तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 15 नवंबर 2014

story of neglected bastar



हर कोई बस्तर में बस नक्सली देखना चाहता है
पंकज चतुर्वेदी

jansatta sunday 16-11-14http://epaper.jansatta.com/375709/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-16112014#page/21/1
‘‘बस्तर’’ बाहरी दुनिया के लिए एक ऐसा नाम जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित तो करता है, लेकिन वहां कोई भी वह सब कुछ नहीं देखना चाहता, जो सामने दिखता है, वे देखना चाहते हैं हाथ में असलहा लिए नक्सलियों को, समाज के सामने आने से परहेज करने वाले आदिवासियों को और वहां की अकूत प्राकृतिक संपदा को। भरोसा ना हो तो जरा बताएं कि कहीं दिल्ली में पढ़ा-सुना है कि बीते दो महीनों में यहां  कोई सौ लोग पीलिया से मर गए हैं। बीते जुलाई-अगस्त के चालीस दिनों में अबुझमाड़ के जंगलों में  40 से ज्यादा आदिवासी हैजा-अतिसार से मर चुके हैं। गत तीन सालों में यहां मलेरिया से मरने वालों की संख्या कई सौ है। इस बात का लेखा-जोखा तो हर हफ्ते छपता रहेगा कि कब किसने कितने लोगों को मार गिराया, लेकिन साफ पानी या दवा के अभाव के चलते बेआसरा मरने वालों की सुध दिल्ली लेती नहीं है।
बस्तर पर तकरीरें देने वालों को यह भी नहीं पता होगा कि बस्तर असल में एक गांव है-रायपुर से विषाखापत्तनम जाने वाले राजमार्ग पर कोंडागांव से जगदलपुर के बीच एक छोटा सा गांव, जहां के राजा का महल, किसी गांव के आम किसान के घर की तरह सड़क पर ही दिखता है।  असल में बस्तर  कभी इतना बड़ा जिला हुआ करता था कि केरल राज्य उसके क्षेत्रफल के सामने छोटा था। आज उस बस्तर को सात जिलों में बांट दिया गया है - कांकेर, कोंडागांव, जगदलपुर, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और कोंटा। इस संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। कह सकते हैं कि बस्तर की राजधानी अब जगदलपुर बन गया है। जगदलपुर को समझे बगैर बस्तर को बूझना जरा मुश्‍िकल होगा। कोई सवा लाख आबादी वाला शहर है जगदलपुर, केवल नाम का ‘‘जगदल’’ पुर नहीं है यह- यहां देश के हर राज्य, भाषा के लोग हैं - उडि़या, तेलुगु, उ.प्र व बिहार के , नेपाल और पूर्वोत्तर राज्यों के, ईसाई मिषिनरी में काम करने वाले बहुत से तमिल व मलयाली, सिख-सिंधी, बंगाली..... गजब षहर है। तभी तो यहां जमीन के दाम रायपुर से भी ज्यादा हैं। यहां कई रिर्सोट्स हैं । कहते हैं कि बस्तर में पैसा कमा कर यहीं खर्च किया तो प्रगति होगी, यदि पैसा बाहर ले जाने की कोषिष की तो बर्बादी। तभी यहां जो कोई भी नौकरी-व्यापार को असया, यहीं बस गया। जगह कम पड़ी तो यहां के विषाल दलपत सागर तालाब के बड़े हिस्से पर कब्जा कर कालोनी बना ली गईं। भारत के नियाग्रा प्रपात के तौर पर भव्य व मशहूर चित्रकोट जल प्रपात की दूरी जगदलपुर से 45 किलोमीटर है और अब उस पूरे रास्ते पर भीतर गांव-गांव तक जमीन खरीदना किसी करोड़पति के बूते की बात भी नहीं हैं। वहां टाटा ने कई एकड़ जमीन खरीदी और उसके बाद आदिवासियों की जमीनों के बेनामी सौदों की झड़ी लग गई। सनद रहे इस इलाके में कोई गैरआदिवासी आदिवासी की जमीन नहीं खरीद सकता है, इसलिए सबकुछ फर्जीवाड़ा चलता रहता है। जमीन का ही लोभ है कि चित्रकोट गांव में स्थित नागवंश के अंतिम षासक हरिष्चंद्रदेव का महल भी देखते-देखते बिखर गया और उनकी बेटी की समाधि पर खेत जोत दिए गए।
रायपुर से बस्तर तक बहुत सी योजनाएं चल कर आती है, और यहां से पैसा चल कर वहां तक जाता है, सो यह तीन सौ किलोमीटर की सड़क भले ही फोर लेन ना हो, लेकिन बिल्कुल चिकनी-सपाट है। इस सड़क पर सारी रात बगैर खौफ यातायात चलता है, कोई कह नहीं सकता कि यह इतना ‘‘बदनाम’’ इलाका है। पूुंजी-प्रवाह के रास्ते में कहीं कोई बाधा कभी भी आई है? बस जगदलपुर से सुकमा, नारायणपुर  की तरफ जाने की कोशशि करें, ना तो सड़क मिलेगी, ना ही सरकार। स्कूल, दफ्तर जब तब बंद होते है।, कह दिया जाता है कि नक्सली का खतरा है। हकीकत में आपको पूरे रास्ते में कहीं सुरक्षा बल भी नहीं मिलेंगे, कहीं-कहीं मिलेंगे स्थानीय 16-18 साल के आदिवासी बच्चे जिनके कंधे पर पुरानी थ्री नाट थी्र बंदूक होती है और वे वाहनों को चैक करते रहते हैं। असली पुलिस चाक चैाबंद थानों के भवनों के भीतर ही रहते हैं। ये किषोर बचपन से बंदूक की ताकत देखते हैं- दोनेा तरफ से सो बंदूक ले कर कुछ सौ रूपए में सुरक्षा की ड्यूटी करने में फक्र महसूस करते हैं। यह दीगर बात है कि यदा-कदा इनमें से ही कोई नक्सली बता कर मार डाला जाता है तो स्थानीय स्तर पर कुछ असंतोश छाता है, लेकिन वह जल्दी ही मजबूरी के नीचे दफन हो जाता है। 
बस्तर का अपना समृद्ध इतिहास है जो रखरखाव के बगैर नष्‍ट हो रहा है। यहां की अपनी बोलियां-साहित्य-संस्कार हैं जो यहां की बेशकीमती जमीन व अयस्कों की खरीद में लुप्त हो रही हैं, यहां का मधुर संगीत-नाट्य- नृत्य बारूद की ंगंध में बेसुध हो रहा है। जगदलपुर में ही देख लें यहां के पारंपरिक शिल्प बाजार पर पूरी तरह बंगालियों का कब्जा है, स्थानीय आदिवासी केवल पत्थर-लकड़ी-धातु तराषता है, उस पर मुनाफा दूसरे ही कमाते हैं। एक और चैंकाने वाला आंकडा गौरतलब है कि ताजा जनगणना बताती है कि बस्तर अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या ना केवल कम हो रही है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो रही है। यहां कुपोशण, उल्टी-दस्त और मलेरिया जैसी बीमारियों के कारण हर साल हजारों लोगों का मरना सरकार व समाज की संवेदना को झकझोरता नहीं हैं।  बस्तर के जंगल, वनोपज, अयस्कों पर सभी अपना हिस्सा चाहते हैं लेकिन यहां के सामाजिक दर्द, सांस्कृतिक क्षरण और पर्यावरणीय संकटों को गंभीरता से लेने को कोई तैयार नहीं है।  जिन सड़कों से अफसर-नेता को आना-जाना है वह गडढारहित होती है, लेकिन आम आदमी के जिला या संभाग मुख्यालय आने वाली सड़के साल में सात महीने आने जाने लायक नहीं रहतीं। अपनी सभी नाकामी, गडबडि़यों को छिपाने का एक ही बहाना है -नक्सली। विडंबना है कि इलाके में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी-बड़ी गड़बडि़यों की षिकायतो पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती। कभी कह दिया जाता है कि विकासविरोधी नक्सली ऐसा कर रहे हैं या फिर कभी नक्सली जांच नहीं करने दे रहे हैं। कोंडागांव में जहां नदी नहीं है, वहां बाढ़ दिखा कर पुलिया के बहने के नाम पर करोड़ों का पैसा गडप हो जाता है। कांकेर के आसपास सरकारी अनाज खुले में स्टोर कर उसे सड़ा दिखा कर हजम कर दिया जाता है, जंगलों की कटाई कर उसे रायपुर में बेच कर आदिवासियों पर जंगलसफाई का आरोप मढ़ दिया जाता है,- एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब दादालोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख।
लगता है कि हर एक चाहता है कि बस्तर एक खौफ के नाम से बदनाम रहे, यहां वे ही लोग आ पाएं जिन्हें यहां के ‘‘बाजार’’ की जानकारी है। दिल्ली में बैठे लोग चाहते हैं कि उनके सामने बस्तर का आदिवासी सिर पर सींग लगा कर, गले में ढोल लटका कर नाचे, गाए और गणंतंत्र दिवस परेड में राश्ट्रपति को सलामी दे और जब हम वहां जाएं तो उनके अंतर्मन की पीड़ा को दरकिनार कर तलाषं कि आखिर नक्सली कैसे होते हैं !!

अभी शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री के साथ देषार के बच्चों की बातचीत के क्रम में बस्तर के दंतेवाड़ा से एक बच्ची ने बस्तर में लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा के वाजिब अवसर ना होने की बात कही। हकीकत तो यह है कि जब कभी यहां खून खराबा होता है तो सारे देश की निगाह इस तरफ जाती है, लेकिन जब यहां शिक्षा जैसा मूलभूत अधिकार का हनन किया जाता है और इसके लिए प्रशासन सुपी्रम कोर्ट की अवमानना करने से भी नहीं हिचकता तो यह खबर नहीं बनती।  प्राकृतिक संपदा, नैसर्गिक सुंदरता और सम्द्ध मान संसाधन वाले बस्तर में सुरक्षा बलों की तुलना में नक्सलियों के साथ स्थानीय लेागों की अधिक नजदीकी के मूल कारणों में से एक यहां जागरूकता का अभाव होना है और जागरूकता का मूल मंत्र शिक्षा है जिसके लिए प्रशासन बेपरवाह है।  यहां के स्कूल भवनों को सुरक्षा बलों का आसरा बना दिया गया है, सो नक्सली भी आचंलिक क्षेत्रों में स्कूल भवन केवल इस लिए बनने से रोक देते हैं, क्योंकि वहां बच्चे नहीं बंदूकें रहती हैं। अभी राज्य के बोर्ड के नतीजे आए बस्तर से कोई भी बच्चा राज्य स्तर की मेरिट सूची में नहीं है ।
जहां तक शिक्षा का सवाल है, वह नारों और बड़े-बड़े बैनरों से निकल कर व्यावहारिक धरातल से कोसों दूर है।  स्कूल भवन या तो सुरक्षाब लों का आसरा बने हैं या फिर नक्सलियों के आतंक से खंउहर। इस इलाके के बच्चों को बाहर नौकरी मिलना बेहद कठिन होता हे , क्योंकि दसवीं पास करने के बाद उनका एम.एल.एल(मिनिमम लेबल आफ लर्निंग) या ज्ञान कान्यूनतम स्तर बामुष्किल छठी-सातवीं के बच्चे के बराबर होता है। बस्तर संभाग के सात जिलों में कुल 20 सरकारी कालेज हैं जिनमें हर साल  चालीस हजार से ज्यादा बच्चे विभिन्न परीक्षाअें में बैठते हैं। जान कर दुख होगा कि इनमें से आधे से ज्यादा छात्र पास नहीं हो पाते हैं। कालेज में स्टाफ कम होने जैसी समस्याएं तो हैं ही, असल  दिक्कत यह है कि स्कूल स्तर पर बच्चे जैसे-तैसे पास हो जातते हें, लेकिन उनका षैक्षिक स्तर कालेज के लायक होता ही नहीं है।
और हो भी कैसे ? बानगी के लिए यहां के सबसे विकसित दो जिलों - कोंडागांव व बस्तर को लेते हैं। यहां पर राज्य शासन, सर्व शिक्षा अभियान और जनजातिय विभाग द्वारा संचालित कुल  चार हजार 886 स्कूल हैं , जिनमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या दो लाख 65 हजार से जयादा है।  इन स्कूलों में भवन तो हैं, लेकिन  प्राथमिक षालाओं में प्रधान अध्यापक के 1300 और अध्यापकों के 281 पद खाली हैं। माध्यमिक स्तर पर तो ढांचा पूरी तरह चरमराया हुूआ है, हेड मास्टर के 664 और उच्च श्रेणी शिक्षक के 1164 पदों पर कोई बहाली नहीं है।  लगभग 185 स्कूल ऐसे हैं जहां पीने का पानी भी मवस्सर नहीं है। अब सुकमा, नारायणपुर, दंतेवाड़ा जिलों में तो ये आंकड़े शर्मनाक स्तर पर पहुंच जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि इलाके के आंचलिक क्षेत्रांें में सडक, परिवहन, बिजली जैसी सुविधाएं लगभग ना के बराबर है , सो वहां पदस्थ बाहरी कर्मचारी सेवा करने को तैयार नहीं नहीं होते हैं,ऊपर से  नक्सलियों का इतना खौफ है कि सरकारी नौकर का गांव में रहना खतरे से खाली नहीं होता।

वैसे बीते पांच सालों के दौरान बस्तर इलाके के पांच सौ सरकारी स्कूलों को लाल आतंक के कारण बंद किया गया । बीजापुर जिला इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है और वहां 264 रूकूल पूरी तरह बंद करने पड़े। इसके अलावा नारायणपुर के 10 व कोंटा के 16 स्कूल भी बंद किए गए। हालांकि प्रशासन ने बंद स्कूलों के लिए आश्रम खोले और कुछ जगह विस्थापित आबादी के लिए अस्थाई केबिन बना कर षाला शुरू करने का प्रयास किया गया, लेकिन आश्रमों में पानी, षौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की गैर माजूदगी से वहां के बच्चे अपना पूरा दिन जीवन जीने की जुगत में ही बिता देते हैं। स्कूल बंद होने से खाली पड़े भवनों पर सुरक्षा बल अपना कब्जा जमा लेते हैं तो कभी नक्सली उन्हें बारूद लगा कर उड़ा देते हैं। यह बात यहां के षिखक भी मानते हैं कि बच्चे पढ़ने नहीं बल्कि खाना खाने ही स्कूल आते हैं । आदिम जाति कल्याणा विभाग के ये आंकड़े भी  यहां के ड्राप आउट रेट की बानगी है -  बस्तर संभाग में पहली कक्षा में आए छात्र 27143, कक्षा पंाच तक पहुंचे 18950, आठ पास कर पाए 12553 और दसवीं में पहुंचे 11745। यानी की चालीस फीसदी से जयादा आदिवासी बच्चे दसवीं तक भी नहीं पहुंच पाते हैं।
जनवरी-2011 में एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राजय शासन को आदेश दिया था कि स्कूलों में सुरक्षा बलों को ना ठहरा जाए । कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव या ऐसे ही हालात के नाम पर स्कूलों को बंद कर वहां सुरक्षा बलों को रुकाना गैरकानूनी है। लेकिन राज्य सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। अगस्त-2013 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य शासन को अवमानना का नोटिस भी थमा दिया, बावजूद हाल ही में संपन्न चुनावों में फिर से स्कूलों में सुरक्षा बलों का डेरा था। राज्य शासन कहता है कि वह चुनाव आयोग से अनुमति ले कर ऐसा करता है, लेकिन इस बात का जवाब देने को कोई तयार नहीं है कि क्या चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर सकता है?  कुल मिला कर सामने दिख रहा है कि बस्तर में शिक्षा का सवाल सुरक्षा के समाने गौण हैं।
हाल ही में केंद्र सरकार की एक योजना के तहत पूरे देश में स्कूल स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को शुरू किया गया, इसके लिए छत्तीसगढ़ के 25 स्कूलों को षामिल किया गया है। लेकिन रोजगारोन्मुखी षिखा की इस परियोजना में बस्तर संभग का एक भी स्कूल नहीं है।, यह बस्तर में  पढ़ाई के प्रति राज्य के नजरिये को दर्षाता है।  सरकारी सिस्टम बस्तर में सुरक्षा के नाम पर बेइंतिहां खर्च व व्यवस्था करता है, लेकिन यह तय है कि केवल सुरक्षा बलों के जरिए वहां नक्सल उन्मूलन संभव नहीं होगा। जब तक आमजन  रोजगार, जागरूकता जैसे सवालों से  साबका करने लायक नहीं होगा, सुरक्षा बल नाकाम रहेंगे और यह हिम्मत लोगों में केवल पढ़ाई-लिखाई से ही आएगी।

घने जंगलों, प्राकृतिक झरनों और पहाड़ों जैसी नैसर्गिक सुंदरता से भरपूर बस्तर में भी पूरे देश की तरह मौसम बदलते हैं, उनके स्थानीय बोलियों में नाम भी हैं, लेकिन वहां के बाषिंदे इन मौसमों को बीमारियों से चीन्हते हैं। इस समय वहां पीलिया का मौसम चल रहा है, फिर उल्टी-दस्त का आएगा, फिर बारिष हुई कि मलेरिया का। सरकारी खजाने का मुंह बस्तर के जंगलों की तरफ इस तरह खुला हुआ है कि लगता है अब वहां की गरीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा बस बीते दिनों की बात बनने ही वाले हैं। जबकि हकीकत यह है कि कभी प्रकृति के सहारे जीने-मरने वाले यहां के आदिवासी साफ पानी के अभाव में सारे साल बीमारियों से त्रस्त रहते हैं। सरकारी दस्तावेज खुद गवाह है कि जिन इलाकों में लोग जहरीले पानी से मर रहे हैं, वहां सरकारी मषीनरी पहंुच ही नहीं पा रही है और अपनी नाकामी को नक्सलवाद का मुलम्मा चढा कर लाचार दिख रही है। बहुत से बस्तर-विषेशज्ञ इसे हर साल की स्थाई त्रासदी करार दे कर मामले को हल्का बना रहे हैं तो कुछ सारा ठीकरा नक्सलियों के सर फोड कर सत्ताधारी दल के गुण गा रहे हैं।
यहां साल भर मनरेगा के नाम पर कागजों पर तालाबों के गहरीकरण व सफाई होती है, असलियत में तो अप्रेल के आखिरी सप्ताह में ही यहां के तालाब सूख चुके थे। अब ग्रामीणें के पास पेयजल का एक ही माध्यम बचता है - हैंड पंप, जबकि यहां के अधिकंाष हेडपंप पानी के नाम पर लोहा व फ्लोराईड के आधिक्य वाला जहर फैंकते हैं। यह बात सामने आ रही है कि नदी के किनारे बसे गांवों में बीमारियों का ज्यादा प्रकोप है। असल में यहां धान के खेतों में अंधाधुंध रसायन का प्रचलन बढने के बाद यहां के सभी प्राकृतिक जल-धाराएं जहरीली हो गई हैं। इलाके भर के हैंड पंपों पर फ्लोराईड या आयरन के आधिक्य के बोर्ड लगे हैं, लेकिन वे आदिवासी तो पढना ही नहीं जानते हैं और जो पानी मिलता है, पी लेते हैं। माढ़ के आदिवासी षौच के बाद भी जल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। ऐसे में उनके षरीर पर बाहरी रसायन तत्काल तेजी से असर करते हैं। सरकारी अमले हेपेटाईटस-ए और बी के टीके लगाने के आंकड़े तो पेष करते हैं , लेकिन यह नहीं बताते कि इन टीकों को पांच डिगरी सेंटीग्रेट तापनाम पर रखना होता है, वरना यह खराब हो जाते हैं। हकीकत यह है कि प्रशासन के पास अभी तक ऐसी कोई व्यवसथा नहीं है कि आंचलिक क्षेत्रों तक इतने कम तापमान में टीके पहुंचाए जाएं।
यह पहली बार नहीं हुआ था कि, बीते दस सालों के दौरान यहां गरमी शुरू होते ही जल-जनित रोगों से लोग मरने लगते हैं। और जैसे ही बाषि हुई ,उससे सटे-सटे ही मलेरिया आ जाता है।  बस्तर में गत तीन सालों के दौरान मलेरिया से 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।  कह सकते हैं कि बीमार होना, मर जाना यहां की नियति हो गई है और तभी हल्बी में इस पर कई लोक गीत भी हैं।  आदिवासी अपने किसी के जाने की पीड़ा गीत गा कर कम करते हैं तो सरकार सभी के लिए स्वास्थ्य के गीत कागजों पर लिख कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाती है।  बस्तर यानी जगदलपुर के छह विकास खंडों के सरकारी अस्पतालों में ना तो कोई स्त्री रोग विषेशज्ञ है और ना ही बाल रोग विषेशज्ञ। सर्जरी या बेहोष करने वाले या फिर एमडी डाक्टरों की संख्या भी षून्य है।  जिले के बस्तर, बकावंड, लोहडीगुडा, दरभा, किलेपाल, तोकापाल व नानगुर विकासखंड में डाक्टरों के कुल 106 पदों में से 73 खाली हैं। तभी सन 2012-13 के दौरान जिले में  दर्ज औरतों व लड़कियों की मौत में 60 फीसदी कम खून यानी एनीमिया से हुई हैं। बडे किलेपाल इलाके में 25 प्रतिषत से ज्यादा  किषोरियां व औरतें कम खून से ग्रस्त हैं।
टीकाकरण, गोलियों का वितरण, मलेरिया या हीमोग्लोबीन की जांच जैसी बाते यहां सपने की तरह हैं।  जब अस्पताल में ही स्टाफ नहीं है तो किसी माहामरी के समय गांवों में जा कर कैंप लगाना संभव ही हनीं होता। अभी बीजापुर जिले के भैैरमपुर ब्लाक में  इंद्रावती नदी के उस पार बेथधरमा,ताकीलांड, उतला, गोरमेटा जैसे कई गांवों में हर रोज तीन से पांच लोगों की चिताएं जलने की खबर आ रही है। स्वास्थ्य विभाग नक्सलियों के डर से वहां जाता ही नहीं है। ऐसे कोई 450 गांव पूरे संभाग में हैं जहां आज तक कोई स्वास्थ्य कर्मी गया ही नहीं, क्योंकि या तो वहां तक रास्ता नहीं है या फिर वहां जाना मौत को बुलाना कहा जाता है और वहां उल्टी-दस्त व अब मलेरिया मौत का तांडव कर रहा है।
बस्तर बीमार है, वहां के लेाकरंग स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बेरंग हो रहे हैं। इलाके में जल-जंगल-जमीन को बाहरी दखल ने जहरीला बना दिया है, वरना वहां हर मरज की जड़ी-बूटी थी। सरकार असहाय है और इसका फयदा कतिपय झाड़-फूंक, गुलिया-ओझा उठा रहे हैं। लोगों को बस्तर की याद तभी आती है जब वहां नक्सल या पुलिस के बैरल से निकली गोली के साथ किसी निर्दोश का खून बहता है या फिर कहीं मुल्क की समृद्ध संस्कृति के नाम पर वहां के लोक-नृत्य का प्रदर्षन करना होता है। काष सरकार में बैठे लोगों पर भी कोई टोना-टोटका कर दे ताकि वे पीलिया, डायरिया जैसे सामान्य रोग से मरते अपने ही बस्तर के प्रति गंभीर हो सकें।
बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक और संपर्क बगैर केवल बंदूक के बल पर षांति की कल्पना बेमानी है। आज भले ही वहां जोर षोर से  आत्मसमर्पण, जंगल में आतंक समाप्त होने, की खबरे प्रचारित की जा रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि बस्तर के आदिवासी का मूल स्वभाव उसके नैसर्गिक कार्यों में आड़े आने पर प्रतिरोध का है। उनकी भाषा, बोली, संस्कार, गांव, भोजन, रहन-सहन में न्यूनतम बाहरी दखल तथा उन्हें सरकारी सुविधाओं के लाा के लिए ईमानदार यत्न ही बस्तर से बारूद की गंध छांट सकते हैं





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