तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

बुधवार, 9 जुलाई 2014

raj express bhopal 10-7-14
सियासत की चैखट पर दम तोड़ गया एक और जन अंदोलन
पंकज चतुर्वेदी

अरविंद केजरीवाल दिल्ली के 49 दिन के मुख्यमंत्री बन गए और उनकी वह धार उतर गई, जिसके लिए कभी उनके साथ लाखों-लाख युवा थे । अन्ना हजारे के जन लोकपाल  और भ्रश्टाचार विरोधी आंदोलन की दुर्गति के लिए उनके द्वारा ममता बनर्जी को मसर्थन देने के बाद दिल्ली में आयोजित फुस्स रैली को याद रखना काफी है। इससे पहले एक ऐसा व्यक्ति जिसे पूरे देष में निर्विवाद रूप से एक योग षिक्षक और अच्छे संचारक के रूप में सम्मान मिला था, जब उसने काले धन के मुद्दे पर जन आंदोलन षुरू करना चाहा तो कुछ ही दिनों में ही उनका असली मसला गौण हो गया और पुलिस ज्यादती, बाबा का निजी जीवन और उनके समर्थकों की राजनीतिक अभिलाशाएं , ऐसा ही ना जाने क्या-क्या उभरने लगा।
अन्ना हजारे और केजरीवाल ने भले ही जन आंदोलन खड़ा किया हो लेकिन जैसे-जैसे वे सियासत के करीब आए, लोग उनसे दूर होते चले गए। अब खुद केजरीवाल अपने राजीनीतिक फैसलों को गलत ठहरा रहे हैं, लेकिन काठ की हांडी बार-बार तो चूल्हे पर चढती नहीं है।  भारत में आजादी के बाद ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि कोई गैरराजनैतिक जन आंदोलन खड़ा हुआ और कुछ ही दिन में वह फुस्स हो कर दिषा भटक गया।  याद करें सन 1973 की, जब मोरबी, अमदाबाद के इंजीनियरिंग कालेज के छा़त्रों के होस्टल के मेस के बढ़े बिल देने पर षुरू हुआ विवाद महंगाई, भ्रश्टाचार, षिक्षा- सुधार और बेरोजगारी के खिलाफ ‘नवनिर्माण समिति’ के आंदोलन के रूप में देषव्यापी बना। लोकनायक जयप्रकाष के संपूर्ण क्रांति की नीतिगत दिषा उसी से तय हुई, आपातकाल लगा, इंदिरा गांधी की बुरी तरह पराजय हुई और उसके बाद संपूर्ण क्रांति के सपने ध्वस्त करने में जनता पार्टी की सरकार को ढाई साल भी नहीं लगे। ताकत पानी ज्यादा कठिन नहीं होता, मुष्किल होता है उस ताकत को धारण करना और उसका सकारात्मक इस्तेमाल करना। बाबू जयप्रकाष उसमें असफल रहे और उसके बाद पूरे देष में कभी भी बदलाव या स्वतःस्फूर्त आंदोलन की कोई बयार नहीं आई।
इससे पहले सन 1967 में बंगाल के एक अनजान गांव नक्सलबाडी से षुरू हुआ अन्याय और षोशण के खिलाफ हिंसक आदंालन नक्सलवाद भले ही आज देष के एक तिहाई हिस्से में फैल गया हो, लेकिन अब वह जन आंदोलन नहीं रह गया। बंदूक या हिंसा के बल पर कुछ लोगों को डराने-धमकाने या सषस्त्र बलों पर घात लगा कर हमला कर देने मात्र से सत्ता की नीतियां बदलने से रही। उस जन आंदोलन में अब तक बीस हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि संगठन आतंकवादी घोशित कर दिए गए हैं और कुल मिला कर वे अपनी दिषा भी भटक चुके हैं।कष्मीर का पृथकतावादी आंदोलन पहले भले ही एक राज्य के घाटी वाले हिस्से तक सीमित रहा हो, लेकिन अब तो पूरी तरह अपने मूल विशय से ही भटक चुका हे। कष्मीर की आजादी या स्वायत्तता से ज्यादा पाकिस्तान परस्ती या वहां से मिल रहे पैसे पर ऐष करना उस आंदोलन की नियति बन चुका है। विदेषियों यानी बांग्लादेषियों को अपनी जमीन से खदेड़ने का असम का छात्र आदंोलन राज्य में सत्ता पाते ही दिग््भ्रमित हो गया, तीन-चैथाई बहुमत के बावजूद युवा जोष कुछ सकारात्मक कर नहीं पाया,। यह जरूर हुआ कि राज्य में उनकी छबि भ्रश्ट, निकम्मों की जरूर बन गई। मान्यवर कांषीराम का बामसेफ आंदोलन सत्ता पाने की ललक में कई बार पटरियों से नीचे उतरा। और बीते लोकसभा चुनाव में उसकी उ.प्र में क्या हालत हुई, सबके सामने है।
सन 1990 में मंडल आयोग की रिपेार्ट के खिलाफ आरक्षण-विरोधी आदंालन की यादें भी लोगों के जेहन में धुंधली या विस्तृत हो चुकी हैं। दिल्ली में राजीव गोस्वामी नामक युवक ने खुद को जलाने का प्रयास किया और वह रातो-रात पूरे देष का हीरो बन गया। लेाग भूल चुके हैं कि 24 सितंबर 1990 को दिल्ली के देषबंधु सांध्य कालेज के छात्र सुरेन्द्र सिंह चैहान ने सरेआम खुद को जला कर मार डाला था और अपने आत्महत्या-नोट में लिखा था कि वह सरकार की आरक्षण नीति के विरोध में अपनी जान दे रहा है। देष के कई हिस्सों में सेना को बुलाना पड़ा था। उसके बाद राममंदिर के षंखनाद ने उस जन आंदेालन ही नहीं उसकी यादों को भी गर्त में डाल दिया। राजीव गोस्वामी गुमनामी की जिंदगी जीते हुए दो साल पहले ही असमय मर गया।  हालांकि रामजन्म भूमि आंदोलन भी सत्ता षिखर पर पहुंच कर ध्वस्त हो गया और लोगों को पता चल गया कि  अयोध्या में विवादास्पद ढंाचा गिराना या मंदिर बनाना तो बस बहाना था, असली मकसद तो सत्ता की मलाई पाना था।
सन 1985 से चल रहे नर्मदा बचाओं आदंालन, गुजरात में दंगों के बाद पीडि़तों को न्याय दिलवाने के लिए जन आंदोलन, सिंगूर और जंगल महल के विद्रोह; ऐसे अनगिनत आदंालन गिनाए जा सकते हैं जिसने जन आकांक्षाओं को उभारा, उनकी उम्मीदें  जगाईं लेकिन उनका अंत आम लोगों को ठगने, दिग्भ्रमित करने जैसी निराषाओं से ही हुआ। आखिर क्यों जन आंदोलन जनता की आषाओं की कसौटी पर खरे नहीें उतर पाते हैं ? क्या जन-ज्वार के बीच कतिपय सता लोलुप राजनीतिक दलों की घुसपैठ होना और धीरे से आंदोलन पर अपना एजेंडा थोप देना, आम लोगों के सरोकारों के प्रति आंदोलन की दिषा भटका देता है ? क्या अभी तक जन आंदोलन अपरिपक्व हैं और वे भीड़ को जुटा लेने के बाद अपने होष और जोष खो देते हैं ? या फिर जन आंदोलनों के नायक सरकार की दवाब-प्रकिया के आगे डगमगा जाते हैं और ना चाहते हुए भी एक कदम ऐसा उठा लेते हैं जो उनके लिए अधोगति का मार्ग प्रषस्त कर देता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जन आंदालन महज सत्ता बदलने का जरिया बनते जा रहे हैं, जबकि उनका काम व्यवस्था को बदलने का होना चाहिए और यह काम जमीनी स्तर का है जबकि आंदोलनकर्ता उसके लिए उच्च नेतृत्व पर दवाब डालते हैं।
एक स्वस्थ्य, सषक्त और उभरते हुए लोकतंत्र में यह जरूरी है कि षासन को नियंत्रित करने के लिए कुछ गैर राजनैतिक और निस्वार्थ षक्तियां जन जागरण करती रहें। विडंबना है कि जो षक्तियां इस हेतु आगे आती हैं, वे येन-केन प्रकारेण वोट की राजनीति में फंस जाती है।ं ऐसे निस्वार्थ आंदोलन व दवाब के अभाव में ना तो हम आने वाली पीढि़यों को तैयार कर पा रहे हैं और ना ही जन-नेता ऐसी कोई नजीर दे पा रहे हैं जिससे बगैर सत्ता लोलुपता के  लोकतंत्र को मजबूत करने, प्रषासन में पारदर्षिता और कल्याणकारी योजनाओं को उनके असली हितग्राहियों तक पहुंचाने के कार्य के लिए आम लोग प्रेरित हो सकें।
पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060


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