तालाब की बातें

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शनिवार, 16 मई 2015

Customer will be king after GST and FDI in retail

भारत में उपभाेक्ता के हक में है जीएसटी और रिटेल में विदेशी निवेश

राज एक्‍सप्रेस मप्र 16 मई 2015 
                                                                 पंकज चतुर्वेदी

जब देश में महंगाई की मार से बेहाल है, केंद्र सरकार की केबीनेट ने बहु ब्रांड के खुदरा यानी रिटेल क्षेत्र में 51 फीसदी तक विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी। इससे पहले पूरे देश में एकसमान कर प्रणाली वाले जीएसटी पर भी संसद में लगभग सभी सहमत दिख रहे हैं। हालांकि दो साल पहले ही भारत सरकार के सचिवों की एक समिति ने इसकी सिफारिश की थी और तभी से यह तय माना जा रहा था। देष में एकल ब्रांड के रिेटेल में पहले से ही इतने निवेश की मंजूरी है। जबकि थोक व्यापार में तो षत प्रतिषत की छूट है। हालंाकि यह आषंका जताई जा रही है कि इसका विपरीत असर देश के नियोजित और बेहद लघु स्तर पर व्यापक रूप में चल रहे खुूदरा व्यापार पर पड़ेगा। लेकिन यदि इस निर्णय के बाद कुछ बड़ी कंपनियां भारत में निवेष करती हैं तो यह ना केवल सरकार के लिए बल्कि उपभोक्ता और घरेलू अर्थ व्यवस्था के लिए भी फायदेमंद होगा। रोजगार के सामधन बढ़ेंगे, कर अपवंचन, घटतौली, मिलावट जैसी बीमारियों से मुक्ति के रास्ते खुलेंगे , सो अलग।
एक अनुमान है कि भारत के लोग हर साल खाने-पीने या यो कहंे कि राशन पर 200 अरब अमेरिकी डालर के बराबर पैसा खर्च करते हैं। यही नहीं इस क्षेत्र में विकास दर भी सालाना 25 से 30 फीसदी की है। लेकिन इस क्षेत्र में नियोजित सेक्टर की भागीदारी बामुष्किल आठ अरब डालर की है। ऐसे स्टोर्स षहरी क्ष्ेात्रों में दो प्रतिषत के आसपास व्यापार कर रहे हैं, जबकि 98 प्रतिषत हिस्सा गांव-गांव तक फैली कोई सवा करोड़ दुकानों से होता है, जिनका आकार 500 वर्ग फुट से भी कम है। भारत में किराना के फुटकर व्यापार से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कोई तीन करोड़ दस लाख लोग जुड़े हैं। इनमें बड़ी संख्या बिचैलियों की हे। वैसे भी इस तरह की बहुराश्ट्रीय कंपनियों के स्टोर दस लाख से ज्यादा आबादी के षहरों मे ही खुलेेंगे, जाहिर है कि इस व्यापार में लगे मौजूदा वयापारियों की बड़ी संख्या इससे अप्रभावित रहेगी। एक बात और जब बड़े स्टोर्स पर कम दाम में गुणवत्ता वाली चीजें मिलेंगेी तो गली वाले दुकानदार को भी संभलना होगा और उसका फायदा उपभोक्ता को ही होगा। टेलीकम्यूनिकेषंस के क्षेत्र में पिदेषी निवेष के फायदे सभी के सामने हैं। इसके साथ ही जब जीएसटी के चलते पूरे देष में वस्तुओं के एक ही दाम होंगे तो एमआरपी व छूट के नाम पर ग्राहक के साथ होने वाली बाजीगरी रूक जाएगी।
हमारे देष में रिटेल बाजार का नियोजित रूप बहुद ही आरंभिक अवस्था में है। रिलाईंस, भारती, फ्यूचर यानी बिग बाजार, मोर, स्पेंसर , 6 टेन जैसे औद्योगिक घरानों ने माॅल की नवसंस्कृति पर सवार हो कर महानगरों व उभरते षहरों में अपने स्टोर्स खोले हैं। हाल ही में सहारा समूह ने लोगों को गुणवत्ता वाली सामग्री वाजिब दाम पर मुहैया करवाने के लिए ‘क्यू’ षाॅप षुरू की हैं। जब पूरी दुनिया पर आर्थिक मंदी की मार पड़ रही थी, तब देष में नियोजित रिटेल मार्कैट जोर पकड़ रहा था। दुर्भाग्य ही था कि उस हवा में सुभिक्षा जैसे स्टोर्स को बाजार से बाहर ही होना पड़ा, जबकि सबका बाजार जैसे छोटे रिटेलरों को अपना काम संकरा करना पड़ा था । इसके बावजूद उभरते षहरों में खुले रिटेल चैनों ने नए उपभोक्ता वर्ग या नवधनाढ्यों के बल पर खुद को बाजार में विरीत हवा के बावजूद खड़े रखा था। ऐसे में कम से कम दो करोड़ डालर लगाने की षर्त पर विदेषी निवेष का यदि फैसला होता है तो उभरती अर्थ व्यवस्था वाले हमारे देष में उपभोक्ता की नई संस्कृति विकसित होगी। सनद रहे कि विेदेषी निवेष में कम से कम आधा पैसा कोल्ड स्टोरेज व अन्य सप्लाई चैन विकसित करने में खर्च करना होगा।
बड़े स्टोर्स खुलने से भले ही हमारे घर के बगल की दुकान की बिक्री पर असर पड़ रहा हो, लेकिन यह बात भी एकमत से स्वीकारी जाती है कि सुदूर भारत में ही नहीं दिल्ली के भी अल्प विकसित या आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की बस्तियों में चलने वाली किराना दुकानें नकली, मिलावटी और दोयम दर्जें के खाद्य पदार्थों की बिक्री का बड़ा अड्डा होती हैं। ऐसी दुकाने उपभोक्ता को तो ठगती ही हैं, सरकार को टैक्स की मार भी देती हैं। जानना जरूरी है कि बड़े रिटेल स्टोर्स में सामान की बिक्री बगैर बिल के होती नहीं है, सो कर चोरी के अवसर कम होते हैं। कहा जा सकता है कि वेट के लागू होने के बाद बिक्री पर कर चोरी की संभावना कम होती है। लेकिन यह तो तब संभव है जब दुकानों पर असली माल बिक रहा हो। यदि माल ही नकली व घटिया है तो जाहिर है कि उसके कारखाने भी चोरी-छिपे वाले होंगे और वे ना तो वेट देते होंगे ना ही सामान पर अन्य टैक्स।  अनुमान है कि यदि देष भर में दैनिक सामान की बिक्री पर ईमानदारी से कर वसूला जाए तो वह 900 अरब रूपए होगा। अभी यह वास्तविक का बीस फीसदी भी नहीं आता है। यही नहीं इस तरह अनियोजित सेक्टर में चल रही दुकानों में ढंग की तराजू तक नहीं होती है और आम उपभोक्ता कम तौलने का षिकार होता है।
बडे स्टोर, बड़ी पूंजी के साथ खुलेंगे तो उनमें रोजगार की संभावना बढ़ेगी। कम पढ़-लिखे युवाओं को अच्छे परिवेष में सुनिश्चित रोजगार बढ़ेगा।  इसका दुहरा असर हमारी अर्थ व्यवस्था पर पड़ेगा- रोजगार के अवसर विकसित होने से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, नकली सामान की बिक्री रुकने से कर वसूली मंे इजाफा। नकली सामान बनाने के कारखानों पर ताला लगने से हमारी औद्योगिक विकास की दर स्वतः ही बढ़ेगी। वैसे कन्फेडरेषन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स एसोषिएसन और भारतीय जनता पार्टी ने मंत्री समूह की इस सिफारिष पर विरोध प्रकट करते हुए, इससे देष की लाखों छोटी-बड़ी दुकानों के लिए खतरा बताया है। संस्था इसके विरेाध में धरने प्रदर्षन भी किए जा रेह हैं। लेकिन वे इस बात को नजर अंदाज  कर रहे हैं कि हिंदुस्तान लीवर व कुछ और कंपनियों ने छोटे-छोटे किराना दुकानों को ‘क्वालिटी स्टोर्स’ बना कर सामान बेचने के लिए नियोजित क्षेत्र में आने का अवसर दिया था, लेकिन वह योजना सफल ना होंने का कारण छोटे दुकानदारों की नियत में खोट होना था।
भारत की एक प्रमुख व्यावसायिक संस्था के फौरी सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा दुकानें भारत में हैं । जहां अमेरिका जैसे विकसित या सिंगापुर जैसे व्यापारिक देश में प्रति हजार आबादी पर औसत 7 दुकानें हैं , वहीं भारत में यह आंकड़ा 11 है । उपभोक्ताओं की संख्या की तुलना में भारत सबसे अधिक दुकानों वाला देश बन गया है । यह आंकड़ा भले ही आकर्शक लगता हो , लेकिन हकीकत यह है कि इन दुकानों का अधिकांष हिस्सा गुमटी, ठेले और गैरकानूनी तरीके से बने बाजारों  का है। उभरती अर्थ व्यवस्था में इस तरह के अनियोजित विकास को तिलांजली देना ही होगा और ऐसे में यदि बड़े विदेषी निवेष के साथ समान कर की षर्त के साथ कंपनियां आंचलिक क्षेत्रों तक जाती है तो यह देष के लिए सुखद ही होगा।


पंकज चतुर्वेदी
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