिन यह भी समझना जरूरी होगा कि यमुना, हिंडन, सिंध जैसी नदियों की हालत सुधारे बगैर गंगा में सुधार होना असंभव है। ध्यान रहे, पूवरेत्तर में ब्रह्मपुत्र है तो दक्षिण में मैली होती कावेरी, छत्तीसगढ़ में इंद्रावती- हर जगह की कहानी एक सी ही है। देश की संस्कृति, सभ्यता, लोकाचार के अनुसार सभी छोटी-बड़ी नदियां गंगा की ही तरह पवित्र, जन-आस्थाओं की प्रतीक और पर्यावरण के लिए जरूरी हैं। जिस तरह प्रकृति का तापमान बढ़ रहा है, उसको देखते हुए हिमाचल के ग्लेशियर से लेकर गांव-कस्बे की ताल-तलैया को संरक्षित करना सरकार की योजना में होना चाहिए, वरना गंगा सफाई अभी तक उछाले गए नारों से अलग नहीं होगी। बढ़ती आबादी, जल संकट से निबटने के लिए पाताल फोड़ कर पानी निकालने के बजाय बारिश की हर बूंद को सहेजने की छोटी-छोटी योजनाएं समय की मांग हैं। पर्यावरण मंत्रलय के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदी जोड़ने की परियोजनाओं को लेकर है। अभी तक तो यही सामने आया है कि हजारों करोड़ खर्च कर नदियों को जोड़ने के बाद जिस स्तर पर जंगल व खेतों का नुकसान होना है, उसकी तुलना में फायदे बहुत कम हैं।1साल दर साल बढ़ती गरमी, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल. ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। कहीं कोई नदी, तालाब के संरक्षण की बात कर रहा है तो कहीं पेड़ लगा कर धरती को बचाने का संकल्प, जंगल व वहां के बाशिंदे जानवरों को बचाने के लिए भी सरकार व समाज प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट तेजी से विस्तारित होता शहरीकरण एक समग्र विषय के तौर लगभग उपेक्षित है।1असल में देखें तो संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का- सभी के मूल में विकास की वह अवधारणा है, जिससे शहररूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और नैसर्गिकता। अब सौ नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है। बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि नए बने शहर ऊर्जा, यातायात, गंदगी निस्तारण, पानी के मामलों में अपने संसाधनों पर ही निर्भर होंगे, अन्यथा यह प्रयोग देश के लिए नया पर्यावरणीय संकट होगा।1देश के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं कि कहीं भारत आने वाली सदी में अरबन स्लम या शहरी मलिन बस्तियों में तब्दील ना हो जाए!1भारत में तस्करों की पसंद वह नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका है। पाश्चात्य देश उसका महत्व समझ रहे हैं। नैसर्गिक संपदा की तस्करी महज नैतिक और कानून सम्मत अपराध ही नहीं, बल्कि देश की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविष्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातियों के पौधों की जानकारी है। इनमें से कई भोजन या दवाइयों के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं । दुर्लभ कछुओं, केकड़ों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सामने आ चुके हैं।1 हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य से सतत चलता है। खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी। सांप पर काबू पाने के लिए मोर और नेवले भी जरूरी हैं, लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जाने के लिए भारत के जैव संसार पर तस्करों की निगाहें गहरे तक लगी हुई हैं। भारत ही साक्षी है कि पिछले कुछ वषों के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं और इसका खामियाजा भी समाज भुगत रहा है। इस तरह जैव विविधता को लुप्त होने से बचाना और उसे समृद्ध करना भी सरकार के लिए बड़ा काम होगा।1कानून और योजनाएं सरकार भले ही बहुत सी बना ले, लेकिन जब तक आम लोगों को पर्यावरणीय संरक्षण के सरोकारों से जोड़ा नहीं जाएगा, सरकार का हर प्रयास अधूरा रहेगा। यह जरूरी है कि सरकार शिक्षा, समाज, शोध सभी स्तर पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता को अपने एजेंडे में प्राथमिकता से शामिल करे।1 ’ लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

पॉलिथीन पर पाबंदी के लिए चाहिए वैकल्पिक व्यवस्था


बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलिथीन के प्रति लोभ ना तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं, ना ही खरीदार। पॉलिथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है। इससे बचने के लिए वैकल्पिक उत्पादों पर हमें गौर करना होगा।

एक साल पहले मध्य प्रदेश सरकार की घोषणा हो या फिर दिल्ली से सटे गाजियाबाद नगर निगम द्वारा चलाया गया सख्त अभियान, लोग मानते हैं कि पॉलिथीन थैली नुकसानदेह है लेकिन अगले ही पल कोई मजबूरी जताकर उसे हाथ में ले कर चल देते हैं। विडंबना है कि हर एक इंसान यह मानता है कि पॉलिथीन बहुत नुकसान कर रही है, लेकिन उसका मोह ऐसा है कि किसी ना किसी बहाने से उसे छोड़ नहीं पा रहा है।


देशभर की नगर निगमों के बजट का बड़ा हिस्सा सीवर व नालों की सफाई में जाता है और परिणाम-शून्य ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण पूरे मल-जल प्रणाली में पॉलिथीन का अंबार होना है। यह पहला मामला नहीं है जब स्थानीय प्रशासन ने पॉलिथीन पर पाबंदी की पहल की हो, रीवा, भुवनेश्वर, शिमला, देहरादून, बरेली, देवास, बनारस… देश के हर राज्य के कई सौ शहर यह प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अपेक्षित नहीं आने का सबसे बड़ा कारण विकल्प का अभाव है।
कच्चे तेल के परिशोधन से मिलने वाले डीजल, पेट्रोल आदि के साथ ही पॉलिथीन बनाने का मसाला भी पेट्रो उत्पाद ही है। यह इंसान और जानवर दोनों के लिए जानलेवा है। घटिया पॉलिथीन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है। पॉलिथीन की थैलियां नष्ट नहीं होती हैं और धरती की उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं। साथ ही मिट्टी में इनके दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ता है।
पॉलिथीन खाने से गायों व अन्य जानवरों के मरने की घटनाएं तो अब आम हो गई हैं। फिर भी बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलिथीन के प्रति लोभ ना तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं ना ही खरीदार। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभ्ययारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्राओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है।
पॉलिथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है। यह मानवोचित गुण है कि इंसान जब किसी सुविधा का आदी हो जाता है तो उसे तभी छोड़ पाता है जब उसका विकल्प हो। यह भी सच है कि पॉलिथीन बीते दो दशक के दौरान बीस लाख से ज्यादा लोगों के जीवकोपार्जन का जरिया बन चुका है जो कि इसके उत्पादन, व्यवसाय, पुरानी पन्नी एकत्र करने व उसे कबाड़ी को बेचने जैसे काम में लगे हैं। वहीं पॉलिथीन के विकल्प के रूप में जो सिंथेटिक थैले बाजार में डाले गए हैं, वे एक तो महंगे हैं, दूसरे कमजोर और तीसरे वे भी प्राकृतिक या घुलनशील सामग्री से नहीं बने हैं और उनके भी कई विषम प्रभाव हैं। कुछ स्थानों पर कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांटे भी गए लेकिन मांग की तुलना में उनकी आपूर्ति कम थी।
यदि वास्तव में बाजार से पॉलिथीन का विकल्प तलाशना है तो पुराने कपड़े के थैले बनवाना एक विकल्प है। इससे कई लोगों को विकल्प मिलता है- पॉलिथीन निर्माण की छोटी-छोटी इकाई लगाए लोगों को कपड़े के थैले बनाने का,  उसके व्यापार में लगे लोगों को उसे दुकानदार तक पहुंचाने का और आम लोगों को सामान लाने-ले जाने का। यह सच है कि जिस तरह पॉलिथीन की मांग है उतनी कपड़े के थैले की नहीं होगी, क्योंकि थैला कई-कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कपड़े के थैले की कीमत, उत्पादन की गति भी उसी तरह पॉलिथीन के मानिंद तेज नहीं होगी। सबसे बड़ी दिक्कत है दूध, जूस, बनी हुई करी वाली सब्जी आदि के व्यापार की। इसके लिए एल्यूमिनियम या अन्य मिश्रित धातु के खाद्य-पदार्थ के लिए माकूल कंटेनर बनाए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात घर से बर्तन ले जाने की आदत फिर से लौट आए तो खाने का स्वाद, उसकी गुणवत्ता, दोनों ही बनी रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पॉलिथीन में पैक दूध या गरम करी उसके जहर को भी आपके पेट तक पहुंचाती है। आजकल बाजार माइक्रोवेव में गरम करने लायक एयरटाइट बर्तनों से अटा पड़ा है, ऐसे कई-कई साल तक इस्तेमाल होने वाले बर्तनों का भी विकल्प के तौर पर विचार किया जा सकता है। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बायो प्लास्टिक को बढ़ावा देना चाहिए। बायो प्लास्टिक चीनी, चुकंदर, भुट्टा जैसे जैविक रूप से अपघटित होने वाले पदार्थों के इस्तेमाल से बनाई जाती है। हो सकता है कि शुरूआत में कुछ साल पन्नी की जगह कपड़े के थैले व अन्य विकल्प के लिए कुछ सब्सिडी दी जाए तो लोग अपनी आदत बदलने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन यह व्यय पॉलिथीन से हो रहे व्यापक नुकसान की तुलना में बेहद कम ही होगा।
सनद रहे कि 40 माइक्रॉन से कम पतली पन्नी सबसे ज्यादा खतरनाक होती है। सरकारी अमलों को ऐसी पॉलिथीन उत्पादन करने वाले कारखानों को ही बंद करवाना पड़ेगा। वहीं प्लास्टिक कचरा बीन कर पेट पालने वालों के लिए विकल्प के तौर पर बंगलुरू के प्रयोग पर विचार कर सकते हैं, जहां लावारिस फेंकी गई पन्नियों को अन्य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी पन्नियों को डामर के साथ गला कर सड़क बनाने का काम चल रहा है। जर्मनी में प्लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है।
“नेशनल इनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट”, नागपुर के मुताबिक देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 ग्राम से 60 ग्राम कचरा हर दिन निकालता है। इसमें से आधे से अधिक कागज, लकड़ी या पुट्ठा होता है, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा, घरेलू गंदगी होती है। कचरे का निबटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। दिल्ली की नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर तक दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रही है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना कितना महंगा व जटिल काम है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निबटान हो पाता है। असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार में ऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं। देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह शेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। हमरा बाथ्रूम और किचन तो कूड़े का बड़ा उत्पादनकर्ता बन गया है।
अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन लेकर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बर्तनों का प्रचलन, बाजार से सामान लाते समय पॉलिथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग; ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। घरों में सफाई और खुशबू के नाम पर बढ़ रहे साबुन व अन्य रसायनों के चलन ने भी अलग किस्म के कचरे को बढ़ाया है।
हिमाचल प्रदेश तथा केरल जैसे विकल्प तो और भी बहुत  हैं, बस जरूरत है तो एक नियोजित दूरगामी योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए जबरदस्त इच्छाशक्ति की।
केरल से सीखें प्लास्टिक कचरा कम करना
केरल राज्य ने इस विकराल समस्या के समझा और पूरे राज्य में कचरा कम करने के कुछ कदम उठाए। इस दिशा में जारी दिशा-निर्देशों में सबसे ज्यादा सफल रहा है डिस्पोजेबल बॉल पेन के स्थान पर इंक पेन इस्तेमाल का अभियान। सरकार ने पाया कि हर दिन लाखों रिफिल और एक समय इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पेन राज्य के कचरे में इजाफा कर रहे हैं। सो, कार्यालयीन आदेश निकाल कर सभी सरकारी दफ्तरों में बाल पाईंट वाले पेनों पर पांबदी लगा दी गई। अब सरकारी खरीद में केवल इंक पेन खरीदे व इस्तेमाल किए जा रहे हैं। राज्य के स्कूल, कालेजों और चौराहों पर कचरा बन गए बॉल पेनों के एकत्रीकरण के लिए डिब्बे लगाए गए हैं। कई जिलों में एक दिन में पांच लाख तक बेकार प्लास्टिक पेन एकत्र हुए। इस बीच इंक पेन और श्याही पर भी छूट दी जा रही है। अनुमान है कि यदि पूरे राज्य में यह येाजना सफल हुई तो प्रति दिन पचास लाख प्लास्टिक पेन का कचरा र्प्यावरण में मिलने से रह जाएगा। इन एकत्र पेनों को वैज्ञानिक तरीके से निबटाया भी जा रहा है। राज्य सरकार ने इसके अलावा कार्यालयों में पैक्ड पानी की बोतलों के स्थान पर स्टील के बर्तन में पानी, सरकारी आयोजनों में फ्लेक्स बैनर और गुलदस्ते के फूलों को पनी में लपेटने पर रोक लगा दी है। प्रत्येक कार्यालय में कचरे को अलग-अलग करना, कंपोस्ट बनाना, कागज के कचरे को रिसाईकिल के लिए देना और बिजली व इलेक्ट्रानिक कचरे को एक-कर प्रत्येक तीन महीने में वैज्ञानिक तरीके से उसको ठिकाने लगाने की योजनाएं जमीनी स्तर पर बेहद कारगर रही हैं।

शुक्रवार, 1 जून 2018

reducing agriculture land , reducing farmers in UP

उ.प्र.: सिमटती खेती, उजड़ता किसान

पंकज चतुर्वेदी

जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम का गड़बड़ाता मिजाज, खेती के घाटे का सौदा होने और कथित विकास के लिए जमीन की बढ़ती मांग ने उ.प्र. में खेती-किसानी के लिए बड़ा संकट खड़ा कर दिया हे। इससे केवल देश को अन्न उपलब्ध कराने की क्षमता ही नहीं, कृषि  पर लोगों की निर्भरता भी घटी है। इसके चलते भयंकर पलायन हो रहा है। कहीं विकास के नाम पर तो कही शहरीकरण की चपेट में खेत सिमट रहे हैं , वहीं खेती में लाभ ना देख कर उससे विमुख हो रहे लोगों की संख्या साल-दर-साल बढ़ रही है। यह हाल है देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्राी व सबसे ज्यादा सांसद देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश का। यह दुखद है कि राज्य का किसान दिल्ली या ऐसे ही महानगर में दूसरों की चाकरी करे, गांव की खुली हवा-पानी छोड़ कर महानगर की झुग्गियों में बसे और यह मानने को मजबूर हो जाए कि उसका श्रम किसी पूंजीपति के पास रेहन रख दिया गया है।

सरकारी आंकड़ों के चश्में से यदि उप्र को देखें तो प्रदेश में 24202000 हेक्टेयर भूमि है जिसमें से षुद्ध बुवाई वाला(यानी जहां खेती होती है) रकवा 16812000हेक्टेयर है जो कुल जमीन का 69.5 फीसदी है। जाहिर है कि राज्य के निवासियों की चूल्हा-चौका का सबसे बड़ा जरिया खेती ही है। राज्य में कोई ढाई फीसदी जमीन उसर या खेती के अयोग्य भी है।  प्रदेश के 53 प्रतिशत लोग किसान हैं और कोई 20 प्रतिशत खेतिहर मजदूर। यानी लगभग तीन-चौथाई आबादी इसी जमीन से अपना अन्न जुटाती है। एक बात और गौर करने लायक है कि 1970-1990 के दो दशकों के दौरान राज्य में नेट बोया गया क्षेत्रफल 173 लाख हेक्टेयर स्थिर रहने के पश्चात अब लगातार कम हो रहा है।  ऐसोचेम का कहना है कि हाल के वशों में उ.प्र. का कृशि के मामले में सालाना विकास दर यानि सीएजीआर महज 2.9 प्रतिशत है, जोकि राश्ट्रीय प्रतिशत 3.7 से बेहद कम व निराशाजनक है। विकास के नाम पर सोना उगलने वाली जमीन की दुर्दशा इस आंकड़े से आंसू बहाती दिखती है कि उत्तर प्रदेश में सालाना कोई 48 हजार हेक्टेयर खेती की जमीन  कंक्रीट द्वारा निगली जा रही है। वैसे तो सन 2013 की कृषि  नीति में राज्य षासन ने खेती की विकास दर 5.3 तक ले जाने का लक्ष्य तय किया गया था और  इसके लिए अनुबंध खेती, बीटी बीज जैसे प्रयोग भी शु रू हुए थे। लेकिन यह सब तभी संभव है जब खेती लायक जमीन, सड़क, श हर जैसे निर्माण कार्यों के बनने से बचेगी।

उत्तरप्रदेश की सालाना राज्य आय का 31.8 प्रतिशत खेती से आता है। हालांकि यह प्रतिशत सन 1971 में 57, सन 1981 में 50 और 1991 में 41 हुआ करता था। साफ नजर आ रहा है कि लोगों से खेती दूर हो रही है - या तो खेती ज्यादा फायदे का पेशा नहीं रहा या फिर दीगर कारणों से लोगों का इससे मोहभ्ंग हो रहा है। दिल्ली से सटे जिलों- गाजियाबाद, बागपत, गौतम बु़द्ध नगर जिले से बीते तीन दशकों से खेत उजड़ने का जो सिलसिला शु रू हुआ , उससे भले ही कुछ लोगों के पास पैसा आ गया हो , लेकिन वह अपने साथ कई ऐसी बुराईयां व अपराध लाया कि गांवों की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता सभी कुछ नष्ट  हो गई। जिनके खेत थे, उन्हें तो कार, मकान और मौज-मस्ती के लिए पैसे मिल गए, लेकिन उनके खेतों में काम करने वाले तो बेरोजगार हो गए। उनके लिए करीबी महानगर दिल्ली में आ कर रिक्शा चलाने या छोटी-मोटी नौकरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। जो गांव में आधा पेट रह कर भी खुश  थे, वे आज दिल्ली में ना तो खुद खुश है और ना ही दूसरों की खुशी के लिए कुछ कर पा रहे हैं। देश के अन्न भंडार भरने वाले खेतों पर जो आवासीय परिसर खड़े हो रहे हैं, वे बगैर घर वाले लोगों की जरूरत पूरा करने के बनिस्पत निवेश का कम ज्यादा कर रहे हैं। वहीं अधिगृहित भूमि पर लगने वाले कारखानों में स्थानीय लोगों के लिए मजदूर या फिर चौकीदार से ज्यादा रोजगार के अवसर नहीं । इन कारखानों में बाहर से मोटे वेतन पर आए लोग स्थानीय बाजार को महंगा कर रहे है, जोकि स्थानीय लोगों के लिए नए तरीके की दिक्कतें पैदा कर रहा है।

राज्य में बड़े या मझौले उद्योगों को स्थापित करने में कई समस्याएं हैं- बिजली व पानी की कमी, कानून-व्यवस्था की जर्जर स्थिति, राजनैतिक प्रतिद्वंदिता और इच्छा-शक्ति का अभाव। ऐसे में खेती पर जीवकोपार्जन व रोजगार का जोर बढ़ जाता है। इस कटु सत्य से बेखबर सरकार पक्के निर्माण, सड़कों में अपना भविश्य तलाश रही है और अपनी गांठ के खेतों को उस पर खपा रही है। यदि हाल ऐसा ही रहा तो आने वाले पांच सालों में राज्य की कोई तीन लाख हेक्टेयर जमीन से खेतों का नामोनिशान मिट जाएगा। किसान को भले ही देर से सही, यह समझ में आ रही है कि षहर व आधुनिक सुख-सुविधाओं की बातें मृगमरिचिका है और एक बार जमीन हाथ से जाने के बाद मिट्टी भी मुट्ठी में नहीं रह जाती है। मुआवजे का पैसा पूर्णिमा की चंद्र-कला की तरह होता है जो हर दिन के हिसाब से स्याह पड़ता जाता है। गांव वाले, विशेशरूप से खेती करने वाले यह भांप गए हैं कि जमीन हाथ से निकलेने के बाद उनके बच्चों की षादियां भी मुश्किल है और ऐसे परिवार वालों की संख्या, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ी है जिनके यहां वंश बढ़ाने वाला ही नहीं बच रहा है।

प्रदेश के चहुंमुखी विकास के लिए कारखाने, बिजली परियोजना और सड़कें सभी कुछ जरूरी हैं, लेकिन यह भी तो देखा जाए कि अन्नपूर्णा धरती को उजाड़ कर इन्हें पाना कहां तक व्यावहारिक व फायदेमंद है। सनद रहे कि राज्य की कोई 11 फीसदी भूमि या तो ऊसर है या फिर खेती में काम नहीं आती है। यह बात जरूर है कि ऐसे इलाकों में मूलभूत सुविधाएं जुटाने में जेब कुछ ज्यादा ढीली करनी होगी। काश ऐसे इलाकों में नई परियोजना, कारखानों आदि को लगाने के बारे में सोचा जाए। इससे एक तो नए इलाके विकसित होंगे, दूसरा खेत बचे रहेंगे, तीसरा विकास ‘‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’’ वाला होगा। हां, ठेकेदारों व पूंजीपतियों के लिए  यह जरूर महंगा सौदा होग, दादरी, अलीगढ़ या गाजियाबाद की तुलना में। वैसे उप्र सरकार विश्व बैंक से उसर-बंजर जमीन के सुधार के नाम पर 1332 करोड़ का कर्जा भी ले चुकी है। यह कैसी नौटंकी है कि एक तरफ से तो करोड़ो का कर्जा ले कर सवा लाख हेक्टेयर जमीन को खेती के लायक बनाने के कागजी घोड़े दौड़ रहे हैं दूसरी आरे अच्छे-खासे खेतों को ऊसर बनाया जा रहा है।
यही नहीं इस राज्य में नकली बीज व खाद की भी समस्या निरंकुश है तो खेत सींचने के लिए बिजली का टोटा है। कृशि मंडियां दलालों का अड्डा बनी है व गन्ना, आलू जैसी फसलों के वाजिब दाम मिलना या सही समय पर कीमत मिलना लगभग असंभव जैसा हो गया हे। जाहिर है कि ऐसी घिसी-पिटी व्यवस्था में नई पीढ़ी तो काम करने से रही, सो वह खेत छोड़ कर चाकरी करने पलायन कर रही है।
जब तक खेत उजड़गे, दिल्ली जैसे महानगरों की ओर ना तो लोगों का पलायन रूकेगा और ना ही अपराध रूकेंगे , ना ही जन सुविधाओं का मूलभूत ढ़ांचा लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप होगा। आज किसानों के पलायन के कारण दिल्ली  व अन्य महानगर त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, कल जमीन से उखड़े ये कंुठित, बेरोजगार और हताश लोगों की भीड़ कदम-कदम पर महानगरों का रास्ता रोकेगी। यदि दिल से चाहते हो कि कभी किसान दिल्ली की ओर ना आए तो सरकार व समाज पर दवाब बनाएं कि दिल्ली या लखनऊ उसके खेत पर लालच से लार टपकाना बंद कर दे।

बुधवार, 30 मई 2018

we are wasting water

पानी की बर्बादी क्यों?


पंकज चतुर्वेदी 


राष्ट्रीय सहारा 
गरमी कुछ समय से पहले आई और भयंकर आई। बीती बरसात कमजोर रही थी देश के कोई 360 जिलों में पानी की मारामारी थी। यह देश के लिए अब हर तीन साल में एक बार के नियमित हालात हो गए हैं। तपती गर्मी के बाद जब आसमान पर बादल छाते हैं तो क्या इंसान और क्या पशु-पक्षी, सभी सुकून की सांस लेते हैं। पेड़-पौधों को भी उम्मीद बंधती है। हालांकि बरसते बादल कहीं रौद्र रूप दिखाते हैं तो कहीं रूठ जाते हैं। बाढ़ और सूखा प्रकृति के दो पहलू हैं, बिल्कुल धूप और छांव की तरह। लेकिन बारिश बीतते ही देशभर में पानी की त्राहि-त्राहि की खबरें आने लगती हैं। कहीं पीने को पानी नहीं है तो कहीं खेत को। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि बारिश का इतना सारा पानी आखिर जाता कहां है? इसका कुछ हिस्सा तो भाप बनकर उड़ जाता है और कुछ समुद्र में चला जाता है। कभी सोचा आपने कि यदि इस पानी को अभी सहेजकर न रखा गया तो भविष्य में क्या होगा और कैसे पूरी होगी हमारी पानी की आवश्यकता? दुनिया के 1.4 अरब लोगाों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। 

प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं उसे वापस भी हमें ही लौटाना होता है। पानी के बारे में एक नहीं, कई चौंकाने वाले तय हैं, जिसे जानकर लगेगा कि सचमुच अब हममें थोड़ा सा भी पानी नहीं बचा है। कुछ तय इस प्रकार हैं-मुंबई में रोज गाड़ियां धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण 17 से 44 प्रतिशत पानी प्रतिदिन बेकार बह जाता है। ब्रrापुत्र नदी का प्रतिदिन 2.16 घन मीटर पानी बंगाल की खाड़ी में चला जाता है। भारत में हर वर्ष बाढ़ के कारण करीब हजारों मौतें व अरबों का नुकसान होता है। इस्रइल में औसत बारिश 10 सेंटीमीटर है, इसके बावजूद वह अनाज निर्यात करता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटीमीटर से भी अधिक वष्ा होने के बावजूद सिंचाई के लिए जरूरी जल की कमी बनी रहती है। यह भी कड़वा सच है कि हमारे देश में औरत पीने के पानी की जुगाड़ के लिए हर रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती हैं। हमारे समाज में पानी बरबाद करने की राजसी प्रवृत्ति है, जिस पर अभी तक अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं हुई है। हकीकत में जब से देश आजाद हुआ है, तब से आज तक इस दिशा में कोई भी काम गंभीरता से नहीं हुआ है। पृवी का विस्तार 51 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। उसमें से 36 करोड़ वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र पानी से घिरा हुआ है। दुर्भाग्य यह है कि इसमें से पीने लायक पानी का क्षेत्र बहुत कम है। 97 प्रतिशत भाग तो समुद्र है। बाकी के तीन प्रतिशत हिस्से में मौजूद पानी में से 2 प्रतिशत पर्वत और ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है, जिसका कोई उपयोग नहीं होता है। यदि इसमें से करीब 6 करोड़ घन किलोमीटर बर्फ पिघल जाए तो हमारे महासागारों का तल 80 मीटर बढ़ जाएगा, किंतु फिलहाल यह संभव नहीं। 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में खुलापन आने के बाद निजीकरण का जोर बढ़ा है। एक के बाद एक कई क्षेत्र निजीकरण की भेंट चढ़ते गए। सबसे बड़ा झटका जल क्षेत्र के निजीकरण का है। जब भारत में बिजली के क्षेत्र को निजीकरण के लिए खोला गया तब कोई बहस नहीं हुई। बड़े पैमाने पर बिजली गुल होने का डर दिखाकर निजीकरण को आगे बढ़ाया गया, जिसका नतीजा आज सबके सामने है। सरकारी तौर पर भी यह स्वीकार किया जा चुका है कि सुधार औंधे मुंह गिरे हैं और राष्ट्र को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अब पानी के क्षेत्र में ऐसी ही निजीकरण की बात हो रही है। कई जगह नदियों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। विकास के नाम पर तालाब व नदियों को उजाड़ने में कोई परहेज नहीं हो रहा है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया तो संभव है पानी केवल हमारी आंखों में ही बच पाए। हमारा देश वह है, जिसकी गोदी में हजारों नदियां खेलती थीं, आज वे नदियां हजारों में से केवल सैकड़ों में रह गई हैं। आखिर कहां गई ये नदियां कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दें, हमारे गांव-मोहल्लों तक से तालाब, कुएं, बावड़ी आदि लुप्त हो रहे हैं। जान लें, पानी की कमी, मांग में वृद्धि तो साल-दर-साल ऐसी ही रहेगी। अब मानव को ही बरसात की हर बूंद को सहेजने और उसे किफायत से खर्च करने पर विचार करना होगा। इसमें अन्न की बर्बादी सबसे बड़ा मसला है-जितना अन्न बर्बाद होता है, उतना ही पानी जाया होता है। 


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