तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

सोमवार, 16 मार्च 2015

Examination mania killing joy of learning

नंबर-दौड़ में गुम शिक्षा का मकसद

                                                                                                                                
पंकज चतुव्रेदी 

आज मूल्यांकन का आधार बच्चों की योग्यता न होकर उनकी कमजोरी है। यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पच्रे बेचने-खरीदने की प्रवृत्ति, नकल व झूठ का सहारा लेना जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस नंबर-दौड़ में गुम होकर रह गया है परीक्षा व उसके परिणामों ने एक भयावह सपने औ र बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप ले लिया है। कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर शतरे की बाधाएं खड़ी कर दी हैं


Rashtriy Sahara 17-3-15
बोर्ड की परीक्षाएं बच्चे, अभिभावक शिक्षक सभी के लिए चिंता का कारण होती हैं। किसी को बेहतर संस्थान में एडमिशन की चिंता, तो किसी को स्कूल का नाम रोशन करने की, तो कोई समाज में रुतबे के लिए बच्चे को सहारा बनाए है। कहने को तो सीबीएसई में नंबर की जगह ग्रेड लागू है, लेकिन इससे उस संघर्ष का दायरा और बढ़ गया है जो बच्चों के आगे के एडमिशन, भविष्य या जीवन तय करते हैं। चार साल पहले एनसीईआरटी और सीबीएसई के हवाले से कई समाचार छपते थे कि अब बच्चों को परीक्षा के भूत से मुक्ति मिल जाएगी, ऐसी नीतियां व पुस्तकें बन गई हैं जिनके कारण बच्चे मजे से पढ़ेंगे। घोषणा हुई थी कि 10वीं के बच्चों को अंक नहीं ग्रेड दिया जाएगा। लेकिन इस व्यवस्था से बच्चों पर दवाब में कोई कमी नहीं आई है। विचारणीय है कि जो शिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंतण्रकरना न सिखा सके, विषम परिस्थिति में संतुलित रहना न सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक होगी? ज्यादा नंबर लाने की होड़, और इसके बीच में पिसता किशोर! अभी-अभी उसने बचपन की दहलीज छोड़ी है और पहला अनुभव ही इतना कटु? दुनिया क्या ऐसे ही गलाकाट प्रतिस्पर्धा से चलती है। एक तरफ कॉलेजों में दाखिले की मारामारी होगी, तो दूसरी ओर हायर सेकेंडरी में अपने पसंद के विषय लेने के लिए माकूल अंकों की दरकार का खेल। अब तो बोर्ड के इम्तिहान से आगे की गलाकाट ज्यादा बड़ी हो गई है- हर एक बच्चा एआईईई, सीपीएमटी के अलावा अलग-अलग राज्यों के इंजीनियरिंग और मेडिकल इंट्रेंस एक्जाम में भी लगा है। बीबीए में दाखिला भी अलग से परीक्षा से होना है। जाहिर है, पाठ्यक्रम के दवाब के साथ-साथ अपने भविष्य और अपने पालकों के अरमानों के दवाब को झेलने के लिए 17-18 साल की उम्र कुछ कम ही होती है। इस तरह की ‘परीक्षा- पण्राली’ से सफल नहीं, वरन असफल लोगों की जमात तैयार हो रही है। क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमता का तकाजा महज अंकों का प्रतिशत ही है? वह भी उस परीक्षा पण्राली में, जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है। सीबीएसई की कक्षा 10 में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत से बच्चों के कम अंक रहे। जबकि हिंदी के मूल्यांकन की पण्राली को गंभीरता से देखें तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है। कोई बच्चा ‘हैं’ जैसे शब्दों में बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी को छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है। स्पष्ट है यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए। यानी मूल्यांकन का आधार बच्चों की योग्यता न होकर उनकी कमजोरी है। यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पच्रे बेचने-खरीदने की प्रवृत्ति, नकल व झूठ का सहारा लेना जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस नंबर-दौड़ में गुम होकर रह गया है। छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के लगातार नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी जिसकी अगुआई प्रोफेसर यशपाल कर रहे थे। समिति ने देशभर की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया और जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें साफ लिखा था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है न समझ पाने का बोझ। सरकार ने सिफारिशों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू किया जा रहा है। फिर देश की राजनीति मंदिर-मस्जिद जैसे विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही। चूंकि परीक्षा का वर्तमान स्वरूप आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है, अत: इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसके विपरीत बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार होका मौत को गले लगा चुके हैं। हायर सेकेंडरी के रिजल्ट के बाद ऐसे हादसे पूरे देश में होते रहते हैं। अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो से ही पालक युद्ध-सा लड़ने लगते हैं। यशपाल समिति की दूसरी सिफारिश पाठ्य पुस्तक के लेखन में शिक्षकों की भागीदारी बढ़ाकर उसे विकेंद्रित करने की थी। सभी स्कूलों को पाठ्य पुस्तकों और अन्य सामग्री के चुनाव सहित नवाचार के लिए बढ़ावा दिए जाने की बात भी इस रपट में थी। अब प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक तो मिल गया है, लेकिन यह अच्छा व्यापार बनकर बच्चों- अभिभावकों के शोषण का जरिया बन गया है। पब्लिक स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते जा रहे हैं। सरकार बदलने के साथ किताबें बदलने का दौर एनसीईआरटी के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगमों में भी जारी हैं। पाठ्य पुस्तकों को स्कूल की संपत्ति मानने व उन्हें बच्चों को रोज घर ले जाने की जगह स्कूल में ही रखने के सुझाव न जाने किस लाल फीते वाली फाइल में बंध कर गुम हो गए। जबकि बच्चे बस्ते के बोझ, कोर्स की अधिकता और अभिभावकों की अपेक्षाओं से कुंठित होते जा रहे हैं। कुल मिलाकर परीक्षा व उसके परिणामों ने भयावह सपने और बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप ले लिया है। कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर शतरे की बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सवाल है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है! परीक्षा में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, विषयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायद? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं। सरकार हर साल ‘ड्राप आउट’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है। लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपनी पसंद के विषय या संस्था में प्रवेश न मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं। एमए और बीए की डिग्री पाने वाले कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने अपनी पसंद के विषय पढ़े हैं? विषय चुनने का हक बच्चों को नहीं, उस परीक्षक को है जो बच्चों की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी गलतियों की गणना के अनुसार कर रहा है। यह भी गौरतलब है कि 12वीं की जो परीक्षा योग्यता का प्रमाणपत्र मानी जा रही है, व्यावसायिक पाठ्यक्रम वाले उसे कागज का टुकड़ा भर मानते हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, चार्टेड एकाउंटेंट; जिस भी कोर्स में दाखिला लेना हो, प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। यही नहीं, 12वीं पास करने के एवज में मिला प्रमाणपत्र उच्च शिक्षा की गारंटी भी नहीं लेता। डिग्री कॉलेजों में भी ऊंचे नंबर पाने वालों की लिस्ट तैयार होती है। अनुमान है कि हर साल हायर सेकेंडरी (राज्य या केंद्रीय बोर्ड से) पास बच्चों का 40 फीसद आगे की पढ़ाई से वंचित रह जाता है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया व उसके बाद के नतीजों को बच्चों के लिहाज से परखने का वक्त आ गया है।

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