तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

बुधवार, 24 अगस्त 2016

Catch them young, but when ?

बाजार में खेल, खेल का बाजार

                                                                                                                                     पंकज चतुर्वेदी
जिस समय पूरा देश पीवी सिंधु पर चार करोड़ रूप्ए व ढेर सारा प्यार लुटा रहा था, तभी पटियाला की खेल अकादेमी की एक हेड बाल खिलाडी पूजा के लिए महज 3750 रूपए बतौर होस्टल की फीस ना चुका पाने का दर्द असहनीय हो गया था और उसने आत्महत्या कर ली थी। उससे दो दिन पहले विभिन्न राज्य सरकारों की तर्ज पर मध्यप्रदेश षासन कुश्ती में देश का नाम रोशन करने वाली साक्षी मलिक को दस लाख रूपए देने की घोशणा कर रहा था, तभी उसी राज्य के मंदसौर से एक एक ऐसी बच्ची का कहानी मीडिया में तैर रही थी जो कि दो बार प्रदेश की हॉकी टीम में स्थान बना कर नेशनल खेल चुकी है, लेकिन उसे अपना पेट पालने के लिए दूसरों के घर पर बरतन मांजने पड़ते हैं। सफल खिलाड़ी व संघर्शरत या प्रतिभावान खिलाड़ी के बीच की इस असीम दूरी की कई घटनाएं आए रोज आती है, जब किसी अंतरराश्ट्रीय स्पर्धा में हम अच्छा नहीं करते तो कुछ व्यंग्य, कुछ कटाक्ष, कुछ नसीहतें, कुछ बिसरा दिए गए खिलाड़ियों के किस्से बामुश्किल एक सप्ताह सुर्खियों में रहते हैं। उसके बाद वही संकल्प दुहराया जाता है कि ‘‘कैच देम यंग’’ और फिर वही खेल का ‘खेल’ षुरू हो जाता है।
एरिक प्रभाकर। यह नाम कई के लिये नया हो सकता है लेकिन अगर आप भारतीय ओलंपिक के इतिहास को खंगालेंगे तो इस नाम से भी परिचित हो जाएंगे। 23 फरवरी 1925 को जन्में प्रभाकर ने 1948 में लंदन ओलंपिक में भारत की तरफ से 100 मीटर फर्राटा दौड़ में हिस्सा लिया था। उन्होंने 11.00 सेकेंड का समय निकाला और क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे। महज षुरू दशमलव तीन संेकड से वे पदक के लिए रह गए थे। हालांकि  सन 1944 में वे 100 मीटर के लिए 10.8 सेकंड का बड़ा रिकार्ड बना चुके थे। वे सन 1942 से 48 तक लगातार छह साल 100 व 400 मीटर दौड के राश्ट्रीय चेंपियन रहे थे।  उस दौर में अर्थशास्त्र में एमए, वह भी गोल्ड मेडल के साथ, फिर आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शिक्षा के लिए रोड्स फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय, यही नहीं आजाद भारत की पहली आईएएस में चयनित श्री एरिक प्रभाकर की किताब  ‘द वे टु एथलेटिक्स गोल्ड’ सन 1994 में आई थी व बाद में उसका हिंदी व कई अन्य भारतय भाशाओं में अनुवाद नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापा। काश हमारे खेल महकमे में से किसी जिम्मेदार ने उस पुस्तक को पढ लिया होता। उन्होंने बहुत बारीकी से और वैज्ञानिक तरीके से समझाया है कि भारत में किस तरह से सफल एथलीट तैयार किये जा सकते हैं। उन्होंने इसमें भौगोलिक स्थिति, खानपान चोटों से बचने आदि के बारे में भी अच्छी तरह से बताया है। भारतीय खेलों के कर्ताधर्ताओ हो सके तो कभी यह किताब पढ़कर उसमें दिये गये उपायों पर अमल करने की कोशिश करना। यदि वह पुस्तक हर खिलाड़ी, हर कोच, प्रत्येक खेल संघ के सदस्यों को पढने और उस पर ईमादारी से मनन करने को दी जाए तो मैं गारंटी से कह सकता हूं कि परिणाम अच्छे निकलेंगे। कुछ दशक पहले तक स्कूलों में राश्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज जैसे आयोजन होते थे जिसमें दौड, लंबी कूद, चक्का फैक जैसी प्रतियोगिताओं में बच्चों को प्रमाध पत्र व ‘सितारे’ मिलते थे। वे प्रतियोगिताएं स्कूल स्तर, फिर जिला स्तर और उसके बाद राश्ट्रीय स्तर तक होती थीं। तब निजी स्कूल हुआ नहीं करते थे या बहुत कम थे और कई बार स्कूली स्तर पर राश्ट्रीय रिकार्ड के करीब पहुंचने वाली प्रतिभाएं भी सामने आती थीं। जिनमें से कई आगे जाते थे। ऐसी प्रतिभा खेाज की नियमित पद्धति अब हमारे यहां बची नहीं है। कालेज स्तर की प्रतियोगिताओं में जरूर ऐसे चयन की संभावना है, लेकिन चीन, जापान के अनुभव बानगी हैं कि ‘‘केच देम यंग’’ का अर्थ है कि सात-आठ साल से कड़ा परिश्रम, सपनों का रंग और तकनीक सिखाना। चीन की राजधानी पेईचिंग में ओलंपिक के लिए बनाया गया ‘बर्डनेस्ट स्टेडियम’ का बाहरी हिस्सा पर्यटकों के लिए है लेकिन उसके भीतर सुबह छह बजे से आठ से दस साल की बच्चियां दिख जाती है।
वहां स्कूलों में खिलाड़ी बच्चों के लिए शिक्षा की अलग व्यवस्था होती है, तोकि उन पर परीक्षा जैसा दवाब ना हो। जबकि दिल्ली में स्टेडियम में सरकारी कार्यालय व सचिवालय चलते हैं। कहीं षादियां होती हैं। महानगरों के सुरसामुखी विस्तार, नगरों के महानगर बनने की लालसा, कस्बों के षहर बनने की दौड़ और गांवों के कस्बे बनने की होड़ में मैदान, तालाब, नदी बच नहीं रहे हैं झारख्ंाड में नेशनल लेबल के तैराक बच्चे ऐसे पोखर में अभ्यास करते हैं जिसमें घडियाल , सांप या मेढक आम है। मैदान कंक्रीट के जंगल के उदरस्थ हुए तो खेल का मुकाम क्लब या स्टेडियम में तब्दील हो गया। वहां जाना, वहां की सुविधाओं का इस्तेमाल करना आमोखास के बस की बात होता नहीं । जब दिल्ली में स्टेडियमों में स्कूल के आयेाजन या षादियों होती हैं तो जान लें कि जिला स्तर पर ऐसे सार्वजनिक खेल परिसरों के हालात क्या होंगे।
ख्ेाल के एसोशिसन किस तरह सियासतदां के अखाड़े बन गए हैं और उनका खेल व खिलाड़ी के प्रति कितना सम्मान है, उसका खुलासा हाल के रियो ओलंपिक में गए सैंकड़ाभर से ज्यादा गैर खिलाड़ियों के दल ने कर दिया है। विजेता खिलाड़ियों पर जिस तरह से लेाग पैसा लुटाते हैं असल में यह उनका खेल के प्रति प्रेम या खिलाड़ी के प्रति सम्मान नही होता, यह तो महज बाजार में आए एक नए नाम पर निवेश होता है। क्रिकेट की बानगी सामने है, जिसमें ट्रैनिंग से ले कर आगे तक कारपोरेट घरानों का सहयोग व संलिप्तता है।
यह जान लेना जरूरी है कि अंतरराश्ट्रीय स्तर पर हमारे खिलाड़ी तैयार ना होने का सबसे बड़ा कारण हमारे यहां छोटी उम्र में प्रतिभाओं की पहचान व उनको सहयोग ना मिल पाना हे। रूस, चीन या अमेरिका में जिस उम्र में खिलाड़ी अंतरराश्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ देते हैं, हमारे यहां उस उम्र में उनकी शिनाख्त हो पाती है। हमारे यहां बच्चों के लिए, शिक्षा के लिए किए जा रहे काम को जिम्मेदारी से ज्यादा धर्माथ का काम माना जाता है और तभी स्कूलों, हॉस्टल, खेल मैदान, खिलाड़ियों की दुर्गति, स्कूली टूर्नामेंट स्तर पर खिलाड़ियों को ठीक से खाना तक नहीं मिलना जैसी बातों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता। हुक्मुरान समझते हैं कि ‘‘इतना कर दिया वह कम है क्या’’। मुल्क का हर बच्चा भलीभंाति विकसित हो, शिक्षित हो, उसकी प्रतिभा को निखरने का हरसंभव परिवेश मिले, यह देश के लिए अनिवार्य है, ना कि इसके लिए किए जा रहे सरकारी बजट का व्यय कोई दया । यह भाव जब तक पूरी मशीनरी में विकसित नहीं होगा, हम बालपन में उर्जावान, उदीयमान और उच्च महत्वाकांक्षा वाले बच्चों को सही ऊंचाई तक नहीं ले जा पांगे।
स्थानीय टूर्नामेंट की बात क्या की जाए, जब ओलंपिक में गए दल के किसी सदस्य के पास जर्सी नहीं थी तो किसी के पास फिजियोथेरेपिस्ट। डाक्टर तक नहीं था, एक रेडियोलोजिस्ट को डाक्टर के तौर पर भ्ेाज दिया गया था जो कि पेरासीटामाल से ज्यादा दवाई नहीं जानता था। ऐसी घटनाओं पर चुप्पी व ऐस करने वालों पर कड़ी कार्यवाही ना होना, खेल के  प्रति देश के लापरवाह नजरिये का प्रतिबिंब है। देश के हर कोने में जिम्नास्ट, दौड़, लंबी कूद कुश्ती की प्रतिभाएं छिपी हैं, लेकिन दिल्ली, हरियाणा के अखाड़े के पहलवान 15 सल मिट्टी में तन घोटने के बाद किसी क्लब में बाउंसर बन जाते हैं या किसी गिरोह के सदस्य। षायद ही कोई ऐसा जिला मिले , जहां कोई राश्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी जीवनयापन की जद्दोजहद में अपनी प्रतिभा को होम करता ना मिले। हर कस्बे में आठ से दस साल के बच्चों में कामल करने की क्षमता वाले दर्जनों मिलेंगे। लेकिन हम तो उगते सूरज पर ही अर्ध्य चढ़ाने के आदी हैं। टिमटिमाते सितारों को अनगिनत मान कर विस्मृत करना हमारी फितरत है।
अब समाज को ही अपनी प्रतिभाओं को तलाशने, तराशने का काम अपने जिम्मे लेना होगा। किस इलाके की जलवाुय कसी है और वहां किस तरह के खिलाड़ी तैयार हो सकते हंे इस पर वैज्ञानिक तरीके से काम हो। जैसे कि समुंद के किनारे वाले इलाकों में दौड़ने का स्वाभाविक प्रभाव होता हे। पूर्वोत्तर में षरीर का लचीलापन है तो वहां जिम्नास्टिक, मुक्केबाजी पर काम हो। झाारखंड व पंजाब में हाकी। ऐसे ही इलाकों का नक्शा बना कर प्रतिभाओं को उभारने का काम हो। जिला स्तर पर समाज के लेागों की समितियां, स्थानीय व्यापारी और खेल प्रेमी ऐसे लेागों को तलाशंे। इंटरनेट की मदद से उनके रिकार्ड को आंकड़ों के साथ प्रचारित करें। हर जिला स्तर पर अच्छे एथलेटिक्स के नाम सामने होना चाहिए। वे किन प्रतिस्पर्दाओं में जाएं उसकी जानकारी व तैयारी का जिम्मा जिला खेल कमेटियों का हो। बच्चों को संतुलित आहार, ख्ेलने का महौल, उपकरण मिले,ं इसकी पारदर्शी व्यवस्था हो और उसमें स्थानीय व्यापार समूहों से सहयोग लिया जाए। सरकार किसी के दरवाजे जाने से रही, लेागों को ही ऐसे लेागों को षासकीय योजनाओं का लाभ दिलवाने के प्रयास करने होंगे। सबसे बड़ी बात जहां कहीं भी बाल प्रतिभा की अनदेखाी या दुभात होती दिखे, उसके खिलाफ जोर से आवाज उठानी होगी।

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