तालाब की बातें

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जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

An analysis of defence budget

स्‍वदेशी व खर्च कटौती से सुधरेगी सेना की सेहत 

                                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी 
केंद्र सरकार के 2016 के बजट में रक्षा सेवा को उम्मीद से कम धन के प्रस्ताव पर कुछ लोग सरकार की आलोचना कर रहे हैं। तुलना के लिए चीन का बजट दिखाया जा रहा है, जिसमें मंदी के बावजूद बेशुमार पैसा दिया गया है। बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो कम धन के कारण सेना के मनोबल पर विपरीत असर और अपने पड़ोसी खासतौर पर चीन की तुलना में कमजोर पड़ने की चेतावनी दे रहा है। इस बीच केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का एक बयान भी आया कि सरकार सेना के अवांछित खचोंर् को कम करेगी, जिसमें ऐसे गैरजरूरी पदों व विभागों को खत्म करना भी शामिल है, जोकि नई तकनीक के युग में गैरजरूरी या बेकार हो गए हैं। यदि सेना की किसी भी यूनिट में जा कर देखें तो पाएंगे कि वहां कई परंपराएं, व्यवस्थाएं अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही हैं और लोकशाही में उनका कोई अर्थ नहीं रह गया है। 

सेना के सामने अब चुनौतियां व खतरे नए तरीके के हैं और उनसे निबटने के लिए इंसान से ज्यादा तकनीक व अत्याधुनिक उपकरण कारगर हैं। ऐसे में स्पष्ट होता है कि यदि सरकार के पास सेना के खर्च घटाने और तकनीक से कार्यक्षमता बढ़ाने की कोई दूरगाामी कार्ययोजना है, यदि सरकार मेक इन इंडिया की नीति फौज में लागू करना चाहती है और रक्षा सामान विदेश से मंगाने के बनिस्पत अपनी ही आयुध निमार्णियों को सशक्त करना चाहती है तो बजट राशि कम होना कोई खास चिंता की बात नहीं है। यह बात तय है कि इस समय भारतीय सेना में बडे़ बदलाव की दरकार है, ताकि इंसानी ताकत को तकनीक के पंख लग सकें। हमारी विदेशों पर निर्भरता कम हो और नई वैश्विक चुनौतियों के बारे में नई रणनीति बन सके। बीते लगभग चार दशक से हर साल रक्षा बजट की बढ़ोतरी 15 प्रतिशत के आसपास होती है। लेकिन इस साल पिछले साल के बजट 2.46 लाख करोड़ रुपए की तुलना में मामूली इजाफा करके 2.49 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है। यह पिछले साल की तुलना में महज 0.9 प्रतिशत की वृद्धि है। इस वर्ष का रक्षा बजट 1962 के बाद से सबसे कम और सकल घरेलू उत्पाद का 1.62 प्रतिशत है। यह भी गौर करने लायक बात है कि वर्ष 2014-15 में 10,306 करोड़ का रक्षा बजट खर्च ही नहीं हुआ, जबकि 2015-16 में यह राशि बढ़कर 22,091 करोड़ हो गई। बजट का खर्च नहीं होना और कम बजट के लिए चीख-पुकार मचाना, इन दोनों के बीच बेहद गहरी चुप्पी और संबंध छुपा हुआ है। असल में मनोहर पर्रिकर के आने के बाद रक्षा सौदों से बिचौलिए और दलालों को बाहर करने का अभियान चला है। इसी डर से कई महत्वपूर्ण सौदे होते-होते रह गए और उसका धन बचा रह गया। यह भी जानना जरूरी है कि कई कथित रक्षा विशेषज्ञ , जोकि टीवी बहसों में लंबी-लंबी हांकते हैं व हमारी सेना में संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं, असल में सेना से सेवानिवृत्ति के बाद कई विदेशी हथियार सप्लायरों के लिए भारत में एजेंट के तौर पर काम करते हैं। दलाल-सफाई अभियान से चोट खाए ऐसे लेाग कम बजट, नाकाफी तैयारी का स्यापा कर असल में सरकार पर दवाब बनाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि धन की कमी के चलते ही सेना में माउंटेन कोर का गठन नहीं हो पा रहा है। खासकर पिछले महीने ही हमारे दस जवानों के सियाचीन में बर्फ में फंस कर मारे जाने के बाद माउंटेन कोर की जरूरत पर ज्यादा विमर्श हो रहा है। यूपीए-2 सरकार ने जुलाई 2013 में 90 हजार 274 अतिरिक्त सैनिकों के साथ कोर (17 कॉर्प्स) को खड़ा करने का फैसला किया था। इसपर 60 हजार 678 करोड़ रुपए का खर्चा आना था। इसे आठ सालों के अंदर 2020-21 तक खड़ा करना था। हालांकि, धन की कमी और डिफेंस पीएसयू व ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में स्वदेशी निर्माण शुरू नहीं होने के चलते सरकार ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। सेना का मानना है कि कई क्षेत्रों में तकनीकी तौर पर पिछड़ने के बाद सैनिकों की तैनाती का कोई विकल्प नहीं है। सेना को जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकियों से निपटने के साथ साथ चीन और पाकिस्तान से लगने वाले बॉर्डर की भी सुरक्षा करनी होती है। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चीन 2017 तक अपनी 23 लाख संख्या वाली सेना में 3 लाख सैनिकों की कटौती करेगा। तकनीकी सुधारों को देखते हुए 30 सालों में वह ऐसा पहली बार करने जा रहा है। हम इसके कहीं आस-पास भी नहीं हैं। वहीं, रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी इस बात पर जोर दिया है कि वेतन और पेंशन के बढ़ते बोझ के चलते सेना को अपने गैर क्रियाशील मैनपावर को खत्म करने पर विचार करना चाहिए। इस बार के बजट में 82 हजार करोड़ तो महज ओरओपी के लिए है। वेतन-भत्ते अलग।
जब हम अपनी रक्षा तैयारी की बात करते हैं तो हमारा मुकाबला चीन से होता है, क्योंकि एक तो वह पड़ोसी है, दूसरा उससे एक युद्ध में हम मात खा चुके हैं, तीसरा चीन से हमरा जमीन विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है, चौथा भारत तिब्बत की मुक्ति का समर्थन कर रहा है। चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना है, उसे बाद अमेरिका है और तीसरे नंबर पर भारत है। पिछले दिनों चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के वार्षिक सत्र में पेश बजट रिपोर्ट के मुताबिक, वह 2016 का रक्षा बजट 7.6 प्रतिशत बढ़ाकर 954 अरब युआन यानी लगभग 146 अरब डॉलर करने जा रहा है। पिछले साल रक्षा बजट में 10.1 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी। चीन इस बढ़ोतरी के बाद रक्षा पर सर्वाधिक खर्च करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। चीन ने अपना रक्षा बजट का औपचारिक एलान किया है। यह 140 अरब डॉलर से ज्यादा है यानी पिछली साल की तुलना में करीब 10 फीसदी अधिक। खास बात यह है कि चीन की आर्थिक प्रगति की दर इस साल कुछ कम हुई है, लेकिन उसने अपने रक्षा बजट को प्रभावित नहीं होने दिया है। भारत ने भी अपने रक्षा बजट को इस बार बढ़ाया है और यह 40 अरब डॉलर से कम है। इस तरह चीन और भारत के रक्षा बजट में एक खरब डॉलर से ज्यादा का फर्क है। यहां जानना जरूरी है कि चीन अपने रक्षा बजट को बहुत समझदारी से खर्च करता रहा है। उसने अपने टेक्नो मिलिट्री इंडस्ट्रियल बेस को बढ़ाया है और स्वदेशी सैन्य निर्माण को बेहतर किया है। इसके विपरीत हमरा बजट व्यय मूल रूप से कर्मियों के वेतन-भत्तों और हथियार आयात के मद में बढ़ता रहा है। यह दुनिया जानती है कि भातर के पास कंप्यूटर व तकनीक के श्रेष्ठतम दिमाग है और उनकी बड़ी संख्या दुनिया के अन्य देशों में अपनी सेवा दे रही हैं। हमारी आयुध निर्माणी यानी आर्डिनेंस फैक्ट्रियों में पुरानी मशीनों की भरमार है। हमारा शोध का संस्थान डीआरडीओ चाह कर भी नई, उन्नत तकनीक विकसित नहीं कर पा रहा है। जबकि हमें चीन से मुकाबले के लिए साइबर, स्पेस टेक्नोलॉजी और गाइडेड हथियारों की क्षमता हासिल करने पर भी काम करना होगा। यदि हम इस पर विदेशी निर्माताओं पर निर्भर रहे तो जरूरी नहीं कि उससे मिलती-जुलती तकनीक के हथियार ही सप्लायर पाकिस्तान को न बेच दे या चीन अपने गुपचुप खाते से ऐसे हथियार पाकिस्तान को खरीदवा दे। हमारे सामने असल चुनौती चीन का बजट या हमारा कथित कम बजट होना नहीं है, हमारी असली परीक्षा स्वदेशी तकनीक का विकास, सफेद हाथी बन गए महकमे और दलालों का मकड़जाल है। यह दुखद है कि पिछले दो साल के दौरान हमने तकनीक के अभाव में अपने कई समुद्री पोतों का नुकसान उठाया, हमारे सैनिक सियाचीन के बर्फ-मरुस्थल में मारे गए। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे सैनिक बल, साहस और क्षमता में दुनिया के श्रेष्ठतम और हर तरह की विषम परिस्थिति में काम करने में उच्चतम क्षमता रखने वाले हैं। लेकिन इसके साथ हमारे सहयोगी संस्थानों को भी मजबूत और समय के अत्याधुनिक बनाना होगा। इसमें 41 आर्डिनेंस फैक्ट्री, नौ प्रशिक्षण संस्थान, तीन क्षेत्रीय विपणन केंद्र, चार क्षेत्रीय सुरक्षा नियंत्रक और छह मुख्यालय प्रमुख है। यहां की कार्यशैली, आधुनिकीकरण तत्काल जरूरी है। साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन यानी डीआरडीओ की 48 प्रयोगशालों से नए शोध, उनका परीक्षण, नई खोजों को सेना को सौंपने तथा उनकी विदेश में मार्केटिंग को यदि नए सलीके से संवारा जाए तो मौजूदा बजट न तो कम है और न ही चीन की तुलना में कमतर।
= पंकज चतुर्वेदी

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