तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

beware of malaria ! going out of control

धरती के गरम होने व निष्प्रभावी  दवाओं से फैल रहा है मलेरिया

पंकज चतुर्वेदी
संयुक्त राश्ट्र ने तीन साल पहले ही हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका को मलेरिया से मुक्त घोषित  कर दिया। दूसरी तरफ बरसात विदा होंते ही राजधानी दिल्ली में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया का हमला हो गया है। इसमें कोई षक नहीं कि श्रीलंका की आबादी और क्षेत्रफल भारत से बहुत कम है, लेकिन यह भी मानना होगा कि हमारे पास संसाधन, मानव श्रम, शिक्षा, चिकित्सा  की मूलभूत सुविधांए श्रीलंका से कहीं ज्यादा हैं। दोनो देशेां की मौसमी और भौगोलिक परिस्थितयों में काफी समानता है, लेकिन पिछले अनुभव बानगी हैं कि हमारे देश में योजनाएं तो बहुत बनती हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन स्तर पर लालफीताशाही के चलते अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। मलेरिया डेंगू , जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसे नए-नए संहारक शस्त्रों से लैसे हो कर जनता पर टूट रहा है और सरकारी महकमे अपने पुराने नुस्खों को अपना कर उनके असफल होने का रोना रोते रहते हैं । यही नहीं हाथी पांव यानी फाईलेरिया के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है । यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि हमारे यहां मलेरिया निवारण के लिए इस्तेमाल हो रही दवांए असल में मच्छरों को ही ताकतवर बना रही हैं। विशेषरूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों(जहां हाल के वर्षों में अप्रत्याशित रूप से घनघोर पानी बरसा है), बिहार के सदानीरा बाढ़ग्रस्त जिलों मध्यप्रदेश ,पूर्वोंत्तर राज्यें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है । सरकारी तंत्र पश्चिमी-प्रायांजित एड्स की काली छाया के पीछे भाग रहा है, जबकि मच्छरों की मार से फैले रोग को डाक्टर लाइलाज मानने लगे हैं । उनका कहना है कि आज के मचछर मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं । दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मच्छर -मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मच्छर अब और जहरीला हो गया है । देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मच्छर देखने को नहीं मिलता था, अब वहां रात में खुले में सोने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । बहरहाल यूएन ने दक्षिण-पूर्व एशिया के जिन 35 देशो में सन 2030 तक मलेरिया से पूरी तरह मुक्ति का लक्ष्य रखा है, उसमें भारत भी है। श्रीलंका के अलावा मालदीव भी मलेरिया-मुक्त हो चुका है।

हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि डेंगू का संक्रमण रोकने में हमारी दवाएं निश्प्रभावी हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ बंगाल, दार्जीलिंग ने बंगाल के मलेरिया ग्रस्त इलाकों में इससें निबटने के लिए इस्तेमाल हो रही दवाओं -डीडीटी, मैलाथिओन परमेथ्रिन और प्रोपोक्सर को ले कर प्रयाग किए और पाया कि मच्छरों में प्रतिरोध पैदा करने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रिया के तहत मच्छरों में मौजूद एंजाइम काबरेक्सीलेस्टेरेसेस, ग्लूटाथिओन एस-ट्रांसफेरेसेस और साइटोक्रोम पी450 या संयुक्त रूप से काम करने वाले ऑक्सीडेसेस के माध्यम से उत्पन्न डिटॉक्सीफिकेशन द्वारा प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हुई है। इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धीरज साहा ने बताया, ‘कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मच्छरों ने अपने शरीर में कीटनाशकों के नियोजित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए रणनीतियों का विकास कर किया है। इसी प्रक्रिया को कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता के विकास रूप में जाना जाता है।’गौरतलब है कि एडीस एजिप्टि और एडीस अल्बोपिक्टस डेंगू के रोगवाहक मच्छरों की प्रजातियां हैं, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हैं।

शुरूआती दिनों में शहरों को मलेरिया के मामले में निरापद माना जाता था और तभी शहरों में मलेरिया उन्मूलन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया । 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण के विकास के साथ नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था । ऐसे जंगलों पर बसे शहरों में मच्छरों को बना-बनाया घर मिल गया । जर्जर जल निकास व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था । गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के ढर्रे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है । धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मच्छरों में आ गई । तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है । पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ-साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है । हैजानुमा दस्त, पैचिस की तरह शौच में खून आने लगता है । रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाता है । गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिगरी से लैसे डाक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए।  डाक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में तल्लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है ।
हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाण्ुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है । रिपोर्ट में कहा गया था कि एशिया में तापमान की अधिकता और ठहरे हुए पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल अवसर मिल रहा है । कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टेंक खोदने के कारण मच्छरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मच्छर होते ही नहीं थे । सनद रहे कि हमारे यहां स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में जम कर षौचालय बनाए जा रहे हैं, जिनमें ना तो पानी है, ना ही वहां से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी की मुकम्मल व्यवस्था।
हरित क्रांति के लिए सिंचाई के साधन बढ़ाने और फसल को कीटों से निरापद रखने के लिए कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी मलेरिया को पाला-पोसा है । बड़ी संख्या में बने बांध और नहरों के करीब विकसित हुए दलदलों ने मच्छरों की संख्या बढ़ाई है । रही बची कसर फसलों में डीडीटी ऐसे ही कीटनाशकों के बेतहाशा दुरूपयोग ने पूरी कर दी । खाने के पदार्थों में डीडीटी का मात्रा जहर के स्तर तक बढ़ने लगी, वहीं दूसरी ओर मच्छर ने डीडीटी को डकार लेने की क्षमता विकसित कर ली । बढ़ती आबादी के लिए मकान, खेत और कारखाने मुहैया करवाने के नाम पर गत् पांच दशकों के दौरान देश के जंगलों की निर्ममता से कटाई की जाती रही है । कहीं अयस्कों की खुदाई तो जलावन या फर्नीचर के लिए भी पेड़ों को साफ किया गया ।  जहां 1950 में 40.48 मिलीयन हेक्टर में हरियाली का राज था, आज यह सिमट कर 22 मिलीयन के आसपास रह गया है । हालांकि घने जंगल मच्छर व मलेरिया के माकूल आवास होते हैं और जंगलों में रहने वचाले आदिवासी मलेरिया के बड़े शिकार होते रहे हैं । लेकिन यह भी तथ्य है कि वनवासियों में मलेरिया के कीटाणुओं से लड़ने की आंतरिक क्षमता विकसित हो चुकी थी । जंगलों के कटने से इंसान के पर्यावास में आए बदलाव और मच्छरों के बदलते ठिकाने ने शहरी क्षेत्रों में मलेरिया को आक्रामक बना दिया ।
विडंबना है कि हमारे देश में मलेरिया से निबटने की नीति ही गलत है - पहले मरीज बनो, फिर इलाज होगा । जबकि होना यह चाहिए कि मलेरिया फैल ना सके, इसकी कोशिश हों । मलेरिया प्रभावित राज्यों में पेयजल या सिंचाई की योजनाएं बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ठहरा हुआ पानी कहीं ‘‘ मच्छर-प्रजनन केंद्र’’ तो नहीं बन रहा है । धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेंरिया के माकूल है, पहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मच्छर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।



बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

The drought is again knocking India's door

फिर सूखे की ओर बढ़ता देश 

देश के 229 जिलों में इस वर्ष औसत से कम बारिश हुई है। इससे सूखे का भयावह संकट खड़ा पैदा होने की आशंका बलवती हो गई है। मानसून सीजन में बादलों के कम बरसने का सीधा असर खेती-किसानी के अलावा पेयजल, पशुपालन सहित कई क्षेत्रों पर होता है। जब सूखे की जानकारी अभी से हमारे पास है तो सरकार व समाज दोनों को कम पानी में काम चलाने, ऐसी ही फसल उगाने, मवेशियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने आदि पर काम करना शुरू करना चाहिए। 



मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल मानसून ने देश का 21.38 फीसद भूभाग को थोड़े सूखे से बहुत ज्यादा सूखे के बीच छोड़ दिया है। सूखे को मापने का इंडेक्स बताता है कि इस साल मानसून में सूखे की स्थिति साल 2016 और 2017 से भी खराब रही है। इस साल करीब 134 जिलों में थोड़ा सूखे से बहुत ज्यादा सूखे वाले हालात रहे हैं। यह इंडेक्स सूखे के लिए नकारात्मक और नमी वाली स्थितियों के लिए पॉजिटिव होता है। इसके मुताबिक करीब 229 जिलों में हल्की सूखी स्थिति रही जो कि इस मानसून का 43.51 फीसद है। पिछले साल देश का करीब 17.78 प्रतिशत क्षेत्र थोड़े सूखे से बहुत सूखे के बीच रहा था जबकि 2016 में यह 12.28 प्रतिशत था। अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, झारखंड, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक में गंभीर सूखे की स्थिति देखी जा सकती है। मराठवाड़ा और विदर्भ के भी कुछ जिलों में सूखा रहा। 

एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जलाशयों में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘औसत से कम’ पानी बरसा या बरसेगा तो क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की करीब दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्रहि-त्रहि करती है। हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 प्रतिशत है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4,000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1,869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1,122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं। एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी वाले सोयाबीन व अन्य नकदी फसलों की वृद्धि हुई है। इस कारण बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थोड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है। अब गंगा-यमुना के दोआब के पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ही लें, न तो यहां के लेागों का भोजन धान था और न ही यहां की फसल। लेकिन ज्यादा पैसा कमाने के लिए सबने धान बो कर जमीन बर्बाद की और आदत बिगड़ी सो अलग। देश के उत्तरी हिस्से में नदियों में पानी का 80 फीसद जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत का है। बरसात गई और नदियों का पानी भी गुम हो जाता है। कहीं अंधाधुंध रेत खनन तो कहीं विकास के नाम पर नदी के रास्ते में पक्के निर्माण तो कहीं नदियों का पानी सलीके से न सहेजने के तरीकों के कारण कीमती जल का नालियों के जरिये समुद्र में बह जाना। असल में हमने पानी को ले कर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुएं से रस्सी डाल कर पानी खींचना होता था या चापाकल चला कर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल निकाला जाता था। घर में नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूब वेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलबा डालने, कूड़ा मिलाने जैसी गतिविधियों से बच कर, पारंपरिक जल स्त्रोतों- तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है। कस्बाई लोग बीस रुपये में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव में कई बार शौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है। 

सूखे के कारण जमीन के बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभर रहे हैं। भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में बह जाता है। गुजरात के जूनागढ़, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद ही सीखा। विछियावाडा गांव के लोगों ने डेढ़ लाख रुपये व कुछ दिनों की मेहनत से 12 बांध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नलकूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्य प्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें तो कर्नाटक से ले कर असम तक और बिहार से ले कर बस्तर तक ऐसे हजारों सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लेागों ने सूखे को मात दी है। 

कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक इस बात के लिए तैयारी करनी होगी कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्षा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जीवित करना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास हैं जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

देश के करीब एक-तिहाई जिलों में इस वर्ष औसत से कम बारिश हळ्ई है जिससे सूखे की आशंका बढ़ गई है। संभावित समस्या से निपटने के लिए अभी से तैयारी शळ्रू कर देनी चाहिए

पंकज चतुर्वेदी1पर्यावरण मामलों के जानकार 

रविवार, 7 अक्तूबर 2018

weekly market have an important social role in

बड़़ी सामाजिक भूमिका निभाते छोटे-छोटे हाट बाजार



दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर का नवयुग मार्केट वहां के कनॉट प्लेस की तरह है। जहां बड़े-बड़े शोरूम, छोटी दुकानें तो हैं ही, दफ्तर भी हैं। यहां हर रविवार को एक साप्ताहिक बाजार भी लगता है, जिसमें कोई पांच हजार रेहड़ी-पटरी वाले आते हैं। इस बाजार में 90 प्रतिशत विक्रेता देवबंद, सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़, दिल्ली के सीलमपुर आदि क्षेत्रों से आते हैं, जिनकी किसी प्रकार की कोई पहचान नहीं है। पिछले कुछ महीनों से साप्ताहिक बाजार के मसले पर स्थानीय व्यापारियों और पटरी दुकानदारों में खींचतान चल रही है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सप्ताह में एक दिन पटरी पर लगने वाला बाजार उनकी दुकानदारी चौपट कर देता है। उसकी वजह से सड़कों पर जो जाम लगता है, वह अलग परेशानी पैदा करता है। 
वैसे यह मामला सिर्फ गाजियाबाद का ही नहीं है, देश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर ऐसे हाट-बाजारों को बंद करने की मांग उठती रहती है। इसके पीछे गिनाए जाने वाले कारण लगभग एक से होते हैं- बाजार के कारण यातायात ठप हो जाता है, इलाके के निवासी अपने घर में बंधक बन जाते हैं, इनकी भीड़ में गिरहकटी होती है, अपराधी आते हैं या फिर ये काफी गंदगी फैलाते हैं। हालांकि यह भी माना जाता है कि ऐसे बाजारों को बंद कराने के पीछे स्थानीय व्यापारियों के कारण दीगर होते हैं, यहां मिलने वाला सस्ता सामान बड़ी दुकानों की दुकानदारी कम करता है। 
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की लगभग हर कॉलोनी में ऐसे साप्ताहिक बाजार आज भी लोगों की जीवन-रेखा हैं। यहां बेचने और खरीदने वाले की मनोदशा, आर्थिक और सामाजिक स्थिति तकरीबन वही होती है, जो देश के दूरदराज के गांवों में लगने वाले हाट-बाजारों में होती है। दिल्ली में कालकाजी के साप्ताहिक बाजार हों या फिर वसंत विहार जैसे महंगे इलाके का बुध बाजार या फिर सुदूर भोपाल या बीकानेर या सहरसा के साप्ताहिक हाट, जरा गंभीरता से देखें, तो इनके बहुत से सामाजिक समीकरण एक ही होते हैं। हर तरह का सामान बेचते हुए, मगर पूरी तरह से सुविधाहीन। दैनिक मजदूरी करने वाला हो या अफसर की बीवी या फिर खुद दुकानदार, सभी आपको यहां मिल जाएंगे। 
ये बाजार रोजगार की तलाश में अपने घर-गांव से पलायन करके आए निम्न आयवर्ग के लोगों की जीवन-रेखा होते हैं। आम बाजार से सस्ते सामान, चर्चित ब्रांड से मिलते-जुलते सामान, छोटे व कम दाम के पैकेट, घर के पास और मेहनत-मजदूरी करने के बाद देर रात तक मिलने वाला सजा बाजार। ये हाट-बाजार सिर्फ उन्हीं  परिवारों के पेट नहीं भरते, जो वहां फुटपाथ पर अपना सामान बेचते हैं, और भी बहुत से लोगों की रोजी-रोटी इनसे चलती है। बाजार के लिए लकड़ी के फट्टे या टेबल, ऊपर तिरपाल और बैटरी से चलने वाली एलईडी लाइट की सप्लाई करने वालों का बड़ा वर्ग इन हाट-बाजारों पर ही निर्भर होता है। कई लोग ऐसे बाजारों के सामान लादने वगैरह का काम भी करते हैं। फिर वे लोग भी हैं, जो स्थानीय निकायों से ऐसे बाजार चलाने का ठेका लेते हैं और उसके लिए दुकानों से पैठ वसूलते हैं।
ऐसे हाट-बाजारों का अभी तक आधिकारिक सर्वेक्षण तो हुआ नहीं, मगर अनुमान है कि दिल्ली शहर, गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव में लगने वाले कोई 300 से अधिक बाजारों में 35,000 से 40,000 दुकानदार हैं। पूरे देश में यह संख्या लाखों में होगी। इसके बावजूद न तो इनको कोई स्वास्थ्य सुविधा मिली है और न ही बैंक से कर्ज या ऐसी कोई बीमा की सुविधा। यह पूरा काम बेहद जोखिम का है, क्योंकि बरसात हो गई, तो बाजार नहीं लगेगा, कभी-कभी त्योहारों के पहले जब पुलिस के पास कोई संवेदनशील सूचना होती है, तब भी बाजार नहीं लगते। कभी कोई जाम में फंस गया और समय पर बाजार नहीं पहुंच पाया, तो कभी सप्लाई चैन में गड़बड़ हो गई। बावजूद इसके मॉल और ई-कॉमर्स के इस युग में ये बाजार न सिर्फ बरकरार हैं, बल्कि एक महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक भूमिका भी निभा रहे हैं। वह भी तब, जब इन्हें सरकारों की तरफ से कोई वैधता नहीं बख्शी गई है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

ऐसे कैसे होगी भंगी-मुक्ति

पंकज चतुर्वेदी
एक तरफ अंतरिक्ष को अपने कदमों से नापने के बुलंद हौसलें हैं, तो दूसरी तरफ  दूसरों का मल सिर पर ढोते नरक कुंड की सफाई करती मानव जाति। संवेदनहीन मानसिकता और नृशंस अत्याचार की यह मौन मिसाल सरकारी कागजों में दंडनीय अपराध है। यह बात दीगर है कि सरकार के ही महकमे इस घृणित कृत्य को बाकायदा जायज रूप देते हैं। नृशंसता यहां से भी कही आगे तक है, समाज के सर्वाधिक उपेक्षित व कमजोर तबके के उत्थान के लिए बनाए गए महकमे खुद ही सरकारी उपेक्षा से आहत रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा देश के18 राज्यों में किए गए सर्वे से पता चला है कि अभी भी हमारे देश में 20 हजार से अधिक लोग सिर पर मैला ढाने का कार्य करते हैं। सनद रहे सुप्रीम कोर्ट से ले कर सरकार तक इसे मानवता के नाम पर कलंक निरूपित कर चुकी है।
शुष्क शौचालयों की सफाई या सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को सरकार संज्ञेय अपराध घोषित कर चुकी है। इस व्यवस्था को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारें कई वित्तपोषित योजनाऐं चलाती रही हैं। लेकिन यह सामाजिक नासूर यथावत है। इसके निदान हेतु अब तक कई अरब रूपये खर्च हो चुके हैं। इसमें वह धन शामिल नहीं है, जो इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए पले ‘‘सफेद हाथियों’’ के मासिक वेतन व सुख-सुविधाओं पर खर्च होता रहा है। लेकिन हाथ में झाडू-पंजा व सिर पर टोकरी बरकरार है। देश की आजादी के साठ से अधिक वसंत बीत चुके हैं। लेकिन जिन लोगों का मल ढोया जा रहा है उनकी संवेदनशून्यता अभी भी परतंत्र है। उनमें न तो इस कुकर्म का अपराध बोध है, और न ही ग्लानि। मैला ढ़ोने वालों की आर्थिक या सामाजिक हैसियत में भी कहीं कोई बदलाव नहीं आया । सरकारी नौकरी में आरक्षण की तपन महज उन अनुसूचित जातियों तक ही पहुंची है, जिनके पुश्तैनी धंधों में नोटों की बौछार देख कर अगड़ी जातियों ने उन पर कब्जे किए। भंगी महंगा हुआ नहीं, इस धंधे में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को मुनाफा लगा नहीं, सो इसका औजार भी नहीं बदला।
देश का सबसे अधिक सांसद और सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाले प्रदेश उत्तरप्रदेश में पैंतालिस लाख रिहाईशी मकान हैं । इनमें से एक तिहाई में या तो शौचालय है ही नहीं या फिर सीवर व्यवस्था नहीं है । तभी यहां 6123 लोग मैला ढ़ोने  के अमानवीय कृत्य में लगे हैं । इनमें से अधिकांश राजधानी लखनऊ या शाहजहांपुर में हैं। वह भी तब जबकि केंद्र सरकार इस मद में राज्य सरकार को 175 करोड़ रुपए दे चुकी है । महाराष्ट्र में 5296 और कर्नाटक में 1744 लोग सिर पर मैलाढ़ोने का कार्य करते पाए गए। सबसे दुखद पहलु यह है कि सरकार के ही पिछले सर्वे में ऐसे लोगों की संख्या 13,770 थी जो अब बढ़ कर 20,500 हो गई।
घरेलू शौचालयों को फ्लश लैट्रिनों में बदलने के लिए 1981 से कुछ कोशिशें हुई, पर युनाईटेड नेशनल डेवलपमेंट प्रोग्राम के सहयोग से। अगर संयुक्त राष्ट्र से आर्थिक सहायता नहीं मिलती तो भारत सरकार के लिए मुहिम चलाना संभव नहीं था। तथाकथित सभ्य समाज को तो सिर पर मैला ढ़ोने वालों को देखना भी गवारा नहीं है, तभी यह मार्मिक स्थिति उनकी चेतना को झकझोर नहीं पाती है। सिर पर गंदगी लादने या शुष्क शौचालयों को दंडनीय अपराध बनाने में ‘‘हरिजन प्रेमी’’ सरकारों को पूरे 45 साल लगे। तब से सरकार सामान्य स्वच्छ प्रसाधन योजना के तहत 50 फीसदी कर्जा देती है। बकाया 50 फीसदी राज्य सरकार बतौर अनुदान देती हैं। स्वच्छकार विमुक्ति योजना में भी ऐसे ही वित्तीय प्रावधान है। लेकिन अनुदान और कर्जे, अफसर व बिचौलिए खा जाते हैं।
सरकार ने सफाई कर्मचारियों के लिए एक आयोग बनाया। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग जैसे अन्य सांविधिक आयोगों के कार्यकाल की तो कोई सीमा निर्धारित की नहीं गई, लेकिन सफाई कर्मचारी आयोग को अपना काम समेटने के लिए महज ढ़ाई साल की अवधि तय कर दी गई थी। इस प्रकार मांगीलाल आर्य की अध्यक्षता वाला पहला आयोग 31 मार्च, 1997 को रोते-झींकते खत्म हो गया । तब से लगातार सरकार बदलने के साथ आयोग में बदलाव होते रहे हैं, लेकिन नहीं बदली तो सफाईकर्मियों की तकदीर और अयोग के काम करने का तरीका। सफाई कर्मचारी आयोग के प्रति सरकारी भेदभाव महज समय-सीमा निर्धारण तक ही नहीं है, बल्कि अधिकार, सुविधाओं व संसाधन के मामले में भी इसे दोयम दर्जा दिया गया। समाज कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में गठित अन्य तीनों आयोगों को अपने काम-काज के लिए सिविल कोर्ट के अधिकार दिए गए हैं जबकि सफाई कर्मी आयोग के पास सामान्य प्रशासनिक अधिकार भी नहीं है। इसके सदस्य राज्य सरकारों से सूचनाएं प्राप्त करने का अनुरोध मात्र कर सकते हैं। तभी राज्य सरकारों सफाई कर्मचारी आयोग के पत्रों का जबाव तक नहीं देती।
वैसे इस आयोग के गठन का मुख्य उद्देश्य ऐसे प्रशिक्षण आयोजित करना था, ताकि गंदगी के संपर्क में आए बगैर सफाई काम को अंजाम दिया जा सके। सिर पर मैला ढ़ोने से छुटकारा दिलवाना, सफाई कर्मचारियों को अन्य रोजगार मुहैया कराना भी इसका मकसद था। आयोग जब शुरू हुआ तो एक अरब 11 करोड़ की बहुआयामी योजनाएं बनाई गई थीं। इसमें 300 करोड़ पुर्नवास और 125 करोड़ कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करने का प्रावधान था। पर नतीजा वही ‘‘ढाक के तीन पात’’ रहा। दीगर महकमों की तरह घपले, घूसखोरी और घोटालों से यह ‘‘अछूतों’’ का विभाग भी अछूता नहीं रहा। कुछ साल पहले आयोग के उत्तर प्रदेश कार्यालय में दो अरब की गड़बड़ का खुलासा हुआ था।
आयोग व समितियों के जरिए भंगी मुक्ति के सरकारी स्वांग आजादी के बाद से जारी रहे हैं। संयुक्त प्रांत (वर्तमान उ.प्र.) ने भंगी मुक्ति बाबत एक समिति का गठन किया था। आजादी के चार दिन बाद 19 अगस्त 1947 को सरकार ने इस समिति की सिफारिशों पर अमल के निर्देश दिए थे। पर वह एक रद्दी का टुकड़ा ही साबित हुआ।  1963 में मलकानी समिति ने निष्कर्ष दिया था कि जो सफाई कामगार अन्य कोई रोजगार अपनाना चाहें, उन्हें लंबरदार, चौकीदार, चपरासी जैसे पदों पर नियुक्त दिया जाए। परंतु आज भी सफाई कर्मचारी के ग्रेजुएट बच्चों को सबसे पहले ‘‘झाडू-पंजे’’ की नौकरी के लिए ही बुलाया जाता है। नगर पालिका हो या फौज, सफाई कर्मचारियों के पद भंगियों के लिए ही आरक्षित हैं।
सन 1964 और 1967 में भी दो राष्ट्रीय आयोग गठित हुए थे। उनकी सिफारिशों या क्रियाकलाप की फाईलें तक उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि उन दोनों आयोगों की सोच दिल्ली से बाहर विस्तार नहीं पा सकी थीं। 1968  में बीएस बंटी की अध्यक्षता में गठित न्यूनतम मजदूरी समिति की सिफारिशें 21 वीं सदी के मुहाने पर पहुंचते हुए भी लागू नहीं हो पाई हैं। पता नहीं किस तरह के विकास और सुदृढ़ता का दावा हमारे देश के कर्णधार करते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हरियाणा के 40.3 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास टेलीविजन हैं, पर शौचालय महज आठ फीसदी हैं। करीबी समृद्ध राज्य पंजाब में टीवी 38.6 प्रतिशत लोगों के पास है परंतु शौचालय मात्र 19.8 की पहुंच में हैं। 1990 में बिहार की आबादी 1.11 करोड़ थी। उनमें से सिर्फ 30 लाख लोग ही किसी न किसी प्रकार के शौचालय की सेवा पाते हैं। यह आंकड़े इंगित करते हैं कि सफाई या उस कार्य से जुड़े लोग सरकार की नजर में निहायत उपेक्षित हैं।
आजाद भारत में सफाई कर्मचारियों के लिए गठित आयोग, समितियों, इस सबके थोथे प्रचार व तथाकथित क्रियान्वयन में लगे अमले के वेतन, कल्याण योजनाओं के नाम पर खर्च व्यय का यदि जोड़ करें तो यह राशि अरबों-खरबों में होगी। काश, इस धन को सीधे ही सफाई कर्मचारियों में बांट दिया जाता तो हर एक परिवार  करोड़पति होता। यदि आधी सदी के अनुभवों को सीख माने तो यह तय है कि जब तक भंगी महंगा नहीं होगा, उसकी मुक्ति संभव नहीं है।
यदि सरकार या सामाजिक संस्थाएं वास्तव में सफाई कर्मचारियों को अपमान, लाचारी और गुलामी से उपजी कुंठा से मुक्ति दिलवाना चाहते हैं तो आई आई टी सरीखे तकनीकी शोध संस्थानों में ‘‘सार्वजनिक सफाई’’ जैसे विषयों को अनिवार्य करना होगा। जिस रफ्तार से शहरों का विस्तार हो रहा है, उसके मद्देनजर आने वाले दशक में स्वच्छता एक गंभीर समस्या होगी।

पंकज चतुर्वेदी




why police feels helpless against criminal s

क्यों नहीं रहा पुलिस का डर


                                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी


लखनउ में एक निजी कंपनी के अधिकारी को आधी रात में दो पुलिस वालों द्वारा बेवजह गोली मार देने की नृशंस घटना के तथ्य जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं, पता चल रहा है कि एक सिपाही यदि अपनी पर आ जाए तो क्या कर सकता है। चूंकि यह मामला बड़े राज्य की राजधानी का था, एक मध्य वर्ग का था सो इतना हल्ला, सहायता, जांच भी हो गई। वरना उसके ही कुछ दिनों पहले अलीगढ़ पुलिस ने बाकायदा पत्रकारों को न्यौता भेजा कि चलो मुठभेड़ में बदमाश मारते हैं और दो लेागों को ठोक दिया। मारे गए लोगों के सफेद-काले रिकार्ड बनाए गए, लेकिन जिस तरह सारा गांव बता रहा है कि कथित मुठभेड के तीन दिन पहले ही पुलिस उन दोनों को घर से उठा कर ले गई थीं, मामला संदिग्ध ही प्रतीत होता है। एक तरफ पुलिस का रिकार्ड उन्हें बाहुबली, अपराध होने से पहले ही पहुंचने वाला और जनता का सेवक बताता है तो दूसारी तरफ आम लेाग अपराधियों के भय और पुलिस के प्रति अविश्वसनीयता के देाहरे चक्र में पिसते दिखते हैं।

 पिछले कुछ सालों से दिल्ली और करीबी एनसीआर के जिलों- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगावं व फरीदाबाद में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं , महिलाओं की जंजीर व मोबाईल फोन झटक लेते हैं, बैंक में लूट तो ठीक ही है, अब तो एटीएम मषीन उखाड़ कर ले जाते हैं; इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है। दिल्ली और एनसीआर बेहद संवेदनषील इलाका है और यहां की पुलिस से सतर्कता और अपराध नियंत्रण के लिए अतिरिक्त चौकस रहने की उम्मीद की जाती है। विडंबना है कि एनसीआर की पुलिस में कर्मठता और व्यावसायिकता की बेहद कमी है। उनकी रात की गश्त लगभग बंद है और डायल 100 की गाड़िया, हाईवे पर नाके लगा कर वाहनों से वसूली को ही अपना मूल कार्य मानती हैं। 

वैसे यहां पुलिस की दुर्गति का मूल कारण सरकार की पुलिस संबंधी नीतियों का पुराना व अप्रासंगिक होना है। ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाईकर्स गेंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाईकर्स-गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिषत  नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेषियां, अपराधों की तफ्तीष, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्षनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है। हर महीने में तीन से चार बार तो मुख्यमंत्री गाजियाबाद में हिंडन हवाई अडडडे पर आते हैं और उनके लिए सुरक्षा, रास्ते बंद करने व सफाई करवाने मं ही सारा फोर्स लगा रहता है। 
मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था।  अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी ,इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामतः आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गयी और समाज में असुरक्षा और अराजकता का माहौल बन गया। शुरू-शुरू में राजनैतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिये तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अन्ततः इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिषें कर दीं। लेकिन लोकषाही का षायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांष राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेष को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है।
कानून व्यवस्था या वे कार्य जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर षरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुष बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हांे। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों के सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थानें में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गये तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं।
रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चौकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में ”स्ट्राइकिंग फोर्स“ नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं । तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं। 
पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग  विभाग घटित करने की भी बात है।  सनद रहे अभी ये तीनों काम  एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चौथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग ना के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गष्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता ।
सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका हैं, लेकिन देश का नेता पुलिस का उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है । तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है ।  वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए।  इसी का परिणाम है कि दिल्ली एनसीआर में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ़
पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनषील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है। आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है ।  आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है ।


पंकज चतुर्वेदी
संपर्क- 9891928376





x

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2018

बर्फ के मरू को नहीं चाहिए पक्के मकान

पंकज चतुर्वेदी
वहां के लोग प्रकृति के संग जीने के आदी हैं, उनका धर्म व दर्शन भी उन्हें नैसर्गिकता के करीब जीवनयापन करने की सीख देता है, ना जरूरत से ज्यादा संचय और ना ही बेवजह षब्दों का इस्तेमाल। कायनात की खूबसूरत देन सदियों तक अक्षुण्ण रही,बाहरी प्रभावों से क्योंकि किसी आम आदमी के लिए वहां तक पहुंचना और फिर उस परिवेश में जीना दूभर होता था, हांे सते -सन्यासी पहुंचते थे, वहीं वहां बसते थे क्योंकि वे ना तो सावन हरे ना वैशाख सूखे। फिर पर्यटन व्यवसाय बन गया, देवों के निवास स्थान तक आरोहण के लिए हवाई जहाज जाने लगे, पांच-पांच दर्रे पार कर मनाली से सड़क निकाल दी गई जिस पर बसें चल सकें। ईंधन चालित वाहनों ने धरती के इस अनछुए हिस्से पर अपने पहियों के निशान बना दिए। आधुनिकता आई, लेकिन आज वही आधुनिकता उनकी त्रासदी बन रही है, सिर मुंडाए, गहरे लाल रंग के कपड़े पहने लामा, संत कह रहे हैं हमें नहीं चाहिए पक्के-कंक्रीट के मकान लेकिन बड़ा दवाब है सीमेंट, लोहा बेचने वाली कंपनियों का। हालांकि स्थानीय लोगों का दो दशक में ही कंक्रीट से मोह भ्ंाग हो रहा है, कई आधुनधक आर्किटेक की मिसालें मिटाई जा रही हंे और लौट रहे हें स्थानीय मिट्टी व रेत से बने पारंपरिक मकान। यह हालात हैं जलवायु परिवर्तन, जल-मल की आधुनिक सुविधाओं की भयंकर त्रासदी झेल रहे लेह-लद्दाक की कहानी।
अभी कुछ दशक पहले तक लेह-लद्दाक के दूर-दूर बसे बड़े से घरों के छोटे-छोटे गांवों में करेंसी का महत्व गौण था। अपना दूध-मक्खन, अपनी भेड़ के ऊन के कपड़े, अपनी नदियों का पानी और अपनी फसल , ना चाय में चीनी की जरूरत थी और ना ही मकान में फ्लश की। फिर आए पर्यटक, उनके लिए कुछ होटल बने, सरकार ने बढ़ावा दिया तो उनके देखा-देखी कई लेागों ने अपने पुश्तैनी मकान अपने ही हाथों से तबाह कर सीमेंट, ईंटें दूर देश से मंगवा कर आधुनिक डिजाईन के सुदर मकान खड़े कर लिए, ताकि बाहरी लोग उनके मेहमान बन कर रहें, उनसे कमाई हो। स्थानीय प्रशासन ने भी घर-घर नल पुहंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। जाहिर है कि बेकार गए पानपी को बहने के लिए रासता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से चीने आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पेसा बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए अवास का लालच भी बढ़ाया। असल में लेह7लद्छाक में सैंकड़ों ऐसी धाराएं है जहां सालों पानी नहीं आता, लेकिन जब ऊपर ज्यादा बरफ पिघलती है तो वहां अचानक तेज जल-बहाव होता है। याद करें छह अगस्त 2010 को जब बादल फटने के बाद विनाशकारी बाढ़ आई थी और पक्के कंक्रीट के मकानों के कारण सबसे ज्यादा तबाही हुई थी। असल में ऐसे अधिकांश मकान ऐसी ही सूखी जल धाराओं के रास्ते में रोप दिए गए थे। पानी को जब अपने पुश्तैनी रास्ते में ऐसे व्यवधान दिखे तो उसने उन मकानों को नेस्तनाबूद कर दिया।
जान लें कि लेह-लद्दाख हिमालय की छाया में बसे हैं और यहां बरसात कम ही होती थी, लेकिन जलवाुय परिवर्तन का असर यहां भी दिख रहा है व अब गर्मियों में कई-कई बार बरसात होती है। अंधाधुंध पर्यटन के कारण उनके साथ आया प्लास्टिक व अन्य पैकेजिंग का कचरा यहां के भूगोल को प्रभावित कर रहा है ।
इस अंचल के ऊपरी इलाकों में प्शुपालक व निचले हिस्से में कृशक समाज रहता हे। इनके पारंपरिक घर स्थानीय मिट्टी में रेत मिला कर धूप में पकाई गई र्इ्रंटों से बनते हैं। इन घरों की बाहरी दीवारों को स्थानीय ‘पुतनी मिट्टी’ व उसमें वनस्पतियों के अवशेश को मिला कर ऐसा कवच बनाया जाता है जो षून्य से नीचे तापनाम में भी उसमें रहने वालों को उश्मा देता है। यहां तेज सूरज चमकता है और तापमान षून्य तीस डिगरी से नीचे जाता है। भूकंप -संवेदनशील  इलाका तो है ही। ऐसे में पारंपरिक आवास सुरक्षित माने जाते रहे हैं। सनद रहे कंक्रीट  गरमी में और तपती व जाउ़े में अधिक ठंडा करती है।  सीमेंट की वैज्ञानिक आयु 50 साल है जबकि इस इलाके में पारंपरिक तरीके से बने कई मकान, मंदिर, मठ हजार साल से ऐसे ही षान से खड़े हैं।  यहां के पारंपरिक मकान तीन मंजिला होते हैं। -सबसे नीचे मवेशी, उसके उपर परिवार और सबसे उपर पूजा घर। इसके सामाजिक व वैज्ञानिक कारण भी हैं।
यह दुखद है कि बाहरी दुनिया के हजारों लेाग यहां प्रकृति की सुंदरता निहारने आ रहे हैं लेकिन वे अपने पीछे इतनी गंदगी, आधुनिकता की गर्द छोड़कर जा रहे हैं कि  यहां के स्थानीय समाज का अस्तित्व खतरे में हैं। उदाहरण के लिए बाहरी दखल के चलते यहां अब चीनी यानि षक्कर का इस्तेमाल होने लगा और इसी का कुप्रभाव है कि स्थानीय समाज में अब डायबीटिज जैसे रेाग घर कर रहे हैं। असल में भोजन हर समय स्थानीय देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप ही विकसित होता था। उसी तरह आवास भी। आज कई लोग यहां अपनी गलतियों को सुधार रहे हैं व सीमेंट के मकान खुद ही नश्ट करवा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि निर्माण व आर्किटेक के आध्ुानिक षोधकर्ता स्थानीय सामग्री से ही ऐसे मकान बनाने में स्थानीय समाज को मदद करंे जो कि बाथरूम, फ्लश जैसी आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप हो तथा कम व्यय में तुलनात्मक रूप से आकर्शक भी हो। साथ ही बाहरी कचरे को रोकने के कठोर कदम उठाए जाएं ताकि कायनात की इस सुंदर संरचना को सुरक्षित रखा जा सके।


शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

Electoral system needs urgent reform

लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखने के लिए जरूरी हैं कड़े चुनाव सुधार 

पंकज चतुर्वेदी


Independent mail bhopal 
इन दिनों देश की सबसे बडी ताकत, लोकंतत्र ही दांव पर लगा है। यह बात सही है कि कई लगता है हमारा मुल्क चुनाव-प्रधान देश हो गया है। हर समय किसी ना किसी राज्य में कोई ना कोई चुनाव अवश्य होता रहता है। राजनीतिक दल भी पूरे समय चुनाव जीतने की जुगत में रहते हैंव उनका जमीनी जन कल्याण कार्य से वास्ता समाप्त हो रहा है। हालांकि अभी केंद्र सरकार ने सभी चुनाव एकसाथ करवाने की पहल तो की है। लेकिन जरूरी यह है कि आम वोटर को भी शिक्षित किया जाए कि वह किस उम्मीदवार को, किस चुनाव में किस काम के लिए वोट दे रहा है । चुनाव तो राज्य की सरकार को चुनने का होता है लेकिन मसला कभी मंदिर  तो कभी आरक्षण कभी गाय और उससे आगे निजी अरोप-गालीगलौज। चुनाव के प्रचार अभियान ने यह साबित कर दिया कि लाख पाबंदी के बावजूद चुनाव ना केवल महंगे हो रहे हैं, बल्कि सियासी दल जिस तरह एक दूसरे पर षुचिता के उलाहने देते दिखेे, खुद को पाक-साफ व दूसरे को चोर साबित करते रहे हैं असल में समूचे कुंए में ही भांग घुली हुई हैं। लोकतंत्र के मूल आधार निर्वाचन की समूची प्रणाली ही अर्थ-प्रधान हो गई हैं और विडंबना है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव सुधार के किसी भी कदम से बचते रहे हैं।
इवीएम पर सवाल उठाना , वास्तव में लोकतंत्र के समक्ष नई चुनौतियों की बानगी मात्र है, यह चरम बिंदू है जब चुनाव सुधार की बात आर्थिक -सुधार के बनिस्पत अधिक प्राथमिकता से करना जरूरी है। जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी दल ईमानदारी से चुनाव सुधारों की दिशा में काम नहीं करना चाहता है। दुखद तो यह है कि हमारा अधिसंख्यक मतदाता अभी अपने वोट की कीमत और विभिन्न निर्वाचित संस्थआों के अधिकार व कर्तव्य जानता ही नहीं है। लोकसभा चुनाव में मुहल्ले की नाली और नगरपालिका चुनाव में पाकिस्तान के मुद्दे उठाए जाते हैं। यही नहीं नेता भी उल जलूल वादे भी कर देते हैं जबकि वह उनके अधिकार क्षेत्र में होता नहीं है। आधी-अधूरी मतदाता सूची, कम मतदान, पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की मतदान में कम रूचि, महंगी निर्वाचन प्रक्रिया, बाहुबलियों और धन्नासेठों की पैठ, उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या, जाति-धर्म की सियासत, चुनाव करवाने के बढ़ते खर्च, आचार संहिता की अवहेलना - ये कुछ ऐसी बुराईयां हैं जो स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए जानलेवा वायरस हैं और इस बार ये सभी ताकतवर हो कर उभरी हैं।
आज चुनाव से बहुत पहले बड़े-बड़े रणनीतिकार  मतदाता सूची का विश्लेशण कर तय कर लेते हैं कि हमें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां चाहे एक वोट से जीतो या पांच लाख वोट से , दोनों के ही सदन में अधिकार बराबर होते है। यदि राश्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैंसियत, सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, ना कि केवल गूजर, मुसलमान या ब्राहण वोट के।  केबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को ले कर निर्वाचित प्रतिनिधियों का उनको मिले कुछ वोटो का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक मतदान भी जुटाने को मजबूर करेगा।
कुछ सौ वोट पाने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या, जमानत राशि बढ़ाने से भले ही कम हो गई हो, लेकिन लोकतंत्र का नया खतरा वे पार्टियां बन रही हैं, जो कि महज राश्ट्रीय दल का दर्जा पाने के लिए तयशुदा वोट पाने के लिए अपने उम्मीदवार हर जगह खड़ा कर रही हैं । ऐसे उम्मीदवारों की संख्या में लगातार बढ़ौतरी से मतदाताओं को अपने पसंद का प्र्रत्याशी चुनने  में बाधा तो महसूस होती ही है, प्रशासनिक  दिक्कतें व व्यय भी बढ़ता है । ऐसे प्रत्याशी चुनावों के दौरान कई गड़बड़ियां और अराजकता फैलाने में भी आगे रहते हैं । सैद्धांतिक रूप से यह सभी स्वीकार करते हैं कि ‘‘बेवजह- उम्मीदवारों’’ की बढ़ती संख्या स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधक है, इसके बावजूद इन पर पाबंदी के लिए चुनाव सुधारेंा की बात कोई भी राजनैतिक दल नहीं करता है । करे भी क्यों ? आखिर ऐसे अगंभीर उम्मीदवार उनकी ही तो देन होते हैं । जब से चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च पर निगरानी के कुछ कड़े कदम उठाए हैं, तब से लगभग सभी पार्टियां कुछ लोगों को निर्दलीय या किसी छोटे दल के नाम से ‘छद्म’ उम्मीदवार खड़ा करती हैं । ये प्राक्सी प्रत्याशी, गाडियों की संख्या, मतदान केंद्र में अपने प्क्ष के अधिक आदमी भीतर बैठाने जैसे कामों में सहायक होते हैं । किसी जाति-धर्म या क्षेत्रविशेश के मतों को किसी के पक्ष में एकजुट में गिरने से रोकने के लिए उसी जाति-संप्रदाय के किसी गुमनाम उम्मीदवार को खड़ा करना आम कूट नीति बन गया है । विरोधी उम्मीदवार के नाम या चुनाव चिन्ह से मिलते-जुलते चिन्ह पर किसी को खड़ा का मतदाता को भ्रमित करने की योजना के तहत भी मतदान- मशीन का आकार बढ़ जाता है । चुनाव में बड़े राजनैतिक दल भले ही मुद्दों पर आधारित चुनाव का दावा करते हों,, लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि देश के आधे से अधिक चुनाव क्षेत्रों में जीत का फैसला वोट-काटू उम्मीदवारों के कद पर निर्भर है ।
ऐसे भी लोगों की संख्या कम नहीं है, जोकि स्थानीय प्रशासन या राजनीति में अपना रसूख दिखानेभर के लिए पर्चा भरते हैं । ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जबकि मात्र नामांकन दाखिल कर कुछ लोग लाखों के वारे-न्यारे कर लेते हैं । बहुत से राजनैतिक दल राश्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता पाने के लिए निधार्रित मत-प्रतिशत पाना चाहते हैं । इस फिराक में वे आंख बंद कर प्रत्याशी मैदान में उतार देते हैं । जेल में बंद कुख्यात अपराधियों का जमानत पाने या फिर कारावास की चारदीवारी से बाहर निकलने के बहानों के रूप में  या फिर मुकदमें के गवाहों व तथ्यों को प्रभावित करने के लिए चुनाव में पर्चा भरना भी एक आम हथकंडा  है ।
यह एक विडंबना है कि कई राजनीतिक कार्यकर्ता जिंदगीभर मेहनत करते हैं और चुनाव के समय उनके इलाके में कहीं दूर का या ताजा-ताजा किसी अन्य दल से आयातित उम्मीदवार आ कर चुनाव लड़ जाता है और ग्लेमर या पैसे या फिर जातीय समीकरणों के चलते जीत भी जाता है। ऐसे में सियासत को दलाली या धंधा समझने वालों की पीढ़ी बढ़ती जा रही है। संसद का चुनाव लड़ने के लिए निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम पांच साल तक सामाजिक काम करने के प्रमाण प्रस्तुत करना, उस इलाके या राज्य में संगठन में निर्वाचित पदाधिकारी की अनिवार्यता ‘जमीन से जुड़े’’ कार्यकर्ताओं को संसद तक पहुंचाने में कारगर कदम हो सकता है। इससे थैलीशाहों और नवसामंतवर्ग की सियासत में बढ़ रही पैठ को कुछ हद तक सीमित किया जा सकेगा। इस कदम से सदन में कारपोरेट दुनिया के बनिस्पत आम आदमी के सवालों को अधिक जगह मिलेगी। लिहाजा आम आदमी संसद से अपने सरोकारों को समझेगा व ‘‘कोउ नृप हो हमें क्या हानि’’ सोच कर वोट ना देने वाले मध्य वर्ग की मानसकिता भी बदलेगी।
इस समय चुनाव करवाना बेहद खर्चीला होता जा रहा है, तिस पर यदि पूरे साल देश में कहीं  जिला पंचायत के तो कहीं विधानसभा के चुनाव होते रहते हैं इससे सरकारी खजाने का दम तो निकलता ही ही है, सरकार व सरकारी मशीनरी के काम भी प्रभावित होते हैं। विकास के कई आवश्यक काम भी आचार संहिता के कारण रूके रहते हैं । ऐसे में नए चुनाव सुधारों में तीनों चुनाव(कम से कम दो तो अवश्य) लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय एकसाथ करवाने की व्यवस्था करना जरूरी है। रहा सवाल सदन की स्थिरता को तो उसके लिए एक मामूली कदम उठाया जा सकता है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव खुले सदन में वोट की कीमत यानी जो जितने वोट से जीता है, उसके वोट की सदन में उतनी ही अधिक कीमत होगी; के आधार पर पांच साल के लिए हो।
सांसद का चुनाव लड़ने के लिए क्षेत्रीय दलों पर अंकुश भी स्थाई व मजबूत सरकार के लिए जरूरी है। कम से कम पांच राज्यों में कम से कम दो प्रतिशत वोट पाने वाले दल को ही सांसद के चुनाव में उतरने की पात्रता जैसा कोई नियम ‘दिल्ली में घोडा़ मंडी’’ की रोक का सशक्त जरिया बन सकता है। ठीक इसी तरह के बंधन राज्य स्तर पर भी हो सकते हैं। निर्दलीय चुनाव लड़ने की षर्तों को इस तरह बनाना जरूरी है कि अगंभीर प्रत्याशी लोकतंत्र का मजाक ना बना पाएं। सनद रहे कि 16 से अधिक उम्मीदवार होने पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन की एक से अधिक यूनिट लगानी पड़ती है, जो खर्चीली भी है  और जटिल भी। जमानत जब्त होने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों को अगले दो किसी भी चुनावों में लड़ने से राकना जैसे कुछ कड़े कानून समय की मांग हैं।
मतदाता सूचियों में कमियां होना हरेक चुनाव के दौरान सामने आती हैं। घर-घर जा कर मतदाता सूचियों का पुनररीक्षण एक असफल प्रयोग रहा है। दिल्ली जैसे महानगरों में कई कालोनियां ऐसी हैं जहां गत दो दशकों से कोई मतदाता सूची बनाने नहीं पहुंचा है। देश के प्रत्येक वैध बाशिंदे का मतदाता सूची में नाम हो और वह वोट डालने में सहज महसूस करे; इसके लिए एक तंत्र विकसित करना भी बहुत जरूरी है। वहीं पड़ोसी राज्यों के लाखों लोगों को इस गरज से मतदाता सूची में जुड़वाया गया, ताकि उनके वोटों के बल पर चुनाव जीता जा सके।इस बार तो चुनाव आयोग ने केवल सटे हुए जिलों से मतदाता सूची का मिलान किया, लेकिन 40 फीसदी विस्थापित मजदूरों से बनी दिल्ली में उप्र, मप्र, बंगाल या बिहार व दिल्ली दोनो जगह मतदाता सूची में नाम होने के लाखों लाख उदाहरण मिलेंगे।
चुनावी खर्च बाबत कानून की ढ़ेरों खामियों को सरकार और सभी सियासती पार्टियां स्वीकार करती हैं । किंतु उनके निदान के सवाल को सदैव खटाई में डाला जाता रहा है । राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुआई में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, ईंधन, मतदाता सूचियां, लाउड-स्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैर सरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ‘ढ़ाक के तीन पात’ रहा । 1964 में संथानम कमेटी ने कहा था कि  राजनैतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है । 1971 में वांचू कमेटी अपनी रपट में कहा था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्चा काले धन को प्रोत्साहित करता है । इस रपट में हरेक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के एकाउंट का नियमित ऑडिट करवाने के सुझाव थे । 1980 में राजाचलैया समिति ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं । ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके है ।
अगस्त-98 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए । आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासती पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित ऑडिट नहीं कराती हैं । अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे । चुनाव आयोग ने जब कड़ा रुख अपनाता है तब सभी पार्टियों ने तुरत-फुरत गोलमाल रिर्पोटें जमा करती हैं । आज भी इस पर कहीं कोई गंभीरता नहीं दिख रही है । यहां तक कि नई नई राजनीति में आई आम आदमी पार्टी अपने विदेशी चंदे के हिसाब को सबके सामने रखने में गोलमोल कर रही हैं
पंकज चतुर्वेदी ,
साहिबाबाद गाजियाबाद 201005 फोन-9891928376




मेरे बारे में