तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 5 अप्रैल 2015

save the Hindon

हिंडन, जो कभी नदी थी

                                                         पंकज चतुर्वेदी

देश की राजधानी दिल्ली के दरवाजे पर खड़े गाजियाबाद में गगनचुंबी इमारतों के नए ठिकाने
हिंडन का पुराना नाम हरनदी या हरनंदी है। इसका उद्गम सहारनपुर जिले में हिमालय क्षेत्र के ऊपरी षिवालिक पहाडि़यों में पुर का टंका गांव से है। यह बारिष पर आधारित नदी है और इसका जल विस्तार क्षेत्र सात हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। यह गंगा और यमुना के बीच के देाआब क्षेत्र में मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर और ग्रेटर नोएडा का 280 किलोमीटर का सफर करते हुए दिल्ली से कुछ दूर तिलवाडा में यमुना में समाहित हो जाती है। रास्ते में इसमें कृश्णा, धमोला, नागदेवी, चेचही और काली नदी मिलती हैं। ये छोटी नदिया भीं अपने साथ ढेर सारी गंदगी व रसायन ले कर आती हैं और हिंडन को और जहरीला बनाती हैं। कभी पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा कहलाने वाली हिंडन का पानी इंसान तो क्या जानवरों के लायक भी नहीं बचा है। इसमें आक्सीजन की मात्रा बेहद कम है। लगातार कारखानों का कचरा, शहरीय नाले, पूजन सामग्री और मुर्दों का अवशेष मिलने से मोहन नगर के पास इसमें आक्सीजन की मात्र महज दो तीन मिलीग्राम प्रति लीटर ही रह गई है। करहेडा व छजारसी में इस नदी में कोई जीव-जंतु शेष नहीं हैं, हैं तो केवल काईरोनास लार्वा। सनद रहे दस साल पहले तक इसमें कछुए, मेंढक, मछलियां खूब थे।  बीते साल आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने यहां तीन महीने शोध किया था और अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हिंडन का पानी इस हद तक विषैला होगा या है कि अब इससे यहां का भूजल भी प्रभािवत हो रहा है।
इधर उ.प्र. प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि हिंडन में जहर घुलने का काम गाजियाबाद में कम होता है, यह तो यहा पहले से ही दूशित आती हे। बोर्ड का कहना है कि जनपद में 316 जल प्रदूशणकारी कारखाने हैं जिसमं से 216 एमएलडी गंदा पानी निकलता है, लेकिन सभी इकाईयों में ईटीपी लगा है। इन दावों की हकीकत तो करहेडा गांव में आ रहे नाले से ही मिल जाती है, असल में कारखानों में ईटीपी लगे हैं, लेकिन बिजली बचाने के लिए इन्हे यदा-कदा ही चलाया जाता है। हिंडन का दर्द अकेले इसमें गंदगी मिलना नहीं है, इसके अस्तित्व पर संकट का असल कारण तो इसके प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ रहा है। कभी पंटून पूल वाला रास्ता कहलाने वाले इलाके में करहेडा गांव के पास बड़ा पुल बनाया गया, ताकि नई बस रही कालोनी राजनगर एक्सटेंषन को ग्राहक मिल सकें।  इसके लिए कई हजार ट्रक मिट्टी-मलवा डाल कर नदी को संकरा किया गया और उसकी राह को मोड़ा गया। मामला नेषनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) में भी गया। एनजीटी ने एक पिलर बनाने के साथ-साथ कई निर्देष भी दिए। इस लडाई को लड़ने वाले धर्मेन्द्र सिंह बताते हैं कि बिल्डर लाॅबी इतनी ताकतवर है कि उसकी षह पर सरकारी महकमे भी दबे रहते हैं और एनजीटी के आदेषों को भी नहीं मानते हैं। यही नहीं बीते दस सालों में अकबरपुर-बहरामपुर, कनावनी गांव के आसपास नदी सूखी नहीं कि उसकी जमीन पर प्लाट काट कर बेचने वाले सक्रिय हो गए। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे लोग रसूखदार होते हैं। आज कोई 10 हजार अवैध निर्माण हिंडन के डूब क्षेत्र में सिर उठाए हैं और सभी अवैध हैं । स्थानीय प्रषासन ने इन अवैध निर्माणों को जल-बिजली कनेक्षन दे रखा है। एनजीटी ने इन निर्माणों को हटाने के आदेष दिए हैं तो लोग इसके विरूद्ध हाई कोट से स्टे ले आए। करहेडा में तो सरकारी बिजलीघर का निर्माण भी डूब क्षेत्र में कर दिया गया।  जिले का हज हाउस भी नदी के डूब क्षेत्र में ही खड़ा कर दिया गया। प्र्यावरण के लिए काम कर रहे अधिवक्ता संजय कष्यप बताते हैं कि अभी कुछ साल पहले तक इसका जल प्रवाह देानेा सिरों पर चार-चार सौ मीटर था जो अब सिकुड कर कुल जमा दो सौ मीटर रह गया है।
प्रषांत वत्स ‘‘हरनंदी कहिन’’ नाम से एक मासिक पत्रिका निकालते हैं औ वे हिंडन नदी के कनिारे रहने वाले लोगों को इसके पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने की मुहिम चला रहे हैं। श्री वत्स बताते हैं कि हिंडन नदी के षुद्धिकरण का मसल हर चुनाव में उछाला जाता है, हर बार कुछ धन राषि भी व्यय होती है, लेकिन हिंडन की मूल समस्याओं को समझा नहीं जाता है। एक तो इसे नैसर्गिक मार्ग को बदलना,दूसरा इसमें षहरी व औद्योगिक नालों का मिलना, तीसरा इसके जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण- इन तीनों पर एकसाथ काम किए बगैर नदी का बचना मुष्किल है।
दिक्कत यह भी है कि कतिपय कारखानों का बचाव कर रही सरकार मानने को तैयार नहीं है कि हिंडन का पानी जहर से बदतर है।  पिछले दिनों देश की नदियों में प्रदूषण की जांच में जुटे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उत्तर प्रदेश की हिंडन नदी के पानी को नहाने लायक भी नहीं पाया है। बोर्ड ने यह जानकारी राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) के प्रमुख स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ को सौंपे हलफनामे में दी है। सीपीसीबी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ मिलकर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ और गाजियाबाद में नदी के पानी की जांच की। हलफनामे में बताया कि नदी का पानी पर्यावरण अधिनियम, 1986 के तहत तय नहाने के पानी के मानकों के अनुरूप नहीं है। इसके समाधान के लिए बोर्ड ने ठोस अवशिष्ट को नदी किनारे और नदी में न फेंकने की हिदायत दी है। इसके अलावा बोर्ड ने कहा है कि अशोधित कचरा नदी में न फेंका जाए बल्कि नगर पालिका अवशिष्ट प्रबंधन अधिनियम, 2000 के तहत इसकी सही व्यवस्था की जाए। इससे पहले पंचाट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पश्चिमी यूपी की नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी मांगी थी। पंचाट एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसके मुताबिक नदी में पड़ने वाले खतरनाक अवशिष्ट से गंगौली, दाहा, संकरोड जैसे गांवों के लोगों में कैंसर हो रहा है।
इसके विपरीत उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंडन नदी के पानी को जहरीला बताए जाने के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के दावे को झुठला दिया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि नदी के पानी में कोई जहरीला पदार्थ नहीं है। जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने ट्रिब्यूनल में स्वीकार किया था कि सहारनपुर से लेकर गौतमबुद्ध नगर तक हिंडन नदी का पानी है दूषित हो गया है।

समिति ने कहा था कि हिंडन की सहायक नदियां कृष्णा और काली नदी का पानी भी पूरी तरह से दूषित है। साथ ही कहा था कि हिंडन नदी का पानी इतना दूषित है कि अब यह नहाने धोने के योग्य भी नहीं रहा है। सीपीसीबी ने यह हलफनामा बागपत के गांव में दूषित पानी पीने से लोगों में हो रही कैंसर और अन्य जानलेवा बीमारियों पर रोकथाम लगाने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर दिया था। अब उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति ने कहा है कि सबकुछ ठीक है और औद्योगिक इकाईयों में ईटीपी लगा हुआ है।
यदि यमुना में हिंडन का काला जल मिलजने से रोकना है तो ग्रेटर नोएडा के मध्य से होकर गुजरने वाले घोर प्रदूषित लोहिया ड्रेन की अतिशीघ्र सफाई कराने के साथ साथ प्रदूषित इकाइयों को चिन्हित कर उनके प्रदूषित औधोगिक उत्प्रवाहों के निस्तारण पर रोक लगाना जरूरी है। लोहिया ड्रेन गांव इस्लामाबाद कालदा(ग्रेटर नोएडा) से निकलकर कैंसर प्रभावित क्षेत्र से होते हुए ग्रेटर नोएडा के नालेज पार्क से होकर हिंडन नदी से मिलता है। ग्रेटर नोएडा के इकोटेक-3,उद्योग केंद-2 एवं साईट ए,बी-सी की औधोगिक इकाइयों सहित कई बड़ी इकाइयों के गेर शोधित औधोगिक उत्प्रवाहों का निस्तारण निकटवर्ती लोहिया ड्रेन में होता है। परिणामस्वरूप ये नाला गंदगी और सडांध से भरा रहता हे जबकि यह सूरजपुर,गामा-1,नालेज पार्क-1-2-3,ओमेगा-2,सेक्टर पाई आदि आवासीय सेक्टरों के मध्य व बराबर से गुजरता है।  परिणामस्वरूप भयंकर दुर्गन्ध तथा मक्खी-मच्छरों की भरमार के कारण लोग नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हे साथ ही यह सेक्टरों के साथ साथ गांवों के भूगर्भ जल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है ।
हां, यह तय है कि जिस तरह से हिंडन नदी के इलाके में कंक्रीट की लहरें पिरोई जा रही हैं, वे जल्द ही बड़े संकट का इषारा कर रही हैं। एक तो नदी के डूब क्षेत्र की जमीन भीतर से दलदली होती है, दूसरा नदी अपने प्राकृतिक मार्ग पर हर समय टकराती रहती है। अब यहां बीस-बीस मंजिल की खड़ी इमारतें एक फुसफुसी, कीचड़ वाली जमीन पर तनी हैं, जिन्हे ंनीचे से गहराई में पानी की चोट भी लग रही हैं। यह इलाका भूकंप के लिए बेहद संवेदनषील है। दिल्ली के गांधी नगर व यमुना पार की कई कालोनियों के उदाहरण साामने हैं जहां, यमुना का जल स्तर बढ़ने पर बेसमेंट में सीलन आई व भवन गिर गए। साथ ही यहां के भूजल का स्तर नीचे गिरने व उसके जहरीले होने की जो रफ्तार है उससे साफ जाहिर है कि भले ही नदी की जमीन घेर कर भवन बना लो, लेकिन इंसानी जीवन के लिए जरूरी जल कहां से लाओगे।
इंसान के लालच, लापरवाही ने हिंडन को ‘हिडन’ बना दिया है लेकिन जब नदी अपना रौद्र रूप दिखाएगी तब मानव जाति के पास बचाव के कोई रास्ते नहीं मिलेंगे। एक बात और सरकार भले ही यमुना के प्रदूशण निवारण की बडी-बडी योजनाएं बनाए, जब तक उसमें मिलने वाली हिंडन जैसी नदियां पावन नहीं होंगी, सारा श्रम व धन बेमानी ही होगा।
राजनगर एक्सटेंशन को दूर से देखो तो एक समृद्ध, अत्याधुनिक उपनगरीय विकास का आधुनिक नमूना दिखता है, लेकिन जैसे-जैसे मोहन नगर से उस ओर बढ़ते हैं तो अहसास होने लगता है कि समूची सुंदर स्थापत्यता एक बदबूदार गंदे नाबदान के किनारे है। जरा और ध्यान से देखें तो साफ हो जाता है कि यह एक भरपूर जीवित नदी का बलात गला घोंट कर कब्जाई जमीन पर किया गया
प्रभात, मेरठ 5 अप्रेल 2015
विकास है, जिसकी कीमत फिलहाल तो नदी चुका रही है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब नदी के असामयिक काल कवलित होने का खामियाजा समाज को भी भुगतना होगा।  गांव करहेडा के लोगों से बात करें या फिर सिंहानी के, उन सभी ने कोई तीन दशक पहले तक इस नदी के जल से सालभर अपने घर-गांव की प्यास बुझाई है। यहां के खेत सोना उगलते थे और हाथ से खोदने पर जमीन से शीतल-निर्मल पानी निकल आता था।  हिंडन की यह दुर्गति गाजियाबाद में आते ही षुरू हो जाती है और जैसे-जैसे यह अपने प्रयाण स्थल तक पहुंचती है, हर मीटर पर विकासोन्मुख समाज इसकी सांसें हरता जाता है।

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