तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 12 जुलाई 2015

census with cast data :reverse gear on developmental pace

जाति, जनगणना, खाप और संविधान

                                                                                                                         पंकज चतुर्वेदी
JANSANDESH TIMES 13-7-15
यह अजब का अंतर्विरोध है- एक तरफ तो विज्ञान, तकनीकी, व्यापार और दीगर क्षेत्रों में दुनिया के षीर्श की ओर लपकने को लालयित होता देष है तो दूसरी ओर अभी भी मध्ययुगीन बर्बरताओं को सियासती मेकअप करने वोल राजनेता ; कहीं भी पर विशम आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद आईएएस, आईआईटी व अन्य खुली प्रतिस्पद्धाओं में आगे आ रहे विपन्न वर्ग के लोगों का तांता है तो साथ में खाते-पीते लोगों द्वारा खुद को असहाय बता कर आरक्षण की वैषाखी की मांग करना। एक तरफ संविधान की मूल भावना में निहित समतामूलक समाज की स्थापना के प्रति प्रतिबद्धता दुहराना तो दूसरी तरफ धार्मिक आधार पर आरक्षण या कुछ लोगों की मांग पर देष को जाति के आधार पर बांटने की सियासत खेलना।
मथुरा के चतुर्वेदी समम्मनित-कर्मकांडी ब्राहण कहलाते हैं और उनमें बदले में षादियो की परंपरा है- यानी इस घर की लड़की और उस घर के लड़के की बदले में षादी। चतुर्वेदियों में जीजा की बहन से मामा की षादी कोई गलत नहीं है, यानी जो लड़की की ननद है, वह मामी भी है। मेरी मामी, मेरी पत्नी की सगी बुआ भी हो सकती है। कुछ ही दूर बुंदेलखंड में जाएं तो ऐसे रिष्ते को सामाजिक मान्यता नहीं है।। मालवा में चाची की बहन चाची, मामी की बहन मामी और फूफा का भाई भी उसी रिष्ते का हकदार होता है। ब्रज के चतुर्वेदियों में ऐसा नहीं होता। उनके यहां चाची या मामी के भाई-बहन से सीधे रिष्ते हो जाते हैं। ये वही चतुर्वेदी हैं जो हिंदुओं की सभी जातियों में चरण धो कर पूजे जाते हैं। दक्षिण में तो मामा की बेटी से षादी को ही प्राथमिकता दी जाती है। जबकि बुंदेलखंड में भांजी के पैर उलटे मामा छूते हैं। खाप पंचायतों को कानूनी जामा पहनाने की मांग करने वाले जाटों के यहां अपनी जमीन पर हक सीमित रखने के लिए एक ही महिला से दो भाईयों षादी हो जाना या फिर जानसार बाबर में एक महिला के कई पति होना किसी से दबा-छिपा नहीं है। कुछ दिनों पहले दिल्ली हाई कोर्ट में एक अर्जी की सुनवाई करते हुए जब न्यायाधीष ने याचिकाकर्ता से पूछ लिया कि किस ग्रंथ में सगोत्रीय विवाह को निशेध कहा है तो याचिकाकर्ता बगलें झांकता दिखा।
आखिर इतनी सदियों से  यह समाज चल रहा है। स्थानीय देष-काल परिस्थितियों के अनुसार हर समाज, कुनबे और समूह ने अपने सामाजिक दायरे बना लिए थे। यही नहीं समय में बदलाव के साथ ये कानून बनते-बिगड़ते रहे। इसी समाज ने सती और बाल विवाह को मिटाया। इसी समाज ने बारात में पंजाबियों की तरह बैंड बजाने या वणिकों की तरह दहेज लेने-देने को अपना लिया। अभी कुछ साल पहले तक सातों जातों में पांच दिन की षादियां होती थीं, जो अब एक रात की हो गई।ं यही बदलाव इस समाज को जीवंत बनाए है। कुंभ या सिंहस्थ मे ंलाखों लोगों का पहुंचना, पर्व-त्योहारों को अपने तरीके से मनाने और आस्था को अपने सलीके से व्यक्त करने के लिए इस समाज को किसी ‘‘विष्व स्तर की परिशद’’ या रथयात्री की अपील-आव्हान की जरूरत नहीं होती है; भले ही वे भ्रम पाले रहते हों कि धर्म उनके जोर से चल रहा है और उनके नारों से बचा हुआ है।
पता नहीं कि यह अनायास हो गया कि किसी योजना के तहत हुआ- जहां एक तरफ कुछ लोग खाप पंचायतों के नाम पर मध्यकालीन बर्बरता को कानूनी जामा पहनाने की मांग कर रहे थे तो ठीक उसी समय कुछ लोग व दल जनगणना को जाति के आधार पर खुलासा करने के लिए जोर डाल रहे हैं तो साथ में कुछ नेता संप्रदाय के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की चिंगारी भड़काने में लगे हैं। यह बात अब किसी से छुपी नहीं हैं कि मंडल कमीषन की सियासत के गंभीर परिणाम इस मुल्क ने भोगे हैं, जिसमें सबसे बड़ा कलंक मंडल की  आग को थामने के लिए निकाला गया राम मंदिर का कमंडल था। अयोध्या का विवादास्पद ढंाचा गिराया जाना देष के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर सबसे बड़ा कलंक था। एक लंबा दौर चला अस्थिर और अल्पमत सरकारों का, जिनके पास विकास का कोई?एजेंडा ही नहीं था। हालांकि ऐसा एजेंडा आज भी नहीं है- अभी तो केवल गरीब को और गरीब तथा अमीर की तिजोरी को और समृद्ध करने की नीतियां ही विकास के नाम पर परोसी जा रही हैं। फिर भी षिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मसले मंदिर-मस्जिद पर भारी पड़ तो रहे ही हैं। देष में साक्षरता का आंकड़ा बढ़ रहा है और उसके साथ ही जागरूकता भी मीडिया के कंधों पर सवार हो कर उभर रही हैं।
 कोई कहता है कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी जिम्म्ेदारी, कोई कह रहा है कि हमरी पुष्तैनी रोजगार खेती-किसानी खतम हो रही है, सो हमारे पास नौकरी के अलावा कोई चारा नहीं है। एक तरफ से आवाज  आ रही है कि सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन- आरक्षण 50 फीसदी से अधिक ना हो , को मिटाने के लिए जाति आधारित जनगणना जरूरी है।  असली मसला वहीं खड़ा बिसुर रहा है कि क्या किसी भी तबके की तरक्की के लिए क्या आरक्षण एकमात्र रास्ता है ? यह तथ्य बड़ी चालाकी से छुपाया जा रहा है कि देष में रोजगार के कुल अवसरों में से महज 3 फीसदी ही सरकारी नौकरियां हैं। षेश 97 प्रतिषत बाजार का खुला हिस्सा है, जहां अधिकांष में काबिलियत और कुव्वत से ही जगह मिलती है। फिर इस महज तीन फीसदी के लिए क्यों कुहराम काटा जा रहा है? हाल के आंकड़ै बताते हैं कि 50 फीसदी से अधिक लोग तो दिहीड़ी मजदूरी से जीवन काट रहे हैं जहां ना तो कोई जात-बिरादरी है, ना ही आरक्षण।
यह सभी समाज षास्त्री स्वीकार करते हैं कि जातियों का निर्माण कर्म से हुआ। भंगी जैसी जातियां तो अभी दो सौ साल पुरानी भी नहीं है।। समय-चक्र घूम रहा हैं और चमड़े का इंजीनयिर बनने या फिर चप्पल के षोरूम खोलने में ब्राहण-बनियों को कोई संकोच नहीं हो रहा हैं। एयरपोर्ट व अन्य जगहों पर सफाई कर्मचारी के रूप में उंची जाति के लोग बड़ी संख्या में आ रहे है। वहीं गांवों से तेली, लुहार,बढ़ई, ढीमर, कलार जैसी जातियों के पारंपरिक काम हाथ से छूट गए हैं और उन पर पैसे वालों की मषीनों का कब्जा हो गया हैं। समाज और बदल रहा है, अब दर्जी, मोची जैसे लोगों के पास काम कम आ रहा है - कारण अब जमाना खराब चीजों की मरम्मत करवाने का नहीं उन्हें कबाड़े में फैंकने का हैं। कबाड़ी का धंधा सभी जाति के लोग कर रहे है। कागज बनाने वाले, भड़भूंजे जैसी जातियां तो अब विलुप्त ही हो गई हैं।
असल में जब आम आदमी को सुरक्षा की जरूरत थी, जब लोगों को किसी संस्कार में बांधने की जरूरत महसूस हो रही थी, तब कबीले, समाज या समूह बने। आज सुरक्षा, कानून के लिए सरकार है तो फिर उन पारंपरिक संस्थाओं की जरूरत ही खतम हो जाती है। कुछ लोग सत्ता को अपनी ताकत का  जरिया मानते हैं, ना कि जनसेवा का ; ऐसे ही लोग पुरातनपंथी कुरीतियों की दुहाई दे कर खाप पंचायतों या फिर जातिगत गणना का सहारा लेने की फिराक में रहते हैं। कभी सोचा है कि यदि जाति के आधार पर जनगणना होगी तो आगे चल कर जाति के आधार पर आरक्षण की बात भी होगी। यानी तय है कि यदि किसीसमाज या जाति के लोग कम संख्या में होंगे तो काबिलियत के आधार पर उनका आगे बढ़ना मुष्किल होगा। विडंबना है कि हमारी संसद हर दस साल में एक औपचारिकता निभा कर आरक्षण को दस साल के लिए आगे बढ़ा देती है। कभी कोई यह नहीं सोचता कि 60 साल में आरक्षण नीति के परिणाम क्या रहे ?इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों को मितले, इस पर नीति बनाने के मसले पर सभी मौन हैं।
याद करें कि अंग्रेज हिंदुस्तान को मुल्क मानते ही नहीं थे, वे तो कहते थे कि भारत विभिन्न जातियों और समुदायों का समूह मात्र है। संविधान सभा जानती थी कि जातियां समाज को खंडित करती हैं और खंडित समाज कमजोर होता है। संविधान सभा यह भी जानती थी कि अंग्रेज सरकार की धर्म-आधारित निर्वाचन नीति के कारण ही अलगाववादी सक्रिय हुए और उसी की दुखद परिणति देष का विभाजन हुआ। आज देष को जातियों के आधार पर गिनने की जिद ठाने नेताओं के मंसूबे भी जातिगत आधार पर निर्वाचन में आरक्षण ही है। कहने की जरूरत नहीं है कि उनका यह छिछोरा स्वार्थ देष को किस ओर ले जाएगा।
संविधान की प्रस्तावना में संुदर तरीके से लिखा है कि भारत का संविधान देष के हर नागरिक को प्रतिश्ठा और अवसर की समानता प्रदान करता है। खाप को जायज और जाितगत आधार पर समाज को बंटवारे के लिए उकसाने वाले असल में संविधान में निहित भावना को ही रौंद रहे हैं। क्या आप भी उनका साथ देंगे?
पंकज चतुर्वेदी
नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376


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