तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

दाल की घटती मांग व् खेती पर आलेख राष्ट्रीय सहारा २२ जनवरी २०१४ http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9और राज एक्सप्रेस, भोपाल २३-१-१४

आम आदमी की थाली से दूर होती दाल
मुद्दा पंकज चतुव्रेदी
इन दिनों आम आदमी के भोजन से दाल गायब हो रही है। इसका कारण है, मांग की तुलना में कम उत्पादन। डॉलर के मुकाबले रपए के कमजोर होने से घटता आयात और उसके आसमान छूते दाम। वह दिन अब हवा हो गए हैं जब आम मेहनतकश लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रेत दालें हुआ करती थीं। देश की आबादी बढ़ी, लोगों की पौष्टिक आहार की मांग भी बढ़ी, लेकिन नहीं बढ़ा तो दाल बुवाई का रकबा। परिणाम सामने हैं- मांग की तुलना में दाल की आपूत्तर्ि कम है और इसी कारण बाजार भाव मनमाने हो रहे हैं। भारत में 20 मीट्रीक टन दाल की सालाना जरूरत है, जबकि देश में सन् 2012-13 में इसका उत्पादन हुआ महज 18.45 मीट्रिक टन। दाल की कमी होने के कारण ही इसके दाम बढ़ रहे हैं, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों पर निर्भर हो रहा है। इस तरह दूसरे अनाजों की भी कमी और दामों में बढ़ोतरी हो रही है। हालात इतने खराब हैं कि पिछले 22-23 सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं, लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है । यहां यह जानना जरूरी है कि भारत दुनिया भर में दाल का सबसे बड़ा खपत कर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसद है। इसके बावजूद अब वे दिन सपना हो गए हैं जब आम-आदमी को ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी। आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में काफी कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध है, उसकी कीमत चुकाना गरीब गुरबा और आम-आदमी के बूते से बाहर हो गया है। वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 तक आते-आते भी 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। सन 2008-09 में मुल्क के 220.9 लाख हेक्टेयर खेतों में 145.7 लाख टन दाल ही पैदा हो सकी। सनद रहे कि इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुणा बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जाहिर है, अबादी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी। इसी अवधि के दौरान गेंहू की फसल 104 लाख टन से बढ़ कर 725 लाख टन तथा चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़ कर 901.3 लाख टन हो गई। हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है। दलहन फसलों की बुवाई के रकबे में बढ़ोतरी न होना भी चिंता की बात है । सन 1965-66 में देश के 227.2 लाख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी जबकि सन 2005-06 तक आते-आते यह रकबा घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया। वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, लेकिन 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया। हालांकि सन 2000 आते-आते इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई और यह 22.64 फीसद हो गया लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे। हम गत 25 वर्षो से लगातार विदेशों (म्यांमार, कनाडा, आस्ट्रेलिया और टर्की) से दालें मंगवा रहे हैं। पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़ गए थे। तब आम आदमी बहुत परेशानी में था और उसने अपने स्तर पर विरोध भी दर्ज कराया, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम मचाने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे थे । पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवम्बर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए नियंतण्र टेंडर को मंजूरी दी थी। माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपने उत्पादन का अपेक्षित रेट नहीं मिला। ऐसे में किसान के हाथ फिर निराशा लगी और अगली फसल में उसने एक बार फिर दालों से मुंह मोड़ लिया । दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज (आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी। इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सब्सिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी। लेकिन वास्तव में यह योजना नारों से ऊपर नहीं आ पाई। इससे पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में ‘इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया। सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू की गई योजना थी। उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले। जहां सन 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति प्रति दिन 61 ग्राम थी जो 2009-10 तक आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों हर साल मांग 13 लाख कुंतल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंतल। यह तथ्य इस बात की बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। यह दुख की बात है कि भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने के लिए कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है। एक ही उपाय है कि कमी हो तो बाहर से आयात कर लो। यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं माना जा सकता है। नेशनल सैंपल सव्रे के एक सव्रेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है। शायद सभी सियासी पार्टियों की रुचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं। तभी तो इतने शोर-शराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटौरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।
    

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