तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

Grabage from "Development "

विकास की अंधी दौड में उपजता जहरीला कचरा 

                                                                                                    पंकज चतुर्वेदी

हमारी सुविधाएं, विकास के प्रतिमान और आधुनिकता के आईने जल्दी ही हमारे लिए गले का फंदा बनने वाला है। देश के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन एसोचेम ने भी चेतानवी दी है कि आगामी 2018 तक भारत में हर साल 30 लाख मेट्रीक टन ई-कचरा उत्पादित होने लगेगा और यदि इसके सुरक्षित निबटारे के लिए अभी से काम नहीं किया गया तो देश की धरती, हवा और पानी में इतना जहर घुल जाएगा कि उसका निदान होना मुश्किल होगा। कहते हैं ना कि हर सुविधा या विकास की माकूल कीमत चुकानी ही होती है, लेकिन इस बात का नहीं पता था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी होगी। सनद रहे आज देश में लगभग 18.5 लाख टन ई-कचरा हर साल निकल रहा है। इसमें मुंबई से सबसे यादा एक लाख बीस हजार मे.टन, दिल्ली से 98 हजार मे.ट.और बंगलुरु से 92 मे.ट. कचरा है। दुर्भाग्य है कि इसमें से महज ढाई फीसदी कचरे का ही सही तरीके से निबटारा हो रहा है। बाकि कचरा अवैध तरीके से निबटने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस कचरे से बहुमूल्य धातु निकालने का काम दस से 15 साल की आयु के कोई पांच लाख बचे जुड़े हुए हैं और ऐसे बचों की सांस व शरीर में हर दिन इतना विष जुड़ रहा है कि वे शायद ही अपनी जवानी देख पाएं।
15 साल पुरानी वह घटना शायद ही किसी को याद हो, जब दिल्ली स्थित एशिया के सबसे बड़े कबाड़ी बाजार मायापुरी में कोबाल्ट का विकिरण फैल गया था, जिसमें एक मौत हुई व अन्य पांच जीवन भर के लिए बीमार हो गए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन विभाग ने एक बेकार पड़े उपकरण को कबाड़े में बेच दिया व कबाड़ी ने उससे धातु निकालने के लिए उसे जलाना चाहा था। उन दिनों व हादसा उच न्यायालय तक गया था। आज तो देश के हर छोटे-बड़े शहर में हर दिन ऐसे हजारों उपकरण तोड़े-जलाए जा रहे हैं जिनसे निकलने वाले अपशिष्ट का मानव जीवन तथा प्रकृति पर दुष्प्रभाव विकिरण से कई गुणा यादा है। यह भी तथ्य है कि हर दिन ऐसे उपकरणों में से कई हजार खराब होते हैं या पुराने होने के कारण कबाड़े में डाल दिए जाते हैं। ऐसे सभी इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। यही ई-कचरा कहलाता है और अब यह वैश्विक समस्या बन गया है।
इस कचरे से होने वाले नुकसान का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 38 अलग प्रकार के रासायनिक तत्व शामिल होते हैं जिनसे काफी नुकसान भी हो सकता है। जैसे टीवी व पुराने कम्प्यूटर मॉनिटर में लगी सीआरटी (केथोंड रे ट्यूब) को रिसाइकल करना मुश्किल होता है। इस कचरे में लेड, मरक्यूरी, केडमियम जैसे घातक तत्व भी होते हैं। दरअसल ई-कचरे का निपटान आसान काम नहीं है क्योंकि इसमें प्लास्टिक और कई तरह की धातुओं से लेकर अन्य पदार्थ रहते हैं। सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाईल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और ना जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। कैडमियम से फेफड़े प्रभावित होते हैं, जबकि कैडमियम के धुएं और धूल के कारण फेफड़े व किडनी दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलों से भी उपज रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वाइरनमेंट (सीएसई) ने कुछ साल पहले जब सर्किट बोर्ड जलानेवाले इलाके के आसपास शोध कराया तो पूरे इलाके में बड़ी तादाद में जहरीले तत्व मिले थे, जिनसे वहां काम करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका जताई गई, जबकि आसपास के लोग भी फसलों के जरिए इससे प्रभावित हो रहे थे।
भारत में यह समस्या लगभग 25 साल पुरानी है, लेकिन सूचना प्रोद्योगिकी के चढ़ते सूरज के सामने इसे पहले गौण समझा गया, जब इस पर कानून आए तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। घरों और यहां तक कि बड़ी कंपनियों से निकलने वाला ई-वेस्ट यादातर कबाड़ी उठाते हैं। वे इसे या तो किसी लैंडफिल में डाल देते हैं या फिर कीमती मेटल निकालने के लिए इसे जला देते हैं, जो कि और भी नुकसानदेह है।
वैसे तो केंद्र सरकार ने सन् 2012 में ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन नियम) 2011 लागू किया है, लेकिन इसमें दिए गए दिशा-निर्देश का पालन होता कहीं दिखता नहीं है। म.प्र. में भी खतरनाक अपशिष्ट (प्रबंधन, हैंडलिंग एवं सीमापार संचलन)अधिनियम-2008 में ही इलेक्ट्रॉनिक व इलेक्टिक वस्तुओं से निकलने वाले कचरे के प्रबंधन की व्यवस्था कई साल पहले से ही लागू कर दी गई थी, लेकिन म.प्र. प्रदूषण बोर्ड द्वारा लगातार इसकी अनदेखी की जा रही है।
अभी मई-2015 में ही संसदीय समिति ने देश में ई-कचरे के चिंताजनक रफ्तार से बढ़ने की बात को रेखांकित करते हुए इस पर लगाम लगाने के लिए विधायी एवं प्रवर्तन तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की है ताकि भारत को विकसित देशों के ई-कचरा निपटारा करने का स्थल बनने से रोका जा सके। कई रिपोर्टो में इस बात के संकेत प्राप्त हुए हैं कि ई-कचरा विकसित देशों से एशिया, अफ्रीका और लातीन अमेरिकी देशों में भेजे जा रहे हैं और यह उपयोग किये गए उत्पाद के नाम पर भेजे जा रहे हैं ताकि इसके रिसाइकिल करने के खर्च से बचा जा सके। पर्यावरण मंत्रलय के लिए 2015-16 की अनुदान की मांगों से संबंधित समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति देश को विकसित देशों के ई-कचरा निपटारा करने का स्थल बनने से रोकने के लिए इस पर लगाम लगाने के लिए विधायी एवं प्रवर्तन तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की है।
असल में ई-कचरे के आतंक के समाधान का मंत्र है - जागरूकता व बचाव ही असली निदान है। ई-वेस्ट से निपटने का सबसे अछा मंत्र रिड्यूस, रीयूज और रीसाइकलिंग का है। रिड्यूज यानि कम से कम कचरा जमा करें, यानि जब तक जरूरी ना हो, अपने इलेक्ट्रानिक उपकरण बदलें नहीं। यदि उपकरण काम कर रहा है तो उसे किसी जरूरतमंद को इस्तेमाल करने दें। रीयूज यानि फिर से इस्तेमाल करना। यदि उपकरण में कोई मामूली कमी है। तो उसकी मरम्मत करवा कर अधिक दिनों तक प्रयोग में लाएं। रीसाइकलिंग का अर्थ कतई वे तरीके नहीं है जिनकी चर्चा ऊपर आलेख में की गई है। हमारे देश में हालांकि बहुत कम हैं, लेकिन कई कंपनियां काम कर रही हैं जो ई-कचरे का निबटारा वैज्ञानिक तरीके से करती हैं। अपने बेकार उपकरण कबाड़ी को नहीं, बल्कि ऐसी कंपनियों को दें। नया इलेक्ट्रानिक उपकरण खरीदते समय इस बात को ध्यान दें कि कौन सी कंपनियां पुराने उपकरणों को लेती हैं तथा किन के पास ऐसे कचरे के निस्तारण की व्यवस्था है। जब उपभोक्ता ऐसी कंपनियों की ओर जाएगा तो सभी उत्पादकों को कचरे के निस्तारण के वैज्ञानिक तरीके वाले कारखाने स्थापित करने होंगे।

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